बुधवार, 6 अक्टूबर 2010

क्यों पिछड़ा है राजस्थानी सिने उद्योग

राजस्थानी सिनेमा का यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि हिंदी की मुख्यधारा की फिल्मों में राजस्थानी परिवारों की कहानियां हिट रहती हैं, लेकिन राजस्थानी भाषा का अपना सिनेमा न तो क्लासिक और न ही कमर्शियल फिल्म के तौर पर अब तक खास पहचान बना पाया है। हालांकि हिंदी का शुरूआती सिनेमा राजस्थानी रजवाड़ों की कहानियों से भरा पड़ा था। मीराबाई से लेकर पन्ना धाय तक की कहानियां भी हिंदी सिनेमा का विषय बन चुकी हैं। मुगल-ए-आजम से लेकर जोधा-अकबर जैसी फिल्मों ने राजस्थानी पृष्ठभूमि का हिंदी सिनेमा ने कलात्मक और व्यवसायिक दोहन किया है। राजस्थानी तर्ज के नीबूड़ा-नीबूड़ा जैसे कई गीतों ने हिंदी सिनेमा के हिट होने में अहम योगदान दिया है। हम दिल दे चुके सनम तो पूरी तरह राजस्थानी पृष्ठभूमि की ही फिल्म थी। फिर क्या वजह है कि राजस्थानी सिनेमा अपनी अलहदा पहचान नहीं बना पाया। इसका जवाब देते हैं हिंदी में कई हिट फिल्में बना चुके के सी बोकाड़िया। आज का अर्जुन, तेरी मेहरबानियां जैसी हिट फिल्में बनाने और निर्देशित करने वाले बोकाड़िया राजस्थान के ही मेड़ता सिटी के रहने वाले हैं। उनका कहना है कि राजस्थान में हर 20-25 किलोमीटर के बाद भाषा बदल जाती है। यही वजह है कि राजस्थानी सिनेमा की दुर्दशा हो रही है। क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों के पिछड़ने की वजह की जब भी चर्चा होती है, तब यही सवाल उठता है। हरियाणा अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टीवल में हरियाणवी फिल्मों के विकास पर हो रही गोष्ठी में भी यही मजबूरी निर्माता-निर्देशक अश्विनी चौधरी ने जताई थी।
सवाल यह है कि क्या सचमुच बोलियों में विविधता ही हरियाणवी या राजस्थानी सिनेमा के विकास की बड़ी बाधा हैं। यह तर्क देने वाले भूल जाते हैं कि इस देश में बरसों से कहावत चली आ रही है- कोस-कोस पर पानी बदले, तीन कोस पर बानी। यह स्थिति भारत की हर भाषा की है। तेलुगू, तमिल, कन्नड़, मलयालम, मराठी, बांग्ला, भोजपुरी कोई भी ऐसी बोली नहीं है, जिसे उसके प्रभाव क्षेत्र में एक ही तरह से बोला जाता हो। खुद हिंदी के साथ भी ऐसी स्थिति नहीं है। बिहार वाले की हिंदी, मध्य प्रदेश वाले की हिंदी से अलग है। लखनऊ समेत मध्य उत्तर प्रदेश का व्यक्ति जिस हिंदी का इस्तेमाल करता है, झारखंड या छत्तीसगढ़ की हिंदी से वह अलग होती है। लेकिन क्षेत्रीय भाषाओं और हिंदी का सिनेमा चल रहा है। उसकी व्यवासियक और क्लासिकल, दोनों पहचान है। ऐसे में बोलियों की विविधता को क्षेत्रीय सिनेमा के विकास में बाधक मानने वाले तर्क पर गौर किया जाना जरूरी है।

सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

क्षेत्रीय सिनेमा के विकास के लिए राज्य का संरक्षण जरूरी


समानांतर और सरोकार वाले सिनेमा को लेकर अपने यहां जब भी चर्चा होती है, बांग्ला और मलयालम जैसी क्षेत्रीय भाषाओं का नाम सबसे उपर होता है। सार्थक सिनेमा की कड़ी में मराठी, उड़िया और असमी जैसी भाषाओं ने भी अपनी पहचान दर्ज करा दी है। कमर्शियल फिल्मों की दुनिया में तमिल, तेलुगू, कन्नड़ का कोई जोड़ नहीं है। भोजपुरी तो इन दिनों अपने कमर्शियल सिनेमा को लेकर क्षेत्रीय भाषाओं में नई पहचान बना रही है। इन अर्थों में देखा जाय तो हरियाणवी फिल्मों का अब तक का विकास निराश करता है। हरियाणा के यमुनानगर में आयोजित तीसरे अंतरराष्ट्रीय हरियाणा फिल्म फेस्टिवल में हरियाणवी सिनेमा का विकास विषय पर आयोजित गोष्ठी में इसी निराशा को समझने की कोशिश की गई। इस मौके पर अपनी पहली ही हरियाणवी फिल्म लाडो से चर्चित हो चुके अश्विनी चौधरी ने मार्के की बात कही। उन्होंने कहा कि अच्छे सिनेमा का बेहतर स्रोत साहित्य होता है। सच कहें तो सिनेमा के लिए साहित्य परखा हुआ दस्तावेज होता है। लेकिन हरियाणवी सिनेमा का संकट यह है कि यहां कोई अपना साहित्य ही नहीं है। यही वजह है कि जब कोई हरियाणवी सिनेमा में हाथ आजमाना चाहता है तो कहानी के लिए उसे लोक साहित्य की ओर देखना पड़ता है। लेकिन लोक के साथ संकट यह है कि वह सिनेमा के लिए हर वक्त उर्वर और कामयाब कहानी नहीं दे सकता। कमर्शियल सिनेमा को जहां आम लोगों का साथ मिलता है, वहीं सरोकारी सिनेमा को समाज के प्रबुद्ध वर्ग का साथ मिलता है। अश्विनी चौधरी के मुताबिक हरियाणवी समाज में इसकी भी कमी है और सबसे बड़ी बात यह है कि हरियाणा की बोलियों में एक रूपता नहीं हैं। यही वजह है कि अगर कोई हरियाणवी फिल्म बनाना चाहता है तो उसके सिनेकार को ये चिंता सताती रहती है कि वह किस बोली में फिल्म बनाए।
बोलियों की समस्या को लेकर अश्विनी चौधरी की इस राय से हरियाणवी सिनेमा की पहली सुपर हिट फिल्म चंद्रावल की हीरोईन ऊषा शर्मा सहमत नहीं हैं। उनका कहना था कि अगर बोलियां बाधा रहतीं तो उनकी फिल्म हरियाणा के बाहर उत्तरी राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दिल्ली और पंजाब के कुछ हिस्सों तक में हिट रही थी।
गोष्ठी में शामिल सभी वक्ता कम से एक मुद्दे पर सहमत थे। उनका मानना था कि क्षेत्रीय सिनेमा के पनपने में राज्य का सहयोग कम से कम शुरूआती दौर में होना चाहिए। क्योंकि जहां-जहां क्षेत्रीय सिनेमा विकसित हुआ है, वहां – वहां क्षेत्रीय सिनेमा का शुरूआती दौर में राज्य ने संरक्षण दिया है।
चंद्रावल का सीक्वल बनाने जा रही ऊषा शर्मा को अफसोस है कि हरियाणा में अब तक राज्य की अपनी कोई फिल्म पॉलिसी नहीं है। 1985 में उन्होंने राज्य के मुख्यमंत्री से फिल्म नीति बनाने की मांग रखी थी। इसमें हरियाणवी भाषा में कम से कम दो फिल्में बना चुके निर्माता को तीस लाख रूपए का राजकीय अनुदान देने की मांग रखी थी। इसके साथ ही उन्होंने कम से कम अस्सी फीसदी शूटिंग हरियाणा में होने वाली फिल्मों को भी यही सहायता देने की मांग रखी थी। इसके साथ ही हर सिनेमा हॉल को हरियाणवी फिल्में कम से कम हर हफ्ते दो शो दिखाने की मांग भी रखी। यह सच है कि अगर यह मांग मान ली जाती तो शायद हरियाणा में सिनेमा के विकास को गति मिल सकती थी। लेकिन अधिकारियों के चलते अब तक न तो राज्य की अपनी फिल्म पॉलिसी बन पाई है और न ही सिनेमा हॉलों को कोई आदेश दिया जा सका है।
ऊषा शर्मा की इस राय से सहमत होने के बावजूद भोजपुरी जैसी क्षेत्रीय भाषाओं के सिनेमा का विस्तार सवाल खड़े करता है। यह सच है कि भोजपुरी का बाजार हरियाणवी की तुलना में बड़ा है। लेकिन यह भी सच है कि उसे न तो बिहार, न ही उत्तर प्रदेश और न ही झारखंड की सरकारों से कोई प्रोत्साहन मिल पाया है। इसके बावजूद कम से कम कमर्शियल स्तर पर भोजपुरी सिनेमा का विस्तार होता जा रहा है। इसका जवाब अश्विनी चौधरी की तकरीर में मिलता है। अश्विनी चौधरी ने कहा कि सिनेमा को बढ़ावा देने में मध्य वर्ग का भी योगदान होता है, लेकिन हरियाणा में कम से कम अपने सिनेमा से प्यार करने वाला मध्यम वर्ग विकसित नहीं हो पाया है। अगर इन तर्कों को ही आखिरी मान लिया जाएगा तो हरियाणवी ही नहीं, किसी भी भाषा और उसके सिनेमा के विकास की गुंजाइश कम होती जाएगी। इस मसले पर सबसे बढ़िया सुझाव रहा शीतल शर्मा का, जिनका कहना था कि अगर रचनात्मक लोग आगे आंएगें तो मध्यवर्ग को आकर्षित किया जा सकेगा और बोलियों की एक रूपता के संकट से भी पार पाया जा सकेगा।
गोष्ठी का संचालन कर रहे हरियाणा के मशहूर संस्कृतिकर्मी अनूप लाठर ने महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने कहा कि बाजार तो चंद्रावल ने ही बना दिया था। यह बात और है कि उस बाजार की दिशा में हरियाणवी सिनेमा आगे नहीं बढ़ पाया। उनके मुताबिक शुरूआती हरियाणवी सिनेमा में प्रशिक्षित कलाकारों की कमी तो थी ही, आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल भी कम ही हुआ। अपनी फिल्म लाडो के संदर्भ में अश्विनी चौधरी भी इस तथ्य से सहमत नजर आ रहे थे।
ऐसी गोष्ठियों का मकसद किसी मुकम्मल नतीजे पर पहुंचना होता है। हालांकि यह गोष्ठी किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाईं। लेकिन अजित राय के शब्दों में कहें तो ऐसी गोष्ठियां किसी मसले का रातोंरात हल नहीं सुझातीं, बल्कि बदलाव की जमीन तैयार करती हैं। ऐसे में यह उम्मीद करना बेमानी नहीं होगा कि हरियाणवी फिल्म के विकास की दिशा में यह गोष्ठी भी एक कदम जरूर साबित होगी।

रविवार, 3 अक्टूबर 2010

अलग –अलग विधा हैं साहित्य और सिनेमा



साहित्य और सिनेमा के रिश्ते की जब भी चर्चा होती है, हिंदी में एक तरह की वैचारिक गर्मी आ जाती है। किसी साहित्यिक कृति पर बनी फिल्म को लेकर अक्सर साहित्यकारों को शिकायत रहती है कि फिल्मकार या निर्देशक ने उसकी रचना की आत्मा को मार डाला। हिमांशु जोशी ने अपनी कहानी सुराज पर बनी फिल्म में मनमाने बदलाव के बाद भविष्‍य में अपनी कहानी पर फिल्म बनाने की अनुमति देने से कान ही पकड़ लिये। हालांकि राजेंद्र यादव, जिनके मशहूर उपन्यास सारा आकाश पर इसी नाम से फिल्म बन चुकी है, मानते रहे हैं कि कहानी और उपन्यास जहां लेखक की रचना होती है, वहीं फिल्म पूरी तरह निर्देशक की कृति होती है। कुछ ऐसा ही विचार हरियाणा अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टीवल के तीसरे दिन सिनेमा और साहित्य के रिश्ते पर आयोजित गोष्ठी में शामिल वक्ताओं के भी रहे।
मशहूर फिल्मकार के. बिक्रम सिंह का कहना है कि साहित्य और सिनेमा के रिश्ते पर चर्चा के वक्त हिंदी में विवाद की असल वजह है कि दरअसल हिंदी में विजुअल आधारित सोच का विकास नहीं हुआ है, बल्कि सोच में शाब्दिकता का जोर ज्यादा है। उनका कहना है कि सिनेमा में कला, संगीत, सिनेमॉटोग्राफी, कला निर्देशन जैसी कई विधाओं का संगम होता है। ऐसे में साहित्य को पूरी तरह से सेल्युलायड पर उतारना संभव नहीं होता। उन्होंने सत्यजीत रे की फिल्म पाथेर पांचाली का उदाहरण देते हुए कहा कि इस उपन्यास में जहां करीब पांच सौ चरित्र हैं, वहीं फिल्म में महज दस-बारह। उन्होंने श्रीलंका के मशहूर उपन्यासकार लेक्सटर जेंस पेरी का उदाहरण देते हुए कहा कि उनके उपन्यास टेकावा पर जब फिल्म बनी और उनसे प्रतिक्रिया पूछी गई तो पैरी ने कहा था कि उपन्यास उनका है, जबकि फिल्म निर्देशक की है। उन्होंने रवींद्र नाथ टैगोर के हवाले से कहा कि सिनेमा कला के तौर पर तभी स्थापित हो सकेगा, जब वह साहित्य से छुटकारा पा लेगा। हालांकि मशहूर फिल्म समीक्षक और कवि विनोद भारद्वाज ने रवींद्र नाथ टैगोर की कहानी चारूलता का उदाहरण देते हुए कहा कि अच्छे साहित्य पर अच्छी फिल्में बनाई जा सकती हैं। जिस पर सत्यजीत रे ने बेहतरीन फिल्म बनाई है। भारद्वाज ने शरत चंद्र के उपन्यास देवदास पर बनी विमल राय की फिल्म देवदास और अनुराग कश्यप की देव डी का उदाहरण देते हुए कहा कि एक ही कृति पर अलग-अलग ढंग से सोचते हुए अच्छी फिल्में जरूर बनाई जा सकती हैं। उनका सुझाव है कि साहित्यकारों को यह सोचना चाहिए कि महान साहित्यिक कृतियों के फिल्मांकन के वक्त छेड़छाड़ उस कृति की महानता से छेड़छाड़ नहीं है। साहित्यिक कृतियों पर बनने वाली फिल्मों की रिलीज के बाद साहित्य और सिनेमा के रिश्तों में आने वाली तल्खी का ध्यान फ्रेंच फिल्मकार गोदार को भी था। यही वजह है कि वे अच्छी और महान कृति पर फिल्म बनाने का विरोध करते थे। वैसे सिनेमा और साहित्य के रिश्ते को समझने के लिए फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान, पुणे के पूर्व निदेशक त्रिपुरारिशरण नया नजरिया देते हैं। उनका कहना है कि चूंकि साहित्य का जोर कहने और सिनेमा का जोर देखने पर होता है, लिहाजा भारत में दोनों विधाओं के रिश्तों में खींचतान दिखती रही है। उनका मानना है कि चूंकि यूरोप में कहने और देखने का अनुशासन विकसित हो चुका है, लिहाजा वहां साहित्य और सिनेमा के रिश्ते को लेकर वैसे सवाल नहीं उठते, जैसे भारत में उठते हैं। शरण के मुताबिक यही वजह है कि भारत में प्रबुद्ध सिनेकार महत्वपूर्ण रचनाओं को छूना तक नहीं चाहते। उनका सुझाव है कि सिनेमा और साहित्य असल में दो तरह की दो अलग विधाएं हैं, लिहाजा उनके बीच तुलना होनी ही नहीं चाहिए।

पुस्तक समीक्षा


संपादकीय लेखन के विकास का गवाह

उमेश चतुर्वेदी
हिंदी पत्रकारिता को शुरूआती दौर में वे सारी चुनौतियां झेलनी पड़ीं, जिनका सामना उदारीकरण के दौर में आए मीडिया बूम के पहले तक सामना करना पड़ रहा था पाठकों की संख्या, ग्राहकों की उदासीनता और पैसे की कमी ने हिंदी पत्रकारिता को शुरूआती दौर से ही परेशान किए रखा है। पिछली सदी के शुरूआती बरसों में ये चुनौतियां और भी पहाड़ सरीखी अंग्रेजी राज के दमन तंत्र के चलते हो जाती थीं। इसके बावजूद प्रताप नारायण मिश्र का चाहे ब्राह्मण नामक पत्र हो या फिर गणेश शंकर विद्यार्थी का प्रताप या फिर माधव राव सप्रे का छत्तीसगढ़ मित्र, हर पत्र का संपादक अपने दौर की समस्याओं को लेकर अपने संपादकीयों में चिंता जाहिर करता रहा है। तरूशिखा सुरजन के संपादन में आई किताब हिंदी पत्रकारिता का प्रतिनिधि संकलन के पृष्ठों से गुजरते हुए इसके बार-बार दर्शन होते हैं।
हिंदी पत्रकारिता में एक प्रवृत्ति आज भी देखने को मिलती है। अखबारों की तुलना में पत्रिकाओं को चलाना और उनमें लिखना-पढ़ना कहीं कम महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। हैरत की बात यह है कि हिंदी पत्रकारिता के शुरूआती दौर में अपनी पत्रिकाओं को जमाने के लिए तब के संपादक लोगों को पत्रिकाओं को दैनिक अखबारों की तुलना में कहीं ज्यादा संग्रहणीय बताने की जरूरत महसूस होती थी। इस संकलन के शुरूआती संपादकीयों में ऐसी चिंताएं बार-बार दिखती हैं। सरस्वती के दिसंबर 1900 के अंक में उसके प्रकाशक ने अपनी परेशानियां गिनाते वक्त इसकी चर्चा की है। 438 पृष्ठ की इस भारी-भरकम किताब में शामिल हिंदी की पहली महिला पत्रिका बालबोधिनी के संपादक भारतेंदु हरिश्चंद्र से लेकर रतलाम की सुगृहिणी की संपादक हेमंत कुमार चौधरी तक के संपादकीय जहां हमें उस दौर में स्त्रीशिक्षा को लेकर जताई जा रही चिंताओं से हिंदी पाठकों को रूबरू कराते हैं तो वहीं प्रताप, अभ्युदय, चांद, सरस्वती के संपादकीय राष्ट्रीय आंदोलन की चिंताओं और भाषा की समस्या से भरे पड़े हैं। विशाल भारत के अपने संपादकीय में सन 1940 में भी बनारसी दास चतुर्वेदी किसानों और मजदूरों की समस्याओं को लेकर अपनी चिंताएं जता चुके हैं। इस संकलन में जहां आजादी के पहले राष्ट्र को बनाने और उसके आजाद होने के बाद की नीतियों पर केंद्रित संपादकीय शामिल हैं, तो बाद के दौर के संपादकीय नेहरू के बाद कौन, पाकिस्तान से लड़ाई और आपातकाल की चिंताओं से पाठकों को रूबरू कराते हैं।
हिंदी पत्रकारिता में संपादकीय लेखन का किस तरह विकास हुआ है, इसे समझने में भी यह संकलन मददगार साबित होता है। हालांकि इसमें संपादन की सीमाएं भी दिखती हैं। खासतौर पर स्नेहलता चौधरी और हिंदी पत्रकारिता के आदि संपादक युगुल किशोर शुक्ल के संपादकीयों को सीधे-सीधे पेश करने की बजाय उन पर लिखे लेख पेश किए गए हैं। जिसका जिक्र अखबारी स्तंभों की तरह नीचे किया गया है। इससे इनकी पाठकीयता के आस्वादन में बाधा आती है।

किताब - हिंदी पत्रकारिता का प्रतिनिधि संकलन
संपादक – तरूशिखा सुरजन
प्रकाशक – राधाकृष्ण प्रकाशन
7 / 31, अंसारी मार्ग, दरियागंज
नई दिल्ली- 110002
मूल्य - रूपए 550 /

बुधवार, 15 सितंबर 2010

शब्द संकोचन का शिकार बनती हिंदी

उमेश चतुर्वेदी
हाल ही में राजधानी दिल्ली से सटे एक कॉलेज में एक मित्र को जाने का मौका मिला। जिस बिल्डिंग के उपरी माले पर स्थित दफ्तर में उन्हें जाना था, उसकी सीढ़ियों पर भारी संख्या में छात्र बैठे हुए थे। छात्रों ने सीढ़ी को ऐसा घेर रखा था कि वहां से चाह कर भी निकलना आसान नहीं था। लिहाजा एक जगह उन्होंने छात्रों से अनुरोध किया – अपना पैर बटोर कर बैठो दोस्त...लेकिन कोई प्रतिक्रिया छात्रों की ओर से नहीं मिली। बल्कि उल्टे उनकी प्रश्नवाचक निगाहें मित्र को घूरती रहीं। दस सेकंड में ही माजरा समझ में आ गया। तब उन्हें छात्रों से अनुरोध करना पड़ा कि अपने पैर समेट लो। राजधानी के नजदीक स्थित कॉलेज के उन छात्रों को बटोरना भले ही समझ में नहीं आया, लेकिन शुक्र है उन्हें समेटना पता था।
शहरी इलाकों में आए दिन हमें ऐसे वाकयों से दो-चार होना पड़ता है। हाल ही में मशहूर गीतकार प्रसून जोशी ने अपने साथ घटी एक घटना का भी जिक्र किया है। एक फिल्म के गीत की रिकॉर्डिंग के वक्त उन्हें भी कुछ ऐसा ही अनुभव हुआ। उस गीत में उन्होंने एक जगह सट-सटकर बैठने का जिक्र किया है। जोशी को हैरानी तब हुई, जब हिंदी फिल्मी दुनिया के संगीतकार, गायक और वहां मौजूद ज्यादातर साजिंदों को सट-सटकर बैठने का अर्थ ही नहीं समझ आ रहा था। हारकर उन्हें सटना की जगह पास-पास बैठने का प्रयोग करना पड़ा। लेकिन प्रसून जोशी को अफसोस है कि सट-सटकर बैठने जैसे शब्दों के प्रयोग से जो तपिश और ध्वनि निकलती है, वह पास-पास में कहां निकलती है। अब तक यह आरोप लगता रहा है कि शाब्दिक ज्ञान की दुनिया नई पीढ़ी में सिमट रही है। लेकिन यह प्रक्रिया तो सत्तर के दशक में ही शुरू हो गई थी, जब कथित तौर पर मांटेसरी और कान्वेंट स्कूलों की खेप गांवों तक पहुंचनी शुरू हुई थी। यह प्रक्रिया तो इन दिनों अपने चरम पर है। लेकिन सत्तर-अस्सी के दशक में शुरू हुए अधकचरे कान्वेंट की परंपरा ने जड़ जमा ली है और वहां से पढ़कर निकली पीढ़ी अब जवान हो गई है। वही पीढ़ी है, जिसे सट-सटकर बैठने का अर्थ अब समझ नहीं आता है। इस पीढ़ी के सामने आपने खालिस हिंदी का प्रयोग किया तो आपको यह भी सुनने के लिए तैयार रहना होगा- क्या डिफिकल्ट हिंदी बोलते हैं आप। इस पूरी प्रक्रिया में भागीदार अपना मीडिया भी है। मीडिया के छात्रों और नवागंतुकों को एक ही चीज बताई-समझाई जाती है कि सरल – सहज भाषा में अपनी बात रखो। सहजता और सरलता की यह परंपरा इतनी गहरी हो गई है कि सामान्य हिंदी के शब्दों की बजाय अंग्रेजी के शब्दों का धड़ल्ले से प्रयोग जारी है। दिल्ली में इन दिनों कॉमनवेल्थ गेम की बड़ी चर्चा है। दो-चार साल पहले तक हिंदी अखबार इसे राष्ट्रमंडल या राष्ट्रकुल खेल कहते नहीं अघाते थे। लेकिन अब वे भी इन शब्दों को भूल गए हैं। हमसे पहले की पीढ़ी ने भाषा का संस्कार और उसका पाठ अखबारों के जरिए ही सीखा है। लेकिन तब मीडिया संस्कारित करने की भूमिका भी निभाता था। लेकिन आज ऐसी हालत नहीं रही है। उसका तर्क है कि उसके पाठक जो पढ़ना चाहते हैं, वह उसे पढ़ाना चाहता है। मीडिया को अब हिंगलिश भाषा अच्छी नजर आने लगी है और यह सब हो रहा है नई पीढ़ी के नाम पर। तर्क तो यह भी दिया जाता है कि नई पीढ़ी को यही सब पसंद है। लेकिन यह तर्क देते वक्त हम यह भूल जाते हैं कि नई पीढ़ी तो सड़क पर ही जीवन की वर्जनाओं को तोड़ना चाहती है। क्या इसकी छूट दी जा सकती है। नई पीढ़ी को छेड़खानी और बदतमीजी में ही मजा आता है। क्या इसके लिए छूट दी जा सकती है। दरअसल मनुष्य स्वभाव से ही आदिम और जानवर होता है। उसे सलीका और शिष्टाचार का पाठ संस्कारों और शिक्षा के जरिए पढ़ाया जाता है। भाषा का संस्कार भी उसी प्रक्रिया की एक कड़ी है। लेकिन दुर्भाग्य से हमने उस परंपरा को तोड़ दिया है। 1853 में जब मैकाले की मिंट योजना के बाद देसी और प्राच्य शिक्षा को खत्म करके सिर्फ अंग्रेजी शिक्षा देने की ईस्ट इंडिया कंपनी की सरकार ने तैयारी की तो उसका जोरदार विरोध हुआ था। तब सवाल उठा था कि अपनी भाषाएं खत्म हो जाएंगी और भाषा खत्म होगी तो संस्कृति पर भी खतरा आएगा। मैकाले की योजना तब सफल तो नहीं हुई, लेकिन आजादी के बाद यह योजना सफल होती नजर आ रही है। जो काम विदेशी नहीं कर पाए, आजादी के बाद आई अपने लोगों की सरकार की नीतियों ने वह कर दिखाया है।
दैनिक जीवन में शब्दों संकोचन को हर वक्त महसूस किया जा सकता है। दैनंदिन व्यवहार में आने वाले शब्द भी अब हम भूलते जा रहे हैं। अगर दिमाग पर जोर डालकर उन शब्दों की तलाश करें तो आपको पता चलेगा कि शब्दों के ज्ञान की दुनिया में कितनी कमी आ चुकी है। हिंदी पखवाड़ा जारी है। हिंदी को कथित तौर पर विकसित करने का पाखंड जारी है। बेहतर तो होता कि हिंदी को अपने लपेटे में ले रही इस प्रवृत्ति पर भी विचार किया जाता।

रविवार, 22 अगस्त 2010

साहित्यिक पत्रकारिता- सवाल सिर्फ पाठकों का नहीं


उमेश चतुर्वेदी
पचास करोड़ हिंदी भाषियों के देश में अगर हिंदी की सबसे लोकप्रिय पत्रिका हंस बारह हजार के आसपास ही बिकती हो तो, हिंदीभाषियों के साहित्यिक संसार पर सवाल उठेंगे ही। किसी भी भाषा की रचनाशीलता की सबसे बेहतर प्रतिनिधि उसकी साहित्यिक पत्रिकाएं ही होती हैं। निश्चित तौर पर इस मोर्चे पर हिंदी का पूरा परिदृश्य निराशाजनक है। हिंदी की लोकप्रिय पत्रकारिता में जिस तरह दैनिक अखबारों की भूमिका बढ़ती जा रही है, वह निश्चित तौर पर हिंदी के लिए बेहतर संकेत तो है। लेकिन इस लोकप्रियता के बरक्स हिंदी में कम से कम साहित्यिक पत्रकारिता को लेकर पाठकों में संस्कार विकसित नहीं हो पाए हैं। हिंदी में जब भी इसकी तरफ ध्यान दिया जाता है, सबसे पहला ध्यान राजभाषा को लेकर सरकारी उदासीनता की ओर ही जाता है। राजभाषा बनने के बावजूद नीति नियंताओं और सत्ता विमर्श में हिंदी की भूमिका वैसी नहीं हो पाई है, जैसी अंग्रेजी की है। रचनाशीलता और रचनात्मकता से जुड़े विमर्श को लेकर हिंदीभाषी राज्यों को छोड़ दें तो केंद्रीय स्तर पर हिंदी सापेक्ष माहौल अभी बनना बाकी है। लेकिन सिर्फ इसी वजह से यह मान लिया जाय कि हिंदी के लिए साहित्यिक पत्रकारिता का माहौल नहीं रहा तो यह निष्कर्ष अधूरा ही माना जाएगा।
हिंदी में आज भी लोकप्रिय किताबों का संस्करण हजार से दो हजार तक ही होता है। साहित्यिक पत्रकारिता पर चर्चा के वक्त हिंदी प्रकाशन जगत की उदासीनता पर भी ध्यान जाना सहज ही है। यह सच है कि हिंदी की कमाई खाने वाले प्रकाशकों ने भी हिंदी के साहित्यिक संस्कार को विकसित करने में कोई खास योगदान नहीं दिया। आजादी के तत्काल बाद चूंकि माहौल राष्ट्रीयता से ओतप्रोत था, लिहाजा उस वक्त हिंदी के लिए सोचने-मरने वाले लोग थे। उस माहौल का ही असर था कि उस वक्त हिंदी में साहसिक पहल करने की जिद्द का बोलबाला था। लेकिन जैसे-जैसे उदारीकरण की तरफ हमारे कदम बढ़ते गए, हिंदी की रचनाशीलता को लेकर जिद्दीपन में कमी आती गई। साहसिक पहल तो अब सिर्फ अंग्रेजी की ही बात है। यह कहना कि सिर्फ इसके चलते ही हिंदी में लोकप्रिय साहित्यिक पत्रकारिता के क्षितिज का फैलाव नहीं हुआ तो यह भी अतिशयोक्ति ही होगी। हालांकि यह भी एक कारण जरूर हो सकता है।
आज हिंदी के कुछ उत्साही कार्यकर्ता तर्क देते नहीं थक रहे हैं कि जब भास्कर, जागरण, अमर उजाला, राजस्थान पत्रिका, हिंदुस्तान, सरस सलिल, प्रतियोगिता दर्पण, गृहशोभा लाखों की संख्या में बिक सकते हैं तो हिंदी की कोई साहित्यिक पत्रिका क्यों सात से दस हजार की संख्या तक भी नहीं पहुंच पाती। लेकिन यह तर्क भी एकांगी ही है। क्योंकि जो सामग्री सरस सलिल में छप सकती है, वह किसी साहित्यिक पत्रिका की सामग्री नहीं हो सकती। दरअसल हर प्रकाशन और विषय विशेष का अपना अनुशासन होता है। बच्चों की पत्रिका में समोसे बनाने की विधियां या फिर लिपस्टिक लगाने के तरीके की जानकारी नहीं दी जा सकती। वैसे ही महिला पत्रिकाओं में राजनीतिक भंडाफोड़ की सामग्री देना भी अटपटा ही लगेगा। कुछ यही हालत साहित्यिक पत्रकारिता की भी है। वहां हर तरह की सामग्री देना संभव ही नहीं होगा। ऐसे में किसी साहित्यिक पत्रिका की किसी लोकप्रिय पत्रिका से तुलना ही बेमानी होगा। लेकिन दिल्ली में हाल ही में हुई ऐसी एक गोष्ठी में ऐसी तुलना की गई तो हंगामा मच गया।
हिंदी में साहित्यिक पत्रकारिता के सामने आज प्रसार का जो संकट दिख रहा है, उसके दो कारण हैं। पहला तो विचारशीलता को भौतिक यानी आर्थिक प्रश्रय देने वाले उदार हाथों की कमी हो गई है। उदारीकरण के दौर में इस तथ्य पर गौर फरमाने की कहीं ज्यादा जरूरत है। वैचारिकता से ओतप्रोत साहसिक पहल करने वाले लोगों की कमी भी हमारे इस पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार है। वैसे तो हर तरह की पत्रकारिता पाठक केंद्रित ही होती है। लेकिन साहित्यिक पत्रकारिता पर पाठक को संस्कारित करने और वैचारिकता से लैस करने की जिम्मेदारी भी होती है। वैसे यह काम क्षेत्र विशेष के नियंताओं और भाषा की कमाई खाने वाले वर्ग का भी है, ताकि वे अपनी भाषा को जिम्मेदार और वैचारिक रचनाशीलता का वाहक बना सकें। दुर्भाग्य से इस मोर्चे पर कोई काम नहीं हुआ है। जाहिर है कि पाठकीय संस्कारहीनता भी आज साहित्यिक पत्रकारिता की राह में रोड़ा बनकर खड़ी है। जिस अंग्रेजी में किताबों की बिक्री के आंकड़े गिनाते हम अपनी हिंदी में ऐसे भविष्य की चिंता करते रहते हैं, पैसा, पाठकीयता और उदारीकरण के बावजूद वहां भी साहित्यिक पत्रकारिता की कोई बहुत ज्यादा बेहतर स्थिति नहीं है। वहां भी अगर कला अकादमियां या ट्रस्ट और विश्वविद्यालय मदद नहीं करते तो ग्रांटा या न्यूयार्कर जैसी पत्रिकाओं के सहज प्रकाशन का अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता। जबकि भारत में ही अंग्रेजी की किसी किताब का पांच हजार से ज्यादा का संस्करण निकलता है।
तो क्या यह मान लिया जाय कि हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता में सर्वत्र घटाटोप अंधेरा ही अंधेरा है। फिलहाल भले ही ऐसा लग रहा हो, लेकिन सच तो यह है कि एक बार फिर हिंदी की कमाई खा रहे लोगों पर ही इस अंधेरे से बाहर निकलने की जिम्मेदारी है। बड़े अखबार समूह, संस्थानिक घराने और विश्वविद्यालय अगर पूंजी का आधार मुहैया कराएं तो हिंदी साहित्यिक पत्ररकारिता में रचनाशीलता को नया आयाम मिलेगा। तब शायद हमें पाठकों का रोना न रोने का कोई कारण भी नहीं रह पाएगा।

रविवार, 8 अगस्त 2010

भला हो हम हिंदी वालों का

उमेश चतुर्वेदी
राजधानी दिल्ली में इन दिनों तकरीबन रोज ही कहीं हलकी और तेज बारिश हो जाती है। बरसाती फुहारों के बीच मौसम में ठंडक का अहसास होना स्वाभाविक है। लेकिन यहां राजभाषा के साहित्यिक गलियारे में इन दिनो गरमी की तासीर कुछ ज्यादा ही महसूस की जा रही है। गरमी की वजह बना है देश के सबसे प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्थान भारतीय ज्ञानपीठ की पत्रिका नया ज्ञानोदय में प्रकाशित शहर में कर्फ्यू के उपन्यासकार विभूति नारायण राय का एक इंटरव्यू। जिसमें उन्होंने हिंदी की कुछ लेखिकाओं की आत्मकथाओं के बहाने असंसदीय किस्म की टिप्पणी कर दी है। चूंकि विभूति नारायण राय गांधी जी के नाम पर बने अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति और उत्तर प्रदेश कैडर के पूर्व पुलिस अधिकारी हैं, इसलिए उनकी लानतें-मलामतें का दौर तेज हो गया है। हिंदी के अतिजनवादी एक्टिविस्ट पत्रकारों, लेखकों और संस्कृतिकर्मियों का ग्रुप राय को हिंदी विश्वविद्यालय से बर्खास्त कराने को लेकर अभियान जारी रखे हुए है।
इस लड़ाई को लेकर बहसबाजियों का दौर तेज है। क्या गलत है और क्या सही, इस पर विचार किया जाना यहां उद्देश्य भी नहीं हैं। इस पूरे बहस में एक तथ्य पर ध्यान नहीं दिया गया कि यह मसला उछला कैसे। दरअसल राय के इंटरव्यू को लेकर सबसे पहले अपनी आक्रामकता के लिए मशहूर अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने खबर बनाई। अगस्त महीने के पहले दिन इस खबर के छपने से करीब हफ्ताभर पहले से नया ज्ञानोदय का अंक बाजार में मौजूद था। लेकिन उसे किसी ने नोटिस नहीं लिया, नोटिस लिया भी गया तो तब, तब एक्सप्रेस में यह खबर साया हुई। तब से देश के अति जनवादी साहित्यिक-सांस्कृतिक खेमे का हरावल दस्ता विभूति नारायण राय के खिलाफ पिल पड़ा है। ऐसा कैसे हो सकता है कि हिंदी में एक्टिविस्ट की भूमिका निभा रहे इस हरावल दस्ते के किसी सदस्य की नजर मूल हिंदी में हिंदी की प्रमुख साहित्यिक पत्रिकाओं में शुमार नया ज्ञानोदय पर नहीं पड़ी होगी। उनकी नजर में विभूति का इंटरव्यू विवादास्पद तभी बना, जब एक्सप्रेस में इसकी खबर हुई। यहां इस तथ्य पर भी ध्यान दिए जाने की जरूरत है कि क्या एक्सप्रेस का रिपोर्टर हिंदी की पत्रिकाओं से उतने ही सहज तरीके से बाबस्ता होते हैं, जितना वे अंग्रेजी प्रकाशनों के साथ होते हैं। अगर ऐसा है तो हिंदी के लिए यह सुखद बात है। लेकिन इसकी उम्मीद कम ही नजर आती है। जाहिर है ऐसे में शक की सूई ज्ञानपीठ के आकाओं पर भी उठती है कि कहीं पत्रिका को चर्चा में लाने के लिए उन्होंने ही इस इंटरव्यू की कॉपी एक्सप्रेस रिपोर्टर को मुहैया कराई हो।
इस मसले पर पूरी बहसबाजी और उठाने-गिराने की साहित्यिक-सांस्कृतिक पहलवानी में हिंदी-अंग्रेजी का मुद्दा शामिल करना प्रगतिवादियों को बुरा लग सकता है। लेकिन हकीकत यही है। इस मुद्दे ने अंग्रेजी मानसिकता को हिंदी वालों का मजाक उड़ाने का बैठे-बिठाए मौका ही दे दिया है। जैसा की टेबलायड पत्रकारिता का चरित्र है, अंग्रेजी के एक नवेले टेबलायड अखबार ने इस पूरे मसले को चटखारे लेकर तफसील से प्रकाशित किया। अगर इतना ही होता तो गनीमत थी। लेकिन लगे हाथों उसने टिप्पणी भी कर दी कि हिंदी वालों के इसी चरित्र के ही चलते हिंदी की यह हालत बनी हुई है। यानी हिंदी आज भी अगर चेरी की भूमिका में है तो उस अंग्रेजी अखबार के मुताबिक विभूति जैसे लोगों की सतही टिप्पणियां और उस पर बवाल मचाने वाले प्रगतिवादियों की आपसी जोरआजमाइश का भी हाथ है। लगे हाथों उस अखबार ने हिंदी वालों को सुझाव भी दे डाला कि हिंदी को आगे ले जाना है तो ऐसी ओछी हरकतों से बचो। हिंदी वाले चाहे जितना क्रांतिकारी बनने का दावा करें, अपने भाषाई स्वाभिमान की चर्चा करें, लेकिन हकीकत यही है कि आपसी सिरफुटौव्वल में उस्तादी की तुलना में भाषाई स्वाभिमान कम ही है। चूंकि अंग्रेजी ठहरी देश के असल राजकाज की भाषा - नीति नियंताओं के सोचने-विचारने की भाषा, लिहाजा उन्हें अंग्रेजी के उस टेबलॉयड अखबार के सुझावों से कोई परेशानी नहीं है। उलटे उन्हें ये सुझाव अच्छे लग रहे हैं। भला हो हम हिंदी वालों का ....
साहित्यिक और सांस्कृतिक हलकों में जब भी किसी समस्या की चर्चा होती है, राजनीति को दोषी ठहराने का खेल चालू हो जाता है। राजनीति दोषी है भी, लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के चलते राजनीति पर सवाल खड़े करना आसान है। इक्का-दुक्का घटनाओं को छोड़ दें, तो राजनीति हमारी जिंदगी में इतना स्पेस मुहैया जरूर कराती है कि आप उसकी आलोचना कर सकें। लेकिन क्या इतना स्पेस हमारे सांस्कृतिक और साहित्यिक हलकों में है...निश्चित तौर पर इसका जवाब ना में है। संस्कृति और साहित्य के मसले पर अगर किसी की ओर उंगली उठती है तो उसके पीछे अधिकांश वक्त नितांत निजी स्वार्थ और अपना बदला चुकाने की भावना होती है। साहित्यिक कृतियों की आलोचना के पीछे भी यही धारणा काम कर रही होती है। साहित्यिक और सांस्कृतिक आलोचनाओं को स्वस्थ अंदाज में लिया भी नहीं जाता। स्वस्थ आलोचक से दुश्मन की तरह व्यवहार किया जाने लगता है। ऐसे में फिर कैसे होगा अपनी हिंदी का विकास....सोचना तो हमें ही पड़ेगा। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हम ऐसी वैचारिक मुठभेड़ों के लिए तैयार हैं। हिंदी में इन दिनों जारी पहलवानी के खेल से ऐसा तो नहीं ही लग रहा।