गुरुवार, 31 जनवरी 2008

अंग्रेजी की एक हकीकत

उमेश चतुर्वेदी
मेरे एक जानकार इन दिनों जर्मनी में जाकर भी परेशान हैं। आप सवाल पूछेंगे कि आखिर क्या वजह रही कि जर्मनी जाकर भी वे हलकान हुए जा रहे हैं। ये सवाल इसलिए भी मौजूं हैं कि क्यों बदलती दुनिया में आज हर किसी का मकसद यूरोप और अमेरिका जाना और वहां छोटा-मोटा ही सही, नौकरी करना हो गया है। यूरो और डालर की चमक के इस दौर में इन्हें कमाना आज दुनिया की सबसे बड़ी इच्छा हो गई है। ऐसे में हमारे जानकार को जर्मनी जाकर ही खुश हो जाना चाहिए था- लेकिन वे खासे परेशान हैं तो सवाल उठेगा ही।
इस सवाल का जवाब जानने-समझने से पहले उनके जर्मनी जाने की पृष्ठभूमि भी समझ लेनी चाहिए। मेरे मित्र को इंटरनेट पर चैटिंग करते हुए एक जर्मन लड़की से प्रेम हो गया। मैक्समूलर की धरती की बेटी को भी भारत और इसकी अध्यात्मिक दुनिया को जानने-समझने में जबर्दस्त दिलचस्पी थी-लिहाजा उसे भी भारत का देसी छोरा पसंद आ गया और बात इतनी आगे बढ़ी कि अंजाम शादी तक पहुंच गया। हालांकि लड़की की दिलचस्पी भारत में रहने और यहां की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दुनिया में खुद को डूबा लेने की थी। लेकिन शादी के बाद उसे पता चला कि पति महोदय की दिलचस्पी तो जर्मनी जाकर यूरो कमाने में है। तो लड़की ने भी ठेठ भारतीय लड़की की तरह पति की ही इच्छा को अपनी इच्छा मानकर पति के साथ जर्मनी लौट गई। जर्मनी जाने के बाद हमारे जानकार की जिंदगी कुछ दिनों तक तो बेहतर रही-लेकिन ऐसा कब तक चलता?तो जब मधुयामिनी का वक्त बीता, हमारे जानकार महोदय को जीविका,नौकरी और यूरो की चिंता समाने लगी और शुरु हुआ जर्मनी में नौकरी ढूंढ़ने की जमीनी कोशिश। जानकार महोदय अच्छी-खासी अंग्रेजी जानते हैं। भारत में अच्छे कहे जाने वाले स्कूलों में उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई है,इसलिए उन्हें भरोसा था कि उन्हें नौकरी मिल ही जाएगी। लेकिन उनकी कोशिश कुछ वैसी ही होती गई-जैसे भारत में बेरोजगारों को नौकरी खोजते वक्त होती है।
दरअसल जर्मनी में नौकरी पाने के लिए अंग्रेजी से ज्यादा जर्मन जानना ज्यादा जरूरी है। जानकार महोदय जर्मन नहीं जानते-लिहाजा उन्हें नौकरी मिलने में दिक्कतें हो रही हैं। यही वह वजह है कि जानकार महोदय विदेश की चमकीली और सुनहली जमीन पर भी हलकान हुए जा रहे हैं।
अमेरिकी मॉडल की अर्थव्यवस्था लागू होने के बाद से अपने देश में अंग्रेजी का बोलबाला और तेजी से बढ़ा है। इसके साथ ही ये भी मान लिया गया कि पूरी दुनिया में सफलता सिर्फ और सिर्फ अंग्रेजी के जरिए ही हासिल की जा सकती है। हमारे जानकार महोदय भी ऐसी ही मानसिकता को लेकर जर्मनी की जमीन पर पहुंचे थे। लेकिन उनकी इस मानसिकता को चोट पहुंची वहीं पहुंचकर। सिर्फ जर्मनी ही नही, दुनिया के तमाम देश ऐसे हैं-जहां अंग्रेजी के बल पर सामान्य कामकाज भी नहीं निबटाया जा सकता। अभी हाल ही में क्वात्रोक्की का मामला एक बार फिर उछला था। क्वात्रोक्की अर्जेंटीना में है। जिसके प्रत्यर्पण के लिए सीबीआई टीम पहुंची तो वहां की स्थानीय भाषा न जानने के कारण उसे कई तरह की परेशानियां झेलनी पड़ीं। क्वात्रोक्की के सीबीआई के हाथ से फिसल जाने के कारणों की पड़ताल के साथ ही इस तथ्य की भी जमकर चर्चा हुई थी। फ्रांस के लोगों को तो अंग्रेजी बोलने से भी परहेज रहता है। ये तो बात जगजाहिर है। लेकिन फ्रांस और जर्मनी भी आर्थिक मोर्चे पर अमेरिका को टक्कर दे रहे हैं।
दुर्भाग्य की बात ये है कि नए आर्थिक उदारीकरण के इस दौर में मीÊडया भी ऐसी खबरों को कोई प्रमुखता नहीं दे रहा। चाहे भाषाई मीÊडया हो या फिर कथित मुख्यधारा का अंग्रेजी मीडिया-उसके लिए इन खबरों का कोई मतलब नहीं रह गया है। इसका एक असर ये हो रहा है कि फ्रांस और जर्मनी के भी सपने लोग अंग्रेजी के जरिए देखने लगे हैं और वहां जाकर हमारे जानकार की तरह परेशान घूमने या फिर छोटी-मोटी नौकरियां करने को मजबूर हो गए हैं।

सोमवार, 28 जनवरी 2008

पत्रकारिता के किंतु - परंतु

ये लेख भारतीय जनसंचार संस्थान की त्रैमासिक पत्रिका संचार माध्यम के जुलाई-सितंबर 2005 के अंक में प्रकाशित हो चुका है। अंक देर से प्रकाशित हुआ है।
उमेश चतुर्वेदी
बीसवीं सदी के आखिरी वर्षों में समाचार माध्यमों में जो इलेक्ट्रॉनिक क्रांति हुई, उससे अखबारों की दुनिया के सिकुड़ने की आशंका जताई जाने लगी थी। लेकिन अखबारों का विस्तार हुआ, ना सिर्फ बढ़े, बल्कि उनकी बढ़त क्रांतिकारी रही। हिंदी के दो अखबारों – दैनिक जागरण और दैनिक भास्कर की क्रांतिकारी प्रसार संख्या इसकी गवाह है। दोनों ही अखबारों का दावा डेढ़ करोड़ पाठक होने का है। दोनों के बिक्री के आंकड़े दस लाख की संख्या को पार कर गए हैं। गाय और गोबर पट्टी के तौर पर देशभर में उपहास का पात्र रहे हिंदी इलाके में अकेले इन्हीं दो अखबारों का दस लाख की प्रसार संख्या का पार कर जाना, इस बात का गवाह है कि छपे हुए शब्दों के प्रति गाय और गोबर पट्टी का रवैया तेजी से बदला है। इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों के वर्चस्व के दौर में भी छपे शब्दों की ताकत और उनके प्रति लोगों में कितनी आस्था है- इसका अंदाजा आए दिन अखबारों के दफ्तरों में आने वाले दुखी-पीड़ित लोगों को देखकर लगाया जा सकता है। उन्हें लगता है कि उनके दुख, उनकी पीड़ाएं और उनके साथ हुए अन्याय को अखबार का स्वर मिला तो उनकी समस्या छू-मंतर हो जाएगी। लेकिन सवाल उठता है कि क्या अखबार अब भी अपने इस दायित्व का उतनी ही शिद्दत से निर्वाह कर रहे हैं ?
इस सवाल का जवाब ढूंढ़ने से पहले याद आते हैं हिंदी के संपादकाचार्य बाबू राव विष्णुराव पराड़कर के करीब छह दशक पहले कहे गए कुछ शब्द ... पत्र निकालकर सफलतापूर्वक चलाना बड़े-बड़े धनियों अथवा सुसंघटित कंपनियों के लिए ही संभव होगा। पत्र सर्वांग सुंदर होंगे। छपाई अच्छी होगी, मनोहर,मनोरंजक और ज्ञानवर्द्धक चित्रों से सुसज्जित होंगे। लेखों में विविधता होगी,कल्पकता होगी, गंभीर गवेषणा की झलक होगी,ग्राहकों की संख्या लाखों में गिनी जाएगी। यह सब कुछ होगा पर पत्र प्राणहीन होंगे।.....उनकी ये बात आज अक्षरश: साबित हो रही है। अखबारों के अब तक तीन काम गिनाए जाते रहे हैं। मीडिया संस्थानों के विद्यार्थी इसका रट्टा मारते रहे हैं। ये काम है – सूचना देना, शिक्षा देना और मनोरंजन करना। लेकिन मनमोहनी अर्थव्यवस्था ने जैसे-जैसे इस भारतभूमि में अपने पांव पसारे – अखबारों ने अपने इन तीनों भूमिकाओं में कटौती शुरू कर दी। कुछ लोग एतराज के तौर पर कह सकते हैं कि अखबार सूचना देने का काम तो करते ही रहते हैं। इस पर चर्चा बाद में ...सबसे पहले बात करते हैं मनोरंजन की। हिंदी अखबारों के चकमक रंगीन पृष्ठों पर आजकल खबरें लगातार कम होती जा रही हैं। बल्कि इन पृष्ठों पर अब प्यार करने की विधियों से लेकर कॉलेज में लड़का या लड़की पटाने तक सजीव तरीका बताया जा रहा है। ये काम वे संपादक भी बदस्तूर जारी रखे हुए हैं – जिनसे हिंदी समाज को कहीं ज्यादा अपेक्षाएं थीं। संपादक महोदय खुद हिंदी के गरिष्ठ- क्लिष्ट लेखों से अपने पाठकों को बोर कर रहे हैं या अपने अखबारी जीवन को समृद्ध कर रहे हैं- ये तो शोध का विषय है। लेकिन सरसरी तौर पर जो परिलक्षित हो रहा है – उसकें युवा पाठकों की पसंद के नाम पर वो सब कुछ परोसा जा रहा है। जिसे बाजारी व्यवस्था वाले खुले समाज की इकाई परिवारों तक ने अभी तक नहीं आजमाया है।
विकसित देशों की पेज थ्री पत्रकारिता को अंग्रेजी अखबारों ने करीब छह- सात साल पहले जब अपनाया था, तब हिंदी अखबारों ने इस चलन को लेकर खूब नाक-भौं सिकोड़ा था। इन पृष्ठों पर दलाली और दूसरे दोयम तरीके से समाज में बेहतर आर्थिक हैसियत हासिल कर चुके राजनेताओं के एक लिजलिजे वर्ग ने कब्जा जमाना शुरू किया तो अंग्रेजी अखबारों ने इसे हाथोंहाथ लिया। इस पेज थ्री पत्रकारिता की सहायता से कई लोगों ने अपनी राजनीतिक हैसियत में और इजाफा कर लिया है। ऐसे में इसका असर पेज थ्री पत्रकारिता पर नहीं पड़ता, ऐसा कैसे हो सकता था। इन पृष्ठों पर प्रकाशित होने वाले छपास रोगी राजनेताओं,पत्रकारिता से इतर कर्म करने के बावजूद पत्रकारिता करने के बावजूद पत्रकार कहलाने वाले कथित पत्रकार, सोशलाइट और नवधनाढ्यों ने इन पृष्ठों का रसूख बढ़ाने में भरपूर कोशिश की। हर बार छपने पर उनका समाज सेवा और क्रांति करने का दावा रहा। लेकिन हकीकत में इन पृष्ठों पर प्रकाशित होने वाली हस्तियों की प्रतिबद्धता किसके प्रति है – ये हाल के दिनों में पूरी शिद्दत से जाहिर हुआ है। बीना रमानी के उदाहरण से इसे समझा जा सकता है। पेज थ्री पर छाई रहने वाली इस सोशलाइट के टर्मरिंड कोर्ट में तीस अप्रैल 1999 को उसके ही सामने उसकी ही कर्मचारी जेसिका लाल की हत्या हुई। हत्या भी पेज थ्री पर ही छाए रहने वाले मनु शर्मा नामक एक रसूखदार रईसजादे ने की। लेकिन कहां तक बीना अपने सार्वजनिक चेहरे के मुताबिक हत्यारे के खिलाफ उठ खड़ी होती – तो उल्टे वह हत्यारे को बचाने में ही जुट गई।
पेज थ्री पर साया होने वाली हस्तियों को मीडिया जमकर स्पेस देता रहा है। लेकिन इनमें से ज्यादातर के लिए सार्वजनिक भूमिका का कोई मतलब नहीं है। हालांकि अंग्रेजी अखबारों ने इन हस्तियों को साया करने और अहमियत देने की प्रवृत्ति के बावजूद पेज थ्री से असल पत्रकारिता की दूरी बचाए रखी। लेकिन यहीं पर हिंदी अखबारों की भूमिका गड्ड-मड्ड नजर आई। पेज थ्री को देर से ही सही हिंदी अखबारों ने भी आत्मसात कर लिया, लेकिन अंग्रेजी अखबारों की तरह वे पेज थ्री और थोड़ी-बहुत बची असल पत्रकारिता के बीच दूरी बनाकर नहीं रख सके। हिंदी अखबारों में पेज थ्री वाले राजनेता मुख्य पृष्ठ पर भी भरपूर जगह हासिल करते रहे। उन्हें रातोंरात महान नेता बनाने में भी आज की पत्रकारिता कोई कसर नहीं छोड़ती। लेकिन जब यही राजनेता किसी स्टिंग ऑपरेशन या घोटाले में फंस जाता है तो अखबारों की बेचारगी साफतौर पर नजर आने लगती है। यहां ऐसी घटनाओं और उनसे जुड़े राजनेताओं का नाम लेना उचित नहीं होगा। लेकिन एक बात गौर करने की है कि ऐसे में मुद्दा आधारित पत्रकारिता करने वाले लोगों को किनारे लगाने की प्रवृत्ति भी बढ़ती जा रही है और इसमें पेज थ्री वाले राजनेता भी सफल कोशिश करने से नहीं चूक रहे। दिलचस्प बात ये है कि अखबार प्रबंधन भी ऐसे लोगों की बीट बदलने और उनका ट्रांसफर करने से नहीं चूकता। अपने करीब चौदह साल के पत्रकारीय जीवन में इन पंक्तियों के लेखक ने भी कई बार ऐसे वाकये देखे-भुगते हैं। इसका सबसे बदतर असर पत्रकारिता के स्तर और जनपक्षधरता पर पड़ रहा है। इसका सबसे बेहतर उदाहरण है 2004 का लोकसभा चुनाव। तब के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और उनकी सरकार को पूरा देश चमकता हुआ ही नजर आ रहा था। एनडीए सरकार जैसे-जैसे देश को चमकता हुआ दिखा रही थी, अखबार-खासतौर पर हिंदी अखबार एनडीए से भी कहीं ज्यादा देश को चमकता हुआ दिखा रहे थे। किसी ने ये पड़ताल करने की कोशिश नहीं की कि खुशहाल रहे पंजाब और विदर्भ में किसान लगातार आत्महत्याएं कर रहे हैं-इसके बावजूद देश कैसे चमक रहा है ? उत्तर प्रदेश में सड़कों पर गड्ढे भरे पड़े हैं और अंधेरे में डूबा है, आंध्र में भी आत्महत्याओं और भुखमरी का दौर जारी है। इसके बावजूद देश कैसे चमक रहा है। यहां ये सवाल उठता है कि क्या अखबार अपने पहले दायित्व – तथ्यात्मक सूचना देने का सही मायने में निर्वाह कर रहे थे। इसका जवाब 2004 के लोकसभा चुनाव के नतीजों ने ही दिया। एनडीए को जीतते दिखा रहे अखबारों की भविष्यवाणी और आकलन गलत साबित हुआ, एनडीए की हार हुई। लेकिन निर्लज्ज अखबार उतनी ही तेजी से यूपीए के गुणगान में जुट गए। उन्हें एनडीए बुराइयों का पुलिंदा नजर आने लगा। इससे हिंदी अखबारों के बौद्धिक दिवालिएपन का आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है।
जहां तक सूचना देने की बात है तो आज कितने अखबार हैं , जो सही मायने में सूचनाएं दे रहे हैं। अपने निहित राजनीतिक स्वार्थों और तात्कालिक फायदे के लिए अखबार अपना चोला बदलने से नहीं चूक रहे। एनडीए की तर्ज पर एक और बड़े अखबार को हरियाणा की चौटाला सरकार में 2005 में कोई गलती नजर नहीं आ रही थी। लेकिन इसी साल हुए विधानसभा चुनावों में चौटाला की पार्टी पूरी तरह साफ हो गई। दरअसल अखबारों में वस्तुनिष्ठता के आधार पर सरकारों के कामकाज के विवेचन की समृद्ध परंपरा लगातार खत्म होती जा रही है। इसलिए छपे शब्दों की महिमा भी लगातार कम हुई है। इसका दर्शन-श्रवण पान-चाय की दुकानों, लोकल ट्रेनों और बस यात्रा में सामान्य लोगों की आपसी चर्चा में किया जा सकता है। अखबारों को ये भ्रम है कि वे जो कहते-छापते हैं, जनता आंखमूंदकर उस पर भरोसा कर लेती है। राजनेता भी कुछ ऐसा ही समझते हैं। इसीलिए वे अखबारों का अपने पक्ष में मनचाहा छपवाने की हरदम कोशिश करते रहते हैं। लेकिन आज की जनता बदल चुकी है। उसे पता है कि कौन अखबार कांग्रेस का समर्थक है और किसकी सहानुभूति वामपंथी विचारधारा से है। काश ! अखबारी दुनिया के आका इसे जानने-समझने की कोशिश करते।
लेकिन सच ये भी है कि मिशनरी पत्रकारिता करने वालों की एक टुकड़ी अब भी शब्दों की दुनिया का संस्कार करने और प्रतिष्ठा बचाने की कोशिशों में चुपचाप जुटी हुई है। लेकिन उनकी हालत बत्तीस दांतों के बीच जीभ की तरह है। चूंकि पत्रकारिता में तेवर का जमाना नहीं रहा – लिहाजा ऐसे लोग हाशिए पर हैं। नीति-निर्धारण करने वाली स्थितियों में इनकी संख्या कम ही है। इसका खामियाजा आज हाशिए पर पड़े लोग भुगत रहे हैं। जब पत्रकारिता में तेवर को मान्यता थी – तब मिशनरी लोगों ने ही पत्रकारिता के मानदंड स्थापित किए थे। आज अगर ये अखबारी संस्थानों में बचे –बने हुए हैं तो इसलिए नहीं कि आज की नियंता पीढ़ी ने उन पर कोई कृपा की है। बल्कि अखबार निकालने और बचाने की कला दुर्भाग्यवश मीडियाकर लोगों की बजाय इन मिशनरी लोगों को ही आती है।
भारत में पत्रकारिता की नींव तेवर और विरोध के स्वरों के साथ ही पड़ी थी। जेम्स हिक्की का ‘बंगाल गडट एंड जनरल एडवर्टाइजर ’ भले ही एक अंग्रेज का अखबार था। लेकिन हिक्की का उद्देश्य अंग्रेजी सरकार का गुणगान करना नहीं था – बल्कि सरकार और प्रशासन में मौजूद घूसखोरी और विलासिता को उजागर करना और उसके लिए विरोधी मानस तैयार करना था। इसकी हिक्की को कीमत भी चुकानी पड़ी। इस पत्रकारिता की रक्त-अस्थि-मांस-मज्जा आजादी के आंदोलन की कोख में बनी थी। सही मायने में इसी दौर में भारतीय पत्रकारिता ने आकार ग्रहण किया। कहना ना होगा- उस आंदोलन के आदर्श और उसकी आंच वर्षों तक भारतीय पत्रकारिता की प्रेरणास्रोत बनी रही। खासकर भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता ने आजादी के आंदोलन के मूल्यों में ही अपना अस्तित्व खोजा और पाया है। यह भी सच है कि बाजारवाद के दौर में पत्रकारिता ने बाजारवादी लटके-झटके भी अख्तियार कर लिए हैं। लेकिन वह अभी भी आजादी के आंदोलन की स्वर्णिम स्मृतियों से मुक्त नहीं हो पाई है और शायद ही कभी मुक्त हो। यही वजह है कि बाजारवाद के मूल्यों को आंशिक या पूरी भारतीय पत्रकारिता का अब भी आजादी के मूल्यों पर चलने का दिखावा भी उसकी मजबूरी है। समीर जैन के अलावा डंके की चोट पर अपने अखबार या पत्रिका को महज एक उत्पाद कहने वाले मालिक-प्रकाशक कम ही हैं। ऐसे दिखावे में मिशनरी लोग ही मददगार हो सकते हैं। लिहाजा उन्हें अखबार प्रबंधन आज भी ढो रहा है। (ये शब्द भी प्रबंधन के शब्दकोश से लिए गए हैं। )
आमजन की आवाज और उनके अभावों को सुर्खियां बनाने की मांग मिशनरी लोग तकरीबन रोज ही करते हैं। लेकिन महान दार्शनिक इमैनुअल कांट के कार्य-कारण सिद्धांत के तहत ऐसी खबरें सुर्खियां तभी हासिल कर पाती हैं – जब ऐसी खबरों से कोई राजनीतिक दल या समूह फायदा पाने की कोशिश करता है। जाहिर है – ऐसे हालात में आम आदमी की स्थिति प्रयोगशाला के ‘गिनीपिग’ से ज्यादा नहीं रह जाती। यानी आम व्यक्ति और उसके अभाव, उसकी दुश्चिंताएं सभी अवसरवादी राजनीति के उपादान बन जाते हैं। कहना न होगा इसके मंच बनते हैं अखबार। अखबारों की इन सुर्खियों के पीछे की हकीकत और राजनीति को जब तक आम पाठक समझ पाते हैं – तब तक देर हो चुकी होती है।
तो क्या हमें ये मान लेना चाहिए कि अखबारी दुनिया में भरोसे के लिए कुछ भी नहीं बचा है। गणित के सवाल की तरह इसका जवाब पूरी तरह ना तो ‘ना’ में हो सकता है और ना ही पूरी तरह से ‘हां’ में।

शनिवार, 26 जनवरी 2008

ये कैसा मीडिया !

उमेश चतुर्वेदी
गुजरात के हालिया विधानसभा चुनाव में एक बड़ी पार्टी के बड़े नेता को भी जिम्मेदारी दी गई थी। अपनी पार्टी के प्रचार में उन्होंने गुजरात के जिले-जिले का दौरा किया था। इस दौरान उन्हें जो अनुभव हुआ- वह चौंकाने वाला था। उन्होंने हैरतभरे लहजे में बताया कि हर जिले में उनकी प्रेस कांफ्रेंस को कवर करने के लिए भारी संख्या में पत्रकार आते थे। उन्हें गौर से सुना भी जाता था, सवाल-जवाब भी खूब होते। लेकिन प्रेस कांफ्रेंस खत्म होने के बाद उनसे घुमा - फिराकर सवाल पूछा जाता, उनके अखबार या फिर पत्रिका को वे कितनी रकम देंगे। दिल्ली में अपना अधिकांश वक्त बड़े पत्रकारों और समाचार पत्रों के मालिकों के साथ गुजारने वाले एक बड़ी पार्टी के प्रवक्ता के लिए पत्रकारों द्वारा पैसा मांगे जाने का ये अनुभव पहला था। मजे की बात ये है कि पूरे गुजरात में उनसे ऐसे सवाल किए गए- ऐसी अपेक्षाएं पाली गईं। ये बात और है कि उन्होंने किसी को पैसा नहीं दिया। दिल्ली लौटकर ये अनुभव साझा करते वक्त भी उनका आश्चर्य कम नहीं हुआ था। उन्हें लगा कि ऐसा पहली बार हुआ। ये बताते वक्त वे ये भी बताना नहीं भूले कि जब उन्होंने इसके लिए तहकीकात किया तो पता चला कि हर पत्रकार का अखबारों ने लक्ष्य तय कर दिया था। कई बार ये भी हुआ था कि अखबार ने अपनी जिला यूनिट को भी टारगेट दिया था।
उस पार्टी प्रवक्ता के लिए ये भले ही पहला अनुभव हो – लेकिन ये खेल बहुत पहले से चल रहा है। पत्रकारिता की दुनिया में आने वाले शावक पत्रकारों को पहले ही समझा दिया जाता था कि चुनाव अखबारों के लिए उत्सव के समान होते हैं। लेकिन ये बातें सिर्फ कंटेंट के स्तर पर होती थीं। तब अखबारों में होड़ रहती थी कि कौन कितनी ज्यादा कवरेज करता है। पत्रकारों की कोशिश रहती थी कि वे ये साबित कर सकें कि जनता की नब्ज उन्होंने सबसे गहराई से पकड़ा। लेकिन उदारीकरण की हवा में अब ये सब अब बीते दिनों की बातें होती जा रही हैं। ऐसा नहीं कि चुनाव में पहली बार पैसा खाने की बात सामने आ रही है। पहले भी ऐसा होता रहा है। लेकिन कम से कम सीधे-सीधे पैसे मांगने की हिम्मत विरले पत्रकार ही करते रहे हैं। वैसे दिल्ली की 1998 के विधानसभा चुनाव में एक बड़े नेता से एक पत्रकार ने सीधे-सीधे पैसे मांगने की जुर्रत की थी। जिसकी शिकायत उस बड़े नेता ने उस पत्रकार के दफ्तर को कर दी थी। पत्रकारिता जगत में ये चर्चा तब छाई रही थी। लेकिन तब भी ये चलन नहीं बन पाया था। लेकिन अब ये संस्थानिक दर्जा हासिल कर चुका है।
हिंदी में पहली बार मध्य भारत के एक अखबार ने 1999 के आम चुनाव से शुरू किया था। उसने अपनी सभी यूनिटों के लिए उसकी क्षमता के मुताबिक लक्ष्य तय कर दिया था। उम्मीदवारों के बारे में खबरें छापने के लिए उनकी यूनिटों ने पैसे तय कर दिए थे। तब उस अखबार के इलाके में इसकी आलोचना हुई थी। तब अखबार की दलील थी कि जब चुनाव लड़ने वाले नेता से पत्रकार पैसे खाने की कोशिश करते हैं तो अखबार ही सीधे-सीधे क्यों न पैसे लें। तब इस चलन पर नाक-भौं सिकोड़ने वाले अखबार भी देर-सवेर नैतिकता के इस उहापोह से निकल गए। 2004 के आम चुनावों और 2003 के विधानसभा चुनावों में इस प्रवृत्ति को कुछ – एक बड़े अखबारों को छोड़कर – संस्थानिक दर्जा मिलने लगा था। पिछले साल उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भी अखबारों ने ऐसा किया।
ऐसा नहीं कि पहले पैसे लेकर खबरें नहीं प्रकाशित की जाती थीं। लेकिन तब अखबार या पत्रिका पत्रकारिता के नैतिक दबावों के चलते कहीं कोने में ये जरूर छाप देते थे – ये एडवर्टोरियल है। लेकिन उदारीकरण की आंधी में एडवर्टोरियल लिखने- बताने का नैतिक दबाव भी नहीं रहा। इसके लिए अब तो बाकायदा विज्ञापन के तौर पर पैसे कमाने वाली यूनिटों को बाकायदा कमीशन भी देते हैं। ये जानकारी लेनी है तो इन अखबारों के दफ्तरों में काम करने वाले पत्रकारों से संपर्क किया जा सकता है।
मीडिया का काम सही खबरें लोगों तक पहुंचाना है। सही मायने में न्यूज बिजनेस की जो अवधारणा है – उसमें मौजूदा चलन की कोई जगह नहीं है। सवाल ये उठता है कि जब अपने लक्ष्य के मुताबिक पैसा जुटाने के लिए पत्रकार पर दबाव होगा तो वह कैसे निष्पक्ष खबरें दे पाएगा। इसका जवाब देर-सवेर प्रिंट मीडिया को ही ढूंढ़ना होगा। आजकल एक चलन ने जोर पकड़ लिया है – टेलीविजन पत्रकारिता को कटघरे में खड़ा करना। लेकिन प्रिंट माध्यम में ये जो बदलाव आता जा रहा है – उस पर विचार करने की जहमत नहीं उठाई जा रही। माना टेलीविजन चैनल पत्रकारिता नहीं कर रहे हैं – लेकिन प्रिंट माध्यमों की इस पत्रकारिता को सही कैसे ठहराया जाएगा। इस सवाल का जवाब फिलहाल उस राष्ट्रीय पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता भी ढूंढ़ रहे हैं। लेकिन अभी तक उन्हें कोई जवाब नहीं सूझ पाया है।

स्टिंग का खेल और टीवी पत्रकारिता

गीता
1991 में जब उदारीकरण की बयार इस देश में बहाए जाने की तैयारी थी- तब उसके विरोधियों का एक तर्क ये भी था कि उदारीकरण की बयार देश की संस्कृति और परंपरा पर भी असर डालेगी। कहना ना होगा कि पत्रकारिता पर भी इसका खासा असर देखने को मिल रहा है। झटपट चर्चित ओने और पैसा कमाने का मोह आज पत्रकारिता पर भी हावी हो गया है। चूंकि भारत में टेलीविजन पत्रकारिता चूंकि इसी दौर में पनपी है- इसलिए भौतिकवादी जीवनधारा (मैटरलिस्टिक लाइफ स्टाइल) पर इसका कुछ ज्यादा ही असर दिख रहा है। स्टिंग पत्रकारिता भी इसी की एक कड़ी है।
पिछले दिनों दो स्टिंग मीडिया में बेहद चर्चित रहे। पहला स्टिंग रहा - जनमत के परिवर्तित नाम वाले चैनल इंडिया लाइव का- जिसके असर से एक अच्छी-भली अध्यापिका की जिंदगी सूली पर चढ़ गई। उमा खुराना स्कूली छात्राओं से वेश्यावृत्ति नहीं कराती थी- पुलिस जांच से ये साबित भी हो गया है। लेकिन एक चैनल ने सनसनी बटोरने के लिए ये पड़ताल करना जरूरी नहीं समझा कि स्टिंग की हकीकत क्या है। यहीं पर अनुभव की बात आती है। इस चैनल के युवा कर्ताधर्ताओं को सनसनी चाहिए थी और उनकी इस चाहत का ही फायदा उठाया नए पत्रकार प्रकाश ने। मजे की बात ये है कि इसमें स्कूली छात्रा की भूमिका निभाने वाली भी लड़की पत्रकार रही है। सनसनी और पैसे कमाने की चाहत ने साध्य की पवित्रता का कोई खयाल नहीं रखा और उमा खुराना को सूली पर चढ़ाने में कोई कसर नहीं रखी गई। जब तक टेलीविजन नहीं थे- सिर्फ अखबारी दुनिया थी- तब पत्रकारों के बीच एक कहावत प्रचलित थी- नो न्यूज इज बेटर न्यूज यानी खबर का ना होना बेहतर खबर है। लेकिन आज के पत्रकार के पत्रकारीय मुंह को खबरों का खून लग गया है। ऐसे में नो न्यूज की चिंता ही उसे खाए डालती है। उदारीकरण की कोख से निकले टेलीविजन पत्रकारों को ये खून कुछ ज्यादा ही लग गया है। इसी का असर है कि किसी शिक्षिका को भी बदनाम करने के पहले सोचा नहीं जाता और दंगे हो जाते हैं। वैसे भी इंडिया लाइव के जो कर्ताधर्ता हैं- उनका वैसे भी कोई साफ पत्रकारीय रिकॉर्ड नहीं रहा है। ऐसे में ये कहना कि प्रकाश ने उसे झांसे में रखा- सहज भरोसेमंद नहीं है। सच तो ये है कि आज के दौर में पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखने वाले हर नौजवान की एक ही पसंद है- टेलीविजन के पर्दे पर छा जाना। एक-दो नौजवान ही मिलते हैं- जिनकी दिलचस्पी सोच-विचार वाले माध्यम अखबार और पत्रिका में काम करने में होती है। असलियत तो ये है कि उमा खुराना का स्टिंग करने वाला प्रकाश पहले आईबीएन सेवेन नाम के नवेले हिंदी चैनल में इंटर्नशिप कर रहा था और उसे इस स्टिंग के सहारे बुद्धू बक्से वाले पत्रकारिता पर छा जाने की उम्मीद थी। लेकिन जब उसका मकसद आईबीएन में साबित होता नहीं दिखा तो वह इंडिया लाइव में आ गया। उसका ऑपरेशन सफल भी रहा- रातोंरात इंडिया लाइव छा भी गया- उसके कर्ताधर्ताओं के फोटो और इंटरव्यू अखबारों में चस्पा होने लगे। लेकिन पुलिस की जांच ने उनके सारे गुब्बारे की हवा निकाल दी।
दूसरा स्टिंग भी इसी तरह का रहा। झारखंड के सांसद रामेश्वर उरांव को फर्जी पत्रकारों की एक टीम ने फंसाने की कोशिश की। लेकिन आज का हर राजनेता बंगारू लक्ष्मण नहीं रहा। अब राजनेता भी सतर्क हो गए हैं। उरांव भी सावधान थे तो उन्होंने पुलिस ही बुला ली और तीन फर्जी पत्रकार -दूसरे शब्दों में कहें तो स्टिंगबाज धरे गए। जब पुलिस ने उनसे पूछताछ की तो उन्होंने एक-दो चैनलों को छोड़कर तकरीबन सभी बड़े दबंग स्टिंग और खोजी संपादकों का नाम ले डाला। उनका कहना था कि उन्होंने सबसे तेज से लेकर सबसे आक्रामक चैनल के खोजी संपादकों के लिए स्टिंग किए हैं। जब उन्होंने पुलिस को ये बयान दिए तो संबंधित संपादकों के हाथों से तोते उड़ते नजर आए। फिर शुरू हुआ आननफानन में हर एक चैनलों को फोन करके ये खबर न चलाने की गुजारिश का खेल। इसमें उनकी बदनामी जो होनी थी। ऐसा हुआ भी। अपनी बिरादरी का पत्रकारों ने खयाल रखा भी। लेकिन इससे एक सवाल तो उठ खड़ा हुआ ही कि आखिर टेलीविजन के पर्दे पर क्या किया जा रहा है। वैसे भी जिस जनता के नाम पर खबरों का खेल दिखाया जाता है- वह जनता भी अब चैनलों के इस खेल का रस लेकर आनंद उठाने लगी है। इसका असर है कि आज टेलीविजन को खबरों के लिए नहीं- बकवासबाजी का आनंद उठाने के लिए देखा जा रहा है। इससे टेलीविजन पत्रकार शायद ही सहमत होंगे- लेकिन हकीकत ये है कि जनता से उनका भी कोई सीधा साबका नहीं रहा। लिहाजा उन्हें पता ही नहीं है कि जिस जनता के नाम पर वे स्टिंग कर रहे हैं, उसका खयाल भी कुछ और ही है। इसे जानने के लिए पान वाले से लेकर अखबारों और चायवालों की दुकानों की खाक छाननी पड़ेगी। लाख टके का सवाल ये है कि चैनलों के कर्ताधर्ता इसे समझने की कोशिश करेंगे या नहीं। लेकिन ये भी सच है कि अगर इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो टेलीविजन की साख को बचा पाना आसान नहीं होगा- साख के संकट से जूझ रही टेलीविजन पत्रकारिता के लिए ये बहुत ही महंगा सौदा होगा।

गुरुवार, 17 जनवरी 2008

भदेसपन की भाषा और तकनीक का साथ

उमेश चतुर्वेदी

भाषा में भदेस हूं,इतना कायर हूं कि उत्तर प्रदेश हूं। सुदामा पांडे धूमिल ने ये कविता भले ही पूरे उत्तर प्रदेश के संदर्भ में लिखी थी, लेकिन उन्होंने असल में जिस भदेसपन की बात की थी, वह दरअसल पूर्वी उत्तर प्रदेश में ही पाई जाती है। और सच कहें तो ये देसीपन (भदेसपन) खासतौर पर भोजपुरीभाषी इलाके में ही पाई जाती है। भोजपुरी के अमर गायक और लोक कलाकार भिखारी ठाकुर के मशहूर नाटक विदेसिया या गबरघिंचोक में इस भदेसपन की खूब चर्चा मिलती है। इस भदेस इलाके ने देश-विदेश में ख्यात ढेरों विभूतियों को जन्म दिया, साहित्य और राजनीति से लेकर समाजशास्त्रीय विद्वानों तक को पैदा किया, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर इस इलाके को सहज सम्मान का पात्र कभी नहीं माना गया। शायद यही वजह है कि इंटरनेट की अत्याधुनिक दुनिया में जो भोजपुरी वेबसाइटें काम कर रही हैं या फिर सक्रिय हैं, उनका मूल उद्देश्य अपने इसी स्वाभिमान को बचाए और बनाए रखना तो है ही, उसे नए सिरे से प्रतिष्ठित कराना भी है।

गूगल या याहू से सर्च करने पर भोजपुरी की जिन वेबसाइटों से हमारा पहला परिचय होता है, उसमें सबसे पहला नाम भोजपुरी संसार का होता है। सही मायने में ये याहू के भोजपुरी ग्रुप की वेबसाइट है, जिसका मकसद भोजपुरी संस्कृति और सामाजिक ढांचे से दुनियाभर को परिचित कराना तो है ही, दुनियाभर में फैले भोजपुरीभाषी लोगों को भी एक सूत्र में जोड़ना भी है। इस साइट पर भोजपुरी कहानी, कविता से लेकर लालबहादुर ओझा लिखित भोजपुरी सिनेमा का इतिहास तक, सब कुछ है। भोजपुरी ग्रुप की ये साइट स्वतंत्र रूप से भोजपुरी डॉट ओआरजी के नाम से भी आपको इंटरनेट पर मिल सकती है। इन दिनों भोजपुरी में सीवान जिले के सुधीर कुमार सिंह ने भोजपुरिया डॉट कॉम नाम से वेब पोर्टल मैदान में उतारा है। जमशेदपुर में अपनी खुद की सॉफ्टवेयर कंपनी चला रहे सुधीर कुमार ने अपनी इस साइट पर भोजपुरी साहित्य और संस्कृति से लेकर रीति-रिवाज़ों और खानपान को भी पूरी शिद्दत से पेश किया है। इन दिनों उन्होंने फिल्मोत्सव की तर्ज पर भोजपुरी सिनेमा का समारोह आयोजित करना शुरु किया है। बिहार और भोजपुरी इलाके के मशहूर छठ पूजा का आयोजन और इसके प्रसाद का वितरण दुनियाभर में करके ये भोजपुरी संस्कृति और समाज का अलख जगाने में जुटे हुए हैं।

भोजपुरी इलाके में रहकर जितने लोग सूचनाक्रांति की इस नई दुनिया से नहीं जुड़ रहे हैं, उससे कहीं ज्यादा वे लोग सूचना और तकनीकी क्रांति के जरिए भोजपुरी की सेवा कर रहे हैं, जो अपने कामकाज के सिलसिले में सिलिकॉन वैली या सिंगापुर या फिर ब्रिटेन में रह रहे हैं। अमेरिका में एक भोजपुरी एसोसिएशन है-भोजपुरी एसोसिएशन ऑफ नॉर्थ अमेरिका। इसके कर्ता-धर्ता हैं शैलेश मिश्र और इनकी साइट है-भोजपुरी डॉट यूएस। इसी तरह भोजपुरी सोसाइटी ऑफ सिंगापुर की भी एक साइट पूरे जोशोखरोश से मौजूद है- भोजपुरी सिंगापुर डॉट कॉम। एक ऐसी ही साइट है गोरखपुर के मशहूर इलाके चौरीचौरा के नाम पर चौरीचौरा डॉट कॉम। गोरखपुर के निवासी आर एन शुक्ला और सुधांशु त्रिपाठी मिलकर इस पोर्टल को चला रहे हैं। जैसा कि नाम से स्पष्ट है, इस साइट पर गोरखपुर की ज्यादा सूचनाएं और समाचार और सांस्कृतिक विविधताओं की जानकारी है। लेकिन भोजपुरी संस्कृति और समाज की खांटी झलक भी इस साइट के जरिए आपको मिल सकती है।

लेकिन ये सब साइटें या तो रोमन लिपि में अंग्रेजी में भोजपुरी इलाके की सांस्कृतिक रस-गंध लिए हुए हैं या फिर उनमें एक कोना देवनागरी लिपि में भोजपुरी का भी है। लेकिन पूरी तरह से देवनागरी लिपि में भोजपुरी की साइट है अंजोरिया डॉट कॉम। बलिया जैसी छोटी जगह से अपने व्यक्तिगत प्रयासों से ओपी सिंह नामक एक सज्जन भोजपुरी इलाके की अहम खबरों को दुनियाभर में फैले भोजपुरीभाषी और भोजपुरी मूल के लोगों तक पहुंचा रहे हैं।

अब ब्लाìग की चर्चा न हो तो ये आलेख अधूरा ही रहेगा। उपर उल्लिखित साइटें जहां भोजपुरी इलाके की सांस्कृतिक रसगंध को फैलाने और उसके जरिए फिजी, गुयाना. त्रिनिडाड और मारीशस से लेकर दुनियाभर में फैले भोजपुरी समाज को जोड़ने की कोशिश कर रहीं हैं तो दूसरी तरफ ब्लॉग की दुनिया में मौजूद लिट्टीचोखा डॉट कॉम और भोजपुरी डॉट ब्लॉगस्पॉट डॉट कॉम सही मायने में भोजपुरी इलाके की खांटी और खरी-खरी बातें पेश कर रहीं हैं। कुछ यही हाल भोजपुरी डॉट संसद डॉट ओआरजी और भोजपुरी डॉट ब्लॉगमैट्रिक्स डॉट कॉम का भी है।

ये भी सच है कि सिर्फ देश भर में ही करीब चौदह करोड़ लोग भोजपुरी बोलते हैं। एक अनुमान के मुताबिक सिर्फ देश में ही करीब चार करोड़ भोजपुरीभाषी विस्थापित हैं. जो कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और गुजरात से लेकर अरूणाचल प्रदेश तक फैले हुए हैं। इसके अलावा करीब तीन करोड़ भोजपुरी भाषी और भोजपुरी मूल के लोग दुनियाभर में भी फैले हुए हैं। ऐसे में ये कुछ चुनिंदा वेब साइटें ऊंट के मुंह में जीरा के ही समान हैं। लेकिन भदेसपन से भरपूर संस्कृति वाले लोगों का अपनी सांस्कृतिक अस्मिता को बचाए और बनाए रखने की ये कोशिश भी किसी तरह से कम करके नहीं आंकी जा सकती।

कॉपी एडिटर और उपसंपादक की चीख

ये कविता हमें प्रियदर्शन ने भेजी है। अंशुल शुक्ला की संग्रहीत या रचित इस कविता में उपसंपादक की पीड़ा का जिक्र है। यही वजह है कि मीडिया मीमांसा पर इस कविता को डाला जा रहा है।


ये मीटिंग ये स्टोरी ये फीचर की दुनिया
ये इंसान के दुश्मन, क्वार्क की दुनिया
ये डेडलाइन के भूखे, एडिटर की दुनिया
ये पेज अगर बन भी जाए तो क्या है?

यहां एक खिलौना है सब एडिटर की हस्ती
ये बस्ती है मुर्दा रिपोर्टर की बस्ती
यहां पर तो रेजेज से इंन्फ्लेशन ही सस्ती
ये अप्रेजल अगर हो भी जाए तो क्या है ?

हर एक कंप्यूटर घायल, हर एक न्यूज ही बासी
डिजाइनर में उलझन, फोटोग्राफर्स में उदासी
ये ऑफिस है या आलमी मैनेजमेंट की
सर्कुलेशन अगर बढ़ भी जाए तो क्या है ?

जला दो, जला दो इसे, फूंक डालो मॉनीटर
मेरे नाम का हटा दो ये यूजर
तुम्हारा है, तुम्हीं संभालो ये कंप्यूटर
ये पेपर अगर चल भी जाए तो क्या है ?

गुरुवार, 10 जनवरी 2008

नई मीडिया के नए हीरो

जयप्रकाश ज्यादा जरूरी हैं या अमिताभ
उमेश चतुर्वेदी

अमिताभ बच्चन और जयप्रकाश नारायण में क्या समानता है। आप ये सवाल पूछ सकते हैं कि आखिर अमिताभ और जयप्रकाश नारायण से तुलना करने की क्या जरूरत आ पड़ी! अगर तुलना जरूरी है भी तो जयप्रकाश का नाम पहले आना चाहिए,इस सवाल का जवाब देने से पहले एक सवाल और अमिताभ बच्चन और जयप्रकाश नारायण में क्या अंतर है!
जयप्रकाश नारायण और अमिताभ बच्चन में एक ही समानता है कि दोनों का जन्म 11 अक्टूबर को हुआ था। दोनों की अहमियत और व्यक्तित्व में क्या अंतर है-इसे बीते 11 अक्टूबर को देश के मौजूदा हालात से थोड़ा भी वास्ता रखने वालों ने जरूर समझा होगा। इस बार मीडिया परिदृश्य से जप्रकाश या तो गायब थे-या फिर उन्हें याद करने की औपचारिकता पूरी की गई। कई जगहों से तो वह औपचारिकता भी वैसे ही गायब थी-जैसे उनके ही अनुयायियों ने करीब ढाई दशक पहले उन्हें भुला दिया था। हां,पूरे मीडिया परिदृश्य पर अमिताभ बच्चन छाए हुए थे।
1991 में आर्थिक उदारीकरण की शुरूआत के बाद आर्थिक इस प्रक्रिया पर निगाह रखने वाले जानकारों ने सबसे बड़ी चिंता देश के सामाजिक और सांस्कृतिक परिदृश्य के विचलन की जताई थी। आर्थिक मोर्चे पर देश लगातार आगे बढ़ता जा रहा है-लेकिन उसकी वैचारिकता में विचलन आता जा रहा है। अगर ऐसा नहीं होता तो देश के इतिहास में कम से कम दो बार जबर्दस्त हस्तक्षेप करने वाले जयप्रकाश नारायण महज औपचारिकता का विषय नहीं रह जाते। अमिताभ बच्चन का जन्मदिन मनाया जाना चाहिए-बॉलीवुड में उनके ऐतिहासिक योगदान को नकारा भी नहीं जा सकता। लेकिन जयप्रकाश नारायण औपचारिक याद का भी विषय न समझे जाएं-कम से कम ये बात तो समझ के परे है।
लेकिन हमें याद रखना चाहिए-अमिताभ बच्चन जिस विचारधारा के जरिए सुपरस्टॉरडम के सर्वोच्च मुकाम पर पहुंचे-उनमें जयप्रकाश नारायण के 1974 के युवा आंदोलन का भारी योगदान है। जिस दीवार और जंजीर जैसी फिल्मों के जरिए अमिताभ बच्चन हिंदी सिनेमा के मील के पत्थर बने-दरअसल ये फिल्में जयप्रकाश आंदोलन की ही सिनेमाई अभिव्यक्ति थीं। देश में फैल रही गरीबी,अराजकता और भ्रष्टाचार ने उस वक्त युवाओं और छात्रों को क्षोभ और गुस्से से भर दिया था। जयप्रकाश नारायण ने उन्हीं युवाओं के आंदोलन का नेतृत्व किया था। इसी दौर में अमिताभ बच्चन यंग्री यंग मैन की नई छवि में अवतरित हुए थे। इसके पहले सात हिंदुस्तानी,रेशमा और शेरा और आनंद जैसी फिल्मों के जरिए भले ही वे अपने अभिनय की छाप छोड़ रहे थे, लेकिन सही मायने में उन्हें सुपर स्टार बनाया उनकी यंग्री यंग मैन की ही छवि ने। क्या कोई ये कल्पना कर सकता है कि जयप्रकाश आंदोलन के बिना अमिताभ की ये फिल्में सामने आ सकती थीं? सच तो ये है कि प्रकाश मेहरा और मनमोहन देसाई जैसे फिल्म निर्माता जयप्रकाश आंदोलन से वाकिफ थे और उन्होंने दीवार और जंजीर जैसी फिल्मों के जरिए उस दौर के क्षोभ को ही अभिव्यक्ति देने की कोशिश की थी।
लेकिन आज के दौर में असल आंदोलनकारी तो भुला दिया जाता है,लेकिन उसके आंदोलन पर अभिनय करने वाली शख्सियत को पूरी शिद्दत से याद किया जाता है। दरअसल आज क्रांतिकारी भी तभी बिकेगा-जब उसके बाजार में बिकने की संभावना होगी। देश के लिए त्याग,राजनीतिक सत्ता को बदलने की कूव्वत की आज तभी कोई अहमियत है-जब बाज़ार में उसके बिकने की गुंजाइश हो,अन्यथा इंदिरा गांधी की तानाशाही को उखाड़ फेंकने की आज के मीडिया परिदृश्य में उसकी तभी़ कोई अहमियत है-जब उसके खरीददार मिलें। चूंकि अमिताभ बिकते हैं-उनकी मार्केट वैल्यू है,इसलिए वे मीडिया परिदृश्य पर छाए रहते हैं। लेकिन जयप्रकाश नारायण बिकाउ नहीं हैं, लिहाजा उन्हें कौन याद करता है।
लेकिन उनके अनुयायी ही उन्हें कहां याद कर रहे हैं। उन्हें मुलायम सिंह अपने ढंग से याद कर रहे हैं। उनके लिए जयप्रकाश का जन्मदिन भी अपनी निजी राजनीति चमकाने का मौका लगता है। जयप्रकाश नारायण को याद करने की इस प्रक्रिया में उनके साथ जार्ज फर्नांडिस भी शामिल हो जाते हैं। कुछ ऐसा ही जयप्रकाश नारायण के जन्मस्थान सिताबदियारा में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर भी उन्हें हर साल याद करते रहे। लेकिन जयप्रकाश नारायण के सपनों को उन्होंने कितना पूरा किया है-इसका हिसाब तो उनसे इतिहास मांगेगा। जयप्रकाश स्मृति ट्रस्ट में जिस तरह उनके परिवारजनों ने कब्जा जमाने की कोशिशें कीं, उससे साफ है कि जयप्रकाश के सपनों के साथ क्या हो रहा है। ये बात दीगर है कि उत्तर प्रदेश के रजिस्ट्रार ने इस ट्रस्ट पर उनके परिवारजनों के कब्जे को नकार कर नए चुनाव कराने का आदेश दे दिया।
जयप्रकाश नारायण और जवाहरलाल नेहरू के पत्र व्यवहार को हाल ही में राष्ट्रीय अभिलेखागार ने प्रदर्शित किया। इनमें वह पत्र भी है-जिसमें जयप्रकाश ने नेहरू कैबिनेट में शामिल होने से इंकार कर दिया था। अपने पत्र में जयप्रकाश ने लिखा कि उनका गांधीजी के उस विचार में भरोसा है,जिसमें विकास नीचे से उपर की ओर होना चाहिए,जबकि नेहरू जी की सोच उल्टी है। ऐसे में कैबिनेट में ‘शामिल होने के बाद दोनों के बीच मतभेद बढ़ेगा,जो सरकार और देशहित में नहीं होगा। लेकिन आज चाहे समाजवादी नेता हों या फिर दूसरी विचारधारा के लोग-उनके लिए जयप्रकाश का जन्मदिन मनाना तो आसान है,लेकिन वे उनके विचारों को याद तक नहीं। उस पर आचरण तो दूर की बात है।
आर्थिक उदारीकरण के दौर में आज गांव कहां हैं? ये किसी से छिपा नहीं है। जब देश को दिशा देने वाले नेता ही बिकाऊपन को बढ़ावा देने में भरोसा कर रहे हों-राजनीति सिर्फ सत्ता का साधन मात्र रह गई हो-राजनीति से विचार गायब होते जा रहे हों-ऐसे में जयप्रकाश नारायण को अपनी राजनीति का जरिया ही बनाया जाएगा। जयप्रकाश से कहीं ज्यादा अहम अमिताभ ही नज़र आएंगे। लेकिन जिस तरह देश में अब भी असमानता फैल रही है-उसमें वह दिन दूर नहीं-जब देश को विचार करना होगा कि देष के लिए ज्यादा अहम अमिताभ हैं या फिर जयप्रकाश नारायण।