मंगलवार, 1 मई 2018

पुस्तक समीक्षा

राष्ट्रवाद से जुड़े विमर्शों का रेखांकन
लोकेन्द्र सिंह
(समीक्षक विश्व संवाद केंद्र,भोपाल के कार्यकारी निदेशक हैं।)

पुस्तक परिचय
पुस्तक : राष्ट्रवादभारतीयता और पत्रकारिता
संपादक : प्रो. संजय द्विवेदी
प्रकाशकः यश पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स
1/10753, सुभाष पार्कनवीन शाहदरादिल्ली-110032
मूल्यः 650 रूपए मात्र (सजिल्द), 250 रूपए मात्र (पेपरबैक)
पृष्ठ : 247

देश में राष्ट्रवाद से जुड़ी बहस इन दिनों चरम पर है। राष्ट्रवाद की स्वीकार्यता बढ़ी है। उसके प्रति लोगों की समझ बढ़ी है। राष्ट्रवाद के प्रति बनाई गई नकारात्मक धारणा टूट रही है। भारत में बुद्धिजीवियों का एक वर्ग ऐसा हैजो हर विषय को पश्चिम के चश्मे से देखते है और वहीं की कसौटियों पर कस कर उसका परीक्षण करता है। राष्ट्रवाद के साथ भी उन्होंने यही किया। राष्ट्रवाद को भी उन्होंने पश्चिम के दृष्टिकोण से देखने का प्रयास किया। जबकि भारत का राष्ट्रवाद पश्चिम के राष्ट्रवाद से सर्वथा भिन्न है। पश्चिम का राष्ट्रवाद एक राजनीतिक विचार है। चूँकि वहाँ राजनीति ने राष्ट्रों का निर्माण किया हैइसलिए वहाँ राष्ट्रवाद एक राजनीतिक विचार है। उसका दायरा बहुत बड़ा नहीं है। उसमें कट्टरवाद है,जड़ता है। हिंसा के साथ भी उसका गहरा संबंध रहा है। किंतुहमारा राष्ट्र संस्कृति केंद्रित रहा है। भारत के राष्ट्रवाद की बात करते हैं तब 'सांस्कृतिक राष्ट्रवादकी तस्वीर उभर कर आती है। विभिन्नता में एकात्म। एकात्मता का स्वर है- 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद'। इसी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की समझ को और स्पष्ट करने का प्रयास पुस्तक के संपादक प्रो. संजय द्विवेदी ने अपनी पुस्तक 'राष्ट्रवादभारतीयता और पत्रकारिताके माध्यम से किया है। उन्होंने न केवल राष्ट्रवाद पर चर्चा को विस्तार दिया हैअपितु पत्रकारिता में भी 'राष्ट्र सबसे पहलेके भाव की स्थापना को आवश्यक बताया है। 
          यह पुस्तक ऐसे समय में आई हैजब मीडिया में भी राष्ट्रीय विचार 'धाराबहती दिख रही है। हालाँकियह भी सत्य है कि उसका इस तरह दिखना बहुतों को सहन नहीं हो रहा। भारतीयता का विरोधी कुनबा अब राष्ट्रवाद को पहले की अपेक्षा अधिक बदनाम करने का षड्यंत्र रच रहा है। किंतुराष्ट्रवाद का जो ज्वार आया हैउसमें उनके सभी प्रयास न केवल असफल हो रहे हैंबल्कि उसके वेग से उनके नकाब भी उतर रहे हैं। पुस्तक में शामिल 38 आलेख और तीन साक्षात्कारों से होकर जब हम गुजरते हैंतो उक्त बातें ध्यान में आती हैं। संपादक ने यह सावधानी रखी है कि राष्ट्रवादभारतीयता और पत्रकारिता पर समूचा संवाद एकतरफा न हो। वामपंथी विचारक डॉ. विजय बहादुर सिंह अपने लेख 'समझिए देश होने के मायने!में राष्ट्रवाद के संबंध में अपने विचार रखते हैं। वह अपने साक्षात्कार में मुखर होकर कहते हैं कि उन्हें 'राष्ट्र तो मंजूर हैपर राष्ट्रवाद नहीं।इसी तरह जनता दल (यू) के राज्यसभा सांसद और प्रभात खबर के संपादक हरिवंश 'आइए,सामूहिक सपना देखेंका आह्वान करते हैं। आजतक के एंकर- टेलीविजन पत्रकार सईद अंसारी 'भारतीयता और पत्रकारिताको अपने ढंग से समझा रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकार आबिद रजा ने अपने लेख में यह समझाने का बखूबी प्रयास किया है कि भारतीयता और राष्ट्रीयता एक-दूसरे की पूरक हैं। उनका कहना सही भी है।
          पुस्तक में राष्ट्रवाद का ध्वज उठाकर और सामाजिक जीवन का वृत लेकर चल रहे चिंतक-विचारकों के दृष्टिकोण भी समाहित हैं। विवेकानंद केंद्र के माध्यम से युवाओं के बीच लंबे समय तक कार्य करने वाले मुकुल कानिटकरराष्ट्रवादी विचारधारा के विद्वान डॉ. राकेश सिन्हावरिष्ठ साहित्यकार डॉ. देवेन्द्र दीपक और वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र शर्मा, रमेश शर्मा जैसे प्रखर विद्वानों ने भारतीय दृष्टिकोण से राष्ट्रवाद को हम सबके सामने प्रस्तुत किया है। भारतीय दृष्टिकोण से देखने पर राष्ट्रवाद की अवधारण बहुत सुंदर दिखाई देती है। भारत का राष्ट्रवाद उदार है। उसमें सबके लिए स्थान है। सबको साथ लेकर चलने का आह्वान भारत का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद करता है। इसलिए जिन लोगों को राष्ट्रवाद के नाम से ही उबकाई आती हैउन्हें यह पुस्तक जरूर पढऩी चाहिएताकि वह जान सकें कि राष्ट्र और राष्ट्रवाद को लेकर भारतीय दृष्टि क्या है?
          मीडिया की समाज में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है। वह जनता के मध्य मत निर्माण करने में उत्प्रेरक की भूमिका निभाती है। इसलिए मीडिया में कार्य करने वाले प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी बहुत बढ़ जाती है। अक्सर यह कहा जाता है कि लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका एक विपक्ष की तरह है। इस नीति वाक्य को सामान्य ढंग से लेने के कारण अकसर पत्रकार गड़बड़ कर देते हैं। वह भूल जाते हैं कि मीडिया की विपक्ष की भूमिका अलग प्रकार की है। वह सत्ता विरोधी राजनीतिक पार्टी की तरह विपक्ष नहीं है। उसका कार्य है कि वह सत्ता के अतार्किक और गलत निर्णयों पर प्रश्न उठाए, न कि लट्ठ लेकर सरकार और उसके विचार के पीछे पड़ जाए। किंतुआज मीडिया अपनी वास्तविक भूमिका भूल कर राजनीतिक दलों की तरह विपक्ष बन कर रह गया है। जिस तरह विपक्षी राजनीतिक दल सत्ता पक्ष के प्रत्येक कार्य को गलत ठहरा कर हो-हल्ला करते हैंवही कार्य आज मीडिया कर रहा है। दिक्कत यहाँ तक भी नहींकिंतु कई बार मीडिया सत्ता का विरोध करते हुए सीमा रेखा से आगे निकल जाता है। कब सत्ता की जगह देश उसके प्रश्नों के निशाने पर आ जाता हैउसको स्वयं पता नहीं चल पाता है। संभवत: इस परिदृश्य को देखकर ही पुस्तक में 'राष्ट्रवाद और मीडियाविषय पर प्रमुखता से चर्चा की गई है।
         भारतीय शिक्षण मंडल के राष्ट्रीय संगठन मंत्री मुकुल कानिटकर ने जिस तरह आग्रह किया है कि 'प्रसार माध्यम भी कहें पहले भारत', उसी बात को अपन राम ने भी अपने आलेख 'पत्रकारिता में भी राष्ट्र सबसे पहले जरूरीमें उठाया है। आज जिस तरह की पत्रकारिता हो रही हैउसे देखकर तो यही कहा जा सकता है कि हमारी पत्रकारिता में भी राष्ट्र की चिंता पहले करने की प्रवृत्ति बढऩी चाहिए। पुस्तक के संपादक प्रो. संजय द्विवेदी ने भी इस बार को रेखांकित किया है-'उदारीकरण और भूमंडलीकरण की इस आँधी में जैसा मीडिया हमने बनाया हैउसमें 'भारतीयताऔर 'भारतकी उपस्थिति कम होती जा रही है। संपादक का यह कथन ही पुस्तक और उसके विषय की प्रासंगिकता एवं आवश्यकता को बताने के लिए पर्याप्त है। राष्ट्रवाद और मीडिया के अंतर्सबंधों एवं उनकी परस्पर निर्भरता को डॉ. सौरभ मालवीय ने भी अच्छे से वर्णित किया है। 
          पुस्तक के संपादक प्रो. संजय द्विवेदी के इस कथन से स्पष्ट सहमति जताई जा सकती है कि - 'यह पुस्तक राष्ट्रवादभारतीयता और मीडिया के उलझे-सुलझे रिश्तों तथा उससे बनते हुए विमर्शों पर प्रकाश डालती है।' निश्चित ही यह पुस्तक राष्ट्रवाद पर डाली गई धूल को साफ कर उसके उजले पक्ष को सामने रखती है। इसके साथ ही राष्ट्रवादभारतीयता और पत्रकारिता के आपसी संबंधों को भी स्पष्ट करती है। वर्तमान समय में जब तीनों ही शब्द एवं अवधारणाएं विमर्श में हैंतब प्रो. द्विवेदी की यह पुस्तक अत्यधिक प्रासंगिक हो जाती है।

बुधवार, 24 जनवरी 2018

साहित्य मनुष्य को बेहतर बनाता है

"उपन्यास और कविताएं वस्तुतः जीवन और समाज की धड़कन होती है। व्यक्तित्व  चेहरों से याद रखे जाते हैं या कृति के माध्यम से। लेखक अपनी कृति से सदैव जीवित रहता है ।"यह उद्गार हेमंत फाउंडेशन पुरस्कार समारोह के मुख्य अतिथि भोपाल से पधारे आईसेक्ट यूनिवर्सिटी के रिसर्च जनरल अनुसंधान के संपादक सुप्रसिद्ध कवि विजयकांत वर्मा ने 20 जनवरी 2018 को श्री राजस्थानी सेवा संघ के सभागार में व्यक्त किए।
 कार्यक्रम का आरंभ दीप प्रज्वलन से शुरू हुआ। अतिथियों का स्वागत करते हुए संस्था की अध्यक्ष सुप्रसिद्ध साहित्यकार संतोष श्रीवास्तव ने अपने स्वागत भाषण में कहा
"यह पुरस्कार हमारे लिए एक इम्तिहान की तरह है जिसे हम जीवन की चुनौती मानकर हर साल आयोजित करते हैं और आयोजित करते रहेंगे।" सितारों के आगे जहां और भी है अभी इश्क के इम्तिहां और भी है"
आयोजन की प्रस्तावना तथा संस्था का परिचय कथाकार पत्रकार संस्था की सचिव प्रमिला वर्मा ने दिया। उन्होंने विजय वर्मा कथा सम्मान एवं हेमंत स्मृति कविता सम्मान का संक्षिप्त इतिहास भी बतलाया। विजय वर्मा  सम्मान के लिए चयनित पुस्तक "दीनानाथ की चक्की" के बारे में बोलते हुए सुप्रसिद्ध पत्रकार हरीश पाठक ने कहा "अशोक मिश्र की कहानियां विमर्शवादी या फैशनेबल कहानियां नहीं है ।उन्होंने संग्रह की कहानी `पत्रकार बुद्धिराम @पत्रकारिता डॉट कॉम" का विशेष उल्लेख किया । उन्होंने कहा कि इस कहानी में पत्रकारिता का पूरा सच बहुत ही विश्वसनीय ढंग से लिखा गया है। पाठक ने अशोक मिश्र की कहानी दीनानाथ की चक्की और अन्य की विस्तार से चर्चा की ।
हेमंत स्मृति कविता सम्मान के लिए चयनित पुस्तक वसंत के पहले दिन से पहले पर नवभारत टाइम्स मुंबई के सहायक संपादक हरि मृदुल ने कहा "राकेशजी की कविता चालू मुहावरों और बड़बोलेपन से पूरी तरह मुक्त है इसीलिए गहरी हैपाठक से बतियाती और संवेदना को छूती इस तरह की कविताएं काफी कम लिखी जा रही हैं । इन्हीं अर्थों में "बसन्त के पहले दिन से पहले " एक मूल्यवान संग्रह है उनके पास प्रतिरोध की इकाई प्रभावशाली कविताएं हैं। विजय वर्मा कथा सम्मान सूर्यबालाजी के कर कमलों द्वारा अशोक मिश्र एवं विजयकांत वर्मा द्वारा हेमंत स्मृति कविता सम्मान राकेश पाठक को प्रदान किया गया ।
अपने वक्तव्य में कथाकार अशोक मिश्र ने कहा "मेरे लिए कहानी लिखना किसी आम आदमी की पीड़ा को वाणी देने जैसा है । मेरी कोशिश होती है कि अन्याय, असमानतापक्षपातअव्यवस्थाशोषण के दुष्चक्र में पिसते और मेहनत मजदूरी कर गुजारा करने वाले मजदूर या किसान की दशा का थोड़ा सा चित्रण कर सके तो शायद लिखना सार्थक कहलाएगा ।"
डॉ राकेश पाठक ने संस्था को धन्यवाद देते हुए कहा "कविता आम आदमी को बेहतर मनुष्य बनाने का काम करती है। इस हिंसक समय में प्रेम कविताएं मनुष्यता का संदेश देती हैं। उन्होंने अपनी एक प्रेम कविता का पाठ रोचक अंदाज में प्रस्तुत किया।जेजेटी यूनिवर्सिटी के कुलपति एवं राजस्थानी सेवा संघ के प्रमुख विशिष्ट अतिथि विनोद टीबड़ेवाला ने राजनीतिक गतिविधियों पर गहरी चिंता व्यक्त की और साहित्यकारों की लेखनी से  परिवर्तन होने का आव्हान किया। समारोह की अध्यक्ष सुप्रसिद्ध साहित्यकार सूर्यबाला ने कहा।
"यह दोनों पुरस्कार एक बहन एक मां द्वारा अपने दिवंगत रचनाकार भाई और सगे बेटे को दी गई श्रद्धांजलि है । संतोषजी ने अपने दुख के अंकुरों को रोपकर उन्हें संवेदना और रचनात्मकता के घने छायादार वृक्ष में परिवर्तित कर दिया। इन पुरस्कारों का हमारे महानगर के साहित्यिक परिदृश्य को बहुत महत्वपूर्ण योगदान रहा है और इस मंच से पुरस्कृत नामों की विश्वसनीयता पर कभी सवाल नहीं उठे।"
कवि गजलकार देवमणि पांडेय ने कार्यक्रम का संचालन किया।
कार्यक्रम में शहर के वरिष्ठ साहित्यकार एवं पत्रकारिता की दुनिया से जुड़े  संपादक और साहित्यकारों की गरिमामय उपस्थिति रही। विशेष रूप से  कानपुर से आए वाणी के संपादक श्री हरि वाणी, झांसी से आए वरिष्ठ कवि साकेत सुमन चतुर्वेदी ,कोलकाता से आए वरिष्ठ कवि कपिल आर्यसमाजसेवी विजय वर्माधीरेंद्र अस्थानासूरजप्रकाशबृजभूषण साहनीराजेश विक्रांतफिरोज खानअसीमा भट्ट ,ज्योति गजभिए ,रीता रामदासअमर त्रिपाठी ,मुरलीधर पांडे,नागेन्द्र नाथ गुप्ता,विद्याभूषण त्रिवेदी,आभा दवे ,वनमाली चतुर्वेदी,,सुनील सिंह  आदि रचनाकारों की उपस्थिति विशेष रूप से दर्ज़ की गई।
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मंगलवार, 16 जनवरी 2018

साहित्यिक पत्रकारिता का बृजलाल द्विवेदी सम्मान रामकुमार कृषक को

हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता को सम्मानित किए जाने के लिए दिया जाने वाला पं. बृजलाल द्विवेदी अखिल भारतीय साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान इस वर्ष ‘अलाव’ (दिल्ली) के संपादक श्री रामकुमार कृषक  को दिया जाएगा।
      श्री रामकुमार कृषक  साहित्यिक पत्रकारिता के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर होने के साथ-साथ देश के जाने-माने संस्कृतिकर्मी,कवि एवं लेखक हैं। 1989 से वे लोकोन्मुख साहित्य चेतना पर केंद्रित महत्वपूर्ण पत्रिका ‘अलाव’ का संपादन कर रहे हैं।
    सम्मान कार्यक्रम आगामी 4, फरवरी, 2018 को गांधी भवन, भोपाल में दिन में 11 बजे आयोजित किया गया है। मीडिया विमर्श पत्रिका के कार्यकारी संपादक संजय द्विवेदी ने बताया कि आयोजन में अनेक साहित्कार, बुद्धिजीवी और पत्रकार हिस्सा लेगें। पुरस्कार के निर्णायक मंडल में सर्वश्री विश्वनाथ सचदेव,  रमेश नैयर, डा. सच्चिदानंद जोशी शामिल हैं।
         इसके पूर्व यह सम्मान वीणा (इंदौर) के संपादक स्व. श्यामसुंदर व्यास, दस्तावेज (गोरखपुर) के संपादक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, कथादेश (दिल्ली) के संपादक हरिनारायण, अक्सर (जयपुर) के संपादक डा. हेतु भारद्वाज, सद्भावना दर्पण (रायपुर) के संपादक गिरीश पंकज, व्यंग्य यात्रा (दिल्ली) के संपादक डा. प्रेम जनमेजय, कला समय के संपादक विनय उपाध्याय (भोपाल), संवेद के संपादक किशन कालजयी (दिल्ली) और अक्षरा (भोपाल) के संपादक कैलाशचंद्र पंत को दिया जा चुका है। त्रैमासिक पत्रिका ‘मीडिया विमर्श’ द्वारा प्रारंभ किए गए इस अखिलभारतीय सम्मान के तहत साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान करने वाले संपादक को ग्यारह हजार रूपए,शाल,श्रीफल,प्रतीकचिन्ह और सम्मान पत्र से अलंकृत किया जाता है। 
कौन हैं रामकुमार कृषक
एक अक्टूबर, 1943 को अमरोहा (मुरादाबाद-उप्र) के एक गांव गुलड़िया में जन्मे रामकुमार कृषक ने मेरठ विश्वविद्यालय से हिंदी में एमए की उपाधि और प्रयाग विवि से साहित्यरत्न की उपाधि प्राप्त की। दिल्ली में लंबे समय पत्रकारिता की। अध्यापन और लेखन करते हुए आठवें दशक के प्रमुख प्रगतिशील-जनवादी कवियों में शुमार हुए। गजल और गीत विधाओं में विशेष योगदान के साथ-साथ कहानी, संस्मरण, साक्षात्कार और आलोचना आदि गद्य विधाओं में भी उल्लेखनीय स्थान। सात कविता संग्रहों के अलावा विविध विधाओं में एक दर्जन से अधिक किताबें प्रकाशित।1978 से 1992 तक राजकमल प्रकाशन में संपादक और संपादकीय प्रमुख रहे।  1989 से अलाव पत्रिका के संपादक हैं।

बुधवार, 18 अक्टूबर 2017

टिमटिमा रहा दीया....

उमेश चतुर्वेदी 
उत्साह और उत्सव का गहरा नाता है..दोनों के उत्स में उत्स ही है, उत्स यानी नया जन्म, शुरूआत..नवजीवन हमेशा नव ऊर्जा का वाहक होता है.. नियमित खांचे में यात्रावान जिंदगी एकरस हो जाती है..एकरसता कुछ उसी तरह होती है, जैसे रूका हुआ पानी...बहता पानी ऊर्जा ही नहीं, नवजीवन का प्रतीक भी होता है..बहता पानी निर्मला इस अवधारणा के मूल में यह नवजीवन और नव ऊर्जा ही तो है...जिंदगी को उसी अंदाज में नवसंचारी बनाने के लिए, उसमें उत्साह की अंतर्निहित ऊर्जा को भरने के लिए संस्कृतियों को वक्त के साथ उपादानों की जरूरत महसूस हुई होगी..और उसने पर्वों का विधान किया होगा..ये पर्व भी एक दिन में नहीं बने होंगे, बल्कि समय-शिला की कसौटी पर वे कसे गए...समय के साथ उनमें नए-नए मुलम्मे चढ़ते गए..वे सकारात्मक ऊर्जा से लबरेज होते जाएं, इसलिए उनकी गुणवत्ता बढ़ाने लायक उपादान जुड़ते गए..और एक वक्त के बाद नए रूप में ये त्योहार हमारी जिंदगी के अभिन्न अंग बनते गए..
आनंद मठ उपन्यास में बंकिम चंद्र का मशहूर गीत है, वंदे मातरम्...भारतीय संविधान ने उसे राष्ट्रगीत का दर्जा दिया है..आजादी प्राप्त करने और उसके पहले तक हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के मन में राष्ट्र को लेकर एक स्वप्न था..स्वप्न का वह राष्ट्र यथार्थ के राष्ट्र से कहीं ज्यादा विस्तृण, कहीं ज्यादा महान, कहीं ज्यादा गहरा था...प्लेटो साहित्य शास्त्र में एक अवधारणा देते हैं..त्रिधा अपेत की..थ्री डाइमेंशन थियरी..उसके मुताबिक हमारे स्वप्नों में जो विचार आते हैं, उन्हें ही वास्तविक जगत में हम मूर्त करने की कोशिश करते हैं.लेकिन हकीकत की भौतिक दुनिया में आते-आते और मूर्त होते-होते इन विचारों में कुछ विचलन हो जाता है..यानी स्वप्न जितना महान होता है, हमारा विचार जगत जितना बड़ा होता है, असलियत की दुनिया उतनी गंभीर और ठीक वैसी ही नहीं हो पाती..उतनी महान नहीं होती..लेकिन दोनों का अपना महत्व है. दुनिया का दैनंदिन कार्य-व्यापार हकीकत से ही चलता है..लेकिन उसे और बेहतर बनाने के विचार स्वप्नों से ही आते हैं..यही महान स्वप्न वंदेमातरम् गीत में भी है...लेकिन आजादी के सत्तर साल में यह स्वप्न विदीर्ण हुआ है..वंदेमातरम् पर भी सवाल हैं..यथार्थ का राष्ट्र, स्वप्न के राष्ट्र के मुताबिक हो..लेकिन उसकी सीमा है, वह पूर्णत: स्वप्न जैसा नहीं हो सकता..अथर्ववेद में भी राष्ट्र का यह स्वप्न अपने ढंग से आता है...माता भूमि: पुत्रो अहं पृथिव्या...बहरहाल वंदेमातरम् गीत में एक पंक्ति है..सुजलां, सुफलां, मलयज शीतलां, शस्य श्यामलां मातरम्...यह शस्य श्यामलां क्या है..शस्य यानी खेती-फसल और उससे आच्छादित हमारी महान भारत माता श्यामल यानी सांवले रंग की दिखती है..वंदेमातरम् में बंकिम उस भारत के महान स्वप्न को ही रूपायित करते हैं, जिसका आधार खेती रही है..इसीलिए भारतीय संस्कृति को शस्य संस्कृति भी कहते हैं..शस्य यानी कृषि संस्कृति पर हमारे त्योहार आधारित हैं.. यानी फसल का एक चक्र पूरा हुआ तो त्योहार..फसल तैयार है या बढ़ रही है तो उसका त्योहार... फसल की बुवाई का त्योहार...मानव मूल में शस्य केंद्रित ही है..इसलिए दुनियाभर के लोकपर्वों को देखेंगे तो उनके पीछे कहीं न कहीं खेती, स्थानीय आखेट का ही असर है..आधुनिकता की नई परिभाषा देकर परंपराओं को नकारने का दर्शन देने वाले पश्चिम में भी देखेंगे तो वहां के भी लोक त्योहार फसल आधारित ही नजर आएंगे..इस संदर्भ में वहां के आधुनिकता से लबरेज त्योहारों को इस निकष से तज ही दीजिए..हमारी दीवाली भी ऐसा ही त्योहार है...बरसात के बाद फसलें तैयार होती हैं..यही वह दिन होता है, जब धान की फसल पकती है..पके धान की झूमती सुनहली बालियों से हमारे रीति कवि भी प्रभावित हुए है..लोक की रचनाओं की नायिकाएं पके धान की लोच खाती सुनहली बालियों की तरह लय में झूमती नजर आती हैं..
हमारे त्योहार चूंकि फसली चक्र पर आधारित हैं, इसलिए उसमें उन्हीं चीजों का इस्तेमाल होता है, जो उस फसल चक्र से अन्न से हासिल होते हैं..दीपावली पर हम खील चढ़ाते हैं..धान का खील, उसी का प्रतीक है..गुड़ से बनी मिठाइयां भी एक दौर में खूब तैयार की जाती थीं..
उत्साह के उत्स से संचारित त्योहार कहीं हमारे अवचेतन में छिपी बैठी उदासी का जरिया भी बनकर आते हैं..हर त्योहार के कुछ पहले और कुछ बाद...हमारे अवचेतन से यह उदासी बाहर निकल आती है..कई बार आंसुओं के रूप में तो कई बार निराशा के रूप में.. आंसू कई बार अंतरतम के अंधकार को, विकार को बाहर निकालने का जरिया भी बनते हैं..जीवन में कई बार ऐसा हुआ है, त्योहारों पर आंसूं निकले हैं..अवचेतन में गहरे पैठी करूणा बाहर झांकने लगती है..कई बार प्यार और न्योछावर होने का भाव भी इन आंसुओं के जरिए छलक आता है..गोरखपुर में देशभक्ति के गीत सुन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की आंखों का छलछलाना उसी भाव का प्रकटीकरण था..उसका नव उत्साही मीडिया ने मजाक उड़ाया..वैसे आज के दौर में मजाक और आलोचना के स्वर कुछ ज्यादा ही हो गए हैं..हिंदी पत्रकारिता के शलाका पुरूष प्रभाष जोशी भी ने ऐसे मौके पर आए अपने आंसुओं को कभी छुपाया नहीं..अपने मशहूर स्तंभ कागद कारे में जिक्र भी करते रहे..उसका भी मजाक उड़ाया गया..एक मशहूर कवि-पत्रकार ने उन पर आरोप ही जड़ दिया था, उसके अंदर एक बूढ़ी विधवा रहती है जो मौके-बेमौके विलाप करती रहती है...
ये आंसू वीरता के भी प्रतीक हैं..मनुष्यता की रक्षा के लिए उमड़ने वाले भावों के प्रतीक....आंसू को समझना है तो जयशंकर प्रसाद के पास जाना पड़ेगा..वे कहते हैं.. इस करुणा कलित हृदय में / अब विकल रागिनी बजती / क्यों हाहाकार स्वरों में / वेदना असीम गरजती
इसका जवाब वे आगे देते हैं..
अवकाश भला हैं किसको,/ सुनने को करुण कथाएँ /बेसुध जो अपने सुख से / जिनकी हैं सुप्त व्यथाएँ
बचपन की दीवाली याद आती है..दीवाली के अगले दिन मां और दादी के लिए मुंह अंधेरे ही निकल जाते..कटेली की खोज में आयुर्वेदिक दवाओं की जान कटेली..कांटों भरी कटेली जिसे हमारी भोजपुरी में रेंगनी कहते..रेंगनी की डालियां उखाड़ कर लाई जातीं..मां और दादी को सौंप दिया जाता..गोधन पूजा की तैयारियों में जुटी मां और दादी अपनी मसरूफियत में से कुछ पल निकालतीं..उस कटेली की कांटेदार एक-एक पत्ती तोड़तीं, अपने सिर के चारों तरफ घुमातीं और परिवार के एक-एक पुरूष सदस्य की मृत्यु की घोषणा करतीं, अगर वे शादी-शुदा हुए तो उनकी पत्नियों को बेवा घोषित करतीं और कटेली की पत्ती पहले से बिछे कोंहड़ा के पत्ते पर डालती जातीं..किसी साध्वी को विधवा कह कर देखिए. वह चंडी रूप धारण कर लेगी, लेकिन दीपावली की उस अगली सुबह साध्वी खुद ही खुद को बेवा घोषित करती..इस पूरी प्रक्रिया को श्रापना कहते...यह परंपरा आज भी पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड के गांवों में जारी है..फिर उन पत्तियों को बटोर कर गोधन पूजा की जगह लाया जाता..वहां बने गोबर के गोवर्धन के पास रखा जाता..गोवर्धन पूजा के बाद वहां का जल लेकर हम बच्चे घर लौटते और फिर उस श्रापने की प्रक्रिया को उल्टे क्रम में लाया जाता..मां और दादी अपने बालों से एक लट निकालतीं..उसे हाथ में लेतीं और उस पर वह लाया हुआ जल गिराया जाता...इस दौरान जितने लोगों को वह श्राप चुकी होतीं..उनके जिंदा होने की कामना की जाती औऱ फिर शुरू हो पाता था..गोवर्धन पूजा के बाद का भोज...पूरन पूरी और गुड़ की खीर का भोज
यह श्रापना और उसे जिंदा रखना क्या है..यह सृष्टि के संहार और उससे उपजी उदासी का ही प्रतीक है..और इस संहार और उदासी के बाद ही नवसृजन होता है..सृष्टि के संहार और सृजन की इस परंपरा को सहज भाव से लेने का संदेश भी है इसमें... आध्यात्मिकता की इस डोर के जरिए इसे बांधे रखा गया...लेकिन वक्त के साथ इस डोर पर विस्मृति की तहें चढ़ती गईं और हम भूल गए इन परंपराओं के संदेशों को...आधुनिक शिक्षा ने इन्हें दकियानूसी घोषित कर दिया..अंधविश्वासी भी बना दिया...इस पर बहस की गुंजाइश भी नहीं छोड़ी..बहरहाल उदासी इसलिए भी आती है कि आप नवसृजन का उमंगों से स्वागत भी कर सकें..
कभी आपने दीये को देखा है..पारंपरिक दीये को...देर रात टिमटिमाना..दीया अंधकार के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक है..वह अंधेरे की काली दुनिया को अपने प्रकाश से चुनौती देता है..दीया भले ही टिमटिमाता रहे, वह अंधेरे को चुनौती ही देता है..टिमटिमाना उदासी का प्रतीक भी है...गौर से आज की रात देखिएगा अकेले टिमटिमाते..चुपचाप बल खाते दीये को..उसकी राह में हवाओं की बाधा भी आएगी..वह बल खाएगा..उसकी लौ कंपित होगी...लेकिन वह खड़े रहने की कोशिश करेगा..हवा के थपेड़ों के सामने वह बुझ जाएगा..लेकिन अपनी आखिरी लौ तक वह प्रकाश फैलाता रहेगा...अंधेरे के खिलाफ उसका संघर्ष आखिरी दौर तक जारी रहेगा..दीप और अंधेरे की प्रकृति में बुनियादी अंतर है..अंधेरा एकात्म भाव से रोशनी को भगाता है...दीया अकेले ही रोशनी को चुनौती देगा..यह बिना सोचे कि उसकी रोशनी सिर्फ उसके लिए ही नहीं, सबके लिए होगी..
अज्ञेय कहते हैं.. यह वह विश्वास नहीं, जो अपनी लघुता में भी काँपा / वह पीड़ा, जिसकी गहराई को स्वयं उसी ने नापा / कुत्सा, अपमान, अवज्ञा के धुँधुआते कड़वे तम में / यह सदा द्रवित, चिर जागरूक, अनुरक्त नेत्र / उल्लंब-बाहु, यह चिर अखंड अपनापा
हर दीपक ऐसा ही है..दीवाली पर ऐसे ही ढेरों दीपों की पंक्तियां सजती हैं..मनुष्यता की रक्षा के लिए..

बुधवार, 23 अगस्त 2017

पद्मश्री राम बहादुर राय बने हिन्दुस्थान समाचार समूह के प्रधान संपादक

पाक्षिक पत्रिका ‘यथावत’ के संपादकराम बहादुर राय को हिन्दुस्थान समाचार समूह का प्रधान संपादक बनाया गया है जबकि मुख्य कार्यकारी अधिकारी सह प्रधान संपादक राकेश मंजुल को सभी संपादकीय कार्यों से निवृत कर दिया गया है। अब वे संस्थान में मुख्य कार्यकारी अधिकारी (रेडियो एवं दूरदर्शन सेवा) का स्वतंत्र प्रभार संभालेंगे। राम बहादुर राय तात्कालिक प्रभाव से हिन्दुस्थान समाचार वायर सेवा, यथावत पाक्षिक, युगवार्ता साप्ताहिक, नवोत्थान मासिक, नवोत्थान बांग्ला और हिंदुस्थान समाचार वार्षिकी के संपादन कार्य की देखरेख और नियंत्रण करेंगे। उक्त निर्णय हिन्दुस्थान समाचार के निदेशक मंडल की मंगलवार को दिल्ली में हुई बैठक के दौरान लिया गया है। हिंदुस्थान समाचार के चेयरमैन रवींद्र किशोर सिन्हा ने इस आशय के आदेश जारी कर दिए हैं। आपको बता दें कि बहुभाषी समाचार एजेंसी हिंदुस्थान समाचार की स्थापना बालेश्वर अग्रवाल ने की थी। एक दौर में यह भारतीय भाषाओं की सबसे बड़ी समाचार एजेंसी थी।

शुक्रवार, 3 मार्च 2017

लेकिन असल जिंदगी में नहीं लड़ पाती अनारकली


उमेश चतुर्वेदी
पत्रकार से फिल्म निर्देशक बने अविनाश दास की फिल्म अनारकली ऑफ आरा इन दिनों चर्चा में है। 24 मार्च को रिलीज होने जा रही इस फिल्म में नौटंकी गायिका अनारकली की भूमिका नील बटे सन्नाटा फिल्म से अपने अभिनय का लोहा मनवा चुकी स्वरा भास्कर ने निभाई है। यह चरित्र बेहद तेज-तर्रार है और गाली देकर बात करती है। स्वरा बताती हैं कि ये एक ऐसी महिला की कहानी है, जो अपने खुलेपन और डांस के लिए ख्यात है। वह सामंती मानसिकता के लोगों के बीच भद्दे और द्विअर्थी गानों पर डांस करती है।फिल्म की कहानी एक ऐसी महिला की है, जो मेले-ठेले में अश्लीलता की हद तक द्विअर्थी गीत गाकर लोगों का मनोरंजन करती है और अपना पेट पालती है। वैसे देश के तमाम इलाकों में अब भी मनोरंजन का साधन नाचने-गाने वाली ऐसी महिलाएं ही हैं। कहीं वे द्विअर्थी गीत पेश करती हैं तो कहीं अपने लटके-झटके के जरिए नोटों की बरसात कराती हैं, ताकि उनके और उनके साजिंदों की जिंदगी की गाड़ी आगे बढ़ सके। हालांकि इस चलन के लिए कहीं ज्यादा बदनाम अपने भदेसपन के लिए विख्यात भोजपुरी इलाका कहीं ज्यादा है। फिल्म अनारकली ऑफ आरा की कहानी भी ठेठ भोजपुरी इलाका बिहार के आरा की गायिका अनारकली की है।

मंगलवार, 26 जुलाई 2016

सूचना सेवा में सुधार पर बासवान समिति ने खड़े किये हाथ

                 संघ लोकसेवा आयोग परीक्षा से संबंधित सुधारों पर कार्य करने के लिए बी एस बासवान समिति ने भारतीय सूचना सेवा में सुधार के सवाल पर हाथ खड़े कर दिये हैं, इससे इस सेवा में सुधार के लिए किये जा रहे प्रयासों को झटका लगा है।
                 हालांकि समिति ने अभी अंतिम रिपोर्ट सरकार को सौंपी नहीं है लेकिन भारतीय सूचना सेवा में सुधार के लिए छात्रों की ओर से किये जा रहे प्रयासों के जवाब में समिति के अध्यक्ष बी एस बासवान की ओर से जयपुर के छात्र श्याम शर्मा को ईमेल कर कहा गया है भारतीय सूचना सेवा को सिविल सेवाओं में रखना या न रखनासूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का काम हैसमिति का नहीं। मुझे लगता है कि वे यथास्थिति बनाये रखना चाहते हैं।
       हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालयजयपुर के छात्र श्याम शर्मा ने प्रधानमंत्री कार्यालय व बासवान समिति को पत्र लिखकर मांग की थी कि भारतीय सूचना सेवा की पेशागत आवश्यकताओं को देखते हुए इसे ग्रुप ’ पेशेवर सेवा के तौर पर चिन्ह्ति किया जाए तथा इसमें प्रवेश के लिए मीडिया व जनसंचार विषयों की विशेषज्ञता अनिवार्य की जाए।
उल्लेखनीय है कि भारतीय सूचना सेवा में शीर्षस्थ पदों पर नियुक्तियों के लिए अब तक विशेषज्ञता अनिवार्य नहीं है और सिविल सेवाओं में निचले रैंकों पर रहने वाले प्रतिभागी अनिच्छा के साथ इस सेवा में पहुंचते हैं जिससे सरकार की कार्यदक्षता तो प्रभावित होती ही हैसाथ हीसंचार कौशल संयुक्त पेशेवर प्रतिभा के साथ भी अन्याय होता है। इस संबंध में मीडिया स्कैनदिल्ली पत्रकार संघ,आईआईएमसी छात्र संघ तथा अन्य तमाम मीडिया संगठनों व छात्र संगठनों ने बासवान समिति को पत्र लिखा है।  
इन संगठनों का मानना है कि यह स्थिति पत्रकारिता के छात्रों के साथ अन्याय जैसी है। देशभर में बड़ी संख्या में पत्रकारिता संस्थानों से सैकड़ों की संख्या में स्नातक होकर पत्रकारिता और जनसंचार के छात्र निकलते हैं और उनके कौशलों की आवश्यकता वाली एक लोकसेवा भी अस्तित्व में है फिर भी उनको अवसर देने के स्थान पर इस सेवा में ऐसे लोगों को मौका दिया जा रहा है जिनके पास पत्रकारिता और जनसंचार की बेसिक जानकारी तक नहीं है। इसलिए सूचना और प्रसारण मंत्रालयकेंद्रीय कार्मिक और प्रशिक्षण विभागसंघ लोकसेवा आयोग और प्रधानमंत्री कार्यालय से मांग की गयी है कि देशभर में पत्रकारिता के छात्रों के हित में भारतीय सूचना सेवा को पूरी तरह विशेषज्ञ सेवा के रूप में ग्रुप ए पेशेवर सेवा के रूप में चिन्हित किया जाए।