बुधवार, 18 अक्तूबर 2017

टिमटिमा रहा दीया....

उमेश चतुर्वेदी 
उत्साह और उत्सव का गहरा नाता है..दोनों के उत्स में उत्स ही है, उत्स यानी नया जन्म, शुरूआत..नवजीवन हमेशा नव ऊर्जा का वाहक होता है.. नियमित खांचे में यात्रावान जिंदगी एकरस हो जाती है..एकरसता कुछ उसी तरह होती है, जैसे रूका हुआ पानी...बहता पानी ऊर्जा ही नहीं, नवजीवन का प्रतीक भी होता है..बहता पानी निर्मला इस अवधारणा के मूल में यह नवजीवन और नव ऊर्जा ही तो है...जिंदगी को उसी अंदाज में नवसंचारी बनाने के लिए, उसमें उत्साह की अंतर्निहित ऊर्जा को भरने के लिए संस्कृतियों को वक्त के साथ उपादानों की जरूरत महसूस हुई होगी..और उसने पर्वों का विधान किया होगा..ये पर्व भी एक दिन में नहीं बने होंगे, बल्कि समय-शिला की कसौटी पर वे कसे गए...समय के साथ उनमें नए-नए मुलम्मे चढ़ते गए..वे सकारात्मक ऊर्जा से लबरेज होते जाएं, इसलिए उनकी गुणवत्ता बढ़ाने लायक उपादान जुड़ते गए..और एक वक्त के बाद नए रूप में ये त्योहार हमारी जिंदगी के अभिन्न अंग बनते गए..
आनंद मठ उपन्यास में बंकिम चंद्र का मशहूर गीत है, वंदे मातरम्...भारतीय संविधान ने उसे राष्ट्रगीत का दर्जा दिया है..आजादी प्राप्त करने और उसके पहले तक हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के मन में राष्ट्र को लेकर एक स्वप्न था..स्वप्न का वह राष्ट्र यथार्थ के राष्ट्र से कहीं ज्यादा विस्तृण, कहीं ज्यादा महान, कहीं ज्यादा गहरा था...प्लेटो साहित्य शास्त्र में एक अवधारणा देते हैं..त्रिधा अपेत की..थ्री डाइमेंशन थियरी..उसके मुताबिक हमारे स्वप्नों में जो विचार आते हैं, उन्हें ही वास्तविक जगत में हम मूर्त करने की कोशिश करते हैं.लेकिन हकीकत की भौतिक दुनिया में आते-आते और मूर्त होते-होते इन विचारों में कुछ विचलन हो जाता है..यानी स्वप्न जितना महान होता है, हमारा विचार जगत जितना बड़ा होता है, असलियत की दुनिया उतनी गंभीर और ठीक वैसी ही नहीं हो पाती..उतनी महान नहीं होती..लेकिन दोनों का अपना महत्व है. दुनिया का दैनंदिन कार्य-व्यापार हकीकत से ही चलता है..लेकिन उसे और बेहतर बनाने के विचार स्वप्नों से ही आते हैं..यही महान स्वप्न वंदेमातरम् गीत में भी है...लेकिन आजादी के सत्तर साल में यह स्वप्न विदीर्ण हुआ है..वंदेमातरम् पर भी सवाल हैं..यथार्थ का राष्ट्र, स्वप्न के राष्ट्र के मुताबिक हो..लेकिन उसकी सीमा है, वह पूर्णत: स्वप्न जैसा नहीं हो सकता..अथर्ववेद में भी राष्ट्र का यह स्वप्न अपने ढंग से आता है...माता भूमि: पुत्रो अहं पृथिव्या...बहरहाल वंदेमातरम् गीत में एक पंक्ति है..सुजलां, सुफलां, मलयज शीतलां, शस्य श्यामलां मातरम्...यह शस्य श्यामलां क्या है..शस्य यानी खेती-फसल और उससे आच्छादित हमारी महान भारत माता श्यामल यानी सांवले रंग की दिखती है..वंदेमातरम् में बंकिम उस भारत के महान स्वप्न को ही रूपायित करते हैं, जिसका आधार खेती रही है..इसीलिए भारतीय संस्कृति को शस्य संस्कृति भी कहते हैं..शस्य यानी कृषि संस्कृति पर हमारे त्योहार आधारित हैं.. यानी फसल का एक चक्र पूरा हुआ तो त्योहार..फसल तैयार है या बढ़ रही है तो उसका त्योहार... फसल की बुवाई का त्योहार...मानव मूल में शस्य केंद्रित ही है..इसलिए दुनियाभर के लोकपर्वों को देखेंगे तो उनके पीछे कहीं न कहीं खेती, स्थानीय आखेट का ही असर है..आधुनिकता की नई परिभाषा देकर परंपराओं को नकारने का दर्शन देने वाले पश्चिम में भी देखेंगे तो वहां के भी लोक त्योहार फसल आधारित ही नजर आएंगे..इस संदर्भ में वहां के आधुनिकता से लबरेज त्योहारों को इस निकष से तज ही दीजिए..हमारी दीवाली भी ऐसा ही त्योहार है...बरसात के बाद फसलें तैयार होती हैं..यही वह दिन होता है, जब धान की फसल पकती है..पके धान की झूमती सुनहली बालियों से हमारे रीति कवि भी प्रभावित हुए है..लोक की रचनाओं की नायिकाएं पके धान की लोच खाती सुनहली बालियों की तरह लय में झूमती नजर आती हैं..
हमारे त्योहार चूंकि फसली चक्र पर आधारित हैं, इसलिए उसमें उन्हीं चीजों का इस्तेमाल होता है, जो उस फसल चक्र से अन्न से हासिल होते हैं..दीपावली पर हम खील चढ़ाते हैं..धान का खील, उसी का प्रतीक है..गुड़ से बनी मिठाइयां भी एक दौर में खूब तैयार की जाती थीं..
उत्साह के उत्स से संचारित त्योहार कहीं हमारे अवचेतन में छिपी बैठी उदासी का जरिया भी बनकर आते हैं..हर त्योहार के कुछ पहले और कुछ बाद...हमारे अवचेतन से यह उदासी बाहर निकल आती है..कई बार आंसुओं के रूप में तो कई बार निराशा के रूप में.. आंसू कई बार अंतरतम के अंधकार को, विकार को बाहर निकालने का जरिया भी बनते हैं..जीवन में कई बार ऐसा हुआ है, त्योहारों पर आंसूं निकले हैं..अवचेतन में गहरे पैठी करूणा बाहर झांकने लगती है..कई बार प्यार और न्योछावर होने का भाव भी इन आंसुओं के जरिए छलक आता है..गोरखपुर में देशभक्ति के गीत सुन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की आंखों का छलछलाना उसी भाव का प्रकटीकरण था..उसका नव उत्साही मीडिया ने मजाक उड़ाया..वैसे आज के दौर में मजाक और आलोचना के स्वर कुछ ज्यादा ही हो गए हैं..हिंदी पत्रकारिता के शलाका पुरूष प्रभाष जोशी भी ने ऐसे मौके पर आए अपने आंसुओं को कभी छुपाया नहीं..अपने मशहूर स्तंभ कागद कारे में जिक्र भी करते रहे..उसका भी मजाक उड़ाया गया..एक मशहूर कवि-पत्रकार ने उन पर आरोप ही जड़ दिया था, उसके अंदर एक बूढ़ी विधवा रहती है जो मौके-बेमौके विलाप करती रहती है...
ये आंसू वीरता के भी प्रतीक हैं..मनुष्यता की रक्षा के लिए उमड़ने वाले भावों के प्रतीक....आंसू को समझना है तो जयशंकर प्रसाद के पास जाना पड़ेगा..वे कहते हैं.. इस करुणा कलित हृदय में / अब विकल रागिनी बजती / क्यों हाहाकार स्वरों में / वेदना असीम गरजती
इसका जवाब वे आगे देते हैं..
अवकाश भला हैं किसको,/ सुनने को करुण कथाएँ /बेसुध जो अपने सुख से / जिनकी हैं सुप्त व्यथाएँ
बचपन की दीवाली याद आती है..दीवाली के अगले दिन मां और दादी के लिए मुंह अंधेरे ही निकल जाते..कटेली की खोज में आयुर्वेदिक दवाओं की जान कटेली..कांटों भरी कटेली जिसे हमारी भोजपुरी में रेंगनी कहते..रेंगनी की डालियां उखाड़ कर लाई जातीं..मां और दादी को सौंप दिया जाता..गोधन पूजा की तैयारियों में जुटी मां और दादी अपनी मसरूफियत में से कुछ पल निकालतीं..उस कटेली की कांटेदार एक-एक पत्ती तोड़तीं, अपने सिर के चारों तरफ घुमातीं और परिवार के एक-एक पुरूष सदस्य की मृत्यु की घोषणा करतीं, अगर वे शादी-शुदा हुए तो उनकी पत्नियों को बेवा घोषित करतीं और कटेली की पत्ती पहले से बिछे कोंहड़ा के पत्ते पर डालती जातीं..किसी साध्वी को विधवा कह कर देखिए. वह चंडी रूप धारण कर लेगी, लेकिन दीपावली की उस अगली सुबह साध्वी खुद ही खुद को बेवा घोषित करती..इस पूरी प्रक्रिया को श्रापना कहते...यह परंपरा आज भी पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड के गांवों में जारी है..फिर उन पत्तियों को बटोर कर गोधन पूजा की जगह लाया जाता..वहां बने गोबर के गोवर्धन के पास रखा जाता..गोवर्धन पूजा के बाद वहां का जल लेकर हम बच्चे घर लौटते और फिर उस श्रापने की प्रक्रिया को उल्टे क्रम में लाया जाता..मां और दादी अपने बालों से एक लट निकालतीं..उसे हाथ में लेतीं और उस पर वह लाया हुआ जल गिराया जाता...इस दौरान जितने लोगों को वह श्राप चुकी होतीं..उनके जिंदा होने की कामना की जाती औऱ फिर शुरू हो पाता था..गोवर्धन पूजा के बाद का भोज...पूरन पूरी और गुड़ की खीर का भोज
यह श्रापना और उसे जिंदा रखना क्या है..यह सृष्टि के संहार और उससे उपजी उदासी का ही प्रतीक है..और इस संहार और उदासी के बाद ही नवसृजन होता है..सृष्टि के संहार और सृजन की इस परंपरा को सहज भाव से लेने का संदेश भी है इसमें... आध्यात्मिकता की इस डोर के जरिए इसे बांधे रखा गया...लेकिन वक्त के साथ इस डोर पर विस्मृति की तहें चढ़ती गईं और हम भूल गए इन परंपराओं के संदेशों को...आधुनिक शिक्षा ने इन्हें दकियानूसी घोषित कर दिया..अंधविश्वासी भी बना दिया...इस पर बहस की गुंजाइश भी नहीं छोड़ी..बहरहाल उदासी इसलिए भी आती है कि आप नवसृजन का उमंगों से स्वागत भी कर सकें..
कभी आपने दीये को देखा है..पारंपरिक दीये को...देर रात टिमटिमाना..दीया अंधकार के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक है..वह अंधेरे की काली दुनिया को अपने प्रकाश से चुनौती देता है..दीया भले ही टिमटिमाता रहे, वह अंधेरे को चुनौती ही देता है..टिमटिमाना उदासी का प्रतीक भी है...गौर से आज की रात देखिएगा अकेले टिमटिमाते..चुपचाप बल खाते दीये को..उसकी राह में हवाओं की बाधा भी आएगी..वह बल खाएगा..उसकी लौ कंपित होगी...लेकिन वह खड़े रहने की कोशिश करेगा..हवा के थपेड़ों के सामने वह बुझ जाएगा..लेकिन अपनी आखिरी लौ तक वह प्रकाश फैलाता रहेगा...अंधेरे के खिलाफ उसका संघर्ष आखिरी दौर तक जारी रहेगा..दीप और अंधेरे की प्रकृति में बुनियादी अंतर है..अंधेरा एकात्म भाव से रोशनी को भगाता है...दीया अकेले ही रोशनी को चुनौती देगा..यह बिना सोचे कि उसकी रोशनी सिर्फ उसके लिए ही नहीं, सबके लिए होगी..
अज्ञेय कहते हैं.. यह वह विश्वास नहीं, जो अपनी लघुता में भी काँपा / वह पीड़ा, जिसकी गहराई को स्वयं उसी ने नापा / कुत्सा, अपमान, अवज्ञा के धुँधुआते कड़वे तम में / यह सदा द्रवित, चिर जागरूक, अनुरक्त नेत्र / उल्लंब-बाहु, यह चिर अखंड अपनापा
हर दीपक ऐसा ही है..दीवाली पर ऐसे ही ढेरों दीपों की पंक्तियां सजती हैं..मनुष्यता की रक्षा के लिए..

बुधवार, 23 अगस्त 2017

पद्मश्री राम बहादुर राय बने हिन्दुस्थान समाचार समूह के प्रधान संपादक

पाक्षिक पत्रिका ‘यथावत’ के संपादकराम बहादुर राय को हिन्दुस्थान समाचार समूह का प्रधान संपादक बनाया गया है जबकि मुख्य कार्यकारी अधिकारी सह प्रधान संपादक राकेश मंजुल को सभी संपादकीय कार्यों से निवृत कर दिया गया है। अब वे संस्थान में मुख्य कार्यकारी अधिकारी (रेडियो एवं दूरदर्शन सेवा) का स्वतंत्र प्रभार संभालेंगे। राम बहादुर राय तात्कालिक प्रभाव से हिन्दुस्थान समाचार वायर सेवा, यथावत पाक्षिक, युगवार्ता साप्ताहिक, नवोत्थान मासिक, नवोत्थान बांग्ला और हिंदुस्थान समाचार वार्षिकी के संपादन कार्य की देखरेख और नियंत्रण करेंगे। उक्त निर्णय हिन्दुस्थान समाचार के निदेशक मंडल की मंगलवार को दिल्ली में हुई बैठक के दौरान लिया गया है। हिंदुस्थान समाचार के चेयरमैन रवींद्र किशोर सिन्हा ने इस आशय के आदेश जारी कर दिए हैं। आपको बता दें कि बहुभाषी समाचार एजेंसी हिंदुस्थान समाचार की स्थापना बालेश्वर अग्रवाल ने की थी। एक दौर में यह भारतीय भाषाओं की सबसे बड़ी समाचार एजेंसी थी।

शुक्रवार, 3 मार्च 2017

लेकिन असल जिंदगी में नहीं लड़ पाती अनारकली


उमेश चतुर्वेदी
पत्रकार से फिल्म निर्देशक बने अविनाश दास की फिल्म अनारकली ऑफ आरा इन दिनों चर्चा में है। 24 मार्च को रिलीज होने जा रही इस फिल्म में नौटंकी गायिका अनारकली की भूमिका नील बटे सन्नाटा फिल्म से अपने अभिनय का लोहा मनवा चुकी स्वरा भास्कर ने निभाई है। यह चरित्र बेहद तेज-तर्रार है और गाली देकर बात करती है। स्वरा बताती हैं कि ये एक ऐसी महिला की कहानी है, जो अपने खुलेपन और डांस के लिए ख्यात है। वह सामंती मानसिकता के लोगों के बीच भद्दे और द्विअर्थी गानों पर डांस करती है।फिल्म की कहानी एक ऐसी महिला की है, जो मेले-ठेले में अश्लीलता की हद तक द्विअर्थी गीत गाकर लोगों का मनोरंजन करती है और अपना पेट पालती है। वैसे देश के तमाम इलाकों में अब भी मनोरंजन का साधन नाचने-गाने वाली ऐसी महिलाएं ही हैं। कहीं वे द्विअर्थी गीत पेश करती हैं तो कहीं अपने लटके-झटके के जरिए नोटों की बरसात कराती हैं, ताकि उनके और उनके साजिंदों की जिंदगी की गाड़ी आगे बढ़ सके। हालांकि इस चलन के लिए कहीं ज्यादा बदनाम अपने भदेसपन के लिए विख्यात भोजपुरी इलाका कहीं ज्यादा है। फिल्म अनारकली ऑफ आरा की कहानी भी ठेठ भोजपुरी इलाका बिहार के आरा की गायिका अनारकली की है।

मंगलवार, 26 जुलाई 2016

सूचना सेवा में सुधार पर बासवान समिति ने खड़े किये हाथ

                 संघ लोकसेवा आयोग परीक्षा से संबंधित सुधारों पर कार्य करने के लिए बी एस बासवान समिति ने भारतीय सूचना सेवा में सुधार के सवाल पर हाथ खड़े कर दिये हैं, इससे इस सेवा में सुधार के लिए किये जा रहे प्रयासों को झटका लगा है।
                 हालांकि समिति ने अभी अंतिम रिपोर्ट सरकार को सौंपी नहीं है लेकिन भारतीय सूचना सेवा में सुधार के लिए छात्रों की ओर से किये जा रहे प्रयासों के जवाब में समिति के अध्यक्ष बी एस बासवान की ओर से जयपुर के छात्र श्याम शर्मा को ईमेल कर कहा गया है भारतीय सूचना सेवा को सिविल सेवाओं में रखना या न रखनासूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का काम हैसमिति का नहीं। मुझे लगता है कि वे यथास्थिति बनाये रखना चाहते हैं।
       हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालयजयपुर के छात्र श्याम शर्मा ने प्रधानमंत्री कार्यालय व बासवान समिति को पत्र लिखकर मांग की थी कि भारतीय सूचना सेवा की पेशागत आवश्यकताओं को देखते हुए इसे ग्रुप ’ पेशेवर सेवा के तौर पर चिन्ह्ति किया जाए तथा इसमें प्रवेश के लिए मीडिया व जनसंचार विषयों की विशेषज्ञता अनिवार्य की जाए।
उल्लेखनीय है कि भारतीय सूचना सेवा में शीर्षस्थ पदों पर नियुक्तियों के लिए अब तक विशेषज्ञता अनिवार्य नहीं है और सिविल सेवाओं में निचले रैंकों पर रहने वाले प्रतिभागी अनिच्छा के साथ इस सेवा में पहुंचते हैं जिससे सरकार की कार्यदक्षता तो प्रभावित होती ही हैसाथ हीसंचार कौशल संयुक्त पेशेवर प्रतिभा के साथ भी अन्याय होता है। इस संबंध में मीडिया स्कैनदिल्ली पत्रकार संघ,आईआईएमसी छात्र संघ तथा अन्य तमाम मीडिया संगठनों व छात्र संगठनों ने बासवान समिति को पत्र लिखा है।  
इन संगठनों का मानना है कि यह स्थिति पत्रकारिता के छात्रों के साथ अन्याय जैसी है। देशभर में बड़ी संख्या में पत्रकारिता संस्थानों से सैकड़ों की संख्या में स्नातक होकर पत्रकारिता और जनसंचार के छात्र निकलते हैं और उनके कौशलों की आवश्यकता वाली एक लोकसेवा भी अस्तित्व में है फिर भी उनको अवसर देने के स्थान पर इस सेवा में ऐसे लोगों को मौका दिया जा रहा है जिनके पास पत्रकारिता और जनसंचार की बेसिक जानकारी तक नहीं है। इसलिए सूचना और प्रसारण मंत्रालयकेंद्रीय कार्मिक और प्रशिक्षण विभागसंघ लोकसेवा आयोग और प्रधानमंत्री कार्यालय से मांग की गयी है कि देशभर में पत्रकारिता के छात्रों के हित में भारतीय सूचना सेवा को पूरी तरह विशेषज्ञ सेवा के रूप में ग्रुप ए पेशेवर सेवा के रूप में चिन्हित किया जाए। 

बुधवार, 25 मई 2016

आपकी मदद चाहिए

मेरी कार चोरी हुए दस दिन हो गए..दिल्ली पुलिस ने इसे कैजुअली लिया..हम चाहते हैं कि आगे से ऐसे मामलों को दिल्ली पुलिस कैजुअली ना ले..इसलिए एक याचिका डाली है..जो नीचे दिए गए लिंक पर है..कृपया इस पर क्लिक करें और अपना हस्ताक्षर करके सहयोग करें..ताकि आगे किसी की कार चोरी हो तो पुलिस उसे कैजुअली ना ले..
यहां क्लिक करें 

शनिवार, 20 फ़रवरी 2016

कितना जहरीला है मौजूदा माहौल...


माहौल में कितना जहर भर गया है.. जरा देखिए फेसबुक पर यह पोस्ट..मेरे छात्र रहे हैं नाम है मन्शेष कुमार.. आईआईएमसी जैसी जगह में पढ़ते हैं..तो जाहिर है कि ऊंची छलांग लगाने की भी सोच रहे होंगे..लेकिन उनकी भाषा कैसी है..जरा पढ़िए..मेरे पोस्ट को शेयर करते वक्त,.दुख है कि इन्हें अपनी क्लास में मैं पढ़ा नहीं पाया..वैसे 23 साल पहले मैं उसी क्लास में छात्र था..आखिर भविष्य में ये क्या करेंगे...अंदाज लगाइए...इनका परिचय और इनकी पोस्ट दोनों लगा रहा हूं..देखिए और विचार कीजिए....

सोमवार, 11 जनवरी 2016

किशन कालजयी को बृजलाल द्विवेदी सम्मान

मीडिया विमर्श के आयोजन में 7 फरवरी को होंगे अलंकृत
हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता को सम्मानित किए जाने के लिए दिया जाने वाला पं. बृजलाल द्विवेदी अखिल भारतीय साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान इस वर्ष ‘संवेद’ (दिल्ली) के संपादक श्री किशन कालजयी  को प्रदान किया जाएगा। श्री किशन कालजयी   साहित्यिक पत्रकारिता के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर होने के साथ-साथ देश के जाने-माने संपादक एवं लेखक हैं।
सम्मान कार्यक्रम 7, फरवरी, 2016 को गांधी भवन, भोपाल में सायं 5.30 बजे आयोजित किया गया है। मीडिया विमर्श पत्रिका के कार्यकारी संपादक संजय द्विवेदी ने बताया कि आयोजन में अनेक साहित्यकार, बुद्धिजीवी और पत्रकार हिस्सा लेंगे। सम्मान समारोह के मुख्य अतिथि माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बृज किशोर कुठियाला होंगे तथा अध्यक्षता शिक्षाविद् और समाज सेवी संकठा प्रसाद सिंह करेंगे। आयोजन में साहित्यकार गिरीश पंकजहरिभूमि के प्रबंध संपादक डा. हिमांशु द्विवेदी उपस्थित रहेंगे। पुरस्कार के निर्णायक मंडल में सर्वश्री विश्वनाथ सचदेव,  रमेश नैयर, डा. सच्चिदानंद जोशी, डा.सुभद्रा राठौर और जयप्रकाश मानस शामिल हैं। इसके पूर्व यह सम्मान वीणा(इंदौर) के संपादक स्व. श्यामसुंदर व्यास, दस्तावेज(गोरखपुर) के संपादक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, कथादेश (दिल्ली) के संपादक हरिनारायण, अक्सर (जयपुर) के संपादक डा. हेतु भारद्वाजसद्भावना दर्पण (रायपुर) के संपादक गिरीश पंकज, व्यंग्य यात्रा (दिल्ली) के संपादक डा. प्रेम जनमेजय और कला समय(भोपाल) के संपादक विनय उपाध्याय को दिया जा चुका है। त्रैमासिक पत्रिका ‘मीडिया विमर्श’ द्वारा प्रारंभ किए गए इस अखिल भारतीय सम्मान के तहत साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान करने वाले संपादक को ग्यारह हजार रूपए, शाल, श्रीफल, प्रतीक चिन्ह और सम्मान पत्र से अलंकृत किया जाता है।

कौन हैं किशन कालजयी
 किशन कालजयी देश के जाने-माने साहित्यकार,पत्रकार, संस्कृतिकर्मी और लेखक हैं। इस समय वे दिल्ली सेसंवेद और सबलोग नामक दो पत्रिकाओं का संपादन कर रहे हैं। मूलतः झारखंड के निवासी श्री किशन कालजयी भारतीय ज्ञानपीठ में वरिष्ठ प्रकाशन अधिकारी के अलावा नई बात, पर्यावरण, लोकायत, विक्रम शिला टाइम्स, सहयात्री जैसे पत्रों के संपादन से जुड़े रहे हैं। अनुपम मिश्र की किताब साफ माथे का समाज का आपने संपादन किया है। आप मुंगेर के कालेज में हिंदी विभाग में प्राध्यापक भी रहे। आपने इसके साथ ही कई ड्रामा स्क्रिप्ट का लेखन और नाटकों का निर्देशन भी किया। श्री नेमिचंद्र जैन पर एक घंटे की डाक्यूमेंट्री फिल्म बनाने के अलावा पांच अन्य डाक्यूमेंट्री फिल्में बनाई हैं। दो नाटकों के लिए आपको बेस्ट डायरेक्टर अवार्ड भी मिल चुका है। दिल्ली, बिहार और झारखंड में आपने अनेक संस्थाओं का गठन, संचालन तो किया ही है, साथ ही उनके माध्यम से अनेक सांस्कृतिक-साहित्यिक गतिविधियों का आयोजन भी किया है।