गुरुवार, 29 सितंबर 2011

हिंदी के गौरव का दिन

उमेश चतुर्वेदी
तीन साल पहले की बात है....दिल्ली के प्रेस क्लब में एक हस्ताक्षर अभियान चलाया जा रहा था...इलाहाबाद में रह रहे एक साहित्यकार के बेटे उन्हें मानव संसाधन विकास मंत्रालय से आर्थिक मदद दिलाने के लिए इस अभियान में जुड़े हुए थे। उन्होंने इन पंक्तियों के लेखक के सामने भी वह चिट्ठी रखी, यह कहते हुए कि अगर उचित लगे तो इस पर हस्ताक्षर कर दो... पता नही उस अभियान ने उन्हें आर्थिक दुश्चिंताओं से मुक्त किया या नहीं...अब अमरकांत को भारतीय साहित्य के सर्वोच्च पुरस्कार मिलने की घोषणा हो चुकी है...लेकिन यह पुरस्कार भी उनकी जिंदगी को आर्थिक तौर पर पूरी तरह सुरक्षित शायद ही बना पाए। श्रीलाल शुक्ल को उनके ही साथ ज्ञानपीठ ने सम्मानित करने का निर्णय लिया है।

मंगलवार, 27 सितंबर 2011

हारूद का रद्द होना

उमेश चतुर्वेदी
कश्मीर घाटी में शांति लाने की बारूदी और राजनीतिक कोशिशों के बीच संस्कृति की धारा अब तक खामोश ही रही है...जिस कश्मीरी भाषा ने ललद्यद जैसी लब्धप्रतिष्ठ और क्रांतिकारी कवियत्री को पैदा किया हो...वहां की संस्कृति और साहित्यिक धारा का शांति के पक्ष में न उतरने की वजह भले ही बारूद की दुर्गंध और संगीनों की छांह रही हो...लेकिन पहली बार घाटी में संस्कृति की धारा उठती नजर आई थी। कश्मीर विश्वविद्यालय के श्रीनगर कैंपस और श्रीनगर के दिल्ली पब्लिक स्कूल में चौबीस से छब्बीस सितंबर तक कश्मीरी साहित्य का अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन हारूद होना था।

बुधवार, 21 सितंबर 2011

हिंदी को भी अन्ना का इंतजार

उमेश चतुर्वेदी
हिंदी पखवाड़े की धूम है...हिंदी को लेकर साल भर तक नाक-भौं सिकोड़ने वालों की जुबान बदल गई है...खासतौर पर सरकारी दफ्तरों में गोष्ठियों और सेमिनारों की धूम है...पूरे साल तक कोने में बैठे उंघता-सा दिखता रहा राजभाषा विभाग इन दिनों जा गया है...वैसे पूरे साल सोने और उंघने की ड्यूटी निभाते राजभाषा विभाग को 1951 से ही हिंदी पखवाड़े में जागने की आदत है...हर साल वह संकल्प भी लेता है...अपने कुछ चहेते साहित्यकारों या साहित्य के नाम पर तुकबंदी करने वालों को उपकृत करने का मौसम भी होता है हिंदी पखवाड़ा...लिहाजा लोकप्रिय किस्म के कवियों को बुलाकर उन्हें शॉल-श्रीफल पकड़ा कर उनसे चार-छह कविताएं सुन ली जाती हैं

शनिवार, 30 जुलाई 2011

पच्चीस साल का हंस

उमेश चतुर्वेदी
हिंदी में जब सांस्कृतिक पत्रिकाओं की मौत हो रही थी, धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी पत्रिकाओं के दिन लदने लगे थे, हिंदीभाषी इलाके की बौद्धिक और राजनीतिक धड़कन रह चुकी पत्रिका दिनमान के दम भी उखड़ने लगे थे, उन्हीं दिनों हंस को पुनर्जीवित करने का माद्दा दिखाना ही अपने आप में बड़ी बात थी। लेकिन कथा सम्राट प्रेमचंद का यह बिरवा भले ही पचास के दशक में सूख गया था, उसे फिर से अपनी उम्मीदों के जरिए खाद-पानी देकर ना सिर्फ जिंदा करना, बल्कि उसमें कोंपले निकालना राजेंद्र यादव के जीवट की ही बात थी। 1986 में पुनर्जीवित हुआ हंस अब पच्चीस साल का हो गया है और हिंदी क्षेत्र की सांस्कृतिक धड़कनों के प्रतीक के तौर पर राज कर रहा है। जिस समय आप ये पंक्तियां पढ़ रहे होंगे, दिल्ली के ऐवान-ए-गालिब सभागार में हंस के पुनर्जन्म की पच्चीसवीं सालगिरह की तैयारियां अपने चरम पर होंगी। नई कहानी आंदोलन के जरिए हिंदी कहानी के केंद्र में स्थापित हो चुके राजेंद्र यादव को हंस के बाद पैदा हुई साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्कारों वाली पीढ़ियां उनके विमर्शों के लिए कहीं ज्यादा जानेगी, बनिस्बत उनके कथा लेखन के लिए। राजेंद्र यादव भी मानते हैं कि हंस के संपादन के साथ ही उनका कथा लेखन कहीं पीछे छूट गया। लेकिन उन्हें इसका गम इसलिए नहीं है, क्योंकि उन्होंने जो साहित्य की दुनिया में हस्तक्षेप के लिए हंस का जो बिरवा लगाया था, जरूरी विमर्शों के जरिए उसने ना सिर्फ रचनात्मक हस्तक्षेप किया है, बल्कि हिंदी के वैचारिक धरातल को जरूरी आधार भी मुहैया कराया है। हर महीने संपादकीय के तौर पर छपने वाला उनका स्तंभ मेरी-तेरी उसकी बात की हिंदी क्षेत्र में अगर प्रतीक्षा की जाती है तो इसीलिए कि उसमें हर बार कुछ नया, कुछ ज्यादा बौद्धिक उत्तेजक और खास होता है। कथाकार राजेंद्र यादव की कलम के इस नवोन्मेष ने उन्हें साहित्यिक और सांस्कृतिक ही नहीं, बल्कि राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है। इस एक स्तंभ ने उन्हें बौद्धिक लोकप्रियता तो दिलाई ही, इसकी कीमत भी उन्हें चुकानी पड़ी। कई बार उनके विवादित विचारों ने राजनीतिक बवंडर भी खड़ा किया। लेकिन राजेंद्र यादव अपनी बात पर टिके रहे।
राजेंद्र यादव की एक खासियत यह है कि आप उनसे भले ही असहमत हों, लेकिन विमर्श में वे आपके विचारों को भी स्पेस देने का लोकतांत्रिक माद्दा रखते हैं। हंस की सालगिरह पर होने वाले एक कार्यक्रम में उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र आर्गनाइजर के संपादक रहे शेषाद्रि चारी को भी बोलने के लिए बुलाया था। हंस की चौबीसवीं साल गिरह के कार्यक्रम में कथाकार और महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के कुलपति विभूति नारायण राय को बुलाया था। तब विभूति नारायण राय हिंदी लेखिकाओं की आत्मकथाओं पर विवादित बयान देकर अलोकप्रिय हो चुके थे। हंस के मंच पर इसके लिए उनका जोरदार विरोध हुआ। राजेंद्र यादव ने उस वक्त के छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन को भी बुलाया था। तब विमर्श का विषय था – वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति। तब सलवा जुडूम के समर्थन के लिए विश्व रंजन का विरोध होना तय था। लेकिन विश्वरंजन नहीं आए। अकेले विभूति नारायण राय को ही लानत-मलामत झेलनी पड़ी। लानत-मलामत करने वाले वही लोग थे, जिनके विचारों की झलक राजेंद्र यादव के लेखन में भी दिखती है और जिसके समर्थक राजेंद्र यादव भी हैं। लेकिन इस विरोध प्रदर्शन से राजेंद्र यादव दुखी थे। उन्होंने कहा भी कि लोकतांत्रिक समाज में सक्रिय संवाद की गुंजाइश बनी रहनी चाहिए, चाहे वह संवाद विरोधी विचार से ही क्यों न हो।
हंस में प्रकाशित कहानियों की चर्चा के बिना ये लेख अधूरा ही रहेगा। हंस ने सृंजय जैसे कथाकार की कहानी कामरेड का कोट छापकर जैसे हिंदी साहित्य में नया भूचाल ही ला दिया था। उदय प्रकाश की कहानी और अंत में प्रार्थना तो जैसे बदलते दौर का दस्तावेज ही है। इस कहानी को भी पाठकों की कचहरी में लाने का श्रेय हंस को ही जाता है। उदय प्रकाश की ही कहानी पीली छतरी वाली लड़कियां और मोहनदास- जिस पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला- भी हंस ने ही प्रकाशित किया। गीतांजलिश्री, लवलीन, महेश कटारे, प्रियंवद, सारा रॉय जैसे ढेरों कहानीकारों की उद्वेलित करती कहानियों से हिंदी पाठकों को परिचित कराने का जरिया हंस ही बना। साहित्यिक और सांस्कृतिक पत्रकारिता विरोधी माहौल में हंस ने हिंदी पाठकों को संस्कारित करने और उनकी जरूरतें पूरी करने का भी बड़ा काम किया है। आर्थिक और राजनीतिक झंझावातों को झेलने के बावजूद अगर हंस जिंदा है तो उसके लिए राजेंद्र यादव की जीजिविषा ही बड़ी वजह है।

बुधवार, 27 जुलाई 2011

इस राह का अंत नहीं


उमेश चतुर्वेदी
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू अपने सामाजिक सरोकारों वाले फैसले के लिए जाने जाते हैं। कानून की नीरस किताबों और पेंचीदगियों से उलझने वाले न्यायविद के अलावा भी उनकी एक छवि है। कम से कम मध्य प्रदेश के जिस मालवा इलाके से वे आते हैं, वहां के साहित्यिक और सांस्कृतिक हलकों में उनकी संवेदनशील उपस्थिति नजर आती है तो इसकी वजह यह है कि साहित्य की गंग-जमुनी धारा में उनकी दिलचस्पी है। लेकिन हाल ही में इंदौर में भरोसा न्यास के एक कार्यक्रम की अध्यक्षता करते वक्त उन्होंने जो मांग रखी है, उसे आसानी से स्वीकार नहीं किया जा सकता। इस कार्यक्रम में निदा फाजली जैसे नामचीन शायर की मौजूदगी के बीच उन्होंने हिंदवी संस्कृति के मशहूर शायर गालिब को भारत रत्न देने की मांग दोहरा डाली। दरअसल वे दिल्ली में हर साल होने वाले अंतरराष्ट्रीय मुशायरा जश्न ए बहार में अपनी ये मांग पहले ही कर चुके हैं। मजे की बात यह है कि इंदौर में उन्होंने इसके लिए एक प्रस्ताव भी रख दिया और मालवा के तमाम बड़े पत्रकारों ने इसे लगे हाथों समर्थन भी दे डाला। प्रबुद्ध समझे जाने वाले लोगों ने इस मांग की जरूरत और उसके निहितार्थों को समझे बिना जिस तरह समर्थन दिया, उससे साफ है कि लोग इस मांग के दूरगामी असर को नहीं समझ पा रहे हैं।
गालिब की महानता पर किसी को शक नहीं हो सकता। उनकी शायरी के कायल वे लोग भी हैं, जिन पर देश की गंग-जमुनी संस्कृति को नुकसान पहुंचाने का आरोप है। लेकिन सवाल यह है कि क्या डेढ़ सौ साल पहले जिसने इस दुनिया को अलविदा कह दिया, उसे भारत रत्न जैसे सम्मान की दरकार है। गालिब की मौत 15 फरवरी 1869 को दिल्ली में हुई थी। फाकामस्ती के इस शायर की अहमियत और इज्जत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके गुजरने के डेढ सौ साल बीतने के बाद भी अपनी बात को गहरे तक पैठाने के लिए आज भी हम में से कई लोग उनकी शायरी का सहारा लेते है। ऐसे में क्या भारत रत्न देकर उनके साथ न्याय किया जा सकता है। जस्टिस मार्कंडेय काटजू का तर्क है कि जब सरदार पटेल और भीमराव अंबेडकर को उनकी मौत के बरसों बाद भारत रत्न दिया जा सकता है तो मिर्जा गालिब को क्यों नहीं। सरदार पटेल और अंबेडकर की तुलना मिर्जा गालिब से कम से कम एक स्तर पर नहीं की जा सकती। दोनों हालिया इतिहास की हस्तियां रहे हैं और आजाद भारत के बीच उन्होंने भी सांस ली है। अगर सिर्फ महानता के ही आधार पर ऐतिहासिक हस्तियों को भारत रत्न दिए जाने की परंपरा शुरू हो गई तो यह निश्चित जानिए कि भारतीय इतिहास की अंधेरी और उजली दोनों गलियों से ऐसे इतने नाम निकलने शुरू हो जाएंगे, जिन्हें भारत रत्न देते देते हम थक जाएंगे और शायद यह सूची कभी खत्म नहीं हो सकती। अगर मिर्जा गालिब को भारत रत्न सम्मान दिया गया तो हमारे विद्वत जन और संस्कृति प्रेमी बाल्मीकि से लेकर भास, कालिदास, भर्तृहरि लगायत मध्यकाल में सूर-तुलसी-कबीर और तेनाली राम तक पहुंच जाएंगे। कुछ लोगों के लिए मंगल पांडे और कुंवर सिंह तो कुछ के लिए खुदी राम बोस और बंकिमचंद्र भी भारत रत्न के लिए उपयुक्त व्यक्तित्व नजर आने लगेंगे। चाणक्य और चंद्रगुप्त से लेकर अल्लाउद्दीन खिलजी और न जाने कितने नाम भारत रत्न की इस सूची में शामिल करने की मांगें उठने लगेंगी। आज भी एक तबका ऐसा है, जो बार-बार पृथ्वीराज चौहान की अस्थियां अफगानिस्तान से लाने की मांग करता रहता है। उनकी नजर में पृथ्वीराज चौहान भी भारत रत्न के हकदार हो सकते हैं।
भारत में 1990 के दशक से क्षेत्रीय अस्मिताओं की पुनर्पहचान का एक नया दौर चल पड़ा है। राजनीतिक तौर पर ये अस्मिताएं अपनी ताकत हासिल कर भी रही हैं और अपने लिए नए प्रतीक और महानता के नए व्यक्तित्व भी तलाश भी कर रही हैं। भारतीय संविधान के दायरे में ही उनका अस्मिताबोध जारी है। एक – दो बार दबी जबान से महात्मा फुले और पेरियार को भी भारत रत्न देने की मांग उठी भी है। लेकिन भारत रत्न को लेकर कम से कम एक राष्ट्रीय सहमति के बोध की अंतर्धारा हमारे राष्ट्रीय मानस में बह रही है और वह इन शख्सियतों को महान मानते हुए भी कम से कम उन्हें भारत रत्न के विवाद से दूर रखना चाहती हैं। आम धारा तो यही मानती है कि निकट इतिहास में जिस शख्सियत ने भारतीयता को नए पायदान पर पहुंचाया है और अपनी सार्वजनिक सेवा के जरिए भारतीयता के कल्याण में योगदान दिया है, उसे ही भारत रत्न दिया जाना चाहिए। याद कीजिए, जब अंबेडकर और पटेल को भारत रत्न से नवाजा गया था। तब भी भारत में एक वैचारिक धारा ऐसी थी, जिसका मानना था कि पटेल और अंबेडकर की शख्सियत की पहचान भारत रत्न से भी आगे की है। यह भी सच है कि उन्हें राजनीतिक हितों के लिए भारत रत्न से नवाजा गया था। यही वजह है कि तब सवाल भी उठे थे। बेहतर तो यह होगा कि दूरवर्ती इतिहास की शख्सियत को भारत रत्न की परिधि से दूर ही रखा जाय। इससे नए विवादों से दूर रहने में मदद ही मिलेगी। अन्यथा अगर गालिब और तुलसी को भारत रत्न दिया जाना शुरू हो गया तो यकीन मानिए क्षेत्रीय अस्मिताओं की पहचान तलाश रहे समुदाय अपने इतिहास की शख्सियतों को भारत रत्न दिलाने के अभियान पर निकल पड़ेंगी। निश्चित तौर पर तब इन मांगों से निबटना आसान नहीं होगा और ऐतिहासिक शख्सियतों को भी शायद ही यह विवाद पसंद हो।

गुरुवार, 21 जुलाई 2011

प्रतिरोध का सिनेमा अभियान का पहला बलिया फिल्म फेस्टिवल

2006 से जन संस्कृति मंच द्वारा आयोजित प्रतिरोध का सिनेमा अभियान का उन्नीसवां और बलिया का पहला प्रतिरोध का सिनेमा फिल्म फेस्टिवल आगामी 10 और 11 सितम्बर को बलिया के बापू भवन टाउन हॉल में सुबह 10 बजे से होने जा रहा है। टाउन हॉल बलिया बलिया रेलवे स्टेशन के बहुत नजदीक है। जल्द ही हम अपने ब्लॉग www.gorakhpurfilmfestival.blogspot.comपर कार्यक्रम का विस्तृत ब्यौरा देंगे।
इस फेस्टिवल में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय महत्व के वृत्त चित्र, लघु फिल्म और फीचर फिल्मों के अलावा संकल्प, बलिया द्वारा भिखारी ठाकुर के प्रसिद्ध नाटक बिदेशिया का मंचन भी किया जाएगा। इसके साथ ही गोरख पाण्डेय की कविता पोस्टरों और जन चेतना के चितेरे के नाम से प्रगतिशील चित्रकार चित्त प्रसाद, जैनुल आबेदीन और सोमनाथ होड़ के प्रतिनिधि चित्रों की प्रदर्शनी भी आयोजित की जा रही है। फिल्म फेस्टिवल में प्रमुख भारतीय फिल्मकारों के शामिल होने की भी संभावना है।
प्रतिरोध के सिनेमा अभियान के दूसरे फिल्म फेस्टिवलों की तरह यह फेस्टिवल भी बिना किसी सरकारी, गैर सरकारी और एन जी ओ की स्पांसरशिप के आयोजित किया जा रहा है। प्रतिरोध की संस्कृति के इच्छुक ईमानदार सामन्य जन ही इसके स्पांसर हैं। इसलिए आपसे अनुरोध है कि इस आयोजन में हर तरह से शामिल होकर प्रतिरोध का सिनेमा अभियान को सफल और मजबूत बनाएँ। इस पूरे आयोजन में प्रवेश नि:शुल्क है और किसी भी प्रकार के औपचारिक निमंत्रण की जरुरत नही है। इस बारे में और जानकारी संकल्प ,जन संस्कृति मंच, बलिया के सचिव आशीष त्रिवेदी से उनके फोन नंबर 09918377816 या ashistrivedi1@gmail.com से हासिल की जा सकती है। (प्रेस विज्ञप्ति)

सोमवार, 18 जुलाई 2011

रचनाधर्मिता की नई जमीन

उमेश चतुर्वेदी
हिंदी की युवा रचनाधर्मिता इन दिनों कुछ ज्यादा ही उत्साही हो गई है। युवा उत्साह कई बार नई राह खोजने को प्रेरित करता है और इस दौरान खतरे से खेलने की प्रेरणा भी लेता है। उसे कामयाबी और नाकामयाबी की चिंता कम ही परेशान करती है। राजधानी दिल्ली के साहित्यिक गलियारों में इन दिनों हिंदी के कुछ युवा साहित्यप्रेमियों के इस उत्साह को खासतौर पर रेखांकित किया जा सकता है। ये युवा नई तरह से साहित्य का आलोचन कर रहे हैं और उसका नये-नए पाठों की खोज भी कर रहे हैं। इसमें उन्हें कितनी कामयाबी मिल रही है, इसका मूल्यांकन करना फिलहाल मुश्किल है, लेकिन यह सच है कि उन्होंने साहित्य की रपटीली राह की कंकड़ भरी जमीन को तोड़ कर उसे नई सज्जा देने की कोशिश जरूर की है। वाणी प्रकाशन के पुनर्पाठ कार्यक्रम को साहित्यिक की रपटीली-पथरीली जमीन को तोड़ने की कोशिश के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। पिछले दिनों वाणी ने मशहूर कथाकार यशपाल की रचना दिव्या के पुनर्पाठ का आयोजन किया तो उसकी कामयाबी को लेकर चिंताएं भी जताई गईं। क्योंकि इस एक रचना का पाठ दो पीढ़ियों के जरिए होना था। एक ही रचना को लेकर दो पीढ़ियां किस तरह सोचती हैं और एक ही रचना को वे कैसे लेती हैं, इस पुनर्पाठ में आना ही था। और हुआ भी वैसा ही। दिव्या को जिस तरह पुरानी पीढ़ी के श्रीभगवान सिंह और उनसे युवतर कवियत्री अनामिका ने जैसे लिया है, इन दोनों से युवतर पीढ़ी के दो आलोचकों वैभव सिंह और सत्यानंद निरूपम के पाठ अलग ही थे। और यह होना ही था। प्लेटो साहित्य का जब विवेचन करते हैं तो वे त्रिधाअपेत का सिद्धांत देते हैं। उनके मुताबिक एक विचार रचनाकार के मन में जन्म लेता है और उसे वह मूर्त जब बनाता है तो दरअसल वह अपने विचार की कॉपी करने की कोशिश करता है, लेकिन हूबहू ऐसा नहीं होता। और एक बार जब रचना बन जाती है तो वह सार्वजनिक हो जाती है और जरूरी नहीं है कि उसका पाठ करने वाला भी हूबहू रचनाकार के मूल वैचारिक आधार को ग्रहण कर सके। यानी एक रचना का तीन बार विचलन होता है और प्लेटो इसे ही त्रिधाअपेत कहते हैं। त्रिधा अपेत की यह धारणा साहित्य शास्त्र की किताबों में सैद्धांतिक तौर पर तो है। लेकिन हर रचना के लिए यह नियम लागू होता है। जरूरी नहीं कि मैं किसी रचना का पाठ जिस तरीके से करूं और उसके बिम्बों को ग्रहण करूं, उसके संदेश को पकड़ूं, कोई दूसरा शख्स भी ठीक वैसे ही पकड़े। क्योंकि किसी भी रचना की ग्रहणशीलता में ग्रहण करने वाले की पृष्ठभूमि और उसके जरिए विकसित ज्ञान का भी महत्वपूर्ण हाथ होता है। जाहिर है कि सबका ज्ञान भी एक जैसा नहीं होता और सबकी पृष्ठभूमि और किसी ज्ञान को समझने की परिस्थियां भी एक नहीं होतीं। ऐसे में संभव है कि एक ही रचना का हर दूसरा शख्स अपने ढंग से पाठ करे। वैसे यह बेहद गूढ़ और वैचारिकता वाला विषय है। लेकिन कहने का मतलब यह है कि हिंदी में अब ऐसी जमीनें तोड़ने की कोशिशें हो रही हैं। निश्चित तौर पर प्रकाशक भी इस दिशा में आगे आ रहे हैं। लेकिन नई रचनाधर्मिता के बिना इस यज्ञ को पूरा माना भी नहीं जा सकता।
हिंदी की साहित्यिक गोष्ठियों में लोग अगर उंघते और उबासियां लेते हुए देखे जाते हैं तो इसकी खास वजह तुम मुझे मीर कहो- मैं तुझे गालिब कहूं की परिपाटी है। शायद ही कभी हिंदी के मूर्धन्य साहित्यकार गोष्ठियों में नई बात कह कर ऊर्जा का संचार करने की कोशिश करते हों। जहां ऐसा माहौल रहा है, वहां नई रचनाधर्मिता की यह कोशिश निश्चित रूप पर सराही जानी चाहिए। वैसे भी पुनर्पाठ जैसे आयोजनों में नए पाठकों और छात्र-छात्राओं की उपस्थिति ज्यादा ही दिख रही है। किसी रचना के तमाम पाठों से उनका साबका पड़ रहा है और इसे वे अपनी रचनात्मक जिंदगी की उपलब्धि के तौर पर देख रहे हैं। निश्चित तौर पर ऐसे आयोजन साहित्य से ना सिर्फ नई पीढ़ी को जोड़ने का सबब बनेंगे, बल्कि साहित्यिक कद्रदानों को बढ़ावा देने में भी मददगार होंगे। जिसका फायदा अंतत: साहित्य को ही होना है।