उमेश चतुर्वेदी
पिछले दिनों एक शैक्षिक प्रकाशक पीछे ही पड़ गए थे। उनकी मांग थी कि पत्रकारिता पर एक पाठ्यपुस्तक लिख कर दें। खबर और ग्लैमर के कैरियर के तौर पर विकसित हो रहे मीडिया पाठ्यक्रमों में खासकर हिंदी माध्यम की स्तरीय किताबों का भारी अभाव है। हिंदी के बड़े से बड़े प्रकाशकों ने भी इस धारा को दुहने के लिए किताबों की ढेर मैदान में उतार दी है, लेकिन उनमें से ज्यादातर उबाऊ और दुहराऊ विशुद्ध अकादमिक किताबें हैं। जिनसे छात्रों को न तो आम पढ़ाई में, न ही मीडिया की असल जिंदगी में कोई फायदा मिल पाता है। खैर इस विषय पर बहस इस वक्त मकसद नहीं है। बहरहाल इसी बहाने प्रकाशक महोदय से हिंदी में किताबों के दाम तय करने के फार्मूले की जानकारी हो गई। उनके मुताबिक अगर किसी किताब की कीमत 300 रूपए रखी गई है तो तय है कि उसके प्रोडक्शन पर महज 120 रूपए ही खर्च हुए हों। प्रकाशक महोदय के मुताबिक किताबों को बेचने और खपाने के लिए उन्हें तरह-तरह के कमीशन और घूस देने होते हैं। अगर अकादमिक किताब हुई तो पाठ्यक्रम संयोजक से लेकर महाविद्यालयों-विश्वविद्यालयों में किताबें तय करने वाले अध्यापकों और पुस्तकालय अध्यक्षों तक को उन्हें चढ़ावा चढ़ाना पड़ता है। अगर आम फहम किताब हुई तो उसे सरकारी दफ्तरों के जिम्मेदार लोगों को चढ़ावा देकर ही लाइब्रेरी का मुंह दिखाया जा सकता है। लिहाजा किताबों का दाम महंगा रखना पड़ता है।
प्रकाशक महोदय की इन बातों से पता चलता है कि असल में हिंदी प्रकाशन की दुनिया आम पाठकों की मर्जी की बजाय हिंदी के मठाधीशों के अधीन है। ज्यादातर प्रकाशक अपनी किताबें इसी वजह से सिर्फ पुस्तकालयों की शोभा बढ़ाने के लिए ही आज प्रकाशित कर रहे हैं। हालांकि कुछ प्रकाशक ऐसे भी हैं, जिनका उद्देश्य लाइब्रेरी की बजाय आम पाठकों तक किताब पहुंचाना है। लेकिन उनकी चिंता सिर्फ किताब की पाठ्य सामग्री की गुणवत्ता पर ही ज्यादा रहती है। जबकि आज जमाना बदल गया है। आज किताब का प्रोडक्शन भी उसकी बिक्री पर खासा असर रखता है। लेकिन हकीकत यह है कि हिंदी के ज्यादातर प्रकाशक अब भी पारंपरिक ढंग से ही किताबें छाप रहे हैं। उनके यहां स्थायी संपादक, डिजायनर तो हैं ही नहीं, स्थायी प्रूफ रीडर तक नहीं हैं। जाहिर है कि प्रोफेशनल संपादक, डिजायनर और प्रूफ रीडर रखने का खर्च प्रकाशक को भारी लगता है। यही वजह है कि हिंदी की ज्यादातर किताबों में अब भी संपादन की कमियां, प्रूफ की गलती और बोझिल- बासी डिजाइन दिखती है। इसके बावजूद हिंदी में किताबों का दाम ज्यादा ही है। साफ है कि प्रकाशक अपने मोटे मुनाफे के साथ लाइब्रेरी परंपरा में जारी चढ़ावे की प्रक्रिया में भागीदार बने हुए हैं। इसका सीधा नुकसान हिंदी को हो रहा है, प्रकाशनों के बावजूद किताबें पाठकों तक नहीं पहुंच रही हैं। तार्किक तौर पर बेहद महंगी किताबों को कौन पूछेगा। वैसे हिंदी का आम लेखक अब भी चाहता है कि उसकी प्रकाशित होने वाली किताब सस्ती हो, ताकि पाठकों तक उसकी सीधी पहुंच बन सके। हालांकि इस बहस में पेंगुइन जैसे प्रकाशक दूसरे तरीके से सोच रहे हैं। पेंगुइन यात्रा बुक के संपादक सत्यानंद निरूपम उलटे सवाल उठाते हैं कि हिंदी में किताबें आखिर क्यों न महंगी हों। सत्यानंद जब यह सवाल उठाते हैं तो जाहिर है कि उनके सामने उनके प्रकाशन से निकली किताबों की गुणवत्ता रहती है। दरअसल पेंगुइन यात्रा बुक जैसे प्रकाशक अपनी एक-एक किताब की डिजाइन, उसके संपादन और उसके प्रोडक्शन पर खासा ध्यान रखते हैं। इस प्रक्रिया में श्रम और पैसे दोनों खर्च होते हैं। जाहिर है कि इसीलिए वे उनकी किताबें बाकी लोगों की तुलना कहीं ज्यादा सुघड़ और आकर्षक होती हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि उनकी किताबों का लक्ष्यवर्ग पाठक हैं, लाइब्रेरियां नहीं हैं।
इस ब्लॉग पर कोशिश है कि मीडिया जगत की विचारोत्तेजक और नीतिगत चीजों को प्रेषित और पोस्ट किया जाए। मीडिया के अंतर्विरोधों पर आपके भी विचार आमंत्रित हैं।
रविवार, 27 मार्च 2011
रविवार, 20 मार्च 2011
कहां गई वह साहित्यिक होली
उमेश चतुर्वेदी
दुनिया का काम है बदलना...लेकिन जिंदगी में कई परंपराएं ऐसी होती हैं, जिनका बदलना कम से कम संवेदनशील मन को परेशान कर देता है। शस्य परंपरा से जुड़े हमारे त्यौहारों की पारंपरिक निरंतरता हमारी जिंदगियों में हर बार नया रस भरती रही हैं। जिंदगी की जड़ों से जुड़े रहने का यह जज्बा ही रहा है कि ये त्यौहार अपनी निरंतरता में बने पारंपरिक ही रहे हैं। शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह पारंपरिक निरंतरता भी एक दिन बदल जाएगी। लेकिन उदारीकरण ने वह कर दिखाया, जिससे सदियों की सांस्कृतिक विरासत में भी बदलाव नजर आने लगा। बहरहाल यह मौका इस बदलाव की मीमांसा का नहीं है। जब से हिंदी पत्रकारिता का विकास हुआ है, सांस्कृतिक रस-गंध से जैसे-जैसे वह जुड़ती गई, सदियों पुराने त्यौहारों को भी साहित्यिक तरीके से मनाने की परंपरा विकसित होती गई। यह बदलाव नहीं, बल्कि खुद में उदात्त परंपराओं को आत्मसात होना था। हर बार जैसे ही त्यौहार आते, उनकी तैयारियां आम जिंदगी में तो होती ही थीं, पत्रकारिता और साहित्यकारिता भी इसे अपने अंदाज में मनाने की तैयारियों में जुट जाती थी। लेकिन जैसे-जैसे उदारीकरण का बिरवा पेड़ बनने की दिशा में बढ़ता जा रहा है, वैसे-वैसे कम से कम हिंदी साहित्यकारिता और पत्रकारिता अपनी इस उदात्त परंपरा से दूर होती जा रही है। जाहिर है कि इसका असर होली-दीवाली पर भी दिखने लगा है।
स्मृतियों के गलियारों में अभी-अभी धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, कादंबिनी, नंदन, पराग जैसी पत्रिकाओं के होली-दीवाली विशेषांक याद हैं। अपनी प्रति सुरक्षित कराने के लिए हम बार-बार स्टॉल वाले को याद दिलाते रहते थे। होली पर पारिवारिक पत्रिकाओं में जहां हास्य व्यंग्य से भरपूर गद्य और पद्य रचनाएं प्रकाशित की जाती थीं, वहीं बच्चों की पत्रिकाओं में स्वस्थ हास्य वाली कहानियां छापी जाती थीं। स्कूलों-कॉलेजों में होली की लंबी छुट्टियां भी होती थीं। रंग-पानी के बाद थकान इन पत्रिकाओं के साथ ही मिटाई जाती थी। पुए और गुझिया खाते हुए इन पत्रिकाओं का पारायण होता था। इस पारायण का आनंद ऐसा था कि उससे वंचित होने का खतरा उठाने को शायद ही कोई तैयार होता। पत्रिकाएं अदल-बदल कर पढ़ीं जातीं। इसके अलावा अखबारों के साप्ताहिक परिशिष्ट भी होली – दीवाली पर सुसज्जित अंक निकालते, जिनमें सुपठनयोग्य रचनाएं प्रकाशित की जाती थीं। इन अंकों और उनमें लिखने वाले लेखकों का प्रचार महीनों पहले ही शुरू हो जाता। इसी अंदाज में अखबारों के साप्ताहिक परिशिष्ट भी दो हफ्ते पहले से ही अपने अंकों का प्रचार करने लगते। दूसरे शब्दों में कहें तो साहित्यिकारिता और पत्रकारिता का अपने तरीके से होली-दीवाली मनाने का यह अंदाज था। लेकिन दुर्भाग्यवश अब यह परंपरा खत्म होती जा रही है। कहा तो जा रहा है कि उदारीकरण ने यह सब बदल कर रख दिया है। बाजार की बढ़ती पैठ ने हिंदी साहित्यिकारिता को सिर्फ बाजारोन्मुखी बनाकर रख दिया है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सचमुच बाजार ही इसके लिए उत्तरदायी है। अगर ऐसा है तो बांग्ला और मराठी में भी ऐसा बदलाव दिखता। लेकिन बांग्ला में वहां के सबसे उल्लासमय त्यौहार दुर्गापूजा को मनाने की साहित्यिक और पत्रकारीय तैयारियों में कमी नहीं आई है। बांग्ला पत्रिकाएं और अखबार अपने पूजा विशेषांकों की तैयारी महीनों पहले से शुरू कर देते हैं। बांग्ला प्रकाशनों में अपने लिए लेखकों को आरक्षित करने की होड़ महीनों पहले से ही शुरू हो जाती है। जहां पाठक का इतना खयाल रखा जाता है, वहां पाठक भी अपने प्रकाशनों के लिए इसी तरह तैयार रहते हैं। हमारे कई जानने वाले ऐसे हैं, जो विदेशों में रहते हैं लेकिन देश(बांग्ला पत्रिका) के पूजा विशेषांक के लिए हमें परेशान करते रहते हैं। उनकी मांग पूरी करने के लिए स्टॉलों की खाक छाननी पड़ती है।
होली को अपने अंदाज में कुछ स्वतंत्र तरीके से ही पत्रकारिता और साहित्य जगत के लोग मनाते रहे हैं। बनारस में फटीचर नाम से एक पत्रिका भी प्रकाशित की जाती रही है। निश्चित तौर पर उसमें फूहड़ हास्य सामग्री नहीं प्रकाशित की जाती थी। लेकिन अब स्वस्थ हास्य वाले पत्रों और होलियाना पत्रिकाओं का प्रकाशन या तो खत्म हो गया है या आखिरी सांसें ले रहा है। लेकिन इस बीच अश्लील प्रकाशनों की बाढ़ आ गई है। जिन्हें बाजार की मांग के नाम पर परोसा जा रहा है। सच तो यह है कि मनुष्य के अंदर हमेशा एक राक्षस बैठा रहता है। मर्यादाएं और संस्कार ही उसे मनुष्य बनाए रखते हैं। बाजारवाद ने इसी राक्षस को आगे आने का बहाना दे दिया है। सांस्कृतिक रस-गंध से जुड़े रहे हमारे त्यौहार इन राक्षसी वृत्तियों पर लगाम लगाते रहे हैं। लेकिन बाजारवाद के नाम पर यह कड़ी भी कमजोर हुई है। ऐसे में साहित्यकारिता और पत्रकारिता पर सबसे अहम उत्तरदायित्व आ जाता है। सांस्कृतिक रस-गंध की परंपरा को बनाए रखते हुए ऐसे माहौल की तरफ आगे बढ़ना, ताकि जिंदगी से राक्षसी वृत्तियां दूर हो सकें। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि ऐसे साहस दिखाने वाली आत्माएं हमारे बीच से लगातार कम होती जा रही हैं।
दुनिया का काम है बदलना...लेकिन जिंदगी में कई परंपराएं ऐसी होती हैं, जिनका बदलना कम से कम संवेदनशील मन को परेशान कर देता है। शस्य परंपरा से जुड़े हमारे त्यौहारों की पारंपरिक निरंतरता हमारी जिंदगियों में हर बार नया रस भरती रही हैं। जिंदगी की जड़ों से जुड़े रहने का यह जज्बा ही रहा है कि ये त्यौहार अपनी निरंतरता में बने पारंपरिक ही रहे हैं। शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह पारंपरिक निरंतरता भी एक दिन बदल जाएगी। लेकिन उदारीकरण ने वह कर दिखाया, जिससे सदियों की सांस्कृतिक विरासत में भी बदलाव नजर आने लगा। बहरहाल यह मौका इस बदलाव की मीमांसा का नहीं है। जब से हिंदी पत्रकारिता का विकास हुआ है, सांस्कृतिक रस-गंध से जैसे-जैसे वह जुड़ती गई, सदियों पुराने त्यौहारों को भी साहित्यिक तरीके से मनाने की परंपरा विकसित होती गई। यह बदलाव नहीं, बल्कि खुद में उदात्त परंपराओं को आत्मसात होना था। हर बार जैसे ही त्यौहार आते, उनकी तैयारियां आम जिंदगी में तो होती ही थीं, पत्रकारिता और साहित्यकारिता भी इसे अपने अंदाज में मनाने की तैयारियों में जुट जाती थी। लेकिन जैसे-जैसे उदारीकरण का बिरवा पेड़ बनने की दिशा में बढ़ता जा रहा है, वैसे-वैसे कम से कम हिंदी साहित्यकारिता और पत्रकारिता अपनी इस उदात्त परंपरा से दूर होती जा रही है। जाहिर है कि इसका असर होली-दीवाली पर भी दिखने लगा है।
स्मृतियों के गलियारों में अभी-अभी धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, कादंबिनी, नंदन, पराग जैसी पत्रिकाओं के होली-दीवाली विशेषांक याद हैं। अपनी प्रति सुरक्षित कराने के लिए हम बार-बार स्टॉल वाले को याद दिलाते रहते थे। होली पर पारिवारिक पत्रिकाओं में जहां हास्य व्यंग्य से भरपूर गद्य और पद्य रचनाएं प्रकाशित की जाती थीं, वहीं बच्चों की पत्रिकाओं में स्वस्थ हास्य वाली कहानियां छापी जाती थीं। स्कूलों-कॉलेजों में होली की लंबी छुट्टियां भी होती थीं। रंग-पानी के बाद थकान इन पत्रिकाओं के साथ ही मिटाई जाती थी। पुए और गुझिया खाते हुए इन पत्रिकाओं का पारायण होता था। इस पारायण का आनंद ऐसा था कि उससे वंचित होने का खतरा उठाने को शायद ही कोई तैयार होता। पत्रिकाएं अदल-बदल कर पढ़ीं जातीं। इसके अलावा अखबारों के साप्ताहिक परिशिष्ट भी होली – दीवाली पर सुसज्जित अंक निकालते, जिनमें सुपठनयोग्य रचनाएं प्रकाशित की जाती थीं। इन अंकों और उनमें लिखने वाले लेखकों का प्रचार महीनों पहले ही शुरू हो जाता। इसी अंदाज में अखबारों के साप्ताहिक परिशिष्ट भी दो हफ्ते पहले से ही अपने अंकों का प्रचार करने लगते। दूसरे शब्दों में कहें तो साहित्यिकारिता और पत्रकारिता का अपने तरीके से होली-दीवाली मनाने का यह अंदाज था। लेकिन दुर्भाग्यवश अब यह परंपरा खत्म होती जा रही है। कहा तो जा रहा है कि उदारीकरण ने यह सब बदल कर रख दिया है। बाजार की बढ़ती पैठ ने हिंदी साहित्यिकारिता को सिर्फ बाजारोन्मुखी बनाकर रख दिया है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सचमुच बाजार ही इसके लिए उत्तरदायी है। अगर ऐसा है तो बांग्ला और मराठी में भी ऐसा बदलाव दिखता। लेकिन बांग्ला में वहां के सबसे उल्लासमय त्यौहार दुर्गापूजा को मनाने की साहित्यिक और पत्रकारीय तैयारियों में कमी नहीं आई है। बांग्ला पत्रिकाएं और अखबार अपने पूजा विशेषांकों की तैयारी महीनों पहले से शुरू कर देते हैं। बांग्ला प्रकाशनों में अपने लिए लेखकों को आरक्षित करने की होड़ महीनों पहले से ही शुरू हो जाती है। जहां पाठक का इतना खयाल रखा जाता है, वहां पाठक भी अपने प्रकाशनों के लिए इसी तरह तैयार रहते हैं। हमारे कई जानने वाले ऐसे हैं, जो विदेशों में रहते हैं लेकिन देश(बांग्ला पत्रिका) के पूजा विशेषांक के लिए हमें परेशान करते रहते हैं। उनकी मांग पूरी करने के लिए स्टॉलों की खाक छाननी पड़ती है।
होली को अपने अंदाज में कुछ स्वतंत्र तरीके से ही पत्रकारिता और साहित्य जगत के लोग मनाते रहे हैं। बनारस में फटीचर नाम से एक पत्रिका भी प्रकाशित की जाती रही है। निश्चित तौर पर उसमें फूहड़ हास्य सामग्री नहीं प्रकाशित की जाती थी। लेकिन अब स्वस्थ हास्य वाले पत्रों और होलियाना पत्रिकाओं का प्रकाशन या तो खत्म हो गया है या आखिरी सांसें ले रहा है। लेकिन इस बीच अश्लील प्रकाशनों की बाढ़ आ गई है। जिन्हें बाजार की मांग के नाम पर परोसा जा रहा है। सच तो यह है कि मनुष्य के अंदर हमेशा एक राक्षस बैठा रहता है। मर्यादाएं और संस्कार ही उसे मनुष्य बनाए रखते हैं। बाजारवाद ने इसी राक्षस को आगे आने का बहाना दे दिया है। सांस्कृतिक रस-गंध से जुड़े रहे हमारे त्यौहार इन राक्षसी वृत्तियों पर लगाम लगाते रहे हैं। लेकिन बाजारवाद के नाम पर यह कड़ी भी कमजोर हुई है। ऐसे में साहित्यकारिता और पत्रकारिता पर सबसे अहम उत्तरदायित्व आ जाता है। सांस्कृतिक रस-गंध की परंपरा को बनाए रखते हुए ऐसे माहौल की तरफ आगे बढ़ना, ताकि जिंदगी से राक्षसी वृत्तियां दूर हो सकें। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि ऐसे साहस दिखाने वाली आत्माएं हमारे बीच से लगातार कम होती जा रही हैं।
शनिवार, 12 मार्च 2011
रेटिंग पर टिकी हिंदी विमर्श की दुनिया
उमेश चतुर्वेदी
हिंदी पत्रकारिता एक रोग से काफी पहले से प्रभावित रही है...उसे खालिस हिंदी के विचारक पसंद नहीं रहे हैं। उसे लगता रहा है कि हिंदी में विमर्श हो ही नहीं सकता। उसे अंग्रेजी में सोचने-विचारने वाले विचारक ही पसंद रहे हैं। इसलिए हिंदी अखबारों के विचार पृष्ठों पर अंग्रेजी विमर्श को प्रमुखता से जगह मिलती रही है। कुछ ऐसी ही हालत इन दिनों हिंदी विमर्श की दुनिया की भी है। गोष्ठियों और समारोहों में इन दिनों टेलीविजन पत्रकारिता के नामचीन चेहरे जगह खूब जगह बना रहे हैं। टेलीविजन के पर्दे पर चमकते रहे चेहरों की मांग गोष्ठियों और समारोहों में खूब बन आई है। इनमें भी एंकरिंग कर रहे लोगों की पूछ-परख कहीं ज्यादा है। पत्रकारिता में एक कहावत कही जाती रही है जैक फॉर ऑल...कुछ इसी अंदाज में नई मीडिया से लेकर दुनिया में आ रहे सामाजिक बदलाव को लेकर जब भी चर्चा हो रही है, टेलीविजन के पर्दे पर नुमाया होते रहे चेहरे इन गोष्ठियों की शान बन रहे हैं। अगर चर्चा महिला आरक्षण को लेकर हुई या फिर विमर्श का विषय महिला सशक्तिकरण...हिंदी की दुनिया को दूसरे अनुशासनों के लोगों पर नजर ही नहीं जाती। विमर्श की दुनिया में महिला एंकरों की मांग भी कुछ ज्यादा है। हिंदी अखबारों के संपादकीय पृष्ठों को देखिए तो लगता है कि अंग्रेजी के बिना हिंदी विमर्श अधूरा है। कुछ इसी अंदाज में लगता है कि हिंदी में अगर कहीं कोई विमर्श हो रहा है तो वह सिर्फ टेलीविजन की दुनिया में ही हो रहा है। दिलचस्प बात यह है कि टीआरपी के दौर में सबसे ज्यादा गाली हिंदी की टीवी पत्रकारिता को ही दी जा रही है। पत्रकारिता का नाश करने के लिए हिंदी का विमर्शशील समाज सबसे ज्यादा हिंदी के खबरिया चैनलों को ही जिम्मेदार ठहरा रहा है। लेकिन जब उसे सार्वजनिक समारोहों में कभी वक्ता की जरूरत पड़ती है तो उसका ध्यान सबसे पहले टेलीविजन की दुनिया पर ही जाता है। ऐसे में विमर्श की पहली पसंद बनते हैं एंकर। नई मीडिया से लेकर हिंदी से होते हुए महिला आरक्षण और महिला सशक्तिकरण तक हर जगह विमर्श के लिए ये लोग उपस्थित हो जाते हैं। इनमें कुछ बड़े नाम हैं तो कुछ नए और बेहद अनचीन्हे भी हैं। गोष्ठियों और सेमिनारों के आयोजकों को उनकी पृष्ठभूमि, उनके पुराने काम तक की जानकारी नहीं होती। अभी हाल ही में न्यू मीडिया पर एक राजधानी दिल्ली में एक गोष्ठी हुई..उसमें बुलाए गए ज्यादातर लोग एक दौर तक न्यू मीडिया का विरोध करते थे। ज्यादातर नई मीडिया के बारे में कोई योगदान नहीं था। इसी तरह राजधानी से सटे एक विश्वविद्यालय में महिला सशक्तिकरण पर सेमिनार हुआ तो महिला एंकरों को बुलाया गया। हालांकि उनमें से एक-दो को छोड़कर अधिकांश का कोई काम महिला सशक्तिकरण की दुनिया में कोई योगदान नहीं था। उनकी कोई परख तक नहीं थी। इसी तरह हिंदी की दुनिया को लेकर भी एक गोष्ठी हुई तो वहां भी टेलीविजन पर नुमाया होने वाले चेहरे भी बुला लिए गए। उनमें हिंदी को बिगाड़ने में महती भूमिका निभाने वाले नाम भी शामिल थे।
ऐसा नहीं कि टीवी पर्दे पर नुमाया होने वाले चेहरे दिमागदार नहीं हो सकते...विमर्श की दुनिया में उनका योगदान नहीं हो सकता...लेकिन यह भी जरूरी नहीं कि टीवी पर नुमाया होने वाले सारे चेहरे सचमुच विमर्शशील ही होंगे। सच तो यह है कि टेलीविजन में पर्दे के पीछे की दुनिया सामने नुमाया होने वाली दुनिया से कहीं ज्यादा बड़ी होती है। कई हाथ मिलकर एक चेहरे के जरिए कोई खबर या प्रोग्राम पेश करते हैं। उनमें कहीं ज्यादा दिमागदार और विमर्शशील लोग होते हैं। यह सच है कि इसकी जानकारी आम लोगों को नहीं है। लेकिन अगर कोई विमर्श करने या कराने जा रहा है तो उसे औरों से अलग होना ही चाहिए..कुछ बेहतर भी होना चाहिए। इसलिए उन्हें तो कम से अपने समारोहों में बुलाने वाले लोगों की पृष्ठभूमि या उनके विषय से संबंधित क्षेत्र में काम कर चुके लोगों की जानकारी तो होनी ही चाहिए। अगर ऐसा नहीं है तो काहे के वे आयोजक और काहे का विमर्श।
हिंदी में दरअसल आजकल ज्यादातर विमर्श का नाटक हो रहा है। सबसे बड़ी बिडंबना यह है कि टीआरपी को गाली देने वाला हिंदी के कथित बौद्धिक समाज को सबसे बड़ी चिंता अपने यहां श्रोताओं को जुटाने की रहती है। उन्हें लगता है कि अगर उनके यहां बोलने के लिए किसी लोकप्रिय टीवी चैनल का लोकप्रिय नाम आएगा तो श्रोताओं की भीड़ जुटेगी और उनका कार्यक्रम कामयाब होगा। जहां विमर्श की बुनियाद ही रेटिंग हासिल करने पर आधारित हो, वहां सार्थक विमर्श की उम्मीद भी बेमानी बनी रहेगी। ऐसे में गंभीर और कुछ रचनात्मक बदलाव लाने वाले श्रोताओं का अभाव बना रहेगा। हां, टीआरपी का खेल जारी रहेगा।
हिंदी पत्रकारिता एक रोग से काफी पहले से प्रभावित रही है...उसे खालिस हिंदी के विचारक पसंद नहीं रहे हैं। उसे लगता रहा है कि हिंदी में विमर्श हो ही नहीं सकता। उसे अंग्रेजी में सोचने-विचारने वाले विचारक ही पसंद रहे हैं। इसलिए हिंदी अखबारों के विचार पृष्ठों पर अंग्रेजी विमर्श को प्रमुखता से जगह मिलती रही है। कुछ ऐसी ही हालत इन दिनों हिंदी विमर्श की दुनिया की भी है। गोष्ठियों और समारोहों में इन दिनों टेलीविजन पत्रकारिता के नामचीन चेहरे जगह खूब जगह बना रहे हैं। टेलीविजन के पर्दे पर चमकते रहे चेहरों की मांग गोष्ठियों और समारोहों में खूब बन आई है। इनमें भी एंकरिंग कर रहे लोगों की पूछ-परख कहीं ज्यादा है। पत्रकारिता में एक कहावत कही जाती रही है जैक फॉर ऑल...कुछ इसी अंदाज में नई मीडिया से लेकर दुनिया में आ रहे सामाजिक बदलाव को लेकर जब भी चर्चा हो रही है, टेलीविजन के पर्दे पर नुमाया होते रहे चेहरे इन गोष्ठियों की शान बन रहे हैं। अगर चर्चा महिला आरक्षण को लेकर हुई या फिर विमर्श का विषय महिला सशक्तिकरण...हिंदी की दुनिया को दूसरे अनुशासनों के लोगों पर नजर ही नहीं जाती। विमर्श की दुनिया में महिला एंकरों की मांग भी कुछ ज्यादा है। हिंदी अखबारों के संपादकीय पृष्ठों को देखिए तो लगता है कि अंग्रेजी के बिना हिंदी विमर्श अधूरा है। कुछ इसी अंदाज में लगता है कि हिंदी में अगर कहीं कोई विमर्श हो रहा है तो वह सिर्फ टेलीविजन की दुनिया में ही हो रहा है। दिलचस्प बात यह है कि टीआरपी के दौर में सबसे ज्यादा गाली हिंदी की टीवी पत्रकारिता को ही दी जा रही है। पत्रकारिता का नाश करने के लिए हिंदी का विमर्शशील समाज सबसे ज्यादा हिंदी के खबरिया चैनलों को ही जिम्मेदार ठहरा रहा है। लेकिन जब उसे सार्वजनिक समारोहों में कभी वक्ता की जरूरत पड़ती है तो उसका ध्यान सबसे पहले टेलीविजन की दुनिया पर ही जाता है। ऐसे में विमर्श की पहली पसंद बनते हैं एंकर। नई मीडिया से लेकर हिंदी से होते हुए महिला आरक्षण और महिला सशक्तिकरण तक हर जगह विमर्श के लिए ये लोग उपस्थित हो जाते हैं। इनमें कुछ बड़े नाम हैं तो कुछ नए और बेहद अनचीन्हे भी हैं। गोष्ठियों और सेमिनारों के आयोजकों को उनकी पृष्ठभूमि, उनके पुराने काम तक की जानकारी नहीं होती। अभी हाल ही में न्यू मीडिया पर एक राजधानी दिल्ली में एक गोष्ठी हुई..उसमें बुलाए गए ज्यादातर लोग एक दौर तक न्यू मीडिया का विरोध करते थे। ज्यादातर नई मीडिया के बारे में कोई योगदान नहीं था। इसी तरह राजधानी से सटे एक विश्वविद्यालय में महिला सशक्तिकरण पर सेमिनार हुआ तो महिला एंकरों को बुलाया गया। हालांकि उनमें से एक-दो को छोड़कर अधिकांश का कोई काम महिला सशक्तिकरण की दुनिया में कोई योगदान नहीं था। उनकी कोई परख तक नहीं थी। इसी तरह हिंदी की दुनिया को लेकर भी एक गोष्ठी हुई तो वहां भी टेलीविजन पर नुमाया होने वाले चेहरे भी बुला लिए गए। उनमें हिंदी को बिगाड़ने में महती भूमिका निभाने वाले नाम भी शामिल थे।
ऐसा नहीं कि टीवी पर्दे पर नुमाया होने वाले चेहरे दिमागदार नहीं हो सकते...विमर्श की दुनिया में उनका योगदान नहीं हो सकता...लेकिन यह भी जरूरी नहीं कि टीवी पर नुमाया होने वाले सारे चेहरे सचमुच विमर्शशील ही होंगे। सच तो यह है कि टेलीविजन में पर्दे के पीछे की दुनिया सामने नुमाया होने वाली दुनिया से कहीं ज्यादा बड़ी होती है। कई हाथ मिलकर एक चेहरे के जरिए कोई खबर या प्रोग्राम पेश करते हैं। उनमें कहीं ज्यादा दिमागदार और विमर्शशील लोग होते हैं। यह सच है कि इसकी जानकारी आम लोगों को नहीं है। लेकिन अगर कोई विमर्श करने या कराने जा रहा है तो उसे औरों से अलग होना ही चाहिए..कुछ बेहतर भी होना चाहिए। इसलिए उन्हें तो कम से अपने समारोहों में बुलाने वाले लोगों की पृष्ठभूमि या उनके विषय से संबंधित क्षेत्र में काम कर चुके लोगों की जानकारी तो होनी ही चाहिए। अगर ऐसा नहीं है तो काहे के वे आयोजक और काहे का विमर्श।
हिंदी में दरअसल आजकल ज्यादातर विमर्श का नाटक हो रहा है। सबसे बड़ी बिडंबना यह है कि टीआरपी को गाली देने वाला हिंदी के कथित बौद्धिक समाज को सबसे बड़ी चिंता अपने यहां श्रोताओं को जुटाने की रहती है। उन्हें लगता है कि अगर उनके यहां बोलने के लिए किसी लोकप्रिय टीवी चैनल का लोकप्रिय नाम आएगा तो श्रोताओं की भीड़ जुटेगी और उनका कार्यक्रम कामयाब होगा। जहां विमर्श की बुनियाद ही रेटिंग हासिल करने पर आधारित हो, वहां सार्थक विमर्श की उम्मीद भी बेमानी बनी रहेगी। ऐसे में गंभीर और कुछ रचनात्मक बदलाव लाने वाले श्रोताओं का अभाव बना रहेगा। हां, टीआरपी का खेल जारी रहेगा।
शनिवार, 5 मार्च 2011
हिंदी की कौन कर रहा जुगाली
उमेश चतुर्वेदी
हिंदी का विकास किसने किया है, इसे लेकर विवाद रहा है। विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ा रहे विद्वानों को इस बात का गुमान है कि आज जो हिंदी गढ़ी और बनाई जा रही है, उसके पीछे उनका ही योगदान है। पढ़ाने के अलावा राजनीति की दुनिया में रमते रहे अधिसंख्य हिंदी अध्यापकों का यह गुमान अध्यापक रहे नामवर सिंह ने ही तो़ड़ दिया है। दिलचस्प बात यह है कि नामवर सिंह अपने समूचे सक्रिय और कार्यशील जीवन में प्रमुखत: अध्यापक ही रहे हैं। भोपाल के पत्रकार अजित वरनेकर की किताब ‘शब्दों का सफर’ के लोकार्पण और उस पर हिंदी के महत्वपूर्ण प्रकाशक राजकमल प्रकाशन की ओर से एक लाख का पुरस्कार अजित को देते वक्त नामवर सिंह ने जो कहा, उसे अध्यापकों को नोट कर लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि हिंदी को अध्यापकों ने नहीं, पत्रकारों ने गढ़ा है। इसके लिए हिंदी के सबसे पहले प्रतापी संपादक महावीर प्रसाद द्विवेदी और बाबू बालमुकुंद गुप्त के बीच अनस्थिर शब्द को लेकर मचे बवाल का उल्लेख करते हुए नामवर सिंह ने जब यह स्थापना रखी तो उस समारोह में हिंदी पढ़ाने वाले ढेर सारे अध्यापक मौजूद थे। लेकिन उनके चेहरे पर स्यापा छा गया। अगर यह कथन नामवर सिंह की जगह किसी पत्रकार की जुबान से निकला होता तो विश्वविद्यालय के धुरंधर लोग उस पत्रकार का मजाक ही उड़ाते, चाहे वह पत्रकार कितना ही मूर्धन्य क्यों न रहा हो। लेकिन उनका दुर्भाग्य यह कि उनका पाला किसी पत्रकार से नहीं, हिंदी के ठेठ अध्यापक से पड़ा था। नामवर सिंह कितने सही है, इसका अंदाज इन पंक्तियों के लेखक को गाहे-बगाहे होता रहा है। हाल ही में दिल्ली के एक महाविद्यालय में न्यू मीडिया को लेकर एक गोष्ठी हुई। उदारीकरण के दौर में स्ववित्तपोषित पाठ्यक्रम शुरू करने की इजाजत विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को दे रखी है। इसका फायदा उठाते हुए तमाम कॉलेजों ने अपने यहां पत्रकारिता का पाठ्यक्रम शुरू कर रखा है। हिंदी या अंग्रेजी विभागों के अधीन यह कोर्स चल रहा है। ये अध्यापक अब अपने को पत्रकारिता का अध्येता भी समझ बैठे हैं। उन्हें लगता है कि बाल मुकुंद गुप्त से लेकर अज्ञेय तक ही हिंदी में पत्रकारिता हुई है। प्रभाष जोशी तक तो उन्हें पता है। लेकिन उसके बाद राहुल देव, प्रणय राय, अच्युतानंद मिश्र. जैसे नाम तो इन विभाग प्रमुखों तक को पता नहीं है। हिंदी में सक्रिय नव पत्रकारों की बात तो इनके लिए बेमानी है। उनके लिए भाषा अब भी महादेवी वर्मा और अज्ञेय तक ही लटकी हुई है। उसके आगे भी हिंदी ने कुछ विकास किया है, उन्हें इसे जानने की जरूरत ही नहीं है। हिंदी की समकालीन पत्रकारिता की बात कौन कहे, समकालीन लेखन तक की तमीज नहीं है। ऐसे में उनसे भाषा के विकास की उम्मीद करना ही बेमानी है। न्यू मीडिया की गोष्ठी में भी अध्यापक गणों की चर्चा में महावीर प्रसाद द्विवेदी और बाल मुकुंद गुप्त या अध्यापक पूर्ण सिंह ही मौजूद थे। न्यू मीडिया यानी इंटरनेट क्या है , उसकी दुनिया कैसे बदल रही है, तकनीक भाषा के साथ कैसा खिलवाड़ कर रही है और उसके दबाव में भाषा कैसे बदल रही है, इसकी जानकारी शायद ही किसी अध्यापक को थी। जाहिर है कि वे अध्यापक सिर्फ जुगाली कर रहे थे और अपने परिचितों को बुलाकर इस जुगाली का आर्थिक और कथित ज्ञानाश्रयी फायदा उठा-लुटा रहे थे। ऐसे में पाठकगण अंदाज लगा सकते हैं कि विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ा रहे अध्यापक गण हिंदी का कितना विकास कर रहे हैं।
अब आते हैं नामवर सिंह की बात पर...हिंदी गद्य को गद्यपर्व निश्चित तौर पर महावीर प्रसाद द्विवेदी जैसे धुरंधर पत्रकारों ने ही बनाया। लेकिन हम मुंशी सदासुख लाल और लल्लू लाल जैसे अध्यापकों को कैसे भूल सकते हैं। अंग्रेज अधिकारियों को भारतीय भाषाओं की ट्रेनिंग देने के लिए स्थापित कोलकाता के फोर्ट बिलियम कॉलेज में हिंदी पढ़ाने वाले इन अध्यापकों ने हिंदी के विकास के लिए ही सुख सागर और प्रेम सागर जैसे ग्रंथ लिखे। जिनका प्रचार इतना हुआ कि उन्हें घर-घर में धार्मिक ग्रंथों की तरह रखा जाने लगा। यानी जरूरत पड़ी तो अध्यापकों ने भी हिंदी के विकास यज्ञ में हिस्सा बंटाया है। यह बात और है कि आज के ज्यादातर हिंदी अध्यापकों को सिर्फ विश्वविद्यालयी राजनीति से मतलब है। हिंदी पढ़ाने की बजाय उन्हें उसकी जुगाली ही पसंद है। लेकिन इसका यह भी मतलब नहीं है कि आज के हिंदी पत्रकार सिर्फ हिंदी को गढ़ ही रहे हैं। हिंदी के साथ जितना अनाचार नव हिंदी पत्रकार कर रहे हैं, वह भी क्षमा के काबिल नहीं है।
हिंदी का विकास किसने किया है, इसे लेकर विवाद रहा है। विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ा रहे विद्वानों को इस बात का गुमान है कि आज जो हिंदी गढ़ी और बनाई जा रही है, उसके पीछे उनका ही योगदान है। पढ़ाने के अलावा राजनीति की दुनिया में रमते रहे अधिसंख्य हिंदी अध्यापकों का यह गुमान अध्यापक रहे नामवर सिंह ने ही तो़ड़ दिया है। दिलचस्प बात यह है कि नामवर सिंह अपने समूचे सक्रिय और कार्यशील जीवन में प्रमुखत: अध्यापक ही रहे हैं। भोपाल के पत्रकार अजित वरनेकर की किताब ‘शब्दों का सफर’ के लोकार्पण और उस पर हिंदी के महत्वपूर्ण प्रकाशक राजकमल प्रकाशन की ओर से एक लाख का पुरस्कार अजित को देते वक्त नामवर सिंह ने जो कहा, उसे अध्यापकों को नोट कर लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि हिंदी को अध्यापकों ने नहीं, पत्रकारों ने गढ़ा है। इसके लिए हिंदी के सबसे पहले प्रतापी संपादक महावीर प्रसाद द्विवेदी और बाबू बालमुकुंद गुप्त के बीच अनस्थिर शब्द को लेकर मचे बवाल का उल्लेख करते हुए नामवर सिंह ने जब यह स्थापना रखी तो उस समारोह में हिंदी पढ़ाने वाले ढेर सारे अध्यापक मौजूद थे। लेकिन उनके चेहरे पर स्यापा छा गया। अगर यह कथन नामवर सिंह की जगह किसी पत्रकार की जुबान से निकला होता तो विश्वविद्यालय के धुरंधर लोग उस पत्रकार का मजाक ही उड़ाते, चाहे वह पत्रकार कितना ही मूर्धन्य क्यों न रहा हो। लेकिन उनका दुर्भाग्य यह कि उनका पाला किसी पत्रकार से नहीं, हिंदी के ठेठ अध्यापक से पड़ा था। नामवर सिंह कितने सही है, इसका अंदाज इन पंक्तियों के लेखक को गाहे-बगाहे होता रहा है। हाल ही में दिल्ली के एक महाविद्यालय में न्यू मीडिया को लेकर एक गोष्ठी हुई। उदारीकरण के दौर में स्ववित्तपोषित पाठ्यक्रम शुरू करने की इजाजत विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को दे रखी है। इसका फायदा उठाते हुए तमाम कॉलेजों ने अपने यहां पत्रकारिता का पाठ्यक्रम शुरू कर रखा है। हिंदी या अंग्रेजी विभागों के अधीन यह कोर्स चल रहा है। ये अध्यापक अब अपने को पत्रकारिता का अध्येता भी समझ बैठे हैं। उन्हें लगता है कि बाल मुकुंद गुप्त से लेकर अज्ञेय तक ही हिंदी में पत्रकारिता हुई है। प्रभाष जोशी तक तो उन्हें पता है। लेकिन उसके बाद राहुल देव, प्रणय राय, अच्युतानंद मिश्र. जैसे नाम तो इन विभाग प्रमुखों तक को पता नहीं है। हिंदी में सक्रिय नव पत्रकारों की बात तो इनके लिए बेमानी है। उनके लिए भाषा अब भी महादेवी वर्मा और अज्ञेय तक ही लटकी हुई है। उसके आगे भी हिंदी ने कुछ विकास किया है, उन्हें इसे जानने की जरूरत ही नहीं है। हिंदी की समकालीन पत्रकारिता की बात कौन कहे, समकालीन लेखन तक की तमीज नहीं है। ऐसे में उनसे भाषा के विकास की उम्मीद करना ही बेमानी है। न्यू मीडिया की गोष्ठी में भी अध्यापक गणों की चर्चा में महावीर प्रसाद द्विवेदी और बाल मुकुंद गुप्त या अध्यापक पूर्ण सिंह ही मौजूद थे। न्यू मीडिया यानी इंटरनेट क्या है , उसकी दुनिया कैसे बदल रही है, तकनीक भाषा के साथ कैसा खिलवाड़ कर रही है और उसके दबाव में भाषा कैसे बदल रही है, इसकी जानकारी शायद ही किसी अध्यापक को थी। जाहिर है कि वे अध्यापक सिर्फ जुगाली कर रहे थे और अपने परिचितों को बुलाकर इस जुगाली का आर्थिक और कथित ज्ञानाश्रयी फायदा उठा-लुटा रहे थे। ऐसे में पाठकगण अंदाज लगा सकते हैं कि विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ा रहे अध्यापक गण हिंदी का कितना विकास कर रहे हैं।
अब आते हैं नामवर सिंह की बात पर...हिंदी गद्य को गद्यपर्व निश्चित तौर पर महावीर प्रसाद द्विवेदी जैसे धुरंधर पत्रकारों ने ही बनाया। लेकिन हम मुंशी सदासुख लाल और लल्लू लाल जैसे अध्यापकों को कैसे भूल सकते हैं। अंग्रेज अधिकारियों को भारतीय भाषाओं की ट्रेनिंग देने के लिए स्थापित कोलकाता के फोर्ट बिलियम कॉलेज में हिंदी पढ़ाने वाले इन अध्यापकों ने हिंदी के विकास के लिए ही सुख सागर और प्रेम सागर जैसे ग्रंथ लिखे। जिनका प्रचार इतना हुआ कि उन्हें घर-घर में धार्मिक ग्रंथों की तरह रखा जाने लगा। यानी जरूरत पड़ी तो अध्यापकों ने भी हिंदी के विकास यज्ञ में हिस्सा बंटाया है। यह बात और है कि आज के ज्यादातर हिंदी अध्यापकों को सिर्फ विश्वविद्यालयी राजनीति से मतलब है। हिंदी पढ़ाने की बजाय उन्हें उसकी जुगाली ही पसंद है। लेकिन इसका यह भी मतलब नहीं है कि आज के हिंदी पत्रकार सिर्फ हिंदी को गढ़ ही रहे हैं। हिंदी के साथ जितना अनाचार नव हिंदी पत्रकार कर रहे हैं, वह भी क्षमा के काबिल नहीं है।
रविवार, 27 फ़रवरी 2011
साहित्यिक चर्चाओं में गालियां
उमेश चतुर्वेदी
भाषा के अब तक दो ही रूप पढ़ाए जाते रहे हैं- लौकिक और साहित्यिक। संस्कृत चूंकि एक दौर में वेदों की पर्याय मानी जाती रही, लिहाजा यह भाषाई वर्गीकरण वहां लौकिक और वैदिक के तौर पर है। साहित्यिक समारोहों ही नहीं, औपचारिक माहौल में हमारे यहां गालियों के इस्तेमाल से परहेज रहा है। लेकिन पिछले दिनों जयपुर में हुए जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में भारतीय मूल के एक लेखक जीत तायल ने अपनी नई अंग्रेजी पुस्तक के कुछ अंश पढ़े तो उनकी किताब में इस्तेमाल हिंदी की ठेठ देसज गालियों के इस्तेमाल ने प्रबुद्ध लेखकों को भले ही नहीं चौंकाया, लेकिन स्थानीय पाठकों को हैरत जरूर हुई। गालियों का सार्वजनिक इस्तेमाल वह भी औपचारिक आयोजनों में होने का जयपुर वासियों के लिए शायद यह पहला अनुभव था। उनकी चिंताओं की वजह यही रही। वैसे अपने यहां मांगलिक कार्यक्रमों में गाली देने का रिवाज रहा है। शादी-विवाह के मौकों पर समधी और रिश्तेदारों की खातिरदारी तब तक पूरी नहीं मानी जाती रही है, जब तक उन्हें गालियों के माहौल में खिलाया-पिलाया न जाए। रामचरित मानस में राम विवाह के वक्त गालियों के इस्तेमाल का चित्रण तुलसीदास ने भी किया है। लेकिन उन गालियों में एक हद तक शिष्टता होती थी। अगर इन गालियों का सामाजिक अध्ययन किया जाय तो पता चलेगा कि गालियों में शिष्टाचार दरअसल जातिगत आधार पर था। नीची जातियों में मंगल मौकों पर गाई जाने वाली गालियां उच्चतर जातियों की गालियों से कहीं ज्यादा फूहड़ होती थीं। तब माना जाता था कि शिक्षा के प्रसार के चलते उच्चतर जातियों में गालियों का शिष्टाचार कुछ दूसरे अंदाज में दिखता है। उत्तर भारत में होली के मौके पर गालियों की बौछार की परंपरा रही है। दुनिया के सबसे पुराने शहर के खिताब से नवाजे जाते रहे वाराणसी में होली का कवि सम्मेलन मशहूर है। इस सम्मेलन में ठेठ गालियों से ही समाज के कुल-शील लोगों का स्वागत होता रहा है। गालियों के स्वागत की साख ऐसी है कि अगर शहर के सम्मानजन्य लोगों का इस सम्मेलन में नाम नहीं लिया जाता तो उसका मतलब यही माना जाता है कि अब उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं रही। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के भोजपुरी इलाके में गोंड़ऊ नाम लोकनृत्य का प्रचलन रहा है। डमरू जैसे बड़े वाद्य हुड़का और मंजीरे की थाप पर इस लोकनृत्य के प्रमुख कलाकार सामाजिक समस्याओं को उभारते रहे हैं। इन लोकनृत्य़ों में भक्ति की धारा भी बहती रही है। लेकिन उनका विदूषक ठेठ और गंदी गालियों से ही लोगों का स्वागत करता रहा है। इन विदूषकों के बारे में भी माना जाता रहा है कि अगर उन्होंने अपनी गालियों में गांव के प्रमुख लोगों का नाम नहीं लिया तो उसका मतलब यह है कि उनकी नजर में उस रसूखदार की कोई खास वकत नहीं है। जाहिर है कि भारतीय समाज में गालियों की परंपरा और गाहे-बगाहे की सामाजिक मान्यता रही है। लेकिन इन गालियों पर आज अगर चर्चा हो रही है तो इसकी बड़ी वजह यह है कि अब इन गालियों ने नागर समाज की सामाजिक परिधि को तोड़ डाला है। वह लौकिक से साहित्यिक गढ़ों में सेंध लगाती जा रही है। इसकी शुरूआत आपको यथार्थवादी रचनाओं में दिखती है। नई कहानियों में जब गांवों और समाज के निचले तबके को रचना का आधार बनाना शुरू किया तो वहां गालियों की बौछार शुरू हो गई। निश्चित तौर पर हंस और कथादेश में छपी कहानियों से इसकी शुरूआत होती है। हिंदी फिल्मों में गालियों की शुरूआत फूलन देवी की जिंदगी पर आधारित फिल्म बैंडिट क्विन में होती है। मां-बहन की गालियां इस फिल्म में धड़ल्ले से इस्तेमाल हुई। विवाद तो तब भी हुआ। कहानियों में गालियों की बौछारों को प्रकाशित करने वाले हंस ने भी इस फिल्म में आई गालियों पर बहस कराई। हाल के दिनों में आई फिल्म इश्किया में भी गालियों की जमकर इस्तेमाल हुआ। हाल के दिनों में आई फिल्म नो वन किल्ड जेसिका और ओंकारा तक में गालियों का जमकर इस्तेमाल हुआ है।
यथार्थवादी साहित्य और सिनेमा ने गालियों के देसज रूपों को भले ही स्वीकार कर लिया है, लेकिन अखबारों और मुख्यधारा की दूसरी पत्रकारिता में अभी इतना साहस नहीं है। हालांकि कौन नहीं जानता कि अखबारों और टेलीविजन के न्यूज रूमों में तनाव के वक्त गालियों का कितनी तेजी से इस्तेमाल होता है। लेकिन यह सिर्फ लौकिक ही रह जाता है, अखबार या पत्रिका के पन्ने और टीवी के पर्दे पर आकर साहित्यिक रूप धारण करने से बच जाता है। और ऐसा होता भी है तो इसलिए, क्योंकि माध्यमों के ये रूप अपने को कम से कम अब भी संस्कारित होने या दिखने का दबाव महसूस करते हैं। यह दबाव ही है कि फिल्मों या साहित्य में ठेठ गालियों की बाढ़ नैतिकता समेत तमाम दूसरे सवालों को उछालने के लिए मजबूर कर रही है। लेकिन यह भी सच है कि लोक संस्कृति का अंग रहने के बावजूद सभ्य समाज गालियों को अपना दैनंदिन साथी नहीं मानता रहा है। वह मांगलिक कार्यों या होली तक ही सीमित रही है। गोंड़ऊ लोकनृत्य में काम करने वाले विदूषक भी सामान्य जिंदगी में गालियों के इस्तेमाल से परहेज करते रहे हैं। कहना न होगा कि यह दबाव समाज पर काम करता रहेगा। इसीलिए साहित्य और फिल्मों में गालियों की बाढ़ पर सवाल उठते रहेंगे।
भाषा के अब तक दो ही रूप पढ़ाए जाते रहे हैं- लौकिक और साहित्यिक। संस्कृत चूंकि एक दौर में वेदों की पर्याय मानी जाती रही, लिहाजा यह भाषाई वर्गीकरण वहां लौकिक और वैदिक के तौर पर है। साहित्यिक समारोहों ही नहीं, औपचारिक माहौल में हमारे यहां गालियों के इस्तेमाल से परहेज रहा है। लेकिन पिछले दिनों जयपुर में हुए जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में भारतीय मूल के एक लेखक जीत तायल ने अपनी नई अंग्रेजी पुस्तक के कुछ अंश पढ़े तो उनकी किताब में इस्तेमाल हिंदी की ठेठ देसज गालियों के इस्तेमाल ने प्रबुद्ध लेखकों को भले ही नहीं चौंकाया, लेकिन स्थानीय पाठकों को हैरत जरूर हुई। गालियों का सार्वजनिक इस्तेमाल वह भी औपचारिक आयोजनों में होने का जयपुर वासियों के लिए शायद यह पहला अनुभव था। उनकी चिंताओं की वजह यही रही। वैसे अपने यहां मांगलिक कार्यक्रमों में गाली देने का रिवाज रहा है। शादी-विवाह के मौकों पर समधी और रिश्तेदारों की खातिरदारी तब तक पूरी नहीं मानी जाती रही है, जब तक उन्हें गालियों के माहौल में खिलाया-पिलाया न जाए। रामचरित मानस में राम विवाह के वक्त गालियों के इस्तेमाल का चित्रण तुलसीदास ने भी किया है। लेकिन उन गालियों में एक हद तक शिष्टता होती थी। अगर इन गालियों का सामाजिक अध्ययन किया जाय तो पता चलेगा कि गालियों में शिष्टाचार दरअसल जातिगत आधार पर था। नीची जातियों में मंगल मौकों पर गाई जाने वाली गालियां उच्चतर जातियों की गालियों से कहीं ज्यादा फूहड़ होती थीं। तब माना जाता था कि शिक्षा के प्रसार के चलते उच्चतर जातियों में गालियों का शिष्टाचार कुछ दूसरे अंदाज में दिखता है। उत्तर भारत में होली के मौके पर गालियों की बौछार की परंपरा रही है। दुनिया के सबसे पुराने शहर के खिताब से नवाजे जाते रहे वाराणसी में होली का कवि सम्मेलन मशहूर है। इस सम्मेलन में ठेठ गालियों से ही समाज के कुल-शील लोगों का स्वागत होता रहा है। गालियों के स्वागत की साख ऐसी है कि अगर शहर के सम्मानजन्य लोगों का इस सम्मेलन में नाम नहीं लिया जाता तो उसका मतलब यही माना जाता है कि अब उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं रही। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के भोजपुरी इलाके में गोंड़ऊ नाम लोकनृत्य का प्रचलन रहा है। डमरू जैसे बड़े वाद्य हुड़का और मंजीरे की थाप पर इस लोकनृत्य के प्रमुख कलाकार सामाजिक समस्याओं को उभारते रहे हैं। इन लोकनृत्य़ों में भक्ति की धारा भी बहती रही है। लेकिन उनका विदूषक ठेठ और गंदी गालियों से ही लोगों का स्वागत करता रहा है। इन विदूषकों के बारे में भी माना जाता रहा है कि अगर उन्होंने अपनी गालियों में गांव के प्रमुख लोगों का नाम नहीं लिया तो उसका मतलब यह है कि उनकी नजर में उस रसूखदार की कोई खास वकत नहीं है। जाहिर है कि भारतीय समाज में गालियों की परंपरा और गाहे-बगाहे की सामाजिक मान्यता रही है। लेकिन इन गालियों पर आज अगर चर्चा हो रही है तो इसकी बड़ी वजह यह है कि अब इन गालियों ने नागर समाज की सामाजिक परिधि को तोड़ डाला है। वह लौकिक से साहित्यिक गढ़ों में सेंध लगाती जा रही है। इसकी शुरूआत आपको यथार्थवादी रचनाओं में दिखती है। नई कहानियों में जब गांवों और समाज के निचले तबके को रचना का आधार बनाना शुरू किया तो वहां गालियों की बौछार शुरू हो गई। निश्चित तौर पर हंस और कथादेश में छपी कहानियों से इसकी शुरूआत होती है। हिंदी फिल्मों में गालियों की शुरूआत फूलन देवी की जिंदगी पर आधारित फिल्म बैंडिट क्विन में होती है। मां-बहन की गालियां इस फिल्म में धड़ल्ले से इस्तेमाल हुई। विवाद तो तब भी हुआ। कहानियों में गालियों की बौछारों को प्रकाशित करने वाले हंस ने भी इस फिल्म में आई गालियों पर बहस कराई। हाल के दिनों में आई फिल्म इश्किया में भी गालियों की जमकर इस्तेमाल हुआ। हाल के दिनों में आई फिल्म नो वन किल्ड जेसिका और ओंकारा तक में गालियों का जमकर इस्तेमाल हुआ है।
यथार्थवादी साहित्य और सिनेमा ने गालियों के देसज रूपों को भले ही स्वीकार कर लिया है, लेकिन अखबारों और मुख्यधारा की दूसरी पत्रकारिता में अभी इतना साहस नहीं है। हालांकि कौन नहीं जानता कि अखबारों और टेलीविजन के न्यूज रूमों में तनाव के वक्त गालियों का कितनी तेजी से इस्तेमाल होता है। लेकिन यह सिर्फ लौकिक ही रह जाता है, अखबार या पत्रिका के पन्ने और टीवी के पर्दे पर आकर साहित्यिक रूप धारण करने से बच जाता है। और ऐसा होता भी है तो इसलिए, क्योंकि माध्यमों के ये रूप अपने को कम से कम अब भी संस्कारित होने या दिखने का दबाव महसूस करते हैं। यह दबाव ही है कि फिल्मों या साहित्य में ठेठ गालियों की बाढ़ नैतिकता समेत तमाम दूसरे सवालों को उछालने के लिए मजबूर कर रही है। लेकिन यह भी सच है कि लोक संस्कृति का अंग रहने के बावजूद सभ्य समाज गालियों को अपना दैनंदिन साथी नहीं मानता रहा है। वह मांगलिक कार्यों या होली तक ही सीमित रही है। गोंड़ऊ लोकनृत्य में काम करने वाले विदूषक भी सामान्य जिंदगी में गालियों के इस्तेमाल से परहेज करते रहे हैं। कहना न होगा कि यह दबाव समाज पर काम करता रहेगा। इसीलिए साहित्य और फिल्मों में गालियों की बाढ़ पर सवाल उठते रहेंगे।
शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011
वेब पत्रकारिता : चुनौतियां और संभावनाएं
उमेश चतुर्वेदी
मीडिया का जब भी कोई नया माध्यम आता है, उससे पहले के माध्यमों के लिए शोक गीत गाने की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। वेब माध्यम के आने के बाद भी कुछ ऐसा रूदन शुरू हो गया था। इस रोने-गाने में मीडिया समीक्षक भूल जाते हैं कि वेब माध्यम अपने चरित्र और अपनी तकनीक के चलते दूसरे सभी माध्यमों से अलग है। बीसवीं सदी के शुरू में जब रेडियो माध्यम आया था तो निश्चित तौर पर वह प्रिंट माध्यम से चरित्र और तकनीकी दोनों स्तर पर अलग था। इसी तरह 1930 के दशक में आया टेलीविजन भी रेडियो के ऑडियो गुणों से थोड़ा युक्त होने के बावजूद अपने पहले के दोनों माध्यमों से अलग था। लेकिन 1969 में आए इंटरनेट माध्यम अपने पहले के तीनों माध्यमों से अलग होते हुए भी इन तीनों को अपने में समाहित किए हुए है। यही वजह है कि इस माध्यम के लिए पत्रकारिता का काम सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि इस माध्यम की चुनौती को जिस पेशेवराना अंदाजा से जूझने की तैयारी होनी चाहिए, कम से कम भारतीय भाषाओं में यह नदारद ही दिखती है। वेब जर्नलिज्म की अलख अगर भारतीय भाषाओं में दिख रही है तो उसका सबसे बड़ा जरिया बने हैं इस माध्यम की ताकत और महत्व को समझने वाले कुछ शौकिया लोग। लेकिन यह भी सच है कि शौकिया और सनकी किस्म के लोग किसी नए विचार और माध्यम को शुरूआती ताकत और दिशा ही दे सकते हैं, उसके लिए जरूरी आधार मुहैया करा सकते हैं, लेकिन उस विचार या माध्यम को आखिरकार आगे ले जाने की जिम्मेदारी पेशवर लोगों और उनके पेशेवराना अंदाज पर ज्यादा होती है।
वेब पत्रकारिता की चुनौतियों को समझने के लिए सबसे पहले हमें आज के दौर में मौजूद माध्यमों, उनके चरित्र और उनकी खासियतों-कमियों पर ध्यान देना होगा। इंटरनेट के आने से पहले तक सभी माध्यमों की अपनी स्वतंत्र पहचान और स्पेस था। लेकिन इंटरनेट ने इसे पूरी तरह बदल डाला है। इंटरनेट पर स्वतंत्र समाचार साइटें भी हैं तो अखबारों के अपने ई संस्करण भी मौजूद हैं। स्वतंत्र पत्रिकाएं भी हैं तो उनके ई संस्करण भी आज कंप्यूटर से महज एक क्लिक की दूरी पर मौजूद हैं। इसी तरह टेलीविजन और रेडियो के चैनल भी कंप्यूटर पर मौजूद हैं। कंप्यूटर का यह फैलाव सिर्फ डेस्क टॉप या फिर लैपटॉप तक ही नहीं है। बल्कि यह आम-ओ-खास सबके हाथों में मौजूद पंडोरा बॉक्स तक में पहुंच गया है। 2003 में बीएसएनएल की मोबाइल फोन सेवा की लखनऊ में शुरूआत करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने मोबाइल फोन को पंडोरा बॉक्स ही कहा था। भारत में मोबाइल तकनीक और फोन सेवा की संभावनाओं का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश के बड़े टेलिकॉम ऑपरेटरों ने 3G सेवाओं के लाइसेंस के लिए हाल ही में करीब 16 अरब डॉलर यानी 75,600 करोड़ रुपए की बोली लगाई। संचार मंत्रालय के एक आंकड़े के मुताबिक देश में जून 2010 तक मोबाइल फोन उपभोक्ताओं की संख्या 67 करोड़ तक पहुंच गई थी। यहां इस तथ्य पर गौर फरमाने की जरूरत यह है कि इन में से ज्यादातर फोन पर इंटरनेट सर्विस भी मौजूद है। लेकिन मोबाइल के जरिए इंटरनेट का जोरशोर से इस्तेमाल अभी नहीं हो रहा है। एक अमरीकी संस्था 'बोस्टन कंस्लटिंग ग्रुप' ने 'इंटरनेट्स न्यू बिलियन' नाम से जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक इस समय भारत में 8.1 करोड़ इंटरनेट उपभोक्ता हैं। इस संस्था के मुताबिक 2015 में भारत में इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या बढ़कर 23.7 करोड़ हो जाएगी। इसी रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत का मौजूदा इंटरनेट उपभोक्ता रोजाना आधे घंटे तक इंटरनेट का इस्तेमाल करता है। जिसके बढ़ने की संभावना अपार है। इस रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ 2015 तक ही भारत का आम इंटरनेट उपभोक्ता रोजाना आधे घंटे की बजाय 42 मिनट इंटरनेट का इस्तेमाल करने लगेगा। इसकी वजह भी है। दरअसल आज भी दिल्ली-मुंबई या लखनऊ-जयपुर जैसे शहरों को छोड़ दें तो तकरीबन पूरा देश बिजली की किल्लत से जूझ रहा है। इंटरनेट के पारंपरिक माध्यमों को चलाने के लिए बिजली जरूरी है। ऐसे में कंप्यूटर निर्माता कंपनियां ऐसे कंप्यूटरों के निर्माण में जुटी हैं, जिन्हें बैटरियों या ऐसे ही दूसरे वैकल्पिक साधनों से चलाया जा सके। इस दिशा में तकनीकी विकास जैसे हो रहा है, जाहिर है कि ऐसा होना देर-सवेर संभव होगा ही। कल्पना कीजिए कि अगर ऐसा हो गया तो देश में कंप्यूटर क्रांति आ जाएगी और फिर इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या बढ़ना लाजिमी हो जाएगा। विविधतावादी भारत देश में तब इंटरनेट पाठकों, स्रोताओं और दर्शकों का विविधता युक्त एक बड़ा समूह होगा, जिनकी जरूरतें और दिलचस्पी के क्षेत्र विविध होंगे। जिनकी ओर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। हालांकि इसकी एक झलक आज भी प्रिंट माध्यमों में दिख रहा है। जहां पाठकों की विविधरंगी रूचियां और जरूरतें साफ नजर आती हैं। अखबार और पत्रिकाएं अपने पाठकों को लुभाने के लिए उनकी दिलचस्पी और जरूरत की पाठ्य सामग्री मुहैया करा रही हैं।
इंटरनेट की एक और खासियत है, समय की मजबूरियों से मुक्ति। अखबार या पत्रिकाएं एक निश्चित अंतराल के बाद ही प्रकाशित होते हैं। टेलीविजन ने इस अंतराल को निश्चित तौर पर कम किया है। रेडियो ने भी वाचिक माध्यम के तौर पर इस अंतराल को घटाया ही है। लेकिन वहां अब भी तकनीकी तामझाम ज्यादा है। विजुअल को शूट करना, उसे एडिट करना और उसे सॉफ्टवेयर में लोड करना अब भी ज्यादा वक्त लेता है। लेकिन इंटरनेट ने वक्त की यह पाबंदी भी कम कर दी है। खबर आई या उसका वीडियो या ऑडियो शूट किया गया और उसे इंटरनेट पर लोड कर दिया गया। हालांकि अभी तक उपलब्ध 2 जी तकनीक के चलते इस पूरी प्रक्रिया में थोड़ी दिक्कतें जरूर होती हैं। लेकिन 3 जी के आने के बाद ये दिक्कतें पूरी तरह से कम हो जाएंगी। तब निश्चित तौर पर इस माध्यम के लिए कंटेंट जुटाने और तैयार करने वाले लोगों की परेशानियां थोड़ी कम हो जाएंगी।
भारतीय भाषाओं की वेब पत्रकारिता को परेशानी कमाई के स्रोत कम होना है। जिस तरह प्रिंट माध्यमों में विज्ञापन दिख रहे हैं, टेलीविजन में भी विज्ञापनों की कमाई बढ़ रही है, वैसा अभी फिलहाल इंटरनेट की दुनिया में नहीं दिख रहा है। हालांकि प्राइस वाटर हाउस कूपर की पिछले साल जारी रिपोर्ट ने इंटरनेट विज्ञापनों की दुनिया में 12.4 फीसद बढ़त का आकलन किया था।
मीडिया का जब भी कोई नया माध्यम आता है, उससे पहले के माध्यमों के लिए शोक गीत गाने की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। वेब माध्यम के आने के बाद भी कुछ ऐसा रूदन शुरू हो गया था। इस रोने-गाने में मीडिया समीक्षक भूल जाते हैं कि वेब माध्यम अपने चरित्र और अपनी तकनीक के चलते दूसरे सभी माध्यमों से अलग है। बीसवीं सदी के शुरू में जब रेडियो माध्यम आया था तो निश्चित तौर पर वह प्रिंट माध्यम से चरित्र और तकनीकी दोनों स्तर पर अलग था। इसी तरह 1930 के दशक में आया टेलीविजन भी रेडियो के ऑडियो गुणों से थोड़ा युक्त होने के बावजूद अपने पहले के दोनों माध्यमों से अलग था। लेकिन 1969 में आए इंटरनेट माध्यम अपने पहले के तीनों माध्यमों से अलग होते हुए भी इन तीनों को अपने में समाहित किए हुए है। यही वजह है कि इस माध्यम के लिए पत्रकारिता का काम सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि इस माध्यम की चुनौती को जिस पेशेवराना अंदाजा से जूझने की तैयारी होनी चाहिए, कम से कम भारतीय भाषाओं में यह नदारद ही दिखती है। वेब जर्नलिज्म की अलख अगर भारतीय भाषाओं में दिख रही है तो उसका सबसे बड़ा जरिया बने हैं इस माध्यम की ताकत और महत्व को समझने वाले कुछ शौकिया लोग। लेकिन यह भी सच है कि शौकिया और सनकी किस्म के लोग किसी नए विचार और माध्यम को शुरूआती ताकत और दिशा ही दे सकते हैं, उसके लिए जरूरी आधार मुहैया करा सकते हैं, लेकिन उस विचार या माध्यम को आखिरकार आगे ले जाने की जिम्मेदारी पेशवर लोगों और उनके पेशेवराना अंदाज पर ज्यादा होती है।
वेब पत्रकारिता की चुनौतियों को समझने के लिए सबसे पहले हमें आज के दौर में मौजूद माध्यमों, उनके चरित्र और उनकी खासियतों-कमियों पर ध्यान देना होगा। इंटरनेट के आने से पहले तक सभी माध्यमों की अपनी स्वतंत्र पहचान और स्पेस था। लेकिन इंटरनेट ने इसे पूरी तरह बदल डाला है। इंटरनेट पर स्वतंत्र समाचार साइटें भी हैं तो अखबारों के अपने ई संस्करण भी मौजूद हैं। स्वतंत्र पत्रिकाएं भी हैं तो उनके ई संस्करण भी आज कंप्यूटर से महज एक क्लिक की दूरी पर मौजूद हैं। इसी तरह टेलीविजन और रेडियो के चैनल भी कंप्यूटर पर मौजूद हैं। कंप्यूटर का यह फैलाव सिर्फ डेस्क टॉप या फिर लैपटॉप तक ही नहीं है। बल्कि यह आम-ओ-खास सबके हाथों में मौजूद पंडोरा बॉक्स तक में पहुंच गया है। 2003 में बीएसएनएल की मोबाइल फोन सेवा की लखनऊ में शुरूआत करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने मोबाइल फोन को पंडोरा बॉक्स ही कहा था। भारत में मोबाइल तकनीक और फोन सेवा की संभावनाओं का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश के बड़े टेलिकॉम ऑपरेटरों ने 3G सेवाओं के लाइसेंस के लिए हाल ही में करीब 16 अरब डॉलर यानी 75,600 करोड़ रुपए की बोली लगाई। संचार मंत्रालय के एक आंकड़े के मुताबिक देश में जून 2010 तक मोबाइल फोन उपभोक्ताओं की संख्या 67 करोड़ तक पहुंच गई थी। यहां इस तथ्य पर गौर फरमाने की जरूरत यह है कि इन में से ज्यादातर फोन पर इंटरनेट सर्विस भी मौजूद है। लेकिन मोबाइल के जरिए इंटरनेट का जोरशोर से इस्तेमाल अभी नहीं हो रहा है। एक अमरीकी संस्था 'बोस्टन कंस्लटिंग ग्रुप' ने 'इंटरनेट्स न्यू बिलियन' नाम से जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक इस समय भारत में 8.1 करोड़ इंटरनेट उपभोक्ता हैं। इस संस्था के मुताबिक 2015 में भारत में इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या बढ़कर 23.7 करोड़ हो जाएगी। इसी रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत का मौजूदा इंटरनेट उपभोक्ता रोजाना आधे घंटे तक इंटरनेट का इस्तेमाल करता है। जिसके बढ़ने की संभावना अपार है। इस रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ 2015 तक ही भारत का आम इंटरनेट उपभोक्ता रोजाना आधे घंटे की बजाय 42 मिनट इंटरनेट का इस्तेमाल करने लगेगा। इसकी वजह भी है। दरअसल आज भी दिल्ली-मुंबई या लखनऊ-जयपुर जैसे शहरों को छोड़ दें तो तकरीबन पूरा देश बिजली की किल्लत से जूझ रहा है। इंटरनेट के पारंपरिक माध्यमों को चलाने के लिए बिजली जरूरी है। ऐसे में कंप्यूटर निर्माता कंपनियां ऐसे कंप्यूटरों के निर्माण में जुटी हैं, जिन्हें बैटरियों या ऐसे ही दूसरे वैकल्पिक साधनों से चलाया जा सके। इस दिशा में तकनीकी विकास जैसे हो रहा है, जाहिर है कि ऐसा होना देर-सवेर संभव होगा ही। कल्पना कीजिए कि अगर ऐसा हो गया तो देश में कंप्यूटर क्रांति आ जाएगी और फिर इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या बढ़ना लाजिमी हो जाएगा। विविधतावादी भारत देश में तब इंटरनेट पाठकों, स्रोताओं और दर्शकों का विविधता युक्त एक बड़ा समूह होगा, जिनकी जरूरतें और दिलचस्पी के क्षेत्र विविध होंगे। जिनकी ओर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। हालांकि इसकी एक झलक आज भी प्रिंट माध्यमों में दिख रहा है। जहां पाठकों की विविधरंगी रूचियां और जरूरतें साफ नजर आती हैं। अखबार और पत्रिकाएं अपने पाठकों को लुभाने के लिए उनकी दिलचस्पी और जरूरत की पाठ्य सामग्री मुहैया करा रही हैं।
इंटरनेट की एक और खासियत है, समय की मजबूरियों से मुक्ति। अखबार या पत्रिकाएं एक निश्चित अंतराल के बाद ही प्रकाशित होते हैं। टेलीविजन ने इस अंतराल को निश्चित तौर पर कम किया है। रेडियो ने भी वाचिक माध्यम के तौर पर इस अंतराल को घटाया ही है। लेकिन वहां अब भी तकनीकी तामझाम ज्यादा है। विजुअल को शूट करना, उसे एडिट करना और उसे सॉफ्टवेयर में लोड करना अब भी ज्यादा वक्त लेता है। लेकिन इंटरनेट ने वक्त की यह पाबंदी भी कम कर दी है। खबर आई या उसका वीडियो या ऑडियो शूट किया गया और उसे इंटरनेट पर लोड कर दिया गया। हालांकि अभी तक उपलब्ध 2 जी तकनीक के चलते इस पूरी प्रक्रिया में थोड़ी दिक्कतें जरूर होती हैं। लेकिन 3 जी के आने के बाद ये दिक्कतें पूरी तरह से कम हो जाएंगी। तब निश्चित तौर पर इस माध्यम के लिए कंटेंट जुटाने और तैयार करने वाले लोगों की परेशानियां थोड़ी कम हो जाएंगी।
भारतीय भाषाओं की वेब पत्रकारिता को परेशानी कमाई के स्रोत कम होना है। जिस तरह प्रिंट माध्यमों में विज्ञापन दिख रहे हैं, टेलीविजन में भी विज्ञापनों की कमाई बढ़ रही है, वैसा अभी फिलहाल इंटरनेट की दुनिया में नहीं दिख रहा है। हालांकि प्राइस वाटर हाउस कूपर की पिछले साल जारी रिपोर्ट ने इंटरनेट विज्ञापनों की दुनिया में 12.4 फीसद बढ़त का आकलन किया था।
शनिवार, 19 फ़रवरी 2011
एक साहित्यकार की अनोखी वर्षगांठ
उमेश चतुर्वेदी
हिंदी साहित्य की एक बड़ी चिंता पाठकों से सहज संवाद की रही है। दिल्ली से लेकर भोपाल तक हिंदी के ढेर सारे कार्यक्रम होते रहते हैं, लेकिन अक्सर इन कार्यक्रमों में पाठकों की उपस्थिति बेहद कम रहती है। हाल ही में प्रवासी लेखक सम्मेलन में लंदन से भारत आए प्रवासी लेखक तेजेंद्र शर्मा ने भी एक मुलाकात में स्वीकार किया कि हिंदी में ज्यादातर लेखन लगता है लेखकों और उसी साहित्यिक जमात के लिए होता है, जिसे खुद भी कुछ रचने-बांचने की आदत है। दूसरी भाषाओं से की तरह हिंदी में सिर्फ और सिर्फ आम पाठकों की उपस्थिति कम से कम साहित्यिक आयोजनों से दूर ही रहती है। इस दूरी के ही चलते कम से कम आम लोगों में हिंदी लेखकों की सहज पूछ और पहचान कम ही होती है। दूसरी प्रदर्शनकारी विधाओं के रचनाकारों की बनिस्बत हिंदी लेखकों को आम पहचान का यह संकट परेशान करता रहता है। ऐसे माहौल में अगर किसी लेखक का कोई जन्मदिन आम पाठक मनाने लगें तो सुखद हैरत तो होगी ही। लेकिन ऐसा हुआ और उसी दिल्ली की सरजमीं पर हुआ, जहां आम साहित्यिक कार्यक्रमों में पाठकों का रोना रोया जाता है।
हिंदी के वरिष्ठ लेखक और आलोचक हैं विश्वनाथ त्रिपाठी। सहज व्यक्तित्व के धनी विश्वनाथ त्रिपाठी दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ाते रहे हैं। सुदूर पूर्वी उत्तर प्रदेश के निवासी विश्वनाथ जी रिटायर होने के बाद भी दिल्ली में ही रह रहे हैं। पूर्वी दिल्ली के जिस दिलशाद गार्डेन इलाके में वे रहते हैं, उसके बगल में डीयर पार्क है। उस पार्क में वे सुबह-शाम की सैर के लिए लगातार जाते रहे हैं। करीब बीस साल से जारी इस सैर यात्र में उनके कई संगी-साथी बन गए हैं। उन्हें पता है कि विश्वनाथ जी हिंदी के जाने-माने लेखक और अध्यापक हैं। लेकिन उनका निश्छल व्यक्तित्व पार्क के सैर साथियों से सहज संबंध में रोड़ा नहीं बन पाया। बहरहाल वैलेंटाइन डे के दो दिन बाद यानी 16 फरवरी को त्रिपाठी जी ने जिंदगी के 80 बसंत पूरे कर लिए। त्रिपाठी जी के जन्मदिन की जानकारी उनके सैर-साथियों को थी और उन्होंने पार्क में ही सैर के दौरान उनका जन्मदिन मनाने की तैयारियां कर लीं। 16 फरवरी की सुबह जब त्रिपाठी जी पार्क पहुंचे तो उन्हें गेंदे के फूलों की माला से लाद दिया गया। निश्चित तौर पर इसमें वहां रह रहे कुछ लेखक – पत्रकारों का भी सहयोग रहा है। सुखद हैरत की बात यह है कि इस मौके पर डीयर पार्क के मित्रों के सहयोग से एक किताब का प्रकाशन भी किया गया है। बतकही शीर्षक इस पुस्तक को लेखक भारतेंदु मिश्र ने संपादित किया है। यह पुस्तक साहित्यिक अड्डेबाजी या साहित्यकारो की गप्प गोष्ठी का एक सहज दस्तावेज है। बाद मे त्रिपाठी जी ने इस पुस्तक का लोकार्पण करते हुए कहा - “मैं यहाँ बीस वर्षों से आ रहा हूँ, यहाँ के हमारे सभी मित्रो ने ये जो मेरे लिए आयोजन किया है इससे बडा आयोजन मेरे लिए और हो नही सकता।हम लोग बरसों से एक साथ यहाँ बैठते है क्योकि यहाँ हम आपस मे अपनी रचनाओ की चर्चा नही करते। साहित्य से इतर केवल गप्प होती है तो इसी लिए यह चल रहा है। दूसरी तरह के महत्वाकान्क्षी बहुत से लोग जो हमारे बीच आये भी वो खुद कुछ न मिलने पर चले गये।..तो हम लोग आपस मे इसी लिए लम्बे समय से जुडे है कि हम किसी को कुछ देने की स्थिति मे नहीं हैं। इसी लिए यह हमारी गप्प गोष्ठी चल रही है। कुछ आते रहे कुछ जाते रहे। हम सबमे कमियाँ हैं-कमियाँ हैं तभी चल रहा है। ”
हिंदी में ऐसे आयोजनों की परंपरा न के बराबर है। लेकिन त्रिपाठी जी का जन्मदिन दरअसल हिंदी समाज के बदलते मानस का एक परिचय दे गया। इससे साफ है कि अगर पाठकों और आम लोगों से जुड़ने का माद्दा और हिम्मत है तो हिंदी के लेखकों से भी आम पाठक जुड़ना और उसके बारे में जानना चाहता है।
दिल्ली में हर साल मराठी समाज गणेशोत्सव का आयोजन करता है। बंगाली समाज दुर्गापूजा का आयोजन करता है। इन आयोजनों में ये समाज अपने लेखकों और संस्कृति कर्मियों से सीधे मुखातिब होते हैं। असम में तो उस बच्चे का सही संस्कार ही नहीं माना जाता, जो असम साहित्य सम्मेलन में शामिल नहीं हो पाता। लेकिन हिंदी में दुर्भाग्यवश ऐसी परंपरा अभी तक विकसित नहीं हो पाई है। हिंदी पाठक समाज का तालाब इसी वजह से शांत है। दुखद तो यह है कि इस शांत तालाब में हलचल पैदा करने के लिए कंकड़ फेंकने की हिम्मत कम ही लोग दिखा पाते हैं। त्रिपाठी जी का पार्क में जन्मदिन मनाकर पाठक समाज ने खुद के तालाब में ही खुद ही एक कंकड़ मारने की कोशिश की है। इससे एक हलचल पैदा भी हुई है। बेहतर तो यह होगा कि हिंदी लेखक समाज इस हलचल को बढ़ाते रहने की कोशिश को आगे बढ़ाए। इससे पैदा हुई लहरें ही हिंदी को सही मुकाम तक ले जा सकेंगी।
हिंदी साहित्य की एक बड़ी चिंता पाठकों से सहज संवाद की रही है। दिल्ली से लेकर भोपाल तक हिंदी के ढेर सारे कार्यक्रम होते रहते हैं, लेकिन अक्सर इन कार्यक्रमों में पाठकों की उपस्थिति बेहद कम रहती है। हाल ही में प्रवासी लेखक सम्मेलन में लंदन से भारत आए प्रवासी लेखक तेजेंद्र शर्मा ने भी एक मुलाकात में स्वीकार किया कि हिंदी में ज्यादातर लेखन लगता है लेखकों और उसी साहित्यिक जमात के लिए होता है, जिसे खुद भी कुछ रचने-बांचने की आदत है। दूसरी भाषाओं से की तरह हिंदी में सिर्फ और सिर्फ आम पाठकों की उपस्थिति कम से कम साहित्यिक आयोजनों से दूर ही रहती है। इस दूरी के ही चलते कम से कम आम लोगों में हिंदी लेखकों की सहज पूछ और पहचान कम ही होती है। दूसरी प्रदर्शनकारी विधाओं के रचनाकारों की बनिस्बत हिंदी लेखकों को आम पहचान का यह संकट परेशान करता रहता है। ऐसे माहौल में अगर किसी लेखक का कोई जन्मदिन आम पाठक मनाने लगें तो सुखद हैरत तो होगी ही। लेकिन ऐसा हुआ और उसी दिल्ली की सरजमीं पर हुआ, जहां आम साहित्यिक कार्यक्रमों में पाठकों का रोना रोया जाता है।
हिंदी के वरिष्ठ लेखक और आलोचक हैं विश्वनाथ त्रिपाठी। सहज व्यक्तित्व के धनी विश्वनाथ त्रिपाठी दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ाते रहे हैं। सुदूर पूर्वी उत्तर प्रदेश के निवासी विश्वनाथ जी रिटायर होने के बाद भी दिल्ली में ही रह रहे हैं। पूर्वी दिल्ली के जिस दिलशाद गार्डेन इलाके में वे रहते हैं, उसके बगल में डीयर पार्क है। उस पार्क में वे सुबह-शाम की सैर के लिए लगातार जाते रहे हैं। करीब बीस साल से जारी इस सैर यात्र में उनके कई संगी-साथी बन गए हैं। उन्हें पता है कि विश्वनाथ जी हिंदी के जाने-माने लेखक और अध्यापक हैं। लेकिन उनका निश्छल व्यक्तित्व पार्क के सैर साथियों से सहज संबंध में रोड़ा नहीं बन पाया। बहरहाल वैलेंटाइन डे के दो दिन बाद यानी 16 फरवरी को त्रिपाठी जी ने जिंदगी के 80 बसंत पूरे कर लिए। त्रिपाठी जी के जन्मदिन की जानकारी उनके सैर-साथियों को थी और उन्होंने पार्क में ही सैर के दौरान उनका जन्मदिन मनाने की तैयारियां कर लीं। 16 फरवरी की सुबह जब त्रिपाठी जी पार्क पहुंचे तो उन्हें गेंदे के फूलों की माला से लाद दिया गया। निश्चित तौर पर इसमें वहां रह रहे कुछ लेखक – पत्रकारों का भी सहयोग रहा है। सुखद हैरत की बात यह है कि इस मौके पर डीयर पार्क के मित्रों के सहयोग से एक किताब का प्रकाशन भी किया गया है। बतकही शीर्षक इस पुस्तक को लेखक भारतेंदु मिश्र ने संपादित किया है। यह पुस्तक साहित्यिक अड्डेबाजी या साहित्यकारो की गप्प गोष्ठी का एक सहज दस्तावेज है। बाद मे त्रिपाठी जी ने इस पुस्तक का लोकार्पण करते हुए कहा - “मैं यहाँ बीस वर्षों से आ रहा हूँ, यहाँ के हमारे सभी मित्रो ने ये जो मेरे लिए आयोजन किया है इससे बडा आयोजन मेरे लिए और हो नही सकता।हम लोग बरसों से एक साथ यहाँ बैठते है क्योकि यहाँ हम आपस मे अपनी रचनाओ की चर्चा नही करते। साहित्य से इतर केवल गप्प होती है तो इसी लिए यह चल रहा है। दूसरी तरह के महत्वाकान्क्षी बहुत से लोग जो हमारे बीच आये भी वो खुद कुछ न मिलने पर चले गये।..तो हम लोग आपस मे इसी लिए लम्बे समय से जुडे है कि हम किसी को कुछ देने की स्थिति मे नहीं हैं। इसी लिए यह हमारी गप्प गोष्ठी चल रही है। कुछ आते रहे कुछ जाते रहे। हम सबमे कमियाँ हैं-कमियाँ हैं तभी चल रहा है। ”
हिंदी में ऐसे आयोजनों की परंपरा न के बराबर है। लेकिन त्रिपाठी जी का जन्मदिन दरअसल हिंदी समाज के बदलते मानस का एक परिचय दे गया। इससे साफ है कि अगर पाठकों और आम लोगों से जुड़ने का माद्दा और हिम्मत है तो हिंदी के लेखकों से भी आम पाठक जुड़ना और उसके बारे में जानना चाहता है।
दिल्ली में हर साल मराठी समाज गणेशोत्सव का आयोजन करता है। बंगाली समाज दुर्गापूजा का आयोजन करता है। इन आयोजनों में ये समाज अपने लेखकों और संस्कृति कर्मियों से सीधे मुखातिब होते हैं। असम में तो उस बच्चे का सही संस्कार ही नहीं माना जाता, जो असम साहित्य सम्मेलन में शामिल नहीं हो पाता। लेकिन हिंदी में दुर्भाग्यवश ऐसी परंपरा अभी तक विकसित नहीं हो पाई है। हिंदी पाठक समाज का तालाब इसी वजह से शांत है। दुखद तो यह है कि इस शांत तालाब में हलचल पैदा करने के लिए कंकड़ फेंकने की हिम्मत कम ही लोग दिखा पाते हैं। त्रिपाठी जी का पार्क में जन्मदिन मनाकर पाठक समाज ने खुद के तालाब में ही खुद ही एक कंकड़ मारने की कोशिश की है। इससे एक हलचल पैदा भी हुई है। बेहतर तो यह होगा कि हिंदी लेखक समाज इस हलचल को बढ़ाते रहने की कोशिश को आगे बढ़ाए। इससे पैदा हुई लहरें ही हिंदी को सही मुकाम तक ले जा सकेंगी।
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