रविवार, 8 नवंबर 2015

सम्मान वापसी बनाम किताब वापसी



उमेश चतुर्वेदी

वैचारिक असहमति और उन असहमतियों के आधार पर विमर्श होना लोकतांत्रिक समाज का भूषण होता है..लेकिन कथित असहिष्णुता के खिलाफ जारी साहित्यिक-सांस्कृतिक-फिल्मी और वैज्ञानिक जगत में जारी वैचारिक आलोड़न को क्या इसी कसौटी पर देखा-परखा जा सकता है ? सम्मान वापसी के विरोधी आरोप लगा रहे हैं कि भले ही सम्मान वापस करने वालों की भीड़ बढ़ती जा रही है, लेकिन इसके पीछे राजनीतिक विचार और ताकतें काम कर रही हैं। इसके लिए सम्मान वापसी विरोधियों को एक पर एक होती रही घटनाओं ने तार्किक सवाल उठाने का मौका दे दिया है...प्रतिरोध की आवाजों के उठने के अगले ही दिन देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी असहिष्णुता के खिलाफ राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के दरबार पहुंच गईं। यह तो उनकी व्यक्तिगत मुलाकात थी। इसके ठीक अगले दिन उन्होंने सवा सौ नेताओं के लाव-लश्कर समेत बाकायदा जुलूस निकालकर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से शिकायत कर डाली। मौजूदा दौर में एजेंडा तय करना और किसी भी घटना या हादसे को उत्सवी रंग देना मीडिया का काम हो गया, लिहाजा असहिष्णुता का यह लाव-लश्करी विरोध मीडिया के लिए आकर्षक बन गया और इस नाते कांग्रेस खबरों की केंद्र में बनी रही। इससे साफ है कि पहले लेखकों का विरोध और फिर देश की सबसे पुरानी पार्टी का कदम कहीं न कहीं सोची-समझी रणनीति के तहत हुए। अव्वल तो होना चाहिए कि इन घटनाओं के बीच जुड़े तंतुओं की पड़ताल की जाती, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है।

शुक्रवार, 6 नवंबर 2015

कल्पना और बदरी विशाल पित्ती का रचनात्मक संघर्ष

मेश चतुर्वेदी
(यथावत के नवंबर प्रथम 2015 अंक में प्रकाशित)
1.कल्पना और हिंदी साहित्य
लेखक- विवेकी राय/प्रकाशक-अनिल प्रकाशन,इलाहाबाद/मूल्य- 150 रूपए
2.स्वातंत्रयोत्तर हिंदी के विकास में कल्पना के दो दशक/ लेखक- शशिप्रकाश चौधरी/प्रकाशक-राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य-500 रूपए 
3.बदरी विशाल
संपादक - प्रयाग शुक्ल
प्रकाशक - वाग्देवी प्रकाशन, बीकानेर
मूल्य - 250 रूपए
गांधी जी की कामयाबियां, कर्म और प्रयोग उनके जाने के महज 67 साल बाद ही अतिमानवीय और हैरतअंगेज लगने लगे हैं। आने वाली पीढ़ियां तो यह सोचने के लिए बाध्य ही हो जाएंगी कि सचमुच वे हाड़मांस का हमारे-आपके जैसे ही साधारण पुतले भी थे। कंटेंट और विचार के स्तर पर हिंदी पत्रकारिता जितनी तेजी से छीजती जा रही है, उसे देखते हुए आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि कुछ इसी अंदाज में आने वाले दिनों में पत्रकारिता के कर्मयोगी और छात्रों के सामने जब कल्पना की गुणवत्ता की जानकारी आए तो वे हैरत में पड़ जाएं। लेकिन सुदूर अहिंदीभाषी क्षेत्र से निकलती रही कल्पना ने जिस तरह का रूख हिंदी भाषा और साहित्य के सवालों को लेकर दुनिया के सामने रखा, वह आज के दौर में कल्पनातीत ही कहा जाएगा। भारतेंदु युग के बाद हिंदी को मांजने और सार्वजनिक विमर्श की भाषा बनाने में जो काम आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादन में सरस्वती ने किया, आजादी के बाद कुछ वैसा ही योगदान कल्पना का भी रहा। कल्पना ने हिंदी की दुनिया को कल्पना की सीमारेखा से यथार्थ के धरातल पर लाने और भाषाई स्वाधीनता के आंदोलनों से लेकर हिंदी में नए और आधुनिक चलन को स्थापित करने में जो भूमिका निभाई, उसे विवेकी राय की किताब कल्पना और हिंदी साहित्य में बखूबी देखा जा सकता है। कल्पना की शुरूआत यानी 1949 से लेकर 1977 में अंत तक के उसके अंकों के आधार पर तैयार इस पुस्तक के मूल में खुद कल्पना के संस्थापक और मानस पिता हैदराबाद के सुरूचिपूर्ण मारवाड़ी कारोबारी के बेटे बदरी विशाल पित्ती ही थे। विवेकी राय जी के शब्दों में कहें तो कल्पना का सर्वेक्षण नाम से यह सर्वेक्षण शुरू हुआ। इसका कल्पना में ही धारावाहिक तौर पर प्रकाशन भी हुआ। कल्पना निश्चित तौर पर साहित्य, वर्तनी, व्याकरण, कला-समीक्षा, प्रकीर्ण विधाएं आदि के संदर्भ मे अपने मुकम्मल और ठोस विचार रख ही रही थी। लेकिन उसने किस तरह हिंदी साहित्य और भाषा की सेवा की, उसका चौंकाऊ आयाम उसके प्रतिबद्ध पाठक भी नहीं जान पाए थे। लेकिन विवेकी राय के सर्वेक्षण ने जैसे कल्पना को समझने के लिए नई वीथि ही खोल कर रख दी।
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिंदी के शलाका पुरूष डॉक्टर नामवर सिंह के निर्देशन में हिंदी साहित्य के विकास में कल्पना के दो दशक यानी सिर्फ 1968 तक पर शशिप्रकाश चौधरी ने शोध किया है। निश्चित तौर पर इनके शोध में कल्पना के दो दशकों के योगदान को केंद्रित किया गया है। शशिप्रकाश चौधरी ने शोध प्रविधि के लिए तमाम पाठ्य सामग्री इकट्ठी की है और उनके आधार पर कल्पना के योगदान पर विश्लेषण किया है। लिहाजा कल्पना के बीस साल की यात्रा के जरिए हासिल कामयाबियों-खूबियों का जिक्र ज्यादा है। लेकिन हैरत होती है कि कल्पन की सामग्री के सर्वेक्षण पर शशिप्रकाश चौधरी के शोध में चर्चा तक नहीं है। अगर इस सर्वेक्षण पर शशि प्रकाश की नजर पड़ी होती तो शायद उनका शोध निकष कुछ और व्यापक होता और उनके शोध मंथन से हासिल कल्पना का मक्खन कहीं ज्यादा स्वादिष्ट होता।

गुरुवार, 5 नवंबर 2015

13 दिसंबर की याद, संदर्भ असहिष्णुता का विरोध....

उमेश चतुर्वेदी


13 दिसंबर 2001
संसद पर आतंकी हमले को सुरक्षा बलों ने नेस्तनाबूद कर दिया था...संसद भवन और उसके आसपास सेना और अर्धसैनिक बलों की टुकड़ियां तैनात हो चुकी थीं..तब मैं दैनिक भास्कर के दिल्ली ब्यूरो में बतौर संवाददाता तैनात था और उस घटना को रिपोर्ट कर रहा था...सेना ने संसद परिसर और उसके आसपास विमानभेदी तोपें तैनात कर दी थीं..ताकि अगर हवाई हमले भी हों तो उन्हें नेस्तनाबूद किया जा सके..अफरातफरी के बाद नई दिल्ली इलाके में धीरे-धीरे शांति लौट रही थी..लेकिन संसद के केंद्रीय कक्ष में बदहवास बैठे सांसद अपने डर पर काबू नहीं पा रहे थे..तब गृहमंत्री के नाते लालकृष्ण आडवाणी और रक्षा मंत्री के नाते जार्ज फर्नांडिस ने केंद्रीय कक्ष में जाकर सांसदों को आश्वस्त करना तय किया..पहले आडवाणी गए और उन्होंने सांसदों को बताया कि हालात काबू में हैं और जल्द ही सब कुछ सामान्य हो जाएगा। इसके बाद जार्ज फर्नांडिस केंद्रीय कक्ष पहुंचे। ऐसे मौकों पर अपने देश में सेना और उसकी ताकत पर भरोसा पुलिस से कहीं ज्यादा नजर आता है..जार्ज बोलने के लिए तैयार हुए...तो सांसदों ने उन्हें घेर लिया. सुरक्षा के जो-जो उपाय हो सकते थे, जार्ज ने रक्षा मंत्री के नाते कर ही दिए थे, उनकी जानकारी भी सांसदों को दी..आखिर में जार्ज ने यह भी बताया कि सेना ने संसद परिसर में विमान भेदी तोपें तैनात कर दी है और हालात पूरी तरह सेना और सुरक्षा बलों के नियंत्रण में हैं..इसलिए घबराने की कोई बात नहीं है.. इतना कहकर जार्ज जैसे ही लौटने लगे, उन्हें सांसदों ने घेर लिया...जार्ज से हाथ मिलाने के लिए सांसदों में होड़ लग गई..उनमें तब की विपक्ष खासकर कांग्रेस के सांसद सबसे आगे थे...सभी जार्ज का शुक्रिया कर रहे थे..कुछ ने तो यहां तक कह दिया है कि जार्ज यू आर अ ग्रेट डिफेंस मिनिस्टर..यू हैव डन वैरी गुड जॉब लाइक अ ग्रेट डिफेंस मिनिस्टर...ये कहने में कोई हर्ज भी नहीं था..लेकिन विपक्षी सांसदों के मुंह से निकली ये बात तब इसलिए कहीं ज्यादा अहम थी, क्योंकि तब जॉर्ज को विपक्ष रक्षा मंत्री ही नहीं मान रहा था..जिस ताबूत घोटाले में हाल ही में जॉर्ज को सुप्रीम कोर्ट ने बरी किया और सीबीआई को झाड़ पिलाई, उसी कथित घोटाले के चलते विपक्ष उन्हें संसद के दोनों सदनों में देखना तक नहीं पसंद करता था..जिस दिन लोकसभा या राज्यसभा में रक्षा मंत्रालय की बारी होती, प्रश्नकाल शुरू होते ही कांग्रेस समेत समूचा विपक्ष सदन से बाहर निकल जाता था - भाई जब रक्षा मंत्री मानते ही नहीं तो सवाल का जवाब क्यों सुनें...लेकिन आतंकी हमले के बाद उन्हीं सांसदों में संसद के केंद्रीय कक्ष में जॉर्ज का आभार जताने के लिए होड़ मच गई...असहिष्णुता को लेकर मौजूदा केंद्र सरकार पर उठ रहे सवाल, मोदी सरकार के साथ विपक्ष के जारी असहयोग को देखते हुए एक बार फिर यह घटना याद आ गई...

रविवार, 25 अक्टूबर 2015

साहित्य अकादमी में रचा गया नया इतिहास

उमेश चतुर्वेदी
1994 की बात है..साहित्य अकादमी का साहित्योत्सव चल रहा था...उस वक्त साहित्य अकादमी के सचिव थे इंद्रनाथ चौधरी...अध्यक्ष शायद असमिया लेखक वीरेंद्र भट्टाचार्य..गलत भी हो सकता हूं..उस साल साहित्य अकादमी ने संवत्सर व्याख्यान का आयोजन किया था-साहित्योत्सव के मौके पर... इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के संभ्रांत माहौल और हॉल में व्याख्यान और खान-पान का भव्य आयोजन था..उसी दौरान इस भुच्चड़ देहाती को दिल्ली के शहराती साहित्यकर्म का परिचय मिला..भारतीय जनसंचार संस्थान में तकरीबन मुफलिसी की तरह पढाई करते वक्त साहित्य चर्चा के साथ सुस्वादु भोजन का जो स्वाद लगा तो तीन दिनों तक लगातार जाता रहा..दूसरे सहपाठी मित्र भी साथ होते थे..वहीं पहली बार नवनीता देवसेन को सुना...मलयालम की विख्यात लेखिका कमला दास, जो बाद में सुरैया हो गई थीं..उन्हें भी सुना अपनी टूटी-फूटी अंग्रेजी में..हिंदी के तमाम कवियों-लेखकों को लाइन में लगकर खाना लेते और खाते देखकर अच्छा लगा...हैरत भी हुई....क्योंकि इन्हीं में से कुछ को अपने जिले बलिया के एक-दो आयोजनों में नखरे में डूबते और रसरंजन की नैया में उतराते देखा था...तब अपनी नजर में उन लेखकों-कवियों की हैसियत देवताओं से कुछ ही कम होती थी..यह बात और है कि इनमें से कई के साथ जब ऑफ द रिकॉर्ड बातचीत की, उनके धत्कर्म देखॅ तो लगा कि असल में वे भी सामान्य इंसान ही हैं...
सवाल यह कि इन बातों की याद क्यों..क्योंकि 23 अक्टूबर 2015 को साहित्य अकादमी के सामने नया इतिहास रचा गया है..भारतीय-खासकर हिंदी का साहित्यकर्म राष्ट्रीयता और भारतीयता की अवधारणा को धर्मनिरपेक्षता की विचारधारा के खिलाफ मानता है...उसे यह सांप्रदायिक लगता है.. अतीत में इसी बहाने हिंदी साहित्यकर्म की मुख्यधारा की शख्सियतें भारतीयता-राष्ट्रीयता की बात करने वाले कलमचियों से चिलमची की तरह व्यवहार करती रही हैं...1994 में साहित्योत्सव के संवत्सर व्याख्यान में भारतीयता की बातें अकेले रख रहे थे –देवेंद्र स्वरूप..तब उनका उपहास उड़ाया गया था... उनसे हिंदी साहित्यकर्म के आंगन में आए विदेशी-आक्रांता घुसपैठिया जैसा व्यवहार वहां मौजूद साहित्यिक समाज ने किया था..तब उनके साथ एक ही नौजवान खड़ा होता था...उसका प्रतिवाद उन दिनों काफी चर्चित भी हुआ था..साहित्यिक समाज के वाम विचारधारा पर वह हमले करते वक्त कहता था- पनीर खाकर पूंजीवाद को गाली देते हैं—बाद में पता चला कि वह नौजवान नलिन चौहान है..नलिन अगले साल भारतीय जनसंचार संस्थान का विद्यार्थी बना...

23 अक्टूबर 2015 को अभिव्यक्ति पर कथित रोक, कलबुर्गी नामक कन्नड़ लेखक की हत्या और सांप्रदायिकता फैलाने वालों के खिलाफ साहित्य अकादमी की चुप्पी के खिलाफ हिंदी की कथित मुख्य़धारा की साहित्यिक बिरादरी ने विरोध जुलूस निकाला..साहित्य अकादमी के आंगन में कभी वाम विचारधारा के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत दूसरी विचारधारा नहीं करती थी..उसी साहित्य अकादमी के प्रांगण में कथित विरोध और सम्मान वापसी अभियान के खिलाफ लेखकों का हुजूम उमड़ पड़ा..कुछ लोग उन लेखकों का मजाक उड़ा रहे हैं कि वे प्रेमचंद से बड़े लेखक हैं..प्रेमचंद ने क्या लिखा है..इस पर अलग से लेख लिखने की इच्छा है..बहरहाल साहित्य अकादमी के इतिहास में यह पहला मौका था...जब वहां वंदे मातरम का नारा लगा, भारत माता की जय बोली गई..मालिनी अवस्थी ने विरोध में आवाज बुलंद की..नरेंद्र कोहली, बलदेव वंशी विरोधियों की नजर में लेखक ना हों तो ना सही...पाठकों के दिलों में जरूर बसते हैं..उनकी किताबों की रायल्टी कथित मुख्यधारा की आंख खोलने के लिए काफी है...
साहित्य कर्म में बदलते इतिहास को सलाम तो कीजिए

बुधवार, 21 अक्टूबर 2015

सवाल भी कम नहीं हैं सम्मान वापसी अभियान पर

(आमतौर पर मेरे लेख अखबारों में स्थान बना लेते हैं..लेकिन यह लेख नहीं बना पाया..देर से छपने से शायद इसका महत्व कम हो जाए)
उमेश चतुर्वेदी
वैचारिक असहमति और विरोध लोकतंत्र का आभूषण है। वैचारिक विविधता की बुनियाद पर ही लोकतंत्र अपना भविष्य गढ़ता है। कोई भी लोकतांत्रिक समाज बहुरंगी वैचारिक दर्शन और सोच के बिना आगे बढ़ ही नहीं सकता। लेकिन विरोध का भी एक तार्किक आधार होना चाहिए। तार्किकता का यह आधार भी व्यापक होना चाहिए। कथित सांप्रदायिकता और बहुलवादी संस्कृति के गला घोंटने के विरोध में साहित्यिक समाज में उठ रही मुखालफत की मौजूदा आवाजों में क्या लोकतंत्र का व्यापक तार्किक आधार नजर आ रहा है? यह सवाल इसलिए ज्यादा गंभीर बन गया है, क्योंकि कथित दादरीकांड और उसके बाद फैली सामाजिक असहिष्णुता के खिलाफ जिस तरह साहित्यिक समाज का एक धड़ा उठ खड़ा हुआ है, उसे वैचारिक असहमति को तार्किक परिणति तक पहुंचाने का जरिया माना जा रहा है। 2015 का दादरीकांड हो या पिछले साल का मुजफ्फरनगरकांड उनका विरोध होना चाहिए। बहुलतावादी भारतीय समाज में ऐसी अतियों के लिए जगह होनी भी नहीं चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि क्या क्या सचमुच बढ़ती असहिष्णुता के ही विरोध में साहित्य अकादमी से लेकर पद्मश्री तक के सम्मान वापस किए जा रहे हैं।

भारतीय संविधान ने भारतीय राज व्यवस्था के लिए जिस संघीय ढांचे को अंगीकार किया है, उसमें कानून और व्यवस्था का जिम्मा राज्यों का विषय है। चाहकर भी केंद्र सरकार एक हद से ज्यादा कानून और व्यवस्था के मामले में राज्यों के प्रशासनिक कामों में दखल नहीं दे सकती। लालकृष्ण आडवाणी जब देश के उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री थे, तब उन्होंने जर्मनी की तर्ज पर यहां भी फेडरल यानी संघीय पुलिस बनाने की पहल की दिशा में वैचारिक बहस शुरू की थी। जर्मनी में भी कानून और व्यवस्था राज्यों की जिम्मेदारी है। बड़े दंगे और अराजकता जैसे माहौल में वहां की केंद्र सरकार को फेडरल यानी संघीय पुलिस के जरिए संबंधित राज्य या इलाके में व्यवस्था और अमन-चैन बहाली के लिए दखल देने का अधिकार है। संयुक्त राज्य अमेरिका में संघीय पुलिस यानी फेडरल ब्यूरो ऑफ इनवेस्टिगेशन के जरिए केंद्र सरकार को कार्रवाई करने का अधिकार है। लेकिन आज कथित हिंसा के विरोध में अकादमी पुरस्कार वापस कर रहे लेखकों और बौद्धिकों की जमात में तब आडवाणी की पहल को देश के संघीय ढांचे पर हमले के तौर पर देखा गया था।

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2015

सांप्रदायिकता का चश्मा और गीता प्रेस का योगदान

उमेश चतुर्वेदी
(यथावत पत्रिका के अक्टूबर प्रथम 2015 अंक में प्रकाशित)
पूजास्थल पवित्रता और श्रद्धा के केंद्र होते हैं.. देवताओं की मूर्तियां, उनके चित्र और धार्मिक ग्रंथदुनिया के हर मतावलंबी के पूजा और आस्था के केंद्र मानव की आध्यात्मिक यात्रा का जरिया होते हैं। लेकिन हिंदू परिवारों के पूजा स्थलों में अगर इष्ट देवताओं की मूर्तियों या चित्रों के अलावा किसी ग्रंथ ने सबसे ज्यादा सम्मान हासिल किया है, जिसे देवताओं के समतुल्य दर्जा दिया गया है, वह ग्रंथ गोस्वामी तुलसीदास रचित रामचरित मानस है। अपनी रचना के काल से ही रामचरित मानस भारतीय जनमानस की आस्था का केंद्र रहा है..लेकिन इस ग्रंथ को हर घर के पूजा स्थल तक पहुंचाने में 1923 में स्थापित गीता प्रेस का महत्वपूर्ण योगदान है। जिस गीता प्रेस को जयदयाल गोयंदका ने हनुमान प्रसाद पोद्दार के सहयोग से उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में 92 साल पहले स्थापित किया, उसका मकसद सिर्फ और सिर्फ हिंदुत्व की प्राचीन और अजस्रधारा के सांस्कृतिक ग्रंथों को उनकी सहज-सरल टीकाओं के साथ घर-घर तक पहुंचाना था। अपनी उम्र की शतकीय यात्रा की तरफ बढ़ रहे इस सांस्कृतिक संस्थान की चर्चा इन दिनों खास है। खास इसलिए कि यहां के कर्मचारियों ने हड़ताल कर रखी है और इस वजह से यहां कामकाज ठप है। भारतीयता की सांस्कृतिक परंपरा की जब भी चर्चा होती है, हिंदुत्व का ही चेहरा हमारे सामने आता है। लेकिन यह हिंदुत्व इन दिनों सांप्रदायिकता का प्रतीक बन गया है या बौद्धिकता की कथित आधुनिक परंपरा की चाशनी ने उसे संकुचित स्तर पर स्थापित कर दिया है।

रविवार, 27 सितंबर 2015

समाजवादी संवेदनशील व्यक्तित्व की याद

अमर उजाला में प्रकाशित
उमेश चतुर्वेदी
पुस्तक - बदरी विशाल
संपादक - प्रयाग शुक्ल
प्रकाशक - वाग्देवी प्रकाशन, बीकानेर
मूल्य - 250 रूपए
आज राजनीति खुद ही कमाई का साधन बन गई है, अब राजनेता स्वयं ही करोड़ों में खेलते हैं। लिहाजा उनके अनुयायी उनसे आर्थिक सहयोग और ताकत ही हासिल करने की उम्मीद और लालच में उनके अनुगामी बने रहते हैं। वैचारिकता की खुराक की उम्मीद अब राजनेताओं से कम ही की जाती है। सोचिए, अगर राममनोहर लोहिया से भी उनके अनुयायी सिर्फ आर्थिक ताकत ही हासिल करने की उम्मीद लगाए बैठे होते और उनके अनुगामी बने रहते तो क्या देश को झिझोड़ देने वाले विचार लोगों के सामने आ पाते, तब क्या देश को आलोड़ित करने वाली लोकसभा की तीन आने बनाम पंद्रह आने की बहस देशव्यापी चर्चा का विषय बन पाती। डॉक्टर राममनोहर लोहिया महज चार साल तक लोकसभा के सदस्य रहे, लेकिन पहले नेहरू, फिर शास्त्री और बाद में इंदिरा गांधी की सरकारों की नीतियों की कलई जिस अंदाज में उन्होंने संसद के सामने खोली, वैसा दशकों तक संसद की शोभा बढ़ाते रहे लोग नहीं कर पाए हैं। उनके विचार आज भी अगर जनमानस की स्मृतियों में ताजा हैं तो इसके बड़े कारक हैदराबाद के कारोबारी खानदान के चिराग बदरी विशाल पित्ती और कोलकाता के मारवाड़ी व्यापारी बालकृष्ण गुप्त परिवार है। हैदराबाद के निजाम के आर्थिक प्रबंधक रहे पित्ती परिवार को राजा की उपाधि मिली थी। उस परिवार के इकलौते चश्म-ओ-चिराग बदरी विशाल पित्ती का लोहिया विचार और हिंदी की गंभीर पत्रकारिता को अमोल योगदान है। इन्हीं बदरी विशाल की जिंदगी पर आधारित इसी नाम से वरिष्ठ सांस्कृतिक पत्रकार और लेखक प्रयाग शुक्ल ने संपादित की है। जिसमें बदरी विशाल की कलाप्रियता, साहित्यधर्मिता और सांस्कृतिक सोच को लेकर 21 हस्तियों ने अपने विचार लिखे हैं। इससे बदरी विशाल के सांस्कृतिक व्यक्तित्व की एक मुकम्मल तसवीर सामने आती है।