शनिवार, 7 जुलाई 2012


पुस्तक समीक्षा
पेड न्यूज के खेल को तार-तार करता दस्तावेज
उमेश चतुर्वेदी
पत्रकारिता क्या है, उसका मकसद क्या है...क्या पक्षधर होना पत्रकारिता की जरूरत नहीं है..क्या इस पक्षधरता की कीमत वह भी सीधे-सीधे वसूली जानी जरूरी है...जब-जब पेड न्यूज की चर्चा होती है, इसे समस्या के तौर पर देखा और उसे पत्रकारिता के अब तक के निकष पर कसा जाना शुरू होता है, ये सारे सवाल उठ खड़े होते हैं। इन सवालों के जवाब में ही पत्रकारिता का असल दायित्व और मकसद छिपा हुआ है। लेकिन इन सवालों पर चर्चा से पहले कम से कम अब तक मीडिया के छात्रों को पढ़ाए जाते रहे पत्रकारिता के मकसद की चर्चा कर लेते हैं। पत्रकारिता के छात्रों को पढ़ाया जाता है कि उसका मकसद समाज को सूचनाएं देना, शिक्षा देना और मनोरंजन करना है। इन सबका मकसद सिर्फ सामाजिक मूल्यों को बचाए रखते हुए समाज का भला करना। यदि ऐसा नहीं होता तो

गुरुवार, 14 जून 2012



हिंदी प्रदेश में हिंदी का हाल
उमेश चतुर्वेदी

(यह लेख अमर उजाला में प्रकाशित हो चुका है।)
पिछली सदी के नब्बे के दशक में नई आर्थिकी की आगोश में देश जाने की तैयारी कर रहा था, तब कई सवाल उठे थे। इनमें निश्चित तौर पर आर्थिक मसलों से जुड़े सवाल ज्यादा थे। लेकिन लगे हाथों संस्कृति और भारतीय भाषाओं की भावी हालत को लेकर खासी चिंताएं जाहिर की गई थीं। इन चिंताओं का केंद्रीय बिंदु यह आशंका ही थी कि बाजार आधारित नई आर्थिकी ना सिर्फ संस्कृति के क्षेत्र में ही नकारात्मक दखल देगी, बल्कि देसी भाषाओं पर भी असर डालेगी। नई आर्थिकी के पैरोकारों ने इन चिंताओं को निर्मूल करार देने में देर नहीं लगाई। उनके तर्कों का आधार बनी बाजार की भाषा के तौर पर चिन्हित होती हिंदी और उसका बाजार आधारित विस्तार। लेकिन हिंदी भाषी राज्यों के हृदय प्रदेश उत्तर प्रदेश के दसवीं के नतीजों ने उस खतरे  को पहली बार सतह पर ला खड़ा किया है, जिसकी आशंका नब्बे के दशक मे भाषाशास्त्री उठा रहे थे।

शनिवार, 2 जून 2012


नैतिकता की राह के जरिए कामयाबी का पाठ
उमेश चतुर्वेदी
(यह समीक्षा कादंबिनी जून 2012 के अंक में प्रकाशित हुई है। )
हिंदी प्रकाशन का मतलब हाल के कुछ दिनों पहले तक सिर्फ साहित्य और उसमें भी कहानी-उपन्यास और कविता की पुस्तकों का प्रकाशन होता था। लेकिन अब हिंदी प्रकाशन की दुनिया बदल रही है। हिंदी का नया पाठक वर्ग विकसित भी हुआ है। उदारीकरण के बाद हिंदी पाठकों की भी दिलचस्पी नई आर्थिकी, नए दौर के व्यवसाय और नए जीवन मूल्यों की तरफ बढ़ी है। यही वजह है कि अब व्यवहार, व्यापार से लेकर नए मूल्यों और उन मूल्यों से सामंजस्य बढ़ाने की दिशा में सोच-विचार बढ़ाने वाली पुस्तकों की भी मांग बढ़ी है। 

बुधवार, 23 मई 2012


संसद में भोजपुरी की अलख
उमेश चतुर्वेदी 
गृहमंत्री पी चिदंबरम को हिंदी बोलते हुए भी कम ही देखा-सुना गया है। खालिस अंग्रेजी में सांसदों के सवालों का जवाब देने वाले पी चिदंबरम अगर भोजपुरी में यह कहने को मजबूर हो जाएं कि हम रउवा सभके भावना समझतानी तो यह न मानने का कारण नहीं रह जाता कि भोजपुरी को लेकर नजरिया बदलने लगा है। यहां गौर करने की बात यह है कि चिदंबरम उस तमिलनाडु से आते हैं, जहां 1967 में हिंदी विरोधी आंदोलन तेज हो गया था। 17 मई 2012 को लोकसभा में भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने को लेकर उठे विशेष ध्यानाकर्षण प्रस्ताव पर चर्चा के जवाब में चिदंबरम को यह आश्वासन देना पड़ा कि संसद के मानसून सत्र में इसे लेकर ठोक कदम उठाए जाएंगे।

सोमवार, 14 मई 2012


काटजू के खिलाफ हाईकोर्ट में अवमानना याचिका दायर
नेशनल आरटीआई फोरम की कन्वेनर डॉ नूतन ठाकुर ने प्रेस काउन्सिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू और सचिव विभा भार्गव के खिलाफ इलाहाबाद हाई कोर्ट के लखनऊ बेंच में एक अवमानना याचिका दायर की है। यह अवमानना याचिका पीआईएल संख्या 2685/2012 के सम्बन्ध में है। इस पीआईएल में नूतन ने 04 अप्रैल 2012 को सेना कूच से सम्बंधित दो समाचारों के सम्बन्ध में जांच करने हेतु प्रार्थना की थी। जस्टिस उमानाथ सिंह और जस्टिस वी के दीक्षित की बेंच ने 10 अप्रैल 2012 के अपने निर्णय में सचिव, सूचना और प्रसारण मंत्रालय एवं अन्य को आदेशित किया था कि वे सुनिश्चित करें कि सेना के मूवमेंट से सम्बंधित कोई भी खबर प्रिंट एवं इलेक्ट्रौनिक मीडिया में प्रकाशित ना हो।

शुक्रवार, 11 मई 2012


प्रभाषजी ने पूरी हिंदी पत्रकारिता को दिशा और भाषा दी
शंभूनाथ शुक्ल
वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल ने प्रभाष जी पर यह संस्मरण अपने फेसबुक वाल पर लिखा है। जिसे वहां से लेकर साभार प्रकाशित किया जा रहा है- मॉडरेटर


जनसत्ता के एक पुराने साथी और वरिष्ठ पत्रकार ने राजीव मित्तल ने जनसत्ता के फाउंउर और उस पत्र के प्रधान संपादक रहे दिवंगत प्रभाष जोशी के बारे में टिप्पणी की है कि माली ने ही बगिया उजाड़ डाली। शायद चीजों का सरलीकरण है। उत्साहीलाल लखनौआ पत्रकार कुछ ज्यादा ही नाजुक होते हैं न तो उनमें संघर्ष का माद्दा है न चीजों की सतह तक जाने का साहस। जब तक रामनाथ गोयनका जिंदा रहे एक भी ऐसा मौका नहीं मिलता जब जनसत्ता के प्रसार के लिए प्रभाष जी चिंतित न रहे हों। लेकिन आरएनजी की मृत्यु के बाद हालात बदल गए और जनसत्ता प्रबंधन की कुचालों का शिकार हो गया। यह सच है कि जनसत्ता को एक्सप्रेस प्रबंधन ने कभी पसंद नहीं किया लेकिन आरएनजी के रहते प्रभाष जी प्रबंधन की ऐसी कुचालों का जवाब देते रहे। लेकिन विवेक गोयनका, जो खुद हिंदी नहीं जानते थे उनका इस हिंदी अखबार से क्या लगाव हो सकता था। दिल्ली के एक्सप्रेस ग्रुप में मुख्य महाप्रबंधक के रूप में राजीव तिवारी की नियुक्ति और जनसत्ता के संपादकीय विभाग के कुछ अति वामपंथी तबकों ने मिलकर जनसत्ता को भीतर से पिचका दिया। राजीव मित्तल जनसत्ता में तब आए जब जनसत्ता का पराभव काल शुरू हो चुका था वरना जनसत्ता ने उस वक्त की राजनीति और पत्रकारिता को एक ऐसी दिशा और दशा प्रदान की थी जो न तो कभी टाइम्स ग्रुप अपने हिंदी अखबार नवभारत टाइम्स को दे पाया था न बिड़ला की धर्मशाला कहा जाने वाला हिंदुस्तान।

बुधवार, 9 मई 2012


इंटरनेट कानूनों का सख्ती से पालन हो - इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाई कोर्ट, लखनऊ बेंच ने 8 मई को आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर और उनकी पत्नी सामाजिक कार्यकर्ता नूतन ठाकुर द्वारा इलाहाबाद हाई कोर्ट, लखनऊ बेंच में दायर रिट याचिका संख्या 3489/2012 में आदेश देते हुए कहा है कि आज का युग इंटरनेट का युग है, अतः इंटरनेट सम्बंधित नियमों को पूरी सख्ती से पालन किया जाए. अमिताभ और नूतन ने अपना पक्ष कोर्ट में स्वयं रखा जबकि भारत सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता अशोक निगम ने रिट याचिका का इस आधार पर विरोध किया कियाचीगण ने याहू,गूगल आदि को प्रतिवादी नहीं बनाया है.