मंगलवार, 25 जनवरी 2011

इंडिया का यंग रिपब्लिक

उमेश चतुर्वेदी
प्रशांत राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के एक निजी विश्वविद्यालय में पढ़ाई कर रहा है। आम नौजवानों की तरह प्रशांत की चाहत बिजनेस मैनेजर या आईएएस अफसर बनने की नहीं है। जिंदगी का उसका लक्ष्य साफ है, उसे अपने ताऊ की तरह ठेठ राजनेता बनना है। ऐसे में आम मान्यता तो यही है कि पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी को कम से कम वह दूसरे नौजवानों की तुलना में राष्ट्रीय भावनाएं उसे जोर मारेंगी। लेकिन छब्बीस जनवरी को इस बार उसका इरादा देश की सेनाओं की परेड देखना नहीं है। उस दिन उसकी योजना अपने दोस्तों के साथ फिल्म देखने की है। प्रशांत का कहना है कि साल दर साल वही परेड..क्या रखा है इसमें। इससे बेहतर है कि कुछ नया करो और इन्ज्वाय करो।
ऐसी सोच रखने वाला अकेला नौजवान नहीं है प्रशांत...आज के अधिकांश शहरी नौजवानों की सोच कुछ ऐसी ही है। एक दौर था, जब पंद्रह अगस्त, दो अक्टूबर और छब्बीस जनवरी राष्ट्रीयताबोध को जगाने और इसी बहाने एक बार फिर अपने रोएं फड़काने का माध्यम होता था। तब देशभक्ति का मतलब देश के लिए मर मिटना, राष्ट्रीयता के प्रतीकों का सम्मान करना होता था। लेकिन आज के नौजवानों के लिए इसके मायने बदल गए हैं। इसका मतलब यह नहीं कि आज का नौजवान देशभक्त नहीं रहा। लेकिन राष्ट्रभक्ति दिखाने और उसे जताने का माध्यम बदल गया है। आज का नौजवान देश के लिए कुछ करना तो चाहता है, लेकिन उसकी सोच कुछ अलग है। आईएमआई दिल्ली से एमबीए कर चुकी अंकिता कहती है – “ कॉमनवेल्थ से लेकर 2 जी घोटाले में जिस तरह नेताओं का नाम सामने आया है, उससे किस देशभक्ति का आभास मिलता है। इससे अच्छे तो आज के नौजवान हैं, जिन्हें अपनी पढ़ाई-लिखाई और कैरियर से मतलब है। ”
हर पुरानी पीढ़ी नई पीढ़ी को पथभ्रष्ट मानती है। उसकी नजर में उसका गुजरा जमाना ही बेहतर होता है। जाहिर है आज की पीढ़ी को भी अपनी पुरानी पीढ़ी से ऐसे उलाहने सुनने को मिलते हैं – “आज के नौजवानों को न तो अपने कल्चर से मतलब है न अपने संस्कारों से...” लेकिन इसका भी जवाब नई पीढ़ी के पास है। नई पीढ़ी को लगता है कि पुरानी पीढ़ी को उनकी संस्कृति के चलते क्या हासिल हुआ। इन नौजवानों का कहना है कि पुरानी पीढ़ी के लिए संस्कार और संस्कृति की बात करते रह गए। लेकिन उन्हें बदले में अपने जायज कामों को भी कराने के लिए घूस देने पड़े। पानी – बिजली के गलत बिलों को सही कराना हो या स्कूल में भर्ती कराना, उन्हें रिश्वत देनी पड़ी। नौजवानों का सवाल है कि अगर पुराने दिन इतने ही अच्छे थे, संस्कारों और संस्कृति की इतनी ही बात थी तो फिर क्या हुआ कि भ्रष्टाचारियों की बन आई, राजनीति का मतलब सेवा की बजाय अकूत पैसा कमाना रह गया। दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी करके कलम मांजना सीख रहे विनय झा कहते हैं-“ आज की पीढ़ी कम से कम वैसी भ्रष्ट नहीं है, जैसी पुरानी पीढ़ी में थे। आज नौकरी शुरू करने वाले नौजवान को पता है कि वह अपनी सीट पर किसलिए है और उसे अपनी जिम्मेदारी का अहसास है। ”
भारत की जवान पीढ़ी में इन दिनों चेतन भगत, अद्वैत काला या अरविंद अडिगा जैसे उपन्यासकारों की रचनाओं का बोलबाला है। उनके उपन्यास देखते ही देखते लाखों की प्रतियों में बिक रहे हैं। हालांकि भारतीय भाषाओं और हिंदी में बिक्री के ऐसे आंकड़े नजर नहीं आ रहे। कहा तो यह भी जा रहा है कि आज की पीढ़ी के पास चूंकि नैतिक संस्कार वैसे नहीं है, जैसे कि पुरानी पीढ़ी के पास थे। नैतिकता को लेकर जारी वैचारिक और पीढ़ीगत संस्कार ही इन रचनाओं की सफलता का जरिया बने हैं। इसके लिए नौजवान सवालों के घेरे में हैं। लेकिन शिक्षा के अधिकार के लिए संघर्षरत धीरेंद्र सिंह कहते हैं कि चूंकि आज की पीढ़ी की वैचारिकता में गहराई नहीं है। अपने आसपास के संघर्ष और उदारीकरण की छाया में बढ़ रही दुनिया की आपाधापी के बीच आज का नौजवान विकसित हो रहा है, इसलिए उसे चेतन भगत या अद्वैत काला पसंद आ रहे हैं। सच तो यह भी है कि इन लेखकों ने नई पीढ़ी के इसी वैचारिक संघर्ष को अपनी रचनाओं में धार दी है। हालांकि जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से फ्रेंच की पढ़ाई कर रहे अजित कुमार कहते हैं कि पुरानी पीढ़ी क्यों भूल गई कि उन्हें भी एचह्वीलर पर बिकने वाला पल्प लिटरेचर एक दौर में बेहद पसंद था।
लेकिन आमोद - प्रमोद भरी दुनिया, दुनियादारी को लेकर सचेत नजरिया और अपने काम से काम रखने वाली नई पीढ़ी की सोच और कर्म में गहराई देश के भविष्य पर भी असर डाल सकती है। एसजीटी मेडिकल एंड डेंटल इंस्टीट्यूट के रजिस्ट्रार एसएन राजू कहते हैं कि उदारीकरण के चलते नई पीढ़ी दुनिया को सिर्फ सतही नजरिए से देखने का आदी बन गई है। उनका कहना है कि सतही नजरिया ज्यादा दिन तक नहीं चलता। आमोद-प्रमोद की एक सीमा होती है। लेकिन जिंदगी की कड़वी सच्चाईयों का सामना गहरे नजरिए से ही किया जा सकता है। राजू को चिंता है कि आज की पीढ़ी के पास जिंदगी की असल चुनौतियां झेलने का माद्दा कम होता जा रहा है।
लेकिन यह सच्चाई का एक ही पहलू है। अगर जिंदगी से जूझने का माद्दा नहीं रहता तो आज की देसी पीढ़ी की मेहनत और मेधा का झंडा अमेरिका के नासा से लेकर सिलिकॉन वैली तक नहीं फहरता। हां, यह बात और है कि आज की पीढ़ी के भारत और इंडिया में फर्क और अंतर बढ़ता जा रहा है। पहले शहरी युवा के साथ भारत का ग्रामीण युवा भी आसानी से घुलमिल सकता था। लेकिन उदारीकरण और नई संस्कृति के चलते ऐसा होना आसान नहीं रहा। आज भारत का ग्रामीण युवा शहरी नौजवानों के मुकाबले अपने को कमतर कर के आंक रहा है। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि वह 1974 के जेपी आंदोलन की तरह बदलाव लाने की भी नहीं सोच पा रहा है। आंदोलन तो उसके जेहन से दूर होते जा रहे हैं। सिंगूर या छोटे-मोटे एनजीओ के आंदोलन इसके अपवाद जरूर हो सकते हैं। राज सत्ता आंदोलनों से वैरभाव रखती हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि आंदोलन उनके खिलाफ हैं। इस तथ्य में एक हद तक सच्चाई भी है। लेकिन यह भी सच है कि आंदोलनों के गर्भ से विचार की नई राह निकलती है, विकास के नए नजरिए पैदा होते हैं। इन अर्थो में आंदोलन सामाजिक जिंदगी में भूचाल लाकर उसमें गति पैदा करता है। दुनिया के लोकतांत्रिक समाजों में ये जिम्मेदारी नौजवान पीढ़ी ही उठाती रही है। लेकिन दुर्भाग्वश भारतीय गणराज्य के नौजवानों में फिलहाल ऐसा आलोड़न उठता नहीं दिख रहा है।

मंगलवार, 11 जनवरी 2011

हिंदी में खबरों का व्यापार

उमेश चतुर्वेदी
2008 के गुजरात चुनावों की बात है। कांग्रेस के सचिव और महाराष्ट्र राज्य के सह प्रभारी मोहन प्रकाश को राज्य में मीडिया के जरिए पार्टी के प्रचार की जिम्मेदारी दी गई थी। इस सिलसिले में उन्होंने गुजरात के तकरीबन सभी जिला मुख्यालयों का दौरा किया और प्रेस कांफ्रेंस भी की। हर कांफ्रेंस के बाद उनके पास स्थानीय पत्रकारों का झुंड उनके पास आ जाता और वे उनसे घुमा-फिरा कर कुछ पूछने लगते। उन सवालों का लब्बोलुआब यही होता कि उनकी कांफ्रेंस को कवर करने के लिए कितने की थैली मिलेगी। हर बार वे स्थानीय पत्रकारों को टालते रहे और इसकी शिकायत करते रहे। उन्हें लगता था कि चुनाव के बहाने अपनी कमाई के लिए ये स्थानीय पत्रकारों की कारस्तानी है। लेकिन 2009 के आम चुनावों में उन्हें पता चला कि असल माजरा क्या था। दरअसल यह पेड न्यूज का एक तरीका था।
2009 के आम चुनावों में देश के तकरीबन सभी बड़े न्यूज चैनलों ने कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी से बुके में पैकेज की मांग रखी। सत्ता की दौड़ में शामिल रही दोनों प्रमुख पार्टियां इस चुनाव में हर मुद्दे पर एक-दूसरे का गलाकाट विरोध कर रही थीं। लेकिन एक मुद्दा ऐसा था, जिस पर दोनों की राय एक थी और वह मुद्दा था पेड न्यूज। दोनों ने तय किया था कि चैनलों की मनमानी और बुके में विज्ञापन जारी करने की जिद्दी मांग के आगे वे नहीं झुकेंगी। दोनों की मर्जी थी कि अपने लिए फायदेमंद चैनलों को ही वे विज्ञापन देंगीं। लेकिन पेड न्यूज पर निगाह गड़ाए चैनलों की जिद्दी मांग के आगे उन्हें झुकना पड़ा। जनता की अदालत को हर हाल पर अपने पक्ष में झुकाने के लिए दिन-रात एक कर रही दोनों पार्टियों ने समाचार चैनलों को करोड़ों की कीमत के विज्ञापन दिए। दिलचस्प बात यह है कि राजनीतिक भ्रष्टाचार का खुलासा करते रहने का कथित नैतिक दावा करने वाले चैनलों ने यह पूरी की पूरी रकम चेक की बजाय नगद लिया और उसकी पक्की रसीद भी नहीं दी।
पुरानी धारा के राजनेताओं को लगता रहा है कि उनके बयान और उनकी प्रेस रिलीज प्रकाशित करना प्रेस का परम पुनीत काम है। लेकिन पिछले आम चुनाव ने हिंदी भाषी इलाके के नेताओं की आंखें खोल दीं। कोयला खदानों के लिए मशहूर झारखंड के धनबाद जिले के जनता दल यूनाइटेड के नेता अनिल कुमार सिंह को भी पिछले आम चुनाव में ही पता चला कि कभी-कभी खबर छापने के नाम पर पैसे मांगने वाले एक-आध भ्रष्ट पत्रकार थे। लेकिन उस दौरान पूरा मीडिया ही कमाई में जुटा हुआ था। अनिल सिंह की कांफ्रेंस को कवर के एवज में पूर्वी भारत के एक मशहूर अखबार के पत्रकार ने खुलेआम पैसा मांगा। इस मांग से बौखलाए अनिल ने उसके संपादक को कोलकाता में फोन किया। लेकिन उस रिपोर्टर का बाल बांका भी नहीं हुआ। हैरान अनिल जब खोजबीन में जुटे, तब जाकर उन्हें पता चला कि दरअसल उस अखबार के प्रबंधन ने ही अपने रिपोर्टरों को कमाई का लक्ष्य निर्धारित कर रखा था। ऐसे में उनसे पैसे की मांग नहीं रखी जाती तो क्या किया जाता। पिछले आम चुनाव में जिस तरह पूरे देश में पेड न्यूज का खुला खेल हुआ, वह राजनीति को हैरान करने वाला था। हैरान तो जनता भी हो रही थी। एक ही अखबार के एक ही पेज पर एक खबर में दूसरा शख्स जीतता नजर आ रहा था तो दूसरी खबर में उसका प्रतिद्वंदी जीतता नजर आ रहा था। अगर उसी सीट के दूसरे उम्मीदवार ने अखबार को पैसे नहीं दिए तो उसके खिलाफ हवा दिखाने में भी अखबार ने देर नहीं लगाई। जनता को पता नहीं चल रहा था कि अखबार किस मुद्दे पर सही है। दरअसल अखबारों ने अपनी यूनिटों के लिए कमाई का लक्ष्य तय कर रखा था। यूनिटों के प्रमुखों ने हर रिपोर्टर और हर पेज के प्रभारी को लक्ष्य बांट रखा था। लक्ष्य को पूरा करने के लिए रिपोर्टरों और पेज प्रभारियों ने नेताओं पर जमकर दबाव बनाया और अपने-अपने अखबारों ने मोटी कमाई। इसके साथ उन्होंने खुद भी कमाई की। जिस रिपोर्टर और पेज प्रभारी ने इस कमाई में हिस्सेदार बनने में हिचक दिखाई, उसे किनारे कर दिया गया। पेड न्यूज की बात जब तक पूरी तरह प्रचारित नहीं हुई, तब तक हिंदी मीडिया में कथित तौर पर राष्ट्रीय कहे जाने वाले अखबार अपने को पाकसाफ बताते रहे। लेकिन जैसे-जैसे बात खुलती गई, पता चला कि राष्ट्रीय अखबारों के स्थानीय संस्करण भी इस बहती गंगा में हाथ धोने में पूरी शिद्दत से जुटे थे। राष्ट्रीय अखबारों की इस मिलीभगत का ही परिणाम था कि प्रेस कौंसिल की मसविदा समिति ने इस पर 77 पेज की रिपोर्ट बनाई, लेकिन उन्होंने सदस्यों पर दबाव बनाकर इस रिपोर्ट को महज 13 पेज में सिमटा दिया और उसे ही अब प्रकाशित किया जा रहा है। हालांकि पुरंजय गुहा ठाकुरता और के श्रीनिवास रेड्डी की तैयार की हुई यह रिपोर्ट मूल रूप में www.prabhashjoshi.in पर देखी जा सकती।
हिंदी में पेड न्यूज को लेकर सबसे ज्यादा हो-हल्ला बेशक 2009 के आम चुनावों में अखबारों की भागीदारी के सार्वजनिक खुलासे के बाद भले ही हुआ, लेकिन इसकी शुरूआत नब्बे के दशक में ही हो गई थी। जब मध्य भारत के एक हिंदी अखबार ने स्थानीय निकाय के चुनाव में अपने पत्रकारों को खबरों के लिए कमाई का लक्ष्य तय कर दिया था। तब यह रकम पिछले चुनाव की तरह ज्यादा नहीं थी। उस चलन के चपेटे में भारतीय जनता पार्टी के एक राष्ट्रीय महासचिव का परिवार भी आया था। चूंकि वे इन पंक्तियों के लेखक से अपना नाम जाहिर नहीं करने का वचन ले चुके हैं, लिहाजा उनका नाम नहीं दिया जा रहा है। तब उनके परिवार का कोई सदस्य स्थानीय निकाय चुनाव में हिस्सा ले रहा था। जब उनसे उसके पक्ष में खबरें छापने के लिए पैसे मांगे गए थे। भारतीय जनता पार्टी के उस नेता ने तब इसे पेड न्यूज की बजाय स्थानीय पत्रकार की अपनी कारस्तानी समझा था। महाराष्ट्र से जुड़े रहे एक नेता ने भी बताया था कि 2005 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भी कुछ अखबारों ने कमाई के लिए उम्मीदवारों की खबरें छापने का सौदा किया था। इसी दौरान पंजाब के चुनावों में भी खबरों को प्रकाशित करने के लिए खेल हुए थे। दिल्ली नगर निगम के 1995 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता मदन लाल खुराना से दिल्ली के एक प्रतिष्ठित अखबार के संवाददाता ने खुलेआम पैसा मांगा था। जिसकी शिकायत उन्होंने अखबार के संपादक और मालिक से की थी। तब माना गया था कि यह संवाददाता ने अपनी कमाई के लिए रास्ता ढूंढा़ था। तब निश्चित तौर पर अखबार चुनावों को अपनी साख बढ़ाने का माध्यम मानते थे। उस वक्त हिंदी समेत भारतीय भाषाओं के कुछ स्थानीय मुफस्सिल संवाददाता(स्ट्रिंगर) अपनी कमाई के लिए उम्मीदवारों से जरूर थैली लेते थे। बाद में अखबारों को उनके ही नाम पर कमाई होने की इस कुप्रवृत्ति पर निगाह पड़ी और उन्होंने इसे खुद की कमाई का साधन बनाकर इसे स्याह से सफेद धंधा बना दिया। बदले में स्ट्रिंगर और रिपोर्टर के लिए कमीशन भी तय कर दिया। जिसका चलन पेड न्यूज के तौर पर पिछले आम चुनाव में खुलेआम तौर पर दिखा।
अखबारों का तीन मुख्य काम माना जाता है, सूचना देना, शिक्षा देना और मनोरंजन करना। लोकतांत्रिक समाज में अखबारों से उम्मीद की जाती है कि वे अपने पाठकों का इन्हीं कसौटियों पर खयाल रखेंगे और लोकतांत्रिक समाज के नैतिक पहरूआ की भूमिका निभाएंगे। लेकिन बड़े और नैतिक कहे जाने वालों ने भी पेड न्यूज की गंगा में डूब कर ही पार उतरने में ही खुद की भलाई देखी। ऐसे में अखबारों की इस नैतिक पहरूआ की भूमिका पर ही सवाल उठ खड़ा हुआ है। बावेला इसी लिए मचा है। सवाल यह भी है कि अनैतिकता की इस सीमा में कैद होने के बाद अखबार लोकतांत्रिक समाज की निगरानी कैसे कर पाएंगे और उनकी कथित निगरानी पर भरोसा कौन करेगा।

शनिवार, 18 दिसंबर 2010

बदलती दुनिया को समझने का औजार


उमेश चतुर्वेदी
अब दुनिया गोल नहीं
प्रकाशक - पेंगुइन बुक्स इंडिया प्रा. लि.
11 कम्युनिटी सेंटर, पंचशील पार्क, नई दिल्ली -110017
मूल्य – 350 रूपए

पंद्रहवीं सदी के आखिरी दिनों में ईस्ट इंडिया की खोज करने स्पेन से निकले क्रिस्टोफर कोलंबस भले ही भारत को नहीं खोज पाया, लेकिन उसने दुनिया को एक विचार जरूर दिया। दरअसल यह यूरोपीय वैज्ञानिक गैलीलियो के विचार को ही आगे बढ़ा रहा था। इसके मुताबिक दुनिया गोल है। यह वैज्ञानिक सत्य भी है कि हमारी धरती गोल है। लेकिन जब हम धरती के एक कोने से दूसरे कोने तक जाते हैं तो हमें धरती की इस गोलाई का अहसास नहीं होता है, अलबत्ता ये जरूर लगता है कि पूरी धरती समतल है। तकनीक ने धरती के इस समतलीकरण को और बढ़ा दिया है। न्यूयार्क टाइम्स के स्तंभकार टॉमस एल फ्रीडमैन को यह विचार पहली बार तब आया, जब वे न्यूयार्क से हजारों किलोमीटर दूर तकनीक का नया केंद्र बन चुके बंगलुरू में इन्फोसिस के मुख्यालय नंदन नीलकेणी से मिलने पहुंचे। बंगलुरू शहर से चालीस मिनट के सफर पर स्थित इन्फोसिस के मुख्यालय में उन्हें अहसास हुआ कि कोलंबस पंद्रह सदीं में भारत की जगह अमेरिका जा पहुंचा और वहां के लोगों को रेड इंडियन कहा जाने लगा। वक्त का सफर बीसवीं सदी के आखिरी छोर तक पहुंच जाता है। इस बार भी कोई कोलंबस भारत की खोज पर निकलता है। इस बार उसकी यात्रा उस अमेरिका से शुरू होती है, जिसे भारत के नाम पर कोलंबस ने खोजा था। अनजाने में अमेरिका पहुंचे कोलंबस को रेड इंडियन मिले, लेकिन भारत पहुंचे टॉमस फ्रीडमैन को अमेरिकन ही मिले। आउटसोर्सिंग के केंद्र के तौर पर उभरे बंगलुरू में जो अंतरराष्ट्रीय कॉल सेंटर काम कर रहे हैं, उनके बाजार अमेरिका में हैं, उनके ग्राहक अमेरिका में हैं और उनके लिए बंगलुरू में काम करने वाले लोग अपने ग्राहकों से सहज रिश्ता बनाए रखने के लिए ना सिर्फ अमेरिकी लहजे की अमेरिकी बोलना सीख गए हैं, बल्कि उन्होंने अमेरिकन नाम भी अख्तियार कर लिया है। इन अर्थों में देखें तो भारत में भी एक अमेरिका बस गया है, जो अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए काम कर रहा है। इतना ही नहीं इन अमेरिकियों की धरती तो भारतीय है, जन्म भी भारत में ही हुआ है, लेकिन तकनीकी क्रांति के दम पर उन्होंने जो ताकत हासिल की है, उसकी वजह से वे भारत में रहते हुए ही अमेरिकी बनते नजर आ रहे हैं। भारतीय धरती पर अमेरिकी, अमेरिकी धरती पर भारतीय, एशिया में यूरोप और यूरोप में एशिया के चलन और ज्ञान-विज्ञान का जो संस्पर्श बढ़ा है, उसे टॉमस एल फ्रीडमैन ने अपनी किताब द वर्ल्ड इज फ्लैट में संजोया है। तकनीक और ज्ञान आधारित दुनिया में बढ़ते एशियाई वर्चस्व को दिखाने-समझाने वाली इस पुस्तक की दुनिया भर में अब तक पचास लाख प्रतियां बिक चुकी हैं। इसे हाल ही में पेंगुइन बुक्स इंडिया ने अब दुनिया गोल नहीं नाम से प्रकाशित किया है।
उन्नीसवीं सदी की औद्योगिक क्रांति की रोशनी अमेरिका तक पहुंची। विकास की धारा यूरोप से होते हुए अमेरिका तक पहुंची। तकनीक और ज्ञान-विज्ञान के जरिए यूरोप और अमेरिका ने पूरी दुनिया पर वर्चस्व स्थापित कर लिया है। तकनीक और ज्ञान-विज्ञान की ताकत ही रही कि बीसवीं सदी यूरोप और अमेरिका की रही। लेकिन इन्फोसिस, विप्रो, सैमसंग, ओनिडा, ह्यूंडई जैसी हजारों एशियाई कंपनियों की वजह से इक्कीसवीं सदी को एशिया की सदी कहा जा रहा है। टॉमस एल फ्रीडमैन को लगता है कि तकनीक और ज्ञान की यह यात्रा जिस तरह हो रही है, उसके मूल में भी कहीं न कहीं दुनिया का समतल होना ही है। फ्रीडमैन ने तकनीकी क्रांति को अपनी आंखों से भारत, चीन और मध्य पूर्व के देशों में देखा है। फ्रीडमैन की नजर में ब्लॉगिंग्स, ऑनलाइन एनसाइक्लोपीडिया और पॉडकास्टिंग के जरिए एशिया के दो महत्वपूर्ण देशों चीन और भारत पूरी दुनिया को जबर्दस्त तरीके से प्रभावित कर रहे हैं। फ्रीडमैन का मानना है कि दुनिया आज जितनी एक-दूसरे कोनों और विचारों के नजदीक है, उतनी पहले कभी नहीं थी। इसकी बड़ी वजह यही है कि तकनीक और ज्ञान-विज्ञान ने इस नजदीकी को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।
भले ही एशिया का दुनिया में वर्चस्व बढ़ रहा हो, लेकिन एशिया का एक हिस्सा अब भी ऐसा है, जिसके यहां पैसा तो बहुत है, लेकिन ज्ञान की दुनिया में उनका वर्चस्व नहीं बढ़ रहा है। निश्चित तौर पर अरब देशों का यह समूह है। जिनके यहां तेल के चलते पेट्रो डॉलर की बाढ़ है। लेकिन वैसी तकनीकी और ज्ञान क्रांति नहीं है, जैसी भारत और चीन में दिख रही है। इसे समझाने के लिए फ्रीडमैन 2003 में प्रकाशित एक रिपोर्ट का हवाला देते हैं। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के लिए अरबी समाज वैज्ञानिकों ने यह रिपोर्ट तैयार की थी। इस रिपोर्ट के मुताबिक 1980 से 1999 के बीच अरब देशों ने सिर्फ 171 पेटेंट ही कराए, जबकि इसी दौर में दक्षिण कोरिया ने अकेले 16,328 पेटेंट कराए। जबकि कंप्यूटर और प्रिंटिंग टेक्नॉलजी से जुड़ी कंपनी हैवलेट पैकर्ड हर दिन औसतन 11 पेटेंट कराती है। इसी रिपोर्ट के मुताबिक अध्ययन अवधि में अरब देशों में प्रति दस लाख की आबादी पर 371 वैज्ञानिक और इंजीनियर काम कर रहे थे। लेकिन अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका समेत दुनिया का यह औसत 979 था। फ्रीडमैन अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की सन 2004 की एक रिपोर्ट का हवाला भी देते हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में 15 से 24 साल की उम्र वाले बेरोजगार पुरूषों की संख्या 8 करोड़ 80 लाख थी। जिनमें से अकेले 26 फीसदी लोग अरब देशों से ही थे। फ्रीडमैन इस रिपोर्ट के हवाले से इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि अरब देशों में आगे बढ़ने की ललक इसलिए नहीं है, क्योंकि वहां के लोगों की रूझान धार्मिक ज्यादा है और अरब-मुस्लिम जगत में नई चीजों के लिए जगह नहीं है। फ्रीडमैन का मानना है कि ज्ञान जगत में पिछड़ने की वजह से ही इस्लामिक और अरबी जमात में कट्टरता बढ़ रही है।
दुनिया को समतल बताने की इस दौड़ में फ्रीडमैन को कई बार ऐसे सवालों का भी सामना करना पड़ा है, जिससे आज का आम अमेरिकी बचना चाहता है। मसलन भारत और चीन की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और उसके चलते उपभोग का बढ़ता दायरा, गाड़ियों की बढ़ती संख्या उन्हें बहुत परेशान करती है। चीन में एक लेक्चर के दौरान फ्रीडमैन ने जैसे ही यह कहा कि चीन को गाड़ियों की संख्या कम करनी चाहिए और उसे ऊर्जा की खपत कम करनी चाहिए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो दुनिया को ऊर्जा संकट का जल्द ही सामना करना पड़ेगा। उनके व्याख्यान के बाद एक लड़की ने उनसे ही यह सवाल पूछ लिया कि आखिर भारत और चीन को क्यों नहीं ऊर्जा खपत बढ़ानी चाहिए। लगे हाथों उस लड़की ने फ्रीडमैन के सामने एक सवाल उछाल दिया कि अमेरिका और यूरोप ने अपने विकास के दौर में तेल और ऊर्जा की खपत कर ली है और अब बारी भारत और चीन की ही है। फ्रीडमैन तब सोचने के लिए मजबूर हो जाते हैं। क्योंकि बराबरीवाद के आधार पर देखें तो यह तर्क सही है। चिंतन के क्रम में फ्रीडमैन अमेरिका को सुझाते हैं कि उसे खुद के उपभोग पर काबू पाने के बाद ही चीन और भारत से जलवायु परिवर्तन की दिशा में बेहतर काम और नतीजों की उम्मीद रखनी चाहिए। फ्रीडमैन ऐसा कहते वक्त भले ही गांधी का संदर्भ नहीं देते, लेकिन यह सच है कि गांधी का भी यही रास्ता था। गांधी भी ऐसा ही सोचते थे।
तकनीक और ज्ञान का गुणगान करते-करते फ्रीडमैन आखिर में उदास हो जाते हैं। वे कहते हैं – “ दुनिया का समतल होते जाना हमारे लिए नई संभावनाएं, नई चुनौतियां, नए सहयोगी लेकर आया है। लेकिन अफसोस है कि वह साथ में नए खतरे भी लेकर आया है, खासकर अमेरिकी होने के नाते यह जरूरी है कि हम इन सबमें सही संतुलन कायम करें। यह जरूरी है कि हम सबसे अच्छे विश्व नागरिक बनें, जो हम नहीं बन पाते हैं, क्योंकि समतल दुनिया में अगर आप अपने बुरे पड़ोस में नहीं जाते हैं तो वह आपके पास आ सकता है। ”
फ्रीडमैन की यह किताब बदलती दुनिया के बदलाव के औजारों को समझने का जितना अच्छा जरिया बन पड़ी है, दुनिया के भावी खतरों से उतनी मुस्तैदी से आगाह भी करती है।

रविवार, 12 दिसंबर 2010

अफसरशाही और प्रोफेसरशाही को समर्पित

उमेश चतुर्वेदी

पूरे देश में मौसमी दहलीज पर जब सर्दी दस्तक देती है तो जिंदगी को जल्दी समेटने की तैयारियां तेज हो जाती हैं। एक तरफ सूरज देवता अपनी किरणों को समेटते हैं और दूसरी तरफ देश गुदड़ी से लेकर अलाव तक के सहारे रात का अंधेरा काटने की दिशा में आगे बढ़ जाता है। ऐसा नहीं कि गुलाबी सर्दियां सिर्फ शहरों को ही भली लगती हैं, गांवों को भी गुलाबी सर्दियां उतना ही आनंद और सुकून देती हैं, जितना सुविधाजीवी शहरातियों को। लेकिन हाड़ कंपाने वाली ठंड पूरे देश में जिंदगी की गाड़ी को भी ठंडी कर देती है। लेकिन इन्हीं दिनों दिल्ली के साहित्यिक गलियारे गुलजार हो जाते हैं। सर्दियों की परवाह करने की जरूरत भी नहीं रहती। रसरंजन का सर्दियां बेहतरीन बहाना बन जाती हैं। इसी बहाने किताबों के विमोचन का दौर तेज हो जाता है। साहित्यिक गलियारे की यह गर्मी साहित्य अकादमी पुरस्कारों के लिए जोड़तोड़ के चलते बढ़ जाती है। वैसे भी इन दिनों विशुद्ध लेखक किस्म के साहित्यकारों की पूछ कम हुई है। लेखक अगर प्राध्यापक हुआ या फिर सरकारी आला अधिकारी तो समझो सोने पर सुहागा। प्रकाशकों की फौज उनकी किताबों के प्रकाशन और प्रकाशन के बाद लोकार्पण के बहाने वैचारिक विमर्श में जुट जाती है। अगर लेखक ऊंचा सरकारी अफसर हुआ तो क्रांतिकारी होने का दावा करने वाले लेखक और आलोचक तक उसकी किताब को न भूतो न भविष्यति का विशेषण देने लगता है। दिल्ली के अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेला के बाद सर्दियां ही ऐसा बड़ा अवसर होती हैं, जब दिल्ली का साहित्यिक समाज सक्रिय हो जाता है। मशहूर लेखक हिमांशु जोशी कहते रहे हैं कि हिंदी को जरूरत है ऐसे लेखक की जो चौबीस घंटे की जिंदगी में पच्चीस घंटे लेखन में व्यतीत करे। ऐसे लेखक हैं भी लेकिन प्रकाशक मित्रों का उन पर ध्यान कम ही जाता है। उनके लिए अधिकारी लेखक कहीं ज्यादा मुफीद है। पच्चीस घंटे लिखने वाला लेखक प्रकाशक की किताबें भला कैसे बिकवा सकता है। लेकिन अफसर या रसूखदार प्रोफेसर हुआ तो किताबें बिकवाना उसके लिए बाएं हाथ का खेल है। जाहिर है ऐसे लेखक प्रकाशक को मुफीद लगते हैं। इसीलिए उनकी कविता हो या कामचलाऊ गद्य की पुस्तक, सब कुछ छाप देता है और उसे पत्रकारिता के हवाले कर देता है। इन दिनों एक और प्रवृत्ति जोर पकड़ रही है। टेलीविजन के लोकप्रिय चेहरों से किताबें लिखवाने का, उन्हें बाकायदा लोकार्पित भी किया जाता है। पिछले दिनों ऐसी ही एक शख्सियत की किताब का पुनर्संस्करण प्रकाशित हुआ। उस किताब को भी न भूतो न भविष्यति बताने के लिए बड़ा कार्यक्रम हुआ। हिंदी के एक नामी प्रकाशक ने इन पंक्तियों के लेखक को एक ऐसे मशहूर टीवी पत्रकार के लिए घोस्टराइटिंग करने का प्रस्ताव दिया था, जिनका बड़ा नाम है। हिंदी के बड़े अखबारों को भी अब अपनी रियल प्रतिभाएं कम ही प्रभावित करती हैं। उन्हें अधकचरी हिंदी लिखने या धाराप्रवाह अंग्रेजी लिखने वाले सोशलाइट किस्म के पत्रकार, नेता या अधिकारी ही विचार पक्ष को मजबूत करने के लिए बेहतर लगते हैं। हिंदी की अपनी मौलिक प्रतिभाओं पर उनका भरोसा नहीं है। जिनका मूल काम ही लिखना-पढ़ना है, हिंदी के ही अखबारों का उन पर इकबाल कम हुआ है। हिंदी के प्रकाशक भी उसी प्रवृत्ति को अपने ढंग से आगे बढ़ा रहे हैं। प्रकाशकों का तर्क है कि मशहूर टीवी पत्रकारों की किताबें खूब बिकती हैं। ऐसा नहीं कि सभी टीवी एंकरों को लिखना ही नहीं आता। लेकिन सबसे ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि जिनकी किताबें छप रही हैं, उनमें से कम के ही पास लिखने का शऊर है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या बिकाऊ चेहरों, कोर्स में किताबें रखवाने की हैसियत रखने वाले प्रोफेसरों और अफसर लेखकों के ही सहारे हिंदी का कारवां आगे बढ़ेगा। इसका जवाब हिंदीभाषी समाज को खोजना पड़ेगा।

चलते-चलते- आठ दिसंबर को दिल्ली का तापमान आठ डिग्री सेल्सियस के आसपास था, उसी दिन वाणी प्रकाशन ने एक साथ आठ उपन्यासों का लोकार्पण करके इतिहास रच दिया। मशहूर लेखक असगर वजाहत का उपन्यास पहर दोपहर, रमेश चंद्र शाह का असबाब-ए-वीरानी , पुन्नी सिंह का जो घाटी ने कहा, ध्रुव शुक्ल का उसी शहर में उसका घर, मोहनदास नैमिषराय का जख्म हमारे, पत्रकार और कवि विमल कुमार का चांद एट द रेट डॉट कॉम, पत्रकार प्रदीप सौरभ का तीसरी ताली और सुरेश कुमार वर्मा का उपन्यास मुमताज महल का एक साथ लोकार्पण निश्चित तौर पर हिंदी साहित्यिक जगत के लिए महत्वपूर्ण घटना रही।

शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

कैसे सधे सुर

उमेश चतुर्वेदी

जिंदगी में लगातार बढ़ती टेलीविजन की दखल से सामाजिक और पारिवारिक मूल्यों में आ रहे नकारात्मक बदलावों को लेकर आवाजें उठनी अब नई बात नहीं रही। इस सिलसिले में अगर कुछ नया है तो वह है क्लासिकल संगीत की दुनिया से उठती मुखर आवाज। प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह से ऑल इंडिया म्यूजिशिन ग्रुप की मुलाकात की अहमियत भी इसीलिए बढ़ जाती है। शास्त्रीय संगीत में अपनी असाधारण साधना के चलते इस ग्रुप के सदस्यों का देश और दुनिया में नाम है। कत्थक नृत्य का दूसरा नाम बन चुके बिरजू महाराज, संतूर के सतरंगे सुरों की दुनिया के शहंशाह पंडित शिवकुमार शर्मा, बांसुरी की मधुर तान के लिए मशहूर पंडित हरिप्रसाद चौरसिया और राजन मिश्र, तबले की थाप के जरिए पूरी दुनिया में अपना सिक्का जमाने वाले उस्ताद जाकिर हुसैन, सुधा रघुनाथन, लीला सैंमसन, टीएन कृष्णन का ग्रुप बनाकर संगीत के बिगड़ते सुरों को ठीक करने के लिए आवाज उठाना निश्चित तौर पर साहस का काम है।

पहले उस्तादों की शागिर्दी में साधना के बाद प्रतिभाओं की खोज होती थी। इस तरह बनी-निखरी प्रतिभाओं को तब शास्त्रीय समाज में आदर के साथ देखा जाता था। लेकिन टेलीविजन ने प्रतिभा खोज के मायने ही बदल दिए हैं। अब रियलिटी शो के जरिए क्लासिकल संगीत और नृत्य जैसी विधाओं में भी प्रतिभाओं की खोज की जाती है, जिनके लिए पहले निष्काम साधना जरूरी मानी जाती थी। निश्चित तौर पर तब की शास्त्रीय प्रतिभाओं के पास लय और ताल की असल थाती होती थी, लेकिन उनके प्रभामंडल में ग्लैमर की छाया नहीं होती थी। भारत में वैसे भी संगीत को आत्मा से परमात्मा से मिलन की राह माना गया है। वैसे भी शास्त्र और बाजार अपने स्वभावों के मुताबिक एक-दूसरे के विरोधी माने जाते हैं। लेकिन टेलीविजन ने इस पारंपरिक समीकरण को बदल कर रख दिया है। टेलीविजन के जरिए सुरों की दुनिया में बाजार की पैठ बढ़ी है। जीटीवी का मशहूर कार्यक्रम सारेगामापा सिंगिंग सुपरस्टार हो या फिर स्टार प्लस का अमूल वॉयस ऑफ इंडिया, शास्त्रीयता की दुनिया में बढ़ती बाजार की पैठ के ही उदाहरण हैं। बाजार की बढ़ती पैठ ने शास्त्रीयता में भी पैसे की पहुंच बढ़ा दी है। कमाई बढ़ना गलत भी नहीं माना जा सकता। लेकिन कमाई के साथ जब शास्त्रीय परंपराओं और सुरों को ताक पर रखा जाता है तो साधकों को तकलीफ होती ही है। वैसे भी बाजार जब दखल देता है तो वह अपनी शर्तों पर चीजों में बदलाव लाता है। बाजार का एक बड़ा तर्क यही होता है कि जनता को जो पसंद है, उसे ही पेश किया जाय। चूंकि मौजूदा टेलीविजन चैनल बाजारवाद के दौर में ही विकसित हुए हैं, लिहाजा उन पर बाजार के लिए शास्त्रीयता से खिलवाड़ का आरोप लगता रहा है। उन्हें सुरों और शास्त्रीय परंपराओं से खिलवाड़ करने का दोषी माना जाता रहा है। संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष और मशहूर कवि अशोक वाजपेयी की अगुआई में ऑल इंडिया म्यूजिशियन ग्रुप ने प्रधानमंत्री से मिलकर अपनी यही चिंता जताई है। ऐसा नहीं कि संगीत की दुनिया की नामचीन हस्तियों ने पहली बार रियलिटी शो पर ऐसे सवाल उठाए हैं। सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर भी ऐसे कार्यक्रमों पर सवाल उठा चुकी हैं। इन कार्यक्रमों पर सिर्फ सुरों या संगीत के साथ खिलवाड़ करने का आरोप नहीं हैं। बल्कि उन पर यह भी आरोप है कि वे संगीत की उदात्त परंपरा को फूहड़ बना रहे हैं। इससे भारतीय शास्त्रीय संगीत का नुकसान हो रहा है। इससे हजारों साल से संभालकर रखी थाती का ही नुकसान होगा और उसे सही तरीके से बाद वाली पीढ़ी के लिए संजो कर रखना मुश्किल हो जाएगा।

बाजार का तर्क आजकल लोकतांत्रिक परंपराएं लागू करने के बहाने भी सामने आ रहा है। बिग बॉस और राखी का इंसाफ जैसे रियलिटी शो का प्रसारण समय बदलने का फरमान नवंबर के आखिरी हफ्ते में जब सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने जारी किया तो उस समय भी लोकतांत्रिक परिपाटी का ही तर्क दिया गया। कहा गया कि जनता पर ही यह छोड़ दिया जाना चाहिए कि वह किसी कार्यक्रम को पसंद करती है या नहीं...लेकिन बाजार के पैरोकार यह तर्क देते वक्त भूल जाते हैं कि लोकतंत्र की कामयाबी की पहली शर्त यह होती है कि जनता का मानसिक स्तर लोकतांत्रिक मूल्यों को समझने लायक हो। सुरों और नृत्य की शास्त्रीयता की परख शास्त्रीय जानकार ही कर सकता है। सामान्य जनता की पसंदगी और नापसंदगी के दम पर किसी शो या तथ्य को अच्छा या बुरा ठहराना दरअसल गलत कसौटी ही अख्तियार करना होगा। वैसे आधुनिक लोकतांत्रिक समाज का दावा करने वाले देश चाहे ब्रिटेन या फ्रांस या फिर जर्मनी, उनके यहां अपनी परंपरा की थाती को बचा कर रखने का जज्बा बरकार है। पूर्वी यूरोप के कई देशों को अपने संगीत और शास्त्रीय कलाओं की धरोहर पर गर्व है। इसलिए उनसे थोड़ी-भी छेड़छाड़ मंजूर नहीं है। बाजार तो उनके यहां भी है। फिर परंपराओं और मूल्यों की दुहाई देने वाले भारतीय समाज से ऐसी उम्मीद क्यों न की जाए। प्रधानमंत्री से इसी उम्मीद की दिशा में कदम उठाने की संगीतकारों के ग्रुप की मांग को इसी आधार पर जायज ठहराया जाना चाहिए।

शनिवार, 27 नवंबर 2010

सपाट बयानी के खतरे

उमेश चतुर्वेदी
तीन दिसंबर को बांग्लादेश को बने 39 साल हो जाएंगे। यूं तो बरसी और सालगिरह पर किसी महत्वपूर्ण घटना का याद आना असहज नहीं है। लेकिन बांग्लादेश की याद सिर्फ रस्मी तौर पर नहीं आ रही है। हर साल जब तीन दिसंबर आता है, बचपन में पढ़े एक रिपोर्ताज की स्मृतियां जाग उठती हैं। ब्रह्मपुत्र के मोर्चे पर शीर्षक इस रिपोर्ताज को तो किसी संकलन में पढ़ा था। जब साहित्य और पत्रकारिता से गहरा रिश्ता बना तो पता चला कि यह रिपोर्ताज पहले धर्मयुग में छपा था। बांग्लादेश के गठन की तैयारियों के बीच भारतीय सेना की पाकिस्तानी सेना से भिड़ंत भी हुई थी। उसी लड़ाई के एक मोर्चे से हिंदी के यशस्वी कवि और पत्रकार डॉक्टर धर्मवीर भारती ने यह रिपोर्ताज लिखा था। ब्रह्मपुत्र नदी के दोनों तरफ से जारी गोलाबारी के बीच धर्मवीर भारती खुद भी मौजूद थे। यह लेखन इसलिए ज्यादा याद आता है, क्योंकि युद्ध के मोर्चे से लिखे इस रिपोर्ताज में भाषा के जबर्दस्त प्रयोग दिखते हैं। पढ़ते वक्त लगता है जैसे हम सीधे-सीधे लड़ाई के दृश्यों से दो-चार हो रहे हैं। आज का जमाना होता तो धर्मवीर भारती का वह रिपोर्ताज भी खारिज कर दिया जाता यह कहते हुए कि पेस और मूवमेंट लड़ाई के मोर्चे की रिपोर्ट कैसी ? लेकिन ब्रह्मपुत्र के मोर्चे से लिखा यह रिपोर्ताज उन लोगों को जरूर सुकून पहुंचाता है और हिंदी की भाषाई ताकत को महसूस भी कराता है, जिन्हें भाषा में खिलंदड़ापन पसंद हैं।
धर्मवीर भारती ही क्यों, मैला आंचल और परती-परिकथा जैसी कृतियों के मशहूर लेखक फणीश्वर नाथ रेणु के उन रिपोर्ताजों को भी पढ़ना अपने आप में सुखद अनुभव है, जो ऋणजल-धनजल शीर्षक से संग्रहीत हैं। मूलत: दिनमान के लिए इन्हें लिखा गया था। 1973 की बिहार की भयंकर बाढ़, उसके पहले का सूखा, बाढ़ और सूखे के बीच पिसती बिहार की जनता, 1967 में पहली बार बिहार में संयुक्त सरकार बनना, उस सरकार की पहली कैबिनेट बैठक का विवरण...ऐसी कई घटनाओं पर रेणु ने रिपोर्ताज लिखे। दिनमान संपादक रघुवीर सहाय ने रेणु से आग्रह करके खासतौर पर ये रिपोर्ताज लिखवाए थे। उन्हें पढ़कर लोगों का दिल न पसीज जाए, गुस्से से मुट्ठियां न तन जाएं या फिर गर्व ना हो...ऐसा हो ही नहीं सकता। भाषाई चमत्कार और खास घटनाओं के लिए खास शब्दों का इस्तेमाल....इसकी बेहतरीन बानगी है रेणु के ये रिपोर्ताज. अस्सी के दशक तक भाषाई खिलंदड़ी के साथ रिपोर्ताज लेखन की यह परंपरा चलती रही। 1980 के दशक के आखिरी दिनों में भाषाई खिलंदड़ापन का यह प्रयोग टूटने लगा। क्योंकि बाद में आए हिंदी के कर्णधार संपादकों को इस खिलंदड़ापन में पंडिताऊपन नजर आने लगा था। उन्हें हिंदी पत्रकारिता के सबसे बड़े दुश्मन हिंदी से साहित्यकार पत्रकार नजर आने लगे थे। उनके खिलाफ जमकर अभियान चलाया गया। जिन धर्मवीर भारती, रघुवीर सहाय, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, अज्ञेय ने हिंदी को मांजने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, वे सब के सब नए संपादकों की नजर में हिंदी पत्रकारिता के खलनायक थे। खलनायकत्व का यह प्रचार अंतत: हिंदी की नवोन्मेषी विधाओं पर पड़ा। अब तो हालत यह है कि उनके दर्शन भी नहीं होते। 1970 के दशक में वाराणसी से निकलने वाले आज अखबार की तूती पूरे उत्तर प्रदेश और बिहार में बोलती थी। उसमें विवेकी राय का साप्ताहिक स्तंभ मनबोध मास्टर की डायरी छपती थी। भले ही इस स्तंभ के नाम में डायरी शब्द जुड़ा था, लेकिन हकीकत में यह डायरी की बजाय रिपोर्ताज ही था। मजे की बात यह है कि इसे पढ़ने वालों का अपना बड़ा पाठक वर्ग था। इन प्रकीर्ण विधाओं (बाद में पाठ्यक्रमों में रिपोर्ताज और डायरी के लिए प्रकीर्ण शब्द का ही इस्तेमाल किया जाता था।) ने पाठकों के ज्ञान के भंडार में वृद्धि तो की ही, उनका स्तरीय मनोरंजन भी किया। लेकिन इन विधाओं का सबसे बड़ा योगदान यह है कि उन्होंने भाषा को नए-नए शब्द दिए। ऐसा नहीं कि आज ऐसी विधाओं में लोग सक्रिय नहीं हैं। उदयन वाजपेयी, विवेकी राय, नर्मदाप्रसाद उपाध्याय जैसे नाम सक्रिय तो हैं, लेकिन मौजूदा पत्रकारिता में ऐसी रचनात्मकता को मंच उपलब्ध कराने की जगह ही नहीं रही। इसका असर यह हो रहा है कि हमारी नई पीढ़ी के शब्द भंडार में कमी होती जा रही है। हिंदी का हर चौथा शब्द उनकी भौंहों पर बल डालने के लिए काफी होता है। मजे की बात यह है कि मौजूदा पत्रकारिता नएपन और प्रगतिशीलता के नाम पर इसे ही बढ़ावा दे रही है। आज की शहराती पीढ़ी अपने भारत से ही परिचित नहीं है, रही-सही कसर उसे भाषा से भी काट कर पूरा किया जा रहा है।


सोमवार, 22 नवंबर 2010

नकारात्मक प्रतिभाओं की मशहूरियत का दौर


उमेश चतुर्वेदी
झांसी जिले के प्रेम नगर निवासी लक्ष्मण की मौत ने टेलीविजन की चंचल और मुंहफट बाला के रियलिटी शो राखी का इंसाफ को सवालों के घेरे में ला दिया है। लक्ष्मण के घरवालों के मुताबिक खुलेआम टीवी कैमरे के सामने राखी द्वारा उसे नामर्द कहे जाने के सदमे को वह झेल नहीं पाया। लक्ष्मण की मौत ने एनडीटीवी इमैजिन के इस शो को विवादों में ला दिया है और इसे बंद किए जाने की मांग उठने लगी है। पंजाब सरकार के एक मंत्री हीरा सिंह गाबड़िया तक इसे बंद करने की सलाह दे चुके हैं। मुंबई हाईकोर्ट में इसके खिलाफ याचिका भी दायर की जा चुकी है। ये पहला मौका नहीं है, जब राखी का यह शो विवादों में आया है। अभी कुछ ही हफ्तों पहले राखी के इसी शो में भोजपुरी फिल्मों की एक स्ट्रगलर और एक कास्टिंग डाइरेक्टर के बीच खुलेआम गालीगलौज हुआ और दोनों ने कैमरे के सामने एक-दूसरे पर हाथ उठा दिया।
दरअसल यह नकारात्मक प्रचार का दौर है। उदारीकरण ने जिंदगी के तमाम मूल्यों को किनारे रखने में मदद दी है। नकारात्मकता को प्रचार मिलता है और इस प्रचार के चलते दर्शकों की भीड़ ऐसे कार्यक्रमों की ओर टूट पड़ती है। इस दौर में नकारात्मक शख्सियतों को ही पसंद किया जा रहा है। लिहाजा टेलीविजन चैनलों को भी दर्शक जुटाने का यह नकारात्मक तरीका ही पसंद आ रहा है। चूंकि राखी के शो पर आरोप है कि एक शख्स की मौत हो गई है, लिहाजा उस पर इन दिनों उंगलियां खूब उठ रही हैं। लेकिन भारतीय टेलीविजन की दुनिया में दिखने वाला यह एक मात्र रियलिटी शो नहीं है, जिसका कंटेंट जिंदगी के तमाम मूल्यों को ध्वस्त करते हुए आगे बढ़ रहा है। बिग बॉस सीजन – 4 भी इन दिनों कलर्स पर छाया हुआ है। टैम की रेटिंग रिपोर्टें बताती हैं कि जिस दिन सलमान खान इस कार्यक्रम की एंकरिंग कर रहे होते हैं, उस दिन हिंदी मनोरंजन चैनलों को देखने वाले दर्शकों का सबसे ज्यादा हिस्सा इसी चैनल के पास होता है। बिग बॉस में हो रही घटनाएं पहले से तय हैं या नहीं, यह तो बाद के बहस का विषय है। लेकिन इतना तय है कि यहां भी जमकर ऐसे मूल्यों की धज्जियां उड़ाई जाती हैं, जिनकी शिक्षा लोग इस बदलाव के दौर में भी शायद ही अपने बच्चों को देना चाहें। डॉली बिंद्रा की खुलेआम जारी बदतमीजी और चीख-चिल्लाहट, पाकिस्तान की असफल अभिनेत्री वीना मलिक की अश्लीलता भरी अदाएं और उनके प्यार में अश्लीलता की हद तक डूबे महान समाजवादी नेता रजनी पटेल के पोते अस्मित पटेल को देखना आज उस समाज को पसंद आ रहा है, जिसके ड्राइंग या बेडरूम में टेलीविजन की अबाध पहुंच है। नकारात्मकता आज प्रचार पाने का माध्यम बन गई है। इसलिए रियलिटी शो को नकारात्मक विषय और नकारात्मक चरित्र पसंद आ रहे हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो कलर्स को महान चोर बंटी को क्यों चुनना पड़ता। उसे डॉली बिंद्रा की चीख-पुकार क्यों पसंद आती। बीना मलिक पर आरोप है कि उनके क्रिकेट के खेल के सटोरियों से संबंध हैं। इस आरोप वाले व्यक्ति को जेल के सीखचों के पीछे होना चाहिए। उसकी साख सवालों के घेरे में होनी चाहिए। लेकिन वह एक प्रतिष्ठित चैनल के जरिए घर-घर पहुंच तो रही ही है, बदले में उसे मोटा माल भी मिल रहा है। सीमा परिहार बीहड़ों की धूल फांकते हुए अपनी जो पहचान नहीं बना पाईं, वे अब कलर्स के जरिए देश के सभ्य परिवारों के ड्राइंग रूम की शोभा बन चुकी हैं। रियलिटी शो का एक मकसद तो यही है कि मशहूर या कुख्यात शख्सियतों की जिंदगी में झांका जाय। राखी सावंत, डॉली बिंद्रा या ऐसी ही हस्तियों से किसी अच्छेपन की उम्मीद तो नहीं की जा सकती। ब्रेड के टुकड़े या एक सेव और चाय की एक प्याली के लिए भी ये शख्सियतें किस हद तक गिर सकती हैं, इसकी असल तस्वीर ये शो पेश तो कर ही रहे हैं। गालियों को तो जैसे टेलीसमाज में स्वीकृति हासिल हो गई है। तभी तो बिग बॉस की एंकरिंग करते हुए सलमान खान कुछ भी बोल देते हैं और दर्शक फिर भी तालियां बजा रहे होते हैं। एमटीवी रोडीज और यूटीवी के बिंदास भी बिंदासपन की ही असल तस्वीर पेश करते हैं। जहां गालियां नवाचार के तौर आराम से दी जाती हैं और सुनी भी जाती हैं। इन रियलिटी शो ने हमारे हास्य बोध को भी बदलकर रख दिया है। जहां द्विअर्थी संवादों की भरमार है। सोनी टीवी पर भी एक हास्य शो आता है। रियलिटी शो की तरह के इस शो में जितने द्विअर्थी संवादों का इस्तेमाल होता है, उससे दादा कोंडके की फिल्मों की याद आ जाती है। लेकिन दिलचस्प यह है कि उत्सव जैसी फिल्म में अभिनय से विख्यात हुए शेखर कपूर को ऐसे संवादों को हंसने का बहाना ही होते हैं। समाज तालियां पीट रहा है और कंपनियां इन तालियों के चलते विज्ञापनों की माया से भरी हुई हैं।
पश्चिमी दुनिया में भी ढेरों रियलिटी शो चल रहे हैं। वहां भी वे लोकप्रिय हैं। लेकिन शोध रिपोर्टें बताती हैं कि ये शो बच्चों में नकारात्मक प्रवृत्ति को बढ़ावा देते हैं। जर्मनी की मीडिया शिक्षक माया गेयोत्स ने इस विषय पर शोध किया है। उनका कहना है कि 9 से 22 साल के लोग अनजाने में ही इन शोज़ से बहुत कुछ सीख जाते हैं। उनके मुताबिक बच्चे और युवा इन शोज़ से बहुत कुछ सीखते हैं। मिसाल के तौर पर जर्मनीज़ नेक्सट टॉप मॉडल में प्रतियोगियों से कई तरह के टास्क कराए जाते हैं, मसलन बिना कपड़ों के अपना फोटोशूट कराना। जब बच्चे यह सब देखते हैं तो वे सोचते हैं कि वे भी ऐसा कुछ कर सकते हैं। माया कहती हैं कि इन रियलिटी शो को देखते-देखते बच्चों को लगने लगता है कि जीवन में सफल होने और आगे बढ़ने के लिए खूबसूरत दिखना और अच्छे कपड़े पहनना बेहद ज़रूरी है। बच्चों को लगने लगता है कि ऐसा स्टार या फिर मॉडल बनना ही तरक्की कहलाता है।
माया के इन निष्कर्षों की तसदीक अपने देश में भी हो चुकी है। एक रियलिटी शो में हिस्सा लेते वक्त दो साल पहले इंदौर में एक नौजवान अपनी जान गंवाते-गंवाते बचा। वह पानी के टब में ज्यादा से ज्यादा देर तक डूबे रहे कर स्टार बनने की दौ़ड़ में शामिल था। स्टार बनने के चक्कर में रियलिटी शो में शामिल हुई कोलकाता की एक स्कूली लड़की को उस शो के निर्णायकों ने इतना डांटा कि वह अस्पताल पहुंच गई और उसे लकवा मार गया। वह अपनी आवाज भी खो चुकी थी। काफी इलाज के बाद ही वह स्वस्थ हो सकी। जब रामायण-महाभारत का दौर चल रहा था, तब राम और रावण की तरह तीर से लड़ाई करने का चलन बढ़ गया था। हालांकि वे रियलिटी शो नहीं थे। पूरी तरह से महाकाव्यात्म कथाओं पर आधारित वे धारावाहिक थे। आस्था और सांस्कृतिक इतिहास से जुड़ा होने के बावजूद उन धारावाहिकों पर सवाल उठे। बच्चों को समझाने और उन्हें चेताने की कोशिशें शुरू हो गई थीं। हालांकि उनमें जीवन मूल्यों की स्थापना पर जोर था। लेकिन तब से लेकर करीब दो दशक का वक्त बीत चुका है। इसके बावजूद अब के रियलिटी शो को लेकर चेताने की कोई कार्यवाही होती नहीं दिख रही। वैसे राखी का इंसाफ जैसे शो भारतीय कानून व्यवस्था का भी मजाक उड़ा रहे हैं। अगर राखी जैसे लोग ही इंसाफ कर सकते हैं तो कानून व्यवस्था संभालने और न्याय करने वाली संस्थाओं की क्या जरूरत रह जाती है। राखी अपने हावभाव के जरिए इंसाफ चाहें जितना भी करती हों, उनकी ये हरकत दर्शकों को पसंद आती है। बिग बॉस की डॉली बिंद्रा को भी इसी श्रेणी में रखा जा सकता है। नकारात्मक प्रचार की ताकत बढ़ रही है और बाजार चूंकि इसी के सहारे बढ़ रहा है, लिहाजा इसे बढ़ावा देने में उसकी भूमिका बढ़ती जा रही है। यही वजह है कि तमाम टेलीविजन चैनलों पर ऐसे शो की बाढ़ आई हुई है। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बाजार को भले ही ये चीजें पसंद आती हैं। लेकिन समाज के लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा, इसे निर्धारित करने का काम व्यवस्था संभालने वाली संस्थाओं का है, जिनसे ऐसे मसलों पर निर्मम और गंभीर कदमों की उम्मीद की जाती है। बीबीसी के चैनल फोर पर प्रसारित बिग ब्रदर कार्यक्रम में जेड गुडी ने शिल्पा शेट्टी पर नस्ली टिप्पणियां की थीं, तो उसका ब्रिटेन की मीडिया की सबसे बड़ी निगरानी संस्था ब्रा़डकास्टिंग रेग्युलेटरी अथॉरिटी ने संज्ञान लिया था और चैनल फोर को नोटिस जारी किया था। जिसका वहां के नागरिकों तक ने स्वागत किया था। लेकिन खेद का विषय यह है कि अपने यहां ऐसी पहल होती नहीं दिख रही।