गुरुवार, 22 जनवरी 2015



भुवनेश्वर में आल इंडिया रेडियो द्वारा आयोजित
सर्वभाषा कवि-सम्मेलन-2015
की कुछ आंखों-देखी झलकियां 
  • दिनेश कुमार माली
पता नहीं क्यों, हिन्दी-साहित्य के प्रति उमड़ता हुआ मेरा प्रेम मुझे कहाँ-कहाँ नहीं खींच ले जाता है।मन के भीतर सुषुप्त भावनाओं की अभिव्यक्ति की तड़प बड़े-बड़े लेखकों और कवियों से मिलने का एक भी अवसर खोना नहीं चाहती है। तभी तो, इस वर्ष की शुरूआत से ही भुवनेश्वर में आयोजित होने वाले साहित्यिक आयोजनों जैसे इडकॉल प्रेक्षागृह में जगदीश मोहंती फाउंडेशन के प्रथम श्रद्धांजलि समारोह में ओड़िया भाषा के विशिष्ट साहित्यकारों में विभूति पटनायक, सदानंद त्रिपाठी, प्रकाश महापात्र, सरोज बल, सुनील पृष्टि तथा इस संस्थान की अध्यक्षा डॉ सरोजिनी साहू से भेंटवार्ता, कलिंग इंडस्ट्रियल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी के यूनिवर्सिटी कैंपस में कादंबिनी पत्रिका द्वारा आयोजित अद्यतन वार्षिकोत्सव में ओड़िया-भाषा के बड़े-बड़े साहित्यकारों में श्री रमाकांत रथ, श्री राजेन्द्र किशोर पंडा, श्री सातकड़ी होता, श्री दीपक मिश्र एवं हिन्दी भाषा के नामी साहित्यकार चित्रा मुद्गल व अरुण कमल से आत्मीय मुलाकात करने बाद ऑल इंडिया रेडियो द्वारा भुवनेश्वर के भंज कला मंडप में आयोजित 15 जनवरी को ‘सर्वभाषा कवि सम्मेलन ( नेशनल सिम्पोजियम ऑफ पोएट्स) में 22 भारतीय भाषाओं के उत्कृष्ट कवियों तथा उनके अनुवादकों की कविताओं को सुनने के लिए तालचेर से अपने नौकरी वाले कर्तव्य-कर्मों से लुकाछिपी करते हुए वहां पहुंच गया। यहाँ तक कि, महानदी कोलफील्ड्स लिमिटेड की लिंगराज खुली खदान से नेशनल थर्मल पॉवर कॉर्पोरेशन, कनिहा में होने वाले कोयले के आवश्यक सम्प्रेषण जैसे गंभीर कार्य को ताक पर रख कर मैंने अपनी दूसरी दुनिया की ओर प्रस्थान कर लिया। कभी-कभी मजाक में कहा हुआ महाप्रबंधक महोदय का यह कथन सही प्रतीत होने लगता है कि ‘बाय डिफ़ाल्ट’ मैं माइनिंग इंजिनियर बना हूँ आजीविका के लिए, अन्यथा एक विशिष्ट साधना की तरह साहित्य-कर्म में गहन अभिरुचि मुझे अपना गंतव्य स्थान लगने लगती है।
जो भी हो, यह कार्यक्रम मेरे लिए विशिष्ट था। इस कार्यक्रम में मुझे उद्भ्रांत साहब से मिलना था। हिन्दी भाषा के अग्रणी कवि के तौर पर वह इस कार्यक्रम में शिरकत करने वाले थे। दो दिन पहले उन्होने मुझे इस संदर्भ में फोन भी किया था यह कहते हुए, “मैं भुवनेश्वर पहुँच रहा हूं 15 जनवरी को। ऑल इंडिया रेडियो द्वारा आयोजित ‘सर्वभाषा कवि सम्मेलन’ में भाग लेने के लिए। आप भुवनेश्वर से कितने दूर रहते हो ?”
फोन पर उद्भ्रांत जी की आवाज सुनते ही मन बहुत खुश हो गया।मैं उन्हें अपना आदर्श कवि मानता था और उनसे मिलने का मौका बिलकुल खोना नहीं चाहता था। वह मेरे मार्गदर्शक भी थे। मैं उन्हें साल की शुरुआत में नए साल का अभिवादन भी नहीं कर पाया था,क्योंकि उन्होने मुझे चीनी कवि लू-शून का अध्याय जोड़कर ‘चीन का संस्मरण’ पूरा करने का सलाह दी थी, मगर इधर-उधर के कामकाज की वजह से उस पाण्डुलिपि को पूरा कर नहीं पाया था। यह अपराध-बोध मुझे अपनी प्रतिबद्धता के खिलाफ चोटिल कर रहा था। अगस्त 2014 में सृजनगाथा द्वारा चीन में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन की बहुत सारी मधुर स्मृतियां मानस पटल पर रह-रहकर ताजा हो रही थी,अचानक उनके भुवनेश्वर आने का कार्यक्रम मन को अत्यंत सुकून दे रहा था।फोन पर हो रही बातचीत के दौरान उन्होंने अपने अंतस में छुपे स्नेह के अथाह महासागर में से कुछ मोती मेरी तरफ उछालते हुए कहा था, “अगर बहुत ज्यादा दूर हो तो रहने दो। मगर तुम्हें देखे हुए बहुत दिन हो गए हैं। इस कार्यक्रम में रमाकांत रथजी ,उदगाताजी जी भी आएंगे। कोशिश करना ........ ”
“आपसे मिलने के लिए दूरी कोई बाधा नहीं है,सर। मैं पूरा प्रयास करूंगा आपसे मिलने का आप भुवनेश्वर आकर अगर बिना मिले चले जाएंगे तो मुझे बड़ा अफसोस होगा। और तो और, इसी बहाने रमाकांत रथ जी व उदगाता जी से भी मिलना हो जाएगा।” यह कहते हुए मैंने मन ही मन भुवनेश्वर जाने का संकल्प लिया।
मेरे उत्तर से आश्वस्त होकर प्रसन्नतापूर्वक वह कहने लगे, “ सर्वभाषा कवि सम्मेलन या (नेशनल सिम्पोजियम ऑफ पोएट्स) ऑल इंडिया रेडियो द्वारा सन 1956 से हर साल आयोजित किया जाता है। जिसमें देश की 22 भाषाओं के उत्कृष्ट कवि भाग लेते हैं। यह एकमात्र ऐसा मंच है, जो समस्त समकालीन भारतीय भाषाओं के बीच पारस्परिक भाषायी सौहार्द्र के साथ-साथ ‘अनेकता में एकता’ के सूत्र को अक्षुण्ण रखने की प्रेरणा देता है। इस कार्यक्रम में सभी मूल कवि पहले अपना कविता पाठ करते हैं, फिर उनके अनुवादक कवि उनकी कविताओं के हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत करते हैं। इस कार्यक्रम की दो घंटे की रिकॉर्डिंग की जाती है, जिसे 25 जनवरी की रात को दस बजे आल इंडिया रेडियो से प्रसारित किया जाता है। उसी दिन,आल इंडिया रेडियो की रीज़नल शाखाएँ उनकी रीजनल भाषाओं में अनुवाद प्रसारित करती है। इस तरह देश के कोने-कोने में ये सारी कविताएं पहुँच जाती है।”
यह थी इस कार्यक्रम के बारे में संक्षिप्त जानकारी, मगर मेरे लिए यह अलग किस्म का प्रोग्राम था,जिसे मैंने अपने जीवन में न पहले कभी देखा और न ही सुना। एक भाषा के बाईस अनुवाद तो बाईस भाषा के कुल अनुवाद 484 हो जाते हैं। इतने व्यापक स्तर पर भारतीय भाषाओं के अनुवाद का अनोखा प्रयोग था यह। मैं मन ही मन सोच रहा था कि अगर ऐसे ही प्रयोग होते रहें तो भारतीय भाषाओं के शब्द-कोश अपने आप में किसी विश्व-कोश से कम नहीं होगा। “सर्वभाषा कवि सम्मेलन” के माध्यम से आल इंडिया रेडियो संविधान में मान्यता प्राप्त सारी भारतीय भाषाओं की समृद्धि, साहित्यिक धरोहर व उच्च कोटि की सांस्कृतिक प्रस्तुति के महा-संगम को एक मंच पर देखने के लिए किस साहित्य-प्रेमी का मन नहीं ललचाता होगा! एक-दो दिन बाद, इससे पहले कि मैं फर्टिलाइजर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया के मेरे साहित्य-अनुरागी मित्र, सेवा-निवृत केमिकल इंजीनियर डॉ॰ प्रसन्न कुमार बराल को मेरी यह मंशा बताता तो उन्होने पहले ही वहाँ का आमंत्रण-पत्र मुझे दिखाते हुए इस कार्यक्रम की सारी रूपरेखा के बारे में विस्तृत जानकारी देने लगे।

शनिवार, 3 जनवरी 2015

भोजपुरी के संघर्ष की मुकम्मल किताब

उमेश चतुर्वेदी
किताब का नाम: तलाश भोजपुरी भाषायी अस्मिता की
लेखक: अजीत दुबे
प्रकाशक: इंडिका इन्फोमीडिया 
मूल्य: 400 रुपये
तकनीक के विस्तार और सूचना क्रांति के दौर में जब दुनिया ग्लोबल गांव के तौर पर तब्दील हो रही हो, तब स्थानीयता स्थानिकता देसज सोच और पारंपरिक संस्कृति का कोई मतलब ही नहीं रह जाता लेकिन मनुष्य के जीवन में अगर आज भी ये चीजें मायने रखती हैं तो निश्चित तौर पर इसका श्रेय हजारों साल के मानवीय विकासक्रम और इसके जरिए परंपरा और संस्कृति को लेकर स्थापित सोच को ही जाता है यही वजह है कि भाषा और उसकी स्थानीयता आज दुनिया भर में राजनीति का औजार और कारण दोनों बन गए हैं...चेकोस्लोवाकिया के विभाजन की पृष्ठभूमि में चेक और स्लोवाक भाषाओं की भी भूमिका रही...भारत में भाषाएं अब भी राजनीतिक हथियार और सांस्कृतिक संघर्ष का जरिया बनी हुई हैं....तमिल बंगला और मराठी जैसी भाषाओं को लेकर उन्हे बोलने वालों का आग्रह इसका उदहारण है...दुर्भाग्यवश आजादी के बाद हिंदी भारतीयता और भारतीय राजनीति का हथियार नहीं बन पाई जबकि आजादी के पहले वह भारतीयता और राष्ट्र की भाषायी अस्मिता का प्रतीक थी...जाहिर है कि आजादी के बाद जब हिंदी ही राजनीतिक हथियार नहीं बन पाई तो उसकी सहोदर भाषाएं अवधी- भोजपुरी कैसे हथियार बन पाती...लेकिन 17 मई 2012 को जब भारतीय राजनीति के एलीट चेहरे और तब के गृहमंत्री पी चिदंबरम ने लोकसभा में भोजपुरी में लोगों की भावनाओं को समझने का विचार जाहिर किया, तब माना गया कि भोजपुरी भले ही राजनीतिक हथियार न बन पाए लेकिन उसकी अहमियत जरुर समझी जाएगी...

गुरुवार, 1 जनवरी 2015

वर्गीज को श्रद्धांजलि के बहाने

यह स्वीकार करने में अब एकदम हिचक नहीं रही कि भारतीय पत्रकारिता का बहुसंख्यक चेहरा अर्थ यानी धन से ही संचालित होे रहा है, सरोकार तो पता नहीं पत्रकारिता कहां पीछे छोड़ आई है। दिल्ली जैसे शहर में... जहां पत्रकारिता में तुलनात्मक रूप से स्थायीत्व और निरंतरता कहीं ज्यादा है.... वहां भी सरोकार या तो पीछे छूट चुके हैं या छूटने की प्रक्रिया में हैं, लेकिन इसी दिल्ली और इसी दौर में बी जी वर्गीज़ भारतीय पत्रकारिता के लिए मशाल की तरह रहे... सरोकार, विकास और धारा से विपरीत लेकिन संस्कारों से ओतप्रोत विचार.... बी जी वर्गीज़ की पहचान रही। वर्गीज़ के बहाने सरोकार और संस्कार की दबी ढंकी चाहत रखने वाले पत्रकारों के मानस में बेहतर भविष्य की आकांक्षा वाली एक लौ जलती रही, लेकिन दुर्भाग्य.... अब वह लौ भी बुझ गई है... उम्मीद करें कि वह लौ पथभ्रष्ट हो रही पत्रकारिता को उसके मूल सरोकारी पथ पर लाने का प्रेरणा स्रोत बनी रहेगी.... श्रद्धांजलि..

शनिवार, 20 दिसंबर 2014

ज़िंदगी बादे फना तुझको मिलेगी हसरत, तेरा जीना तेरे मरने की बदौलत होगा

फैजाबाद/अयोध्या. पिछले कई सालों से अयोध्या फिल्म सोसाइटी द्वारा आयोजित फिल्म फेस्टिवल का समापन हो गया. गौरतलब है कि अवध की गंगा-जमुनी तहजीब को समर्पित इस फेस्टिवल में सिनेमा के माध्यम से समाज और राजनीतिक चेतना से जुड़े मुद्दों पर बहस की जाती है. बता दें कि फेस्टिवल 'अवाम कासिनेमा' का उद्घाटन प्रेस क्लब 
फैजाबाद में किया गया. इस दौरान काकोरी के क्रांतिवीर की जेल डायरी और दुर्लभ दस्तावेज़ो की प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया. इस अनोखी प्रदर्शनी का उद्घाटन फ़िल्मकार-लेखिका मधुलिका सिंह के हाथों हुआ. फैजाबाद/अयोध्या. पिछले कई सालों से अयोध्या फिल्म सोसाइटी द्वारा आयोजित फिल्म फेस्टिवल का समापन हो गया. गौरतलब है कि अवध की गंगा-जमानी तहजीब को समर्पित इस फेस्टिवल में सिनेमा के माध्यम से समाज और राजनीतिक चेतना से जुड़े मुद्दों पर बहस की जाती है. बता दें कि फेस्टिवल 'अवाम का सिनेमा' का उद्घाटन प्रेस क्लब फैजाबाद में किया गया. इस दौरान काकोरी के क्रांतिवीर की जेल डायरी और दुर्लभ दस्तावेज़ो की प्रदर्शनी का भी आयोजन
किया गया. इस अनोखी प्रदर्शनी का उद्घाटन फ़िल्मकार-लेखिका मधुलिका सिंह के हाथों हुआ.

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

पेशेवर और व्यावसायिकता के बीच भारतीय पत्रकारिता

(मनोरमा ईयर बुक हिंदी के लिए श्री राजेश कालिया की प्रेरणा से लिखा गया और 2014 के अंक में प्रकाशित)

उमेश चतुर्वेदी
भारतीय पत्रकारिता इन दिनों दो विपरीत विचारधाराओं की रस्साकशी के बीच झूल रही है..तकनीकी बदलाव, बढ़ते आर्थिक दबाव और नैतिक मूल्यों में आ रही गिरावट के बीच मीडिया का लगातार विस्तार हो रहा है। इस विस्तार की गवाही भारत के समाचार पत्रों के महापंजीयक के आंकड़े भी देते हैं। जिनके मुताबिक 31 मार्च 2013 तक देश में 94067 समाचार पत्र और पत्रिकाएं पंजीकृत थीं। भारत में मीडिया की पहुंच और अहमियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसमें समाचार पत्रों की संख्या जहां 12511 रही, वहीं साप्ताहिकों और पत्रिकाओं की संख्या 81556 रही। दुनिया के विकसित देशों में जब प्रिंट मीडिया की मौत के युग के खात्म की घोषणा की जा रही है, वहीं भारत में प्रिंट मीडिया में लगातार विकास हो रहा है। इसकी गवाही 2011-12 के दौरान पंजीकृत पत्रों की संख्या देती है, जो 7337 रही। समाचार पत्र और पत्रिकाएं पंजीकृत हुईं। ये तो रही प्रिंट मीडिया की बात..इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के क्षेत्र में भी लगातार विकास हो रहा है। 2012 में जारी ट्राई के आंकड़ों के मुताबिक देश में निजी सेक्टर के करीब 245 एफएम चैनल लगातार प्रसारण कर रहे हैं। इसके अलावा भारत में आकाशवाणी के 413 चैनल काम कर रहे हैं। इसके साथ ही दूरदर्शन के 46 स्टूडियो और करीब 1400 केंद्र लगातार काम कर रहे है। इसके अलावा निजी क्षेत्र के करीब 800 खबरिया चैनल तमाम भाषाओं में लगातार चौबीसों घंटे लगातार प्रसारण कर रहे हैं। इसमें जून 2014 में आए टेलीकॉम रेग्युलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया के इंटरनेट से जुड़े आंकड़ों को जोड़े बिना भारतीय मीडिया की मुकम्मल तस्वीर पेश नहीं की जा सकती। इस आंकड़े के मुताबिक देश में इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या 24 करोड़ 30 लाख हो गई है।
आंकड़ों में विकास और विस्तार की यह तसवीर तो सरसरी तौर पर यही साबित करती है कि भारतीय मीडिया सुनहले दौर से गुजर रहा है। लेकिन हकीकत इसके ठीक उलट है। भारतीय मीडिया इन दिनों पेशवराना अंदाज, नैतिकता की समस्या और साख के संकट से कहीं ज्यादा गुजर रहा है।

गुरुवार, 9 अक्टूबर 2014

चीन रेडियो पर

चीन रेडियो इंटरनेशन के दक्षिण एशिया फोकस कार्यक्रम में शुक्रवार 03 अक्टूबर 2014 को प्रसारित अपने विचार...चीन रेडियोे के यशस्वी एंकर पंकज श्रीवास्तव जी ने इस इंटरव्यू को किया ...इसका लिंक आप सुधी जनों के लिए भी है..आपकी प्रतिक्रियाएं मेरा उत्साह बढ़ाएंगी

http://hindi.cri.cn/1321/2014/10/09/1s162514.htm

मंगलवार, 7 अक्टूबर 2014

नदी संरक्षण के लिए दिल्ली में होगा मीडिया जुटान

“नद्द: रक्षति रक्षितः” विषय के साथ इस बार का आयोजन दिल्ली में भारतीय जनसंचार संस्थान संस्थान (आईआईएमसी) के सभागार में 11 और 12 अक्टूबर को होगा। है। इसमें देशभर के मीडिया, नदी और जल से जुड़े संगठनों के 250 से अधिक प्रतिनिधि हिस्सा लेंगे।
जन सरोकार से जुड़े तमाम मुद्दों पर जागरूकता के लिए प्रयासरत संस्था स्पंदन और मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद् द्वारा संयुक्त रूप से यह आयोजन किया जा रहा है. मीडिया चौपाल का आयोजन गत तीन वर्षों से किया जा रहा है. पिछ्ला दो आयोजन भोपाल में हुआ था. इसमें देश भर के प्रमुख जन संचारक हिस्सा लेते रहे हैं. पिछले आयोजनों विकास और विज्ञान मुख्य विषय था. इस वर्ष चौपाल का मुख्य विषय नदी संरक्षण है. गौरतलब है कि इस बार के चौपाल में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, विज्ञान भारती, भारतीय जनसंचार संस्थान, जम्मू-कश्मीर अध्ययन केंद्र, इंडिया वाटर पोर्टल और भारतीय विज्ञान लेखक संघ का भी सहयोग मिल रहा है.
11-12 अक्टूबर को मीडिया चौपाल में जुटेंगे देश भर से जन-संचारक
इस चौपाल में विचारक के एन गोविन्दाचार्य, पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुरेश प्रभु, सांसद और पत्रकार प्रभात झा, राज्यसभा सांसद और नर्मदा समग्र के अध्यक्ष अनिल माधव दवे, वरिष्ठ पत्रकार जवाहरलाल कॉल, जल विशेषज्ञ अनुपम मिश्र, विज्ञान संचारक डा. मनोज पटेरिया, विज्ञान भारती के संगठक जयकुमार, मध्यप्रदेश सरकार के वैज्ञानिक सलाहकार डा. प्रमोद कुमार वर्मा, बाढ़ के विशेषज्ञ दिनेश मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय, जयदीप कर्णिक, रामेन्द्र सिन्हा, हितेश शंकर, के. जी. सुरेश, पर्यावरण स्तंभकार देवेन्द्र शर्मा, पंकज चतुर्वेदी, भाषाविद हेमंत जोशी, प्रमोद दूबे सहित देशभर के लगभग 250 से अधिक संचारक और जल के जानकार जुट रहे हैं. ये सभी संचारक और विषय विशेषज्ञ लोकहित में प्रभावी और उद्देश्य आधारित संचार के लिए रणनीतिक ज्ञान भी साझा करेंगे. इस मौके पर स्वतंत्र रूप से कार्यरत वेब और अन्य संचारकों की समस्याओं पर भी विमर्श होगा. बेहतर संचार के तरीके भी ढूंढें जाएंगे.