शनिवार, 21 जून 2008

भोजपुरी हमार, बोली बाजार

उमेश चतुर्वेदी
दिल्ली, मुंबई से लेकर कोलाकाता तक उपहास और उपेक्षा का पात्र रहा भोजपुरी समाज अचानक क्षमतावाला बाजार हो गया है. इस संभावित और अनछुए बाजार में इतनी ताकत नजर आ रही है कि मीडिया की दुनिया में उतर रहे बड़े खिलाड़ी बाकायदा खबरिया चैनल लाने की तैयारी में जुट गए हैं। जबकि मीडिया और इंटरटेनमेंट की दुनिया के नामीगिरामी हस्तियां मनोरंजन चैनल लेकर बाजार में उतरने की तैयारी में हैं।

करीब दो दशक पहले पत्रकारों की जिदगी को केंद्र में रखकर नईदिल्ली टाइम्स नाम की फिल्म बना चुके पी के तिवारी के दिमाग की उपज है महुआ चैनल। महुआ चैनल के समाचार प्रमुख अंशुमान त्रिपाठी के मुताबिक इस चैनल में जहॉ भोजपुरी में खबरें होंगी, वहीं दमदार प्रोग्रामिग भी जोर रहेगा। इसके लिए अंशुमान त्रिपाठी की टीम शिद्दत से जुटी हुई है। वहीं हमार टीवी के भी आन एयर होने की तैयारी शुरू हो चुकी है। इस चैनल को पूर्व मंत्री मतंग सिंह की कंपनी लाने जा रही है। मतंग सिंह नरसिंह राव सरकार में मत्री रह चुके हैं। असम से राज्यसभा के लिए चुने जाते रहे मतंग सिंह की मूलत- बिहार के रहने वाले हैं. शायद यही वजह है कि उनकी दिलचस्पी भदेसपन की भाषा में खबरिया चैनल लाने की है। इस चैनल के प्रमुख हैं कुमार संजाìय सिंह। कभी कुमार सजय सिंह के नाम से जाने जाते रहे संजाìय का टेलीविजन और प्रिंट पत्रकारिता में अच्छा खासा अनुभव है। फिलहाल ये चैनल तैयारियों में जुटा हुआ है। इसके अलावा पुरूवा नाम का एक चैनल भी भोजपुरी खबरों की दुनिया में दस्तक देने की तैयारियों में जुटा हुआ है। इसी तरह एक ग्रुप गंगा नाम से भी चैनल लाने की तैयारी में जुटा हुआ है।

आखिर क्या वजह है कि भदेसपन की इस भाषा को लेकर मीडिया दिग्गज़ों और नए खिलाड़ियों को अपने मीडिया साम्राज्य के लिए काफी संभावनाएं नजर आ रही हैं। दरअसल पिछले दो साल में भोजपुरी फिल्मों ने जिस तरह सफलता के नए मानदंड स्थापित किए हैं उससे एक वर्ग को लगता है कि मीडिया और इंटरटेनमेंट की दुनिया के लिए भोजपुरी का बड़े बाजार के तौर पर उभरना अभी बाकी है। इन मीडिया हाउसों को लगता है कि अगर उन्होंने शुरूआती बाजी मार ली और बाजार पर अपनी पकड़ बना ली तो सफल होना आसान होगा। वैसे भी काफी कम बजट में बनी भोजपुरी फिल्में करोड़ों का बिजनेस कर लेती हैं।

दो साल पहले बनी भोजपुरी फिल्म ससुरा बड़ा पैसे वाला ने सफलता के वे झंडे गाड़े कि भोजपुरी में लोगों को बड़ा बाजार नजर आने लगा। ये फिल्म महज 27 लाख रूपए में बनी थी और उसने छह करोड़ का बिजनेस किया। इसके बाद तो मनोज तिवारी की फिल्म दरोगा बाबू आई लव यू समेत कई फिल्मों की बाढ़ आ गई। अवधीभाषी रवि किशन भी भोजपुरी सिनेमा के सुपर स्टार हो गए। भोजपुरी का जलवा ही कहेंगे कि अमिताभ बच्चन और मिथुन चक्रवर्ती भी सिल्वर स्क्रीन पर भोजपुरी बोलते नजर आने लगे। नगमा को भी भोजपुरी बोलने से परहेज नहीं रहा। ऐसे में मीडिया और इंटरटेनमेंट के दिग्गज भला क्यों पीछे रहते। सूचना और प्रसारण मत्रालय से छन कर आ रही खबरों पर भरोसा करें तो मीडिया की दुनिया में अपनी सफलताओं का परचम लहरा चुके जी टेलीफिल्म और श्री अधिकारी ब्रदर्स भी भोजपुरी में इंटरटेनमेंट चैनल लाने की तैयारी में जुट गए हैं। पूर्व सूचना और प्रसारण सचिव रतिकॉत बसु की कंपनी भी भोजपुरी में नया चैनल लाने की तैयारी में है। खबरिया चैनल की दुनिया में हाल ही में कदम रख चुकी हरियाणा के पूर्व मंत्री विनोद शर्मा की कंपनी इंडिया न्यूज भी भोजपुरी में न्यूज चैनल लाने की तैयारी में जुटी है।

वैसे हिंदी में राष्ट्रीय कहे जाने वाले कम से दस चैनल हो गए हैं। कुछ एक अभी भी आने की तैयारी में हैं। लेकिन ये भी सच है कि हिंदी की राष्ट्रीय टेलीविजन पत्रकारिता में इससे ज्यादा स्पेस की गुंजाइ?श फिलहाल नहीं दिखती। लिहाजा इन दिनों क्षेत्रीय चैनलों की भी जोरदार तैयारियॉ चल रही हैं। वैसे इसकी शुरुआत इनाडु टीवी ने उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड, बिहार-झारखंड, मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ और राजस्थान के लिए अलग से चार क्षेत्रीय चैनल लाकर क्षेत्रीय टीवी पत्रकारिया की हिंदी में शुरूआत की थी। गुजराती, बॉग्ला, मराठी, तेलुगू, तमिल और कन्नड़ की टीवी पत्रकारिया में इनाडु ने ही पहले-पहल कदम बढ़ाया। अब तो जी और स्टार के भी गुजराती, मराठी, बॉग्ला और तेलुगू में अपने स्वतंत्र चैनल हैं।

अब इन क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों के अपने स्वतंत्र चैनल हो सकते हैं तो सवाल ये है कि 19 करोड़ लोगों की भाषा भोजपुरी में अपना कोई चैनल नहीं हो सकता है। टीआरपी की दुनिया में सबसे बड़ा बाजार मुंबई है। आज हालत ये है कि मुंबई में भी पूरबिये लोगों की संख्या करीब चालीस लाख हो है। टीआरपी के लिहाज से दूसरे बड़े बाजार दिल्ली में भी करीब चालीस लाख भोजपुरीभा?षी और पूरबिए हैं। कोलकाता की 56 फीसदी जनसंख्या गैर बॉग्लाभाषी है। जिसमें सबसे ज्यादा लोग पूवी उत्तर प्रदेश और बिहार के भी लोग हैं। मध्यवर्गीय बाजार में इनकी भी हैसियत कोई कम नहीं है। इसके साथ ही मारीशस, फिजी, गुयाना जैसे देशों में भी भोजपुरी भाषियों की संख्या लाखों में हैं। जाहिर है- इस भाषा में भी एक बड़ा बाजार इंतजार कर रहा है। और मीडिया के नए-पुराने खिलाड़ियों की इसी बाजार पर निगाह है।

लेकिन सबसे बड़ी आशंका इन चैनलों के कंटेंट को लेकर है। साठ के दशक में भोजपुरी में बनी पहली फिल्म गंगा मईया तोहे पियरी चढ़इबो में एक सामाजिक संदेश भी था। लागी नाहीं छूटे राम से लेकर दूल्हा गंगा पार के और रूठ गइले संइया हमार जैसी फिल्मों में ये परंपरा जारी रही। लेकिन हाल के दिनों में बनी भोजपुरी फिल्में कंटेंट और कथ्य के स्तर पर कुछ खास छाप नहीं छोड़ पाई हैं। यही हाल इस इलाके के लिए रिकार्ड किए जा रहे म्यूजिक की भी है। सबसे बड़ा खतरा ये है कि खबरों में भले ही ये प्रवृत्ति ना दिखे, भोजपुरी चैनलों की प्रोग्रामिग पर इसका असर दिख सकता है। ऐसे में ये चैनल कहीं हंसी का पात्र ना बन जाएं, इसका खास खयाल रखा जाना होगा जरूरी होगा, तभी खबरिया चैनलों की दुनिया में भदेसपन की भाषा के ये चैनल भोजपुरी लोगों के विकास के साथ ही उनकी सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं को मुखर आवाज देने में सफल होंगे।

शनिवार, 14 जून 2008

जाति न पूछो साधु की ...

उमेश चतुर्वेदी
हिंदी ब्लॉग जगत में इन दिनों मीडिया में पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक लोगों की कमी को लेकर कुछ लोग हलकान हुए जा रहे हैं। उन्हें लगता है कि अगर मीडिया में पिछड़े, अल्पसंख्यक और दलितों की भागीदारी ज्यादा होती तो शैक्षिक संस्थानों में आरक्षण और ऐसे ही दूसरे मसलों पर मीडिया की भूमिका कुछ और ही होती। नरेंद्र मोदी समेत हिंदू( फासिस्टों ) संगठनों को लेकर मीडिया की सोच कुछ और ही होती। दलितों के अधिकारों को जोर-शोर से उठाया जाता। इन लोगों को लगता है कि लालू यादव और मायावती जैसे पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक तबके के नेताओं के प्रति भी सवर्ण मीडिया का रूख कुछ दूसरा ही होता। यानी इस चर्चा का प्रमुख लब्बोलुबाब ये है कि मीडिया की आज की अतिवादिता के लिए यह सवर्णवाद ही जिम्मेदार है।
यहां एक बात बता देना मैं जरूरी समझता हूं। आमतौर पर समाजवादियों और वामपंथियों में तमाम मुद्दों पर वैचारिक मतभेद रहते हैं। लेकिन इस सवर्णवाद की चर्चा दोनों तबके ने मिलकर शुरू की। इसे लेकर सबसे पहला सर्वेक्षण मेरे क्लासफेलो वामपंथी एक्टिविस्ट जितेंद्र कुमार, वरिष्ठ वामपंथी पत्रकार अनिल चमड़िया और समाजवादी विचारक और चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव ने किया। इस सर्वेक्षण का उद्देश्य समानता का दावा करने वाले पत्रकारिता और मीडिया संस्थानों का आइना दिखाना था। लेकिन ब्लॉग पर जिस तरह ये चर्चा मीडिया की अतिवादिता का इसे कारक बनाने को लेकर होती जा रही है - शायद इस सर्वेक्षण का ये उद्देश्य भी नहीं था।
यह सच है कि मीडिया की भर्तियों में अपनी तरह का एक खास वर्गवाद जोरों पर है। लेकिन मैं कम से कम इससे असहमत हूं कि इसमें सवर्णवाद का बोलबाला है। नाम से ही जाहिर है कि मैं ब्राह्मण परिवार से आता हूं। लेकिन इसका मुझे तो कोई फायदा कम से कम इस नाम पर नहीं मिला। जबकि मैं कई बड़े ब्राह्मण पत्रकारों के यहां नौकरी पाने का दरबार लगाता रहा हूं। लेकिन उन्होंने उन लोगों को पसंद किया -जो किसी और विरादरी के थे। मैं नाम नहीं गिनाना चाहता, वक्त आएगा तो इससे भी परहेज नहीं रहेगा। अखबारों में छपने के लिए ब्राह्मणवाद ने भी मेरी मदद नहीं की। जबकि कई अखबारों में छापने की स्थिति में कई ब्राह्मण नामधारी पत्रकार रहे। अपने बीच के संघर्ष के दिनों में ब्राह्मण पत्रकारों ने तो मुझे जमकर टरकाया।
जहां तक मैंने देखा है कि मीडिया संस्थानों में नौकरी सिर्फ ब्राह्मण या दलित के नाम पर नहीं मिलती है। वहां नौकरी पाने के लिए विचारधारा और चंपूगिरी अहम भूमिका निभाती है। अगर नौकरी देने की स्थिति में दक्षिणपंथी पत्रकार होते हैं तो उन्हें अपनी ही विचारधारा के पत्रकार पसंद आते हैं। अगर भर्तियां करने की हालत में वामपंथी विचारक रहे तो उन्हें आईसा और एसएफआई से जुड़े संघर्षशील ही पसंद आते हैं - भले ही उन्हें एक लाइन ठीक से लिखना न आता हो और ना ही उन्हें समाचार की समझ हो। इसे आप क्या कहेंगे। ऐसी सूचनाएं आपको हर चैनल और हर अखबार में मिल जाएंगी। ऐसे में मारा जाता है - बेचारा वह संघर्षशील, जो अपने छात्र जीवन में ना तो एबीवीपी या आईसा से जुड़ा नहीं रहा। उसे नौकरी मिल भी गई और ग्रुप में शामिल नहीं हुआ तो उसके इक्रीमेंट और प्रोमोशन का भगवान ही मालिक है।
रही बात मीडिया के कंटेंट सुधरने की - तो मित्रों आपके आसपास कई ऐसे रसूखदार लोग होंगे- जो सुधार और उदारीकरण का जमकर विरोध करते रहे हैं। लेकिन अपने अखबार या टीवी चैनल में प्रबंधन की इच्छा के नाम पर भूत नचाते रहते हैं, सेक्स की छौंक दर्शकों को परोसते रहते हैं। जब चैनल चलाने या अखबार निकालने की बारी आती है तो उनकी सारी क्रांतिधर्मिता धरी की धरी रह जाती है। वैसे इसका भी कोई ठोस सबूत नहीं है कि प्रबंधन ने उन्हें ऐसा करने के लिए कहा ही हो - लेकिन प्रबंधन के नाम पर ऐसा करने में उन्हें अपनी क्रांतिधर्मिता में कोई कमी नजर नहीं आती। दक्षिणपंथी पर तो आरोप लगते ही हैं, वह बेचारा बना ही ऐसा है। लेकिन क्रांति करने वाले लोग क्यों झुक जाते हैं, ये अब तक मेरी समझ में नहीं आया। आपको नजर नहीं आ रहा हो मित्रों इस नजरिए से अब मीडिया संस्थानों की ओर देखिए। आपको इस बहस का औचित्य समझ में आ जाएगा।

मंगलवार, 10 जून 2008

आखिरकार मुंशी जी को मिली फुर्सत

आखिरकार भारतीय जनसंचार संस्थान के पत्रकारिता के छात्रों को डिप्लोमा देने के लिए सूचना और प्रसारण मंत्री प्रियरंजन दास मुंशी ने वक्त निकाल ही लिया। दीक्षांत समारोह 12 जून को किया जा रहा है। जिसमें मुख्य अतिथि के तौर पर विदेशमंत्री प्रणव मुखर्जी भी हिस्सा ले रहे हैं। बंगाल के दो-दो महाशय इस बार दीक्षांत समारोह की शोभा बढ़ाएंगे। छात्रों के डिप्लोमा की मियाद पिछले 30 अप्रैल को ही खत्म हो गई है। लेकिन मुंशी जी की डायरी में पत्रकारिता के छात्रों की औकात कुछ खास नहीं थी। लिहाजा वे वक्त ही नहीं निकाल पा रहे थे। रही बात संस्थान की अफसरशाही की - तो उसकी औकात कहां बिना अपने मंत्री के इशारे के कोई कदम उठाए। वैसे दावा तो किया जाता है कि ये संस्थान स्वायत्त है। लेकिन मंत्री की मर्जी के बगैर यहां शायद ही कभी पत्ता हिलता हो। वैसे वामपंथी दल अक्सर भारतीय इतिहास अनुसंधान संस्थान और एनसीईआरटी की स्वायत्तता की रक्षा के लिए संसद से लेकर बाहर तक तलवार निकालते रहते हैं। लेकिन इस संस्थान की स्वायत्तता को बनाए रखने की ओर उनका ध्यान नहीं जाता।
वैसे भी पहले ये कार्यक्रम सुबह साढ़े दस बजे होना प्रस्तावित था। लेकिन मंत्री जी को कुछ नया काम निकल आया - लिहाजा अब ये कार्यक्रम सुबह नौ बजे ही होगा। संस्थान के इतिहास में ये पहला मौका है - जब इतनी देर से दीक्षांत समारोह आयोजित किया जा रहा है।

मंगलवार, 27 मई 2008

संचार क्रांति की दस्तक !

भारत के ग्रामीण इलाकों में भी तेज ब्राडबैंड सुविधाएं मिलने का दिन नजदीक आता जा रहा है। केंद्र सरकार ने ग्रामीण इलाकों में ब्राडबैंड सेवा के विस्तार के लिए दो सौ करोड़ रूपए के कोष का ऐलान किया है। इसमें सरकार के साथ ही निजी कंपनियों का भी हिस्सा होगा। केंद्रीय संचार राज्य मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के मुताबिक इसमें से 150 करोड़ की रकम जहां निजी क्षेत्र से इकट्ठा किया जाएगा- वहीं 50 करोड़ की रकम भारत सरकार मुहैय्या कराएगी। सिंधिया ने एक साल के भीतर पूरे देश में एक लाख बारह हजार ब्राडबैंड केंद्र स्थापित करने का भी भरोसा दिलाया है। सरकार की घोषणा से ये जाहिर है कि आने वाले दिनों में भारतीय भाषाओं की वर्चुअल दुनिया का तेज विस्तार होने वाला है। अगर ऐसा रहा तो तय मानिए- भारत में नई संचार क्रांति ही होगी।

मंगलवार, 20 मई 2008

गांवों में भी इंटरनेट का बढ़ रहा है जोर

भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या पिछले साल 4 करोड़ 90 लाख रही। जिसमें सबसे ज्यादा शहरी लोगों ने सर्फ किया। ये संख्या करीब चार करोड़ रही- जबकि ग्रामीण इलाकों के लोगों की संख्या करीब नब्बे लाख रही है। महीने में करीब एक बार सर्फ करने वालों की संख्या लगभग 3 करोड़ 50 लाख रही। जिसमें से तीन करोड़ लोग शहरी इलाकों से थे- जबकि पचास लाख लोग गाम्रीण इलाकों से रहे। ये आंकड़े अनुसंधान तथा ऑनलाइन सलाहकार फर्म जस्टकंसल्ट ने जारी किए हैं। भारत ऑनलाइन 2008 नामक सर्वेक्षण के मुताबिक भारतीय शहरों में हर 10 में से एक यानी करीब 10 फीसदी आबादी इंटरनेट से जुड़ी है। सबसे दिलचस्प बात ये है कि इसमें से भी करीब 70 प्रतिशत लोगों की पसंद भारतीय भाषाओं में सर्फ करना है। जाहिर है कि देश में देसी भाषाओं के इंटरनेट का भविष्य बेहतर है। जस्ट कंसल्ट की इस रिपोर्ट के बाद उम्मीद की जा रही है कि देसी भाषाओं के इंटरनेट उपभोक्ताओं में और उछाल आ सकता है।

गुरुवार, 15 मई 2008

तो नंबरों के खेल में शामिल है गिफ्ट...

अब तक ये ही माना जाता था कि अखबार और पत्रिकाएं ही गिफ्ट दे-देकर अपना सर्कुलेशन बढ़ाते हैं। इसके लिए उनकी आलोचना भी होती रही है। लेकिन अब खुलासा हो गया है कि टीआरपी की माया के पीछे भी गिफ्ट महाराज का हाथ है। ट्राई की ओर से टीआरपी की वैकल्पिक रणनीति तैयार करने के लिए ट्राई ने 15 मई को एक बैठक बुलाई थी। इसी बैठक में खुद
टेलीविजन ऑडिएंस मीजरमेंट यानी टैम के सीईओ एल वी कृष्णन इजहार किया कि जिन घरों में टीआरपी के मीटर लगे हुए हैं-उनके सदस्यों को गिफ्ट दिया जाता है। सबसे बड़ी बात ये कि ऐसा करने में उसे कोई बुराई भी नजर नहीं आती। ऐसे में क्या गारंटी है कि टेलीविजन चैनलों के कर्ता-धर्ता गिफ्ट देकर या टैम अधिकारियों के जरिए टीआरपी मीटर वाले घरों के सदस्यों तक गिफ्ट पहुंचा कर अपनी रेटिंग में कमीबेशी नहीं कराते होंगे।
जब इंडियन रीडरशिप सर्वे में ये सब संभव है तो टीआरपी में ऐसा क्यों नहीं हो सकता ..पिछले साल राजस्थान के दो प्रमुख हिंदी अखबारों का विवाद सामने आया था। एक का आरोप था कि दूसरे ने आईआरएस के सर्वेक्षकों को पटाकर - घूस देकर अपनी पाठक संख्या ज्यादा दिखाई है। अब हमें तैयार रहना होगा कि प्रतिद्वंदी चैनलों के बीच भी ऐसे आरोप-प्रत्यारोप के दौर शुरू हो सकते हैं।

मंगलवार, 13 मई 2008

पार्टनर आपकी बीट क्या है ....

उमेश चतुर्वेदी
जानकार कहते हैं कि अगर पुलिस कांस्टेबल की कमाऊ बीट बदल दी जाय तो उसके दिल पर सांप लोटने लगता है। कुछ ऐसा ही हाल दिल्ली में राजनीतिक दलों को कवर कर रहे कुछ पत्रकारों का भी है। खासतौर पर जो लोग कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी कवर करते हैं, उनमें से कुछ लोगों की हालत ये है कि अगर उनकी ये बीट ब्यूरो चीफ या राजनीतिक संपादक बदल दे तो उनका दिल का चैन और रात की नींद खो जाती है।
कांग्रेस बीट कवर करने वाले प्रिंट मीडिया के पत्रकारों में एक ऐसा ग्रुप सक्रिय है- जो हर नए आने वाले पत्रकार और अपने ग्रुप से बाहर के पत्रकारों को सवाल नहीं पूछने देना चाहता। गलती से उसने अपने अखबार और इलाके की जरूरत के मुताबिक कोई सवाल पूछ लिए तो समझो- उसकी शामत आ गई। इनमें वरिष्ठ भी हैं और गरिष्ठ पत्रकार भी हैं। पूरे ग्रुप में से कोई हो सकता है , उस सवाल पर मुंह ही बिचका ले। कोई वरिष्ठ या गरिष्ठ ये भी कह सकता है - ह्वाट ए हेल क्वेश्चन यार ...हो सकता है इस ग्रुप का कोई पत्रकार सवाल पूछने वाले पत्रकार से मुखातिब ये भी बोलता पाया जाए- अरे चुप भी रहोगे।
1999 के चुनाव में कई बार दैनिक भास्कर की ओर से मुझे भी कांग्रेस की ब्रीफिंग कवर करने जाना पड़ता था। विज्ञान और तकनीकी मंत्री कपिल सिब्बल तब प्रवक्ता का जोरदार तरीके से मोर्चा संभाले हुए थे। उनकी ब्रीफिंग के बाद उस ग्रुप के पत्रकार उनकी डीप ब्रीफिंग में पहुंच जाते थे और लगे हाथों उंगलियों से गिनकर बताने लगते थे कि कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभर रही है। कई तो उसे दो सौ का आंकड़ा पार करा देते तो कई सवा दो सौ। इस जमात के लोग आज भी कांग्रेस कवर कर रहे हैं। मैं उन्हीं दिनों से कपिल सिब्बल का कायल हूं। अपने ईमानदार आकलन से वे पूछने लगते कि ये आंकड़ा कहां से आएगा तो उस जमात के चेहरे पर हवाईयां उड़ने लगतीं। 1999 के चुनावी नतीजे गवाह हैं कि कपिल सिब्बल सही थे और कोटरी में शामिल गिरोहबाजों का आकलन कितना हवाई था। यहां ये बता देना जरूरी है कि डीप ब्रीफिंग में पार्टियों के प्रवक्ता ऑफ द बीट जानकारियां देते हैं। उन्हें आप रिकॉर्ड पर उनके हवाले से नहीं पेश कर सकते।
जब भी हिंदी और अंग्रेजी पत्रकारिता की चर्चा होती है - अंग्रेजी के पत्रकारों को ज्यादा प्रोफेशनल बताया जाता है। लेकिन इस गिरोहबाजी में अंग्रेजी के कई वरिष्ठ पत्रकार शामिल हैं। मेरी तो संसद के कमरा नंबर 53 की एक ब्रीफिंग में इस गिरोह से भिड़ंत भी हो चुकी है। उस वक्त राबड़ी देवी की बिहार में सरकार थी। वहां कहीं जनसंहार हुआ था। संयोग से उसके पहले के जनसंहार के दौरान कांग्रेस ने बयान दिया था कि अगर बिहार में जनसंहार रोकने में राबड़ी सरकार बिफल हुई तो कांग्रेस समर्थन वापस ले लेगी। उस वक्त बिहार में राबड़ी सरकार का कांग्रेस समर्थन कर रही थी। संयोग से उसी दिन जयराम रमेश ने कांग्रेस की आर्थिक नीतियों की आलोचना की थी। बहरहाल उस दिन की ब्रीफिंग में कांग्रेस के पुराने बीटधारी पत्रकारों ने इसी पर बहस-मुबाहिसा तब की कांग्रेस प्रवक्ता मार्गरेट अल्वा से शुरू कर दिया था। इसी बीच हमारे मित्र जितेंद्र कुमार ने मार्गरेट अल्वा से सवाल पूछा कि क्या कांग्रेस अब राबड़ी सरकार से समर्थन वापस लेगी। जितेंद्र तब प्रभात खबर के दिल्ली ब्यूरो में काम करते थे। अब दैनिक हिंदुस्तान के रांची में वरिष्ठ संवाददाता हैं। जितेंद्र का सवाल आया नहीं कि कांग्रेस बीटधारियों ने उन्हें हूट करना शूरू किया। इसके बाद मुझसे रहा नहीं गया और झड़प हो गयी।
कई बार असहज सवालों से ऐसे ग्रुप के पत्रकार प्रवक्ताओं और नेताओं को उबारने के लिए सवाल को ही घुमा देते हैं या बीच में ही टपककर दो कोनों से ऐसा सवाल पूछेंगे कि बहस की धारा ही बदल जाएगी। मजे की बात ये है कि अब टीवी के भी कई पत्रकार ऐसे ग्रुपों में शामिल हो गए हैं।
सवाल ये है कि क्या पत्रकारिता के मानदंडों के लिए ये प्रवृत्ति अच्छी है..क्या इससे पत्रकारिता की पहली शर्त वस्तुनिष्ठता बनी रह सकती है। जवाब निश्चित रूप से ना में है। ऐसे में जरूरत है कि इस कोटरी पत्रकारिता की अनदेखी की जाय और ये काम नए पत्रकार ही कर सकते हैं।