रविवार, 4 अप्रैल 2010

नागरी लिपि या रोमन हिंदी


उमेश चतुर्वेदी
1957 में लखनऊ से प्रकाशित युगचेतना पत्रिका में रघुवीर सहाय की हिंदी पर एक कविता छपी थी, जिसमें उन्होंने हिंदी को दुहाजू की नई बीवी बताया था। राजनीतिक सत्तातंत्र के हाथों हिंदी की जो कथित सेवा हो रही थी, इस कविता के जरिए रघुवीर सहाय ने उसकी पोल खोली है। इसे लेकर तब बवाल मच गया था। खालिस हिंदी वाले ने हिंदी की असल हकीकत बयां की थी तो हिंदी वाले ही नाराज हो गए थे। कुछ ऐसा ही इन दिनों भी देखने में आ रहा है। हिंदी की अकादमिक और साहित्यिक दुनिया में रसूखदार असगर वजाहत ने हिंदी को रोमन लिपि में लिखने का सुझाव दिया है। उनका तर्क है कि अगर ऐसा हुआ तो हिंदी का प्रसार काफी तेजी से बढ़ेगा। 53 साल बाद इस एक बयान के बाद ही असगर वजाहत हिंदी वालों की ही आलोचना के केंद्र में आ गए हैं। असगर वजाहत ने तर्क दिया है कि हिंदी का सबसे ज्यादा प्रचार-प्रसार करने वाले टेलीविजन और फिल्मों की दुनिया में अभिनेताओं के डायलॉग रोमन में लिखा जा रहा है। अधिकांश प्रोड्यूसर और डायरेक्टर पटकथाएं और संवाद पारंपरिक देवनागरी लिपि में लिखने की बजाय रोमन लिपि में लिखने के लिए अपने पटकथा और संवाद लेखकों पर जोर डाल रहे हैं। इसी का हवाला देकर असगर वजाहत हिंदी के रहनुमाओं को देवनागरी लिपि की बजाय रोमन में लिखने का सुझाव दे रहे हैं। हिंदी का व्यापक तौर पर प्रचार और प्रसार हो, उसे सही मायने में राजभाषा का दर्जा मिले, राष्ट्र का प्रशासनिक और राजनीतिक काम हिंदी में हो, इससे भला किसी को क्यों ऐतराज होगा। लेकिन हमारी हिंदी की पहचान रही देवनागरी लिपि की जगह रोमन को अपनाने की बात शायद ही किसी को पचेगी। यह सच है कि गेट और डंकल प्रस्तावों के बाद दुनियाभर में आए उदारीकरण के झोंके ने अंग्रेजी के प्रसार में मदद की है। जाहिर है कि रोमन लिपि जापान से लेकर लैटिन अमेरिका के देश ब्राजील और रूस से लेकर फ्रांस तक में पढ़ी जाती है, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सिर्फ रोमन लिपि अख्तियार कर लेने से ही किसी भाषा को समझने का सूत्र हाथ नहीं लग जाता है। अगर ऐसा ही होता तो रोमन में लिखी फ्रेंच और जर्मन को भी आज हर वह व्यक्ति समझना शुरू कर चुका होता, जो अंग्रेजी जानता है। इसी तरह से उसे लैटिन अमेरिकी और अफ्रीकी भाषाएं भी समझ में आ रही होती। क्योंकि दुनियाभर में जहां-जहां ब्रिटेन की सत्ता रही है, कुछ एशियाई देशों को छोड़ दें तो वहां की सरकारों ने अपनी आजादी के बाद अपनी भाषाओं के लिए रोमन लिपि को ही प्राथमिकता दी। ऐसे में होना तो यह चाहिए था कि रोमन लिपि पढ़ने-समझने वाले लोग जिम्बाब्वे की भी भाषा को समझ रहे होते। दक्षिण अफ्रीका में अंग्रेजी के साथ ही स्थानीय जुलू भाषा के लिए भी रोमन लिपि का ही इस्तेमाल होता है, लेकिन जिन्हें अंग्रेजी आती है, वे रोमन में लिखी वहां की अंग्रेजी ही समझते हैं, जुलू भाषा को नहीं। वर्ष 1948 में तुर्की की आजादी के बाद वहां के शासक कमालपाशा ने भी रोमन लिपि का इस्तेमाल किया था, लेकिन तुर्की भाषा दुनियाभर में लोकप्रिय नहीं हो पाई। दुनियाभर में जब यह फार्मूला चल नहीं पाया तो हिंदी में इसके कामयाब होने की गारंटी कैसे दी जा सकती है। देवनागरी से दूर हिंदी को ले जाने का सुझाव देने के लिए मीडिया में रोमन की लोकप्रियता को बड़ा आधार बताते हुए असगर वजाहत साहब कुछ-कुछ पुलकित नजर आ रहे हैं, लेकिन यह सुझाव देते वक्त वह यह भूल गए कि हिंदी के बाजार में जो लोग रोमन के जरिए कारोबार कर रहे हैं, उनका मूल उद्देश्य अपना कारोबार करना मात्र है, हिंदी की सांस्कृतिक परंपरा को और ज्यादा संजीदा और मूल्यवान बनाना नहीं है। वे सिर्फ कारोबार करने आए हैं, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कारोबारियों को जिस दिन लगेगा कि अब वे रोमन की बजाय चीनी लिपि के जरिए कमाई कर सकते हैं, वे रोमन को भी भूल जाएंगे। उनके लिए बाजार में चलने वाली भाषा उनकी बड़ी और कारोबारी दोस्त हो जाएगी। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि भाषाएं संस्कृति का अहम उपादान होती हैं। जिन लिपियों के सहारे वे खुद को अभिव्यक्त करती हैं, उनके जरिए वे अपनी संस्कृति को भी स्वर देती हैं। बाजार की भाषा का इससे कोई लेना नहीं होता। फिल्म और बॉलीवुड की दुनिया में रोमन में लिखे संवाद और पटकथाएं स्वीकार्य हो रही हैं, लेकिन इसके जरिए हिंदी को जो नुकसान हो रहा है, उसे भी देखना-परखना होगा। नागरी लिपि को दुनियाभर के भाषाविज्ञानी सबसे बेहतर और वैज्ञानिक लिपि घोषित कर चुके हैं। दुनिया में जितनी भी भाषाएं और उनकी लिपि है, दरअसल वे स्थानीय भाषाई जरूरतों के मुताबिक विकसित हुई हैं। रोमन के साथ यह स्थिति नहीं है। रोमन में च और क के लिए आपको सीएच का इस्तेमाल मिल जाएगा, यहां बीयूटी बट हो सकता है तो पीयूटी पुट हो जाता है। देवनागरी में ऐसी अराजकता आपको शायद ही देखने को मिले। र वर्ग की ध्वनियों को छोड़ दें तो बाकी हर तरह की जो ध्वनियां हैं और उनका जो उच्चारण है, उसे सही तरीके से नागरी लिपि ही अभिव्यक्त कर पाती है। रोमन लिपि के साथ यह सुविधा नहीं है। वहां द और ड दोनों के लिए एक ही डी अक्षर का इस्तेमाल होता है। इसीलिए रोमन में लिखी स्कि्रप्ट को याद करने के बाद कई अभिनेता डाल को दाल और दाल को डाल बोलते नजर आते हैं। अगर रोमन को हिंदी की लिपि के तौर पर स्वीकार कर लिया गया तो क्या गारंटी है कि दाल और डाल को अलग तरह से बोला जाएगा। इसी तरह से ध्वनि दोषों को सुधारने के लिए कैसे उपाय किए जाएंगे। अगर किसी को मेरा बच्चा पसंद नहीं आता तो इसका यह मतलब तो नहीं हो सकता न कि मैं अपने बच्चे को ही छोड़ दूं और दूसरे के बच्चे को अपनाने की सोचने लगूं। अगर मेरे बच्चे में खराबी या बुराई है तो होना तो यह चाहिए कि मैं उसके स्वाभाव को बदलने की कोशिश करूं, लेकिन दुर्भाग्य से अपनी हिंदी के साथ ऐसा ही हो रहा है। हवाला तो यह भी दिया जा रहा है कि मोबाइल क्रांति के दौर में एसएमएस में हिंदी का इस्तेमाल तो हो रहा है, लेकिन उसकी अभिव्यक्ति का माध्यम रोमन लिपि ही बन रही है। इसकी वजह यह नहीं है कि रोमन ज्यादा सहज है, इसलिए उसे यह जिम्मेदारी निभानी पड़ रही है। चूंकि यह तकनीकी क्रांति पहले अंग्रेजी में ही हुई और उसकी ऑपरेटिंग भाषा अंग्रेजी ही है। यही वजह है कि वहां रोमन का चलन बढ़ा, लेकिन दुनिया में जैसे-जैसे मोबाइल कंपनियां अंग्रेज दुनिया से बाहर के बाजार में अपने पांव फैला रही हैं, वहां की स्थानीय भाषाओं और लिपियों को भी अपने ऑपरेटिंग सिस्टम में शामिल कर रही हैं। अरब देशों में अरबी लिपि, चीन में चीनी लिपि और जापान में जापानी लिपि में न सिर्फ एसएमएस करने की सुविधा मोबाइल कंपनियां मुहैया करा रही हैं, बल्कि ऑपरेटिंग सिस्टम को उन्हीं भाषाओं के आधार पर दुरुस्त और सहज बना रही हैं। बाजार जब आता है तो ऐसे ही स्थानीय संस्कृतियों पर हमला करता है। उसके लिए सांस्कृतिक मूल्यों का कोई महत्व नहीं रहता। उदारीकरण के दौर में जब से अमेरिकी अर्थव्यवस्था ने अपनी आगोश में पूरी दुनिया को लेना शुरू किया, उसने देसी भाषाओ पर भी जोरदार हमला बोला। दुनिया में तीसरे नंबर पर बोली जाने वाली भाषा हिंदी की रेडियो सर्विस को बंद करने की प्रमुख वजह तो यह भी समझी जा रही है कि उसने यह मान लिया है कि हिंदी की धरती पर भी उसका काम अंगरेजी में चल सकता है। असगर वजाहत हिंदी के समझदार और प्रतिष्ठित बौद्धिक है, ऐसे में यह मान लेना कि उन्हें ये सब चीजें पता नहीं होंगी, ऐसा मानना भोलापन ही माना जाएगा। उन्हें भी पता होगा कि हिंदी के लिए रोमन लिपि का यह शिगूफा तात्कालिक तौर पर भले ही फायदेमंद हो, इसके दूरगामी नतीजे हिंदी की सेहत और अस्तित्व के लिए घातक होंगे। रोमन को स्वीकार करना दरअसल अंग्रेजी मानसिकता के सामने झुकना होगा। अंग्रेजी वर्चस्व वाली दुनिया दरअसल यही चाहती हैं। ऐसे में उनका ही काम आसान होगा। हम हिंदीवालों को तय करना है कि हम बाजार के सामने समर्पण करना चाहते हैं या फिर बाजार को खुद के मुताबिक बदलने की कोशिश करेंगे।

गुरुवार, 18 मार्च 2010

लंदन में 'फैसले ' की धूम


लंदन के नेहरू केंद्र के सभागार में 18 मार्च को भारी हुजूम उमड़ा। मौका था मशहूर लेखिका और फिल्म निर्माता-निर्देशक रमा पांडे की किताब फैसले के लोकार्पण का। भारतीय मुस्लिम महिलाओं की जिंदगी पर बने टीवी सीरियल पर आधारित रमा पांडे की इस किताब में उन महिलाओं की जिंदगी पूरी शिद्दत से झांकती है। इस किताब का लोकार्पण लेबर पार्टी की कौंसिलर जाकिया जुबैरी ने किया। इस मौके पर फैसले की कुछ कहानियों की सीडी और डीवीडी भी लांच की गई। इस मौके पर जाकिया जुबैरी ने कहा कि इस किताब का हर पन्ना मैंने चाट लिया है। इसका हर एपिसोड मुझे भारतीय मुस्लिम महिलाओं की जिंदगी का आईना जैसा लगता है। जुबैरी ये कहने से भी नहीं चूकीं कि सियासत एपिसोड में वे खुद को भी कही ना कहीं पाती हैं।
टेलीविजन और रेडियो की चर्चित शख्सियत रमा पांडे ने अपने आसपास बिखरे किरदारों पर 26 एपिसोड का सीरियल बनाया है। फैसले में उन्हीं कहानियों को संकलित किया गया है। इस समारोह में आकर्षण का केंद्र रहीं अफगानी लेखिका सोफिया। अफगानिस्तान से आईं सोफिया ने कहा कि इस किताब के हर हर्फ का अनुवाद किया जाना जरूरी है। ताकि यह बात उन महिलाओं तक भी पहुंचे, जिनके लिए ये सीरियल बनाया गया है।
बीबीसी हिंदी सेवा से जुड़ी मशहूर लेखिका अचला शर्मा ने इस लोकार्पण समारोह का संचालन किया। इस मौके पर नेहरू सेंटर के हॉल को जयपुरी दुपट्टे से खासतौर पर सजाया गया था। दरअसल जयपुरी दुपट्टे बनाने वाले रंगरेजों की कहानी इस सीरियल के सुलताना एपिसोड में दिखाया गया है। इस कार्यक्रम में जाने - माने अंग्रेजी उपन्यासकार लारेंस नारफोक और बीबीसी हिंदी सेवा के पूर्व प्रमुख कैलाश बुधवार समेत कई हस्तियां शामिल हुईं।

गुरुवार, 11 मार्च 2010

नहीं बदल रहा मीडिया का मिजाज


उमेश चतुर्वेदी
टैम की रेटिंग प्वाइंट यानी टीआरपी के मौजूदा पैमाने पर इन दिनों सवालिया निशान लगाने वालों में वे लोग भी शामिल हो गए हैं, जो हाल के दिनों तक इसके पैरोकार रहे हैं। इसके जरिए एक बार फिर से खबरों की बुनियादी संरचना और उसके विषय को लेकर गंभीर बहस शुरू हो गई है। जिसे मुख्यधारा की पत्रकारिता में स्वागत भी किया जा रहा है। ऐसा माना जा रहा है कि इस बहस के जरिए भूत-प्रेत और जादू-टोने से लेकर अतीन्द्रीय किस्म की मनोरंजक खबरों की बजाय सरोकार वाले समाचारों को लेकर मीडिया जगत का रवैया बदल रहा है। जाहिर है, इस बहस के जरिए सरोकारी पत्रकारिता के पैरोकारों की उम्मीदें बढ़ गई हैं। लेकिन क्या सचमुच दुनिया बदल गई है या फिर हाल के दिनों में टीआरपी बटोरने का जो तरीका रहा है, उसी लीक पर आज का मीडिया चल रहा है। इसे समझने के लिए हाल के दिनों की कुछ घटनाओं को लेकर मीडिया कवरेज को देखा जाना चाहिए।
27 फरवरी को जनसंघ के वरिष्ठ नेता रहे नानाजी देशमुख का निधन हुआ। नानाजी भले ही दक्षिणपंथी धारा के महत्वपूर्ण स्तंभ रहे हैं। लेकिन उनका संबंध समाजवादी राजनीति के अलंबरदारों से भी गहरा रहा है। लेकिन उनके निधन को टेलीविजन की तो बात ही छोड़िए, अखबारों तक ने वह कवरेज नहीं दी, जिसके वे हकदार थे। नानाजी देशमुख से लोगों का विरोध हो सकता है, लेकिन भारतीय राजनीति में उनके योगदान को नकारा नहीं जा सकता। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के हीरो रहे डॉक्टर राममनोहर लोहिया ने जिस गैरकांग्रेसवाद की नींव रखी थी, उसको जमीनी स्तर पर पहली बार अमलीजामा 1967 में ही पहनाया जा सका। भारतीय राजनीति के अध्येताओं को पता है कि अगर नानाजी देशमुख नहीं होते तो डॉक्टर लोहिया और जनसंघ प्रमुख दीनदयाल उपाध्याय एक साथ नहीं बैठते और 1967 के चुनावों के बाद नौ राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें नहीं बनतीं। भारतीय राजनीति को तब तक आजादी के आंदोलन से साख हासिल कर चुकी कांग्रेस को अभेद्य माना जाता था। लेकिन नानाजी देशमुख के चलते उस दौर की कांग्रेस विरोधी दो धाराएं- समाजवादी आंदोलन और दक्षिण पंथी विचारधारा साथ आई थी। इस साथ ने कांग्रेस को पहली बार पटखनी देने में कामयाबी हासिल की थी। 1967 का ये प्रयोग अगर नहीं हुआ होता तो शायद 1977 में भी गैरकांग्रेस का नारा सफल नहीं हुआ होता और तब तक भारतीय राजनीति में सर्वशक्तिमान मानी जाती रहीं इंदिरा गांधी की बुरी हार नहीं हुई होती। आजादी के तत्काल बाद गठित जनसंघ और समाजवादी पार्टियां कम से कम एक मसले पर एक जैसा विचार रखती थीं। कांग्रेस विरोध के वैचारिक धरातल पर साथ काम करते रहे दोनों दलों ने 1967 से पहले चुनावी मैदान में साथ उतरने को सोचा होगा। लेकिन दोनों विचारधाराओं को चुनावी बिसात पर साथ लाने में जिन लोगों ने अहम योगदान दिया, उनमें नानाजी देशमुख भी थे। उन्हीं दिनों चंद्रशेखर से भी उनका गहरा संपर्क हुआ और इस प्रखर और खरे समाजवादी के साथ उनका साथ ताजिंदगी बना रहा।
1967 में कांग्रेस विरोध के बहाने ही दोनों विचारधाराओं में साथ आने की जो हिचक दूर हुई, उसका ही असर है कि 1977, 1989 और 1998 में नया इतिहास रचा गया। सबको पता है कि इन्हीं सालों में कांग्रेस को हराकर केंद्र में गैरकांग्रेसी सरकारें बनीं। नानाजी की विचारधारा से असहमत होने का लोकतांत्रिक समाज में सबको अधिकार होना चाहिए। लेकिन भारतीय राजनीति में उनके योगदान को कम करके नहीं आंका जा सकता। अगर इन अर्थों में देखें तो उनकी मौत मीडिया के लिए सिर्फ सूचना बन कर आई। उसके लिए बड़ी खबर नहीं बन पाई। सरोकारी पत्रकारिता का दावा करने वाले अखबारों तक में उन्हें लेकर छोटी खबरें ही जगह बना पाईं।
यह हालत सिर्फ नानाजी के साथ ही नहीं है। देश की राजनीति में भूचाल लाकर इतिहास रचने वाले दूसरे महापुरूषों के साथ भी कुछ ऐसा ही होता रहा है। 11 अक्टूबर 1942 और 1977 के हीरो जयप्रकाश नारायण का जन्मदिन है। यह सुखद संयोग ही है कि इसी दिन अमिताभ बच्चन भी पैदा हुए थे। लेकिन हर साल 11 अक्टूबर को मीडिया जितना स्पेस अमिताभ बच्चन को देता है, उसका दसवां हिस्सा भी जयप्रकाश नारायण को नहीं देता। अमिताभ ने मनोरंजन की दुनिया में भले ही नए कीर्तिमान बनाए हों, लेकिन उनके सामने जयप्रकाश नारायण का महत्व कम नहीं हो जाता। बल्कि सच तो ये है कि अगर जयप्रकाश नहीं होते तो शायद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार ही बहाल नहीं हो पाता, जिसे इमरजेंसी के दौरान छीन लिया गया था।
सरोकारी पत्रकारिता करने वाले मीडिया के लोगों का इस विरोधाभास पर जवाब बेहद सधा हुआ है। उनका कहना है कि नानाजी और जयप्रकाश नारायण को नई पीढ़ी नहीं जानती। इसीलिए उनसे जुड़ी खबरों को ज्यादा स्पेस नहीं दिया जा सकता। पूरी दुनिया में मीडिया के तीन काम पढ़ाए-बताए जाते रहे हैं- सूचना देना, शिक्षा देना और मनोरंजन करना। सवाल है कि जब तक नई पीढ़ी को बताया नहीं जाएगा, तब तक वह नानाजी या जयप्रकाश नारायण के बारे में कैसे जानेगी। ऐसे सवालों का जवाब देने की बजाय मीडिया यह कहकर उससे किनारा करने में देर नहीं लगाता कि मीडिया का काम पढ़ाई कराना नहीं है।
यह सच है कि आजादी के बाद से मीडिया में भी भारी बदलाव आए हैं। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अगर आजादी के आंदोलन के दौरान भी मीडिया ऐसा ही रवैया अख्तियार किए रहता तो क्या आजादी की अलख उतनी तेजी से जलाई रखी जा सकती थी, जितनी तेजी से वह रोशनी और तपिश फैलाती रही। निश्चित तौर पर इसका जवाब ना में होगा। ऐसे सवालों से किनाराकसी करके मीडिया एक तरह से यही साबित करता है कि वह अपने पहले दो फर्जों की बजाय तीसरे यानी सिर्फ मनोरंजन पर ही ज्यादा ध्यान दे रहा है। और अगर ऐसा है तो निश्चित तौर पर सरोकारी पत्रकारिता को लेकर जारी बहस को ही झुठलाने का प्रयास किया जा रहा है। हकीकत तो यही है कि गंभीर और सरोकारी पत्रकारिता को लेकर अभी भी माहौल सकारात्मक नजर नहीं आ रहा है। अब भी खबरों के चयन और उसके प्रकाशन - प्रसारण को लेकर लोकप्रियता और टीआरपी बटोरू मौजूदा रवैया ही महत्वपूर्ण आधार बना हुआ है। ऐसे में टैम की रेटिंग प्वाइंट पर सवाल उठाने और उसके औचित्य को कटघरे में खड़ा करने का भी कोई फायदा मिलना आसान नहीं होगा।

शनिवार, 9 जनवरी 2010

अखबारों पर भरोसा बरकरार

उमेश चतुर्वेदी
अमेरिका और यूरोप में जैसे-जैसे इंटरनेट का प्रसार बढ़ता जा रहा है, अखबारों के प्रसार में गिरावट देखी जा रही है। इसके चलते वहां अखबारों के अस्तित्व पर ही सवाल उठने लगा है। चार साल पहले ब्रिटेन की पत्रिका द इकोनॉमिस्ट में प्रकाशित कवर स्टोरी- हू किल्ड द न्यूजपेपर – के बाद ये सवाल जबर्दस्त तरीके से उछला। ऐसी हालत में प्राइसवाटर हाउसकूपर की ताजा रिपोर्ट अखबारी दुनिया को राहत दे सकती है। वर्ल्ड एसोसिएशन ऑफ न्यूज पेपर्स की पहल पर प्राइसवाटर हाउसकूपर ने हाल ही में अमेरिका और ब्रिटेन के 4900 पाठकों, तीस बड़े मीडिया घराने और दस बड़ी विज्ञापनदाता कंपनियों से सर्वे के बाद एक रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट से साफ हुआ है कि भले ही पश्चिमी दुनिया में अखबारों की बजाय इंटरनेट को ज्यादा तरजीह दी जाने लगी है। लेकिन अब भी ज्यादातर लोगों को प्रिंट पर ही भरोसा है। जबकि सिर्फ बासठ फीसदी लोग ही पैसे देकर इंटरनेट पर उपलब्ध या अखबारों के डिजिटल संस्करणों को पढ़ने के लिए तैयार हैं। पश्चिमी अखबारी जगत के लिए ये रिपोर्ट जहां चौंकाने वाली है, वहीं इंटरनेट के प्रति अखबारी संस्थानों के बढ़ते भरोसे को संतुलित करने के लिए भी काफी है। अखबारी प्रसार में गिरावट के बाद मीडिया मुगल रूपर्ट मर्डोक के प्रकाशनों समेत द टाइम्स न्यूयार्क जैसे प्रकाशन भी अपने इंटरनेट संस्करणों की पाठकों के बीच मुफ्त पहुंच को सीमित करने के लिए जरूरी सॉफ्टवेयर के विकास में जुट गए हैं। ताकि इन प्रकाशनों के इंटरनेट संस्करणों तक उन्हीं पाठकों की पहुंच हो, जो इसके लिए कीमत चुकाने को तैयार हों। लेकिन प्राइसवाटर हाउसकूपर की इस रिसर्च रिपोर्ट से साफ है कि विकसित दुनिया के पाठकों में इंटरनेट के प्रति वैसा भरोसा नहीं है, जैसा कि प्रिंट के प्रति है। क्योंकि प्रिंट के लिए अब भी शत-प्रतिशत लोग कीमत चुकाने के लिए तैयार हैं।
परंपरा की पूंजी के चलते चाहे पूरब का समाज हो या पश्चिम का, प्रिंट बड़ी ताकत बना हुआ है। यही वजह है कि पाठकों का उसमें भरोसा बना हुआ है। यही वजह है कि विज्ञापनदाताओं का भी उन पर भरोसा बरकरार है। इसकी तस्दीक प्राइसवाटर हाउस कूपर की रिसर्च रिपोर्ट भी करती है। रिपोर्ट के मुताबिक डिजिटल माध्यमों की ओर विज्ञापन का प्रवाह बढ़ रहा है। लेकिन विज्ञापनदाता गंभीर और भरोसेमंद पाठकों को लुभाने के लिए अखबारों पर ही ज्यादा भरोसा जता रहे हैं। इसमें उन अखबारों की संभावना ज्यादा बेहतर नजर आ रही है, जिन्होंने अपने डिजिटल या इंटरनेट या फिर दोनों तरह के संस्करण शुरू कर रखे हैं। यानी उन अखबारों पर विज्ञापनदाताओं का भरोसा बना हुआ है, जो बदलते दौर में नई तकनीक को आत्मसात करने में पीछे नहीं हैं। हालांकि इस रिपोर्ट में ये अफसोस भी जताया गया है कि यह चलन अभी ज्यादातर अखबार समूहों में शुरू नहीं हो पाया है। बहरहाल रिपोर्ट ने उम्मीद जताई है कि बाजार में अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए देर-सबेर सभी प्रकाशनों को अपने डिजिटल या इंटरनेट संस्करणों को बेहतर बनाना ही पड़ेगा।
वैसे वैश्विक मंदी और आर्थिक संकट के चलते ये भी सच है कि अखबारों की राह कठिन हुई है। प्राइसवाटर हाउस कूपर की इस रिपोर्ट में भी अनुमान लगाया गया है कि समाचार पत्रों के ग्लोबल बाजार में इस साल 10.2 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की जाएगी। और 2013 तक इसमें हर साल करीब दो प्रतिशत की गिरावट देखी जाएगी। प्राइसवाटर हाउसकूपर की रिपोर्ट ने विज्ञापनों में गिरावट की भी उम्मीद जताई है। यही वजह है कि अखबारों के लिए विज्ञापनों में कमी आई है। कूपर की रिपोर्ट के ही मुताबिक खुद मीडिया संस्थान ही मानते हैं कि वैश्विक मंदी और विज्ञापनों में गिरावट के चलते वे अपना घाटा 2011 में ही पूरा कर पाएंगे। यानी उम्मीद की किरणें बनी हुई हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि अखबार कैसे बचे रह सकते हैं। प्राइसवाटर हाउसकूपर की रिपोर्ट से साफ है कि पाठकों के भरोसे के चलते विज्ञापन उद्योग का प्रिंट पर भरोसा बना रहेगा। लेकिन यह भी सच है कि पाठकों के भरोसे को बनाए रखने के लिए प्रिंट को नए-नए प्रयोग भी करने होंगे। इसकी तस्दीक द इकोनॉमिस्ट को दिए अपने एक इंटरव्यू में मीडिया मुगल रूपर्ट मर्डोक ने भी की थी। उन्होंने कहा था कि मीडिया हाउसों ने अपने प्रिंट संस्करणों के जरिए अकूत कमाई तो की, लेकिन अपने इन दुलारे प्रकाशनों के टिकाऊ विकास के लिए अनुसंधान और नये प्रयोगों पर पैसे खर्च करने के बारे में कभी नहीं सोचा। कहना ना होगा कि भारत के भी बड़े मीडिया संस्थान मर्डोक की इस बात से सहमत नजर आ रहे हैं। हाल ही में एक कार्यक्रम आईएनएस के अध्यक्ष और बॉम्बे समाचार समूह के प्रमुख होर्म्सजी कामा को भी कहना पड़ा कि बदलते दौर के मुताबिक खुद को नए रूप में ढालने के लिए समाचार-पत्रों को तैयार होना पड़ेगा। इसके लिए शोधपरक अध्ययन भी करना होगा। और तो और उन्होंने माना कि वही अखबार बाजार में मजबूती के साथ खड़े रहेंगे, जो अपनी डिजाइन, ले-आउट और स्वरूप में नयापन लाने की सफल कोशिश करेंगे।
जब-जब कोई नया माध्यम आता है, पुराने की मौत की आशंका जताई जाने लगती है। रेडियो- टीवी के आने के दौरान भी ऐसा ही हुआ था। लेकिन नई चुनौतियों से जूझते हुए प्रिंट माध्यम ने खुद को मजबूती से खड़ा होने का रास्ता तलाश लिया था और आगे बढ़ते रहे। ये सच है कि एक बार फिर उनके सामने ऐसी चुनौती आ खड़ी हुई है, लेकिन यह भी सच है कि इससे निबटने और खड़ा होने का रास्ता तलाश ही लेंगे।

बुधवार, 6 जनवरी 2010

टैम की माया के सामने खुलते जिंदगी के राज


उमेश चतुर्वेदी

मौजूदा प्रतिस्पर्धा में कुछ नया करके अपनी पहचान बनाए रखते हुए टीआरपी की दौड़ में अहम स्थान बनाए रखने की अंतहीन कवायद में मनोरंजन चैनल भी जुट गए हैं। इसके लिए हर चैनल नए-नए आइडिया को लेकर आगे आ रहा है। बुद्धू बक्से के पर्दे पर रियलिटी शो की भरमार इसी का नतीजा है। इसी कड़ी में एक और नाम जुड़ा है एनडीटीवी इमैजिन के शो - राज पिछले जन्म का। पास्ट लाईफ रिग्रेशन सिस्टम यानी पिछली जिंदगी को याद करके पिछली जिंदगी के राज खोलने वाले इस शो की शुरूआत सात दिसंबर से हो गई है। इसकी शुरूआत में टीवी और फिल्म की दुनिया की प्रमुख और बिकाऊ चेहरों वाली हस्तियां मसलन शेखर सुमन, सेलिना जेटली, संभावना सेठ, मोनिका वेदी आदि भी अपनी जिंदगी के राज खोल चुकी हैं, लिहाजा इसकी चर्चा जमकर हो रही है। नए-नए आइडिया की बाजीगरी दिखाने वाली भारतीय टीवी की दुनिया में चूंकि ये बिल्कुल ताजा और अपनी तरह का अनूठा आइडिया है, लिहाजा इसकी ओर दर्शक आकर्षित भी हो रहे हैं। लेकिन इस शो और इसमें पेश किए जाने वाली तकनीक और उसके जरिए संयोगों को जोड़ने को लेकर सवाल उठने शुरू हो गए हैं।
इसकी वजह बने हैं मशहूर हस्तियों के पूर्व जन्म के कथित खुलासे। मनोचिकित्सक डॉ. तृप्ती जेईन की मदद से मोनिका वेदी के पिछले जन्म का जो राज खुला, वह चौंकाने वाला है। ये पूरी दुनिया जानती है कि मोनिका वेदी को माफिया डॉन अबू सलेम से संबंधों के चलते सुर्खियों में रहीं। उन्हें पुर्तगाल से प्रत्यर्पण के जरिए भारत लाया गया। उन पर अबू सलेम के साथ कई मामलों में मुकदमे भी चले। पूरी दुनिया जानती है कि उन्होंने अबू सलेम के साथ पुर्तगाल में शरण इसलिए ली थी, क्योंकि पुर्तगाल से भारत की प्रत्यर्पण संधि नहीं थी। फिर पुर्तगाल उन देशों में शामिल हैं, जहां भयंकर अपराधियों को भी मौत की सजा नहीं दी जाती। उन्हें और उनके पुराने दोस्त अबू सलेम को कानून की ये बारीकियां पता थीं। इसका फायदा वे उठाते रहे। ना जाने कितने पापड़ बेलने के बाद ही भारत सरकार उन्हें यहां लाने में कामयाब हो पाई। लेकिन राज पिछले जन्म में हिस्सा लेने के बाद उन्हें पता चला कि पूर्व जन्म में वह ईसाई थीं। इतना ही नहीं, उनके तीन बच्चे भी थे। जिनमें से एक बेटी का नाम नीमा था। उन्हें लग रहा है कि वह
ईसाई धर्म की ओर आकर्षित हो रही हैं। मोनिका का दावा है कि पहले उन्हें इसकी वजह पता नहीं थी। लेकिन शो में आने के बाद उन्हें पता चला कि अपने पिछले जीवन में वह ईसाई थीं।
भोजपुरी फिल्मों की हेलन और बॉलीवुड की आइटम गर्ल के तौर पर विख्यात संभावना सेठ को इस शो में आने के बाद पता चला कि वह पूर्व जन्म में मुस्लिम लड़की थीं। उनका पिछला जन्म अच्छा नहीं था। उनके घरवाले उनपर काफी अत्याचार करते थे और बहुत कम उम्र में ही उनकी मौत भी हो गई। बाबा रामदेव को चुनौती देने वाली संभावना सेठ अपनी आक्रामक छवि के लिए भी जानी जाती हैं। अच्छी और बोल्ड डांसर के तौर पर विख्यात संभावना को अब अपनी असल जिंदगी के तार भी पिछली जिंदगी में दिखने लगे हैं। इस शो में पता चला कि वे पूर्व जन्म में बार डांसर थीं। जाहिर है कि इस जन्म के बोल्ड डांस के पीछे उनकी पूर्व जन्म की ये कहानी ही वजह नजर आ रही है।
टेलीविजन की दुनिया के सुपर स्टार शेखर सुमन भी इस शो के जरिए अपने पूर्व जन्म का राज जान चुके हैं। इसके मुताबिक पूर्व जन्म में वे ब्रिटिश नागरिक थे और उनके यहां जबर्दस्त आग लगी थी, जिसमें उनके बच्चों की मौत हो गई थी। यहां ये बता देना जरूरी है कि करीब पंद्रह साल पहले शेखर सुमन के एक बच्चे की हृदय की बीमारी के चलते मौत हो गई थी। इस शो में उन्हें इस मौत के पीछे भी पूर्व जन्म की वह आग ही नजर आई। ये तो हुई शो में शामिल हस्तियों की बात। चैनल का कहना है कि इस शो में नील नितिन मुकेश समेत कई और हस्तियां भी शामिल होंगी। इस शो में भोपाल की स्वाति सिंह भी शामिल हो चुकी हैं। जिन्हें 1966 में एक विमान हादसे से गुजरना पड़ा था। इसका डर उन पर इस कदर बैठ गया कि वे विमान में बैठने से ही घबराने लगीं। लेकिन इस शो में आने के बाद पता चला कि उनके पिछले जन्म की कई घटनाएं उनके व्यक्तित्व पर हावी रही हैं।
जिन्होंने महान मनोवैज्ञानिक सिग्मंड फ्रायड को पढ़ा है, उन्हें पता है कि फ्रायड ने करीब एक सदी पहले ही बता दिया था कि हर व्यक्ति का मन दरअसल दो स्तरों पर सक्रिय रहता है। एक चेतन, जिसमें व्यक्ति को पता होता है कि वह क्या कर रहा है या फिर क्या पढ़ रहा है। मन का एक स्तर होता है अवचेतन। इसमें व्यक्ति का मन अनजाने में ही अपनी जिंदगी और अपने आसपास की घटनाओं को रिकॉर्ड करते जाता है। फ्रायड कहते हैं कि सबकांशस या अवचेतन की जब भी अवस्था आती है या फिर व्यक्ति कभी सपने देखता है तो अवचेतन की ये घटनाएं ही उसे दिखाई पड़ती हैं। मनोचिकित्सक सम्मोहन के जरिए अवचेतन में बैठी धारणाओं को मनोरोगियों के मन से बाहर निकालने की कोशिश करते हैं। इस लिहाज से देखा जाय तो राज पिछले जन्म का – फ्रायड के उसी सिद्धांत के आधार पर काम कर रहा है। इस लिहाज से यह विषय नया तो नहीं है, लेकिन इसे अभी सार्वजनिक तौर पर पहले कभी पेश नहीं किया गया है, इस अर्थ में ये शो नया तो जरूर है। वैसे भी आज की शहरी जिंदगी में इतने उतार-चढ़ाव हैं, इतनी समस्याएं हैं कि अच्छे-भले लोग भी मानसिक विकारों के शिकार हो जाते हैं। एक अनुमान के मुताबिक इस देश में करीब दो करोड़ लोग मानसिक रोगों से परेशान हैं। जाहिर है, ऐसे में इस शो को लोगों की उत्सुकता की वजह तो बनना ही था और बना भी है। अगर ऐसा नहीं होता तो इस शो में हिस्सा लेने के लिए अब तक आठ हजार लोग रजिस्टर्ड नहीं हो पाते। वैसे किसी की निजी जिंदगी में झांकना और उसे लेकर व्याख्याएं सबके सामने करना, उस व्यक्ति की निजीपन में सेंध का ही मामला है। लेकिन जब सामने वाला खुद ही अपनी जिंदगी के राज पूरी दुनिया के सामने खोलने को उतावला हो तो इस पर सवाल उठाना ही बेमानी है। लेकिन ये भी सच है कि कई लोग अब भी हैं, जो अपनी पुरानी या पिछली जिंदगी के राज खोलने को तैयार नहीं हैं। और तो और, इस कार्यक्रम को पेश कर रहे भोजपुरी फिल्मों के अभिनेता रवि किशन अब तक इसके लिए तैयार नहीं हो पाए हैं। कहा तो ये जा रहा है कि वे अपनी पिछली जिंदगी के खुलासे को लेकर डरे हुए हैं। लेकिन एक सच तो ये भी है कि उन्हें कहीं ना कहीं ये लगता है कि उनके विगत के खुलासे से उनकी अब तक की बनी-बनाई छवि पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
चैनलों की आपसी गलाकाट प्रतियोगिता में अब पत्रकारिता की पुरानी मान्यताएं धूमिल पड़ती जा रही हैं। कीहोल यानी बेडरूम में झांकने वाली पत्रकारिता सभ्य समाज में अब भी स्वीकार्य नहीं है। लेकिन बाजार में बने रहने और टीआरपी वाली नांव की पहली सीट पर सवारी करने का दबाव इतना ज्यादा बढ़ गया है कि मान्यताओं की परवाह कोई नहीं करता। चैनल पर अपने अस्तित्व और आर्थिक संकट का दबाव काम करता है तो व्यक्ति की निजी जिंदगी में चमत्कार की उम्मीदें उसे सब कुछ करने के लिए मजबूर करती हैं। राज पिछली जिंदगी का जैसा शो भी दोनों तरह के दबावों के कोलाज से तैयार है। लेकिन हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि अभी कुछ ही महीने पहले सच का सामना नाम का एक शो आया था। वहां सचाई का सामना करना और देखना तो शुरू में दर्शकों और प्रतिभागियों को अच्छा तो लगा, लेकिन अब उसकी चर्चा भी कभी-कभार ही हो पाती है। सच का सामना का मौजूदा हश्र इस बात का गवाह है कि अगर राज पिछले जन्म का में भी अगर समस्याओं का दुहराव होता रहा तो ताजा आइडिया वाला भी ये शो ज्यादा दिन तक लोगों को ड्राइंग रूम में साथ बैठने की वजह बना नहीं रह सकेगा।

शनिवार, 5 दिसंबर 2009

भदेसपन की बुद्धू बक्से में प्रभावी दस्तक


उमेश चतुर्वेदी
बुद्धू बक्से के पर्दे पर बिहार और उत्तर भारतीय हिंदी भाषियों को अब तक दरबान, चपरासी और मजाक का पात्र बनते रहे उत्तर भारतीय हिंदीभाषी अब कहानियों के केंद्र में हैं और मजे की बात ये है कि इनकी उपस्थिति अब टीआरपी की दौड़ में सफलता की गारंटी भी मानी जा रही है। अगले जनम मोंहे बिटिया ही कीजौ, सबकी जोड़ी वही बनाता-भाग्यविधाता, तेरे मेरे सपने, ना आना इस देस लाडो और बैरी पिया जैसे धारावाहिक इस बात की तस्दीक कर रहे हैं कि बाजार के दबाव में भी कभी हंसोड़ और मजाक के पर्याय रहे उत्तर भारतीय छोटे शहरों की पृष्ठभूमि वाली कहानियां भी अब बुद्धू बक्से के ना सिर्फ केंद्र में हैं, बल्कि विज्ञापन के बाजार को नियंत्रित करने वाली टैम जैसी खालिस अंग्रेजी दां कंपनी की रेटिंग में भी अव्वल स्थान बनाने में कामयाब रही हैं।
पढ़े-लिखे होने का दावा करने वाले दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे महानगरों में भले ही सत्ता विमर्श के केंद्र में बिहार और उत्तर प्रदेश के लोग आने लगे हैं, इसके बावजूद उन्हें लेकर इन महानगरों के साथ ही इनके आसपास के इलाकों के लोगों का आग्रह कम नहीं हुआ है। दिल्ली की सड़कों पर बिहारी शब्द आज भी सम्मान का पात्र नहीं है, मुंबई में भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना को धूल चटाने की हैसियत रखने वाला पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार का समाज उन कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की नजर में भी सम्मान हासिल नहीं कर पाया है। इसके बावजूद वह मायानगरी जैसे खालिस अंग्रेजी दां हाथों से संचालित होने वाले टेलीविजन धारावाहिकों की दुनिया में इस इलाके की देसज पृष्ठभूमि वाली कहानियां और देसज पात्र प्रमुख पात्र संभ्रांत वर्ग के ड्राइंग रूम तक प्रभावी असर बना पाए हैं तो हैरतभरे सवाल उठेंगे ही।
चाहे आजादी का आंदोलन रहा हो या फिर बाद के दौर में दिल्ली की गद्दी पर कब्जे की लड़ाई, उत्तर भारत की खास भूमिका रही है। अंग्रेजों से लोहा लेने में गंगा-घाघरा की उपजाऊ मिट्टी से निकले सपूतों ने अहम भूमिका निभाई। आजादी के बाद 1991 तक दिल्ली की गद्दी पर वही काबिज होता रहा, जिसने उत्तर भारत के सबसे बड़े इलाके उत्तर प्रदेश और बिहार के अधिकांश लोगों के दिलों पर राज किया। पीबी नरसिंह राव पहले प्रधान मंत्री रहे, जिनकी पार्टी को इन दोनों राज्यों से पहले की तरह सम्मान और प्यार हासिल नहीं हो पाया। इसके बावजूद इस इलाके के लोगों को सामाजिक विमर्श में वह स्थान नहीं मिल पाया, जिसका वह हकदार था। लेकिन यह हालत अब बदल रही है। अंग्रेजी वर्चस्व वाली टेलीविजन की दुनिया में विमर्श और कहानी का केंद्र बन रहे इस समाज की भी स्वीकार्यता बढ़ने लगी है। यह स्वीकार्यता ही है कि चाहे अगले जनम मोहें बिटिया ही कीजौ हो या फिर सबकी जोड़ी वही बनाता-भाग्य विधाता, ठेठ उत्तर भारतीय समाज का प्रतिनिधित्व करने वाली कहानी और उसके देसज पात्र अब केंद्रीय भूमिका में हैं। अब उनकी कहानी भी संभ्रांत समझे जाने वाले परिवारों के लोगों की आंखों से भी आंसू लाने के लिए मजबूर कर रहे हैं।
पहले अंग्रेजों के खिलाफ जोरदार लड़ाई लड़ने वाले इस इलाके ने विकास की दौड़ में पिछड़कर काफी कीमत चुकाई। आजादी के बाद दिल्ली की गद्दी के दावेदारों ने इस इलाके के वोटों के लिए इस इलाके के लोगों की ताबेदारी तो की, लेकिन ये भी सच है कि उन्हें विकास की जैसी चिकनी और साफ-सफ्फाक सड़क मिलनी चाहिए थी, वह नहीं मिली। इसके लिए इलाके के राजनेता भी ज्यादा जिम्मेदार रहे। खेती के साथ प्रधानमंत्री और असरदार मंत्रियों की भरपूज उपज यहां की धरती राजनीति और समाज को देती रही, लेकिन जो हरियाली यहां के चेहरों पर आनी चाहिए थी, उससे यहां के चेहरे हमेशा महरूम रहे। संविधान के संकल्प के मुताबिक आजादी के पंद्रह साल बाद भी अंग्रेजी इस देश के राजकाज और भाग्यविधाता की भूमिका से अलग होती नजर नहीं आई तो डॉक्टर राममनोहर लोहिया की अगुआई में अंग्रेजी हटाओ आंदोलन में इसी इलाके ने जोरदार भूमिका निभाई। आज समाजवादी धारा की राजनीति में नीतीश कुमार, लालू यादव, मुलायम सिंह यादव जैसे लोग असरदार बने हुए हैं, उसके पीछे भी कहीं ना कहीं लोहिया का ये आंदोलन भी रहा है। लेकिन दुर्भाग्य ये कि इस पीढ़ी के अधिकांश नेताओं ने सत्ता की सवारी करने के बाद अपने इस आंदोलन और आंदोलन की साथी रही अपनी जनता को भी भुलाने में देर नहीं लगाई। जब कर्णधार ही अपने लोगों का सम्मान नहीं करेंगे, दुनिया क्योंकर सम्मानित करती। दूसरी बात ये हुई कि अंग्रेजी विरोधी आंदोलन के बावजूद हिंदी का वर्चस्व राजकाज की दुनिया में नहीं बढ़ा तो अंग्रेजी को लेकर एक खास तरह की कट्टरता का भी विस्तार हुआ। इन कट्टरवादियों की नजर में अंग्रेजी ना जानने वाले लोग हंसोड़ और मजाक के साथ ही उपहास के ही पात्र बन गए। कहना ना होगा, फिल्मी दुनिया हो या फिर टेलीविजन का रूपहला संसार - वहां बिहार या उत्तर प्रदेश के लोग भदेस और देसज रूप में ही सामने आते रहे। बाद के दौर में भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच जब राजनीति विदूषक जैसी भूमिका में आ गई तो इस इलाके के लोग और भी ज्यादा मजाक और दया के पात्र बन गए। सही मायने में फिल्मी और टेलीविजन के पर्दे भी इसी दुनिया की ही कॉपी कर रहे थे।
यहीं पर याद आते हैं खुशवंत सिंह। भारतीय अंग्रेजी लेखन और पत्रकारिता में खुशवंत सिंह सम्मानित नाम है, लेकिन खांटी हिंदीभाषियों को उनकी कई टिप्पणियां चुभती रही हैं। हिंदी की दुनिया में भी सम्मान के साथ पढ़े जाने के बावजूद हिंदीवालों को लेकर उनके विचार आग्रही ही रहे हैं। एक बार उन्होंने हिंदी की संप्रेषणीयता पर यह कहते हुए सवाल उठाया था कि उसके पास रैट और माउस के लिए एक ही शब्द चूहा ही है। इसी तरह उनकी नजर में उत्तर भारतीयों ने चूंकि अंग्रेजी की पढ़ाई नहीं की – यही वजह है कि उन्हें ज्यादातर दरबान या चपरासी की नौकरियां ही करनी पड़ीं हैं। खुशवंत सिंह भी भारत के उसी अंग्रेजीदां तबके के ही प्रतिनिधि रहे हैं। जिनकी सोच हिंदीभाषियों और खासकर उत्तर भारतीयों को लेकर पूर्वाग्रही रही है।
हालांकि उत्तर भारत की तस्वीर का एक उजला पक्ष भी है। भदेसपन और देसज संस्कारों के साथ ही अंग्रेजी विरोध के चलते जो उत्तर भारत और बिहार कथित संभ्रांत भारतीयों के लिए आशंका की वजह रहे हैं, वहां पढ़ाई को लेकर भी खासतरह की भूख बढ़ी है। केंद्रीय सिविल सेवाओं के लिए यहां के छात्रों के उत्साह को देखिए कि ये परीक्षाएं आयोजित करने वाले संघ लोक सेवा आयोग की ही पिछले साल की एक रिपोर्ट बताती है कि 2015 तक देश के सभी तकरीबन छह सौ जिलों का डीएम या एसपी या फिर दोनों बिहारी ही होगा। इस बीच भदेसपन और जंगलराज का पर्याय रहे बिहार में भी बदलाव की बयार बह रही है। वहां भी सत्ता तंत्र को लेकर भरोसा बढ़ा है। हालांकि वह भरोसा भी अभी काफी नहीं है। लेकिन बदलाव की शुरूआत ने देश की सोच भी बदली है। लिहाजा अब बिहार और उत्तर प्रदेश के लोग भी सामाजिक और राजनीतिक विमर्श के केंद्र में हैं। उनकी चिंताओं और परेशानियों की ओर भी ध्यान जा रहा है। यही वजह है कि अब किसी चैनल का ध्यान तेरे मेरे सपने के जरिए अब खालिस उत्तर भारतीय गांवों के सपने बेचने का बहाना मिल गया है या फिर अगले जनम मोहें बिटिया ही कीजौ की लाली के बहाने बिहार की लड़कियों और जमींदारी प्रथा की कुरीतियों को बेचने का बाजार बनने लगा है।
यहां हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों को अपनी यूएसपी अपना देसज स्वरूप ही नजर आती रही है। उसी देसज से देश का संभ्रांत किस्म का इलाका परहेज करता रहा है। परहेज ही क्यों हंसी भी उड़ाता रहा है। फिल्म और टेलीविजन की दुनिया भी इसका अपवाद नहीं रही है। प्रकाश झा, शत्रुघ्न सिन्हा और आशुतोष राणा जैसे खांटी हिंदी और देसज पृष्ठभूमि वाले लोगों के फिल्मी दुनिया में आने के बावजूद भी मायानगरी के नजरिए में खास बदलाव नहीं आया। लेकिन अब इसे लेकर बदलाव नजर आ रहा है तो इसकी एक मात्र वजह सिर्फ सियासी परिवर्तन का चक्र ही नहीं है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हंसी का पात्र रहे इस देसज इलाके में भी बाजार ने नए तरह से पैठ बनाई है। निश्चित तौर पर इसमें सियासी बदलाव की बयार ने यहां की खुशहाली में अहम भूमिका निभाई है। इसके साथ ही पिछले दो दशक से यह इलाका जिस तरह केंद्रीय राजनीति में भूमिका नहीं निभा पा रहा था, उसमें भी बदलाव आ रहा है। अब यह इलाका एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक विमर्श की दुनिया में प्रभावी भूमिका निभाने की तैयारी में जुट गया है। इस इलाके के मानस में एक बदलाव ये भी आया है कि अब यह भूमिका खाली हाथ नहीं निभाई जाएगी, बल्कि इसकी कीमत भी वसूली जाएगी। जब समाज इस तरह उठ खड़ा होता है, उसे विमर्श के केंद्रों को भी उचित अहमियत देनी पड़ती है। कहना ना होगा- फिल्म और टेलीविजन की ये दुनिया भी वही कर रही है। इस समाज को सम्मानित कर रही है।

गुरुवार, 3 दिसंबर 2009

ह्वाइट हाउस में हिंदी का जयघोष


उमेश चतु्र्वेदी
हिंदुस्तानी महानगरीय उपेक्षाबोध के बीच लगातार ताकतवर बन रही हिंदी ने ह्वाइट हाउस तक में दस्तक दे दी है। इस दस्तक का जरिया हमारे अपने राजनेता या हिंदीभाषी हस्तीन नहीं बने हैं। दुनिया के सबसे बड़े सत्ता के केंद्र ह्वाइट हाउस में हिंदी का ये जयगान दुनिया के सबसे ताकतवर आदमी की जबान के जरिए हुआ है। ह्वाइट हाउस में भारतीय प्रधानमंत्री के सम्मान में दिए भोज में पहुंचे मनमोहन सिंह का ठेठ हिंदी में ही स्वागत किया। उन्होंने भले ही सिर्फ एक लाइन – आपका स्वागत है- बोलकर अमेरिकी धरती पर सिर्फ भारतीय प्रतिनिधिमंडल का दिल ही नहीं जीता है, बल्कि ये साफ संदेश दे दिया है कि हिंदी और उसे बोलने वाले करीब पचास करोड़ लोगों को लेकर उसका नजरिया कैसे बदल रहा है। अमेरिकी धरती पर हिंदुस्तानी लोगों की धमक को महसूस करने के बाद उनकी मातृभाषा को इस तरह सम्मानित करने का भले ही ये पहला मौका है, लेकिन इससे साफ है कि आने वाले दिनों में अमेरिकी राजनीति के लिए हिंदी और हिंदुस्तानी लोग कितनी अहम होने जा रही है।
बाजारवाद के बढ़ते दौर में भले ही हिंदी बाजार की एक बड़ी ताकत बन गई है। लेकिन यह भी सच है कि अब भी यह नीति नियंताओं और अभिजन समाज के नियमित विमर्श का जरिया नहीं बन पाई है। दूसरे देशों की कौन कहे, भारतीय अभिजन समाज और नीति नियंता अब तक अपनी सोच और विमर्श की भाषा के तौर पर हिंदी को सहजता से अपना नहीं पाए हैं। कहना ना होगा, उद्योग, समाज और राजनीति की दुनिया में नीतियों के प्रभावित करने वाला ये समाज ज्यादातर महानगरों में ही रहता है और उसकी दैनंदिन की भाषा वही अंग्रेजी है, जिसका अमेरिका और ब्रिटेन में सहज व्यवहार होता है। दरअसल हमारा आज जो अभिजन समाज है, उसके पैमाने अमेरिका और ब्रिटेन के सामाजिक चलन से ही प्रभावित होते हैं। यही वजह है कि रोजी और रोटी की भाषा के तौर पर हिंदी के बढ़ते कदम के बावजूद आज भी उसे लेकर महानगरों में एक उपेक्षाबोध बना हुआ है। कहना न होगा कि इस उपेक्षाबोध की शुरूआत उसी ब्रिटिश और अमेरिकी मानसिकता के ही जरिए हुई थी। ये बिडंबना ही है कि हिंदी को लेकर ये उपेक्षाबोध उसकी अपनी ही धरती पर बना हुआ है, लेकिन जहां से इस उपेक्षाबोध का बीज पनपा था, वहां की राजनीति इसे लेकर उदार होती नजर आ रही है।
ये सच है कि हिंदी को लेकर दुनिया की महाशक्ति का नजरिया बदल रहा है। इसके बावजूद उसने पिछले साल यानी 2008 में तीस सितंबर को अपनी रेडियो सेवा वॉयस ऑफ इंडिया की हिंदी सर्विस को बंद कर दिया। ये सच है कि वॉयस ऑफ अमेरिका की हिंदी सेवा भारत में बीबीसी की तरह लोकप्रिय नहीं रही है। इसके बावजूद उसे चाहने वालों की कमी नहीं रही है। यही वजह है कि तब हिंदी सर्विस की आवाज बंद होने की खबर ने हिंदी प्रेमियों के एक बड़े तबके में मायूसी भर दी थी। जॉर्ज बुश ने जाते-जाते हिंदुस्तानी लोगों को जोरदार झटका दिया था। लेकिन ओबामा का नजरिया बदला नजर आ रहा है। ऐसी खबर है कि ओबामा की सरकार एक बार फिर से हिंदी सेवा को शुरू करने जा रही है। ये सच है कि 54 साल पहले जब हिंदी सर्विस की शुरूआत हुई थी, तब शीतयुद्ध का जमाना था और इस सर्विस के जरिए अमेरिकी सरकार का उद्देश्य अपनी नीतियों को लेकर प्रोपेगंडा करना था। लेकिन 1990 में सोवियत संघ के बिखराव के बाद से शीतयुद्ध का दौर खत्म होता चला गया। इसी बीच भारत और अमेरिकी संबंधों ने नया इतिहास रच दिया। बुश के ही दौर में भारत और अमेरिका के बीच एटमी समझौता हुआ। इस समझौते के साथ ही हिंदी – अमेरिकी भाई-भाई की नई इबारत लिखी गई। लेकिन इसी बुश के लिए हिंदी सर्विस बेगानी होती चली गई। लेकिन अब अमेरिका का नजारा बदल रहा है। यही वजह है कि हिंदी सर्विस की शुरूआत की खबरें और ह्वाइट हाउस में हिंदी का जयगान को घोष तकरीबन साथ-साथ सुनाई पड़ा है।
वैसे हिंदी को लेकर महाशक्ति का नजारा यूं ही नहीं बदला है। साठ करोड़ के विशाल मध्य वर्ग के सहारे भारत दुनिया के लिए बड़ा बाजार बनता नजर आ रहा है। वैश्विक आर्थिक मंदी के इस दौर में भी टिके रहकर भारतीय अर्थव्यवस्था ने साबित कर दिया है कि अमेरिकी बाजारवाद के दौर में भी उसमें काफी दमखम है। यही वजह है कि दुनिया के सबसे ताकतवर सत्ता केंद्र की नजर में ना सिर्फ हिंदुस्तानी लोग, बल्कि उसकी भाषा सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी है। दुनिया की सबसे बड़ी ताकत जानती है कि भारतीय भूमि पर अंग्रेजी भले ही विमर्श की आज भी मजबूत भाषा बनी हुई है। लेकिन ये सच है कि आम लोगों से सहज संवाद और उन तक अपनी बात पहुंचाने का जरिया हिंदी ही बन सकती है। करीब पचास करोड़ लोगों का दिल अंग्रेजी की बजाय हिंदी के जरिए ही जीता जा सकता है। उसे ये भी पता है कि बाजार आज हिंदी की इस ताकत को पहचान गया है और उसका मौका-बेमौका इस्तेमाल भी कर रहा है। इसी हफ्ते आई एक खबर ने विकसित सरजमीं पर हिंदी की बढ़ती पहुंच और पकड़ को ही जाहिर किया है। ग्लोबल लैंग्वेज मॉनिटर (जीएलएम) के मुताबिक ऑस्कर विजेता फिल्म 'स्लमडॉग मिलिनेयर' के एक गीत के बोल में शामिल जुमला 'जय हो' दुनिया के सर्वाधिक लोकप्रिय शब्दों की लिस्ट में 16वें नंबर पर आ गया है। जबकि हिंदी फिल्मों के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द 'बॉलिवुड' 17वें पायदान पर है। साफ है कि हिंदी को लेकर विकसित दुनिया के आम मानस का भी नजारा बदल रहा है। ऐसे में दुनिया का सबसे बड़ा सत्ता केंद्र मनमोहन सिंह का हिंदी में स्वागत करके दरअसल विकसित दुनिया में हिंदी को लेकर आए बदलाव को ही रेखांकित कर रहा है।
ह्वाइट हाउस तक हिंदी ने दस्तक दे दी है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या विकास और ताकत के साथ ही सभ्यता और सलीके के लिए अमेरिका को अपना पैमाना बना चुके भारतीय महानगरीय मानस को हिंदी का ये जयघोष झकझोर पाएगा ।