सोमवार, 14 मई 2012


काटजू के खिलाफ हाईकोर्ट में अवमानना याचिका दायर
नेशनल आरटीआई फोरम की कन्वेनर डॉ नूतन ठाकुर ने प्रेस काउन्सिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू और सचिव विभा भार्गव के खिलाफ इलाहाबाद हाई कोर्ट के लखनऊ बेंच में एक अवमानना याचिका दायर की है। यह अवमानना याचिका पीआईएल संख्या 2685/2012 के सम्बन्ध में है। इस पीआईएल में नूतन ने 04 अप्रैल 2012 को सेना कूच से सम्बंधित दो समाचारों के सम्बन्ध में जांच करने हेतु प्रार्थना की थी। जस्टिस उमानाथ सिंह और जस्टिस वी के दीक्षित की बेंच ने 10 अप्रैल 2012 के अपने निर्णय में सचिव, सूचना और प्रसारण मंत्रालय एवं अन्य को आदेशित किया था कि वे सुनिश्चित करें कि सेना के मूवमेंट से सम्बंधित कोई भी खबर प्रिंट एवं इलेक्ट्रौनिक मीडिया में प्रकाशित ना हो।

शुक्रवार, 11 मई 2012


प्रभाषजी ने पूरी हिंदी पत्रकारिता को दिशा और भाषा दी
शंभूनाथ शुक्ल
वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल ने प्रभाष जी पर यह संस्मरण अपने फेसबुक वाल पर लिखा है। जिसे वहां से लेकर साभार प्रकाशित किया जा रहा है- मॉडरेटर


जनसत्ता के एक पुराने साथी और वरिष्ठ पत्रकार ने राजीव मित्तल ने जनसत्ता के फाउंउर और उस पत्र के प्रधान संपादक रहे दिवंगत प्रभाष जोशी के बारे में टिप्पणी की है कि माली ने ही बगिया उजाड़ डाली। शायद चीजों का सरलीकरण है। उत्साहीलाल लखनौआ पत्रकार कुछ ज्यादा ही नाजुक होते हैं न तो उनमें संघर्ष का माद्दा है न चीजों की सतह तक जाने का साहस। जब तक रामनाथ गोयनका जिंदा रहे एक भी ऐसा मौका नहीं मिलता जब जनसत्ता के प्रसार के लिए प्रभाष जी चिंतित न रहे हों। लेकिन आरएनजी की मृत्यु के बाद हालात बदल गए और जनसत्ता प्रबंधन की कुचालों का शिकार हो गया। यह सच है कि जनसत्ता को एक्सप्रेस प्रबंधन ने कभी पसंद नहीं किया लेकिन आरएनजी के रहते प्रभाष जी प्रबंधन की ऐसी कुचालों का जवाब देते रहे। लेकिन विवेक गोयनका, जो खुद हिंदी नहीं जानते थे उनका इस हिंदी अखबार से क्या लगाव हो सकता था। दिल्ली के एक्सप्रेस ग्रुप में मुख्य महाप्रबंधक के रूप में राजीव तिवारी की नियुक्ति और जनसत्ता के संपादकीय विभाग के कुछ अति वामपंथी तबकों ने मिलकर जनसत्ता को भीतर से पिचका दिया। राजीव मित्तल जनसत्ता में तब आए जब जनसत्ता का पराभव काल शुरू हो चुका था वरना जनसत्ता ने उस वक्त की राजनीति और पत्रकारिता को एक ऐसी दिशा और दशा प्रदान की थी जो न तो कभी टाइम्स ग्रुप अपने हिंदी अखबार नवभारत टाइम्स को दे पाया था न बिड़ला की धर्मशाला कहा जाने वाला हिंदुस्तान।

बुधवार, 9 मई 2012


इंटरनेट कानूनों का सख्ती से पालन हो - इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाई कोर्ट, लखनऊ बेंच ने 8 मई को आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर और उनकी पत्नी सामाजिक कार्यकर्ता नूतन ठाकुर द्वारा इलाहाबाद हाई कोर्ट, लखनऊ बेंच में दायर रिट याचिका संख्या 3489/2012 में आदेश देते हुए कहा है कि आज का युग इंटरनेट का युग है, अतः इंटरनेट सम्बंधित नियमों को पूरी सख्ती से पालन किया जाए. अमिताभ और नूतन ने अपना पक्ष कोर्ट में स्वयं रखा जबकि भारत सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता अशोक निगम ने रिट याचिका का इस आधार पर विरोध किया कियाचीगण ने याहू,गूगल आदि को प्रतिवादी नहीं बनाया है.

रविवार, 29 अप्रैल 2012


हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग और सोशल मीडिया एकदूसरे के पूरक बन चुके हैं


 भारत की राजधानी नई दिल्ली के दिल कनॉट प्‍लेस के द एम्‍बेसी रेस्‍तरां में एक हिंदी ब्‍लॉगर संगोष्‍ठी लखनऊ से पधारे हिन्‍दी के मशहूर ब्‍लॉगर सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी के सम्‍मान में सामूहिक ब्‍लॉग नुक्‍कड़डॉटकॉम के तत्‍वावधान में शनिवार को आयोजित की गई। इस मौके पर हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग के प्रभाव के सबने एकमत से स्‍वीकारा। देश विदेश में हिंदी के प्रचार प्रसार में हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग के महत्‍व को सबने स्‍वीकार किया और इसकी उन्‍नति के मार्ग में आने वाली कठिनाईयों पर व्‍यापक रूप से विचार विमर्श किया गया। संगोष्‍ठी में दिल्‍ली, नोएडा, गाजियाबाद के जाने माने हिंदी ब्‍लॉगरों से शिरकत की। सोशल मीडिया यथा फेसबुक, ट्विटर को हिंदी ब्‍लॉगिंग का पूरक माना गया। एक मजबूत एग्रीगेटर के अभाव को सबसे एक स्‍वर से महसूस किया और तय किया गया कि इस संबंध में सार्थक प्रयास किए जाने बहुत जरूरी है। फेसबुक आज एक नेटवर्किंग के महत्‍वपूर्ण साधन के तौर पर विकसित हो चुका है। इसका सर्वजनहित में उपयोग करना हम सबकी नैतिक जिम्‍मेदारी है।

सोमवार, 9 अप्रैल 2012

ऊर्जा का संचार करते शब्द

उमेश चतुर्वेदी
मौजूदा भारतीय समाज में राजनेताओं की जुबान से निकले शब्दों पर वह एतबार नहीं रहा, जैसा कभी समाज के अगुआ लोगों की जुबान का रहता था। इसके बावजूद आज के दौर में भी कई शख्सियतें ऐसी हैं, जिनके मुंह से निकले शब्दों के एक-एक हर्फ जिंदगी में नई ऊर्जा का संचार कर देते हैं। उनकी जुबान से निकले शब्दों में ऐसी ताकत होती है कि कई जिंदगियां बदल जाती हैं तो कई सारी जिंदगियां ऐसी भी होती हैं, जिनमें नई आग भर जाती है। महान लोगों के शब्दों की तासीर इतनी गहरी होती है कि उनके सहारे कई नए आंदोलन तक खड़े हो जाते हैं। याद कीजिए बाल गंगाधर तिलक के उस भाषण को..जो आज तक भारतीय आजादी का प्रतीक बना हुआ है स्वशासन का अर्थ कौन नहीं जानता? उसे कौन नहीं चाहता? क्या आप यह पसंद करेंगे कि मैं आपके घर में घुसकर आपकी रसोई को कब्जे में ले लूं ? अपने घर के मामले निपटाने का मुझे अधिकार होना चाहिए। एक सदी से ज्यादा हो गए इस भाषण के..लेकिन यह आज भी भारतीयों की स्वतंत्रता को अक्षुण्ण बनाए रखने में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण है। ये तो रहा एक सदी से भी पुराने भाषण का अंश.....अभी कुछ साल पहले अब्दुल कलाम ने जो भाषण दिया था, वह आज भी भारतीय नौजवानों में ऊर्जा का नया संचार कर रहा है। इस भाषण का एक अंश देखिए- अपने से पूछिए कि आप भारत के लिए क्या कर सकते है। भारत को आज का अमेरिका और अन्य पश्चिमी देश बनाने के लिए जो भी करने की जरूरत है,  करिए।

रविवार, 11 मार्च 2012


कौन भरोसा करता है एक्जिट पोल पर
उमेश चतुर्वेदी

‘‘ओपिनियन पोल और एक्जिट पोल मनोरंजन चैनलों के लिए सर्वश्रेष्ठ हो सकते हैं।’’
मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी का ट्विट
तो क्या सचमुच एक्जिट पोल मनोरंजन के ही पात्र हैं। अब तक के अनुभव तो यही कहते हैं। याद कीजिए उत्तर प्रदेश के 2007 के एक्जिट पोल को...लेकिन जब ईवीएम मशीनों का पिटारा खुला तो उनमें से जो आंकड़े बाहर निकले, वे हकीकत से काफी दूर थे। सिर्फ उत्तर प्रदेश के ही 2007 के एक्जिट पोल के आंकड़ों को याद करें। तब टाइम्स नाऊ ने बहुजन समाज पार्टी को 116 से 126 सीटें दी थीं। उसके एक्जिट पोल में समाजवादी पार्टी को 100 से 110 सीटें मिली थीं। जबकि बीजेपी को 114 से 124 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया था। कांग्रेस को टाइम्स नाऊ ने 25 से 35 सीटें दी थीं। लेकिन हुआ इसके ठीक उलट। इसी तरह स्टार न्यूज ने बहुजन समाज पार्टी को 137, समाजवादी पार्टी को 96, बीजेपी को 108 और कांग्रेस को 27 सीटें दी थीं। स्टार न्यूज की तरफ से सिर्फ दो पार्टियों - समाजवादी पार्टी और कांग्रेस - को लेकर किए गए  अनुमान हकीकत वाले नतीजों के करीब रहे।

सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

हिंदी क्षेत्र के निर्माण की पड़ताल


पुस्तक समीक्षा

उमेश चतुर्वेदी

सामंती समाज की सबसे बड़ी खामी ये रही है कि वहां संवाद एक तरफा होता रहा है। सामंत, राज्य या राजा की तरफ से सूचनाएं और विचार तो जनता की तरफ प्रवाहित होते रहे हैं, लेकिन जनता सामंत, राज्य या राजा के बारे में क्या सोच रही है, उसकी अपेक्षाएं क्या हैं...इसे सामंत, राज्य या राजा की ओर प्रक्षेपित करने की कोई सुचारू व्यवस्था नहीं रही है। सत्रहवीं और अठारहवीं सदी के दौरान यूरोप में जो बदलाव आए और सामंती समाज को लोकतांत्रिक समाज और व्यवस्था में ढालने में मदद की, उसमें एक सार्वजनिक क्षेत्र ने अहम भूमिका निभाई। जर्मन दार्शनिक इसी प्रक्रिया पर आधारित एक अवधारणा पेश की, जिसे उन्होंने पब्लिक स्फेयर यानी सार्वजनिक क्षेत्र कहा जाता है। भारत में यह मान्यता रही है कि मध्यकालीन भारतीय समाज की सोच में लोकतांत्रिक समाज की ओर बदलाव यूरोप के रेनेसां की वजह से ही आया। पहले स्वाधीनता संग्राम तक की अवधि को देखें तो भारतीय समाज में सामंती मूल्यों की ही प्रधानता नजर आती है। लेकिन स्वाधीनता संग्राम की असफलता के बाद भारतीय समाज का यूरोपीय समाज के साथ संपर्क बढ़ा तो यहां भी सामंती मूल्यों में विचलन आने लगता है। निश्चित तौर पर इसमें एक बड़े वर्ग की भूमिका रही, जिसने समाज को आधुनिकता की दिशा में आगे बढ़ाया। 
हेबरमास की अवधारणा के मुताबिक भारत में इस दौरान एक पब्लिक स्फेयर का निर्माण होना शुरू हो गया। राजनीति की दुनिया में लोकमान्य तिलक, गोपाल कृष्ण गोखले, सुरेंद्र नाथ बनर्जी जैसे लोगों की इस पब्लिक स्फेयर के निर्माण में महती भूमिका रही। तो सामाजिक मोर्चे पर दयानंद सरस्वती, राजा राममोहन राय और बाद के दिनों में विवेकानंद जैसे लोगों ने बड़ा काम किया। इसी तरह साहित्य में भारतेंदु, शिवप्रसाद सिंह सितारे हिंद प्रभृत्त लोग दरअसल इसी पब्लिक स्फेयर की नींव रख रहे थे। निश्चित तौर पर गांधी के आने के बाद इसमें तेजी आई और 1920 आते-आते भारतीय समाज में एक मजबूत पब्लिक स्फेयर का निर्माण होता है। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की कामयाबी, सांस्कृतिक मोर्चे पर भारतीय परंपरा के आधार पर आधुनिक अवधारणा, स्त्री शिक्षा, हिंदी का विकास और उसकी स्थिति, सामाजिक मूल्य, लोकतांत्रिक अधिकार आदि को लेकर एक ठोस चिंतन और मूल्य तय होने लगते हैं। वे मूल्य इतने ठोस और मजबूत हैं कि आज भी जब भी समाज, संस्कृति और साहित्य को परखने के लिए निकष की जरूरत होती है, उसे उनके बिना काम नहीं चलता।
ब्रिटिश लेखिका और शोधकर्ता फ्रांचेस्का ऑर्सीनी ने हिंदी की इसी लोकवृत्त की गहन पड़ताल की है।  हिंदी का लोकवृत्त 1920-1940 में फ्रांचेस्का ऑर्सीनी ने 1920-1940 के काल खंड के दौरान हिंदी समाज के बदलते करवट की पड़ताल की कोशिश करता है। फ्रांचेस्का मानती है कि 1920 से 1930 के दशक में हिंदी का साहित्यिक और राजनीतिक क्षेत्र में सार्वजनिक विषयों, सार्वजनिक संचार माध्यमों और जनता के प्रति जो प्रतिक्रिया दिखती है, वह दरअसल आदर्शमूलक है। क्योंकि इस दौरान आते-आते हिंदी के राजनेता और संस्कृतिकर्मी मानने लगे थे, नियम एक और मान्य होने चाहिए। मतभेदों के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। खासतौर पर तीस के दशक तक आते-आते हिंदी को लेकर एक मान्य सिद्धांत विकसित हो जाता है। गांवों के विकास और महिलाओं की भूमिका को लेकर भी मान्य अवधारणा विकसित होने लगती है। तब निश्चित तौर पर आज की तरह का संचार तंत्र नहीं था। लेकिन अपनी सीमित पहुंच के बावजूद मान्य अवधारणाओं को विस्तार और प्रसार में वे भूमिका निभाने लगे थे। निश्चित तौर पर इसमें सबसे बड़ी भूमिका तब स्थापित हो रहे शैक्षिक संस्थानों की भी रही। हिंदी की जिस शुद्धता को आज का इलेक्ट्रॉनिक माध्यम और गिटपिटिया अंग्रेजीभाषी समाज में अपनी बाजार की तलाश करने वाले हिंदी के अखबार हिंदी के ही विकास में बड़ी बाधा मानने लगे हैं, उस शुद्धता की अवधारणा और उसके सार्वजनिक वृत का निर्माण भी तीस के दशक में ही हो गया था। उस समय इससे इतर भाषा का व्यवहार जनता के खिलाफ माना जाता था। उस समय स्थापित हुए मूल्य आज भी कितने प्रासंगिक हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब भी हिंदी के विचलन की बात होती है, उन्हीं मूल्यों के निकष पर उन्हें तौला जाता है।