बुधवार, 9 अप्रैल 2008

शुक्र करो महंगाई कम है !

उमेश चतुर्वेदी
देशभर में महंगाई अपने पूरे उफान पर है। चावल, दाल, आटा, तेल और सब्जियां..सबकी कीमतें आसमान छू रही हैं। इस महंगाई ने लोगों की जिंदगी की गाड़ी को धीमी कर दिया है। खासतौर पर कम आयवर्ग और निम्न मध्य वर्ग के लोगों का घरेलू बजट गड़बड़ा गया है। इस पर कहां तक प्रभावी रोक लगाने के लिए केंद्र सरकार कमर कसती, वह प्रकारांतर से लोगों को समझाने में जुट गई है कि भाई, ये हिंदुस्तान है-यहां महंगाई कम है। इसमें मददगार बन रहे गुलाबी पन्नों वाले आर्थिक अखबार। ऐसे ही एक अखबार ने एक दिन लिखा कि थाईलैंड और यूक्रेन में तो गेहूं 15 रूपए किलो की दर से मिल रहा है। जाहिर है वहां की तुलना में आपको यानी भारतीयों को कम कीमत पर आटा मिल रहा है। उसी अखबार ने ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीकी देशों का हवाला देकर लिखा कि वहां चावल की कीमत देसी चावल से ज्यादा है। अखबार ने लगे हाथ ये भी चेतावनी दे दी कि बासमती के निर्यात रोकने से भारत को कितना नुकसान उठाना पड़ेगा।
यानी अब मीडिया का काम भी सरकारी भोंपू की तरह प्रचार करना रह गया है। जेम्स हिक्की की वह परंपरा मीडिया भूलता जा रहा है – जिसके लिए सरकारी प्रचार से कहीं ज्यादा अहम थी आम लोगों की जिंदगी , उनकी सहूलियतें ....

रविवार, 6 अप्रैल 2008

तो आप किस घराने के पत्रकार हैं?

संजय तिवारी का ये लेख पत्रकारिता जगत के लिए काफी मौजूं है। उन्होंने अपने ब्लॉग पर ये लेख लिखा है। मीडिया की मौजूदा प्रवृत्तियों को रूपायित करने वाला ये लेख साभार यहां साया किया जा रहा है।

इस देश में पत्रकारिता जिस ऊंचाई से शुरू हुई थी वह बहुत गौरवशाली है. इसे आप संयोग भी कह सकते हैं और नियति भी कि ब्रिटिशों से आजादी के संघर्ष के दौरान भारत में पत्रकारिता की शुरूआत होती है. इसलिए यहां पत्रकारिता हमेशा सत्ता प्रतिष्ठान के आलोचक की भूमिका में ही रही है. आज जो पत्रकारिता के पुराने घराने दिखाई देते हैं उनकी भी शुरूआत ऐसी ही रही है और एक से एक श्रेष्ठ लोगों ने इसकी आधारशिला रखने में अपनी आहुति दी है.

मसलन हिन्दुस्तान साप्ताहिक के एक संपादक का किस्सा है 50-55 के आसपास का. कहते हैं जब कोई लेखक उनसे मिलने आता था तो वे उसे दफ्तर की चाय पिलाकर छुट्टी नहीं पा लेते थे. वे उसे लेकर बाजार जाते और पूरी आवभगत करते थे. एक बार किसी ने उनसे पूछा कि सर जब दफ्तर में सारी सुविधा है फिर आप लेखकों के ऊपर बाहर जाकर पैसा क्यों खर्च करते हैं? उन्होंने जवाब दिया था कि ये लेखक ही हमारी पूंजी हैं. ये जैसा लिखेंगे वैसी ही पत्रिका चलेगी.

लेकिन आज संपादकों की उन्हीं घरानों में क्या भूमिका है? घराने सबसे पहले एक संपादक पकड़ते हैं और उसे इतना पैसा देते हैं कि वह बेखटके अपने से नीचे के लोगों का शोषण कर सके. अब संपादक की काबिलियत यह नहीं होती कि खबर को कैसे ट्रीट करता है बल्कि उसकी काबिलियत का पैमाना यह है कि वह खबर और खबरची दोनों को कैसे पीटता है. कैसे एक रीढ़युक्त इंसान को रीढ़वीहिन पत्रकार में तब्दील कर देता है. हो सकता है उसे पता हो कि वह गलत कर रहा है लेकिन उसे यह सब करना पड़ता है क्योंकि इसी काम के लिए उसे पैसे दिये जाते हैं. पत्रकार भी अब संपादक के सिपहसालार नहीं होते बल्कि घराने के पत्रकार हो गये हैं. अब संपादक नहीं बल्कि घराना तय करता है कि आपको कैसी पत्रकारिता करनी है. फिर वह चाहे बिड़ला घराना हो या फिर समीर जैन का. जो नये घराने पैदा हो रहे हैं उनकी दशा अगर इस मामले में ठीक है कि अपने कर्मचारियों (मैं उन्हें पत्रकार कहने से हिचक रहा हूं) को अच्छा पैसा देते हैं तो उनकी अस्मिता को जमकर लूटते भी है.

और देखते ही देखते घराना पत्रकारिता का जन्म हो जाता है जो आम आदमी के लिए नहीं कारपोरेट घरानों और सरकारों का भोंपू बन जाता है. खबर खोजने वाला पत्रकार या तो खबर पैदा करने लगता है या फिर आफिस तक चलकर आयी प्रेस विज्ञप्तियों को खबर बनाकर छाप देता है. कहने की जरूरत नहीं कि कंपनियों ने देखा कि अगर ऐसा ही होता है तो उन्होंने सुंदर लड़कियों को इस काम पर लगा दिया जो अखबार-टीवी के दफ्तरों में घूमकर खबर बांटती हैं. और उनकी खबरें छपती भी हैं. ऐसे तो पत्रकार स्वयंभू तानाशाह होता है लेकिन घराने के अहाते में आते ही तनखहिया नौकर की तरह व्यवहार करने लगता है.

आज देश में आठ-दस बड़े घराने हैं जिनके पास पत्रकारिता का ठेका रखा हुआ है. इसमें दो सबसे बड़े घराने हैं जो आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं वे हैं टाईम्स घराना और हिन्दुस्तान टाईम्स घराना. (क्योंकि मैं सिर्फ हिन्दी पत्रकारिता के संदर्भ में बात कर रहा हूं इसलिए हिन्दू वगैरह की बात नहीं करता.) अगर कोई पत्रकार इन दो घरानों के पेरोल पर है तो वह पत्रकार हो जाता है. और अपने अलावा किसी और को पत्रकार नहीं मानता.

उसका यह श्रेष्ठताबोध अनावश्यक नहीं है. गोपाल कहता है कि ऐसे पत्रकारों को पत्रकार का संबोधन देने की बजाय बिड़ला जी के पत्रकार या फिर समीर जैन के पत्रकार कहना चाहिए. दुर्भाग्य से मुक्त पत्रकारों की आज भी पत्रकार बिरादरी में कोई खास इज्जत नहीं होती. जबकि होना चाहिए उल्टा. मुक्त पत्रकार ही असल में ज्यादा प्रोफेशनल होकर काम कर सकता है. वह नहीं कर पाता इसके कारण दूसरे हैं. लेकिन मेरा मानना है कि उसे घराना पत्रकारों से हर हाल में ज्यादा सम्मान मिलना चाहिए. लेकिन घराना पत्रकार ऐसा नहीं होने देता.

फिर यहां से शोषण की जिस श्रृंखला की शुरूआत होती है उसकी चोट न केवल पत्रकारों पर पड़ती है बल्कि भाषा भी नष्ट होती है और समाज का स्थाई अहित होता है. घराना पत्रकारिता से मुक्ति कैसे मिले इसके लिए पूरे समाज को बहुत काम करने की जरूरत है. अन्यथा तो ये घराने और घराने के पत्रकार दोनों ही समाज को कंपनियों का गुलाम बनाकर छोड़ेंगे.

बुधवार, 19 मार्च 2008

बना रहेगा सहअस्तित्व का दौर -2

लेकिन हकीकत ये है कि इंटरनेट की पहुंच अभी-भी ज्यादातर महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक ही है। इंटरनेट के लिए बुनियादी चीज बिजली की जरूरत है। लेकिन आज भी उत्तर भारत के अधिकांश हिस्से दिन से बारह से बीस घंटे अंधेरे में ही डूबे रहते हैं। ऐसे में अगर दैनिक भास्कर के मार्केटिंग डाइरेक्टर गिरीश अग्रवाल ये कहते हैं कि प्रिंट माध्यम पर अब भी 60 फीसदी लोग भरोसा करते हैं तो गलत नहीं है। इसकी वजह यही है कि प्रिंट या अखबार पढ़ने के लिए गांवों में बिजली की जरूरत नहीं है। जबकि टेलीविजन हो या इंटरनेट इन दोनों माध्यमों के लिए बुनियादी चीज बिजली का होना जरूरी है। रेडियो कुछ हद तक इससे मुक्त है। लिहाजा अखबार और रेडियो इस देश के बड़े हिस्से के लोगों के दिलों पर आज भी राज कर रहे हैं।
माध्यमों का इतिहास गवाह है – जब भी वैकल्पिक मीडिया का कोई नया रूप सामने आता है – तब पारंपरिक मीडिया को उससे डर लगने लगता है। लेकिन बाद में उसे अपनाने में पारंपरिक मीडिया देर नहीं लगाता। फिर उसी के सहारे खुद की उपस्थिति मजबूत करने में जुट जाता है। भारत में भी यही प्रक्रिया दुहराई जा रही है। आज शायद ही कोई अखबार, रेडियो या टीवी चैनल होगा- जिसकी अपनी कोई वेबसाइट नहीं हो। दरअसल आज अखबार अपने बारे में जो अपने पृष्ठों पर नहीं कह पा रहा है – पत्रिकाएं अभिव्यक्त नहीं कर पा रही हैं। उसे वे अपने वेब साइट पर कह रही हैं। टेलीविजन और रेडियो के लिए प्रसारण के लिए समय की कमी है। लिहाजा उनके अपने कार्यक्रमों और समाचारों को पेश करने के लिए वक्त की पाबंदी है। फिर भी उनके लिए बहुत कुछ अनकहा रह जाता है। उसकी भरपाई वे अपनी वेबसाइटों पर करते हैं। यानी इंटरनेट ने यहां भले ही वैकल्पिक माध्यम के तौर पर कदम रखा- लेकिन धीरे-धीरे वह पारंपरिक मीडिया का ही सहभागी बनता जा रहा है। आपको अखबार पर खबर पूरी नहीं मिली तो आप उसकी वेबसाइट पर जाकर पूरी खबर पढ़ सकते हैं।
अभी एक दौर इलेक्ट्रॉनिक मैगजीनों का शुरू हुआ है। अंग्रेजी में तो न्यूयार्कर, वोग से लेकर लाइफ तक सभी इलेक्ट्रॉनिक फॉर्म में आ गई हैं। इनमें कई तो पीडीएफ फाइलों में हैं। जिन्हें आप मनचाहे तरीके से बड़ा या छोटा करके पढ़ सकते हैं। हिंदी में भी ऐसे प्रयास शुरू हो चुके हैं। टेलीविजन पत्रकार राजीव रंजन झा शेयर मंथन नाम से पीडीएफ फॉर्मेट में रोजाना लोगों को इलेक्ट्रॉनिक अखबार ही पेश कर रहे हैं। इस अखबार ने फरवरी में अपने सौ अंक पूरे कर लिए। शेयर बाजार की जानकारी और लोगों के सवालों का विशेषज्ञों से जवाब इस दैनिक ई पत्रिका में रोजाना पाठकों को मिलती है। मुफ्त में प्रसारित होने वाला ये ई अखबार उन्हीं लोगों को मिलता है – जिन्होंने इसकी इच्छा जाहिर की है। राजीव के मुताबिक इसे रोजाना करीब एक हजार लोगों तक भेजा जाता है। इसी तरह पौढ़ी गढ़वाल से भवानीशंकर थपलियाल रिजनल रिपोर्टर नाम से मासिक ई पत्रिका निकाल रहे हैं।
इसी तरह का एक प्रयास गाजियाबाद की एक सॉफ्टवेयर कंपनी ने किया है। उसने अपनी साइट पर गृह लक्ष्मी और प्रतियोगिता दर्पण समेत कई पत्रिकाओं को जगह दी। अभी हाल तक निकलती रही पत्रिका दस दिन भी इसकी साइट पर मौजूद थी। यहां बता देना ये जरूरी है कि अब दस दिन बंद हो गई है। जाहिर है – इस पत्रिका का ई संस्करण भी बंद हो गया है। ये सारी पत्रिकाएं पीडीएफ फॉर्मेट में ही इस साइट पर मौजूद हैं। वर्चुअल दुनिया में ये एक नया अवतार है। धीरे-धीरे ही सही, इनका भी विस्तार हो रहा है। लेकिन यहां ध्यान देना जरूरी है कि शेयर मंथन को छोड़कर बाकी सभी ई पत्रिकाएं किसी पारंपरिक पत्रिका का ई संस्करण ही हैं।
हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि अपने देश में प्रिंट का करीब दो सौ साल का इतिहास है। जबकि रेडियो की जिंदगी 70-75 साल की है। टेलीविजन महज पच्चीस साल पुराना है और इंटरनेट की उम्र महज दस साल है। चूंकि ये सभी माध्यम अलग-अलग हैं - चारों का स्वभाव और चरित्र अलग-अलग है। जाहिर है कि इनकी प्राथमिकताएं भी अलग-अलग होंगी। लेकिन कम से कम भारत में जिस तरह से मीडिया के चारों माध्यम विकसित हो रहे हैं। उससे साफ है कि इनका एक दूसरे के सहअस्तित्व पर ही जोर है। अगर वेब दुनिया का भारतीय भाषाओं के पोर्टल के तौर पर अस्तित्व है तो उसमें कहीं न कहीं उसके मूल अखबार नई दुनिया का भी हाथ है। और अगर नई दुनिया को इंदौर और मालवा से बाहर कैलिफोर्निया और बुडापेस्ट में भी देखा-पढ़ा जाता है तो इसकी वजह वेब दुनिया है। ऐसे में ये सवाल उठना ही गैर लाजिमी है कि अभिव्यक्ति और मीडिया के ये माध्यम एक-दूसरे को खा जाएंगे।
तकनीकी क्रांति के चलते मीडिया में एक और बदलाव की आहट महसूस हो रही है। इस देश में करीब आठ करोड़ मोबाइल उपभोक्ता हैं। सारे अखबारों से भी कहीं ज्यादा मोबाइल के एसएमएस और एमएमएस के पाठक-दर्शक हैं। यही वजह है कि मोबाइल पर भी खबरें देने की परिष्कृत प्रणाली की तैयारियां चल रही हैं। पांच साल पहले जब रिलायंस ने अपना मोबाइल लांच किया था तो उसने खबरें भी दी थीं। लेकिन तब तकनीकी गड़बड़ियों के चलते ये प्रयास परवान नहीं चढ़ पाया था। लेकिन अब मोबाइल कंपनियां पूरी तैयारी के साथ इस क्षेत्र में भी कदम रख रही हैं। टेलीविजन की दुनिया में अपनी धाक जमा चुका ज़ी नेटवर्क ने बाकायदा न्यू मीडिया का अलग विभाग ही बना दिया है। जो मोबाइल पर खबरें देगा। ये खबरें टेलीविजन खबरों का संक्षिप्त रूप होगा। जिसमें विजुअल भी होगा और कंटेंट भी। यानी आधा मिनट के विजुअल और वॉयस ओवर में पूरी खबर बता दी जाएगी। यानी मीडिया का ये नया माध्यम देखने के लिए अब हमें तैयार रहना होगा। वैसे इंडिया टीवी ने इसे पहले ही शुरू कर दिया है। यानी सिर्फ ड्राइंग रूम तक की शोभा बढ़ाती रही विजुअल खबरें अब हर हाथ में स्थित मोबाइल पर मौजूद होंगी। लेकिन टेलीविजन चैनल इससे परेशान नहीं हैं। मोबाइल खबरों की तुलना में टेलीविजन की खबरें पिछले दस-बारह साल में पारंपरिकता का दर्जा हासिल कर चुकी हैं। लिहाजा चैनल यही मानकर चल रहे हैं कि मोबाइल खबरों के चलते उनकी टीआरपी ही बढ़ेगी। ज़ी में न्यू मीडिया का तकनीकी पक्ष देख रहे शशिलोचन सिंह का मानना है कि मोबाइल पर संक्षिप्त खबरें देखकर आम पाठक-दर्शक अपडेट तो रह सकता है। लेकिन उसे यदि विस्तार से खबर देखने की भूख होगी तो उसे पारंपरिक टेलीविजन स्क्रीन पर आना ही होगा। यानी यहां भी वैकल्पिक मीडिया से उन्हें कोई खतरा नजर नहीं आता।
अंत में मीडिया विचारक देवदत्त जी की आशाएं हमें याद रखनी चाहिए। इन पंक्तियों के लेखक को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि बदलते दौर में मीडिया का चाहे जो भी माध्यम हो – उसका तात्कालिकता पर ज्यादा जोर रहेगा। रीडरशिप लगातार बढ़ रही है। इसकी जिम्मेदारी अखबारों पर ज्यादा है। वैसे आज की पाठकों की जरूरतें भी ज्यादा हैं। जाहिर है, ऐसे में उन्हें जानकारी देने के लिए अखबारों पर दबाव रहेगा। सूचना देने और जानकारी देने की अखबारों की भूमिका बढ़ेगी, संस्था के रूप में नए संदेशों को देने में भूमिका रहेगी। लेकिन मीडिया को इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि वह निर्णायक भूमिका निभाएगा।

सोमवार, 17 मार्च 2008

बना रहेगा सहअस्तित्व का दौर

उमेश चतुर्वेदी
माध्यमों के इतिहास से एक अजीब सा संयोग जु़ड़ा हुआ है। दुनिया में जब-जब किसी नए माध्यम की आहट मिलती है – पुराने माध्यमों के अंत की घोषणा होने लगती है। पिछली सदी के दूसरे दशक में जब जी मार्कोनी ने रेडियो की खोज की तो अमेरिका और यूरोप में जमे-जमाए अखबारों पर संकट की घोषणाएं की जाने लगी थी। कुछ वैसे ही – जैसे पिछले दिनों फुकुओमा ने इतिहास के अंत का ऐलान कर दिया था। पिछली सदी के तीसरे दशक में इसी तरह जब जे एल बेयर्ड ने टेलीविजन का आविष्कार किया तो अखबारों के साथ ही रेडियो की अस्मिता भी खतरे में दिखने लगी थी। लेकिन हुआ ठीक इसका उलटा। तब से लेकर टेम्स और हडसन नदियों में ठीक वैसे ही काफी पानी बह चुका है – जैसे अपनी गंगा और यमुना में। लेकिन अमेरिका और यूरोप में अखबारों के सर्कुलेशन और पृष्ठों में लगातार विकास हुआ है। टेलीविजन के चैनल भी बढ़े – रेडियो की दुनिया में क्रांति भी हुई। लेकिन न्यूयार्क टाइम्स हो या फिर वाशिंगटन पोस्ट- सबका सर्कुलेशन बढ़ा। 1920 से लेकर 1970 तक विकसित दुनिया में अखबार, रेडियो और टेलीविजन एक दूसरे के सहभागी के तौर पर विकसित होते रहे। इस सहभाग ने रेडियो और टेलीविजन को भी पारंपरिक मीडिया की श्रेणी में ला दिया। लेकिन 1969 में जब अपरानेट की खोज हुई तो एक बार फिर इस पारंपरिक मीडिया को अपनी अस्मिता खतरे में पड़ती दिखनी शुरू हुई। इस अपरानेट से ही आगे चलकर इंटरनेट का विस्तार हुआ। लेकिन मीडिया के इन सभी माध्य्मों के अस्तित्व पर कोई खतरा नजर नहीं आया। आज सच है कि अमेरिकी और यूरोपीय अखबार सर्कुलेशन न बढ़ पाने की परेशानियों से जूझ रहे हैं। लेकिन इसकी वजह इंटरनेट या रेडिया नहीं हैं। बल्कि वहां का समाज ऐसे विंदु पर पहुंच चुका है- जहां इन माध्यमों के विकास की गुंजाइश नहीं रही।
लेकिन अपने देश की स्थिति बिल्कुल उलट है। यहां आज भी देश में साक्षरता करीब 65 फीसदी ही पहुंच पाई है। यानी शत-प्रतिशत साक्षरता हासिल करने का लक्ष्य काफी पीछे है। ऐसे में यहां प्रिंट माध्यम का अभी भी तेजी से विस्तार हो रहा है। करीब एक दशक पहले जब इस देश में भी इंटरनेट ने दस्तक दी तो अखबारों में अपना इंटरनेट संस्करण निकालने की होड़ लग गई। 1999 और 2000 में डॉट कॉम का बुलबुला तेजी से उठा। तब भी अखबारों के अस्तित्व पर सवाल उठाए जा रहे थे। लेकिन यहां इंटरनेट का वह बुलबुला फूट गया। लेकिन नए सिरे से फिर इंटरनेट के प्रति जागरूकता बढ़ी। अखबारों और पत्रिकाओं के इंटरनेट संस्करण मुफ्त में वर्चुअल स्पेस में मिलने लगे। तब एक बार फिर यहां इनके जरिए पारंपरिक मीडिया के अंत का ऐलान किया जाने लगा। क्रमश:....

सोमवार, 10 मार्च 2008

जरूरत नए मीडिया की -2

उमेश चतुर्वेदी
बाद के दौर में भी ऐसे किस्से दोहराए गए। फिर पनपा भाई-भतीजावाद। बिना जान - पहचान और चापलूसी के अखबारी संस्थानों में भर्तियां दूर की कौड़ी होती गईं। जाहिर है , इसका असर पत्रकारिता की गुणवत्ता पर भी पड़ा। एक गड़बड़ी और भी हुई। इसी दौर में कथित राष्ट्रीय हिंदी अखबार सिकुड़ते गए, जबकि हिंदी के बाजार के बढ़ते दबदबे को देखते हुए हिंदी के क्षेत्रीय पत्रों का विकास तेजी से हुआ। लेकिन इनकी ऊंची कुर्सियां प्रोफेशनल तौर पर कुशल और धाकड़ पत्रकारों को कम ही मिली। कहना ना होगा- उनमें से कई आज भी अहम जगहों पर हैं। इन्होंने अब बिना विज्ञापन के ही भर्तियों की नई परंपरा ही विकसित कर डाली है। आज अगर पत्रकारिता का चेहरा लोकतांत्रिक नहीं दिखता, वहां समाज के दबे- कुचले वर्ग की आवाज नहीं उठ पा रही है तो इसका एक कारण यह भी है। एनडीटीवी इंडिया के संपादक रहे दिबांग इस दौर की पत्रकारिता के पहले रसूखदार व्यक्ति हैं- जिन्होंने हिंदी पत्रकारिता जगत की इस गड़बड़ी पर सवाल उठाया है।
आज टेलीविजन की दुनिया पर जमकर सवाल उठाए जा रहे हैं। इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों पर आरोप है कि वे नाटकीय तत्वों को ही उभारने में सबसे ज्यादा मदद दे रहे हैं। हकीकत में उन्हें ऐसा करना भी पड़ रहा है और इसकी वजह है टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट यानी टीआरपी। लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि अगर टीआरपी की दौड़ में चैनल आगे नहीं रहा तो उसे विज्ञापन मिलने बंद हो जाएंगे और विज्ञापन नहीं मिला तो तकनीक से लदाफदा इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों का तामझाम नहीं चल पाएगा। वैसे भी इलेक्ट्रॉनिक माध्यम की आलोचना की दुनिया में सबसे ज्यादा पत्रकार अखबारी दुनिया के ही हैं। ये आलोचक आलोचना करते वक्त ये भूल जाते हैं कि टेलीविजन का पर्दा उन्हें भी कम नहीं लुभाता। साथ की लालसा भी और विरोध का दर्शन भी –ये ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकता। आपको अपनी सीमा रेखा खींचनी ही होगी।
बहरहाल इस दौर में छोटे-छोटे समूहों की पत्रकारिता ने नई आस जगाई है। सुनीता नारायण का सीएसई न्यूज हो या बुंदेलखंड का खबर लहरिया। ऐसे पत्रों ने जनसरोकारों को उठाने और उन्हें आवाज देने में अहम भूमिका निभाई है। जिस तरह आज का हिंदी अखबारी जगत अपनी सामाजिक भूमिका को भूलता जा रहा है। उसमें खबर लहरिया जैसे पत्रों की भूमिका बढ़ती नजर आ रही है। आने वाले दिनों में ऐसी आवाजें और बुलंद ही होंगी। जिस तरह वंचितों और शोषितों का नया वर्ग उभर कर सामने आ रहा है और अपनी अभिव्यक्ति के लिए नई मीडिया की तलाश कर रहा है, उसके पीछे भी कहीं न कहीं वे कारण ही जिम्मेदार हैं- जिनकी चर्चा इस आलेख के शुरूआती हिस्से में की गई है।
वैसे भी ये तलाश जारी रहेगी। लेकिन इसका भी एक खतरा नजर आ रहा है। दलित और पिछड़े वर्ग के उभार में उसी तरह की आक्रामकता नजर आ रही है, जैसी हाल तक सवर्ण मानसिकता में रही है या है। ऐसे में ये सोच पाना कि उनके लिए उभर रहा और उनकी आवाज बन रहा मीडिया संयम बरतेगा – बेबुनियाद है। बल्कि इस बात की पूरी आशंका है कि प्रचलित मानकों को ध्वस्त करने में यह मीडिया ज्यादा अहम भूमिका निभाएगा। इसका असर दलित लेखन पर दिखने भी लगा है। जहां दलितों के हितैषी महात्मा गांधी शैतान की औलाद बता दिए जाते हैं या प्रेमचंद की रंगभूमि की प्रतियां दलित विरोधी बताकर जलाई जाती हैं।

राजनीति और पत्रकारिता के रिश्ते

उमेश चतुर्वेदी
हिंदी के मशहूर पत्रकार राजेंद्र माथुर ने पत्रकारों के बारे में कहा था कि वे सिर्फ घटनाओं के साक्षी होते हैं-लिहाजा उनकी रिपोर्ट भर कर सकते हैं। उनके मुताबिक घटनाएं घटें-ये कोई जरूरी नहीं। उनके इस कथन का मकसद साफ है कि अगर पत्रकार निरपेक्ष ढंग से रिपोर्ट करने या सोचने वाला नहीं रहा-तो वह किसी घटना को निष्पक्ष तरीके रिपोर्ट नहीं कर पाएगा। यहां एक सवाल और उठता है कि पत्रकार और पत्रकारिता की प्रतिबद्धता किसके प्रति होनी चाहिए-किसी राजनीतिक दल,जनता या फिर नैतिक मूल्यों के प्रति।
इस बहस को आगे बढ़ाने से पहले हमें ये भी जान लेना चाहिए कि राजनीति के बिना पत्रकारिता के अस्तित्व की कल्पना बेमानी है। कहावत है कि आप जिसके साथ सबसे ज्यादा वक्त गुजारते हैं -आपके व्यक्तित्व पर उसका सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ता है। जाहिर है कि राजनीति का पत्रकारिता पर आज काफी असर डाला है। इसकी वजह समझना आसान है। दरअसल राजनीति ही पूरी दुनिया को संचालित करती है। सरकारें बनती हैं या बिगड़ती हैं तो राजनीति के ही जरिए और पत्रकारिता उसी पर निगाह रखती है। इसके चलते उसका दिन रात का साबका राजनीति से ही पड़ता रहता है। जब हम पत्रकारिता की चर्चा कर रहे हैं तो इसका मतलब पत्रकारों से भी है-क्योंकि बिना पत्रकार के पत्रकारिता की कल्पना भी वैसी है-जैसे बिना पत्तियों का पेड़।
दुर्भाग्यवश आज के दौर में राजनीतिक दलों के प्रति पत्रकारों की प्रतिबद्धता दिखनी आम हो गई है। ये असर सबसे ज्यादा उन पत्रकारों में दिखता है-जो लगातार और लगातार राजनीतिक रिपोर्टिंग ही करते हैं। जिस राजनीतिक दल को वे कवर करते हैं,धीरे-धीरे उनकी प्रतिबद्धता भी उसी राजनीतिक दल की ओर झुकती जाती है। फिर वे कुछ इसी तरह सोचने लगत हैं-जैसे उस दल विशेष के नेता और कार्यकर्ता सोच रहे होते हैं। उस दल विशेष के हित में सोचने का असर उनकी रिपोर्टों पर भी दिखना शुरू हो जाता है। शायद यही वजह है कि राजनीतिक दल भी उन पत्रकारों को अपने पक्ष में साधने की कोशिशें करते रहते हैं। इसका असर भी होता है। आज के दौर के एक जाने-पहचाने पत्रकार अपने छात्र जीवन में वामपंथी रूझान वाली छात्र राजनीति के समर्थक और कार्यकर्ता थे। कालांतर में एक अखबार में उन्हें नौकरी मिली और उन्हें कवर करने को मिली बीजेपी। फिर एक दौर ऐसा आया कि बीजेपी के आम कार्यकर्ता और उनमें कोई अंतर ही नहीं दिख रहा था। उनकी सारी वामपंथी राजनीति हवा हो गई थी।
आज के दौर में कई ऐसे चोटी के पत्रकार हैं -जिनका समाजवाद से गहरा रिश्ता रहा है। छात्रजीवन में वे लोहियावादी रहे हैं और कांग्रेस के विरोध को वे जैसे जन्मसिद्ध अधिकार मानते रहे हैं। लेकिन लंबे समय से कांग्रेस को कवर करते-करते उनका सारा समाजवाद काफूर हो गया है। आज उनकी रिपोर्टों को बारीकी से पढ़ें तो आपको लगेगा -मानों वे कांग्रेस का प्रचार कर रहे हैं।
वैसे भी ये असर सत्ताधारी दलों को कवर करने वाले पत्रकारों पर कुछ ज्यादा ही दिखता है। विपक्षी दलों को कवर करने वाले पत्रकारों की उस दल विशेष के प्रति लगाव उतना नहीं होता। ये तय मानिए कि कल कोई जनता दल या फिर समाजवादी पार्टी सत्ता में आ गई तो उसे कवर करने वाले पत्रकार भी जनता दल और समाजवादी पार्टी की ही तरह सोचना शुरू कर देंगे। तो क्या हम मान लें कि सत्ता ही पत्रकारों को भ्रष्ट बनाने की कोशिश करती है। इसका जबाब पूरी तरह हां में हैं।
एक दौर था कि सत्ता का विरोध पत्रकारिता की पहचान माना जाता था। जो जितना तेज-तर्रार और तेवर वाला पत्रकार हुआ,उतना ही उसे बड़ा और गंभीर माना जाता था। लेकिन आज मान्यताएं बदल चुकी हैं। आज पत्रकार का मतलब है कि वह अपनी आम लोगों के प्रति पक्षधरता को कितनी जल्दी तोड़कर नौकरी करने और नौकरी बचाने की मानसिकता से खुद को जोड़ लेता है और इस व्यवस्था का खुद को अंग बना लेता है। जिसने तेवर दिखाए-आम लोगों के अधिकारों की बात की,उनकी नौकरी गई। फिर जब पत्र ही नहीं रहा तो पत्रकारिता कैसी रही।
कहना ना होगा कि इसे पत्रकारिता संस्थानों ने ही बढ़ावा दिया है। कई अखबारों और टेलीविजन चैनलों में शीर्ष पदों पर बैठे ऐसे लोग मिल जाएंगे - जिनका बतौर प्रोफेशनल खास योगदान नहीं है। फिर भी वे रसूखदार पदों पर हैं और जो वास्तविकता पर आधारित आम लोगों की पत्रकारिता कर रहे हैं-उनके जिम्मे पत्रकारिता संस्थान के सबसे निचले तबके के ही काम हैं। अभी हाल ही में एक बड़े अखबार के संपादक को अपने एलीट दिल्ली ब्यूरो में राजनीतिक संवाददाता की जरूरत हुई। कुछ पत्रकारों ने उनसे संपर्क किया तो संपादक महोदय ने सबसे एक ही शर्त रखी-प्रधानमंत्री कार्यालय के किसी बड़े अधिकारी से अपनी सिफारिश करा दो तो समझो नौकरी पक्की। वैसे भी राजनीतिक ब्यूरो में रिपोर्टर और संवाददाता के पदों पर आज किसी भी अखबार में सिर्फ रिपोर्टिंग और बेहतरीन लेखन कौशल के सहारे नौकरी पाना आसान नहीं रहा। दूसरे शब्दों में कहें तो बेहद असंभव सी चुनौती हो गई है। आज अखबारों के मालिक और कारपोरेट मुखिया हों या फिर चैनलों के कर्ता-धर्ता,अपने यहां राजनीतिक रिपोर्टर को रखते हुए एक ही सवाल पूछते हैं-आप किसको जानते हैं। यहां उनका मतलब किसी बड़े नेता और अधिकारी से होता है। इसी तरह आज बिजनेस और आर्थिक बीट पर काम करने वाले पत्रकार से ये पूछा जाने लगा है कि आप किस नामी-गिरामी बिजनेसमैन या उद्योगपति को जानते हैं। कहने को तो ये सब खबरें उगाहने के नाम पर होता है। लेकिन असलियत ये है कि प्रबंधन इस बहाने रिपोर्टर या संवाददाता के जरिए संवाद और खबर के साथ ही दूसरे काम कराना चाहता है।
लेकिन सबसे बड़ी बात ये है कि जिसने सचमुच की पत्रकारिता की होगी- उसके लिए बड़े और रसूखदार व्यक्ति की अहमियत से ज्याद बड़े और अहम मुद्दे आम लोगों की चिंताएं रही होंगी। यानी हर बड़ा और रसूखदार व्यक्ति की गड़बड़ी उजागर करना उसकी प्राथमिकता में रही होगी- अब आप ही सोचिए कि कौन ऐसा उदार बड़ा और ताकतवर आदमी होगा जो ऐसे पत्रकार को नौकरी दिलाना चाहेगा।
तो क्या ये मान लिया जाय कि बिना राजनीतिक सहयोग के बिना पत्रकारिता में रसूखदार पद पाना बिल्कुल असंभव है। इसका जवाब कुछ हद तक हां होते हुए भी ना में है। दरअसल ऐसी नियुक्तियां पाए लोग सत्ता बदलते ही अप्रासंगिक हो जाते हैं और प्रबंधन के लिए उनकी स्थिति निचोड़े हुए नीबू जैसी हो जाती है और जो सचमुच अपनी बदौलत,अपने काम की बदौलत आते हैं-कोई भी प्रबंधन उसे नींबू निंचोड़ने की तरह इस्तेमाल नहीं कर सकता। इसलिए ऐसे लोगों की जरूरत सदा बनी रहेगी। हां उनके लिए सफलता और उपर उठने का रास्ता सीधा-सपाट नहीं होगा। बल्कि उन्हें रपटीली और घुमावदार राहों से ही गुजरना होगा।
राजनीति की दुनिया में कहावत है कि कोई किसी का दोस्त या लंबे समय का दुश्मन नहीं होता। लेकिन पत्रकारिता ही एक मात्र विधा है-जिससे राजनीति सिर्फ और सिर्फ दोस्ती ही निभाना चाहती है और कई मायने निभा भी रही है। दरअसल जिस तरह पत्रकारिता के लिए राजनीति और राजनेता जरूरी हैं,कुछ उसी तरह राजनीति के लिए पत्रकार और अखबार या चैनल भी जरूरी हैं। ऐसे में राजनीति का ये खेल जारी रहेगा कि वह अपने मनपसंद लोगों को रसूखदार जगहों पर पत्रकारीय नौकरियां दिलाते रहें। राजनेता चाहेंगे ही उनका चंपू ही उसके काम लायक अखबार में जगह बनाए। लेकिन हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि स्वतंत्रचेता लोगों के लिए जगह बनी रहेगी। ये सच है कि आज के दौर में ऐसे लोगों का बोलबाला कुछ ज्यादा ही हो गया है। ऐसे में प्रतिभाओं को सामने आने में देर लग सकती है। लेकिन हमें एक तथ्य नहीं भूलना चाहिए। अपने देश की अखबारी पत्रकारिता आजादी के आंदोलन की कोख से निकली और क्रांतिकारी वक्त में पली बढ़ी है। जाहिर है,उसके आदेशों और क्रांति की तपिश पर ही आगे बढ़कर ये यहां तक पहुंची है। हमें ये भी नहीं भूलना चाहिए कि दुनिया के चाहे जो भी काम और संस्कृति ही क्यों ना हो-उसके अपने आदशZ और उसकी नैतिकता होती है। लंबी रेस के घोड़े इन नैतिकताओं और आदर्शों पर चलने वाले लोग ही होते हैं। यहां पर महान अमेरिकी पत्रकार वाल्टर लिपमैन के शब्द याद आते हैं-दुनिया जैसी भी है़,चलती रहेगी। उसमें मैं एक वाक्य जोड़ना चाहूंगा कि दुनिया के आदर्श बचे रहेंगे और ये ही दुनिया की इस महान विधा को बचाए रख सकेंगे।

रविवार, 9 मार्च 2008

प्रभाष जोशी को शलाका सम्मान

हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास में योगदान के लिए साल 2007-08 का शलाका सम्मान वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी को दिया जाएगा। शलाका सम्मान हिंदी अकादमी को ओर से दिया जाने वाला सर्वोच्च सम्मान है. प्रभाष जोशी ने जनसत्ता को आम आदमी का अखबार बनाया. उन्होंने उस भाषा में लिखना-लिखवाना शुरू किया जो आम आदमी बोलता है. देखते ही देखते जनसत्ता आम आदमी की भाषा में बोलनेवाला अखबार हो गया. इससे न केवल भाषा समृद्ध हुई बल्कि बोलियों का भाषा के साथ एक सेतु निर्मित हुआ जिससे नये तरह के मुहावरे और अर्थ समाज में प्रचलित हुए.

नवंबर 1983 में वे जनसत्ता से जुड़े और इस अखबार के संस्थापक संपादक बने. नवंबर 1995 तक वे अखबार के प्रधान संपादक रहे लेकिन उसके बाद वे हाल फिलहाल तक जनसत्ता के सलाहकार संपादक के रूप में जुड़े रहे. उन्होंने अपनी लेखनी से राष्ट्रीयता को लगातार पुष्ट किया. वैचारिक प्रतिबद्धता का जहां तक सवाल है तो उन्होंने सत्य को सबसे बड़ा विचार माना. इसलिए वे संघ और वामपंथ पर समय-समय पर प्रहार करते रहे. अब तक उनकी प्रमुख पुस्तकें जो राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई हैं वे हैं- हिन्दू होने का धर्म, मसि कागद और कागद कारे. अभी भी जनसत्ता में उनका स्तंभ कागद कारे हर रविवार को छपता है और हिंदी राजनीति और पत्रकारिता जगत में अपनी तरह से इसका नोटिस भी लिया जाता है।