उमेश चतुर्वेदी
मीडिया का जब भी कोई नया माध्यम आता है, उससे पहले के माध्यमों के लिए शोक गीत गाने की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। वेब माध्यम के आने के बाद भी कुछ ऐसा रूदन शुरू हो गया था। इस रोने-गाने में मीडिया समीक्षक भूल जाते हैं कि वेब माध्यम अपने चरित्र और अपनी तकनीक के चलते दूसरे सभी माध्यमों से अलग है। बीसवीं सदी के शुरू में जब रेडियो माध्यम आया था तो निश्चित तौर पर वह प्रिंट माध्यम से चरित्र और तकनीकी दोनों स्तर पर अलग था। इसी तरह 1930 के दशक में आया टेलीविजन भी रेडियो के ऑडियो गुणों से थोड़ा युक्त होने के बावजूद अपने पहले के दोनों माध्यमों से अलग था। लेकिन 1969 में आए इंटरनेट माध्यम अपने पहले के तीनों माध्यमों से अलग होते हुए भी इन तीनों को अपने में समाहित किए हुए है। यही वजह है कि इस माध्यम के लिए पत्रकारिता का काम सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि इस माध्यम की चुनौती को जिस पेशेवराना अंदाजा से जूझने की तैयारी होनी चाहिए, कम से कम भारतीय भाषाओं में यह नदारद ही दिखती है। वेब जर्नलिज्म की अलख अगर भारतीय भाषाओं में दिख रही है तो उसका सबसे बड़ा जरिया बने हैं इस माध्यम की ताकत और महत्व को समझने वाले कुछ शौकिया लोग। लेकिन यह भी सच है कि शौकिया और सनकी किस्म के लोग किसी नए विचार और माध्यम को शुरूआती ताकत और दिशा ही दे सकते हैं, उसके लिए जरूरी आधार मुहैया करा सकते हैं, लेकिन उस विचार या माध्यम को आखिरकार आगे ले जाने की जिम्मेदारी पेशवर लोगों और उनके पेशेवराना अंदाज पर ज्यादा होती है।
वेब पत्रकारिता की चुनौतियों को समझने के लिए सबसे पहले हमें आज के दौर में मौजूद माध्यमों, उनके चरित्र और उनकी खासियतों-कमियों पर ध्यान देना होगा। इंटरनेट के आने से पहले तक सभी माध्यमों की अपनी स्वतंत्र पहचान और स्पेस था। लेकिन इंटरनेट ने इसे पूरी तरह बदल डाला है। इंटरनेट पर स्वतंत्र समाचार साइटें भी हैं तो अखबारों के अपने ई संस्करण भी मौजूद हैं। स्वतंत्र पत्रिकाएं भी हैं तो उनके ई संस्करण भी आज कंप्यूटर से महज एक क्लिक की दूरी पर मौजूद हैं। इसी तरह टेलीविजन और रेडियो के चैनल भी कंप्यूटर पर मौजूद हैं। कंप्यूटर का यह फैलाव सिर्फ डेस्क टॉप या फिर लैपटॉप तक ही नहीं है। बल्कि यह आम-ओ-खास सबके हाथों में मौजूद पंडोरा बॉक्स तक में पहुंच गया है। 2003 में बीएसएनएल की मोबाइल फोन सेवा की लखनऊ में शुरूआत करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने मोबाइल फोन को पंडोरा बॉक्स ही कहा था। भारत में मोबाइल तकनीक और फोन सेवा की संभावनाओं का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश के बड़े टेलिकॉम ऑपरेटरों ने 3G सेवाओं के लाइसेंस के लिए हाल ही में करीब 16 अरब डॉलर यानी 75,600 करोड़ रुपए की बोली लगाई। संचार मंत्रालय के एक आंकड़े के मुताबिक देश में जून 2010 तक मोबाइल फोन उपभोक्ताओं की संख्या 67 करोड़ तक पहुंच गई थी। यहां इस तथ्य पर गौर फरमाने की जरूरत यह है कि इन में से ज्यादातर फोन पर इंटरनेट सर्विस भी मौजूद है। लेकिन मोबाइल के जरिए इंटरनेट का जोरशोर से इस्तेमाल अभी नहीं हो रहा है। एक अमरीकी संस्था 'बोस्टन कंस्लटिंग ग्रुप' ने 'इंटरनेट्स न्यू बिलियन' नाम से जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक इस समय भारत में 8.1 करोड़ इंटरनेट उपभोक्ता हैं। इस संस्था के मुताबिक 2015 में भारत में इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या बढ़कर 23.7 करोड़ हो जाएगी। इसी रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत का मौजूदा इंटरनेट उपभोक्ता रोजाना आधे घंटे तक इंटरनेट का इस्तेमाल करता है। जिसके बढ़ने की संभावना अपार है। इस रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ 2015 तक ही भारत का आम इंटरनेट उपभोक्ता रोजाना आधे घंटे की बजाय 42 मिनट इंटरनेट का इस्तेमाल करने लगेगा। इसकी वजह भी है। दरअसल आज भी दिल्ली-मुंबई या लखनऊ-जयपुर जैसे शहरों को छोड़ दें तो तकरीबन पूरा देश बिजली की किल्लत से जूझ रहा है। इंटरनेट के पारंपरिक माध्यमों को चलाने के लिए बिजली जरूरी है। ऐसे में कंप्यूटर निर्माता कंपनियां ऐसे कंप्यूटरों के निर्माण में जुटी हैं, जिन्हें बैटरियों या ऐसे ही दूसरे वैकल्पिक साधनों से चलाया जा सके। इस दिशा में तकनीकी विकास जैसे हो रहा है, जाहिर है कि ऐसा होना देर-सवेर संभव होगा ही। कल्पना कीजिए कि अगर ऐसा हो गया तो देश में कंप्यूटर क्रांति आ जाएगी और फिर इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या बढ़ना लाजिमी हो जाएगा। विविधतावादी भारत देश में तब इंटरनेट पाठकों, स्रोताओं और दर्शकों का विविधता युक्त एक बड़ा समूह होगा, जिनकी जरूरतें और दिलचस्पी के क्षेत्र विविध होंगे। जिनकी ओर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। हालांकि इसकी एक झलक आज भी प्रिंट माध्यमों में दिख रहा है। जहां पाठकों की विविधरंगी रूचियां और जरूरतें साफ नजर आती हैं। अखबार और पत्रिकाएं अपने पाठकों को लुभाने के लिए उनकी दिलचस्पी और जरूरत की पाठ्य सामग्री मुहैया करा रही हैं।
इंटरनेट की एक और खासियत है, समय की मजबूरियों से मुक्ति। अखबार या पत्रिकाएं एक निश्चित अंतराल के बाद ही प्रकाशित होते हैं। टेलीविजन ने इस अंतराल को निश्चित तौर पर कम किया है। रेडियो ने भी वाचिक माध्यम के तौर पर इस अंतराल को घटाया ही है। लेकिन वहां अब भी तकनीकी तामझाम ज्यादा है। विजुअल को शूट करना, उसे एडिट करना और उसे सॉफ्टवेयर में लोड करना अब भी ज्यादा वक्त लेता है। लेकिन इंटरनेट ने वक्त की यह पाबंदी भी कम कर दी है। खबर आई या उसका वीडियो या ऑडियो शूट किया गया और उसे इंटरनेट पर लोड कर दिया गया। हालांकि अभी तक उपलब्ध 2 जी तकनीक के चलते इस पूरी प्रक्रिया में थोड़ी दिक्कतें जरूर होती हैं। लेकिन 3 जी के आने के बाद ये दिक्कतें पूरी तरह से कम हो जाएंगी। तब निश्चित तौर पर इस माध्यम के लिए कंटेंट जुटाने और तैयार करने वाले लोगों की परेशानियां थोड़ी कम हो जाएंगी।
भारतीय भाषाओं की वेब पत्रकारिता को परेशानी कमाई के स्रोत कम होना है। जिस तरह प्रिंट माध्यमों में विज्ञापन दिख रहे हैं, टेलीविजन में भी विज्ञापनों की कमाई बढ़ रही है, वैसा अभी फिलहाल इंटरनेट की दुनिया में नहीं दिख रहा है। हालांकि प्राइस वाटर हाउस कूपर की पिछले साल जारी रिपोर्ट ने इंटरनेट विज्ञापनों की दुनिया में 12.4 फीसद बढ़त का आकलन किया था।
इस ब्लॉग पर कोशिश है कि मीडिया जगत की विचारोत्तेजक और नीतिगत चीजों को प्रेषित और पोस्ट किया जाए। मीडिया के अंतर्विरोधों पर आपके भी विचार आमंत्रित हैं।
शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011
शनिवार, 19 फ़रवरी 2011
एक साहित्यकार की अनोखी वर्षगांठ
उमेश चतुर्वेदी
हिंदी साहित्य की एक बड़ी चिंता पाठकों से सहज संवाद की रही है। दिल्ली से लेकर भोपाल तक हिंदी के ढेर सारे कार्यक्रम होते रहते हैं, लेकिन अक्सर इन कार्यक्रमों में पाठकों की उपस्थिति बेहद कम रहती है। हाल ही में प्रवासी लेखक सम्मेलन में लंदन से भारत आए प्रवासी लेखक तेजेंद्र शर्मा ने भी एक मुलाकात में स्वीकार किया कि हिंदी में ज्यादातर लेखन लगता है लेखकों और उसी साहित्यिक जमात के लिए होता है, जिसे खुद भी कुछ रचने-बांचने की आदत है। दूसरी भाषाओं से की तरह हिंदी में सिर्फ और सिर्फ आम पाठकों की उपस्थिति कम से कम साहित्यिक आयोजनों से दूर ही रहती है। इस दूरी के ही चलते कम से कम आम लोगों में हिंदी लेखकों की सहज पूछ और पहचान कम ही होती है। दूसरी प्रदर्शनकारी विधाओं के रचनाकारों की बनिस्बत हिंदी लेखकों को आम पहचान का यह संकट परेशान करता रहता है। ऐसे माहौल में अगर किसी लेखक का कोई जन्मदिन आम पाठक मनाने लगें तो सुखद हैरत तो होगी ही। लेकिन ऐसा हुआ और उसी दिल्ली की सरजमीं पर हुआ, जहां आम साहित्यिक कार्यक्रमों में पाठकों का रोना रोया जाता है।
हिंदी के वरिष्ठ लेखक और आलोचक हैं विश्वनाथ त्रिपाठी। सहज व्यक्तित्व के धनी विश्वनाथ त्रिपाठी दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ाते रहे हैं। सुदूर पूर्वी उत्तर प्रदेश के निवासी विश्वनाथ जी रिटायर होने के बाद भी दिल्ली में ही रह रहे हैं। पूर्वी दिल्ली के जिस दिलशाद गार्डेन इलाके में वे रहते हैं, उसके बगल में डीयर पार्क है। उस पार्क में वे सुबह-शाम की सैर के लिए लगातार जाते रहे हैं। करीब बीस साल से जारी इस सैर यात्र में उनके कई संगी-साथी बन गए हैं। उन्हें पता है कि विश्वनाथ जी हिंदी के जाने-माने लेखक और अध्यापक हैं। लेकिन उनका निश्छल व्यक्तित्व पार्क के सैर साथियों से सहज संबंध में रोड़ा नहीं बन पाया। बहरहाल वैलेंटाइन डे के दो दिन बाद यानी 16 फरवरी को त्रिपाठी जी ने जिंदगी के 80 बसंत पूरे कर लिए। त्रिपाठी जी के जन्मदिन की जानकारी उनके सैर-साथियों को थी और उन्होंने पार्क में ही सैर के दौरान उनका जन्मदिन मनाने की तैयारियां कर लीं। 16 फरवरी की सुबह जब त्रिपाठी जी पार्क पहुंचे तो उन्हें गेंदे के फूलों की माला से लाद दिया गया। निश्चित तौर पर इसमें वहां रह रहे कुछ लेखक – पत्रकारों का भी सहयोग रहा है। सुखद हैरत की बात यह है कि इस मौके पर डीयर पार्क के मित्रों के सहयोग से एक किताब का प्रकाशन भी किया गया है। बतकही शीर्षक इस पुस्तक को लेखक भारतेंदु मिश्र ने संपादित किया है। यह पुस्तक साहित्यिक अड्डेबाजी या साहित्यकारो की गप्प गोष्ठी का एक सहज दस्तावेज है। बाद मे त्रिपाठी जी ने इस पुस्तक का लोकार्पण करते हुए कहा - “मैं यहाँ बीस वर्षों से आ रहा हूँ, यहाँ के हमारे सभी मित्रो ने ये जो मेरे लिए आयोजन किया है इससे बडा आयोजन मेरे लिए और हो नही सकता।हम लोग बरसों से एक साथ यहाँ बैठते है क्योकि यहाँ हम आपस मे अपनी रचनाओ की चर्चा नही करते। साहित्य से इतर केवल गप्प होती है तो इसी लिए यह चल रहा है। दूसरी तरह के महत्वाकान्क्षी बहुत से लोग जो हमारे बीच आये भी वो खुद कुछ न मिलने पर चले गये।..तो हम लोग आपस मे इसी लिए लम्बे समय से जुडे है कि हम किसी को कुछ देने की स्थिति मे नहीं हैं। इसी लिए यह हमारी गप्प गोष्ठी चल रही है। कुछ आते रहे कुछ जाते रहे। हम सबमे कमियाँ हैं-कमियाँ हैं तभी चल रहा है। ”
हिंदी में ऐसे आयोजनों की परंपरा न के बराबर है। लेकिन त्रिपाठी जी का जन्मदिन दरअसल हिंदी समाज के बदलते मानस का एक परिचय दे गया। इससे साफ है कि अगर पाठकों और आम लोगों से जुड़ने का माद्दा और हिम्मत है तो हिंदी के लेखकों से भी आम पाठक जुड़ना और उसके बारे में जानना चाहता है।
दिल्ली में हर साल मराठी समाज गणेशोत्सव का आयोजन करता है। बंगाली समाज दुर्गापूजा का आयोजन करता है। इन आयोजनों में ये समाज अपने लेखकों और संस्कृति कर्मियों से सीधे मुखातिब होते हैं। असम में तो उस बच्चे का सही संस्कार ही नहीं माना जाता, जो असम साहित्य सम्मेलन में शामिल नहीं हो पाता। लेकिन हिंदी में दुर्भाग्यवश ऐसी परंपरा अभी तक विकसित नहीं हो पाई है। हिंदी पाठक समाज का तालाब इसी वजह से शांत है। दुखद तो यह है कि इस शांत तालाब में हलचल पैदा करने के लिए कंकड़ फेंकने की हिम्मत कम ही लोग दिखा पाते हैं। त्रिपाठी जी का पार्क में जन्मदिन मनाकर पाठक समाज ने खुद के तालाब में ही खुद ही एक कंकड़ मारने की कोशिश की है। इससे एक हलचल पैदा भी हुई है। बेहतर तो यह होगा कि हिंदी लेखक समाज इस हलचल को बढ़ाते रहने की कोशिश को आगे बढ़ाए। इससे पैदा हुई लहरें ही हिंदी को सही मुकाम तक ले जा सकेंगी।
हिंदी साहित्य की एक बड़ी चिंता पाठकों से सहज संवाद की रही है। दिल्ली से लेकर भोपाल तक हिंदी के ढेर सारे कार्यक्रम होते रहते हैं, लेकिन अक्सर इन कार्यक्रमों में पाठकों की उपस्थिति बेहद कम रहती है। हाल ही में प्रवासी लेखक सम्मेलन में लंदन से भारत आए प्रवासी लेखक तेजेंद्र शर्मा ने भी एक मुलाकात में स्वीकार किया कि हिंदी में ज्यादातर लेखन लगता है लेखकों और उसी साहित्यिक जमात के लिए होता है, जिसे खुद भी कुछ रचने-बांचने की आदत है। दूसरी भाषाओं से की तरह हिंदी में सिर्फ और सिर्फ आम पाठकों की उपस्थिति कम से कम साहित्यिक आयोजनों से दूर ही रहती है। इस दूरी के ही चलते कम से कम आम लोगों में हिंदी लेखकों की सहज पूछ और पहचान कम ही होती है। दूसरी प्रदर्शनकारी विधाओं के रचनाकारों की बनिस्बत हिंदी लेखकों को आम पहचान का यह संकट परेशान करता रहता है। ऐसे माहौल में अगर किसी लेखक का कोई जन्मदिन आम पाठक मनाने लगें तो सुखद हैरत तो होगी ही। लेकिन ऐसा हुआ और उसी दिल्ली की सरजमीं पर हुआ, जहां आम साहित्यिक कार्यक्रमों में पाठकों का रोना रोया जाता है।
हिंदी के वरिष्ठ लेखक और आलोचक हैं विश्वनाथ त्रिपाठी। सहज व्यक्तित्व के धनी विश्वनाथ त्रिपाठी दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ाते रहे हैं। सुदूर पूर्वी उत्तर प्रदेश के निवासी विश्वनाथ जी रिटायर होने के बाद भी दिल्ली में ही रह रहे हैं। पूर्वी दिल्ली के जिस दिलशाद गार्डेन इलाके में वे रहते हैं, उसके बगल में डीयर पार्क है। उस पार्क में वे सुबह-शाम की सैर के लिए लगातार जाते रहे हैं। करीब बीस साल से जारी इस सैर यात्र में उनके कई संगी-साथी बन गए हैं। उन्हें पता है कि विश्वनाथ जी हिंदी के जाने-माने लेखक और अध्यापक हैं। लेकिन उनका निश्छल व्यक्तित्व पार्क के सैर साथियों से सहज संबंध में रोड़ा नहीं बन पाया। बहरहाल वैलेंटाइन डे के दो दिन बाद यानी 16 फरवरी को त्रिपाठी जी ने जिंदगी के 80 बसंत पूरे कर लिए। त्रिपाठी जी के जन्मदिन की जानकारी उनके सैर-साथियों को थी और उन्होंने पार्क में ही सैर के दौरान उनका जन्मदिन मनाने की तैयारियां कर लीं। 16 फरवरी की सुबह जब त्रिपाठी जी पार्क पहुंचे तो उन्हें गेंदे के फूलों की माला से लाद दिया गया। निश्चित तौर पर इसमें वहां रह रहे कुछ लेखक – पत्रकारों का भी सहयोग रहा है। सुखद हैरत की बात यह है कि इस मौके पर डीयर पार्क के मित्रों के सहयोग से एक किताब का प्रकाशन भी किया गया है। बतकही शीर्षक इस पुस्तक को लेखक भारतेंदु मिश्र ने संपादित किया है। यह पुस्तक साहित्यिक अड्डेबाजी या साहित्यकारो की गप्प गोष्ठी का एक सहज दस्तावेज है। बाद मे त्रिपाठी जी ने इस पुस्तक का लोकार्पण करते हुए कहा - “मैं यहाँ बीस वर्षों से आ रहा हूँ, यहाँ के हमारे सभी मित्रो ने ये जो मेरे लिए आयोजन किया है इससे बडा आयोजन मेरे लिए और हो नही सकता।हम लोग बरसों से एक साथ यहाँ बैठते है क्योकि यहाँ हम आपस मे अपनी रचनाओ की चर्चा नही करते। साहित्य से इतर केवल गप्प होती है तो इसी लिए यह चल रहा है। दूसरी तरह के महत्वाकान्क्षी बहुत से लोग जो हमारे बीच आये भी वो खुद कुछ न मिलने पर चले गये।..तो हम लोग आपस मे इसी लिए लम्बे समय से जुडे है कि हम किसी को कुछ देने की स्थिति मे नहीं हैं। इसी लिए यह हमारी गप्प गोष्ठी चल रही है। कुछ आते रहे कुछ जाते रहे। हम सबमे कमियाँ हैं-कमियाँ हैं तभी चल रहा है। ”
हिंदी में ऐसे आयोजनों की परंपरा न के बराबर है। लेकिन त्रिपाठी जी का जन्मदिन दरअसल हिंदी समाज के बदलते मानस का एक परिचय दे गया। इससे साफ है कि अगर पाठकों और आम लोगों से जुड़ने का माद्दा और हिम्मत है तो हिंदी के लेखकों से भी आम पाठक जुड़ना और उसके बारे में जानना चाहता है।
दिल्ली में हर साल मराठी समाज गणेशोत्सव का आयोजन करता है। बंगाली समाज दुर्गापूजा का आयोजन करता है। इन आयोजनों में ये समाज अपने लेखकों और संस्कृति कर्मियों से सीधे मुखातिब होते हैं। असम में तो उस बच्चे का सही संस्कार ही नहीं माना जाता, जो असम साहित्य सम्मेलन में शामिल नहीं हो पाता। लेकिन हिंदी में दुर्भाग्यवश ऐसी परंपरा अभी तक विकसित नहीं हो पाई है। हिंदी पाठक समाज का तालाब इसी वजह से शांत है। दुखद तो यह है कि इस शांत तालाब में हलचल पैदा करने के लिए कंकड़ फेंकने की हिम्मत कम ही लोग दिखा पाते हैं। त्रिपाठी जी का पार्क में जन्मदिन मनाकर पाठक समाज ने खुद के तालाब में ही खुद ही एक कंकड़ मारने की कोशिश की है। इससे एक हलचल पैदा भी हुई है। बेहतर तो यह होगा कि हिंदी लेखक समाज इस हलचल को बढ़ाते रहने की कोशिश को आगे बढ़ाए। इससे पैदा हुई लहरें ही हिंदी को सही मुकाम तक ले जा सकेंगी।
शनिवार, 12 फ़रवरी 2011
राजनीति और साहित्य के रिश्ते
उमेश चतु्र्वेदी
अभी हाल ही में एक साहित्यिक आयोजन में जाने का मौका मिला। जैसा कि आज आयोजनों की नियति बन गई है- सेटिंग-गेटिंग और ईटिंग, इस आयोजन में भी ये सारी चीजें देखने को मिलीं। अपनी दिलचस्पी इस सेटिंग और गेटिंग में नहीं थी। लेकिन उदारीकरण के दौर में हिंदी और उसके नियंताओं की नीयत और उनके ज्ञान को नजदीक से देखने का मौका जरूर मिला। जैसा कि हिंदी आयोजनों की एक और प्रवृत्ति है, राजनीति और राजनेताओं को गाली देना और अपने को उनकी तुलना में कहीं ज्यादा ऊंचा और बेहतर साबित करना, इस आयोजन में भी हुआ। लेकिन हकीकत में ऐसा कभी होता नहीं है। जैसे ही कार्यक्रम में राजनेता आता है, उसके पीछे गाली देने वाले साहित्यकार सबसे पहले लपक पड़ते हैं। अपने आयोजन को सफल बताने के लिए वे उस नेता का नाम ले लेकर उसके भाषण को उद्धृत करने लगते हैं। राजनेता की हैसियत जैसी हुई, अपने आयोजन को उतना ही कामयाब बताने में वह साहित्यकार जुट जाता है। तब वह अपनी महानता भूल जाता है। साहित्य की महानता भी उसकी नजर में पीछे छूट जाती है। राजनीति को गाली देना और उससे दूरी बनाने का दावा और फि र उसके पीछे चलने का पाखंड हिंदी की ही नियति रही है। यही वजह है कि यहां राजनेता भी साहित्यकार को अपने पैर की जूती समझने लगता है। उसे पता है कि पुरस्कारों, अनुदानों और नियुक्ति के लिए हिंदी साहित्यकार को उसके पास आना ही है। लिहाजा वह अपनी हैसियत और अपने सम्मान का लुत्फ उठाता रहता है। इसका असर यह होता है कि वह साहित्य को लेकर एक खास तरह का वैसा आदरभाव नहीं दिखा पाता, जैसा बंगला, मलयालम और मराठी या कन्नड़ में दिखता है। मराठी के वरिष्ठ रचनाकर कुसुमाग्रज को ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया जा रहा था, तब मंच पर उस जमाने के उप प्रधानमंत्री यशवंत राव बलवंत राव चव्हाण बैठ गए थे। कुसुमाग्रज ने उनके साथ मंच पर बैठने से इनकार कर दिया था। हिंदी में ऐसा साहस दिखाने की हैसियत कितने लेखकों में हैं। ज्ञानपीठ संस्थान से एक प्रमुख पुरस्कार प्राप्त कर चुके हिंदी के एक वरिष्ठ लेखक पुरस्कार समारोह के अगले दिन अपने मित्रों को समारोह में शामिल न होने का उलाहना इन शब्दों में दे रहे थे - भाई आप क्यों आने लगे समारोह में, लेकिन मैं आपको बता दूं कि यह पुरस्कार खुद नेता प्रतिपक्ष अटल बिहारी वाजपेयी ने दिया। दिलचस्प बात यह है कि स्वर्गीय लेखक महोदय घोषित तौर पर फासीवाद के विरोधी थे। जैसी की धारणा है, वाजपेयी की बीजेपी भी फासीवादी पार्टी ही है। इन पंक्तियों के लेखक के सामने यह घटना घटी थी, क्योंकि तब उन लेखक महोदया का इंटरव्यू लेने के लिए वह उस वक्त लेखक महोदय के घर पर ही मौजूद था।
ऐसी हालत कम के कम दूसरी भारतीय भाषाओं में नहीं है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री रहते हुए रामकृष्ण हेगड़े दिल्ली की एलटीजी हॉल में पहुंच गए थे। तब साहित्य अकादमी का संवत्सर व्याख्यान चल रहा था। आयोजकों ने मुख्यमंत्री को अपने श्रोता समाज में देखा तो वे उनकी मिजाजपुरसी में जुट गए। उन्होंने आगे बैठने या मंच पर जाने से साफ मना कर दिया। उन्होंने साफ कहा कि यह मंच साहित्यकारों का है, उनका नहीं। बंगला में अपने लेखकों को पढऩे और उनका व्याख्यान दिलवाने के लिए लोकसभा का स्पीकर बनते ही सोमनाथ चटर्जी अगर जुट जाते हैं तो उसकी वजह यह है कि यहां का लेखक राजनीति की सीमाएं ही नहीं जानता, बल्कि उसकी ताकत भी जानता है। वहां के संस्कृतिकर्मियों में कम से कम पाखंड तो नहीं है।
हिंदी साहित्यकार की नियति है कि वह राजनेता से आगे की सोचने का दावा करता है। लेकिन हकीकत तो यह है कि वह राजनीति की दुनिया से कम से कम पचास साल पीछे है। वह राजनीति की तरह आगे की नहीं सोच रहा, उसे अभी-भी ज्ञानकांड से परहेज है। विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों की हालत तो और भी ख्रराब है। वे सूर-तुलसी-कबीर से आगे ही नहीं बढ़ पाए हैं। आज की राजनीति, मौजूदा समय की परेशानियां और उसके भावी निहितार्थ उसकी चिंताएं नहीं हैं। इसका असर यह हो रहा है कि अधिसंख्य हिंदी साहित्यकार और प्राध्यापक रूमानी दुनिया में खोए हुए हैं। उनकी रचनात्मकता में धार की लगातार कमी हो रही है। राजनीति से दूरी दिखाने का पाखंड तो है, लेकिन उसके साथ ही वे राजनीति के फायदे भी उठाना चाहते हैं। इसका असर यह हो रहा है कि राजनीति की सिर्फ गंदगी ही हमारे दौर में नजर आ रही है। साहित्यिक समाज पर उसका ही ज्यादा असर है। ऐसे में क्या यह बेहतर नहीं होगा कि हिंदी के साहित्यकार इस पाखंड से दूर हो जाएं कि वे साहित्यकार के नाते राजनेताओं से अलग हैं। वे अपनी श्रेष्ठताग्रंथि से दूर हो जाएं। राजनीति की सीमाएं और ताकत स्वीकार कर लें। निश्चित तौर पर इससे हिंदी साहित्य का भला ही होगा।
अभी हाल ही में एक साहित्यिक आयोजन में जाने का मौका मिला। जैसा कि आज आयोजनों की नियति बन गई है- सेटिंग-गेटिंग और ईटिंग, इस आयोजन में भी ये सारी चीजें देखने को मिलीं। अपनी दिलचस्पी इस सेटिंग और गेटिंग में नहीं थी। लेकिन उदारीकरण के दौर में हिंदी और उसके नियंताओं की नीयत और उनके ज्ञान को नजदीक से देखने का मौका जरूर मिला। जैसा कि हिंदी आयोजनों की एक और प्रवृत्ति है, राजनीति और राजनेताओं को गाली देना और अपने को उनकी तुलना में कहीं ज्यादा ऊंचा और बेहतर साबित करना, इस आयोजन में भी हुआ। लेकिन हकीकत में ऐसा कभी होता नहीं है। जैसे ही कार्यक्रम में राजनेता आता है, उसके पीछे गाली देने वाले साहित्यकार सबसे पहले लपक पड़ते हैं। अपने आयोजन को सफल बताने के लिए वे उस नेता का नाम ले लेकर उसके भाषण को उद्धृत करने लगते हैं। राजनेता की हैसियत जैसी हुई, अपने आयोजन को उतना ही कामयाब बताने में वह साहित्यकार जुट जाता है। तब वह अपनी महानता भूल जाता है। साहित्य की महानता भी उसकी नजर में पीछे छूट जाती है। राजनीति को गाली देना और उससे दूरी बनाने का दावा और फि र उसके पीछे चलने का पाखंड हिंदी की ही नियति रही है। यही वजह है कि यहां राजनेता भी साहित्यकार को अपने पैर की जूती समझने लगता है। उसे पता है कि पुरस्कारों, अनुदानों और नियुक्ति के लिए हिंदी साहित्यकार को उसके पास आना ही है। लिहाजा वह अपनी हैसियत और अपने सम्मान का लुत्फ उठाता रहता है। इसका असर यह होता है कि वह साहित्य को लेकर एक खास तरह का वैसा आदरभाव नहीं दिखा पाता, जैसा बंगला, मलयालम और मराठी या कन्नड़ में दिखता है। मराठी के वरिष्ठ रचनाकर कुसुमाग्रज को ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया जा रहा था, तब मंच पर उस जमाने के उप प्रधानमंत्री यशवंत राव बलवंत राव चव्हाण बैठ गए थे। कुसुमाग्रज ने उनके साथ मंच पर बैठने से इनकार कर दिया था। हिंदी में ऐसा साहस दिखाने की हैसियत कितने लेखकों में हैं। ज्ञानपीठ संस्थान से एक प्रमुख पुरस्कार प्राप्त कर चुके हिंदी के एक वरिष्ठ लेखक पुरस्कार समारोह के अगले दिन अपने मित्रों को समारोह में शामिल न होने का उलाहना इन शब्दों में दे रहे थे - भाई आप क्यों आने लगे समारोह में, लेकिन मैं आपको बता दूं कि यह पुरस्कार खुद नेता प्रतिपक्ष अटल बिहारी वाजपेयी ने दिया। दिलचस्प बात यह है कि स्वर्गीय लेखक महोदय घोषित तौर पर फासीवाद के विरोधी थे। जैसी की धारणा है, वाजपेयी की बीजेपी भी फासीवादी पार्टी ही है। इन पंक्तियों के लेखक के सामने यह घटना घटी थी, क्योंकि तब उन लेखक महोदया का इंटरव्यू लेने के लिए वह उस वक्त लेखक महोदय के घर पर ही मौजूद था।
ऐसी हालत कम के कम दूसरी भारतीय भाषाओं में नहीं है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री रहते हुए रामकृष्ण हेगड़े दिल्ली की एलटीजी हॉल में पहुंच गए थे। तब साहित्य अकादमी का संवत्सर व्याख्यान चल रहा था। आयोजकों ने मुख्यमंत्री को अपने श्रोता समाज में देखा तो वे उनकी मिजाजपुरसी में जुट गए। उन्होंने आगे बैठने या मंच पर जाने से साफ मना कर दिया। उन्होंने साफ कहा कि यह मंच साहित्यकारों का है, उनका नहीं। बंगला में अपने लेखकों को पढऩे और उनका व्याख्यान दिलवाने के लिए लोकसभा का स्पीकर बनते ही सोमनाथ चटर्जी अगर जुट जाते हैं तो उसकी वजह यह है कि यहां का लेखक राजनीति की सीमाएं ही नहीं जानता, बल्कि उसकी ताकत भी जानता है। वहां के संस्कृतिकर्मियों में कम से कम पाखंड तो नहीं है।
हिंदी साहित्यकार की नियति है कि वह राजनेता से आगे की सोचने का दावा करता है। लेकिन हकीकत तो यह है कि वह राजनीति की दुनिया से कम से कम पचास साल पीछे है। वह राजनीति की तरह आगे की नहीं सोच रहा, उसे अभी-भी ज्ञानकांड से परहेज है। विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों की हालत तो और भी ख्रराब है। वे सूर-तुलसी-कबीर से आगे ही नहीं बढ़ पाए हैं। आज की राजनीति, मौजूदा समय की परेशानियां और उसके भावी निहितार्थ उसकी चिंताएं नहीं हैं। इसका असर यह हो रहा है कि अधिसंख्य हिंदी साहित्यकार और प्राध्यापक रूमानी दुनिया में खोए हुए हैं। उनकी रचनात्मकता में धार की लगातार कमी हो रही है। राजनीति से दूरी दिखाने का पाखंड तो है, लेकिन उसके साथ ही वे राजनीति के फायदे भी उठाना चाहते हैं। इसका असर यह हो रहा है कि राजनीति की सिर्फ गंदगी ही हमारे दौर में नजर आ रही है। साहित्यिक समाज पर उसका ही ज्यादा असर है। ऐसे में क्या यह बेहतर नहीं होगा कि हिंदी के साहित्यकार इस पाखंड से दूर हो जाएं कि वे साहित्यकार के नाते राजनेताओं से अलग हैं। वे अपनी श्रेष्ठताग्रंथि से दूर हो जाएं। राजनीति की सीमाएं और ताकत स्वीकार कर लें। निश्चित तौर पर इससे हिंदी साहित्य का भला ही होगा।
सोमवार, 7 फ़रवरी 2011
रामजी बाबू की याद
उमेश चतुर्वेदी
नियति ने लेखन और पत्रकारिता की दुनिया में ढकेलने का निश्चय कर लिया था, शायद यही वजह है कि पाठ्यक्रम से इतर किताबें और पत्रिकाओं के पढ़ने का चस्का कम ही उम्र में लग गया था। पूर्वी उत्तर प्रदेश के आखिरी छोर पर स्थित बलिया में राजेंद्र प्रसाद के प्रतिभा प्रकाशन की वजह से देश-विदेश की अहम पत्रिकाएं मिलती रही थीं। इसी बुक स्टाल पर पहली बार हिंदी की स्थिति को लेकर शायद हिंदुस्तान में एक लेख पढ़ा था और उसके लेखक की भाषा ने जैसे मोह ही लिया था। बाद के दिनों में जब कादंबिनी से साबका पड़ा तो उस लेखक के सारगर्भित लेख गाहे-बगाहे पढ़ने को मिलने लगे। रामजी प्रसाद सिंह उर्फ रामजी बाबू से मानसिक परिचय की नींव ऐसे ही पड़ी। उन्हीं दिनों उनसे मिलने की इच्छा होने लगी थी। इसी बीच भारतीय जनसंचार संस्थान में दाखिला मिल गया और दिल्लीवासी हो गया। यहां पढ़ाई के दौरान पता चला कि रामजी बाबू यहां पढ़ा चुके हैं। लेकिन उनसे मुलाकात का सौभाग्य नहीं मिला। उनसे मुलाकात सबसे पहले 1995 में तब हुई, जब बनारस वाले रत्नाकर पांडे ने दिल्ली के विज्ञान भवन में राजीव गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन करवाया। जिसका तब के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उद्घाटन किया था। सुनहरीबाग मस्जिद के पास बस से उतरकर मैं जब मौलाना आजाद रोड पर विज्ञान भवन के लिए चला तो उसी वक्त मेरे आगे-आगे खद्दर का कुर्ता-पाजामा पहने एक बुजुर्ग शख्स चल रहे थे। मुझे तब तक पता नहीं था कि आगे-आगे चल रहे सज्जन वे रामजी बाबू हैं, जिनसे मिलने की इच्छा बरसों से मेरे मन में दबी हुई है। उनसे परिचय भी कुछ अजीब ढंग से हुआ। विज्ञान भवन में घुसते वक्त जैसी की रवायत है, एसपीजी वालों के रूखे व्यवहार का सामना करना पड़ा। बात इतनी तक होती तो गनीमत थी। लेकिन उस दिन तैनात एसपीजी वाले तकरीबन अपमानजनक व्यवहार ही कर रहे थे। इससे मेरा ठेठ गंवई मन उबाल खा गया और उनसे उलझ पड़ा। दिलचस्प बात यह है कि मेरे ठीक पहले हाथ में पास थामे रामजी बाबू के साथ भी एसपीजी वाले रूखा ही व्यवहार कर रहे थे। लेकिन जैसा कि उनका स्वभाव था, चेहरे पर हल्की मुस्कराहट लिए हुए इस अनपेक्षित व्यवहार को वे ऐसे टाल रहे थे, जैसे इस व्यवहार की उन्हें अपेक्षा ही थी। लेकिन मेरा उबाल खाना उन्हें थोड़ा असहज लगा और पीछे मुड़कर उन्होंने समझाया, ये तो पुलिस वाले हैं, आप क्यों अपना आपा खोते हैं और पीठ पर हाथ रखे मुझे लेकर अंदर चले गए। उनके इस अपनापाभरे व्यवहार ने मुझे अंदर तक भिगो दिया। उनकी सहजता और शालीनता मुझे अंदर तक भिगो गई। इसके बाद से उनका कायल हो गया। पत्रकारिता की दुनिया में वे कम ही विचरण करते थे। लेकिन कभी-कभी किसी मीटिंग-समारोह में आते तो मैं उनसे मिलने जाने की कोशिश कर ही रहा होता कि वे पास चले आते। हर बार मैं उनसे एक ही आग्रह करता था कि कुछ लिखिए। एक बार वरिष्ठ पत्रकार और भाई अवधेश कुमार ने मेरे आग्रह को सुनकर चुटीली टिप्पणी भी कर डाली थी- रामजी बाबू सन्यासी हो गए हैं। इसके जवाब में उनकी निश्छल मुस्कराहट ही रह गई थी।
बाद में जी न्यूज में जब ज्वाइन किया तो वहां एक अक्खड़ किस्म के सहयोगी से पल्ला पड़ा। शुरू के दिनों में उस शख्स से बचने की कोशिश करता। बाद में पता चला कि यह अक्खड़ सहयोगी रोहिताश्व तो अपने रामजी बाबू का ही बेटा है तो उनसे घनिष्ठता बढ़ गई। घनिष्ठता से ही पता चला कि रोहिताश्व की अक्खड़ता की असल वजह तो रामजी बाबू की सादगी और ईमानदारी ही है। जिसका उन्हें कम से कम कोई आर्थिक फायदा कभी नहीं मिला। ईमानदारी की राह पर चलते लोगों के सामने जब बेईमान लोग आगे बढ़ते हैं तो ईमानदार शख्स को भले ही परेशानी नहीं होती, लेकिन उसकी संतानों को ईमानदारी का औचित्य ही परेशान करने लगता है। सवालों का दिन रात का यह सामना ही उन्हें अक्खड़ और बदमिजाज बना देता है। बहरहाल रोहिताश्व से जानपहचान बढ़ने और तमाम वादों के बाद उसके घर नहीं जा सका। रामजी बाबू से उनके घर जाकर नहीं मिल पाया। पत्रकारिता जगत के इस मनीषी को घर जाकर देखने की इच्छा मन में ही रह गई। जो शख्स हिंदुस्तान समाचार जैसी एजेंसी का महाप्रबंधक रह चुका हो, इसके बावजूद वह मौजूदा सांसारिक माया से निर्लिप्त रह पाया हो, ऐसा कम ही होता है। रामजी बाबू उसी धारा के पत्रकार थे। भारतीय पत्रकारिता की आज भी अगर नाक ऊंची है तो उसमें रामजी बाबू जैसे पत्रकारों का योगदान और त्याग सबसे ज्यादा है।
नियति ने लेखन और पत्रकारिता की दुनिया में ढकेलने का निश्चय कर लिया था, शायद यही वजह है कि पाठ्यक्रम से इतर किताबें और पत्रिकाओं के पढ़ने का चस्का कम ही उम्र में लग गया था। पूर्वी उत्तर प्रदेश के आखिरी छोर पर स्थित बलिया में राजेंद्र प्रसाद के प्रतिभा प्रकाशन की वजह से देश-विदेश की अहम पत्रिकाएं मिलती रही थीं। इसी बुक स्टाल पर पहली बार हिंदी की स्थिति को लेकर शायद हिंदुस्तान में एक लेख पढ़ा था और उसके लेखक की भाषा ने जैसे मोह ही लिया था। बाद के दिनों में जब कादंबिनी से साबका पड़ा तो उस लेखक के सारगर्भित लेख गाहे-बगाहे पढ़ने को मिलने लगे। रामजी प्रसाद सिंह उर्फ रामजी बाबू से मानसिक परिचय की नींव ऐसे ही पड़ी। उन्हीं दिनों उनसे मिलने की इच्छा होने लगी थी। इसी बीच भारतीय जनसंचार संस्थान में दाखिला मिल गया और दिल्लीवासी हो गया। यहां पढ़ाई के दौरान पता चला कि रामजी बाबू यहां पढ़ा चुके हैं। लेकिन उनसे मुलाकात का सौभाग्य नहीं मिला। उनसे मुलाकात सबसे पहले 1995 में तब हुई, जब बनारस वाले रत्नाकर पांडे ने दिल्ली के विज्ञान भवन में राजीव गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन करवाया। जिसका तब के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उद्घाटन किया था। सुनहरीबाग मस्जिद के पास बस से उतरकर मैं जब मौलाना आजाद रोड पर विज्ञान भवन के लिए चला तो उसी वक्त मेरे आगे-आगे खद्दर का कुर्ता-पाजामा पहने एक बुजुर्ग शख्स चल रहे थे। मुझे तब तक पता नहीं था कि आगे-आगे चल रहे सज्जन वे रामजी बाबू हैं, जिनसे मिलने की इच्छा बरसों से मेरे मन में दबी हुई है। उनसे परिचय भी कुछ अजीब ढंग से हुआ। विज्ञान भवन में घुसते वक्त जैसी की रवायत है, एसपीजी वालों के रूखे व्यवहार का सामना करना पड़ा। बात इतनी तक होती तो गनीमत थी। लेकिन उस दिन तैनात एसपीजी वाले तकरीबन अपमानजनक व्यवहार ही कर रहे थे। इससे मेरा ठेठ गंवई मन उबाल खा गया और उनसे उलझ पड़ा। दिलचस्प बात यह है कि मेरे ठीक पहले हाथ में पास थामे रामजी बाबू के साथ भी एसपीजी वाले रूखा ही व्यवहार कर रहे थे। लेकिन जैसा कि उनका स्वभाव था, चेहरे पर हल्की मुस्कराहट लिए हुए इस अनपेक्षित व्यवहार को वे ऐसे टाल रहे थे, जैसे इस व्यवहार की उन्हें अपेक्षा ही थी। लेकिन मेरा उबाल खाना उन्हें थोड़ा असहज लगा और पीछे मुड़कर उन्होंने समझाया, ये तो पुलिस वाले हैं, आप क्यों अपना आपा खोते हैं और पीठ पर हाथ रखे मुझे लेकर अंदर चले गए। उनके इस अपनापाभरे व्यवहार ने मुझे अंदर तक भिगो दिया। उनकी सहजता और शालीनता मुझे अंदर तक भिगो गई। इसके बाद से उनका कायल हो गया। पत्रकारिता की दुनिया में वे कम ही विचरण करते थे। लेकिन कभी-कभी किसी मीटिंग-समारोह में आते तो मैं उनसे मिलने जाने की कोशिश कर ही रहा होता कि वे पास चले आते। हर बार मैं उनसे एक ही आग्रह करता था कि कुछ लिखिए। एक बार वरिष्ठ पत्रकार और भाई अवधेश कुमार ने मेरे आग्रह को सुनकर चुटीली टिप्पणी भी कर डाली थी- रामजी बाबू सन्यासी हो गए हैं। इसके जवाब में उनकी निश्छल मुस्कराहट ही रह गई थी।
बाद में जी न्यूज में जब ज्वाइन किया तो वहां एक अक्खड़ किस्म के सहयोगी से पल्ला पड़ा। शुरू के दिनों में उस शख्स से बचने की कोशिश करता। बाद में पता चला कि यह अक्खड़ सहयोगी रोहिताश्व तो अपने रामजी बाबू का ही बेटा है तो उनसे घनिष्ठता बढ़ गई। घनिष्ठता से ही पता चला कि रोहिताश्व की अक्खड़ता की असल वजह तो रामजी बाबू की सादगी और ईमानदारी ही है। जिसका उन्हें कम से कम कोई आर्थिक फायदा कभी नहीं मिला। ईमानदारी की राह पर चलते लोगों के सामने जब बेईमान लोग आगे बढ़ते हैं तो ईमानदार शख्स को भले ही परेशानी नहीं होती, लेकिन उसकी संतानों को ईमानदारी का औचित्य ही परेशान करने लगता है। सवालों का दिन रात का यह सामना ही उन्हें अक्खड़ और बदमिजाज बना देता है। बहरहाल रोहिताश्व से जानपहचान बढ़ने और तमाम वादों के बाद उसके घर नहीं जा सका। रामजी बाबू से उनके घर जाकर नहीं मिल पाया। पत्रकारिता जगत के इस मनीषी को घर जाकर देखने की इच्छा मन में ही रह गई। जो शख्स हिंदुस्तान समाचार जैसी एजेंसी का महाप्रबंधक रह चुका हो, इसके बावजूद वह मौजूदा सांसारिक माया से निर्लिप्त रह पाया हो, ऐसा कम ही होता है। रामजी बाबू उसी धारा के पत्रकार थे। भारतीय पत्रकारिता की आज भी अगर नाक ऊंची है तो उसमें रामजी बाबू जैसे पत्रकारों का योगदान और त्याग सबसे ज्यादा है।
शनिवार, 5 फ़रवरी 2011
प्यार भरे स्वाभिमान को तरसती भारतीय भाषाएं
उमेश चतुर्वेदी
चिली की राष्ट्रपति डॉक्टर मिशेल बास्लेट गणतंत्र दिवस के ठीक पहले भारत के दौरे पर थीं। चूंकि पांच साल बाद चिली का कोई इतना बड़ा नेता भारत के दौरे पर था, लिहाजा उनके सम्मान में भारत सरकार की ओर से कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी गई। उनके सम्मान में उपराष्ट्रपति डॉक्टर हामिद अंसारी ने एक भोज दिया। जैसी की रवायत है, भोज के पहले मेजबान और मेहमान दोनों ने औपचारिक बयान दिया। लेकिन उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के बयान देते ही एक ऐसी घटना हो गई, जिसे लेकर वहां कुछ देर तक सन्नाटा छा गया। हमारे नेता विदेशी नेताओं और मेहमानों के समक्ष अंग्रेजी में ही बोलने के आदी रहे हैं। उपराष्ट्रपति ने उसी परंपरा का निर्वाह किया और औपचारिक बयान अंग्रेजी में ही देने लगे। उनके ऐसा करते ही डॉ.बास्लेट के लिए चिली सरकार की तरफ से दुभाषिया तैनात था। वह दुभाषिया कामचलाऊ अंग्रेजी ही जानता था। उसे हिंदी और स्पेनिश ही आती थी। उपराष्ट्रपति ने बयान पढ़ना शुरू क्या किया, दुभाषिया ने टूटी-फूटी अंग्रेजी में उसे टोक दिया। उसने कहा कि उसकी राष्ट्रभाषा स्पेनिश है। चिली दुभाषिये न उपराष्ट्रपति से अनुरोध किया कि उसकी राष्ट्रपति चूंकि अंग्रेजी नहीं जानती, लिहाजा बेहतर हो कि वे स्पेनिश या हिंदी में बोलें। क्योंकि हिंदी से वह अनुवाद कर सकता था। इसके आगे क्या हुआ, इसका जिक्र किया जाना यहां ज्यादा जरूरी नहीं है।
सोचने की बात यह है कि क्या ऐसी घटनाओं से हम भारतीयों को कोई सीख मिलती है। राजनेताओं को गलियाना और उनकी लानत-मलामत करना तो हमारी दिनचर्या में शामिल है ही। लेकिन हम खुद भी ऐसी घटनाओं के लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं। हमें अपनी श्रेष्ठताबोध के प्रदर्शन का एक ही जरिया नजर आता है अंग्रेजी। नव उदार आर्थिक-सामाजिक परिवेश में अंग्रेजी का बोलबाला कुछ ज्यादा बढ़ गया है। बाजार की अब तक की मजबूरी हिंदी समेत भारतीय भाषाएं हैं। लिहाजा बाजार इन्हें अपने उत्पाद को बेचने के लिए इन भाषाओं का इस्तेमाल भर कर रहा है। चूंकि नई बाजार व्यवस्था में चूंकि उत्पाद को विज्ञापन के जरिए ही अपने लक्ष्य समूह तक पहुंचाया जा सकता है, इसलिए भारतीय भाषाओं में विज्ञापन बनाया जा रहा है और उन्हें देसी मीडिया के जरिए ही फैलाया जा रहा है। भारतीय भाषाओं के मीडिया के विस्तार की एक वजह यह भी है। लेकिन हमारा ध्यान इस ओर नहीं है। वैसे भी बाजार का एक नियम होता है, अपने उत्पाद को बेहतर बनाना। चूंकि भाषाएं भी इस नव बाजारवादी व्यवस्था में एक उत्पाद बन रही हैं, लिहाजा इन्हें बेहतर बनाने की उम्मीद पालना बेमानी नहीं है। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि भाषाओं के मामले में बेहतर बनाने की कोशिश नहीं की जा रही है। इस पूरे उहापोह में अंग्रेजी की बन आई है। सुदूर गाजीपुर में रहकर रचनाकर रहे विवेकी राय अंग्रेजी के इस विकास को नव उपनिवेशवाद मानते हैं। हिंदी का भला चाहने वालों की भी राय कुछ अलग नहीं है। लेकिन अंग्रेजी का यह जनविस्तार बढ़ता जा रहा है। इसलिए इन दिनों एक राय कमोबेश पूरे देश में बन गई है कि अंग्रेजी पढ़-बोलकर ही मलाई खाई जा सकती है।
अंग्रेजी बोध के विस्तार का यह बीज अंग्रेजीदां राजनेताओं ने ही बोया था, जो अब फैल गया है। संविधान में यह कहीं नहीं लिखा कि अंग्रेजी नहीं जानने वाला प्रधानमंत्री नहीं बन पाएगा। लेकिन 1989 में जब देवीलाल जनता दल के नेता चुने गए तो उन्होंने यह कहते हुए ताज वीपी सिंह के सिर रख दिया था कि उन्हें अंग्रेजी नहीं आती और प्रधानमंत्री बनने वाले को अंग्रेजी आनी चाहिए। अंग्रेजी के प्रति राजनीति की असल चाहत को बयां करने के लिए यह एक घटना काफी है। यही वजह है कि विदेशी राजनेताओं के सामने वे अपनी भाषा के अपमान की कीमत पर भी अंग्रेजी में बोलना पसंद करते हैं। ऐसे लोगों के लिए चिली की राष्ट्रपति मिशेल बास्लेट नजीर बन सकती हैं। दस-बारह साल पहले कजाकिस्तान के राष्ट्रपति साहित्य अकादमी के संवत्सर व्याख्यान देने आए थे। लोगों को लगता था कि विदेशी होने के नाते उनका भाषण अंग्रेजी में होगा, लेकिन उन्हें अंग्रेजी नहीं आती थी और उन्होंने अपना भाषण कजाक भाषा में ही दिया। अपनी भाषा के प्रति प्रेम को फ्रांस में भी देखा जा सकता है। दो साल पहले विश्वबैंक की एक बैठक से फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी इसलिए बाहर निकल गए थे, क्योंकि वहां फ्रांसीसी मूल का विश्वबैंक का एक अधिकारी फ्रेंच की बजाय अंग्रेजी में बोल रहा था। इन उदाहरणों का मकसद भाषाओं के प्रति कट्टरता की हद तक प्यार फैलाना नहीं है, बल्कि ये समझाने की कोशिश भर है कि अपनी भाषाओं के प्रति दुनिया के गैरअंग्रेजी भाषी देशों में कितना सम्मान और प्यार है। बेहतर तो यह होता कि हम भी अपने भाषाओं में ऐसा ही प्यारभरा स्वाभिमान भर पाते।
चिली की राष्ट्रपति डॉक्टर मिशेल बास्लेट गणतंत्र दिवस के ठीक पहले भारत के दौरे पर थीं। चूंकि पांच साल बाद चिली का कोई इतना बड़ा नेता भारत के दौरे पर था, लिहाजा उनके सम्मान में भारत सरकार की ओर से कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी गई। उनके सम्मान में उपराष्ट्रपति डॉक्टर हामिद अंसारी ने एक भोज दिया। जैसी की रवायत है, भोज के पहले मेजबान और मेहमान दोनों ने औपचारिक बयान दिया। लेकिन उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के बयान देते ही एक ऐसी घटना हो गई, जिसे लेकर वहां कुछ देर तक सन्नाटा छा गया। हमारे नेता विदेशी नेताओं और मेहमानों के समक्ष अंग्रेजी में ही बोलने के आदी रहे हैं। उपराष्ट्रपति ने उसी परंपरा का निर्वाह किया और औपचारिक बयान अंग्रेजी में ही देने लगे। उनके ऐसा करते ही डॉ.बास्लेट के लिए चिली सरकार की तरफ से दुभाषिया तैनात था। वह दुभाषिया कामचलाऊ अंग्रेजी ही जानता था। उसे हिंदी और स्पेनिश ही आती थी। उपराष्ट्रपति ने बयान पढ़ना शुरू क्या किया, दुभाषिया ने टूटी-फूटी अंग्रेजी में उसे टोक दिया। उसने कहा कि उसकी राष्ट्रभाषा स्पेनिश है। चिली दुभाषिये न उपराष्ट्रपति से अनुरोध किया कि उसकी राष्ट्रपति चूंकि अंग्रेजी नहीं जानती, लिहाजा बेहतर हो कि वे स्पेनिश या हिंदी में बोलें। क्योंकि हिंदी से वह अनुवाद कर सकता था। इसके आगे क्या हुआ, इसका जिक्र किया जाना यहां ज्यादा जरूरी नहीं है।
सोचने की बात यह है कि क्या ऐसी घटनाओं से हम भारतीयों को कोई सीख मिलती है। राजनेताओं को गलियाना और उनकी लानत-मलामत करना तो हमारी दिनचर्या में शामिल है ही। लेकिन हम खुद भी ऐसी घटनाओं के लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं। हमें अपनी श्रेष्ठताबोध के प्रदर्शन का एक ही जरिया नजर आता है अंग्रेजी। नव उदार आर्थिक-सामाजिक परिवेश में अंग्रेजी का बोलबाला कुछ ज्यादा बढ़ गया है। बाजार की अब तक की मजबूरी हिंदी समेत भारतीय भाषाएं हैं। लिहाजा बाजार इन्हें अपने उत्पाद को बेचने के लिए इन भाषाओं का इस्तेमाल भर कर रहा है। चूंकि नई बाजार व्यवस्था में चूंकि उत्पाद को विज्ञापन के जरिए ही अपने लक्ष्य समूह तक पहुंचाया जा सकता है, इसलिए भारतीय भाषाओं में विज्ञापन बनाया जा रहा है और उन्हें देसी मीडिया के जरिए ही फैलाया जा रहा है। भारतीय भाषाओं के मीडिया के विस्तार की एक वजह यह भी है। लेकिन हमारा ध्यान इस ओर नहीं है। वैसे भी बाजार का एक नियम होता है, अपने उत्पाद को बेहतर बनाना। चूंकि भाषाएं भी इस नव बाजारवादी व्यवस्था में एक उत्पाद बन रही हैं, लिहाजा इन्हें बेहतर बनाने की उम्मीद पालना बेमानी नहीं है। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि भाषाओं के मामले में बेहतर बनाने की कोशिश नहीं की जा रही है। इस पूरे उहापोह में अंग्रेजी की बन आई है। सुदूर गाजीपुर में रहकर रचनाकर रहे विवेकी राय अंग्रेजी के इस विकास को नव उपनिवेशवाद मानते हैं। हिंदी का भला चाहने वालों की भी राय कुछ अलग नहीं है। लेकिन अंग्रेजी का यह जनविस्तार बढ़ता जा रहा है। इसलिए इन दिनों एक राय कमोबेश पूरे देश में बन गई है कि अंग्रेजी पढ़-बोलकर ही मलाई खाई जा सकती है।
अंग्रेजी बोध के विस्तार का यह बीज अंग्रेजीदां राजनेताओं ने ही बोया था, जो अब फैल गया है। संविधान में यह कहीं नहीं लिखा कि अंग्रेजी नहीं जानने वाला प्रधानमंत्री नहीं बन पाएगा। लेकिन 1989 में जब देवीलाल जनता दल के नेता चुने गए तो उन्होंने यह कहते हुए ताज वीपी सिंह के सिर रख दिया था कि उन्हें अंग्रेजी नहीं आती और प्रधानमंत्री बनने वाले को अंग्रेजी आनी चाहिए। अंग्रेजी के प्रति राजनीति की असल चाहत को बयां करने के लिए यह एक घटना काफी है। यही वजह है कि विदेशी राजनेताओं के सामने वे अपनी भाषा के अपमान की कीमत पर भी अंग्रेजी में बोलना पसंद करते हैं। ऐसे लोगों के लिए चिली की राष्ट्रपति मिशेल बास्लेट नजीर बन सकती हैं। दस-बारह साल पहले कजाकिस्तान के राष्ट्रपति साहित्य अकादमी के संवत्सर व्याख्यान देने आए थे। लोगों को लगता था कि विदेशी होने के नाते उनका भाषण अंग्रेजी में होगा, लेकिन उन्हें अंग्रेजी नहीं आती थी और उन्होंने अपना भाषण कजाक भाषा में ही दिया। अपनी भाषा के प्रति प्रेम को फ्रांस में भी देखा जा सकता है। दो साल पहले विश्वबैंक की एक बैठक से फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी इसलिए बाहर निकल गए थे, क्योंकि वहां फ्रांसीसी मूल का विश्वबैंक का एक अधिकारी फ्रेंच की बजाय अंग्रेजी में बोल रहा था। इन उदाहरणों का मकसद भाषाओं के प्रति कट्टरता की हद तक प्यार फैलाना नहीं है, बल्कि ये समझाने की कोशिश भर है कि अपनी भाषाओं के प्रति दुनिया के गैरअंग्रेजी भाषी देशों में कितना सम्मान और प्यार है। बेहतर तो यह होता कि हम भी अपने भाषाओं में ऐसा ही प्यारभरा स्वाभिमान भर पाते।
शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011
लोहिया की भविष्यवाणी नहीं, हमारा नजरिया कमजोर है
उमेश चतुर्वेदी
मशहूर इतिहासकार रामचंद्र गुहा की हाल ही में एक किताब आई है ‘दी मेकर्स ऑफ मॉडर्न इंडिया ’। गुहा ने इस किताब में मौजूदा भारत के निर्माण में योगदान देने वाले राजनेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की जिंदगी और उनके कामों की विश्लेषणात्मक जानकारी दी है। इस किताब में अगर डॉक्टर राममनोहर लोहिया का जिक्र नहीं होता तो आश्चर्य की बात होती। लोहिया का जिक्र हुआ है। इसमें अंग्रेजी को लेकर उनके एक कथन को रामचंद्र गुहा उद्धृत करने से रोक नहीं पाए हैं। अंग्रेजी को लेकर लोहिया का वह कथन है - "नदी अपनी धारा बदलेगी, अंग्रेजी निरर्थक हो जाएगी। रूसी भाषा लम्बे डग भरेगी। कुछ समय बाद रूसी भाषा इसी तरह इठलाएगी। रूसी व अंग्रेजी भाषा के बीच आगे बढ़ने का द्वंद्व होगा। अंग्रेजी अन्तरराष्ट्रीय स्तर की भाषा है, यह मिथक ही रह जाएगा। ”
भारतीय राजनीति में एक पीढ़ी ऐसी रही है, जिसके लिए हिंदी ना सिर्फ देसी सम्मान, बल्कि संघर्ष की भाषा रही है। लेकिन समय के साथ वह पीढ़ी लगातार खत्म होती जा रही है। ऐसे में हिंदी के लिए खालिस देसी ढंग से संघर्ष का माद्दा खत्म होता नजर आ रहा है। हालांकि एक वर्ग ऐसा जरूर है, जिसके लिए मीडिया में हिंदी का बढ़ता प्रभाव, और हिंदी मीडिया का दैत्याकार विकास उनके हीनताबोध को एक हद तक परे रखने का जरिया बनता है। इन्हीं में हिंदी मीडिया और संस्कृति की दुनिया में विचरण करने और अपनी रोजी-रोटी कमाने वाला वर्ग भी शामिल है। उसे जब अंग्रेजियत भरा समाज अपने साथ बुलाता है, बैठाकर उसे सुनता है तो वह एक बारगी हिंदी को महत्व मिलते देखता है। फिर वह हिंदी के जयगान में कूद पड़ता है। खालिस अंग्रेजी ढंग से शुरू हुए जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में इस साल हिंदी साहित्यकारों और समीक्षकों को अपनी तकरीर सुनाने का मौका मिला तो उसे महसूस हुआ कि अंग्रेजी के सामने हिंदी भाषा की स्वीकारोक्ति का दौर शुरू हो गया है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों की आर्थिक मदद के सहारे शुरू हुए इस लिटरेचर फेस्टिवल में हिंदी को भी मंच पर बैठाकर सुनने के सम्मान लायक समझा गया तो उसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इसी दौर में भारतीय प्रधानमंत्री को सरकारी बाबुओं की अंग्रेजी में खराब ड्रॉफ्टिंग से कोफ्त होने लगी है। उन्हें सड़कों के किनारे सार्वजनिक निर्माण विभाग, परिवहन निगम या नगर निगमों के लगाए साइन बोर्डों पर हिंदी की टूटती टांग तो नहीं दिखी। लेकिन बाबुओं की खराब अंग्रेजी ड्रॉफ्टिंग परेशान जरूर करने लगी है। इसलिए कैबिनेट सचिव के एम चंद्रशेखर के जरिए ड्रॉफ्टिंग सुधारने का फरमान जारी कराना उन्हें बेहद जरूरी काम लगता है। ऐसे में क्या यह मान लिया जाय़ कि राममनोहर लोहिया की भविष्यवाणी गलत साबित होने वाली है। भारतीय राजनीति से गायब होती हिंदी समर्थक संघर्षशील राजनीतिक पीढ़ी के अल्पसंख्यक होते लोग भले ही ऐसा नहीं मानते, लेकिन ऑक्सफोर्ड या दूसरे विदेशी संस्थानों से निकलकर देसी राजनीति करने का स्वांग करने वाली पीढ़ी को लोहिया के ये विचार बेमानी नजर आने लगे हैं। उन्हें लगने लगा है कि भारत के अंग्रेजी ज्ञान के ही चलते बराक ओबामा को भारत की चौखट पर नाक रगड़ना पड़ा या फिर डेविड कैमरून पाकिस्तान को चेतावनी देने लगे या फिर चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ को भारत आना पड़ा।
तर्कशास्त्री सत्य को दो रूपों में देखते हैं। इस लिहाज से देखा जाय तो एक सचाई तो यह है ही। लेकिन पूरी सचाई यही नहीं है। दिल्ली स्थित स्पेनिश सांस्कृतिक केंद्र के निदेशक ऑस्कर पुजोल जब यह कहते हैं कि हिंदी में क्षमता है, दम है और सुंदरता भी तो वह भी एक सत्य को ही उजागर कर रहे होते हैं। उनका कहना है कि यह मिथ है कि दुनिया में अंग्रेजी सबसे ज्यादा बोली और समझी जाने वाली भाषा है और कार्य-व्यापार में उसका इस्तेमाल होता है तो यह भी आधा सच ही होता है। हालांकि नव उदारवादी व्यवस्था से निकले भारतीय समाज इसी तर्क के सहारे ही अंग्रेजी की ताकत को बढ़ा रहा है और राम मनोहर लोहिया की भविष्यवाणी पर सवाल उठा रहा है। लेकिन पुजॉल का कहना है कि स्पेनिश अंग्रेजी से कहीं ज्यादा कार्यव्यापार की भाषा है।
हाल ही में जारी इंटरनेट वर्ल्ड स्टेट्स के आँकड़े भी दूसरे अर्थ में पुजोल की ही बात को आगे बढ़ाते हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक अगले पांच साल में इंटरनेट की दुनिया में चीनी भाषा अंग्रेजी भाषा को पछाड़ देगी। इस रिपोर्ट के अनुसार चीन में पिछले वर्ष 2010 में 3.6 करोड नए इंटरनेट उपभोक्ता बढ़े। इस तरह से चीन के इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या अब 44 करोड तक पहुँच गई है। जबकि इंटरनेट के जन्मदाता अमेरिका में ही उसके उपयोगकर्ताओं की संख्या 22 करोड ही है। वैसे अंग्रेजी का उपयोग करने वाले लोग ना केवल अमेरिका बल्कि यूरोप, एशिया,ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में भी हैं, लेकिन वैश्विक आँकडों पर गौर करें तो भी अंग्रेजी के उपयोगकर्ताओं की संख्या 53.7 करोड ही है. दूसरी तरफ चीनी भाषा के उपयोगकर्ताओ की संख्या 44 करोड है। इस रिपोर्ट के मुताबिक
दुनिया भर में इंटरनेट उपयोग करने वाले लोगों का 42 फीसदी अंग्रेजी भाषी है, और इतना ही प्रतिशत चीनी भाषी भी है। इस तरह से इंटरनेट पर चीनी भाषा के और विकसित होनी की पूरी सम्भावना है। भारतीय राजनेताओं को राममनोहर लोहिया की भविष्यवाणी भले ही पूरी होती नजर नहीं आ रही हो, लेकिन इंटरनेट की दुनिया के ये आंकड़े तो उसकी तसदीक ही कर रहे हैं।
तकनीक भाषा को भी बदलती है। यह सच है कि अपने यहां राजकाज और ताकत की भाषा अभी तक अंग्रेजी ही बनी हुई है। पश्चिमी सोच वाले कथित पैराटूपर लोकतांत्रिक राजनेताओं की खेप को अंग्रेजी में ही काम करना सुविधाजनक लगता है। लिहाजा हकीकत की धरती पर वे हिंदी की दिशा में कदम नहीं उठाना चाहते। लेकिन इंटरनेट वर्ल्ड की रिपोर्ट में चीन के लिए कहा गया है कि वहां के राजनेताओं ने अपनी भाषा में इंटरनेट के विकास के लिए जो कदम उठाए हैं, उसका ही असर होगा कि पांच साल में इंटरनेट की दुनिया की नंबर वन भाषा उनकी अपनी चीनी ही होगी। इन अर्थों में अपने प्रधानमंत्री का आदेश जहां भारत की अपनी लचर भाषा नीति को ही आईना दिखाता नजर आता है। लिटरेचर फेस्टिवलों में बुलावा मिलने की धुंध में इसे लोग देखना भी नहीं चाहते। बेहतर तो यह होता कि दोनों ही हालात से बचने की कोशिश होती।
मशहूर इतिहासकार रामचंद्र गुहा की हाल ही में एक किताब आई है ‘दी मेकर्स ऑफ मॉडर्न इंडिया ’। गुहा ने इस किताब में मौजूदा भारत के निर्माण में योगदान देने वाले राजनेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की जिंदगी और उनके कामों की विश्लेषणात्मक जानकारी दी है। इस किताब में अगर डॉक्टर राममनोहर लोहिया का जिक्र नहीं होता तो आश्चर्य की बात होती। लोहिया का जिक्र हुआ है। इसमें अंग्रेजी को लेकर उनके एक कथन को रामचंद्र गुहा उद्धृत करने से रोक नहीं पाए हैं। अंग्रेजी को लेकर लोहिया का वह कथन है - "नदी अपनी धारा बदलेगी, अंग्रेजी निरर्थक हो जाएगी। रूसी भाषा लम्बे डग भरेगी। कुछ समय बाद रूसी भाषा इसी तरह इठलाएगी। रूसी व अंग्रेजी भाषा के बीच आगे बढ़ने का द्वंद्व होगा। अंग्रेजी अन्तरराष्ट्रीय स्तर की भाषा है, यह मिथक ही रह जाएगा। ”
भारतीय राजनीति में एक पीढ़ी ऐसी रही है, जिसके लिए हिंदी ना सिर्फ देसी सम्मान, बल्कि संघर्ष की भाषा रही है। लेकिन समय के साथ वह पीढ़ी लगातार खत्म होती जा रही है। ऐसे में हिंदी के लिए खालिस देसी ढंग से संघर्ष का माद्दा खत्म होता नजर आ रहा है। हालांकि एक वर्ग ऐसा जरूर है, जिसके लिए मीडिया में हिंदी का बढ़ता प्रभाव, और हिंदी मीडिया का दैत्याकार विकास उनके हीनताबोध को एक हद तक परे रखने का जरिया बनता है। इन्हीं में हिंदी मीडिया और संस्कृति की दुनिया में विचरण करने और अपनी रोजी-रोटी कमाने वाला वर्ग भी शामिल है। उसे जब अंग्रेजियत भरा समाज अपने साथ बुलाता है, बैठाकर उसे सुनता है तो वह एक बारगी हिंदी को महत्व मिलते देखता है। फिर वह हिंदी के जयगान में कूद पड़ता है। खालिस अंग्रेजी ढंग से शुरू हुए जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में इस साल हिंदी साहित्यकारों और समीक्षकों को अपनी तकरीर सुनाने का मौका मिला तो उसे महसूस हुआ कि अंग्रेजी के सामने हिंदी भाषा की स्वीकारोक्ति का दौर शुरू हो गया है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों की आर्थिक मदद के सहारे शुरू हुए इस लिटरेचर फेस्टिवल में हिंदी को भी मंच पर बैठाकर सुनने के सम्मान लायक समझा गया तो उसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इसी दौर में भारतीय प्रधानमंत्री को सरकारी बाबुओं की अंग्रेजी में खराब ड्रॉफ्टिंग से कोफ्त होने लगी है। उन्हें सड़कों के किनारे सार्वजनिक निर्माण विभाग, परिवहन निगम या नगर निगमों के लगाए साइन बोर्डों पर हिंदी की टूटती टांग तो नहीं दिखी। लेकिन बाबुओं की खराब अंग्रेजी ड्रॉफ्टिंग परेशान जरूर करने लगी है। इसलिए कैबिनेट सचिव के एम चंद्रशेखर के जरिए ड्रॉफ्टिंग सुधारने का फरमान जारी कराना उन्हें बेहद जरूरी काम लगता है। ऐसे में क्या यह मान लिया जाय़ कि राममनोहर लोहिया की भविष्यवाणी गलत साबित होने वाली है। भारतीय राजनीति से गायब होती हिंदी समर्थक संघर्षशील राजनीतिक पीढ़ी के अल्पसंख्यक होते लोग भले ही ऐसा नहीं मानते, लेकिन ऑक्सफोर्ड या दूसरे विदेशी संस्थानों से निकलकर देसी राजनीति करने का स्वांग करने वाली पीढ़ी को लोहिया के ये विचार बेमानी नजर आने लगे हैं। उन्हें लगने लगा है कि भारत के अंग्रेजी ज्ञान के ही चलते बराक ओबामा को भारत की चौखट पर नाक रगड़ना पड़ा या फिर डेविड कैमरून पाकिस्तान को चेतावनी देने लगे या फिर चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ को भारत आना पड़ा।
तर्कशास्त्री सत्य को दो रूपों में देखते हैं। इस लिहाज से देखा जाय तो एक सचाई तो यह है ही। लेकिन पूरी सचाई यही नहीं है। दिल्ली स्थित स्पेनिश सांस्कृतिक केंद्र के निदेशक ऑस्कर पुजोल जब यह कहते हैं कि हिंदी में क्षमता है, दम है और सुंदरता भी तो वह भी एक सत्य को ही उजागर कर रहे होते हैं। उनका कहना है कि यह मिथ है कि दुनिया में अंग्रेजी सबसे ज्यादा बोली और समझी जाने वाली भाषा है और कार्य-व्यापार में उसका इस्तेमाल होता है तो यह भी आधा सच ही होता है। हालांकि नव उदारवादी व्यवस्था से निकले भारतीय समाज इसी तर्क के सहारे ही अंग्रेजी की ताकत को बढ़ा रहा है और राम मनोहर लोहिया की भविष्यवाणी पर सवाल उठा रहा है। लेकिन पुजॉल का कहना है कि स्पेनिश अंग्रेजी से कहीं ज्यादा कार्यव्यापार की भाषा है।
हाल ही में जारी इंटरनेट वर्ल्ड स्टेट्स के आँकड़े भी दूसरे अर्थ में पुजोल की ही बात को आगे बढ़ाते हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक अगले पांच साल में इंटरनेट की दुनिया में चीनी भाषा अंग्रेजी भाषा को पछाड़ देगी। इस रिपोर्ट के अनुसार चीन में पिछले वर्ष 2010 में 3.6 करोड नए इंटरनेट उपभोक्ता बढ़े। इस तरह से चीन के इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या अब 44 करोड तक पहुँच गई है। जबकि इंटरनेट के जन्मदाता अमेरिका में ही उसके उपयोगकर्ताओं की संख्या 22 करोड ही है। वैसे अंग्रेजी का उपयोग करने वाले लोग ना केवल अमेरिका बल्कि यूरोप, एशिया,ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में भी हैं, लेकिन वैश्विक आँकडों पर गौर करें तो भी अंग्रेजी के उपयोगकर्ताओं की संख्या 53.7 करोड ही है. दूसरी तरफ चीनी भाषा के उपयोगकर्ताओ की संख्या 44 करोड है। इस रिपोर्ट के मुताबिक
दुनिया भर में इंटरनेट उपयोग करने वाले लोगों का 42 फीसदी अंग्रेजी भाषी है, और इतना ही प्रतिशत चीनी भाषी भी है। इस तरह से इंटरनेट पर चीनी भाषा के और विकसित होनी की पूरी सम्भावना है। भारतीय राजनेताओं को राममनोहर लोहिया की भविष्यवाणी भले ही पूरी होती नजर नहीं आ रही हो, लेकिन इंटरनेट की दुनिया के ये आंकड़े तो उसकी तसदीक ही कर रहे हैं।
तकनीक भाषा को भी बदलती है। यह सच है कि अपने यहां राजकाज और ताकत की भाषा अभी तक अंग्रेजी ही बनी हुई है। पश्चिमी सोच वाले कथित पैराटूपर लोकतांत्रिक राजनेताओं की खेप को अंग्रेजी में ही काम करना सुविधाजनक लगता है। लिहाजा हकीकत की धरती पर वे हिंदी की दिशा में कदम नहीं उठाना चाहते। लेकिन इंटरनेट वर्ल्ड की रिपोर्ट में चीन के लिए कहा गया है कि वहां के राजनेताओं ने अपनी भाषा में इंटरनेट के विकास के लिए जो कदम उठाए हैं, उसका ही असर होगा कि पांच साल में इंटरनेट की दुनिया की नंबर वन भाषा उनकी अपनी चीनी ही होगी। इन अर्थों में अपने प्रधानमंत्री का आदेश जहां भारत की अपनी लचर भाषा नीति को ही आईना दिखाता नजर आता है। लिटरेचर फेस्टिवलों में बुलावा मिलने की धुंध में इसे लोग देखना भी नहीं चाहते। बेहतर तो यह होता कि दोनों ही हालात से बचने की कोशिश होती।
शनिवार, 29 जनवरी 2011
साधनों की पवित्रता पर भी उठे सवाल
उमेश चतुर्वेदी
गांधी जी कहा करते थे कि सर्वोत्तम साध्य के लिए साधन भी पवित्र होना चाहिए। उदारीकरण का दायरा आज इतना बढ़ गया है कि हर नया और बेहतर साध्य हासिल करने की इच्छा रखने वाले लोगों के सामने संकट खड़ा हो गया है। उदारीकरण का चपेटा इतना बड़ा और गहरा है कि पवित्र साधनों की जमात लगातार कम हुई है। लेकिन मानवता आधारित दुनिया रचने की सफल-असफल कोशिशों में जुटी छिटफुट ताकतों और आत्माओं के लिए पवित्रता की गांधीवादी धारणा लगातार परेशान कर रही है। 27 जनवरी को खत्म हुए बहुप्रचारित जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की शुरूआत में भी पवित्रता की इस अवधारणा ने सवाल जरूर खड़े किए। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि सवाल उठाने वाले क्रांतिजीवियों की ही बातों को उन्हीं के बीच के लोगों ने उपहासात्मक स्वर में नकार दिया। सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिन्होंने साधनों की अपवित्रता के जरिए इस लिटरेचर फेस्टिवल के बहिस्कार का मजाक उड़ाया, दरअसल वे लोग भी क्रांतिजीवी के तौर पर ही जाने जाते हैं। लेकिन बहिस्कार और विरोध की अपील करने वाले लोगों और उपहास उड़ाने वाले लोगों में अंतर सिर्फ इतना ही है कि उपहास उड़ाने वाले लोगों को इस बहुप्रचारित और बहुप्रतिष्ठित समारोह के विमर्श सत्रों में बोलने के लिए बुलाया गया था।
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल को सदा की तरह इस बार भी हिंदी मीडिया ने भी जमकर कवरेज दी। जहां नोबेल पुरस्कार विजेता साहित्यकार ओरहान पामुक आएंगे, अंग्रेजी की स्टार लेखिका किरण देसाई होंगी, अपने स्वभाव के मुताबिक अंग्रेजी मीडिया इसकी कवरेज करेगा ही। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि इस बार हिंदी मीडिया ने भी इस बार इस फेस्टिवल में चले विमर्श सत्रों और पाठ सत्रों की खबरें प्रकाशित करने में कंजूसी नहीं दिखाई। वैसे भी हमारी हिंदी मीडिया को अपनी भाषा के लेखकों की तुलना में अंग्रेजी के रचनाकार ज्यादा बड़े स्टार नजर आते हैं, लिहाजा उनकी कवरेज उन्हें गौरवबोध से भर देता है। इस गौरवबोध में विरोध के सुर और उनके मुद्दे कहीं खो गए। विरोध करने वालों को इस फेस्टिवल के तीन प्रायोजकों के नामों पर खास आपत्ति थी। इस फेस्टिवल के एक आयोजक डीएससी लिमिटेड पर दिल्ली के कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान बाजार दर से 23 फीसद ज्यादा दरों पर ठेके मिले। इसकी तस्दीक देश का सतर्कता आयोग कर चुका है। इसके दूसरे प्रायोजक दुनिया की जानी-मानी खनन कंपनी रियो-टिंटो से भी सहायता लेने पर आपत्ति रही। विरोधियों का मानना है कि रियो-टिंटों दुनियाभर में अवैध तरीकों से ना सिर्फ खनन के ठेके हथियाती है, बल्कि वह नस्ली और फासिस्ट ताकतों की सहायता भी करती है। इसके साथ ही उस पर अमानवीय तरीके से श्रम कानूनों का उल्लंघन करने और पर्यावरण अधिकारों से खिलवाड़ का भी आरोप है। विरोधियों को इस आयोजन के तीसरे प्रायोजक शेल ऑयल कंपनी के प्रायोजन पर भी एतराज रहा। दुनिया की इस सबसे बड़ी ऊर्जा कंपनी पर नाइजीरिया के लेखक और पर्यावरण कार्यकर्ता केन सारो वीवा की हत्या कराने का आरोप है। इन आरोपों के मद्देनजर इस फेस्टिवल का विरोध करने की कोशिश तो हुई, लेकिन एक हद से आगे नहीं बढ़ पाई। नई मीडिया यानी इंटरनेट पत्रकारिता की इन दिनों कम से कम हिंदी में ऐसे विषयों पर गरमा-गरम बहसों के लिए पहचान बन गई है। हिंदी की नई मीडिया को यह पहचान दिलाने में क्रांतिजीवी वैचारिक धारा की सबसे बड़ी भूमिका रही है। इसके बावजूद जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल को लेकर कहीं कोई बहस और चर्चा नहीं देखने को नहीं मिली।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक बहरहाल जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल को जनता ने खूब सराहा है। इसमें लेखकों से ज्यादा प्रदर्शनकारी कलाओं मसलन फिल्म और संगीत से जुड़ी हस्तियों की उपस्थिति का ज्यादा योगदान रहा है। प्रदर्शनकारी कलाओं और टेलीविजन के स्टारों के जरिए ही अगर साहित्य को लेकर एक माहौल बनता है, जनता उसे स्वीकार करती है तो उसकी प्रशंसा की ही जानी चाहिए। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि इस महोत्सव को लेकर उठे सवालों पर चर्चा भी न की जाए। लोकतांत्रिक समाज में महान साहित्यिक परंपराएं जारी रखने के लिए उदात्त वैचारिक बहसें भी जरूरी होती हैं। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल का ‘जयगान’ करने वालों को भी इसे स्वीकार करने से नहीं हिचकना चाहिए। क्योंकि उनके अस्वीकार बोध से विरोधियों के उठाए सवाल अप्रासंगिक नहीं हो जाते। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की कामयाबी के जरिए डीएससी लिमिटेड, रियो टिंटो या शेल ऑयल कंपनी जैसी कंपनिया अपने अनाचारों को जनमानस की स्मृतियों से लोप करके नई छवि गढ़ने की कोशिश करती हैं। इन तथ्यों से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
गांधी जी कहा करते थे कि सर्वोत्तम साध्य के लिए साधन भी पवित्र होना चाहिए। उदारीकरण का दायरा आज इतना बढ़ गया है कि हर नया और बेहतर साध्य हासिल करने की इच्छा रखने वाले लोगों के सामने संकट खड़ा हो गया है। उदारीकरण का चपेटा इतना बड़ा और गहरा है कि पवित्र साधनों की जमात लगातार कम हुई है। लेकिन मानवता आधारित दुनिया रचने की सफल-असफल कोशिशों में जुटी छिटफुट ताकतों और आत्माओं के लिए पवित्रता की गांधीवादी धारणा लगातार परेशान कर रही है। 27 जनवरी को खत्म हुए बहुप्रचारित जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की शुरूआत में भी पवित्रता की इस अवधारणा ने सवाल जरूर खड़े किए। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि सवाल उठाने वाले क्रांतिजीवियों की ही बातों को उन्हीं के बीच के लोगों ने उपहासात्मक स्वर में नकार दिया। सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिन्होंने साधनों की अपवित्रता के जरिए इस लिटरेचर फेस्टिवल के बहिस्कार का मजाक उड़ाया, दरअसल वे लोग भी क्रांतिजीवी के तौर पर ही जाने जाते हैं। लेकिन बहिस्कार और विरोध की अपील करने वाले लोगों और उपहास उड़ाने वाले लोगों में अंतर सिर्फ इतना ही है कि उपहास उड़ाने वाले लोगों को इस बहुप्रचारित और बहुप्रतिष्ठित समारोह के विमर्श सत्रों में बोलने के लिए बुलाया गया था।
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल को सदा की तरह इस बार भी हिंदी मीडिया ने भी जमकर कवरेज दी। जहां नोबेल पुरस्कार विजेता साहित्यकार ओरहान पामुक आएंगे, अंग्रेजी की स्टार लेखिका किरण देसाई होंगी, अपने स्वभाव के मुताबिक अंग्रेजी मीडिया इसकी कवरेज करेगा ही। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि इस बार हिंदी मीडिया ने भी इस बार इस फेस्टिवल में चले विमर्श सत्रों और पाठ सत्रों की खबरें प्रकाशित करने में कंजूसी नहीं दिखाई। वैसे भी हमारी हिंदी मीडिया को अपनी भाषा के लेखकों की तुलना में अंग्रेजी के रचनाकार ज्यादा बड़े स्टार नजर आते हैं, लिहाजा उनकी कवरेज उन्हें गौरवबोध से भर देता है। इस गौरवबोध में विरोध के सुर और उनके मुद्दे कहीं खो गए। विरोध करने वालों को इस फेस्टिवल के तीन प्रायोजकों के नामों पर खास आपत्ति थी। इस फेस्टिवल के एक आयोजक डीएससी लिमिटेड पर दिल्ली के कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान बाजार दर से 23 फीसद ज्यादा दरों पर ठेके मिले। इसकी तस्दीक देश का सतर्कता आयोग कर चुका है। इसके दूसरे प्रायोजक दुनिया की जानी-मानी खनन कंपनी रियो-टिंटो से भी सहायता लेने पर आपत्ति रही। विरोधियों का मानना है कि रियो-टिंटों दुनियाभर में अवैध तरीकों से ना सिर्फ खनन के ठेके हथियाती है, बल्कि वह नस्ली और फासिस्ट ताकतों की सहायता भी करती है। इसके साथ ही उस पर अमानवीय तरीके से श्रम कानूनों का उल्लंघन करने और पर्यावरण अधिकारों से खिलवाड़ का भी आरोप है। विरोधियों को इस आयोजन के तीसरे प्रायोजक शेल ऑयल कंपनी के प्रायोजन पर भी एतराज रहा। दुनिया की इस सबसे बड़ी ऊर्जा कंपनी पर नाइजीरिया के लेखक और पर्यावरण कार्यकर्ता केन सारो वीवा की हत्या कराने का आरोप है। इन आरोपों के मद्देनजर इस फेस्टिवल का विरोध करने की कोशिश तो हुई, लेकिन एक हद से आगे नहीं बढ़ पाई। नई मीडिया यानी इंटरनेट पत्रकारिता की इन दिनों कम से कम हिंदी में ऐसे विषयों पर गरमा-गरम बहसों के लिए पहचान बन गई है। हिंदी की नई मीडिया को यह पहचान दिलाने में क्रांतिजीवी वैचारिक धारा की सबसे बड़ी भूमिका रही है। इसके बावजूद जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल को लेकर कहीं कोई बहस और चर्चा नहीं देखने को नहीं मिली।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक बहरहाल जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल को जनता ने खूब सराहा है। इसमें लेखकों से ज्यादा प्रदर्शनकारी कलाओं मसलन फिल्म और संगीत से जुड़ी हस्तियों की उपस्थिति का ज्यादा योगदान रहा है। प्रदर्शनकारी कलाओं और टेलीविजन के स्टारों के जरिए ही अगर साहित्य को लेकर एक माहौल बनता है, जनता उसे स्वीकार करती है तो उसकी प्रशंसा की ही जानी चाहिए। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि इस महोत्सव को लेकर उठे सवालों पर चर्चा भी न की जाए। लोकतांत्रिक समाज में महान साहित्यिक परंपराएं जारी रखने के लिए उदात्त वैचारिक बहसें भी जरूरी होती हैं। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल का ‘जयगान’ करने वालों को भी इसे स्वीकार करने से नहीं हिचकना चाहिए। क्योंकि उनके अस्वीकार बोध से विरोधियों के उठाए सवाल अप्रासंगिक नहीं हो जाते। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की कामयाबी के जरिए डीएससी लिमिटेड, रियो टिंटो या शेल ऑयल कंपनी जैसी कंपनिया अपने अनाचारों को जनमानस की स्मृतियों से लोप करके नई छवि गढ़ने की कोशिश करती हैं। इन तथ्यों से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
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उमेश चतुर्वेदी लोहिया जी कहते थे कि दिल्ली में माला पहनाने वाली एक कौम है। सरकारें बदल जाती हैं, लेकिन माला पहनाने वाली इस कौम में कोई बदला...
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