अमर उजाला ने 24 अक्टूबर को तीन कॉलम की खबर
प्रकाशित हो रही है – अजमेर
ब्लास्ट में फंसे संघ नेता। सभी अखबारों ने संघ-बीजेपी की प्रतिक्रिया 24 अक्टूबर
को ही दी है। लेकिन अमर उजाला को यह खबर देने का विचार अगले दिन यानी 25 अक्टूबर
को आया। इस दिन अखबार ने खबर दी है – अजमेर केस : भाजपा ,
संघ बिफरे। 27 अक्टूबर को अखबार ने संघ परिवार की खबर दी है। दो कॉलम की इस खबर का
शीर्षक है – संघ पर शिकंजे से
भगवा दल परेशान। इसके अगले दिन जयपुर डेटलाइन से खबर है – अजमेर ब्लास्ट में नया खुलासा, संघ नेता ने दिए थे
निर्देश। दो कॉलम की यह खबर राजस्थान
एटीएस के हवाले से लिखी गई है। अमर उजाला ने आठ नवंबर को संघ के देशव्यापी धरने पर
बैठने की खबर तीन कॉलम में छापी, जिसका शीर्षक था- भगवा ताप नापेंगे भागवत।
इस ब्लॉग पर कोशिश है कि मीडिया जगत की विचारोत्तेजक और नीतिगत चीजों को प्रेषित और पोस्ट किया जाए। मीडिया के अंतर्विरोधों पर आपके भी विचार आमंत्रित हैं।
बुधवार, 28 नवंबर 2012
गुरुवार, 22 नवंबर 2012
मीडिया में इंद्रेश प्रकरण की कवरेज
(गतांक से आगे)....
मुंबई से प्रकाशित डीएनए ने जयपुर डेटलाइन से
24 अक्टूबर को एक ही खबर प्रकाशित की है, जिसका शीर्षक है- आरएसएस ली़डर इन अजमेर
ब्लास्ट चार्जशीट सीज कान्सिपरेसी। दो कॉलम की इस खबर को दूसरे पेज तक फैलाया गया
है। इसके बाद डीएनए ने 3 नवंबर को खबर प्रकाशित की। तीन कॉलम की इस खबर का शीर्षक
था – आरएसएस लान्च नेशनवाइड
प्रोटेस्ट इन इंद्रेश सपोर्ट। इकोनॉमिक टाइम्स ने इसी दिन पूरे कॉलम में यह खबर
प्रकाशित की है, जिसके साथ दो कॉलम का इंद्रेश कुमार और दूसरे नेताओं का फोटो भी
है। इस खबर का शीर्षक है- एटीएस नेम्स आरएसएस लीडर इन अजमेर ब्लास्ट चार्जशीट।
कोलकाता से प्रकाशित द टेलीग्राफ ने 24 अक्टूबर को छह कॉलम में खबर छापी है – ब्लास्ट क्लाउड ऑन आरएसएस आउटरीच मैन। इसके
साथ ही अंदर के पेज पर राधिका रामशेषन की दिल्ली से चार्जशीट टाइमिंग लीव्स बीजेपी
स्टन्ड शीर्षक से विश्लेषण भी प्रकाशित किया गया है।
गुरुवार, 13 सितंबर 2012
ईस्ट इंडिया कंपनी की भाषा नीति और हिंदी
उमेश चतुर्वेदी
अगर भारतीयों
को पूरी तरह से समझना और उन्हें कंपनी के शासन से संतुष्ट रखना है तो सबसे अच्छा
उपाय यही हो सकता है कि सरकार के जिन जूनियर सिविल सेवकों को जनसंपर्क में रहकर
प्रशासन की जिम्मेदारी संभालनी है, उन्हें हिंदुओं और मुसलमानों के रीति-रिवाजों,
काम करने के तरीकों और धार्मिक मान्यताओं की जानकारी हो।
-
लॉर्ड
वेलेजली
हिंदी को राजभाषा का
उचित स्थान नहीं मिलने की जब भी चर्चा होती है, 1835 में लागू की गई अंग्रेजी शिक्षा को जमकर कोसा जाता है।
जिसे मैकाले की मिंट योजना के तहत लागू किया गया था। लेकिन इसके साढ़े तीन दशक
पहले ही राजकाज में हिंदी या हिंदुस्तानी की जरूरत और अहमियत को भारत में कंपनी
राज संभालने आए लॉर्ड वेलेजली ने समझ लिया था। उनकी यह समझ उनके इस बयान में साफ
झलक रही है।
हिंदी दिवस पर खास सर्वेक्षण मीडिया स्टडीज ग्रुप ने किया है। इस सर्वेक्षण को यहां अविकल प्रकाशित किया जा रहा है।
मीडिया स्टडीज ग्रुप का सरकारी हिंदी वेबसाइट का सर्वेक्षण
सरकार की वेबसाइटों
पर हिंदी की घोर उपेक्षा दिखाई देती है। हिंदी को लेकर भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालय, विभाग व
संस्थान के साथ संसद की वेबसाइटों के एक सर्वेक्षण से यह आभास मिलता है कि सरकार
को हिंदी की कतई परवाह नहीं हैं। सर्वेक्षण में शामिल वेबसाइटों के आधार पर यह
दावा किया जा सकता है कि हिंदी भाषियों के एक भी मुकम्मल सरकारी वेबसाइट नहीं हैं। अंग्रेजी के मुकाबले तो हिंदी की वेबसाइट
कहीं नहीं टिकती है। हिंदी के
नाम पर जो वेबसाइट है भी, वे भाषागत अशुद्धियों
से आमतौर पर भरी हैं। हिंदी के नाम पर अंग्रेजी का देवनागरीकरण मिलता हैं। हिंदी की वेबसाइट या तो खुलती नहीं है। बहुत
मुश्किल से कोई वेबसाइट खुलती है तो ज्यादातर में अंग्रेजी में ही सामग्री मिलती
है। रक्षा मंत्रालय
की वेबसाइट का हिंदी रूपांतरण करने के लिए उसे गूगल ट्रासलेंशन से जोड़ दिया गया
है।
बुधवार, 29 अगस्त 2012
पाती एक कवि-कथाकार की
आदऱणीय साथी,किसी भी समाज में मीडिया की बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका होती है। न केवल समाचारों को बिना किसी रंग के पूरी वस्तुनिष्ठता से लोगों तक ले जाने में बल्कि सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक गत्यात्मकता को, इन क्षेत्रों में छोटे से छोटे परिवर्तनों के निहितार्थ एवं संभावित परिणामों के बारे में लोगों को जागरूक करने में। आजादी की लड़ाई को ताकत देने में मीडिया की बड़ी भूमिका रही है, इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता। लेकिन अब वो हाल नहीं है। मीडिया का चेहरा बहुत बदल गया है। खासकर हिंदी मीडिया की दशा-दिशा तो बहुत ही चिंतनीय है। हिंदी के पाठक की जरूरत से पूरी तरह अनजान कुछ खास किस्म के अंग्रेजीदां प्रबंधक तय कर रहे हैं कि हिंदीवालों को क्या पढ़ना चाहिए। वे यह प्रचारित भी कर रहे हैं कि वे जो सामग्री अखबारों में परोस रहे हैं, वही और सिर्फ वही लोग पढ़ना चाहते हैं।
सोमवार, 13 अगस्त 2012
अन्ना आंदोलन का सरोकारी तमाशा और मायूस मीडिया
उमेश चतुर्वेदी
(यह लेख मध्य प्रदेश के कई शहरों से प्रकाशित अखबार प्रदेश टुडे में प्रकाशित हो चुका है। )
सरोकारों से दूर
होने का आरोप झेलता रहे हिंदी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर यह आरोप नया नहीं है कि वह
खुद को बचाए रखने के लिए कई बार खुद भी आखेटक की भूमिका में आ जाता है। पत्रकारिता
में मान्यता रही है कि पत्रकार सिर्फ खबरों का दर्शक और साक्षी होता है और उसे
ज्यों का त्यों पाठकों, दर्शकों और श्रोताओं के सामने रखना ही पत्रकार की असल
जिम्मेदारी है। पत्रकारिता में जिस वस्तुनिष्ठता की वकालत की जाती है, उसके पीछे
यही सोच काम करती रही है। ऐसा भले ही महाभारत के दौर में रहा हो, जब संजय ने ज्यों
का त्यों खबर परोस दी हो, लेकिन खबरों को ट्विस्ट करना या अपने लिहाज से उसे पेश
करना मीडिया की फितरत रही है।
बुधवार, 8 अगस्त 2012
(यह लेख बहुवचन में प्रकाशित हुआ है)
नई आर्थिकी, कारपोरेट कल्चर और मीडिया
उमेश चतुर्वेदी
‘ दुनिया जैसी भी है, बनी रहेगी और चलती
रहेगी ।’
वाल्टर लिपमैन, अमेरिकी पत्रकार
भारतीय
दर्शन में भी जीवन और दुनिया को लेकर कुछ वैसी ही धारणा रही है। जैसा वाल्टर
लिपमैन ने कहा था। इस कथन में नियति को स्वीकार करने का भी एक बोध छुपा हुआ
है। दुनिया और अपने आसपास के माहौल में
मौजूद तमाम तरह के अंतर्विरोधों के बावजूद यह नियतिवादी दर्शन ही उसके प्रति विरोध
और विद्रोह की संभावनाओं को खारिज करता रहता है। कहना न होगा कि इसी नियतिवाद का
शिकार इन दिनों भारतीय मीडिया और उसमें सक्रिय लोग भी हैं। लेकिन इसका मतलब यह
नहीं है कि वे अपनी नियति से विद्रोह करना नहीं चाहते। लेकिन नई आर्थिकी ने जिस
तरह खासतौर पर महानगरीय जिंदगी को आर्थिक घेरे में ले लिया है, वहां विरोध और
विद्रोह की गुंजाइश लगातार कम होती गई है। कर्ज के किश्तों पर टिका जिंदगी की
जरूरतें और आडंबर ने मीडिया में काम कर रहे लोगों को भी इतना घेर लिया है कि तमाम
तरह की विद्रूपताओं के बावजूद इसे झेलने के लिए मजबूर हैं।
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उमेश चतुर्वेदी लोहिया जी कहते थे कि दिल्ली में माला पहनाने वाली एक कौम है। सरकारें बदल जाती हैं, लेकिन माला पहनाने वाली इस कौम में कोई बदला...
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