उमेश चतुर्वेदी
हिंदी प्रकाशन जगत पर आरोप रहा है कि यहां वैचारिक पुस्तकों की गुंजाइश नहीं है। वैसे हिंदी प्रकाशकों की प्रवृत्ति कहानी-उपन्यास और बहुत हुआ तो संस्मरण-जीवनी तक की पुस्तकें प्रकाशित करने की रही है। वैचारिकता और विमर्श के अलावा शोध और सूचना प्रधान रचनाओं के लिए हिंदी में गुंजाइश कम ही रही है। अगर हिंदी प्रकाशकों को लगा कि वैचारिक किताबें भी छाप देनी चाहिए तो वे पाठ्यक्रम से जुडी किताबों को प्रकाशित करने में आगे रहे हैं। लेकिन उच्चकोटि का प्रकाशन कम ही प्रकाशक सामने ला पाने में कामयाब हुए। इस सिलसिले में वाराणसी के हिंदी प्रचारक संस्थान, इलाहाबाद के लोकभारती प्रकाशन, दिल्ली के मोतीलाल बनारसी दास और राजपाल एंड संस का नाम लिया जा सकता है। हां, कहानी-कविता और उपन्यास आदि प्रकाशित करने के लिए मशहूर दिल्ली के कुछ प्रकाशक इन दिनों वैचारिक किताबों को प्रकाशित करने में दिलचस्पी ले रहे हैं। हिंदी में ऐसे प्रकाशनों को गति देने में पेंगुइन यात्रा बुक्स के योगदान को सराहा जाना जरूरी है। जिसने पिछले साल पाल एस फ्रीडमैन की किताब दुनिया गोल नहीं के साथ ही कई महत्वपूर्ण किताबें प्रकाशित की हैं और उन्हें पाठकों ने हाथोंहाथ लिया है। इस कड़ी में वाणी प्रकाशन, राजकमल प्रकाशन, राधाकृष्ण प्रकाशन, सामयिक प्रकाशन और ग्रंथशिल्पी का नाम काफी आदर के साथ लिया जा सकता है। लेकिन यह बात और है कि इनके प्रकाशनों की पूछ और परख वैसी नहीं बन पाई है, जैसी पेंगुइन के हिंदी यात्रा बुक की है। इसलिए उसकी किताबें इन दिनों पाठकों के बीच पूछ और परख बना रही हैं। दुनिया गोल नहीं हो या उभरते भारत की तस्वीर, नई सदी से जुड़े विचार, भारतीयता की ओर जैसे पेंगुइन प्रकाशकों ने हिंदी पाठकों की दुनिया में अपने प्रोडक्शन और सामग्री के चलते पैठ बनाई है। इस कड़ी में खालिस देसी हिंदी प्रकाशकों के प्रयास सराहनीय तो हैं, लेकिन कम से कम पेंगुइन जैसा प्रोफेशनलिज्म उनमें नजर नहीं आता। यही वजह है कि उनकी किताबें पेंगुइन यात्रा बुक की तुलना में कम ही बिक पाती हैं। वैसे यह जमाना टीआरपी यानी टैम रेटिंग प्वाइंट का है। टेलीविजन की लोकप्रियता के ग्राफ को नापने वाली इस प्रणाली में बिकने वाली चीजों का महत्व बढ़ा है। यहां बिक्री की वजह बनी है सनसनी और ऐसी ही चीजें। हिंदी के नामचीन प्रकाशकों को बिक्री के लिए अब सनसनीखेज मसाले ही पसंद आते हैं। यानी कोई पत्रकार इराक की यात्रा रिपोर्टिंग के सिलसिले में कर आया तो वह अनुभव हिंदी प्रकाशक को बिकाऊ लगता है। हिंदी प्रकाशक को विदर्भ की मिट्टी में कर्ज के बोझ तले जान गंवाते किसानों का दर्द कम ही सालता है। अगर उसे विदर्भ से कोई विषय पसंद आता है तो वह होता है विदर्भ की कलावती और शशिकला जैसा चरित्र, जिन्हें कभी राहुल गांधी का सहयोग और सहानुभूति मिली। कहने का मतलब यह है कि हिंदी प्रकाशकों को वैचारिक आधार वाले वही विषय पसंद आते हैं, जो पाप्युलर हों। लेकिन कम से कम पेंगुइन या हिंदी के ग्रंथ शिल्पी जैसे प्रकाशनों के साथ ऐसी स्थिति नहीं है। वे ऐसे गंभीर साहित्य भी प्रकाशित करते हैं, जिनका पाप्युलर कल्चर से कोई वास्ता नहीं है। फिर भी उन्हें वे बेच लेते हैं और यह सब होता है उनकी सामग्री की गुणवत्ता और बेहतरीन प्रोडक्ट के दम पर। हिंदी के बड़े से बड़े प्रकाशक के सामने इस स्थिति की चर्चा करें तो उसका एक ही जवाब होता है कि उसके पास पूंजी नहीं है। हालांकि उनकी कमाई बढ़ती जा रही है, अब वे हवाई यात्राएं करते हैं। लेकिन उनके दफ्तर भी चमक-दमक भरे होते जा रहे हैं। लेकिन उनका पुराना रूदन जारी है। एक दौर में मध्य प्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी, राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी, बिहार ग्रंथ अकादमी जैसे सरकारी प्रकाशनों ने गंभीर और साहित्येत्तर प्रकाशनों के जरिए हिंदी के बौद्धिक जगत को बदलने का प्रयास किया था। लेकिन अब वहां भी पहले जैसी हालत नहीं रही। राजनीतिक नियुक्तियों ने इन संस्थानों की गंभीर छवि और उसके प्रकाशनों की गुणवत्ता को खत्म कर दिया है। तो क्या यह मान लिया जाय कि हिंदी में गंभीर रचनाधर्मिता और प्रकशनों की दुनिया सिमट गई है। इसका जवाब हिंदी के अखबार हैं, जिनके दिल्ली और लखनऊ जैसे राजधानी केंद्रित संस्करणों में अब बौद्धिक किताबों की समीक्षाएं छापने का चलन बढ़ा है। जाहिर है कि वे हिंदी में लगातार बढ़ रहे बौद्धिक पाठकों की मानसिक खुराक देने की कोशिश में हैं। हिंदी के बौद्धिकता आधारित प्रकाशन जगत के लिए फिलहाल इससे ज्यादा सकारात्मक बात क्या होगी।
इस ब्लॉग पर कोशिश है कि मीडिया जगत की विचारोत्तेजक और नीतिगत चीजों को प्रेषित और पोस्ट किया जाए। मीडिया के अंतर्विरोधों पर आपके भी विचार आमंत्रित हैं।
शनिवार, 28 मई 2011
सोमवार, 23 मई 2011
हाशिए का साहित्य
उमेश चतुर्वेदी
हाशिए के साहित्य की जब भी चर्चा होती है, हमारे सामने उन रचनाओं का बिंब सामने आ जाता है, जिनकी गुटीय आलोचना के चलते चर्चा नहीं हो पाती या स्तरीय होने के बावजूद उनकी वाजिब नोटिस नहीं ली जाती। लेकिन यहां उस हाशिए की रचनाओं की दुर्दशा पर चर्चा का मकसद है, जो दिल्ली-पटना या लखनऊ-भोपाल से काफी दूर दूर-दराज के गांवों – कस्बों और ढाणियों में रचा जा रहा है। लेकिन दिल्ली-भोपाल, लखनऊ- पटना की समीक्षात्मक निगाहें इन रचनाकारों और उनकी रचनाधर्मिता पर नहीं पड़ रही है। साहित्य के गणतंत्र में हाशिए की इस रचनाधर्मिता की हैसियत कुछ वैसी ही हो गई है, जैसी भारतीय राजनीतिक गणतंत्र में राजधानी और शहरों के सामने गांवों-ढाणियों की हो गई है। राजधानी और राज्यों की राजधानियों में जिस तरह चमक-दमक भरी है और उनके सामने गांव-गिरांव और उनके लोग फीके हो गए हैं। उनकी आवाज की धमक सिर्फ चुनावों तक ही सुनाई पड़ती है, उनकी औकात सिर्फ चुनावी वक्त के दौरान ही बढ़ती है। लेकिन जैसे ही चुनाव बीत जाता है, हाशिए के लोगों की हैसियत पहले की ही तरह तीन कौड़ी की हो जाती है। लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि साहित्य में कोई राजनीतिक वरिष्ठताक्रम और सत्ता चुनने-गुनने की कोई परंपरा नहीं है, लिहाजा वहां चुनाव की जरूरत ही नहीं है, इस लिहाज से हाशिए के रचनाकार के लिए आम लोगों की तरह कभी चुनाव जैसा वक्त भी नहीं आता कि उनकी हैसियत कुछ पल के लिए ही बढ़ सके।
इस दर्द का जिक्र इसलिए कि अभी हाल ही में राजधानी दिल्ली से हजार-ग्यारह सौ किलोमीटर दूर की एक नितांत निजी यात्रा का संयोग बना। इस यात्रा के दौरान ऐसी रचनाधर्मिता से पाला पड़ा। लेकिन उन्हें कोई जानने की कोशिश करने वाला नहीं मिला। लेकिन उनका दुर्भाग्य देखिए कि उन्हें अपनी पहचान और हैसियत बढ़ाने के लिए वैसे ही दिल्ली की तरफ देखना पड़ रहा है, जैसे आम लोग दिल्ली-लखनऊ में बैठे राजनेताओं और सरकार के बड़े लोगों की रहमोकरम की बाट जोहते रहते हैं। लेकिन जैसे राजनेताओं के पास आम लोगों के लिए वक्त नहीं होता, कुछ ऐसा ही नखरा दिल्ली- लखनऊ के वे साहित्यकार दिखा रहे हैं, जो कथित साहित्य के केंद्र में हैं। अपनी रचनाधर्मिता को मान्यता दिलाने के लिए वे चिट्ठियों और पत्रियों के जरिए दिल्ली के साहित्यिक केंद्रों को बुलाने के लिए रिरियाते रहते हैं, अपने सीमित संसाधनों के बावजूद उनके रसरंजन का इंतजाम करने का भी वादा करते हैं, छोटे शहर के बेहतर होटल में ठहराने की तैयारी करते हैं। हालांकि आमतौर पर परोक्ष रूप से और एक-आध बार प्रत्यक्ष तौर पर ऐसी मांग केंद्र के आलोचकीय और साहित्यिक हस्तियों की तरफ से रखी जाती है, लेकिन फुर्सत होने के बावजूद उनके पास स्थानीय रचनाधर्मिता की पीठ थपथपाने का वक्त नहीं है। इसका दो तरह का असर हो रहा है। एक तो दिल्ली-लखनऊ केंद्रित रचनाधर्मिता के चलन के दौर में स्थानीय रचनाधर्मिता कुंठित हो रही है। उनके सामने चूंकि साहित्यिक गतिविधियों से आर्थिक फायदे का विकल्प भी नहीं है, लिहाजा ज्यादातर ऐसे आयोजन निजी खर्चों में कटौती के जरिए किए जाते हैं। लेकिन घर फूंक लगातार तमाशा देखना किसी के लिए आसान और लगातार करते रहने वाला काम नहीं है। लिहाजा कुंठाओं का असर बढ़ रहा है। यह तो हुई प्रत्यक्ष असर की बात। लेकिन इसका दूरगामी और अंत: असर कहीं ज्यादा गहरा है। हाशिए की यह रचनाधर्मिता दरअसल अनुभवों के आकाश का अनंत विस्तार अपने आप में समेटे हुए है। लेकिन हाशिए की रचनाधर्मिता को प्रोत्साहन नहीं मिलने के कारण अनुभवों के इस विस्तारित आकाश और उसके जरिए हिंदी समाज में हो रहे स्थानीय बदलावों को जानने-समझने की दुनिया सिकुड़ती जा रही है। लोगों को पता नहीं चल पा रहा है कि बापूधाम मोतीहारी के आम जन की सोच क्या है और बांसवाड़ा के किसान और मजदूर की जिंदगी में क्या घटित हो रहा है। हिंदी साहित्य के गणतांत्रिक स्वरूप में इस कमी का असर भी नजर आता है। जब कथित तौर पर दिल्ली-लखनऊ की ज्यादातर रचनाओं में अनुभवों का दुहराव, सामाजिक परिवर्तनों की फिर-फिर वही दुनिया नजर आती है। ऐसी रचनात्मक आस्वाद फीका ही रहता है। ऐसे में क्या हिंदी समाज का यह दायित्व नहीं बनता कि हिंदी के गणतांत्रिक विकास को गति देने और उसकी गणतांत्रिक हैसियत को मजबूत बनाने के लिए हाशिए पर पड़ी स्थानीय रचनाधर्मिता को मुख्यधारा में लाने और उन्हें मांजने की कोशिश करे। हिंदी में घटती पाठकीयता को जोड़ने में भी इसी गणतांत्रिक सोच से मदद मिल सकती है।
हाशिए के साहित्य की जब भी चर्चा होती है, हमारे सामने उन रचनाओं का बिंब सामने आ जाता है, जिनकी गुटीय आलोचना के चलते चर्चा नहीं हो पाती या स्तरीय होने के बावजूद उनकी वाजिब नोटिस नहीं ली जाती। लेकिन यहां उस हाशिए की रचनाओं की दुर्दशा पर चर्चा का मकसद है, जो दिल्ली-पटना या लखनऊ-भोपाल से काफी दूर दूर-दराज के गांवों – कस्बों और ढाणियों में रचा जा रहा है। लेकिन दिल्ली-भोपाल, लखनऊ- पटना की समीक्षात्मक निगाहें इन रचनाकारों और उनकी रचनाधर्मिता पर नहीं पड़ रही है। साहित्य के गणतंत्र में हाशिए की इस रचनाधर्मिता की हैसियत कुछ वैसी ही हो गई है, जैसी भारतीय राजनीतिक गणतंत्र में राजधानी और शहरों के सामने गांवों-ढाणियों की हो गई है। राजधानी और राज्यों की राजधानियों में जिस तरह चमक-दमक भरी है और उनके सामने गांव-गिरांव और उनके लोग फीके हो गए हैं। उनकी आवाज की धमक सिर्फ चुनावों तक ही सुनाई पड़ती है, उनकी औकात सिर्फ चुनावी वक्त के दौरान ही बढ़ती है। लेकिन जैसे ही चुनाव बीत जाता है, हाशिए के लोगों की हैसियत पहले की ही तरह तीन कौड़ी की हो जाती है। लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि साहित्य में कोई राजनीतिक वरिष्ठताक्रम और सत्ता चुनने-गुनने की कोई परंपरा नहीं है, लिहाजा वहां चुनाव की जरूरत ही नहीं है, इस लिहाज से हाशिए के रचनाकार के लिए आम लोगों की तरह कभी चुनाव जैसा वक्त भी नहीं आता कि उनकी हैसियत कुछ पल के लिए ही बढ़ सके।
इस दर्द का जिक्र इसलिए कि अभी हाल ही में राजधानी दिल्ली से हजार-ग्यारह सौ किलोमीटर दूर की एक नितांत निजी यात्रा का संयोग बना। इस यात्रा के दौरान ऐसी रचनाधर्मिता से पाला पड़ा। लेकिन उन्हें कोई जानने की कोशिश करने वाला नहीं मिला। लेकिन उनका दुर्भाग्य देखिए कि उन्हें अपनी पहचान और हैसियत बढ़ाने के लिए वैसे ही दिल्ली की तरफ देखना पड़ रहा है, जैसे आम लोग दिल्ली-लखनऊ में बैठे राजनेताओं और सरकार के बड़े लोगों की रहमोकरम की बाट जोहते रहते हैं। लेकिन जैसे राजनेताओं के पास आम लोगों के लिए वक्त नहीं होता, कुछ ऐसा ही नखरा दिल्ली- लखनऊ के वे साहित्यकार दिखा रहे हैं, जो कथित साहित्य के केंद्र में हैं। अपनी रचनाधर्मिता को मान्यता दिलाने के लिए वे चिट्ठियों और पत्रियों के जरिए दिल्ली के साहित्यिक केंद्रों को बुलाने के लिए रिरियाते रहते हैं, अपने सीमित संसाधनों के बावजूद उनके रसरंजन का इंतजाम करने का भी वादा करते हैं, छोटे शहर के बेहतर होटल में ठहराने की तैयारी करते हैं। हालांकि आमतौर पर परोक्ष रूप से और एक-आध बार प्रत्यक्ष तौर पर ऐसी मांग केंद्र के आलोचकीय और साहित्यिक हस्तियों की तरफ से रखी जाती है, लेकिन फुर्सत होने के बावजूद उनके पास स्थानीय रचनाधर्मिता की पीठ थपथपाने का वक्त नहीं है। इसका दो तरह का असर हो रहा है। एक तो दिल्ली-लखनऊ केंद्रित रचनाधर्मिता के चलन के दौर में स्थानीय रचनाधर्मिता कुंठित हो रही है। उनके सामने चूंकि साहित्यिक गतिविधियों से आर्थिक फायदे का विकल्प भी नहीं है, लिहाजा ज्यादातर ऐसे आयोजन निजी खर्चों में कटौती के जरिए किए जाते हैं। लेकिन घर फूंक लगातार तमाशा देखना किसी के लिए आसान और लगातार करते रहने वाला काम नहीं है। लिहाजा कुंठाओं का असर बढ़ रहा है। यह तो हुई प्रत्यक्ष असर की बात। लेकिन इसका दूरगामी और अंत: असर कहीं ज्यादा गहरा है। हाशिए की यह रचनाधर्मिता दरअसल अनुभवों के आकाश का अनंत विस्तार अपने आप में समेटे हुए है। लेकिन हाशिए की रचनाधर्मिता को प्रोत्साहन नहीं मिलने के कारण अनुभवों के इस विस्तारित आकाश और उसके जरिए हिंदी समाज में हो रहे स्थानीय बदलावों को जानने-समझने की दुनिया सिकुड़ती जा रही है। लोगों को पता नहीं चल पा रहा है कि बापूधाम मोतीहारी के आम जन की सोच क्या है और बांसवाड़ा के किसान और मजदूर की जिंदगी में क्या घटित हो रहा है। हिंदी साहित्य के गणतांत्रिक स्वरूप में इस कमी का असर भी नजर आता है। जब कथित तौर पर दिल्ली-लखनऊ की ज्यादातर रचनाओं में अनुभवों का दुहराव, सामाजिक परिवर्तनों की फिर-फिर वही दुनिया नजर आती है। ऐसी रचनात्मक आस्वाद फीका ही रहता है। ऐसे में क्या हिंदी समाज का यह दायित्व नहीं बनता कि हिंदी के गणतांत्रिक विकास को गति देने और उसकी गणतांत्रिक हैसियत को मजबूत बनाने के लिए हाशिए पर पड़ी स्थानीय रचनाधर्मिता को मुख्यधारा में लाने और उन्हें मांजने की कोशिश करे। हिंदी में घटती पाठकीयता को जोड़ने में भी इसी गणतांत्रिक सोच से मदद मिल सकती है।
रविवार, 15 मई 2011
मैं बपुरा बूड़न डरा, रहा किनारे बैठि
उमेश चतुर्वेदी
कबीर की ये पंक्तियां जिंदगी की जद्दोजहद में अध्यात्म से दूर रही आत्माओं की बेबसी को अभिव्यक्त करती हैं। लेकिन पांच सौ साल पहले की ये पंक्तियां आज के दौर में हिंदी क्षेत्र में सक्रिय बुद्धिजीवियों पर सटीक बैठती हैं। हिंदी के बुद्धिजीवी को जगति गति कम ही व्यापती है। भट्ठा-पारसौल गांव में चलती पुलिस की गोलियां हों या गोरखपुर में मजदूरों पर फैक्टरी मालिकों की शह पर हो रहा लाठी चार्ज, उन्हें प्रभावित नहीं करता। वे राजधानी या राज्यों की राजधानियों के वातानुकूलित कक्षों में साहित्यिक रसपान में व्यस्त रहते हैं। अगर उनसे इन समस्याओं की चर्चा कर भी लो तो उनका एक ही जवाब होगा, भई हम तो ठहरे साहित्यिक जीव, राजनीति और आंदोलन की दुनिया में हमारा क्या काम। हिंदी साहित्य से आंदोलनकारी धर्म का लोप होता जा रहा है। सिर्फ ड्राइंगरूमी सभ्यता और उसके साथ रसपान की अभिव्यक्तियों में डूब जाता है। हिंदी के समादृत कवि नागार्जुन की जन्मशताब्दी चल रही है। शताब्दी आयोजनों के सिलसिले चल रहे हैं। लेकिन उनके आंदोलनकारी रूप को कम ही याद किया जा रहा है। अगर बाबा आज होते तो वे भट्ठा पारसौल गांव में पुलिस की लाठियों के खिलाफ धरने पर बैठे होते, अन्ना के आंदोलन के मंच पर उनकी मौजूदगी होती। विचारधाराओं की बंदिशें उनके मानवीय और आंदोलनकारी सरोकारों को उनसे दूर नहीं रख पाती। अगर विचारधाराओं की बंदिशें में वे बंधे होते तो 1974 के जयप्रकाश आंदोलन में मंच पर नहीं जा पाते। क्योंकि वे कार्ड होल्डर कम्युनिस्ट थे और जयप्रकाश आंदोलन के साथ वामपंथी धड़ों का सहयोग नहीं था। इसके बावजूद जयप्रकाश आंदोलन में मंचों से गाते फिर रहे थे – आओ रानी ढोएं हम तुम्हारी पालकी, यही हुई है राय जवाहर लाल की। बाबा यहीं नहीं रूके। उस दौर की तानाशाह प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ खुलेआम कविता सुनाने से नहीं रूके – इंदु जी, इंदु जी, क्या हुआ आपको, सत्ता की मस्ती में भूल गईं बाप को। जिसकी कीमत उन्हें भी चुकानी पड़ी। आपातकाल में जेल यात्रा उन्हें करनी पड़ी। लेकिन आज हिंदी का साहित्यकार की जन आंदोलनों में ऐसी उपस्थिति नहीं दिखती। गजानन माधव मुक्तिबोध की एक मशहूर रचना है – पार्टनर आपकी पॉलिटिक्स क्या है? मुक्तिबोध की ये रचना दरअसल हिंदी क्षेत्र के बुद्धिजीवियों से खासतौर पर मौजूदा दौर में बार-बार पूछ रही है। हिंदी क्षेत्र के बौद्धिक लोगों की सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों में इस उदासीनता की चर्चा की वजह है पश्चिम बंगाल में आई बदलाव की आंधी। सिंगूर और नंदीग्राम के आंदोलन और वहां पुलिस दमन के बाद पश्चिम बंगाल के बौद्धिक वर्ग सड़कों पर उतर आया था। जिसमें सिनेमा की मशहूर हस्ती अपर्णा सेन भी थीं तो मशहूर कवि शंखो घोष, नवारूण भट्टाचार्य और महाश्वेता देवी जैसे कितने ही नाम पुलिस की लाठियों के खिलाफ मैदान में उतर पड़े थे। इन्हें अपने वातानुकूलित घर मैदान में उतरने से रोक नहीं पाए। जनता के बीच उनकी उपस्थिति ने बंगाल की हवा को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बुद्धिजीवियों का यह सहयोग बंगाल की राजनीति की बदलाव का भागीदार बना। क्या ऐसा दावा हिंदी क्षेत्र के बौद्धिक कर सकते हैं। जाहिर है, इसका जवाब ना में है।
जनांदोलनों-सामाजिक करवटों से दूर रहने का ही खामियाजा है कि हिंदी समाज अपने बौद्धिकों के प्रति वह लगाव और सम्मान नहीं दिखा पाता, जो बांग्ला, मलयालम या मराठी में दिखता है। वहां का बौद्धिक पूरे दमखम के साथ अपने लोगों के सामाजिक संघर्षों में साथ देता है। उनके साथ खड़ा रहता है तो बांग्ला या मराठी मानुष को भी लगता है कि उसका साहित्यकार सिर्फ कागज-कलम से ही रिश्ता नहीं रखता, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी की जद्दोजहद में भी उसके साथ है। लोगों से जुड़ने का यह तार ही वहां साहित्यिक गरिमा और विस्तार का माध्यम बनता है। जिससे राग और सम्मान दोनों हासिल होते हैं। दूसरी बात यह है कि राजनीति की सत्ताओं से मोह ना होने का दिखावा हिंदी के बौद्धिकों में खूब नजर आता है, इसी बहाने वे राजनीतिक आंदोलनों से समान दूरी बनाए रखने की कोशिशों में जुटे रहते हैं। लेकिन हकीकत तो यह है कि सत्ताओं की बदलती भूमिका में अपनी जगह पक्की रखने की जोड़जुगत में वे जुटे रहते हैं। इसीलिए सत्ताएं बदलने के बावजूद सत्ता तंत्र में ज्यादातर की भूमिकाएं नहीं बदलतीं।
क्या हिंदी बौद्धिक समाज अपनी इन सीमाओं पर चिंतन की तरफ बढ़ने की कोशिश करेगा ?
कबीर की ये पंक्तियां जिंदगी की जद्दोजहद में अध्यात्म से दूर रही आत्माओं की बेबसी को अभिव्यक्त करती हैं। लेकिन पांच सौ साल पहले की ये पंक्तियां आज के दौर में हिंदी क्षेत्र में सक्रिय बुद्धिजीवियों पर सटीक बैठती हैं। हिंदी के बुद्धिजीवी को जगति गति कम ही व्यापती है। भट्ठा-पारसौल गांव में चलती पुलिस की गोलियां हों या गोरखपुर में मजदूरों पर फैक्टरी मालिकों की शह पर हो रहा लाठी चार्ज, उन्हें प्रभावित नहीं करता। वे राजधानी या राज्यों की राजधानियों के वातानुकूलित कक्षों में साहित्यिक रसपान में व्यस्त रहते हैं। अगर उनसे इन समस्याओं की चर्चा कर भी लो तो उनका एक ही जवाब होगा, भई हम तो ठहरे साहित्यिक जीव, राजनीति और आंदोलन की दुनिया में हमारा क्या काम। हिंदी साहित्य से आंदोलनकारी धर्म का लोप होता जा रहा है। सिर्फ ड्राइंगरूमी सभ्यता और उसके साथ रसपान की अभिव्यक्तियों में डूब जाता है। हिंदी के समादृत कवि नागार्जुन की जन्मशताब्दी चल रही है। शताब्दी आयोजनों के सिलसिले चल रहे हैं। लेकिन उनके आंदोलनकारी रूप को कम ही याद किया जा रहा है। अगर बाबा आज होते तो वे भट्ठा पारसौल गांव में पुलिस की लाठियों के खिलाफ धरने पर बैठे होते, अन्ना के आंदोलन के मंच पर उनकी मौजूदगी होती। विचारधाराओं की बंदिशें उनके मानवीय और आंदोलनकारी सरोकारों को उनसे दूर नहीं रख पाती। अगर विचारधाराओं की बंदिशें में वे बंधे होते तो 1974 के जयप्रकाश आंदोलन में मंच पर नहीं जा पाते। क्योंकि वे कार्ड होल्डर कम्युनिस्ट थे और जयप्रकाश आंदोलन के साथ वामपंथी धड़ों का सहयोग नहीं था। इसके बावजूद जयप्रकाश आंदोलन में मंचों से गाते फिर रहे थे – आओ रानी ढोएं हम तुम्हारी पालकी, यही हुई है राय जवाहर लाल की। बाबा यहीं नहीं रूके। उस दौर की तानाशाह प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ खुलेआम कविता सुनाने से नहीं रूके – इंदु जी, इंदु जी, क्या हुआ आपको, सत्ता की मस्ती में भूल गईं बाप को। जिसकी कीमत उन्हें भी चुकानी पड़ी। आपातकाल में जेल यात्रा उन्हें करनी पड़ी। लेकिन आज हिंदी का साहित्यकार की जन आंदोलनों में ऐसी उपस्थिति नहीं दिखती। गजानन माधव मुक्तिबोध की एक मशहूर रचना है – पार्टनर आपकी पॉलिटिक्स क्या है? मुक्तिबोध की ये रचना दरअसल हिंदी क्षेत्र के बुद्धिजीवियों से खासतौर पर मौजूदा दौर में बार-बार पूछ रही है। हिंदी क्षेत्र के बौद्धिक लोगों की सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों में इस उदासीनता की चर्चा की वजह है पश्चिम बंगाल में आई बदलाव की आंधी। सिंगूर और नंदीग्राम के आंदोलन और वहां पुलिस दमन के बाद पश्चिम बंगाल के बौद्धिक वर्ग सड़कों पर उतर आया था। जिसमें सिनेमा की मशहूर हस्ती अपर्णा सेन भी थीं तो मशहूर कवि शंखो घोष, नवारूण भट्टाचार्य और महाश्वेता देवी जैसे कितने ही नाम पुलिस की लाठियों के खिलाफ मैदान में उतर पड़े थे। इन्हें अपने वातानुकूलित घर मैदान में उतरने से रोक नहीं पाए। जनता के बीच उनकी उपस्थिति ने बंगाल की हवा को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बुद्धिजीवियों का यह सहयोग बंगाल की राजनीति की बदलाव का भागीदार बना। क्या ऐसा दावा हिंदी क्षेत्र के बौद्धिक कर सकते हैं। जाहिर है, इसका जवाब ना में है।
जनांदोलनों-सामाजिक करवटों से दूर रहने का ही खामियाजा है कि हिंदी समाज अपने बौद्धिकों के प्रति वह लगाव और सम्मान नहीं दिखा पाता, जो बांग्ला, मलयालम या मराठी में दिखता है। वहां का बौद्धिक पूरे दमखम के साथ अपने लोगों के सामाजिक संघर्षों में साथ देता है। उनके साथ खड़ा रहता है तो बांग्ला या मराठी मानुष को भी लगता है कि उसका साहित्यकार सिर्फ कागज-कलम से ही रिश्ता नहीं रखता, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी की जद्दोजहद में भी उसके साथ है। लोगों से जुड़ने का यह तार ही वहां साहित्यिक गरिमा और विस्तार का माध्यम बनता है। जिससे राग और सम्मान दोनों हासिल होते हैं। दूसरी बात यह है कि राजनीति की सत्ताओं से मोह ना होने का दिखावा हिंदी के बौद्धिकों में खूब नजर आता है, इसी बहाने वे राजनीतिक आंदोलनों से समान दूरी बनाए रखने की कोशिशों में जुटे रहते हैं। लेकिन हकीकत तो यह है कि सत्ताओं की बदलती भूमिका में अपनी जगह पक्की रखने की जोड़जुगत में वे जुटे रहते हैं। इसीलिए सत्ताएं बदलने के बावजूद सत्ता तंत्र में ज्यादातर की भूमिकाएं नहीं बदलतीं।
क्या हिंदी बौद्धिक समाज अपनी इन सीमाओं पर चिंतन की तरफ बढ़ने की कोशिश करेगा ?
सोमवार, 9 मई 2011
हिंदी ब्लॉगिंग की चुनौतियां
उमेश चतुर्वेदी
वेब पर लॉगिंग यानी ब्लॉगिंग को लेकर 2010 में हिंदी में मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिली। एक तरफ जहां नए ब्लॉगरों ने हिंदी की दुनिया में दस्तक दी तो दूसरी तरफ पुराने लोगों की सक्रियता कम हुई। यहां गौर तलब यह है कि नए ब्लॉगरों में वे लोग शामिल हैं, जो अभी हाल के ही दिनों में इंटरनेट की साक्षरता हासिल किए हैं। एक अंदाज के मुताबिक इन दिनों हिंदी में बमुश्किल तीन हजार ब्लॉगर ही सक्रिय हैं। जबकि हिंदी ब्लॉगों की संख्या एक अनुमान के मुताबिक बारह हजार के आंकड़े को पार कर चुकी है। ऐसे में उम्मीद तो की जानी चाहिए थी कि इंटरनेटी साक्षरता की बढ़ती दर के साथ हिंदी में ब्लॉगिंग की दुनिया का विस्तार भी होगा। लेकिन 2010 की गतिविधियों से यह उम्मीद परवान चढ़ती नजर नहीं आई। यह हालत तब है, जब देश में इंटरनेट के उपभोक्ता आठ करोड़ की संख्या को पार कर चुके हैं। एक अमरीकी संस्था 'बोस्टन कंस्लटिंग ग्रुप' की पिछले साल आई रिपोर्ट 'इंटरनेट्स न्यू बिलियन' के मुताबिक भारत में इन दिनों 8.1 करोड़ इंटरनेट उपभोक्ता हैं। इनमें मोबाइल फोन धारकों की संख्या शामिल नहीं है। ट्राई की रिपोर्ट के मुताबिक दिसंबर 2010 तक देश में मोबाइल फोन धारकों की संख्या बढ़कर 77 करोड़ हो गई है। इनमें कितने लोग इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं. इसका सही-सही आंक़ड़ा मौजूद नहीं है। लेकिन इतना तो तय है कि इनमें से करीब आधे उपभोक्ता अपने मोबाइल फोन पर ही इंटरनेट का इस्तेमाल तो कर ही रहे हैं। बहरहाल बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप की रिपोर्ट पर ही ध्यान दें तो देश और हिंदी में ब्लॉगिंग की संभावना ज्यादा है। बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप की रिपोर्ट के मुताबिक 2015 तक भारत में इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या बढ़कर 23.7 करोड़ हो जाएगी। इस रिपोर्ट के अनुसार मौजूदा भारतीय इंटरनेट उपभोक्ता रोजाना आधे घंटे तक इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहा0 है। जिसके बढ़ने की संभावना बढ़ती जा रही है। इसी रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ 2015 तक ही भारत का आम उपभोक्ता रोजाना आधे घंटे की बजाय 42 मिनट इंटरनेट का इस्तेमाल करने लगेगा। तकनीक की दुनिया में क्रांति प्रतीक्षित है। तीसरी पीढ़ी के संचार माध्यमों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। ऐसे में तो ब्लॉगिंग की दुनिया बढ़नी चाहिए थी। ऐसे में ब्लॉगरों की सक्रियता कम होने का सवाल भी नहीं उठना चाहिए था। लेकिन ऐसा हो रहा है। भारतीय समाज- खासकर नौजवान पीढ़ी के लिए अमेरिकी तौर-तरीकों को अपनाना आसान रहा है। 2008 के अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में देश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक चुनौतियों की असल तसवीर न तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पेश कर रहा था, नही प्रिंट मीडिया। ऐसे माहौल में हकीकत से दुनिया को रूबरू कराने की जिम्मेदारी ब्लॉगरों ने संभाली। जिसका असर यह हुआ कि बराक हुसैन ओबामा से बेहतर उम्मीदवार होने के बावजूद जॉन मैकेनन चुनाव हार गए। क्योंकि उनके पूर्ववर्ती रिपब्लिकन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश की नीतियों की कलई ब्लॉगरों ने खोद कर रख दी थी। होना तो यह चाहिए था कि भारत में अमेरिका की तरह ब्लॉगर भी मैदान में उतरते ...लेकिन गिने-चुने प्रयासों के अलावा ऐसा कुछ खास नजर नहीं आया।
सच तो यह है कि जिन आर्थिक नीतियों के चलते भारत में तकनीकी क्रांति हुई, तकनीक के स्तर पर उसने ब्लॉगिंग के लिए तकनीकी मंच मुहैया कराकर जितनी सहायता की है, उतनी ही दुश्मन भी बन गई है। आर्थिक नीतियों के चलते भारत में निम्न मध्यवर्ग की जिंदगी दुश्वार हुई है। निम्न मध्यवर्ग एक दिन की भी बेगारी बर्दाश्त नहीं कर सकता। लेकिन हिंदी की ब्लॉगिंग की दुनिया में एक भी रूपए की कमाई होती नहीं दिख रही है। हिंदी ब्लॉगर को अपनी कमाई से ही अपना यह शौक पूरा करना पड़ रहा है। लेकिन यह भी सच है कि इंटरनेट मुफ्त नहीं है, कंप्यूटर या लैपटॉप मुफ्त में नहीं मिल रहे हैं। लेकिन ब्लॉगरों को मुफ्त में ब्लॉगिंग की दुनिया में सक्रिय रहना पड़ रहा है। सच तो यह है कि अब तक भारतीय भाषाओं में ब्लॉगिंग के जरिए कमाई के लिए कोई आर्थिक मॉडल नहीं बन पाया है। ले-देकर विज्ञापन के लिए गूगल एडसेंस का सहारा है। लेकिन उसके नियम कानून हिंदी ब्लॉगर विरोधी हैं। जिनकी वजह से गूगल की जेब तो भर रही है। लेकिन ब्लॉगर बेचारा ठन-ठन गोपाल बनकर घूम रहा है। अपने यहां कहावत कही जाती रही है कि भूखे भजन न होंहिं गोपाला। तो कब तक भूखे भजन होगा।
ब्लॉगिंग दरअसल वैयक्तिकता का विस्तार होता है। लेकिन इस विस्तार पर भी सांस्थानिकता की नजर टिक गई है। इसकी भी वजह है। दरअसल ब्लॉगरों की दुनिया की साफगोई ने उनके लिए पाठक वर्ग भी तैयार किया है। लेकिन इन पाठकों पर संस्थानिक मीडिया की भी नजर लगी हुई है। यही वजह है कि अपनी वेबसाइटों पर उन्होंने अपने यहां ब्लॉगरों के लिए एक कोना स्थापित कर दिया है। इस कोने पर ब्लॉगर आकर अपना खून-पसीना बहा रहे हैं। उन्हें पढ़ने पाठक भी आ रहे हैं। लेकिन इसका फायदा संस्थानिक पत्रकारिता को हो रहा है। संस्थानिक मीडिया के ब्लॉग कोनों में कुछ ऐसा ही लिखा मिलता है, जैसा सरकारी पत्रिकाओं में लिखा रहता है – पत्रिका में व्यक्त विचार लेखकों के अपने हैं, उनसे सहमत होना अमुक पत्रिका के संपादक के लिए जरूरी नहीं है। यानी पाठकों का फायदा तो संस्थानिक मीडिया उठा रहा है, लेकिन ब्लॉगर को कुछ हासिल नहीं हो रहा, सिवा चंद टिप्पणियों में प्रोत्साहन के। यानी हिंदी में ब्लॉगिंग की वैयक्तिक धारा पर संस्थानिकता का दावा बढ़ता जा रहा है। ब्लॉगिंग की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें वैयक्तिक विचारों को स्पेस मिलता है। लेकिन संस्थानिकता की खोल देर-सवेर ब्लॉगिंग की इस खासियत को ही खा जाएगी। जिसका संकट मौजूदा हिंदी ब्लॉगिंग के सामने सबसे ज्यादा दिख रहा है।
हिंदी में 2008 में जब ब्लॉगिंग तेज हुई तो आपस में सिर फुटौव्वल तक की हालत आई। मोहल्ला और भड़ास के बीच गालियों का आदान-प्रदान हुआ। इस तरह हिंदी में ब्लॉगिंग तार्किकता और संयम की गलियों से बाहर निकल कर मुक्त छंद की तरह बहने लगी। लेकिन एक दौर ऐसा आया कि यह मुक्त छंद पारंपरिक मीडिया को भारी लगने लगा और ब्लॉगरों पर हमला बढ़ गया। निश्चित तौर पर इसमें ब्लॉगरों का एक वर्ग भी जिम्मेदार था। जिसके लिए अपनी भड़ास निकालना ब्लॉगिंग की मुख्यधारा बन गया। खासकर मीडिया में सक्रिय लोगों ने अपनी कुंठाएं और भड़ास निकालने शुरू किए। बेहद अश्लील ढंग से लिखे गए इन ब्लॉगों ने हिंदी ब्लॉगिंग को काफी नुकसान पहुंचाया। मुक्त छंद का यह भी मतलब नहीं कि किसी को गाली दी जाय या किसी को सीधे जिम्मेदार ठहराया जाय।
दूसरी चीज यह है कि हिंदी में ज्यादातर ब्लॉगर अपनी वैचारिक भूख और कसक को अभिव्यक्त करने आए तो हैं, लेकिन ज्यादातर का भाषाई संस्कार बेहद कमजोर है। इसने ब्लॉगिंग के स्वाद को बेहद कड़वा बनाया है। ब्लॉगर यह क्यों भूल जाते हैं कि सिर्फ तथ्यों का खुलासा ही ब्लॉगिंग की सफलता के लिए जरूरी नहीं है। बल्कि भाषाई चमत्कार भी उतना ही आवश्यक है। भाषाई चमत्कार भी कई बार रचनाधर्मिता को पढ़ने के लिए मजबूर करते हैं। कभी-कभी किसी पोस्ट को ज्यादा पाठकीयता हासिल हो पाती है तो इसकी एक बड़ी वजह यह है कि भाषाई कौशल के जरिए विगत में छूट गए दर्द को याद करना रही है। यहां हमें ध्यान रखना चाहिए कि हिंदी ब्लॉगरों का एक बड़ा पाठक वर्ग अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया या ऐसी ही जगहों पर खाई-अघाई जिंदगी जी रहे हैं। लेकिन उनके अंदर एक कसक बाकी है, वे अपनी माटी और विगत में छूट गए दर्दों को सहलाते हुए जीना चाहते हैं। मजे की बात यह है कि आज के हिंदी ब्लॉगर के सामने इन पाठकों की भूख को भी तृप्त करने की चुनौती भी है। ऐसा नहीं कि इन चुनौतियों की जानकारी आज के ब्लॉगर को नहीं है। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि इनका सामना करने के लिए ब्लॉगर समुदाय में कोई तैयारी नहीं दिख रही।
वेब पर लॉगिंग यानी ब्लॉगिंग को लेकर 2010 में हिंदी में मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिली। एक तरफ जहां नए ब्लॉगरों ने हिंदी की दुनिया में दस्तक दी तो दूसरी तरफ पुराने लोगों की सक्रियता कम हुई। यहां गौर तलब यह है कि नए ब्लॉगरों में वे लोग शामिल हैं, जो अभी हाल के ही दिनों में इंटरनेट की साक्षरता हासिल किए हैं। एक अंदाज के मुताबिक इन दिनों हिंदी में बमुश्किल तीन हजार ब्लॉगर ही सक्रिय हैं। जबकि हिंदी ब्लॉगों की संख्या एक अनुमान के मुताबिक बारह हजार के आंकड़े को पार कर चुकी है। ऐसे में उम्मीद तो की जानी चाहिए थी कि इंटरनेटी साक्षरता की बढ़ती दर के साथ हिंदी में ब्लॉगिंग की दुनिया का विस्तार भी होगा। लेकिन 2010 की गतिविधियों से यह उम्मीद परवान चढ़ती नजर नहीं आई। यह हालत तब है, जब देश में इंटरनेट के उपभोक्ता आठ करोड़ की संख्या को पार कर चुके हैं। एक अमरीकी संस्था 'बोस्टन कंस्लटिंग ग्रुप' की पिछले साल आई रिपोर्ट 'इंटरनेट्स न्यू बिलियन' के मुताबिक भारत में इन दिनों 8.1 करोड़ इंटरनेट उपभोक्ता हैं। इनमें मोबाइल फोन धारकों की संख्या शामिल नहीं है। ट्राई की रिपोर्ट के मुताबिक दिसंबर 2010 तक देश में मोबाइल फोन धारकों की संख्या बढ़कर 77 करोड़ हो गई है। इनमें कितने लोग इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं. इसका सही-सही आंक़ड़ा मौजूद नहीं है। लेकिन इतना तो तय है कि इनमें से करीब आधे उपभोक्ता अपने मोबाइल फोन पर ही इंटरनेट का इस्तेमाल तो कर ही रहे हैं। बहरहाल बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप की रिपोर्ट पर ही ध्यान दें तो देश और हिंदी में ब्लॉगिंग की संभावना ज्यादा है। बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप की रिपोर्ट के मुताबिक 2015 तक भारत में इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या बढ़कर 23.7 करोड़ हो जाएगी। इस रिपोर्ट के अनुसार मौजूदा भारतीय इंटरनेट उपभोक्ता रोजाना आधे घंटे तक इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहा0 है। जिसके बढ़ने की संभावना बढ़ती जा रही है। इसी रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ 2015 तक ही भारत का आम उपभोक्ता रोजाना आधे घंटे की बजाय 42 मिनट इंटरनेट का इस्तेमाल करने लगेगा। तकनीक की दुनिया में क्रांति प्रतीक्षित है। तीसरी पीढ़ी के संचार माध्यमों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। ऐसे में तो ब्लॉगिंग की दुनिया बढ़नी चाहिए थी। ऐसे में ब्लॉगरों की सक्रियता कम होने का सवाल भी नहीं उठना चाहिए था। लेकिन ऐसा हो रहा है। भारतीय समाज- खासकर नौजवान पीढ़ी के लिए अमेरिकी तौर-तरीकों को अपनाना आसान रहा है। 2008 के अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में देश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक चुनौतियों की असल तसवीर न तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पेश कर रहा था, नही प्रिंट मीडिया। ऐसे माहौल में हकीकत से दुनिया को रूबरू कराने की जिम्मेदारी ब्लॉगरों ने संभाली। जिसका असर यह हुआ कि बराक हुसैन ओबामा से बेहतर उम्मीदवार होने के बावजूद जॉन मैकेनन चुनाव हार गए। क्योंकि उनके पूर्ववर्ती रिपब्लिकन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश की नीतियों की कलई ब्लॉगरों ने खोद कर रख दी थी। होना तो यह चाहिए था कि भारत में अमेरिका की तरह ब्लॉगर भी मैदान में उतरते ...लेकिन गिने-चुने प्रयासों के अलावा ऐसा कुछ खास नजर नहीं आया।
सच तो यह है कि जिन आर्थिक नीतियों के चलते भारत में तकनीकी क्रांति हुई, तकनीक के स्तर पर उसने ब्लॉगिंग के लिए तकनीकी मंच मुहैया कराकर जितनी सहायता की है, उतनी ही दुश्मन भी बन गई है। आर्थिक नीतियों के चलते भारत में निम्न मध्यवर्ग की जिंदगी दुश्वार हुई है। निम्न मध्यवर्ग एक दिन की भी बेगारी बर्दाश्त नहीं कर सकता। लेकिन हिंदी की ब्लॉगिंग की दुनिया में एक भी रूपए की कमाई होती नहीं दिख रही है। हिंदी ब्लॉगर को अपनी कमाई से ही अपना यह शौक पूरा करना पड़ रहा है। लेकिन यह भी सच है कि इंटरनेट मुफ्त नहीं है, कंप्यूटर या लैपटॉप मुफ्त में नहीं मिल रहे हैं। लेकिन ब्लॉगरों को मुफ्त में ब्लॉगिंग की दुनिया में सक्रिय रहना पड़ रहा है। सच तो यह है कि अब तक भारतीय भाषाओं में ब्लॉगिंग के जरिए कमाई के लिए कोई आर्थिक मॉडल नहीं बन पाया है। ले-देकर विज्ञापन के लिए गूगल एडसेंस का सहारा है। लेकिन उसके नियम कानून हिंदी ब्लॉगर विरोधी हैं। जिनकी वजह से गूगल की जेब तो भर रही है। लेकिन ब्लॉगर बेचारा ठन-ठन गोपाल बनकर घूम रहा है। अपने यहां कहावत कही जाती रही है कि भूखे भजन न होंहिं गोपाला। तो कब तक भूखे भजन होगा।
ब्लॉगिंग दरअसल वैयक्तिकता का विस्तार होता है। लेकिन इस विस्तार पर भी सांस्थानिकता की नजर टिक गई है। इसकी भी वजह है। दरअसल ब्लॉगरों की दुनिया की साफगोई ने उनके लिए पाठक वर्ग भी तैयार किया है। लेकिन इन पाठकों पर संस्थानिक मीडिया की भी नजर लगी हुई है। यही वजह है कि अपनी वेबसाइटों पर उन्होंने अपने यहां ब्लॉगरों के लिए एक कोना स्थापित कर दिया है। इस कोने पर ब्लॉगर आकर अपना खून-पसीना बहा रहे हैं। उन्हें पढ़ने पाठक भी आ रहे हैं। लेकिन इसका फायदा संस्थानिक पत्रकारिता को हो रहा है। संस्थानिक मीडिया के ब्लॉग कोनों में कुछ ऐसा ही लिखा मिलता है, जैसा सरकारी पत्रिकाओं में लिखा रहता है – पत्रिका में व्यक्त विचार लेखकों के अपने हैं, उनसे सहमत होना अमुक पत्रिका के संपादक के लिए जरूरी नहीं है। यानी पाठकों का फायदा तो संस्थानिक मीडिया उठा रहा है, लेकिन ब्लॉगर को कुछ हासिल नहीं हो रहा, सिवा चंद टिप्पणियों में प्रोत्साहन के। यानी हिंदी में ब्लॉगिंग की वैयक्तिक धारा पर संस्थानिकता का दावा बढ़ता जा रहा है। ब्लॉगिंग की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें वैयक्तिक विचारों को स्पेस मिलता है। लेकिन संस्थानिकता की खोल देर-सवेर ब्लॉगिंग की इस खासियत को ही खा जाएगी। जिसका संकट मौजूदा हिंदी ब्लॉगिंग के सामने सबसे ज्यादा दिख रहा है।
हिंदी में 2008 में जब ब्लॉगिंग तेज हुई तो आपस में सिर फुटौव्वल तक की हालत आई। मोहल्ला और भड़ास के बीच गालियों का आदान-प्रदान हुआ। इस तरह हिंदी में ब्लॉगिंग तार्किकता और संयम की गलियों से बाहर निकल कर मुक्त छंद की तरह बहने लगी। लेकिन एक दौर ऐसा आया कि यह मुक्त छंद पारंपरिक मीडिया को भारी लगने लगा और ब्लॉगरों पर हमला बढ़ गया। निश्चित तौर पर इसमें ब्लॉगरों का एक वर्ग भी जिम्मेदार था। जिसके लिए अपनी भड़ास निकालना ब्लॉगिंग की मुख्यधारा बन गया। खासकर मीडिया में सक्रिय लोगों ने अपनी कुंठाएं और भड़ास निकालने शुरू किए। बेहद अश्लील ढंग से लिखे गए इन ब्लॉगों ने हिंदी ब्लॉगिंग को काफी नुकसान पहुंचाया। मुक्त छंद का यह भी मतलब नहीं कि किसी को गाली दी जाय या किसी को सीधे जिम्मेदार ठहराया जाय।
दूसरी चीज यह है कि हिंदी में ज्यादातर ब्लॉगर अपनी वैचारिक भूख और कसक को अभिव्यक्त करने आए तो हैं, लेकिन ज्यादातर का भाषाई संस्कार बेहद कमजोर है। इसने ब्लॉगिंग के स्वाद को बेहद कड़वा बनाया है। ब्लॉगर यह क्यों भूल जाते हैं कि सिर्फ तथ्यों का खुलासा ही ब्लॉगिंग की सफलता के लिए जरूरी नहीं है। बल्कि भाषाई चमत्कार भी उतना ही आवश्यक है। भाषाई चमत्कार भी कई बार रचनाधर्मिता को पढ़ने के लिए मजबूर करते हैं। कभी-कभी किसी पोस्ट को ज्यादा पाठकीयता हासिल हो पाती है तो इसकी एक बड़ी वजह यह है कि भाषाई कौशल के जरिए विगत में छूट गए दर्द को याद करना रही है। यहां हमें ध्यान रखना चाहिए कि हिंदी ब्लॉगरों का एक बड़ा पाठक वर्ग अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया या ऐसी ही जगहों पर खाई-अघाई जिंदगी जी रहे हैं। लेकिन उनके अंदर एक कसक बाकी है, वे अपनी माटी और विगत में छूट गए दर्दों को सहलाते हुए जीना चाहते हैं। मजे की बात यह है कि आज के हिंदी ब्लॉगर के सामने इन पाठकों की भूख को भी तृप्त करने की चुनौती भी है। ऐसा नहीं कि इन चुनौतियों की जानकारी आज के ब्लॉगर को नहीं है। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि इनका सामना करने के लिए ब्लॉगर समुदाय में कोई तैयारी नहीं दिख रही।
रविवार, 1 मई 2011
ऐसे ही चलती रहेगी हिंदी !
उमेश चतुर्वेदी
क्या सचमुच हिंदी के ढेर सारे शब्दों को लोग अब नहीं समझते...क्या पत्रिका की जगह सिर्फ मैगजीन ही लोग समझते हैं, क्या कुतिया जैसा शब्द सिर्फ गाली ही है, कुत्ते का स्त्रीलिंग नहीं, क्या कंपीटिशन ही लोग जानते हैं, प्रतियोगी परीक्षा को लोगों के दिमागी शब्दकोश से निकल गया है, न्यूज को अब बिहार से लेकर उत्तर प्रदेश वाया दिल्ली मध्य प्रदेश का पाठक जानता है, उसके लिए समाचार का कोई मतलब नहीं है। स्वीकार या स्वीकृति लोगों के जुबानी चलन से बाहर हो गया है, सिर्फ वेलकम या इस्तेमाल ही अब हिंदी जुबान को मंजूर है...लीडर ही अब दुनिया को समझता है, नेता और अगुआ की कोई वकत नहीं रही, मध्यस्थ को कोई पूछता नहीं, सिर्फ मीडियेटर ही अब आगे रह गया है.....पत्रकारिता की दुनिया में लगातार ऐसे सवालों से जूझते और दो-चार होना जैसे हम जैसे लोगों की नियति बन गई है। इन सवालों के बहुसंख्यक जवाब निश्चित तौर पर निराशा के बोधक हैं। शब्दों की दुनिया के अधिकारियों की नजर में इन और इन जैसे सवालों के जवाब निश्चित तौर पर हां हैं। लेकिन मेरा मन है कि मानने को तैयार ही नहीं है। क्योंकि व्यवहारिक दुनिया से जुड़े इन सवालों का जवाब तभी सटीक हो सकता है, जब उनके लिए व्यवहारिक दुनिया पर आधारित मानदंड भी तय किए गए हों। लेकिन हकीकत तो यह है कि इन जवाबों को सिर्फ सुनी-सुनाई बातों के आधार पर ही स्वीकृत कर लिया गया है। सूचना और संचार क्रांति के इस दौर में ऐसे आधारों ने अपनी भाषा का कितना अवमूल्यन किया है, इसका अंदाजा अब लगना शुरू हो गया है। दूसरी और तीसरी श्रेणी तक के नगरों-शहरों से पढ़कर निकल रही पीढ़ी की हिंदी का भाषाई ज्ञान निश्चित तौर पर निराश करने वाला है। अधिकांश छात्रों की एक ही समस्या है, व्याकरण और भाषाई अनुशासन के नजरिए से एक पैराग्राफ भी अच्छी हिंदी नहीं लिख पाना। अगर किसी से आपने अच्छी हिंदी की उम्मीद पाल ली तो वह मक्षिका स्थाने मक्षिका वाली दुरूह और कठिन हिंदी लिखने लगे। सहज होने को कहिए तो उसके लिए उपयोग शब्द बदलकर सहज होते हुए इस्तेमाल बन कर रह जाएगा, प्रतीक्षा सिर्फ इंतजार बन कर रह जाएगी, विश्वास सिर्फ भरोसा बन जाएगा और ऐसे में विश्वासपात्र का भरोसामंद बन जाना ही है। कहने का मतलब यह है कि सहजता के बारे में मान लिया गया है कि सिर्फ भाषा की उर्दूकरण ही सहज भाषा होने की निशानी है। इस चलन को टेलीविजन मीडिया ने सबसे ज्यादा बढ़ावा दिया है। जब से हिंदी में खबरिया चैनलों की शुरूआत में दो तरह के प्रयोग शुरू हुए, हिंदी के साथ चलन के नाम पर अंग्रेजी के तमाम ऐसे शब्दों का भी प्रयोग, जिनके लिए सहज और आसान हिंदी के शब्द चलन में हैं और दूसरी धारा उर्दू मिश्रित हिंदी की थी। उर्दू मिश्रित हिंदी की परंपरा अपने यहां पारसी थियेटर में भी रही है। याद कीजिए पाकीजा, मुगल ए आजम और रजिया सुल्तान के संवाद, वहां भारी-भरकम उर्दू शब्दावली का जमकर प्रयोग हुआ था। कहना न होगा कि चाक्षुष माध्यम होने के चलते खबरिया टेलीविजन चैनलों को भी अपने लिए भाषा गढ़ते वक्त पारसी थियेटर की वही शैली पसंद आई। लेकिन इन चैनलों की भाषा नीति तैयार करने वाले लोग भूल गए कि यह माध्यम भविष्य में पूरी तरह बाजार के हवाले होने वाला है। क्योंकि बाजारवाद की शुरूआत के साथ ही सूचना क्रांति के ये औजार भारत में भी विकसित होना शुरू हुए थे। लिहाजा एक दिन ऐसा आएगा कि बाजार भाषाओं की समृद्ध संस्कृति को अपने कब्जे में ले लेगा और फिर हम बेचारा की तरह भाषाई समृद्धि और परंपरा को तहस-नहस होते देखने के लिए मजबूर हो जाएंगे। मजे की बात यह है कि इस परिपाटी को शुरू करने वाले लोग अपने पेशेवर संवादों के अलावा जब भी मंचासीन होते हैं तो भाषा की दुर्गति पर विलाप करने से नहीं चूकते।
अब बाजार भाषाओं को बदल रहा है। सहज होने के नाम पर वह हिंदी को अत्यधिक उर्दू अनुरागी बना रहा है या फिर हिंग्रेजी की संस्कृति में ढाल रहा है। मजे की बात यह है कि सब कुछ गांधी जी की उस कल्पना के नाम पर हो रहा है, जिसके तहत उन्होंने गंग-जमुनी संस्कृति और भाषा के स्तर पर जिस हिंदोस्तानी की कल्पना की थी, ये सारा बदलाव उसी नाम पर हो रहा है। दिलचस्प बात यह है कि इस रोग से सबसे ज्यादा हमारा मीडिया ही ग्रस्त है। 1991 के आसपास जब इस चलन की शुरूआत हुई तो भाषा के जानकारों और संस्कृति के अध्येताओं को आशंका थी कि भावी पीढ़ियों की जुबानी घुट्टी से अपनी मां जैसी भाषाएं दूर होती जाएंगी। कहना न होगा कि अब ऐसा ही होता दिख रहा है। ऐसे में सवाल यह है कि इस बदहाल परंपरा पर रोक कैसे लगेगी। या फिर इसमें सकारात्मक बदलाव के लिए इंतजार किया जाता रहा है। सोचना तो हम हिंदी वालों को ही है।
क्या सचमुच हिंदी के ढेर सारे शब्दों को लोग अब नहीं समझते...क्या पत्रिका की जगह सिर्फ मैगजीन ही लोग समझते हैं, क्या कुतिया जैसा शब्द सिर्फ गाली ही है, कुत्ते का स्त्रीलिंग नहीं, क्या कंपीटिशन ही लोग जानते हैं, प्रतियोगी परीक्षा को लोगों के दिमागी शब्दकोश से निकल गया है, न्यूज को अब बिहार से लेकर उत्तर प्रदेश वाया दिल्ली मध्य प्रदेश का पाठक जानता है, उसके लिए समाचार का कोई मतलब नहीं है। स्वीकार या स्वीकृति लोगों के जुबानी चलन से बाहर हो गया है, सिर्फ वेलकम या इस्तेमाल ही अब हिंदी जुबान को मंजूर है...लीडर ही अब दुनिया को समझता है, नेता और अगुआ की कोई वकत नहीं रही, मध्यस्थ को कोई पूछता नहीं, सिर्फ मीडियेटर ही अब आगे रह गया है.....पत्रकारिता की दुनिया में लगातार ऐसे सवालों से जूझते और दो-चार होना जैसे हम जैसे लोगों की नियति बन गई है। इन सवालों के बहुसंख्यक जवाब निश्चित तौर पर निराशा के बोधक हैं। शब्दों की दुनिया के अधिकारियों की नजर में इन और इन जैसे सवालों के जवाब निश्चित तौर पर हां हैं। लेकिन मेरा मन है कि मानने को तैयार ही नहीं है। क्योंकि व्यवहारिक दुनिया से जुड़े इन सवालों का जवाब तभी सटीक हो सकता है, जब उनके लिए व्यवहारिक दुनिया पर आधारित मानदंड भी तय किए गए हों। लेकिन हकीकत तो यह है कि इन जवाबों को सिर्फ सुनी-सुनाई बातों के आधार पर ही स्वीकृत कर लिया गया है। सूचना और संचार क्रांति के इस दौर में ऐसे आधारों ने अपनी भाषा का कितना अवमूल्यन किया है, इसका अंदाजा अब लगना शुरू हो गया है। दूसरी और तीसरी श्रेणी तक के नगरों-शहरों से पढ़कर निकल रही पीढ़ी की हिंदी का भाषाई ज्ञान निश्चित तौर पर निराश करने वाला है। अधिकांश छात्रों की एक ही समस्या है, व्याकरण और भाषाई अनुशासन के नजरिए से एक पैराग्राफ भी अच्छी हिंदी नहीं लिख पाना। अगर किसी से आपने अच्छी हिंदी की उम्मीद पाल ली तो वह मक्षिका स्थाने मक्षिका वाली दुरूह और कठिन हिंदी लिखने लगे। सहज होने को कहिए तो उसके लिए उपयोग शब्द बदलकर सहज होते हुए इस्तेमाल बन कर रह जाएगा, प्रतीक्षा सिर्फ इंतजार बन कर रह जाएगी, विश्वास सिर्फ भरोसा बन जाएगा और ऐसे में विश्वासपात्र का भरोसामंद बन जाना ही है। कहने का मतलब यह है कि सहजता के बारे में मान लिया गया है कि सिर्फ भाषा की उर्दूकरण ही सहज भाषा होने की निशानी है। इस चलन को टेलीविजन मीडिया ने सबसे ज्यादा बढ़ावा दिया है। जब से हिंदी में खबरिया चैनलों की शुरूआत में दो तरह के प्रयोग शुरू हुए, हिंदी के साथ चलन के नाम पर अंग्रेजी के तमाम ऐसे शब्दों का भी प्रयोग, जिनके लिए सहज और आसान हिंदी के शब्द चलन में हैं और दूसरी धारा उर्दू मिश्रित हिंदी की थी। उर्दू मिश्रित हिंदी की परंपरा अपने यहां पारसी थियेटर में भी रही है। याद कीजिए पाकीजा, मुगल ए आजम और रजिया सुल्तान के संवाद, वहां भारी-भरकम उर्दू शब्दावली का जमकर प्रयोग हुआ था। कहना न होगा कि चाक्षुष माध्यम होने के चलते खबरिया टेलीविजन चैनलों को भी अपने लिए भाषा गढ़ते वक्त पारसी थियेटर की वही शैली पसंद आई। लेकिन इन चैनलों की भाषा नीति तैयार करने वाले लोग भूल गए कि यह माध्यम भविष्य में पूरी तरह बाजार के हवाले होने वाला है। क्योंकि बाजारवाद की शुरूआत के साथ ही सूचना क्रांति के ये औजार भारत में भी विकसित होना शुरू हुए थे। लिहाजा एक दिन ऐसा आएगा कि बाजार भाषाओं की समृद्ध संस्कृति को अपने कब्जे में ले लेगा और फिर हम बेचारा की तरह भाषाई समृद्धि और परंपरा को तहस-नहस होते देखने के लिए मजबूर हो जाएंगे। मजे की बात यह है कि इस परिपाटी को शुरू करने वाले लोग अपने पेशेवर संवादों के अलावा जब भी मंचासीन होते हैं तो भाषा की दुर्गति पर विलाप करने से नहीं चूकते।
अब बाजार भाषाओं को बदल रहा है। सहज होने के नाम पर वह हिंदी को अत्यधिक उर्दू अनुरागी बना रहा है या फिर हिंग्रेजी की संस्कृति में ढाल रहा है। मजे की बात यह है कि सब कुछ गांधी जी की उस कल्पना के नाम पर हो रहा है, जिसके तहत उन्होंने गंग-जमुनी संस्कृति और भाषा के स्तर पर जिस हिंदोस्तानी की कल्पना की थी, ये सारा बदलाव उसी नाम पर हो रहा है। दिलचस्प बात यह है कि इस रोग से सबसे ज्यादा हमारा मीडिया ही ग्रस्त है। 1991 के आसपास जब इस चलन की शुरूआत हुई तो भाषा के जानकारों और संस्कृति के अध्येताओं को आशंका थी कि भावी पीढ़ियों की जुबानी घुट्टी से अपनी मां जैसी भाषाएं दूर होती जाएंगी। कहना न होगा कि अब ऐसा ही होता दिख रहा है। ऐसे में सवाल यह है कि इस बदहाल परंपरा पर रोक कैसे लगेगी। या फिर इसमें सकारात्मक बदलाव के लिए इंतजार किया जाता रहा है। सोचना तो हम हिंदी वालों को ही है।
रविवार, 24 अप्रैल 2011
अन्ना का आंदोलन और साहित्यिक चुप्पी
उमेश चतुर्वेदी
रवायत के मुताबिक अन्ना हजारे के आंदोलन ने एक तरफ जहां बेईमानी और भ्रष्टाचार से आजिज आ चुकी आम जनता नई उम्मीदों के सुहाने झूले में झूल रही है, वहीं दूसरी तरफ बेईमान अधिकारियों, ठेकेदारों और नेताओं की तिकड़ी हर वह कदम उठा रही है, जिससे अन्ना के इस सत्कार्य को पटरी से उतारा जा सके। ज्यादातर ये कदम पर्दे के पीछे से उठाए जा रहे हैं। इसमें पत्रकारिता की भी अपनी भूमिका है। खबरों की दुनिया में भी दो तरह के लोग हैं, एक जिन्हें सरोकारी पत्रकारिता करनी है-दूसरे वे जो राजनेताओं के चंपुओं के तौर पर सुख्यात हैं। जाहिर है,सरोकारी पत्रकारिता करने वाले लोग अन्ना के आंदोलन को जहां व्यापक नजरिए से देखने की कोशिश कर रहे हैं,वहीं राजनीति, कारपोरेट और सत्ता की चंपुगिरी करने वाले खबरी जनों को अपने मित्र नेता-कारपोरेट के धंधे चौपट होने का डर सता रहा है, लिहाजा वे खबरों की सरोकारी कीमियागिरी से बचने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन इन सबके बीच साहित्यिक जगत चुप है। खासकर हिंदी साहित्य और उसके नेताओं की कहीं
कोई सक्रियता नजर नहीं आ रही। फेस बुक पर एक दिन इस साल के साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता उदय प्रकाश के विचार एक दिन जरूर साया हुए। शायद पांच या छह अप्रैल को जब अन्ना दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरने पर बैठे हुए
थे, तब उदय प्रकाश भी वहां पहुंचे थे। जंतर-मंतर के धरना स्थल के ठीक सामने सड़क की दूसरी पटरी पर दक्षिण भारतीय खाने का एक छोटा-सा ढाबा है। फेसबुक पर साया उदय प्रकाश के विचारों से पता चलता है कि अन्ना हजारे
के धरने के दिन उदय प्रकाश धरना पर बैठने या उससे सहानुभूति जताने नहीं गए थे, बल्कि मैकेनिक के यहां कनॉट प्लेस में बनने को दिए अपने कैमरे को लाने गए थे और भूख लग गई तो उस दक्षिण भारतीय दुकान पर खाना खाने की मंशा से चले गए थे। लेकिन उदय जी का दुर्भाग्य कि अन्ना के धरने के चलते उन्हें खाना नहीं मिला। मजबूरी के इस उपवास को उन्होंने फेसबुक पर अन्ना के नाम कर दिया। एक दौर में हिंदी पत्रकारिता में सक्रिय रहे इतिहास के शोधार्थी प्रदीप मांडव, कथाकार चित्रा मुद्गल और कुछ महिला साहित्यकारों के साथ अन्ना के समर्थन में एक दिन धरना स्थल पर जरूर पहुंचे थे। इन
छिटपुट साहित्यिक समर्थनों को छोड़ दें तो हिंदी साहित्य में अन्ना के आंदोलन को लेकर खास सुगबुगाहट नजर नहीं आती। साहित्यिक गलियारों में पता नहीं इस आंदोलन को लेकर कितनी चर्चा हो रही है, लेकिन इतना तय है कि जयप्रकाश आंदोलन के बाद इस सबसे महत्वपूर्ण आंदोलन को लेकर हिंदी साहित्य में मुखरता नजर नहीं आ रही है। जयप्रकाश आंदोलन में तो हिंदी
साहित्यकारों के एक बड़े वर्ग ने विरोध में कलम के साथ ही आंदोलन का रास्ता थाम लिया था। कई लोगों को जेल तक जाना पड़ा था। बाबा नागार्जुन तो जनसभाओं में इंदु जी-इंदु जी क्या हुआ आपको गाते चल रहे थे, आओ रानी ढोएं हम तुम्हारी पालकी की पंक्तियों के जरिए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के अपने साथियों पर ताना कस रहे थे। गिरधर राठी को जेल जाना पड़ा था। कुल मिलाकर साहित्यिक जगत में कुलबुलाहट थी। लेकिन अन्ना के आंदोलन के साथ ऐसी स्थिति नहीं है। अन्ना गलत हैं या सही, इसे लेकर समाज को रास्ता दिखाने का दावा करने वाला हिंदी साहित्यिक समाज चुप है। दरअसल हिंदी साहित्यकार की सबसे बड़ी समस्या यह है कि जैसे ही वह लेखन की दुनिया में कुछ खास मुकाम हासिल कर लेता है, भारतीय एलीट राजनीति की तरह एलीट हो जाता है और खुद को आम लोगों से अलग समझने लगता है। इसके साथ हीम उसकी जनता से दूरी बढ़ती जाती है। लिहाजा उसे जगत गति भी यूटोपियाई समाज की तरह ही व्यापने लगती है। यानी कुल मिलाकर एक आभासीपन उसकी रचनात्मकता में नजर आने लगता है। यही वजह है कि आज के हिंदी साहित्य की ज्यादातर रचनाओं की जनता के बीच पहचान और आत्मीयता नहीं बन पाती। कहना न होगा कि साहित्य जगत में व्याप्त इसी प्रवृत्ति के चलते हिंदी का साहित्यिक संसार अन्ना के आंदोलन से वैसी गहरी आत्मीयता या वितृष्णा नहीं बना पाया है,जैसी दूसरी सामाजिक संस्थाओं ने बना रखी है। अन्ना के आंदोलन को लेकर कम से कम साहित्यिक अभिव्यक्ति के स्तर फिलहाल गहरी असंपृक्ति तो नजर आ ही रही है। ऐसी असंपृक्ति से न तो साहित्य का भला हो सकता है और न समाज को...काश कि इसे हिंदी साहित्यिक समुदाय समझने की कोशिश करता....
रवायत के मुताबिक अन्ना हजारे के आंदोलन ने एक तरफ जहां बेईमानी और भ्रष्टाचार से आजिज आ चुकी आम जनता नई उम्मीदों के सुहाने झूले में झूल रही है, वहीं दूसरी तरफ बेईमान अधिकारियों, ठेकेदारों और नेताओं की तिकड़ी हर वह कदम उठा रही है, जिससे अन्ना के इस सत्कार्य को पटरी से उतारा जा सके। ज्यादातर ये कदम पर्दे के पीछे से उठाए जा रहे हैं। इसमें पत्रकारिता की भी अपनी भूमिका है। खबरों की दुनिया में भी दो तरह के लोग हैं, एक जिन्हें सरोकारी पत्रकारिता करनी है-दूसरे वे जो राजनेताओं के चंपुओं के तौर पर सुख्यात हैं। जाहिर है,सरोकारी पत्रकारिता करने वाले लोग अन्ना के आंदोलन को जहां व्यापक नजरिए से देखने की कोशिश कर रहे हैं,वहीं राजनीति, कारपोरेट और सत्ता की चंपुगिरी करने वाले खबरी जनों को अपने मित्र नेता-कारपोरेट के धंधे चौपट होने का डर सता रहा है, लिहाजा वे खबरों की सरोकारी कीमियागिरी से बचने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन इन सबके बीच साहित्यिक जगत चुप है। खासकर हिंदी साहित्य और उसके नेताओं की कहीं
कोई सक्रियता नजर नहीं आ रही। फेस बुक पर एक दिन इस साल के साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता उदय प्रकाश के विचार एक दिन जरूर साया हुए। शायद पांच या छह अप्रैल को जब अन्ना दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरने पर बैठे हुए
थे, तब उदय प्रकाश भी वहां पहुंचे थे। जंतर-मंतर के धरना स्थल के ठीक सामने सड़क की दूसरी पटरी पर दक्षिण भारतीय खाने का एक छोटा-सा ढाबा है। फेसबुक पर साया उदय प्रकाश के विचारों से पता चलता है कि अन्ना हजारे
के धरने के दिन उदय प्रकाश धरना पर बैठने या उससे सहानुभूति जताने नहीं गए थे, बल्कि मैकेनिक के यहां कनॉट प्लेस में बनने को दिए अपने कैमरे को लाने गए थे और भूख लग गई तो उस दक्षिण भारतीय दुकान पर खाना खाने की मंशा से चले गए थे। लेकिन उदय जी का दुर्भाग्य कि अन्ना के धरने के चलते उन्हें खाना नहीं मिला। मजबूरी के इस उपवास को उन्होंने फेसबुक पर अन्ना के नाम कर दिया। एक दौर में हिंदी पत्रकारिता में सक्रिय रहे इतिहास के शोधार्थी प्रदीप मांडव, कथाकार चित्रा मुद्गल और कुछ महिला साहित्यकारों के साथ अन्ना के समर्थन में एक दिन धरना स्थल पर जरूर पहुंचे थे। इन
छिटपुट साहित्यिक समर्थनों को छोड़ दें तो हिंदी साहित्य में अन्ना के आंदोलन को लेकर खास सुगबुगाहट नजर नहीं आती। साहित्यिक गलियारों में पता नहीं इस आंदोलन को लेकर कितनी चर्चा हो रही है, लेकिन इतना तय है कि जयप्रकाश आंदोलन के बाद इस सबसे महत्वपूर्ण आंदोलन को लेकर हिंदी साहित्य में मुखरता नजर नहीं आ रही है। जयप्रकाश आंदोलन में तो हिंदी
साहित्यकारों के एक बड़े वर्ग ने विरोध में कलम के साथ ही आंदोलन का रास्ता थाम लिया था। कई लोगों को जेल तक जाना पड़ा था। बाबा नागार्जुन तो जनसभाओं में इंदु जी-इंदु जी क्या हुआ आपको गाते चल रहे थे, आओ रानी ढोएं हम तुम्हारी पालकी की पंक्तियों के जरिए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के अपने साथियों पर ताना कस रहे थे। गिरधर राठी को जेल जाना पड़ा था। कुल मिलाकर साहित्यिक जगत में कुलबुलाहट थी। लेकिन अन्ना के आंदोलन के साथ ऐसी स्थिति नहीं है। अन्ना गलत हैं या सही, इसे लेकर समाज को रास्ता दिखाने का दावा करने वाला हिंदी साहित्यिक समाज चुप है। दरअसल हिंदी साहित्यकार की सबसे बड़ी समस्या यह है कि जैसे ही वह लेखन की दुनिया में कुछ खास मुकाम हासिल कर लेता है, भारतीय एलीट राजनीति की तरह एलीट हो जाता है और खुद को आम लोगों से अलग समझने लगता है। इसके साथ हीम उसकी जनता से दूरी बढ़ती जाती है। लिहाजा उसे जगत गति भी यूटोपियाई समाज की तरह ही व्यापने लगती है। यानी कुल मिलाकर एक आभासीपन उसकी रचनात्मकता में नजर आने लगता है। यही वजह है कि आज के हिंदी साहित्य की ज्यादातर रचनाओं की जनता के बीच पहचान और आत्मीयता नहीं बन पाती। कहना न होगा कि साहित्य जगत में व्याप्त इसी प्रवृत्ति के चलते हिंदी का साहित्यिक संसार अन्ना के आंदोलन से वैसी गहरी आत्मीयता या वितृष्णा नहीं बना पाया है,जैसी दूसरी सामाजिक संस्थाओं ने बना रखी है। अन्ना के आंदोलन को लेकर कम से कम साहित्यिक अभिव्यक्ति के स्तर फिलहाल गहरी असंपृक्ति तो नजर आ ही रही है। ऐसी असंपृक्ति से न तो साहित्य का भला हो सकता है और न समाज को...काश कि इसे हिंदी साहित्यिक समुदाय समझने की कोशिश करता....
सोमवार, 18 अप्रैल 2011
कैसे बढ़े पाठकीयता का कारवां
उमेश चतुर्वेदी
पिछले दिनों लोहिया रचनावली का लोकार्पण था। समाजवादी लेखक मस्तराम कपूर के संपादन में उनकी रचनावली के अंग्रेजी अनुवाद के इस लोकार्पण समारोह में मौजूदा दौर के समाजवादी धारा के तमाम बड़े नेता मौजूद थे। जैसी कि रवायत है, नेताओं ने रचनावली के तमाम खंडों का लोकार्पण किया और फिर जिसके खाते में जो किताब आई, उसे लेकर बैठ गए। चूंकि इसके बाद एक परिचर्चा थी, लिहाजा सभी नेता उस परिचर्चा में जुट गए। इस बीच उनका ध्यान उनके हिस्से में आई रचनावली के खंड पर ही था। उन्हें लग रहा था कि जिसके हिस्से जो किताब आई, अब उन पर उनका ही हक है। यह बात मंच संचालन कर रहे धुर समाजवादी और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर आनंद कुमार भांप गए। उन्होंने परिचर्चा के बीच में ही मंच पर मौजूद उन बड़े समाजवादी नेताओं ने रचनावली के हिंदी और अंग्रेजी के खंड को खरीदने की अपील कर डाली। उन्होंने विनम्रता पूर्वक साफ कर दिया कि लोकार्पण के दौरान जिसके हिस्से में जो किताब आई है, उस पर उनका हक नहीं है, बल्कि उसे भी नेताजी को खरीदना ही पड़ेगा। मंच पर मौजूद नेताओं में से ज्यादातर ने फाकामस्ती से अपनी जिंदगी की शुरूआत की। लेकिन आज ऑफ द रिकॉर्ड उनके भी पास सैकड़ों करोड़ की संपत्ति बताई जाती है। चूंकि लोहिया रचनावली का सवाल था और वे नेता ठहरे लोहिया भक्त, फिर सरेआम मंच से उनसे किताब खरीदने की मांग की जा रही थी। ऐसे में उनके सामने जेब ढीली करने के अलावा कोई चारा नहीं था।
कहने का मतलब यह कि हिंदी में मालदार लोग भी पढ़ने के लिए खर्च करने से बचते हैं। हालांकि नौजवान पीढ़ी में इन दिनों बदलाव नजर आ रहा है। वह पढ़ने के लिए किताबें खरीदने से नहीं हिचकती। उसे नई-नई किताबों में दिलचस्पी तो है। लोहिया रचनावली के प्रकाशक अनामिका प्रकाशन ने कार्यक्रम स्थल के बाहर समाजवादी साहित्य का एक छोटा सा स्टाल लगा रखा था। वहां से किताबों की खरीद भी हुई और ज्यादातर खरीददार नौजवान ही थे। कुछ ऐसा ही नजारा तीस जनवरी को दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में भी नजर आया। हर साल तीस जनवरी को गांधी शांति प्रतिष्ठान गांधी जी के शहीद दिवस के मौके पर गांधी स्मृति व्याख्यान का आयोजन करता है। इस मौके पर सैकड़ों लोग जुटते हैं। इस मौके का फायदा उठाने के लिए सर्व सेवा संघ प्रकाशन के एक वितरक ने अपनी और नवजीवन प्रकाशन से प्रकाशित गांधी और गांधीवादी साहित्य का स्टाल गांधी शांति प्रतिष्ठान में लगा रखा था। इस स्टाल की हालत यह थी कि देखते ही देखते गांधी जी की आत्मकथा सत्य के साथ प्रयोग के हिंदी और अंग्रेजी संस्करण की सारी प्रतियां बिक गईं। रूस के महान अराजकतावादी नेता प्रिंस उर्फ पीटर क्रोपाटकिन की किताब नवयुवकों से दो बातें, गांधी जी के हिंद स्वराज का हिंदी और अंग्रेजी संस्करण, रोम्या रोलां द्वारा लिखी गांधी जी की जीवनी हाथोंहाथ बिक गई। हैरत की बात यह थी कि इन किताबों के सबसे ज्यादा खरीददार नई पीढी़ के ही लोग थे। इससे एक बात तो तय है कि हिंदी किताबों की पाठकीयता को लेकर नाउम्मीद होने की कोई वजह नहीं है।
वैसे दुनिया में सबसे ज्यादा लोग अपने नेताओं और हीरो से प्रभावित होते हैं। समाजवादी धारा के नेताओं के बारे में माना जाता रहा है कि वे पढ़ते-लिखते रहे हैं। लेकिन आज की समाजवादी पीढ़ी का पढ़ाई-लिखाई से साथ छूट गया है। वाम धारा के नेताओं के बारे में भी माना जाता रहा है कि वे पढ़ते-लिखते हैं। लेकिन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की धारा से आए भाजपा नेताओं को लेकर भी कुछ ऐसी ही छवि रही है। लेकिन आज की राजनीतिक पीढ़ी के साथ वह बात नहीं रही। फिल्मी दुनिया में तो वैसे ही माना जाता है कि वहां बौद्धिकता की गुंजाइश कम ही रहती है। हालांकि वहां भी अनुराग कश्यप, जावेद अख्तर, गुलजार, बासु भट्टाचार्य, अमोल पालेकर, विशाल भारद्वाज, महेश भट्ट, अनुपम खेर, राज बब्बर जैसे पढ़ने-लिखने वाले लोग तो हैं। लेकिन वे नौजवानों को कोर्स के इतर कुछ पढ़ने के लिए प्रेरित नहीं कर पाते। अगर इसके बावजूद भी नई पीढ़ी पढ़ने की ओर अग्रसर हो रही है तो निश्चित तौर पर स्कूलों का योगदान है। क्योंकि तमाम बाधाओं के बावजूद अच्छे कहे जाने वाले स्कूलों के अध्यापक बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित तो कर ही रहे हैं। हालांकि सारे स्कूलों के पास प्रेरक वातावरण नहीं है। ऐसे में अगर पढाई का संस्कार बढ़ाना है तो आनंद कुमार जैसा साहसी और मुंहफट होना पड़ेगा और अच्छे स्कूलों जैसा प्रेरक भी...तभी हिंदी पाठकीयता का कारवां तेजी से बढ़ पाएगा।
पिछले दिनों लोहिया रचनावली का लोकार्पण था। समाजवादी लेखक मस्तराम कपूर के संपादन में उनकी रचनावली के अंग्रेजी अनुवाद के इस लोकार्पण समारोह में मौजूदा दौर के समाजवादी धारा के तमाम बड़े नेता मौजूद थे। जैसी कि रवायत है, नेताओं ने रचनावली के तमाम खंडों का लोकार्पण किया और फिर जिसके खाते में जो किताब आई, उसे लेकर बैठ गए। चूंकि इसके बाद एक परिचर्चा थी, लिहाजा सभी नेता उस परिचर्चा में जुट गए। इस बीच उनका ध्यान उनके हिस्से में आई रचनावली के खंड पर ही था। उन्हें लग रहा था कि जिसके हिस्से जो किताब आई, अब उन पर उनका ही हक है। यह बात मंच संचालन कर रहे धुर समाजवादी और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर आनंद कुमार भांप गए। उन्होंने परिचर्चा के बीच में ही मंच पर मौजूद उन बड़े समाजवादी नेताओं ने रचनावली के हिंदी और अंग्रेजी के खंड को खरीदने की अपील कर डाली। उन्होंने विनम्रता पूर्वक साफ कर दिया कि लोकार्पण के दौरान जिसके हिस्से में जो किताब आई है, उस पर उनका हक नहीं है, बल्कि उसे भी नेताजी को खरीदना ही पड़ेगा। मंच पर मौजूद नेताओं में से ज्यादातर ने फाकामस्ती से अपनी जिंदगी की शुरूआत की। लेकिन आज ऑफ द रिकॉर्ड उनके भी पास सैकड़ों करोड़ की संपत्ति बताई जाती है। चूंकि लोहिया रचनावली का सवाल था और वे नेता ठहरे लोहिया भक्त, फिर सरेआम मंच से उनसे किताब खरीदने की मांग की जा रही थी। ऐसे में उनके सामने जेब ढीली करने के अलावा कोई चारा नहीं था।
कहने का मतलब यह कि हिंदी में मालदार लोग भी पढ़ने के लिए खर्च करने से बचते हैं। हालांकि नौजवान पीढ़ी में इन दिनों बदलाव नजर आ रहा है। वह पढ़ने के लिए किताबें खरीदने से नहीं हिचकती। उसे नई-नई किताबों में दिलचस्पी तो है। लोहिया रचनावली के प्रकाशक अनामिका प्रकाशन ने कार्यक्रम स्थल के बाहर समाजवादी साहित्य का एक छोटा सा स्टाल लगा रखा था। वहां से किताबों की खरीद भी हुई और ज्यादातर खरीददार नौजवान ही थे। कुछ ऐसा ही नजारा तीस जनवरी को दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में भी नजर आया। हर साल तीस जनवरी को गांधी शांति प्रतिष्ठान गांधी जी के शहीद दिवस के मौके पर गांधी स्मृति व्याख्यान का आयोजन करता है। इस मौके पर सैकड़ों लोग जुटते हैं। इस मौके का फायदा उठाने के लिए सर्व सेवा संघ प्रकाशन के एक वितरक ने अपनी और नवजीवन प्रकाशन से प्रकाशित गांधी और गांधीवादी साहित्य का स्टाल गांधी शांति प्रतिष्ठान में लगा रखा था। इस स्टाल की हालत यह थी कि देखते ही देखते गांधी जी की आत्मकथा सत्य के साथ प्रयोग के हिंदी और अंग्रेजी संस्करण की सारी प्रतियां बिक गईं। रूस के महान अराजकतावादी नेता प्रिंस उर्फ पीटर क्रोपाटकिन की किताब नवयुवकों से दो बातें, गांधी जी के हिंद स्वराज का हिंदी और अंग्रेजी संस्करण, रोम्या रोलां द्वारा लिखी गांधी जी की जीवनी हाथोंहाथ बिक गई। हैरत की बात यह थी कि इन किताबों के सबसे ज्यादा खरीददार नई पीढी़ के ही लोग थे। इससे एक बात तो तय है कि हिंदी किताबों की पाठकीयता को लेकर नाउम्मीद होने की कोई वजह नहीं है।
वैसे दुनिया में सबसे ज्यादा लोग अपने नेताओं और हीरो से प्रभावित होते हैं। समाजवादी धारा के नेताओं के बारे में माना जाता रहा है कि वे पढ़ते-लिखते रहे हैं। लेकिन आज की समाजवादी पीढ़ी का पढ़ाई-लिखाई से साथ छूट गया है। वाम धारा के नेताओं के बारे में भी माना जाता रहा है कि वे पढ़ते-लिखते हैं। लेकिन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की धारा से आए भाजपा नेताओं को लेकर भी कुछ ऐसी ही छवि रही है। लेकिन आज की राजनीतिक पीढ़ी के साथ वह बात नहीं रही। फिल्मी दुनिया में तो वैसे ही माना जाता है कि वहां बौद्धिकता की गुंजाइश कम ही रहती है। हालांकि वहां भी अनुराग कश्यप, जावेद अख्तर, गुलजार, बासु भट्टाचार्य, अमोल पालेकर, विशाल भारद्वाज, महेश भट्ट, अनुपम खेर, राज बब्बर जैसे पढ़ने-लिखने वाले लोग तो हैं। लेकिन वे नौजवानों को कोर्स के इतर कुछ पढ़ने के लिए प्रेरित नहीं कर पाते। अगर इसके बावजूद भी नई पीढ़ी पढ़ने की ओर अग्रसर हो रही है तो निश्चित तौर पर स्कूलों का योगदान है। क्योंकि तमाम बाधाओं के बावजूद अच्छे कहे जाने वाले स्कूलों के अध्यापक बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित तो कर ही रहे हैं। हालांकि सारे स्कूलों के पास प्रेरक वातावरण नहीं है। ऐसे में अगर पढाई का संस्कार बढ़ाना है तो आनंद कुमार जैसा साहसी और मुंहफट होना पड़ेगा और अच्छे स्कूलों जैसा प्रेरक भी...तभी हिंदी पाठकीयता का कारवां तेजी से बढ़ पाएगा।
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