शुक्रवार, 3 मार्च 2017

लेकिन असल जिंदगी में नहीं लड़ पाती अनारकली


उमेश चतुर्वेदी
पत्रकार से फिल्म निर्देशक बने अविनाश दास की फिल्म अनारकली ऑफ आरा इन दिनों चर्चा में है। 24 मार्च को रिलीज होने जा रही इस फिल्म में नौटंकी गायिका अनारकली की भूमिका नील बटे सन्नाटा फिल्म से अपने अभिनय का लोहा मनवा चुकी स्वरा भास्कर ने निभाई है। यह चरित्र बेहद तेज-तर्रार है और गाली देकर बात करती है। स्वरा बताती हैं कि ये एक ऐसी महिला की कहानी है, जो अपने खुलेपन और डांस के लिए ख्यात है। वह सामंती मानसिकता के लोगों के बीच भद्दे और द्विअर्थी गानों पर डांस करती है।फिल्म की कहानी एक ऐसी महिला की है, जो मेले-ठेले में अश्लीलता की हद तक द्विअर्थी गीत गाकर लोगों का मनोरंजन करती है और अपना पेट पालती है। वैसे देश के तमाम इलाकों में अब भी मनोरंजन का साधन नाचने-गाने वाली ऐसी महिलाएं ही हैं। कहीं वे द्विअर्थी गीत पेश करती हैं तो कहीं अपने लटके-झटके के जरिए नोटों की बरसात कराती हैं, ताकि उनके और उनके साजिंदों की जिंदगी की गाड़ी आगे बढ़ सके। हालांकि इस चलन के लिए कहीं ज्यादा बदनाम अपने भदेसपन के लिए विख्यात भोजपुरी इलाका कहीं ज्यादा है। फिल्म अनारकली ऑफ आरा की कहानी भी ठेठ भोजपुरी इलाका बिहार के आरा की गायिका अनारकली की है।

मंगलवार, 26 जुलाई 2016

सूचना सेवा में सुधार पर बासवान समिति ने खड़े किये हाथ

                 संघ लोकसेवा आयोग परीक्षा से संबंधित सुधारों पर कार्य करने के लिए बी एस बासवान समिति ने भारतीय सूचना सेवा में सुधार के सवाल पर हाथ खड़े कर दिये हैं, इससे इस सेवा में सुधार के लिए किये जा रहे प्रयासों को झटका लगा है।
                 हालांकि समिति ने अभी अंतिम रिपोर्ट सरकार को सौंपी नहीं है लेकिन भारतीय सूचना सेवा में सुधार के लिए छात्रों की ओर से किये जा रहे प्रयासों के जवाब में समिति के अध्यक्ष बी एस बासवान की ओर से जयपुर के छात्र श्याम शर्मा को ईमेल कर कहा गया है भारतीय सूचना सेवा को सिविल सेवाओं में रखना या न रखनासूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का काम हैसमिति का नहीं। मुझे लगता है कि वे यथास्थिति बनाये रखना चाहते हैं।
       हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालयजयपुर के छात्र श्याम शर्मा ने प्रधानमंत्री कार्यालय व बासवान समिति को पत्र लिखकर मांग की थी कि भारतीय सूचना सेवा की पेशागत आवश्यकताओं को देखते हुए इसे ग्रुप ’ पेशेवर सेवा के तौर पर चिन्ह्ति किया जाए तथा इसमें प्रवेश के लिए मीडिया व जनसंचार विषयों की विशेषज्ञता अनिवार्य की जाए।
उल्लेखनीय है कि भारतीय सूचना सेवा में शीर्षस्थ पदों पर नियुक्तियों के लिए अब तक विशेषज्ञता अनिवार्य नहीं है और सिविल सेवाओं में निचले रैंकों पर रहने वाले प्रतिभागी अनिच्छा के साथ इस सेवा में पहुंचते हैं जिससे सरकार की कार्यदक्षता तो प्रभावित होती ही हैसाथ हीसंचार कौशल संयुक्त पेशेवर प्रतिभा के साथ भी अन्याय होता है। इस संबंध में मीडिया स्कैनदिल्ली पत्रकार संघ,आईआईएमसी छात्र संघ तथा अन्य तमाम मीडिया संगठनों व छात्र संगठनों ने बासवान समिति को पत्र लिखा है।  
इन संगठनों का मानना है कि यह स्थिति पत्रकारिता के छात्रों के साथ अन्याय जैसी है। देशभर में बड़ी संख्या में पत्रकारिता संस्थानों से सैकड़ों की संख्या में स्नातक होकर पत्रकारिता और जनसंचार के छात्र निकलते हैं और उनके कौशलों की आवश्यकता वाली एक लोकसेवा भी अस्तित्व में है फिर भी उनको अवसर देने के स्थान पर इस सेवा में ऐसे लोगों को मौका दिया जा रहा है जिनके पास पत्रकारिता और जनसंचार की बेसिक जानकारी तक नहीं है। इसलिए सूचना और प्रसारण मंत्रालयकेंद्रीय कार्मिक और प्रशिक्षण विभागसंघ लोकसेवा आयोग और प्रधानमंत्री कार्यालय से मांग की गयी है कि देशभर में पत्रकारिता के छात्रों के हित में भारतीय सूचना सेवा को पूरी तरह विशेषज्ञ सेवा के रूप में ग्रुप ए पेशेवर सेवा के रूप में चिन्हित किया जाए। 

बुधवार, 25 मई 2016

आपकी मदद चाहिए

मेरी कार चोरी हुए दस दिन हो गए..दिल्ली पुलिस ने इसे कैजुअली लिया..हम चाहते हैं कि आगे से ऐसे मामलों को दिल्ली पुलिस कैजुअली ना ले..इसलिए एक याचिका डाली है..जो नीचे दिए गए लिंक पर है..कृपया इस पर क्लिक करें और अपना हस्ताक्षर करके सहयोग करें..ताकि आगे किसी की कार चोरी हो तो पुलिस उसे कैजुअली ना ले..
यहां क्लिक करें 

शनिवार, 20 फ़रवरी 2016

कितना जहरीला है मौजूदा माहौल...


माहौल में कितना जहर भर गया है.. जरा देखिए फेसबुक पर यह पोस्ट..मेरे छात्र रहे हैं नाम है मन्शेष कुमार.. आईआईएमसी जैसी जगह में पढ़ते हैं..तो जाहिर है कि ऊंची छलांग लगाने की भी सोच रहे होंगे..लेकिन उनकी भाषा कैसी है..जरा पढ़िए..मेरे पोस्ट को शेयर करते वक्त,.दुख है कि इन्हें अपनी क्लास में मैं पढ़ा नहीं पाया..वैसे 23 साल पहले मैं उसी क्लास में छात्र था..आखिर भविष्य में ये क्या करेंगे...अंदाज लगाइए...इनका परिचय और इनकी पोस्ट दोनों लगा रहा हूं..देखिए और विचार कीजिए....

सोमवार, 11 जनवरी 2016

किशन कालजयी को बृजलाल द्विवेदी सम्मान

मीडिया विमर्श के आयोजन में 7 फरवरी को होंगे अलंकृत
हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता को सम्मानित किए जाने के लिए दिया जाने वाला पं. बृजलाल द्विवेदी अखिल भारतीय साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान इस वर्ष ‘संवेद’ (दिल्ली) के संपादक श्री किशन कालजयी  को प्रदान किया जाएगा। श्री किशन कालजयी   साहित्यिक पत्रकारिता के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर होने के साथ-साथ देश के जाने-माने संपादक एवं लेखक हैं।
सम्मान कार्यक्रम 7, फरवरी, 2016 को गांधी भवन, भोपाल में सायं 5.30 बजे आयोजित किया गया है। मीडिया विमर्श पत्रिका के कार्यकारी संपादक संजय द्विवेदी ने बताया कि आयोजन में अनेक साहित्यकार, बुद्धिजीवी और पत्रकार हिस्सा लेंगे। सम्मान समारोह के मुख्य अतिथि माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बृज किशोर कुठियाला होंगे तथा अध्यक्षता शिक्षाविद् और समाज सेवी संकठा प्रसाद सिंह करेंगे। आयोजन में साहित्यकार गिरीश पंकजहरिभूमि के प्रबंध संपादक डा. हिमांशु द्विवेदी उपस्थित रहेंगे। पुरस्कार के निर्णायक मंडल में सर्वश्री विश्वनाथ सचदेव,  रमेश नैयर, डा. सच्चिदानंद जोशी, डा.सुभद्रा राठौर और जयप्रकाश मानस शामिल हैं। इसके पूर्व यह सम्मान वीणा(इंदौर) के संपादक स्व. श्यामसुंदर व्यास, दस्तावेज(गोरखपुर) के संपादक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, कथादेश (दिल्ली) के संपादक हरिनारायण, अक्सर (जयपुर) के संपादक डा. हेतु भारद्वाजसद्भावना दर्पण (रायपुर) के संपादक गिरीश पंकज, व्यंग्य यात्रा (दिल्ली) के संपादक डा. प्रेम जनमेजय और कला समय(भोपाल) के संपादक विनय उपाध्याय को दिया जा चुका है। त्रैमासिक पत्रिका ‘मीडिया विमर्श’ द्वारा प्रारंभ किए गए इस अखिल भारतीय सम्मान के तहत साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान करने वाले संपादक को ग्यारह हजार रूपए, शाल, श्रीफल, प्रतीक चिन्ह और सम्मान पत्र से अलंकृत किया जाता है।

कौन हैं किशन कालजयी
 किशन कालजयी देश के जाने-माने साहित्यकार,पत्रकार, संस्कृतिकर्मी और लेखक हैं। इस समय वे दिल्ली सेसंवेद और सबलोग नामक दो पत्रिकाओं का संपादन कर रहे हैं। मूलतः झारखंड के निवासी श्री किशन कालजयी भारतीय ज्ञानपीठ में वरिष्ठ प्रकाशन अधिकारी के अलावा नई बात, पर्यावरण, लोकायत, विक्रम शिला टाइम्स, सहयात्री जैसे पत्रों के संपादन से जुड़े रहे हैं। अनुपम मिश्र की किताब साफ माथे का समाज का आपने संपादन किया है। आप मुंगेर के कालेज में हिंदी विभाग में प्राध्यापक भी रहे। आपने इसके साथ ही कई ड्रामा स्क्रिप्ट का लेखन और नाटकों का निर्देशन भी किया। श्री नेमिचंद्र जैन पर एक घंटे की डाक्यूमेंट्री फिल्म बनाने के अलावा पांच अन्य डाक्यूमेंट्री फिल्में बनाई हैं। दो नाटकों के लिए आपको बेस्ट डायरेक्टर अवार्ड भी मिल चुका है। दिल्ली, बिहार और झारखंड में आपने अनेक संस्थाओं का गठन, संचालन तो किया ही है, साथ ही उनके माध्यम से अनेक सांस्कृतिक-साहित्यिक गतिविधियों का आयोजन भी किया है। 

शुक्रवार, 27 नवंबर 2015

वेतन आयोग लाएगा महंगाई


उमेश चतुर्वेदी

कर्मचारियों की सुख समृद्धि बढ़े, उनका जीवन स्तर ऊंचा उठे, इससे इनकार कोई विघ्नसंतोषी ही करेगा। लेकिन सवाल यह है कि जिस देश में 125 करोड़ लोग रह रहे हों और चालीस करोड़ से ज्यादा लोग रोजगार के योग्य हों, वहां सिर्फ 33 लाख एक हजार 536 लोगों की वेतन बढ़ोत्तरी उचित है? सातवें वेतन आयोग की रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद केंद्र सरकार की तरफ से अपने कर्मचारियों को लेकर यही आंकड़ा सामने आया है। बेशक सबसे पहले केंद्र सरकार ही अपने कर्मचारियों को वेतन वृद्धि का यह तोहफा देने जा रही है। लेकिन देर-सवेर राज्यों को भी शौक और मजबूरी में अपने कर्मचारियों को सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के मुताबिक वेतन देना ही पड़ेगा। जब यह वेतन वृद्धि लागू की जाएगी, तब अकेले केंद्र सरकार पर ही सिर्फ वेतन के ही मद में एक लाख दो हजार करोड़ सालाना का बोझ बढ़ेगा। इसमें अकेले 28 हजार 450 करोड़ का बोझ सिर्फ रेलवे पर ही पड़ेगा। इस वेतन वृद्धि का दबाव राज्यों और सार्जजनिक निगमों पर कितना पड़ेगा, इसका अंदाजा राज्यों के कर्मचारियों की संख्या के चलते लगाया जा सकता है। साल 2009 के आंकड़ों के मुताबिक, सरकारी क्षेत्र के 8 करोड़ 70 लाख कर्मचारियों में से सिर्फ 33 लाख कर्मचारी केंद्र सरकार के हैं। जाहिर है कि बाकी कर्मचारी राज्यों के हैं या फिर सार्वजनिक क्षेत्र के निगमों के। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि राज्यों पर कितना बड़ा आर्थिक बोझ आने वाला है।याद कीजिए 2006 को। इसी वर्ष छठवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू की गईं, जिससे केंद्र पर 22 हजार करोड़ रुपए का एक मुश्त बोझ बढ़ा था। केंद्रीय कर्मचारियों की तनख्वाहें अचानक  एक सीमा के पार चली गईं। केंद्र के कुल खर्च का 30 फीसदी अकेले वेतन मद में ही खर्च होने लगा।
इसका दबाव राज्यों पर भी पड़ा। उनका खर्च छठवें वेतन आयोग के चलते 74 फीसदी तक बढ़ गया। कई राज्यों ने तो केंद्र पर दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया था कि उनके कर्मचारियों को बढ़ा हुआ वेतन देने के लिए केंद्र मदद करे। कई राज्यों की अर्थव्यवस्था तक चरमरा गई। उनके पास विकास मद में खर्च करने के लिए पैसे तक नहीं बचे। 2006 के बाद ही हमें महंगाई में तेजी दिखने लगीं। इसी के बाद पेट्रोलियम की कीमतें आसमान छूने लगीं। उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों में भी इजाफा हुआ । यह बात और है कि दो साल बाद आई वैश्विक मंदी और उससे घटी विकास दर के सिर पर महंगाई का ठीकरा सरकार और एक हद तक रिजर्व बैंक ने फोड़ दिया था। इसी दौर में आर्थिक जानकारों का एक तबका ऐसा भी था, जो छठवें वेतन आयोग को भी इस महंगाई से जोड़कर देख रहा था, लेकिन तत्कालीन अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री की अगुआई वाली सरकार और उसके वित्त मंत्रियों ने इसे महंगाई के लिए जिम्मेदार नहीं माना। ठीक नौ साल पहले लागू हुए छठवें वेतन आयोग की रिपोर्ट के बाद आशंकित सामाजिक असमानता और उससे बढ़ने वाली आर्थिक दिक्कतों और महंगाई को लेकर समाजवादी पृष्ठभूमि वाले राजनेताओं, कम्युनिस्ट पार्टी शासित केरल, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल ने इस समस्या की तरफ ध्यान दिलाने की कोशिश की । लेकिन तब की कांग्रेसी सरकार ने इस अनसुना कर दिया। उसका फायदा ठीक तीन साल बाद हुए आम चुनावों में मिला, जब कांग्रेस की सीटें 145 से बढ़कर 206 तक जा पहुंची।

रविवार, 8 नवंबर 2015

सम्मान वापसी बनाम किताब वापसी



उमेश चतुर्वेदी

वैचारिक असहमति और उन असहमतियों के आधार पर विमर्श होना लोकतांत्रिक समाज का भूषण होता है..लेकिन कथित असहिष्णुता के खिलाफ जारी साहित्यिक-सांस्कृतिक-फिल्मी और वैज्ञानिक जगत में जारी वैचारिक आलोड़न को क्या इसी कसौटी पर देखा-परखा जा सकता है ? सम्मान वापसी के विरोधी आरोप लगा रहे हैं कि भले ही सम्मान वापस करने वालों की भीड़ बढ़ती जा रही है, लेकिन इसके पीछे राजनीतिक विचार और ताकतें काम कर रही हैं। इसके लिए सम्मान वापसी विरोधियों को एक पर एक होती रही घटनाओं ने तार्किक सवाल उठाने का मौका दे दिया है...प्रतिरोध की आवाजों के उठने के अगले ही दिन देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी असहिष्णुता के खिलाफ राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के दरबार पहुंच गईं। यह तो उनकी व्यक्तिगत मुलाकात थी। इसके ठीक अगले दिन उन्होंने सवा सौ नेताओं के लाव-लश्कर समेत बाकायदा जुलूस निकालकर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से शिकायत कर डाली। मौजूदा दौर में एजेंडा तय करना और किसी भी घटना या हादसे को उत्सवी रंग देना मीडिया का काम हो गया, लिहाजा असहिष्णुता का यह लाव-लश्करी विरोध मीडिया के लिए आकर्षक बन गया और इस नाते कांग्रेस खबरों की केंद्र में बनी रही। इससे साफ है कि पहले लेखकों का विरोध और फिर देश की सबसे पुरानी पार्टी का कदम कहीं न कहीं सोची-समझी रणनीति के तहत हुए। अव्वल तो होना चाहिए कि इन घटनाओं के बीच जुड़े तंतुओं की पड़ताल की जाती, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है।