रविवार, 23 अगस्त 2015

लय में लौट आए पीएम



उमेश चतुर्वेदी
स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री से उम्मीद लगा रखे लोगों को उनके भाषण में वैसी ताजगी और नई दिशा नजर नहीं आई, जैसा चुनाव अभियान से लेकर पिछले पंद्रह अगस्त तक उनके शब्दों में नजर आती रही। प्रचंड जनमत की आकांक्षाओं के रथ पर सवार होकर जिस तरह सत्ता के शीर्ष पर नरेंद्र मोदी पहुंचे हैं, उसमें जनता की कसौटियों पर कसे जाने की चुनौतियां कुछ ज्यादा होनी ही थी और वह प्रधानमंत्री के सामने है भी। ऐसे में पंद्रह अगस्त के भाषण को लेकर उन पर टीका-टिप्पणी होनी ही थी। दस-पंद्रह साल पहले की बात होती तो इस टीका-टिप्पणी को देखने के लिए कुछ वक्त की दरकार होती। लेकिन फटाफट खबरों वाले खबरिया चैनलों की अनवरत कथित बहस यात्रा और प्रतिपल सक्रिय सोशल मीडिया के दौर में इससे बचाव कहां। अब तत्काल फैसले भी होने लगते हैं और उन पर टिप्पणियों की बौछार भी होने लगती है। जाहिर है कि पंद्रह अगस्त को प्रधानमंत्री मोदी के भाषण को लेकर ऐसी टिप्पणियां शुरू भी हो गईं। तब सवाल यह उठने लगा कि प्रधानमंत्री अब चूकने लगे हैं। सवाल यह भी उठा कि अब तक अभियान के मूड में रही उनकी शैली से जनता का मोहभंग होने लगा है।

मंगलवार, 4 अगस्त 2015

ओम थानवी के बहाने जनसत्ता पर कुछ विचार

उमेश चतुर्वेदी
1986-87 की बात है...तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और तत्कालीन वित्त मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह में अदावत शुरू हो गई थी..उन्हीं दिनों बोफोर्स तोप सौदे को लेकर राजीव सरकार कठघरे में थी...इंडियन एक्सप्रेस अखबार से पहली बार पल्ला उन्हीं दिनों पड़ा..चित्रा सुब्रमण्यम की रिपोर्टें उन दिनों तहलका मचा रखी थीं..उन्हीं दिनों इंडियन एक्सप्रेस के अखबार जनसत्ता से परिचित हुआ..बेहद पतले कागज पर महज आठ पेज का वह अखबार बलिया में अगले दिन मिलता था और कीमत भी दिल्ली में मिलने वाले अखबार की कीमत की तुलना में कुछ महंगी होती थी..बहरहाल उस बासी अखबार को भी पढ़ने की जो लत लग गई...वह दिल्ली आने के बाद बरसों तक बनी रही..बलिया में रहते वक्त ही रविवार को छपने वाले उस अखबार के संपादकीय पृष्ठ किताबें में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के संदर्भ में अपना एक लेख छप चुका था..आचार्य द्विवेदी का बलिया..उस लेख के लिए तब एमए में पढ़ने वाले मुझ जैसे छात्र को स्थानीय पत्रकारों और साहित्यकारों की ठीक-ठाक गालियां भी मिली..तब भी संतोष यह था कि गालियों के बावजूद जनसत्ता में तो छपे..इन्हीं दिनों जनसत्ता के बढ़ते प्रसार और उसे पूरा न कर पाने की मजबूरी का ऐलानिया इजहार भी पढ़ा..प्रभाष जोशी का मिल-बांटकर पढ़ने वाली अपील पढ़ी तो इस अखबार को लेकर एक अलग तरह की छवि मन में बनी...
दिल्ली आए तो जनसत्ता का नया ही रूप देखा..भारतीय जनसंचार संस्थान ने छात्रावास नहीं दिया तो पहले पनाह लेनी पड़ी तत्कालीन बाहरी दिल्ली के इलाके रोहिणी और बाद में संस्थान के बगल कटवारिया सराय में..दोनों ही इलाके उन दिनों जाट आबादी बहुल थे..दोनों ही इलाकों का शायद ही कोई घर था, जिनके यहां जनसत्ता नहीं आता था..तब जनसत्ता में यमुना आर और यमुना पार नाम के पेज आते थे..यमुना था या जमना..इस पर थोड़ा भ्रम है...कुमार संजय सिंह(जो अब संजॉय हो गए हैं) ठीक करेंगे...बहरहाल दोनों पेजों की लोकप्रियता इतनी ज्यादा थी कि दिल्ली की स्थानीय खबरें यहां छपवाने के लिए लोग लालायित रहते...बोफोर्स को लेकर राजीव गांधी की मिट्टी पलीद करने वाले एक्सप्रेस ग्रुप के अखबार जनसत्ता ने कई बार एक्टिविस्ट की भूमिका निभाई...दिल्ली में रेडलाइन बसों का 1993-94 में खासा आतंक था.. उनके खिलाफ सरकारी तंत्र कार्रवाई तक नहीं कर पाता था..जनसत्ता ने रेडलाइन के खिलाफ अभियान छेड़ा..लोगों से सीधी कार्रवाई करने की अपील की..इसका असर हुआ...जनसत्ता के अभियान के सामने रेडलाइन वाले जो तब ज्यादातर मवाली थे, अपनी औकात पर आ गए..क्योंकि जनता ने ठांव फैसला करना शुरू कर दिया..नतीजतन तत्कालीन मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना को कार्रवाई करनी पड़ी...मुझे याद है, दिल्ली के पहले वित्त मंत्री जगदीश मुखी के आदेश के बावजूद बिजली विभाग, जिसे तब डेसू कहा जाता था...के अधिकारी सुधरने को तैयार नहीं थे..तब उन्होंने अपने लोगों से खुद कहा था कि जनसत्ता के रिपोर्टर से संपर्क करो..अब सत्येंद्र झा पत्रकारिता में नहीं हैं..लेकिन दो किश्तों में उन्होंने खोजी रिपोर्ट लिखी और डेसू के कई अफसर सस्पेंड हुए...प्रभाष जोशी तब केंद्रीय टेलीफोन सलाहकार समिति के सदस्य थे..तब एमटीएनएल का दिल्ली में फोन पर एकाधिकार होता था..उसके कर्मचारी और अफसर रिश्वतखोरी को अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते थे..इलाके के लाइन मैन को पूजा-प्रसाद ना दो तो टेलीफोन खराब होना तय था..प्रभाष जोशी के एक मित्र के साथ ऐसा ही होता था..वे सिफारिश करते तो फोन तो ठीक हो जाता..लेकिन कुछ दिनों बाद फिर जानबूझकर खराब कर दिया जाता। जोशी जी के मित्र को लाइनमैन ने कहा कि देखता हूं कितने दिनों तक आप  सिफारिश करा पाते हो..कहने का मतलब ये कि चढ़ावा तो चढ़ाना ही पड़ेगा..प्रभाष जी भी जान गए कि अब उनका असल हथियार ही काम आएगा..उन्होंने तब के अपने प्रमुख संवाददाता से एक रिपोर्टर की मांग की..सत्येंद्र झा प्रभाष जी के पास भेजे गए..उन्होंने एमटीएनएल पर ऐसी स्टोरी लिखी कि जिसे कहते हैं तहलका मचना..वह मच गया..इसका जिक्र खुद प्रभाष जी ने अपने कागद कारे स्तंभ में किया..
जनसत्ता के इतिहास में ऐसी ढेरों कामयाबियां हैं..प्रभाष जी के गुलदस्ते में आक्रामक रिपोर्टिंग टीम थी तो उनके साथ गांधीवादी, दक्षिणपंथी, वामपंथी सब लोग थे...दिल्ली में 1994-95 में जब पत्रकारिता में काम शुरू किया तो अंग्रेजी पत्रकारों को ही तरजीह मिलते देखता था..अफसर तो हिंदी के अखबारों और पत्रकारों को कुछ समझते ही नहीं थे..हिंदी पत्रकारों से सीधे मुंह बात करना तो केंद्र के अफसरों को शायद रास ही नहीं आता था..ऐसे घोर हिंदी विरोधी माहौल में भी जनसत्ता के रिपोर्टरों की धाक थी..राजनीतिक ब्यूरो के रामबहादुर राय जी, प्रदीप सिंह जी, ओमप्रकाशजी, राजेश जोशी, असरार खान जी, अतुल जैन जी, विवेक सक्सेना जी की धाक अपनी नंगी आंखों से तमाम पार्टियों, पीआईबी और सरकार के अंगों को कवर करते वक्त मैंने खुद देखी है...हवाला की रामबहादुर राय और राजेश जोशी ने ऐसी रिपोर्टिंग की कि तब की राजनीति ही बदल गई..शरद यादव, लालकृष्ण आडवाणी, कमलनाथ, माधवराव सिंधिया, मदनलाल खुराना आदि को इस्तीफे देने पड़े...लाखूभाई पाठक घूसकांड हो या बबलू श्रीवास्तव का जेल से इंटरव्यू, इन खबरों ने तो भारतीय राजनीति को झकझोर दिया था..एक बात और अंग्रेजी अखबारों के दफ्तरों में तब मैंने सिर्फ जनसत्ता की फाइलें ही देखी थीं..साहित्यिक रिपोर्टिंग में रवींद्र त्रिपाठी ने कामयाबी और स्तरीयता के नए प्रतिमान गढ़े..लेकिन बाद के दिनों में जनसत्ता में ऐसा कुछ नहीं बचा..प्रभाष जी के विदा होते और अच्युतानंद मिश्र के कार्यकाल के खत्म होते ही या तो ये रिपोर्टर ही वहां नहीं रहे, या बचे भी तो निस्तेज कर दिए गए..
सवाल यह उठता है कि जनसत्ता की इन कामयाबियों का यहां जिक्र क्यों..इसलिए कि ओम थानवी जी जनसत्ता की 16 साल की संपादकी से रिटायर हो गए हैं और उसे लेकर हिंदी के एक खास वर्ग के बुद्धिजीवियों में शोक की लहर दौड़ पड़ी है...कि अब जनसत्ता सूना हो गया कि अब जनसत्ता बिना मेरी सुबह नहीं पूरी होगी..आदि- आदि .
थानवी जी का जनसत्ता को लेकर एक मात्र योगदान है..उसे उन्होंने साहित्यिक अखबार बना दिया..जिसमें वितंडों को भी खूब जगह मिली...प्रभाष जोशी ने जिस जनसत्ता को हर वर्ग और विचारधारा के गुलदस्तों से सजाकर एक मुकम्मल और ठेठ अखबार बनाने की ना सिर्फ कोशिश की थी, बल्कि उसे प्रतिष्ठित अखबार बनाया था, वह प्रतिष्ठा कहीं पीछे छूट गई..थानवी जी का योगदान इसमें भी है..जिस रिपोर्टिंग के चलते जनसत्ता सत्ता को हिलाता था, वह रिपोर्टिंग गायब ही हो गई...हां एक साहित्यिक अखबार के तौर पर उसकी प्रतिष्ठा बनी और वह भी एक खास वर्ग में..कई बार तो वह मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र लोकलहर की रिवाइज्ड कॉपी बनता नजर आया..अगर किसी प्रतिष्ठित अखबार की कामयाबी का यह पैमाना है तो निश्चित तौर पर थानवी जी कामयाब रहे...उनकी कामयाबी को सलाम तो किया ही जाना चाहिए..चलते-चलते एक बात और...थानवी जी बहुत अच्छे व्यक्ति हैं..सबने उनका गुणगान किया है..इतने अच्छे कि उन्होंने अपने पूर्ववर्ती संपादक अच्युतानंद मिश्र का आखिरी संपादकीय नहीं प्रकाशित किया था..तब अच्युतानंद जी को गुस्सा आया कि नहीं..तकलीफ हुई या नहीं..यह तो पता नहीं.. क्योंकि इसे उन्होंने जाहिर नहीं किया..लेकिन तब भानुप्रताप शुक्ल जी जिंदा थे और हिंदी के तमाम प्रमुख अखबारों में नियमित स्तंभ लिखते थे..उन्होंने अपने स्तंभ में वह आखिरी संपादकीय शामिल किया था...जिसे तब करीब 14-15 अखबारों ने प्रकाशित किया था..हां..कुछ पढ़ता-लिखता मैं भी हूं..लेकिन अब मुझे जनसत्ता का उस तरह बेसब्री से इंतजार नहीं रहता..जैसा दस-पंद्रह साल पहले रहता था..मुझे तो वही जनसत्ता पसंद है..जिसकी रिपोर्टिंग सबकी खबर लेती थी और सबको खबर देती थी...

गुरुवार, 16 जुलाई 2015

आह आकाशवाणी, वाह आकाशवाणी...

उमेश चतुर्वेदी
लिखने और फिर छपने के चस्का लगने के दिन थे.. उत्तर प्रदेश के आखिरी छोर पर स्थित बलिया में हिंदी साहित्य की पढ़ाई करते वक्त कलम ना सिर्फ चल पड़ी थी..बल्कि उसे राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में जगह भी मिलने लगी थी..तब के गांव आज की तुलना में कहीं ज्यादा गांव थे..ललित निबंधकार विवेकी राय के शब्दों को उधार लूं तो देसज गांव...जिसमें उसका भूगोल ही नहीं, अपनी सोच और संस्कृति भी समाहित होती थी...तब के गांवों में रोजाना देसी चूल्हे से उठता धुआं भी उन दिनों के गांवों को प्रदूषित नहीं कर पाया था...गांव आज की बनिस्बत कहीं ज्यादा लोकगीतों को अपने दिलों में संजोए बैठे थे..सावन की बदरिया के बीच धनरोपनी होती थी तो खेत-बधार में रोपनी के गीतों की झन्नाती मधुर आवाज गूंज उठती थी..धनरोपनी करते हाथों की चूड़ियों की खनक और गले की मधुर आवाज कब एकाकार हो जाती, कहना मुश्किल था..झींसी और बादलों के बीच लुका-छिपी करते सूरज की छाया में मकई के खेतों की सोहनी भी जैसे गूंजायमान हो जाती थी..शादी-विवाह के अनुष्ठान तो अपने पितरों को याद करने, उन्हें न्योतने और उनका आभार ज्ञापन करने के बिना पूरा ही नहीं होते थे..संझा-पराती के साथ खानदान की दो-चार बूढ़ी दादियां-परदादियां अपनी लरजती आवाज के साथ पितरों का सुबह-शाम आवाहन करतीं..संझा-पराती के गीतों में लय और मधुरता पर जोर देने की बजाय श्रद्धा पर कहीं ज्यादा ध्यान रहता था..रात को राम-जानकी मंदिर पर मुनिलाल कोंहार राम चरित मानस का कंठेसुर से पाठ करते तो गांव का पूरा सीवान जैसे तुलसी की भक्ति में डूब जाता...कभी-कभी सोरठी-बृजभार और सारंगा-सदावृक्ष के विरह-संघर्ष वाले कथागीत सीवान के किसी कोने से उभर आते और बिजलीविहीन गंवई रातों के सन्नाटे को अपने दर्द भरे सुर से चीर देते..लेकिन उस दर्द में भी एक अलग तरह का रोमांटिसिज्म होता..जिसका जिक्र करना आसान नहीं..बस उसे समझा जा सकता है..चैत राजा आते तो गेहूं, चना, अरहर की कटनी के साथ ही नए तरह के गीतों की लय फूटती और पछिया हवा के झोंकों के साथ खास तरह की तरन्नुम में खो जातीं..चैत-बैसाख और जेठ की रातों में महोबा के वीर भाईयों आल्हा-उदल की वीर रस वाली कहानियां उत्साहित लय में रात के किसी कोने से किसी पुरूष आवाज में गूंजती तो सीवान, खलिहान या अपने दुआरों पर खटिया पर लेवा बिछाकर सो रहे लोगों के कान उधर ही केंद्रित हो जाते...दुर्भाग्य.. अब वैसे गांव नहीं रहे...
दिन भर जिला मुख्यालय पर पढ़ाई और अपना कम, पड़ोसी बड़की माईयों या चाचियों के सौदे-सुलफ खरीदने, दवा जुटाने, किसी रिश्तेदार की मिजाज या मातमपुर्सी के बाद शाम को जब तक कोहबर की शर्त वाली चरबज्जी ट्रेन से गांव लौटते, तब तक मन-तन बुरी तरह थक चुका होता..फिर भी मन के कोने में कहीं न कहीं लिखने का उत्साह बचा रहता था..इन्हीं दिनों हाथ लगा लोक का एक गीत...सीता निष्कासन के संदर्भ का गीत..उस भोजपुरी गीत में अलग तरह का दर्द था..बेशक उस गीत में सीता के दर्द को ही सुर और अभिव्यक्ति मिली है..लेकिन सच कहें तो भोजपुरी इलाके की हर महिला के दर्द, उसकी पीड़ाओं को समाहित किए हुए है वह गीत...वैसे ही 1857 के बाद से लगातार शासकीय उपेक्षा की मार भोजपुरी इलाका झेल रहा है...दुर्भाग्यवश ही कहेंगे कि उसने लाल बहादुर शास्त्री, विश्वनाथ प्रताप सिंह और चंद्रशेखर जैसे तीन-तीन प्रधानमंत्री दिए..कहने को तो मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी भोजपुरी इलाके के ही प्रतिनिधि हैं..हालांकि उन्हें भोजपुरी मनई नहीं माना जा सकता..शासकीय पिछड़ेपन की मार झेलती गाय-गोबर की उपेक्षा भरे विशेषण वाली भोजपुरी पट्टी में महिलाओं के हिस्से दर्द कुछ ज्यादा ही है.. बहरहाल सीता निष्कासन के उस भोजपुरी गीत ने ऐसा बांध लिया कि लगा दर्द की लहरियों से हम भी गुजरने लगे हैं..तब तक कलम चलने लगी थी और मैंने एक समीक्षात्मक लेख लिख डाला..तब रेनॉल्ड की बॉल प्वाइंट पेन बाजार में आई ही थी..उससे सफेद फुलस्केप कागज पर उस वक्त की समझ के मुताबिक लेख लिख डाला और टिकट लगे और अपना पता लिखे लिफाफे के साथ कादंबिनी पत्रिका के दिल्ली दफ्तर भेज दिया..तब कादंबिनी पत्रिका के संपादक राजेंद्र अवस्थी होते थे..बेशक तब मेरा नाम छपने लगा था..लेकिन छपने की तुलना में लेखों की वापसी की फ्रीक्वेंसी कहीं ज्यादा थी..इसलिए उम्मीद नहीं थी कि कादंबिनी जैसी गंभीर पत्रिका में मुझ जैसे गंवईं गंध का लेख छप जाएगा..लेकिन एक महीने बीते नहीं कि वापसी का लिफाफा तो नहीं लौटा..अलबत्ता एक छपा हुआ कार्ड जरूर मिला...जिस पर लिखा था कि आपका लेख प्रकाशनार्थ स्वीकार कर लिया गया है..धुर देहाती, गंवई गंध के बीच जिंदगी गुजार रहे उस किशोर के लिए वह कार्ड जैसे सफलता की नई सीढ़ी ही था, जिसने अभी जवानी की दहलीज पर कदम रखा ही हो..लेख शायद जून 1992 के कादंबिनी के अंक में छपा..तब बलिया में कादंबिनी की करीब पांच सौ प्रतियां आती थीं..तब कादंबिनी में लेखक का पता भी उसके लेख के साथ छपता था..जाहिर है कि लेख के साथ अपना भी पता छपा..पता छपा नहीं कि प्रतिक्रियास्वरूप चिट्ठियों की आमद शुरू हो गई..देश के कई कोनों से खत कई हफ्तों तक आते रहे..लेख तो आज भी छपते हैं..अव्वल तो अब डाक से चिट्ठियां तो आती ही नहीं..लेकिन यह भी सच है कि प्रतिक्रिया स्वरूप ईमेल भी कम ही आते हैं.. लेख की प्रशंसा तो खैर उनमें थी

बुधवार, 15 जुलाई 2015

एस एन झा या भवेश नंदन झा के गजबे दुनिया

आर्द्रा मूवीज प्राइवेट लिमिटेड द्वारा दूरदर्शन बिहार के लिए देश-विदेश में रह रहे दर्शकों को ध्यान में रखते हुए एक धारावाहिक का निर्माण किया गया है, जिसका नाम है अमूल “एस.एन.झा के गजबे दुनिया”. मैथिली भाषा में प्रसारित होने वाले इस हास्य धारावहिक का प्रसारण 16 जुलाई से होने जा रहा है. इसे हर बृहस्पतिवार को शाम 6:00 बजे से प्रसारित किया जाएगा. इसके प्रस्तुतकर्ता हैं अमूल. “एस. एन. झा के गजबे दुनिया” एक महत्वाकांक्षी पत्रकार एस.एन.झा (सूर्य नारायण झा) के पत्रकारिता जीवन और आम जनता की विभिन्न समस्याओं को सुलझाने जैसे मुद्दे को लेकर बनाया गया है. अपने शुरूआती दिनों में पत्रकारिता करने वाले निर्माता-निर्देशक भवेश नन्दन यकीन के साथ कहते हैं कि ये धारावाहिक सभी वर्गों को पसंद आएगा.
भवेश नन्दन का धारावाहिक के विषय वस्तु के बारे में कहना है, “एक पत्रकार के लिए जहाँ बड़े-बड़े राजनेता, हस्ती एवं उद्योगपतियों के साथ उठना-बैठना सामान्य बात है, वहीं दूसरी और वह छोटी-छोटी घरेलू समस्याओं से परेशान भी रहता है. पत्रकार एस. एन. झा (सूर्यनारायण झा) की पत्नी (चन्द्रकला झा) पत्रकारिता को आम पेशा की तरह रोजी-रोटी का एक साधन मात्र मानती है. वहीं पत्रकार एस. एन. झा  इसे पेशा न मानकर इसे कर्तव्य मानते हैं. वह भले ही आम लोगों की समस्या को उजागर करने के लिए दिन रात की कड़ी मेहनत करते है, परन्तु अपनें घर की समस्याओं को नज़रअंदाज कर साप्ताहिक छुट्टी वाले दिन घर में आराम फरमाना चाहते हैं. किन्तु हर सप्ताह एक नये कड़ी में आगाज होता है एक समस्या का, जिसको सुलझाने में श्रीमान की छुट्टी खराब हो जाती है, इसको सुलझाने में सरल हास्य उत्पन्न होता है..यही इस सीरियल का मुख्य आधार है”
“ये धारावाहिक एक पत्रकार की कहानी है और हम सभी कहीं ना कहीं इस कहानी से अपने आप को जुड़ा हुआ महसूस करेंगे. जिंदगी की भाग-दौड़ में अगर हास्य व्यंग्य का समावेश ना रहे तो किसी भी सामान्य आदमी के लिए दैनिक कार्य करना मुस्किल हो जाता है, धारावाहिक एक आम इंसान के दैनिक जीवन में हास्य व्यंग्य के महत्ता को परिभाषित करता है.”
दर्शकों को भरपूर मनोरंजन देने के लिए इस धारावहिक की विशेषता है कि किसी ख़ास समस्या को केंद्र में रखकर संभवतः निदान भी उसी कड़ी में कर दिया जाता है, जिससे दर्शकों को अगली कड़ी में रखे जाने वाला एक नई समस्या को देखने के लिए बेसब्री से इंतज़ार होगा.धारावाहिक के निर्माता और निर्देशक हैं भवेश नन्दन झा, भवेश नन्दन नंदन झा इससे पहले कई एड फिल्म, डॉक्युमेंट्री फिल्म तथा लघु फिल्म का निर्देशन कर चुके हैं.  इस धारावाहिक में मुख्य भूमिका है अनिल मिश्र व रोशनी झा की.  इस धारावाहिक की स्क्रिप्ट लिखा है विकास झा ने..जबकि सिनेमेटोग्राफी खालिद अब्बास के जिम्मे है..सम्पादन एल. के. शशि कर रहे हैं. इसके सहायक निर्देशक हैं अमिताभ भूषण, ओमप्रकाश गुंजन, अविनाश प्रभाकर व अपर्णा झा, कार्यकारी निर्माता हैं प्रशांत कुमार व मुकेश चन्दन.

रविवार, 12 जुलाई 2015

बनावटीपन से ताजिंदगी दूर रहे यादवराव देशमुख


उमेश चतुर्वेदी
पांचजन्य के संपादक रहे, सहजता की अनन्य मूर्ति, खालिस सहज इन्सान और अपने चहेतों के बीच काकू के तौर पर मशहूर यादवराव देशमुख चार जून को वहां के लिए कूच कर गए, जहां से कोई लौटकर नहीं आता...दीनदयाल शोध संस्थान के प्रमुख रहे 87 साल के यादव राव देशमुख राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ऐसे कार्यकर्ता थे, जिन्हें अहंकार छू तक नहीं गया था...जिस वक्त उन्होंने महाप्रयाण किया, उस वक्त अशोक महान की बेटी संघमित्रा द्वारा बनवाए गए सांची के स्तूप की यात्रा पर था..लिहाजा बाबा की आखिरी यात्रा का मौन और मार्मिक गवाह नहीं बन पाया..लेकिन विदिशा से दिल्ली लौटने के क्रम में जैसे ही यह खबर मिली..स्मृतियों के हिंडोले में बाबा से जुड़ी कई सारी यादें एक-एक कर आने लगीं..उनके सुपुत्र भारतीय जनसंचार संस्थान की वीथियों में अपने सहपाठी रहे हैं..इसीलिए बाबा से परिचय भी हुआ और यादवराव देशमुख हमारे लिए भी बाबा यानी पिता ही हो गए..यशवंत की मां भी हमें बेटा ही मानती रहीं..कभी नाम नहीं लिया..बहरहाल यादों के हिंडोले से छनकर आयी एक याद साझा कर रहा हूं..जो खालिस पत्रकारीय अनुभव से परिपूर्ण है..

गुरुवार, 2 अप्रैल 2015

रिपोर्टर की नोटबुक

उमेश चतुर्वेदी
उपन्यास-रेड जोन
उपन्यासकार-विनोद कुमार
प्रकाशक- अनुज्ञा बुक्स, दिल्ली -110092
मूल्य -395 रूपए
(यह पुस्तक समीक्षा मशहूर पत्रकार रामबहादुर राय के संपादन में प्रकाशित होने वाली पत्रिका यथावत के 01-15 अप्रैल 2015 के अंक में प्रकाशित हो चुकी है।)
रिपोर्टर की नोटबुक अव्वल तो आंकड़ों, तथ्यों और उन्हें रचने और प्रभावित होने वाले लोगों के अनुभवों का संग्रह होती है। इतना ही नहीं, अपने समय सापेक्ष इतिहास से भी रिपोर्टर अपनी नोटबुक के जरिए ही साक्षात्कार करता रहता है। कई बार तथ्यों को दर्ज करते वक्त रिपोर्टर का एक मात्र मकसद अखबार-पत्रिका की भावी स्टोरी के लिए साक्ष्य के तौर पर उसमें तथ्यों को दर्ज कर रखनाभर होता है। लेकिन जाने-अनजाने में दर्ज किए जाते रिपोर्टर की नोटबुक के विवरण कई बार तात्कालिक इतिहास को रचने, किसी की जिंदगी के दर्द को जमाने की सहानुभूति हासिल कराने का माध्यम भी बन जाते हैं। पेशे से पत्रकार विनोद कुमार के उपन्यास रेड जोन को पढ़ते वक्त बार-बार ऐसा लगता है, मानो आप किसी रिपोर्टर की नोट बुक से गुजर रहे हों। जिसमें रिपोर्टर के कार्यक्षेत्र में स्थित कुछ अभावग्रस्त जिंदगियों का दर्द है..हालात की मारी इन जिंदगियों का शोषण करती सामाजिक व्यवस्था है। उस व्यवस्था से लोहा लेने और इन जिंदगियों को राहत दिलाने की स्वघोषित जिम्मेदारी निभाने का दावा करने वाली पत्रकारिता भी हमाम में नंगे की तरह नंगी नजर आती है। राजनीति तो वैसे ही बदनाम है, उससे तो अब उम्मीद भी अनिवार्य रस्म अदायगी ही रह गई है। रेडजोन को पढ़ते वक्त इस रस्मअदायगी के पीछे का घिनौना सच भी बार-बार सामने आता है।

मंगलवार, 31 मार्च 2015

पत्रों में साया सनातनी संस्कृति का तप

 मेश चतुर्वेदी
(यह समीक्षा पांचजन्य के 05 अप्रैल 2015 के अंक में संपादित करके प्रकाशित की जा चुकी है)
उदात्त भारतीय परंपराओं के बिना भारतीय संस्कृति की व्याख्या और समझ अधूरी है। सनातनी व्यवस्था अगर पांच हजार सालों से बनी और बची हुई है तो इसकी बड़ी वजह उसके अंदर सन्निहित उदात्त चेतना भी है। पश्चिम की विचारधारा पर आधारित लोकतंत्र के जरिए जब से नवजागरण और कथित आधुनिकता का जो दौर आया, उसने सबसे पहले सनातनी व्यवस्था को दकियानुसी ठहराने की की कोशिश शुरू की। सनातनी संस्कृति के पांच हजार साल के इतिहास के सामने अपेक्षाकृत बटुक उम्र वाली संस्कृतियां भी अगर हिंदू धर्म और संस्कृति पर सवाल उठाने का साहस कर पाईं तो उसके पीछे पश्चिम आधारित लोकतंत्र और आधुनिकता की अवधारणा बड़ी वजह रही। लेकिन इसी अवधारणा के दौर में एक शख्स अपनी पूरी सादगी और विनम्रता के साथ तनकर हिंदुत्व की रक्षा में खड़ा रहा। उसने अपनी दृढ़ प्रतिज्ञा और कठिन तप के सहारे आधुनिकता के बहाने हिंदुत्व पर हो रहे हमलों का ना सिर्फ मुकाबला करने की जमीन तैयार की, बल्कि देवनागरी पढ़ने वाले लोगों के जरिए दुनियाभर में हिंदुत्व, सनानती व्यवस्था, सनातनी ज्ञान और उदात्त संस्कृति को प्रस्तारित करने में बड़ी भूमिका निभाई।