उमेश चतुर्वेदी
पिछले दिनों लोहिया रचनावली का लोकार्पण था। समाजवादी लेखक मस्तराम कपूर के संपादन में उनकी रचनावली के अंग्रेजी अनुवाद के इस लोकार्पण समारोह में मौजूदा दौर के समाजवादी धारा के तमाम बड़े नेता मौजूद थे। जैसी कि रवायत है, नेताओं ने रचनावली के तमाम खंडों का लोकार्पण किया और फिर जिसके खाते में जो किताब आई, उसे लेकर बैठ गए। चूंकि इसके बाद एक परिचर्चा थी, लिहाजा सभी नेता उस परिचर्चा में जुट गए। इस बीच उनका ध्यान उनके हिस्से में आई रचनावली के खंड पर ही था। उन्हें लग रहा था कि जिसके हिस्से जो किताब आई, अब उन पर उनका ही हक है। यह बात मंच संचालन कर रहे धुर समाजवादी और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर आनंद कुमार भांप गए। उन्होंने परिचर्चा के बीच में ही मंच पर मौजूद उन बड़े समाजवादी नेताओं ने रचनावली के हिंदी और अंग्रेजी के खंड को खरीदने की अपील कर डाली। उन्होंने विनम्रता पूर्वक साफ कर दिया कि लोकार्पण के दौरान जिसके हिस्से में जो किताब आई है, उस पर उनका हक नहीं है, बल्कि उसे भी नेताजी को खरीदना ही पड़ेगा। मंच पर मौजूद नेताओं में से ज्यादातर ने फाकामस्ती से अपनी जिंदगी की शुरूआत की। लेकिन आज ऑफ द रिकॉर्ड उनके भी पास सैकड़ों करोड़ की संपत्ति बताई जाती है। चूंकि लोहिया रचनावली का सवाल था और वे नेता ठहरे लोहिया भक्त, फिर सरेआम मंच से उनसे किताब खरीदने की मांग की जा रही थी। ऐसे में उनके सामने जेब ढीली करने के अलावा कोई चारा नहीं था।
कहने का मतलब यह कि हिंदी में मालदार लोग भी पढ़ने के लिए खर्च करने से बचते हैं। हालांकि नौजवान पीढ़ी में इन दिनों बदलाव नजर आ रहा है। वह पढ़ने के लिए किताबें खरीदने से नहीं हिचकती। उसे नई-नई किताबों में दिलचस्पी तो है। लोहिया रचनावली के प्रकाशक अनामिका प्रकाशन ने कार्यक्रम स्थल के बाहर समाजवादी साहित्य का एक छोटा सा स्टाल लगा रखा था। वहां से किताबों की खरीद भी हुई और ज्यादातर खरीददार नौजवान ही थे। कुछ ऐसा ही नजारा तीस जनवरी को दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में भी नजर आया। हर साल तीस जनवरी को गांधी शांति प्रतिष्ठान गांधी जी के शहीद दिवस के मौके पर गांधी स्मृति व्याख्यान का आयोजन करता है। इस मौके पर सैकड़ों लोग जुटते हैं। इस मौके का फायदा उठाने के लिए सर्व सेवा संघ प्रकाशन के एक वितरक ने अपनी और नवजीवन प्रकाशन से प्रकाशित गांधी और गांधीवादी साहित्य का स्टाल गांधी शांति प्रतिष्ठान में लगा रखा था। इस स्टाल की हालत यह थी कि देखते ही देखते गांधी जी की आत्मकथा सत्य के साथ प्रयोग के हिंदी और अंग्रेजी संस्करण की सारी प्रतियां बिक गईं। रूस के महान अराजकतावादी नेता प्रिंस उर्फ पीटर क्रोपाटकिन की किताब नवयुवकों से दो बातें, गांधी जी के हिंद स्वराज का हिंदी और अंग्रेजी संस्करण, रोम्या रोलां द्वारा लिखी गांधी जी की जीवनी हाथोंहाथ बिक गई। हैरत की बात यह थी कि इन किताबों के सबसे ज्यादा खरीददार नई पीढी़ के ही लोग थे। इससे एक बात तो तय है कि हिंदी किताबों की पाठकीयता को लेकर नाउम्मीद होने की कोई वजह नहीं है।
वैसे दुनिया में सबसे ज्यादा लोग अपने नेताओं और हीरो से प्रभावित होते हैं। समाजवादी धारा के नेताओं के बारे में माना जाता रहा है कि वे पढ़ते-लिखते रहे हैं। लेकिन आज की समाजवादी पीढ़ी का पढ़ाई-लिखाई से साथ छूट गया है। वाम धारा के नेताओं के बारे में भी माना जाता रहा है कि वे पढ़ते-लिखते हैं। लेकिन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की धारा से आए भाजपा नेताओं को लेकर भी कुछ ऐसी ही छवि रही है। लेकिन आज की राजनीतिक पीढ़ी के साथ वह बात नहीं रही। फिल्मी दुनिया में तो वैसे ही माना जाता है कि वहां बौद्धिकता की गुंजाइश कम ही रहती है। हालांकि वहां भी अनुराग कश्यप, जावेद अख्तर, गुलजार, बासु भट्टाचार्य, अमोल पालेकर, विशाल भारद्वाज, महेश भट्ट, अनुपम खेर, राज बब्बर जैसे पढ़ने-लिखने वाले लोग तो हैं। लेकिन वे नौजवानों को कोर्स के इतर कुछ पढ़ने के लिए प्रेरित नहीं कर पाते। अगर इसके बावजूद भी नई पीढ़ी पढ़ने की ओर अग्रसर हो रही है तो निश्चित तौर पर स्कूलों का योगदान है। क्योंकि तमाम बाधाओं के बावजूद अच्छे कहे जाने वाले स्कूलों के अध्यापक बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित तो कर ही रहे हैं। हालांकि सारे स्कूलों के पास प्रेरक वातावरण नहीं है। ऐसे में अगर पढाई का संस्कार बढ़ाना है तो आनंद कुमार जैसा साहसी और मुंहफट होना पड़ेगा और अच्छे स्कूलों जैसा प्रेरक भी...तभी हिंदी पाठकीयता का कारवां तेजी से बढ़ पाएगा।
इस ब्लॉग पर कोशिश है कि मीडिया जगत की विचारोत्तेजक और नीतिगत चीजों को प्रेषित और पोस्ट किया जाए। मीडिया के अंतर्विरोधों पर आपके भी विचार आमंत्रित हैं।
सोमवार, 18 अप्रैल 2011
सोमवार, 4 अप्रैल 2011
महानगरों में माटी की गंध
उमेश चतुर्वेदी
हिंदीभाषी इलाकों में इन दिनों बोलियों और उन्हें भाषा का दर्जा दिलाने की मांगें कुछ ज्यादा ही बढ़ गई हैं। विद्यापति और नागार्जुन जैसे कवियों की रचनास्थली रही मैथिली को यूं तो लोक में भाषा का दर्जा हासिल हो ही गया है। लेकिन संवैधानिक मान्यता अब तक नहीं है। उसे लेकर मैथिल समाज आंदोलन करता रहा है। पिछली बार दिल्ली विधानसभा चुनावों में भी यह मसला उछला था। अब इस कड़ी में राजस्थानी और भोजपुरी भी जुड़ गई हैं। भोजपुरी और मैथिल भाषियों की दिल्ली की मतदाता सूची में क्या हैसियत है, इसका अदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वहां बाकायदा राज्य सरकार के अधीन एक भोजपुरी-मैथिली अकादमी भी काम कर रही है। एक दौर में हिंदी को जनपदीय भाषाओं-बोलियों के जरिए समृद्ध करने की वकालत विशाल भारत के संपादक बनारसी दास चतुर्वेदी करते रहे। जिसे उन्होंने जनपद आंदोलन का नाम दिया था। हालांकि हिंदी सेवियों की नजर में जनपद आंदोलन हिंदी की अखिल भारतीय छवि और भाषा के तौर पर उसकी ताकत को कमजोर कर सकता था। यही वजह है कि उनके इस आंदोलन का उस दौर में भी व्यापक विरोध हुआ। आकाशवाणी द्वारा प्रकाशित पुस्तक “बनारसी दास चतुर्वेदी : समय के दर्पण में ” में खुद बनारसी दास चतुर्वेदी ने स्वीकार किया है कि जनपद आंदोलन को लेकर मान्यता थी कि अगर यह आंदोलन सफल हुआ तो हिंदुस्तान के हिस्से-हिस्से हो जाएंगे। जबकि बनारसी दास चतुर्वेदी का मानना था कि हिंदी में भी विकेंद्रीकरण होना चाहिए। साहित्यिक और सांस्कृतिक तौर पर वे वासुदेव शरण अग्रवाल की पुस्तक ‘पृथ्वीपुत्र ’ से प्रभावित थे। जिसका मकसद था – हिंदी की क्षेत्रीय बोलियों के रिकॉर्ड रखे जायं और उनकी लोक रचनाओं का संकलन किया जाय। बहरहाल जनपद आंदोलन अपने मूल रूप में सफल तो नहीं रहा, लेकिन उसने हिंदी में लोक साहित्य और स्थानीय बोलियों में प्रचलित मौखिक रचनाओं को संग्रहीत करने की एक प्रेरणा जरूर दे गया।
लेकिन बात अब इससे आगे बढ़ गई है। अब ये बोलियां अब भाषा की सीढ़ी की तरफ बढ़ती हुई राजनीतिक हथियार बनती जा रही है। अगर दिल्ली में भोजपुरी-मैथिली अकादमी का गठन होता है तो इसका मतलब साफ है कि उन्हें बोलने वालों की राजनीतिक ताकत के चलते ऐसा संभव हुआ है। हालांकि साठ के दशक में जैसे जनपद आंदोलन का विरोध हो रहा था, वैसा ही विरोध इन बोलियों को संवैधानिक मान्यता देने की मांग को लेकर भी होने लगा है। कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य और सचिव मोहन प्रकाश का राजनीतिक प्रशिक्षण चूंकि समाजवादी विचारधारा में हुआ है, लिहाजा सांस्कृतिक और साहित्यिक घटनाक्रम उन्हें सोचने के लिए मजबूर करते हैं। बोलियों को राजनीतिक और संवैधानिक हैसियत दिलाने की मांग का वे सैद्धांतिक विरोध कर रहे हैं। उनका मानना है कि देश में सोलह सौ से ज्यादा बोलियां है। अगर बोलियों को संवैधानिक हैसियत देने की मांग मानी जाती रही तो इसका कोई अंत नहीं होगा। देर-सवेर हर एक बोलियों वाले लोग ऐसी मांग उठाने लगेंगे, जिसकी वजह से देश को क्षेत्रीयता की नई समस्या से दो-चार होना पड़ेगा। उनका तर्क है कि अगर राजस्थानी को ही संवैधानिक मान्यता दे दी जाय तो स्थानीयता की समस्या उठ खड़ी होगी। क्योंकि मेवाड़ में बोली जानी वाली राजस्थानी कुछ और है, ब्रज के इलाके में कुछ अलग तरह से राजस्थानी का इस्तेमाल होता है तो मारवाड़ में किसी और तरह से। फिर उनके मानकीकरण की मांग उठेगी। मानकीकरण में एक इलाके की बोली को तरजीह दी गई तो दूसरे इलाके के लोग नाखुश होंगे। यानी एक अंतहीन सिलसिला शुऱू हो जाएगा। डॉक्टर राममनोहर लोहिया के अंग्रेजी हटाओ आंदोलन से जुड़े रहे मोहन प्रकाश की चिंताएं स्वाभाविक हैं। यानी यह गंभीर विमर्श का विषय है और इस पर सार्थक और सकारात्मक विचार किया जाना चाहिए।
ये मांगे जायज हैं या नाजायज, इसे लेकर बहस को एक तरफ रख दें तो बाजारवाद के दौर में इतना तो तय है कि अपनी सोंधी माटी की खुशबू को हासिल करने की कवायद शुरू तो हो ही गई है। यही वजह है कि राजधानी दिल्ली में होली और चैता के भोजपुरी राग-रंग सुनाई देने लगे हैं। गांव की चौपाल और खलिहान में प्रदर्शन के विषय रहे ये लोक रंग अब हैबिटाट सेंटर और फाइव स्टार होटलों के अपेक्षाकृत औपचारिक और संभ्रांत में अब लोक लहरियां उठने लगीं है। राजस्थानी गीतों की धूम पर देसी की कौन कहे, विदेशी भी झूमते रहे हैं और इसे बताने की जरूरत भी नहीं है। बुंदेली आल्हा के रंग भी अब महानगरों की दहलीज के अंदर घुस चुके हैं। यानी जिस ‘पृथ्वीपुत्र ’ को राष्ट्रीयता के उभार के दौर में भी सम्मान हासिल नहीं हो पाया, अब वह सम्मानित हो रहा है। लेकिन इसका एक दुखद पक्ष भी है। जहां ये सुर लहरियां अब तक गूंजती रही हैं, वहां फिल्मी तरन्नुम ने अपनी जगह बना ली है। महानगर में रह रहे प्रवासी अपनी माटी की सोंधी गंध वाली लहरियों में डूब रहे हैं तो इन लहरियों के आंचल का अपना नौजवान को उसे ये कम ही लुभाती हैं। लेकिन जैसे ही राजनीतिक हैसियत की बात उठती है, फिल्मी तरन्नुम में डूबने वाले नौजवान को भी अपनी बोली-बानी याद आ जाती है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या स्थानीय सोंधापन भी राजनीतिक हैसियत के जरिए ही बचाया जाएगा। अगर इस सवाल का जवाब हां में है तो निश्चित तौर पर यह भारतीय सांस्कृतिक और राजनीतिक सोच के लिए दुखद है।
हिंदीभाषी इलाकों में इन दिनों बोलियों और उन्हें भाषा का दर्जा दिलाने की मांगें कुछ ज्यादा ही बढ़ गई हैं। विद्यापति और नागार्जुन जैसे कवियों की रचनास्थली रही मैथिली को यूं तो लोक में भाषा का दर्जा हासिल हो ही गया है। लेकिन संवैधानिक मान्यता अब तक नहीं है। उसे लेकर मैथिल समाज आंदोलन करता रहा है। पिछली बार दिल्ली विधानसभा चुनावों में भी यह मसला उछला था। अब इस कड़ी में राजस्थानी और भोजपुरी भी जुड़ गई हैं। भोजपुरी और मैथिल भाषियों की दिल्ली की मतदाता सूची में क्या हैसियत है, इसका अदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वहां बाकायदा राज्य सरकार के अधीन एक भोजपुरी-मैथिली अकादमी भी काम कर रही है। एक दौर में हिंदी को जनपदीय भाषाओं-बोलियों के जरिए समृद्ध करने की वकालत विशाल भारत के संपादक बनारसी दास चतुर्वेदी करते रहे। जिसे उन्होंने जनपद आंदोलन का नाम दिया था। हालांकि हिंदी सेवियों की नजर में जनपद आंदोलन हिंदी की अखिल भारतीय छवि और भाषा के तौर पर उसकी ताकत को कमजोर कर सकता था। यही वजह है कि उनके इस आंदोलन का उस दौर में भी व्यापक विरोध हुआ। आकाशवाणी द्वारा प्रकाशित पुस्तक “बनारसी दास चतुर्वेदी : समय के दर्पण में ” में खुद बनारसी दास चतुर्वेदी ने स्वीकार किया है कि जनपद आंदोलन को लेकर मान्यता थी कि अगर यह आंदोलन सफल हुआ तो हिंदुस्तान के हिस्से-हिस्से हो जाएंगे। जबकि बनारसी दास चतुर्वेदी का मानना था कि हिंदी में भी विकेंद्रीकरण होना चाहिए। साहित्यिक और सांस्कृतिक तौर पर वे वासुदेव शरण अग्रवाल की पुस्तक ‘पृथ्वीपुत्र ’ से प्रभावित थे। जिसका मकसद था – हिंदी की क्षेत्रीय बोलियों के रिकॉर्ड रखे जायं और उनकी लोक रचनाओं का संकलन किया जाय। बहरहाल जनपद आंदोलन अपने मूल रूप में सफल तो नहीं रहा, लेकिन उसने हिंदी में लोक साहित्य और स्थानीय बोलियों में प्रचलित मौखिक रचनाओं को संग्रहीत करने की एक प्रेरणा जरूर दे गया।
लेकिन बात अब इससे आगे बढ़ गई है। अब ये बोलियां अब भाषा की सीढ़ी की तरफ बढ़ती हुई राजनीतिक हथियार बनती जा रही है। अगर दिल्ली में भोजपुरी-मैथिली अकादमी का गठन होता है तो इसका मतलब साफ है कि उन्हें बोलने वालों की राजनीतिक ताकत के चलते ऐसा संभव हुआ है। हालांकि साठ के दशक में जैसे जनपद आंदोलन का विरोध हो रहा था, वैसा ही विरोध इन बोलियों को संवैधानिक मान्यता देने की मांग को लेकर भी होने लगा है। कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य और सचिव मोहन प्रकाश का राजनीतिक प्रशिक्षण चूंकि समाजवादी विचारधारा में हुआ है, लिहाजा सांस्कृतिक और साहित्यिक घटनाक्रम उन्हें सोचने के लिए मजबूर करते हैं। बोलियों को राजनीतिक और संवैधानिक हैसियत दिलाने की मांग का वे सैद्धांतिक विरोध कर रहे हैं। उनका मानना है कि देश में सोलह सौ से ज्यादा बोलियां है। अगर बोलियों को संवैधानिक हैसियत देने की मांग मानी जाती रही तो इसका कोई अंत नहीं होगा। देर-सवेर हर एक बोलियों वाले लोग ऐसी मांग उठाने लगेंगे, जिसकी वजह से देश को क्षेत्रीयता की नई समस्या से दो-चार होना पड़ेगा। उनका तर्क है कि अगर राजस्थानी को ही संवैधानिक मान्यता दे दी जाय तो स्थानीयता की समस्या उठ खड़ी होगी। क्योंकि मेवाड़ में बोली जानी वाली राजस्थानी कुछ और है, ब्रज के इलाके में कुछ अलग तरह से राजस्थानी का इस्तेमाल होता है तो मारवाड़ में किसी और तरह से। फिर उनके मानकीकरण की मांग उठेगी। मानकीकरण में एक इलाके की बोली को तरजीह दी गई तो दूसरे इलाके के लोग नाखुश होंगे। यानी एक अंतहीन सिलसिला शुऱू हो जाएगा। डॉक्टर राममनोहर लोहिया के अंग्रेजी हटाओ आंदोलन से जुड़े रहे मोहन प्रकाश की चिंताएं स्वाभाविक हैं। यानी यह गंभीर विमर्श का विषय है और इस पर सार्थक और सकारात्मक विचार किया जाना चाहिए।
ये मांगे जायज हैं या नाजायज, इसे लेकर बहस को एक तरफ रख दें तो बाजारवाद के दौर में इतना तो तय है कि अपनी सोंधी माटी की खुशबू को हासिल करने की कवायद शुरू तो हो ही गई है। यही वजह है कि राजधानी दिल्ली में होली और चैता के भोजपुरी राग-रंग सुनाई देने लगे हैं। गांव की चौपाल और खलिहान में प्रदर्शन के विषय रहे ये लोक रंग अब हैबिटाट सेंटर और फाइव स्टार होटलों के अपेक्षाकृत औपचारिक और संभ्रांत में अब लोक लहरियां उठने लगीं है। राजस्थानी गीतों की धूम पर देसी की कौन कहे, विदेशी भी झूमते रहे हैं और इसे बताने की जरूरत भी नहीं है। बुंदेली आल्हा के रंग भी अब महानगरों की दहलीज के अंदर घुस चुके हैं। यानी जिस ‘पृथ्वीपुत्र ’ को राष्ट्रीयता के उभार के दौर में भी सम्मान हासिल नहीं हो पाया, अब वह सम्मानित हो रहा है। लेकिन इसका एक दुखद पक्ष भी है। जहां ये सुर लहरियां अब तक गूंजती रही हैं, वहां फिल्मी तरन्नुम ने अपनी जगह बना ली है। महानगर में रह रहे प्रवासी अपनी माटी की सोंधी गंध वाली लहरियों में डूब रहे हैं तो इन लहरियों के आंचल का अपना नौजवान को उसे ये कम ही लुभाती हैं। लेकिन जैसे ही राजनीतिक हैसियत की बात उठती है, फिल्मी तरन्नुम में डूबने वाले नौजवान को भी अपनी बोली-बानी याद आ जाती है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या स्थानीय सोंधापन भी राजनीतिक हैसियत के जरिए ही बचाया जाएगा। अगर इस सवाल का जवाब हां में है तो निश्चित तौर पर यह भारतीय सांस्कृतिक और राजनीतिक सोच के लिए दुखद है।
रविवार, 27 मार्च 2011
क्यों न बढ़ें हिंदी किताबों के दाम
उमेश चतुर्वेदी
पिछले दिनों एक शैक्षिक प्रकाशक पीछे ही पड़ गए थे। उनकी मांग थी कि पत्रकारिता पर एक पाठ्यपुस्तक लिख कर दें। खबर और ग्लैमर के कैरियर के तौर पर विकसित हो रहे मीडिया पाठ्यक्रमों में खासकर हिंदी माध्यम की स्तरीय किताबों का भारी अभाव है। हिंदी के बड़े से बड़े प्रकाशकों ने भी इस धारा को दुहने के लिए किताबों की ढेर मैदान में उतार दी है, लेकिन उनमें से ज्यादातर उबाऊ और दुहराऊ विशुद्ध अकादमिक किताबें हैं। जिनसे छात्रों को न तो आम पढ़ाई में, न ही मीडिया की असल जिंदगी में कोई फायदा मिल पाता है। खैर इस विषय पर बहस इस वक्त मकसद नहीं है। बहरहाल इसी बहाने प्रकाशक महोदय से हिंदी में किताबों के दाम तय करने के फार्मूले की जानकारी हो गई। उनके मुताबिक अगर किसी किताब की कीमत 300 रूपए रखी गई है तो तय है कि उसके प्रोडक्शन पर महज 120 रूपए ही खर्च हुए हों। प्रकाशक महोदय के मुताबिक किताबों को बेचने और खपाने के लिए उन्हें तरह-तरह के कमीशन और घूस देने होते हैं। अगर अकादमिक किताब हुई तो पाठ्यक्रम संयोजक से लेकर महाविद्यालयों-विश्वविद्यालयों में किताबें तय करने वाले अध्यापकों और पुस्तकालय अध्यक्षों तक को उन्हें चढ़ावा चढ़ाना पड़ता है। अगर आम फहम किताब हुई तो उसे सरकारी दफ्तरों के जिम्मेदार लोगों को चढ़ावा देकर ही लाइब्रेरी का मुंह दिखाया जा सकता है। लिहाजा किताबों का दाम महंगा रखना पड़ता है।
प्रकाशक महोदय की इन बातों से पता चलता है कि असल में हिंदी प्रकाशन की दुनिया आम पाठकों की मर्जी की बजाय हिंदी के मठाधीशों के अधीन है। ज्यादातर प्रकाशक अपनी किताबें इसी वजह से सिर्फ पुस्तकालयों की शोभा बढ़ाने के लिए ही आज प्रकाशित कर रहे हैं। हालांकि कुछ प्रकाशक ऐसे भी हैं, जिनका उद्देश्य लाइब्रेरी की बजाय आम पाठकों तक किताब पहुंचाना है। लेकिन उनकी चिंता सिर्फ किताब की पाठ्य सामग्री की गुणवत्ता पर ही ज्यादा रहती है। जबकि आज जमाना बदल गया है। आज किताब का प्रोडक्शन भी उसकी बिक्री पर खासा असर रखता है। लेकिन हकीकत यह है कि हिंदी के ज्यादातर प्रकाशक अब भी पारंपरिक ढंग से ही किताबें छाप रहे हैं। उनके यहां स्थायी संपादक, डिजायनर तो हैं ही नहीं, स्थायी प्रूफ रीडर तक नहीं हैं। जाहिर है कि प्रोफेशनल संपादक, डिजायनर और प्रूफ रीडर रखने का खर्च प्रकाशक को भारी लगता है। यही वजह है कि हिंदी की ज्यादातर किताबों में अब भी संपादन की कमियां, प्रूफ की गलती और बोझिल- बासी डिजाइन दिखती है। इसके बावजूद हिंदी में किताबों का दाम ज्यादा ही है। साफ है कि प्रकाशक अपने मोटे मुनाफे के साथ लाइब्रेरी परंपरा में जारी चढ़ावे की प्रक्रिया में भागीदार बने हुए हैं। इसका सीधा नुकसान हिंदी को हो रहा है, प्रकाशनों के बावजूद किताबें पाठकों तक नहीं पहुंच रही हैं। तार्किक तौर पर बेहद महंगी किताबों को कौन पूछेगा। वैसे हिंदी का आम लेखक अब भी चाहता है कि उसकी प्रकाशित होने वाली किताब सस्ती हो, ताकि पाठकों तक उसकी सीधी पहुंच बन सके। हालांकि इस बहस में पेंगुइन जैसे प्रकाशक दूसरे तरीके से सोच रहे हैं। पेंगुइन यात्रा बुक के संपादक सत्यानंद निरूपम उलटे सवाल उठाते हैं कि हिंदी में किताबें आखिर क्यों न महंगी हों। सत्यानंद जब यह सवाल उठाते हैं तो जाहिर है कि उनके सामने उनके प्रकाशन से निकली किताबों की गुणवत्ता रहती है। दरअसल पेंगुइन यात्रा बुक जैसे प्रकाशक अपनी एक-एक किताब की डिजाइन, उसके संपादन और उसके प्रोडक्शन पर खासा ध्यान रखते हैं। इस प्रक्रिया में श्रम और पैसे दोनों खर्च होते हैं। जाहिर है कि इसीलिए वे उनकी किताबें बाकी लोगों की तुलना कहीं ज्यादा सुघड़ और आकर्षक होती हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि उनकी किताबों का लक्ष्यवर्ग पाठक हैं, लाइब्रेरियां नहीं हैं।
पिछले दिनों एक शैक्षिक प्रकाशक पीछे ही पड़ गए थे। उनकी मांग थी कि पत्रकारिता पर एक पाठ्यपुस्तक लिख कर दें। खबर और ग्लैमर के कैरियर के तौर पर विकसित हो रहे मीडिया पाठ्यक्रमों में खासकर हिंदी माध्यम की स्तरीय किताबों का भारी अभाव है। हिंदी के बड़े से बड़े प्रकाशकों ने भी इस धारा को दुहने के लिए किताबों की ढेर मैदान में उतार दी है, लेकिन उनमें से ज्यादातर उबाऊ और दुहराऊ विशुद्ध अकादमिक किताबें हैं। जिनसे छात्रों को न तो आम पढ़ाई में, न ही मीडिया की असल जिंदगी में कोई फायदा मिल पाता है। खैर इस विषय पर बहस इस वक्त मकसद नहीं है। बहरहाल इसी बहाने प्रकाशक महोदय से हिंदी में किताबों के दाम तय करने के फार्मूले की जानकारी हो गई। उनके मुताबिक अगर किसी किताब की कीमत 300 रूपए रखी गई है तो तय है कि उसके प्रोडक्शन पर महज 120 रूपए ही खर्च हुए हों। प्रकाशक महोदय के मुताबिक किताबों को बेचने और खपाने के लिए उन्हें तरह-तरह के कमीशन और घूस देने होते हैं। अगर अकादमिक किताब हुई तो पाठ्यक्रम संयोजक से लेकर महाविद्यालयों-विश्वविद्यालयों में किताबें तय करने वाले अध्यापकों और पुस्तकालय अध्यक्षों तक को उन्हें चढ़ावा चढ़ाना पड़ता है। अगर आम फहम किताब हुई तो उसे सरकारी दफ्तरों के जिम्मेदार लोगों को चढ़ावा देकर ही लाइब्रेरी का मुंह दिखाया जा सकता है। लिहाजा किताबों का दाम महंगा रखना पड़ता है।
प्रकाशक महोदय की इन बातों से पता चलता है कि असल में हिंदी प्रकाशन की दुनिया आम पाठकों की मर्जी की बजाय हिंदी के मठाधीशों के अधीन है। ज्यादातर प्रकाशक अपनी किताबें इसी वजह से सिर्फ पुस्तकालयों की शोभा बढ़ाने के लिए ही आज प्रकाशित कर रहे हैं। हालांकि कुछ प्रकाशक ऐसे भी हैं, जिनका उद्देश्य लाइब्रेरी की बजाय आम पाठकों तक किताब पहुंचाना है। लेकिन उनकी चिंता सिर्फ किताब की पाठ्य सामग्री की गुणवत्ता पर ही ज्यादा रहती है। जबकि आज जमाना बदल गया है। आज किताब का प्रोडक्शन भी उसकी बिक्री पर खासा असर रखता है। लेकिन हकीकत यह है कि हिंदी के ज्यादातर प्रकाशक अब भी पारंपरिक ढंग से ही किताबें छाप रहे हैं। उनके यहां स्थायी संपादक, डिजायनर तो हैं ही नहीं, स्थायी प्रूफ रीडर तक नहीं हैं। जाहिर है कि प्रोफेशनल संपादक, डिजायनर और प्रूफ रीडर रखने का खर्च प्रकाशक को भारी लगता है। यही वजह है कि हिंदी की ज्यादातर किताबों में अब भी संपादन की कमियां, प्रूफ की गलती और बोझिल- बासी डिजाइन दिखती है। इसके बावजूद हिंदी में किताबों का दाम ज्यादा ही है। साफ है कि प्रकाशक अपने मोटे मुनाफे के साथ लाइब्रेरी परंपरा में जारी चढ़ावे की प्रक्रिया में भागीदार बने हुए हैं। इसका सीधा नुकसान हिंदी को हो रहा है, प्रकाशनों के बावजूद किताबें पाठकों तक नहीं पहुंच रही हैं। तार्किक तौर पर बेहद महंगी किताबों को कौन पूछेगा। वैसे हिंदी का आम लेखक अब भी चाहता है कि उसकी प्रकाशित होने वाली किताब सस्ती हो, ताकि पाठकों तक उसकी सीधी पहुंच बन सके। हालांकि इस बहस में पेंगुइन जैसे प्रकाशक दूसरे तरीके से सोच रहे हैं। पेंगुइन यात्रा बुक के संपादक सत्यानंद निरूपम उलटे सवाल उठाते हैं कि हिंदी में किताबें आखिर क्यों न महंगी हों। सत्यानंद जब यह सवाल उठाते हैं तो जाहिर है कि उनके सामने उनके प्रकाशन से निकली किताबों की गुणवत्ता रहती है। दरअसल पेंगुइन यात्रा बुक जैसे प्रकाशक अपनी एक-एक किताब की डिजाइन, उसके संपादन और उसके प्रोडक्शन पर खासा ध्यान रखते हैं। इस प्रक्रिया में श्रम और पैसे दोनों खर्च होते हैं। जाहिर है कि इसीलिए वे उनकी किताबें बाकी लोगों की तुलना कहीं ज्यादा सुघड़ और आकर्षक होती हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि उनकी किताबों का लक्ष्यवर्ग पाठक हैं, लाइब्रेरियां नहीं हैं।
रविवार, 20 मार्च 2011
कहां गई वह साहित्यिक होली
उमेश चतुर्वेदी
दुनिया का काम है बदलना...लेकिन जिंदगी में कई परंपराएं ऐसी होती हैं, जिनका बदलना कम से कम संवेदनशील मन को परेशान कर देता है। शस्य परंपरा से जुड़े हमारे त्यौहारों की पारंपरिक निरंतरता हमारी जिंदगियों में हर बार नया रस भरती रही हैं। जिंदगी की जड़ों से जुड़े रहने का यह जज्बा ही रहा है कि ये त्यौहार अपनी निरंतरता में बने पारंपरिक ही रहे हैं। शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह पारंपरिक निरंतरता भी एक दिन बदल जाएगी। लेकिन उदारीकरण ने वह कर दिखाया, जिससे सदियों की सांस्कृतिक विरासत में भी बदलाव नजर आने लगा। बहरहाल यह मौका इस बदलाव की मीमांसा का नहीं है। जब से हिंदी पत्रकारिता का विकास हुआ है, सांस्कृतिक रस-गंध से जैसे-जैसे वह जुड़ती गई, सदियों पुराने त्यौहारों को भी साहित्यिक तरीके से मनाने की परंपरा विकसित होती गई। यह बदलाव नहीं, बल्कि खुद में उदात्त परंपराओं को आत्मसात होना था। हर बार जैसे ही त्यौहार आते, उनकी तैयारियां आम जिंदगी में तो होती ही थीं, पत्रकारिता और साहित्यकारिता भी इसे अपने अंदाज में मनाने की तैयारियों में जुट जाती थी। लेकिन जैसे-जैसे उदारीकरण का बिरवा पेड़ बनने की दिशा में बढ़ता जा रहा है, वैसे-वैसे कम से कम हिंदी साहित्यकारिता और पत्रकारिता अपनी इस उदात्त परंपरा से दूर होती जा रही है। जाहिर है कि इसका असर होली-दीवाली पर भी दिखने लगा है।
स्मृतियों के गलियारों में अभी-अभी धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, कादंबिनी, नंदन, पराग जैसी पत्रिकाओं के होली-दीवाली विशेषांक याद हैं। अपनी प्रति सुरक्षित कराने के लिए हम बार-बार स्टॉल वाले को याद दिलाते रहते थे। होली पर पारिवारिक पत्रिकाओं में जहां हास्य व्यंग्य से भरपूर गद्य और पद्य रचनाएं प्रकाशित की जाती थीं, वहीं बच्चों की पत्रिकाओं में स्वस्थ हास्य वाली कहानियां छापी जाती थीं। स्कूलों-कॉलेजों में होली की लंबी छुट्टियां भी होती थीं। रंग-पानी के बाद थकान इन पत्रिकाओं के साथ ही मिटाई जाती थी। पुए और गुझिया खाते हुए इन पत्रिकाओं का पारायण होता था। इस पारायण का आनंद ऐसा था कि उससे वंचित होने का खतरा उठाने को शायद ही कोई तैयार होता। पत्रिकाएं अदल-बदल कर पढ़ीं जातीं। इसके अलावा अखबारों के साप्ताहिक परिशिष्ट भी होली – दीवाली पर सुसज्जित अंक निकालते, जिनमें सुपठनयोग्य रचनाएं प्रकाशित की जाती थीं। इन अंकों और उनमें लिखने वाले लेखकों का प्रचार महीनों पहले ही शुरू हो जाता। इसी अंदाज में अखबारों के साप्ताहिक परिशिष्ट भी दो हफ्ते पहले से ही अपने अंकों का प्रचार करने लगते। दूसरे शब्दों में कहें तो साहित्यिकारिता और पत्रकारिता का अपने तरीके से होली-दीवाली मनाने का यह अंदाज था। लेकिन दुर्भाग्यवश अब यह परंपरा खत्म होती जा रही है। कहा तो जा रहा है कि उदारीकरण ने यह सब बदल कर रख दिया है। बाजार की बढ़ती पैठ ने हिंदी साहित्यिकारिता को सिर्फ बाजारोन्मुखी बनाकर रख दिया है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सचमुच बाजार ही इसके लिए उत्तरदायी है। अगर ऐसा है तो बांग्ला और मराठी में भी ऐसा बदलाव दिखता। लेकिन बांग्ला में वहां के सबसे उल्लासमय त्यौहार दुर्गापूजा को मनाने की साहित्यिक और पत्रकारीय तैयारियों में कमी नहीं आई है। बांग्ला पत्रिकाएं और अखबार अपने पूजा विशेषांकों की तैयारी महीनों पहले से शुरू कर देते हैं। बांग्ला प्रकाशनों में अपने लिए लेखकों को आरक्षित करने की होड़ महीनों पहले से ही शुरू हो जाती है। जहां पाठक का इतना खयाल रखा जाता है, वहां पाठक भी अपने प्रकाशनों के लिए इसी तरह तैयार रहते हैं। हमारे कई जानने वाले ऐसे हैं, जो विदेशों में रहते हैं लेकिन देश(बांग्ला पत्रिका) के पूजा विशेषांक के लिए हमें परेशान करते रहते हैं। उनकी मांग पूरी करने के लिए स्टॉलों की खाक छाननी पड़ती है।
होली को अपने अंदाज में कुछ स्वतंत्र तरीके से ही पत्रकारिता और साहित्य जगत के लोग मनाते रहे हैं। बनारस में फटीचर नाम से एक पत्रिका भी प्रकाशित की जाती रही है। निश्चित तौर पर उसमें फूहड़ हास्य सामग्री नहीं प्रकाशित की जाती थी। लेकिन अब स्वस्थ हास्य वाले पत्रों और होलियाना पत्रिकाओं का प्रकाशन या तो खत्म हो गया है या आखिरी सांसें ले रहा है। लेकिन इस बीच अश्लील प्रकाशनों की बाढ़ आ गई है। जिन्हें बाजार की मांग के नाम पर परोसा जा रहा है। सच तो यह है कि मनुष्य के अंदर हमेशा एक राक्षस बैठा रहता है। मर्यादाएं और संस्कार ही उसे मनुष्य बनाए रखते हैं। बाजारवाद ने इसी राक्षस को आगे आने का बहाना दे दिया है। सांस्कृतिक रस-गंध से जुड़े रहे हमारे त्यौहार इन राक्षसी वृत्तियों पर लगाम लगाते रहे हैं। लेकिन बाजारवाद के नाम पर यह कड़ी भी कमजोर हुई है। ऐसे में साहित्यकारिता और पत्रकारिता पर सबसे अहम उत्तरदायित्व आ जाता है। सांस्कृतिक रस-गंध की परंपरा को बनाए रखते हुए ऐसे माहौल की तरफ आगे बढ़ना, ताकि जिंदगी से राक्षसी वृत्तियां दूर हो सकें। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि ऐसे साहस दिखाने वाली आत्माएं हमारे बीच से लगातार कम होती जा रही हैं।
दुनिया का काम है बदलना...लेकिन जिंदगी में कई परंपराएं ऐसी होती हैं, जिनका बदलना कम से कम संवेदनशील मन को परेशान कर देता है। शस्य परंपरा से जुड़े हमारे त्यौहारों की पारंपरिक निरंतरता हमारी जिंदगियों में हर बार नया रस भरती रही हैं। जिंदगी की जड़ों से जुड़े रहने का यह जज्बा ही रहा है कि ये त्यौहार अपनी निरंतरता में बने पारंपरिक ही रहे हैं। शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह पारंपरिक निरंतरता भी एक दिन बदल जाएगी। लेकिन उदारीकरण ने वह कर दिखाया, जिससे सदियों की सांस्कृतिक विरासत में भी बदलाव नजर आने लगा। बहरहाल यह मौका इस बदलाव की मीमांसा का नहीं है। जब से हिंदी पत्रकारिता का विकास हुआ है, सांस्कृतिक रस-गंध से जैसे-जैसे वह जुड़ती गई, सदियों पुराने त्यौहारों को भी साहित्यिक तरीके से मनाने की परंपरा विकसित होती गई। यह बदलाव नहीं, बल्कि खुद में उदात्त परंपराओं को आत्मसात होना था। हर बार जैसे ही त्यौहार आते, उनकी तैयारियां आम जिंदगी में तो होती ही थीं, पत्रकारिता और साहित्यकारिता भी इसे अपने अंदाज में मनाने की तैयारियों में जुट जाती थी। लेकिन जैसे-जैसे उदारीकरण का बिरवा पेड़ बनने की दिशा में बढ़ता जा रहा है, वैसे-वैसे कम से कम हिंदी साहित्यकारिता और पत्रकारिता अपनी इस उदात्त परंपरा से दूर होती जा रही है। जाहिर है कि इसका असर होली-दीवाली पर भी दिखने लगा है।
स्मृतियों के गलियारों में अभी-अभी धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, कादंबिनी, नंदन, पराग जैसी पत्रिकाओं के होली-दीवाली विशेषांक याद हैं। अपनी प्रति सुरक्षित कराने के लिए हम बार-बार स्टॉल वाले को याद दिलाते रहते थे। होली पर पारिवारिक पत्रिकाओं में जहां हास्य व्यंग्य से भरपूर गद्य और पद्य रचनाएं प्रकाशित की जाती थीं, वहीं बच्चों की पत्रिकाओं में स्वस्थ हास्य वाली कहानियां छापी जाती थीं। स्कूलों-कॉलेजों में होली की लंबी छुट्टियां भी होती थीं। रंग-पानी के बाद थकान इन पत्रिकाओं के साथ ही मिटाई जाती थी। पुए और गुझिया खाते हुए इन पत्रिकाओं का पारायण होता था। इस पारायण का आनंद ऐसा था कि उससे वंचित होने का खतरा उठाने को शायद ही कोई तैयार होता। पत्रिकाएं अदल-बदल कर पढ़ीं जातीं। इसके अलावा अखबारों के साप्ताहिक परिशिष्ट भी होली – दीवाली पर सुसज्जित अंक निकालते, जिनमें सुपठनयोग्य रचनाएं प्रकाशित की जाती थीं। इन अंकों और उनमें लिखने वाले लेखकों का प्रचार महीनों पहले ही शुरू हो जाता। इसी अंदाज में अखबारों के साप्ताहिक परिशिष्ट भी दो हफ्ते पहले से ही अपने अंकों का प्रचार करने लगते। दूसरे शब्दों में कहें तो साहित्यिकारिता और पत्रकारिता का अपने तरीके से होली-दीवाली मनाने का यह अंदाज था। लेकिन दुर्भाग्यवश अब यह परंपरा खत्म होती जा रही है। कहा तो जा रहा है कि उदारीकरण ने यह सब बदल कर रख दिया है। बाजार की बढ़ती पैठ ने हिंदी साहित्यिकारिता को सिर्फ बाजारोन्मुखी बनाकर रख दिया है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सचमुच बाजार ही इसके लिए उत्तरदायी है। अगर ऐसा है तो बांग्ला और मराठी में भी ऐसा बदलाव दिखता। लेकिन बांग्ला में वहां के सबसे उल्लासमय त्यौहार दुर्गापूजा को मनाने की साहित्यिक और पत्रकारीय तैयारियों में कमी नहीं आई है। बांग्ला पत्रिकाएं और अखबार अपने पूजा विशेषांकों की तैयारी महीनों पहले से शुरू कर देते हैं। बांग्ला प्रकाशनों में अपने लिए लेखकों को आरक्षित करने की होड़ महीनों पहले से ही शुरू हो जाती है। जहां पाठक का इतना खयाल रखा जाता है, वहां पाठक भी अपने प्रकाशनों के लिए इसी तरह तैयार रहते हैं। हमारे कई जानने वाले ऐसे हैं, जो विदेशों में रहते हैं लेकिन देश(बांग्ला पत्रिका) के पूजा विशेषांक के लिए हमें परेशान करते रहते हैं। उनकी मांग पूरी करने के लिए स्टॉलों की खाक छाननी पड़ती है।
होली को अपने अंदाज में कुछ स्वतंत्र तरीके से ही पत्रकारिता और साहित्य जगत के लोग मनाते रहे हैं। बनारस में फटीचर नाम से एक पत्रिका भी प्रकाशित की जाती रही है। निश्चित तौर पर उसमें फूहड़ हास्य सामग्री नहीं प्रकाशित की जाती थी। लेकिन अब स्वस्थ हास्य वाले पत्रों और होलियाना पत्रिकाओं का प्रकाशन या तो खत्म हो गया है या आखिरी सांसें ले रहा है। लेकिन इस बीच अश्लील प्रकाशनों की बाढ़ आ गई है। जिन्हें बाजार की मांग के नाम पर परोसा जा रहा है। सच तो यह है कि मनुष्य के अंदर हमेशा एक राक्षस बैठा रहता है। मर्यादाएं और संस्कार ही उसे मनुष्य बनाए रखते हैं। बाजारवाद ने इसी राक्षस को आगे आने का बहाना दे दिया है। सांस्कृतिक रस-गंध से जुड़े रहे हमारे त्यौहार इन राक्षसी वृत्तियों पर लगाम लगाते रहे हैं। लेकिन बाजारवाद के नाम पर यह कड़ी भी कमजोर हुई है। ऐसे में साहित्यकारिता और पत्रकारिता पर सबसे अहम उत्तरदायित्व आ जाता है। सांस्कृतिक रस-गंध की परंपरा को बनाए रखते हुए ऐसे माहौल की तरफ आगे बढ़ना, ताकि जिंदगी से राक्षसी वृत्तियां दूर हो सकें। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि ऐसे साहस दिखाने वाली आत्माएं हमारे बीच से लगातार कम होती जा रही हैं।
शनिवार, 12 मार्च 2011
रेटिंग पर टिकी हिंदी विमर्श की दुनिया
उमेश चतुर्वेदी
हिंदी पत्रकारिता एक रोग से काफी पहले से प्रभावित रही है...उसे खालिस हिंदी के विचारक पसंद नहीं रहे हैं। उसे लगता रहा है कि हिंदी में विमर्श हो ही नहीं सकता। उसे अंग्रेजी में सोचने-विचारने वाले विचारक ही पसंद रहे हैं। इसलिए हिंदी अखबारों के विचार पृष्ठों पर अंग्रेजी विमर्श को प्रमुखता से जगह मिलती रही है। कुछ ऐसी ही हालत इन दिनों हिंदी विमर्श की दुनिया की भी है। गोष्ठियों और समारोहों में इन दिनों टेलीविजन पत्रकारिता के नामचीन चेहरे जगह खूब जगह बना रहे हैं। टेलीविजन के पर्दे पर चमकते रहे चेहरों की मांग गोष्ठियों और समारोहों में खूब बन आई है। इनमें भी एंकरिंग कर रहे लोगों की पूछ-परख कहीं ज्यादा है। पत्रकारिता में एक कहावत कही जाती रही है जैक फॉर ऑल...कुछ इसी अंदाज में नई मीडिया से लेकर दुनिया में आ रहे सामाजिक बदलाव को लेकर जब भी चर्चा हो रही है, टेलीविजन के पर्दे पर नुमाया होते रहे चेहरे इन गोष्ठियों की शान बन रहे हैं। अगर चर्चा महिला आरक्षण को लेकर हुई या फिर विमर्श का विषय महिला सशक्तिकरण...हिंदी की दुनिया को दूसरे अनुशासनों के लोगों पर नजर ही नहीं जाती। विमर्श की दुनिया में महिला एंकरों की मांग भी कुछ ज्यादा है। हिंदी अखबारों के संपादकीय पृष्ठों को देखिए तो लगता है कि अंग्रेजी के बिना हिंदी विमर्श अधूरा है। कुछ इसी अंदाज में लगता है कि हिंदी में अगर कहीं कोई विमर्श हो रहा है तो वह सिर्फ टेलीविजन की दुनिया में ही हो रहा है। दिलचस्प बात यह है कि टीआरपी के दौर में सबसे ज्यादा गाली हिंदी की टीवी पत्रकारिता को ही दी जा रही है। पत्रकारिता का नाश करने के लिए हिंदी का विमर्शशील समाज सबसे ज्यादा हिंदी के खबरिया चैनलों को ही जिम्मेदार ठहरा रहा है। लेकिन जब उसे सार्वजनिक समारोहों में कभी वक्ता की जरूरत पड़ती है तो उसका ध्यान सबसे पहले टेलीविजन की दुनिया पर ही जाता है। ऐसे में विमर्श की पहली पसंद बनते हैं एंकर। नई मीडिया से लेकर हिंदी से होते हुए महिला आरक्षण और महिला सशक्तिकरण तक हर जगह विमर्श के लिए ये लोग उपस्थित हो जाते हैं। इनमें कुछ बड़े नाम हैं तो कुछ नए और बेहद अनचीन्हे भी हैं। गोष्ठियों और सेमिनारों के आयोजकों को उनकी पृष्ठभूमि, उनके पुराने काम तक की जानकारी नहीं होती। अभी हाल ही में न्यू मीडिया पर एक राजधानी दिल्ली में एक गोष्ठी हुई..उसमें बुलाए गए ज्यादातर लोग एक दौर तक न्यू मीडिया का विरोध करते थे। ज्यादातर नई मीडिया के बारे में कोई योगदान नहीं था। इसी तरह राजधानी से सटे एक विश्वविद्यालय में महिला सशक्तिकरण पर सेमिनार हुआ तो महिला एंकरों को बुलाया गया। हालांकि उनमें से एक-दो को छोड़कर अधिकांश का कोई काम महिला सशक्तिकरण की दुनिया में कोई योगदान नहीं था। उनकी कोई परख तक नहीं थी। इसी तरह हिंदी की दुनिया को लेकर भी एक गोष्ठी हुई तो वहां भी टेलीविजन पर नुमाया होने वाले चेहरे भी बुला लिए गए। उनमें हिंदी को बिगाड़ने में महती भूमिका निभाने वाले नाम भी शामिल थे।
ऐसा नहीं कि टीवी पर्दे पर नुमाया होने वाले चेहरे दिमागदार नहीं हो सकते...विमर्श की दुनिया में उनका योगदान नहीं हो सकता...लेकिन यह भी जरूरी नहीं कि टीवी पर नुमाया होने वाले सारे चेहरे सचमुच विमर्शशील ही होंगे। सच तो यह है कि टेलीविजन में पर्दे के पीछे की दुनिया सामने नुमाया होने वाली दुनिया से कहीं ज्यादा बड़ी होती है। कई हाथ मिलकर एक चेहरे के जरिए कोई खबर या प्रोग्राम पेश करते हैं। उनमें कहीं ज्यादा दिमागदार और विमर्शशील लोग होते हैं। यह सच है कि इसकी जानकारी आम लोगों को नहीं है। लेकिन अगर कोई विमर्श करने या कराने जा रहा है तो उसे औरों से अलग होना ही चाहिए..कुछ बेहतर भी होना चाहिए। इसलिए उन्हें तो कम से अपने समारोहों में बुलाने वाले लोगों की पृष्ठभूमि या उनके विषय से संबंधित क्षेत्र में काम कर चुके लोगों की जानकारी तो होनी ही चाहिए। अगर ऐसा नहीं है तो काहे के वे आयोजक और काहे का विमर्श।
हिंदी में दरअसल आजकल ज्यादातर विमर्श का नाटक हो रहा है। सबसे बड़ी बिडंबना यह है कि टीआरपी को गाली देने वाला हिंदी के कथित बौद्धिक समाज को सबसे बड़ी चिंता अपने यहां श्रोताओं को जुटाने की रहती है। उन्हें लगता है कि अगर उनके यहां बोलने के लिए किसी लोकप्रिय टीवी चैनल का लोकप्रिय नाम आएगा तो श्रोताओं की भीड़ जुटेगी और उनका कार्यक्रम कामयाब होगा। जहां विमर्श की बुनियाद ही रेटिंग हासिल करने पर आधारित हो, वहां सार्थक विमर्श की उम्मीद भी बेमानी बनी रहेगी। ऐसे में गंभीर और कुछ रचनात्मक बदलाव लाने वाले श्रोताओं का अभाव बना रहेगा। हां, टीआरपी का खेल जारी रहेगा।
हिंदी पत्रकारिता एक रोग से काफी पहले से प्रभावित रही है...उसे खालिस हिंदी के विचारक पसंद नहीं रहे हैं। उसे लगता रहा है कि हिंदी में विमर्श हो ही नहीं सकता। उसे अंग्रेजी में सोचने-विचारने वाले विचारक ही पसंद रहे हैं। इसलिए हिंदी अखबारों के विचार पृष्ठों पर अंग्रेजी विमर्श को प्रमुखता से जगह मिलती रही है। कुछ ऐसी ही हालत इन दिनों हिंदी विमर्श की दुनिया की भी है। गोष्ठियों और समारोहों में इन दिनों टेलीविजन पत्रकारिता के नामचीन चेहरे जगह खूब जगह बना रहे हैं। टेलीविजन के पर्दे पर चमकते रहे चेहरों की मांग गोष्ठियों और समारोहों में खूब बन आई है। इनमें भी एंकरिंग कर रहे लोगों की पूछ-परख कहीं ज्यादा है। पत्रकारिता में एक कहावत कही जाती रही है जैक फॉर ऑल...कुछ इसी अंदाज में नई मीडिया से लेकर दुनिया में आ रहे सामाजिक बदलाव को लेकर जब भी चर्चा हो रही है, टेलीविजन के पर्दे पर नुमाया होते रहे चेहरे इन गोष्ठियों की शान बन रहे हैं। अगर चर्चा महिला आरक्षण को लेकर हुई या फिर विमर्श का विषय महिला सशक्तिकरण...हिंदी की दुनिया को दूसरे अनुशासनों के लोगों पर नजर ही नहीं जाती। विमर्श की दुनिया में महिला एंकरों की मांग भी कुछ ज्यादा है। हिंदी अखबारों के संपादकीय पृष्ठों को देखिए तो लगता है कि अंग्रेजी के बिना हिंदी विमर्श अधूरा है। कुछ इसी अंदाज में लगता है कि हिंदी में अगर कहीं कोई विमर्श हो रहा है तो वह सिर्फ टेलीविजन की दुनिया में ही हो रहा है। दिलचस्प बात यह है कि टीआरपी के दौर में सबसे ज्यादा गाली हिंदी की टीवी पत्रकारिता को ही दी जा रही है। पत्रकारिता का नाश करने के लिए हिंदी का विमर्शशील समाज सबसे ज्यादा हिंदी के खबरिया चैनलों को ही जिम्मेदार ठहरा रहा है। लेकिन जब उसे सार्वजनिक समारोहों में कभी वक्ता की जरूरत पड़ती है तो उसका ध्यान सबसे पहले टेलीविजन की दुनिया पर ही जाता है। ऐसे में विमर्श की पहली पसंद बनते हैं एंकर। नई मीडिया से लेकर हिंदी से होते हुए महिला आरक्षण और महिला सशक्तिकरण तक हर जगह विमर्श के लिए ये लोग उपस्थित हो जाते हैं। इनमें कुछ बड़े नाम हैं तो कुछ नए और बेहद अनचीन्हे भी हैं। गोष्ठियों और सेमिनारों के आयोजकों को उनकी पृष्ठभूमि, उनके पुराने काम तक की जानकारी नहीं होती। अभी हाल ही में न्यू मीडिया पर एक राजधानी दिल्ली में एक गोष्ठी हुई..उसमें बुलाए गए ज्यादातर लोग एक दौर तक न्यू मीडिया का विरोध करते थे। ज्यादातर नई मीडिया के बारे में कोई योगदान नहीं था। इसी तरह राजधानी से सटे एक विश्वविद्यालय में महिला सशक्तिकरण पर सेमिनार हुआ तो महिला एंकरों को बुलाया गया। हालांकि उनमें से एक-दो को छोड़कर अधिकांश का कोई काम महिला सशक्तिकरण की दुनिया में कोई योगदान नहीं था। उनकी कोई परख तक नहीं थी। इसी तरह हिंदी की दुनिया को लेकर भी एक गोष्ठी हुई तो वहां भी टेलीविजन पर नुमाया होने वाले चेहरे भी बुला लिए गए। उनमें हिंदी को बिगाड़ने में महती भूमिका निभाने वाले नाम भी शामिल थे।
ऐसा नहीं कि टीवी पर्दे पर नुमाया होने वाले चेहरे दिमागदार नहीं हो सकते...विमर्श की दुनिया में उनका योगदान नहीं हो सकता...लेकिन यह भी जरूरी नहीं कि टीवी पर नुमाया होने वाले सारे चेहरे सचमुच विमर्शशील ही होंगे। सच तो यह है कि टेलीविजन में पर्दे के पीछे की दुनिया सामने नुमाया होने वाली दुनिया से कहीं ज्यादा बड़ी होती है। कई हाथ मिलकर एक चेहरे के जरिए कोई खबर या प्रोग्राम पेश करते हैं। उनमें कहीं ज्यादा दिमागदार और विमर्शशील लोग होते हैं। यह सच है कि इसकी जानकारी आम लोगों को नहीं है। लेकिन अगर कोई विमर्श करने या कराने जा रहा है तो उसे औरों से अलग होना ही चाहिए..कुछ बेहतर भी होना चाहिए। इसलिए उन्हें तो कम से अपने समारोहों में बुलाने वाले लोगों की पृष्ठभूमि या उनके विषय से संबंधित क्षेत्र में काम कर चुके लोगों की जानकारी तो होनी ही चाहिए। अगर ऐसा नहीं है तो काहे के वे आयोजक और काहे का विमर्श।
हिंदी में दरअसल आजकल ज्यादातर विमर्श का नाटक हो रहा है। सबसे बड़ी बिडंबना यह है कि टीआरपी को गाली देने वाला हिंदी के कथित बौद्धिक समाज को सबसे बड़ी चिंता अपने यहां श्रोताओं को जुटाने की रहती है। उन्हें लगता है कि अगर उनके यहां बोलने के लिए किसी लोकप्रिय टीवी चैनल का लोकप्रिय नाम आएगा तो श्रोताओं की भीड़ जुटेगी और उनका कार्यक्रम कामयाब होगा। जहां विमर्श की बुनियाद ही रेटिंग हासिल करने पर आधारित हो, वहां सार्थक विमर्श की उम्मीद भी बेमानी बनी रहेगी। ऐसे में गंभीर और कुछ रचनात्मक बदलाव लाने वाले श्रोताओं का अभाव बना रहेगा। हां, टीआरपी का खेल जारी रहेगा।
शनिवार, 5 मार्च 2011
हिंदी की कौन कर रहा जुगाली
उमेश चतुर्वेदी
हिंदी का विकास किसने किया है, इसे लेकर विवाद रहा है। विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ा रहे विद्वानों को इस बात का गुमान है कि आज जो हिंदी गढ़ी और बनाई जा रही है, उसके पीछे उनका ही योगदान है। पढ़ाने के अलावा राजनीति की दुनिया में रमते रहे अधिसंख्य हिंदी अध्यापकों का यह गुमान अध्यापक रहे नामवर सिंह ने ही तो़ड़ दिया है। दिलचस्प बात यह है कि नामवर सिंह अपने समूचे सक्रिय और कार्यशील जीवन में प्रमुखत: अध्यापक ही रहे हैं। भोपाल के पत्रकार अजित वरनेकर की किताब ‘शब्दों का सफर’ के लोकार्पण और उस पर हिंदी के महत्वपूर्ण प्रकाशक राजकमल प्रकाशन की ओर से एक लाख का पुरस्कार अजित को देते वक्त नामवर सिंह ने जो कहा, उसे अध्यापकों को नोट कर लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि हिंदी को अध्यापकों ने नहीं, पत्रकारों ने गढ़ा है। इसके लिए हिंदी के सबसे पहले प्रतापी संपादक महावीर प्रसाद द्विवेदी और बाबू बालमुकुंद गुप्त के बीच अनस्थिर शब्द को लेकर मचे बवाल का उल्लेख करते हुए नामवर सिंह ने जब यह स्थापना रखी तो उस समारोह में हिंदी पढ़ाने वाले ढेर सारे अध्यापक मौजूद थे। लेकिन उनके चेहरे पर स्यापा छा गया। अगर यह कथन नामवर सिंह की जगह किसी पत्रकार की जुबान से निकला होता तो विश्वविद्यालय के धुरंधर लोग उस पत्रकार का मजाक ही उड़ाते, चाहे वह पत्रकार कितना ही मूर्धन्य क्यों न रहा हो। लेकिन उनका दुर्भाग्य यह कि उनका पाला किसी पत्रकार से नहीं, हिंदी के ठेठ अध्यापक से पड़ा था। नामवर सिंह कितने सही है, इसका अंदाज इन पंक्तियों के लेखक को गाहे-बगाहे होता रहा है। हाल ही में दिल्ली के एक महाविद्यालय में न्यू मीडिया को लेकर एक गोष्ठी हुई। उदारीकरण के दौर में स्ववित्तपोषित पाठ्यक्रम शुरू करने की इजाजत विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को दे रखी है। इसका फायदा उठाते हुए तमाम कॉलेजों ने अपने यहां पत्रकारिता का पाठ्यक्रम शुरू कर रखा है। हिंदी या अंग्रेजी विभागों के अधीन यह कोर्स चल रहा है। ये अध्यापक अब अपने को पत्रकारिता का अध्येता भी समझ बैठे हैं। उन्हें लगता है कि बाल मुकुंद गुप्त से लेकर अज्ञेय तक ही हिंदी में पत्रकारिता हुई है। प्रभाष जोशी तक तो उन्हें पता है। लेकिन उसके बाद राहुल देव, प्रणय राय, अच्युतानंद मिश्र. जैसे नाम तो इन विभाग प्रमुखों तक को पता नहीं है। हिंदी में सक्रिय नव पत्रकारों की बात तो इनके लिए बेमानी है। उनके लिए भाषा अब भी महादेवी वर्मा और अज्ञेय तक ही लटकी हुई है। उसके आगे भी हिंदी ने कुछ विकास किया है, उन्हें इसे जानने की जरूरत ही नहीं है। हिंदी की समकालीन पत्रकारिता की बात कौन कहे, समकालीन लेखन तक की तमीज नहीं है। ऐसे में उनसे भाषा के विकास की उम्मीद करना ही बेमानी है। न्यू मीडिया की गोष्ठी में भी अध्यापक गणों की चर्चा में महावीर प्रसाद द्विवेदी और बाल मुकुंद गुप्त या अध्यापक पूर्ण सिंह ही मौजूद थे। न्यू मीडिया यानी इंटरनेट क्या है , उसकी दुनिया कैसे बदल रही है, तकनीक भाषा के साथ कैसा खिलवाड़ कर रही है और उसके दबाव में भाषा कैसे बदल रही है, इसकी जानकारी शायद ही किसी अध्यापक को थी। जाहिर है कि वे अध्यापक सिर्फ जुगाली कर रहे थे और अपने परिचितों को बुलाकर इस जुगाली का आर्थिक और कथित ज्ञानाश्रयी फायदा उठा-लुटा रहे थे। ऐसे में पाठकगण अंदाज लगा सकते हैं कि विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ा रहे अध्यापक गण हिंदी का कितना विकास कर रहे हैं।
अब आते हैं नामवर सिंह की बात पर...हिंदी गद्य को गद्यपर्व निश्चित तौर पर महावीर प्रसाद द्विवेदी जैसे धुरंधर पत्रकारों ने ही बनाया। लेकिन हम मुंशी सदासुख लाल और लल्लू लाल जैसे अध्यापकों को कैसे भूल सकते हैं। अंग्रेज अधिकारियों को भारतीय भाषाओं की ट्रेनिंग देने के लिए स्थापित कोलकाता के फोर्ट बिलियम कॉलेज में हिंदी पढ़ाने वाले इन अध्यापकों ने हिंदी के विकास के लिए ही सुख सागर और प्रेम सागर जैसे ग्रंथ लिखे। जिनका प्रचार इतना हुआ कि उन्हें घर-घर में धार्मिक ग्रंथों की तरह रखा जाने लगा। यानी जरूरत पड़ी तो अध्यापकों ने भी हिंदी के विकास यज्ञ में हिस्सा बंटाया है। यह बात और है कि आज के ज्यादातर हिंदी अध्यापकों को सिर्फ विश्वविद्यालयी राजनीति से मतलब है। हिंदी पढ़ाने की बजाय उन्हें उसकी जुगाली ही पसंद है। लेकिन इसका यह भी मतलब नहीं है कि आज के हिंदी पत्रकार सिर्फ हिंदी को गढ़ ही रहे हैं। हिंदी के साथ जितना अनाचार नव हिंदी पत्रकार कर रहे हैं, वह भी क्षमा के काबिल नहीं है।
हिंदी का विकास किसने किया है, इसे लेकर विवाद रहा है। विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ा रहे विद्वानों को इस बात का गुमान है कि आज जो हिंदी गढ़ी और बनाई जा रही है, उसके पीछे उनका ही योगदान है। पढ़ाने के अलावा राजनीति की दुनिया में रमते रहे अधिसंख्य हिंदी अध्यापकों का यह गुमान अध्यापक रहे नामवर सिंह ने ही तो़ड़ दिया है। दिलचस्प बात यह है कि नामवर सिंह अपने समूचे सक्रिय और कार्यशील जीवन में प्रमुखत: अध्यापक ही रहे हैं। भोपाल के पत्रकार अजित वरनेकर की किताब ‘शब्दों का सफर’ के लोकार्पण और उस पर हिंदी के महत्वपूर्ण प्रकाशक राजकमल प्रकाशन की ओर से एक लाख का पुरस्कार अजित को देते वक्त नामवर सिंह ने जो कहा, उसे अध्यापकों को नोट कर लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि हिंदी को अध्यापकों ने नहीं, पत्रकारों ने गढ़ा है। इसके लिए हिंदी के सबसे पहले प्रतापी संपादक महावीर प्रसाद द्विवेदी और बाबू बालमुकुंद गुप्त के बीच अनस्थिर शब्द को लेकर मचे बवाल का उल्लेख करते हुए नामवर सिंह ने जब यह स्थापना रखी तो उस समारोह में हिंदी पढ़ाने वाले ढेर सारे अध्यापक मौजूद थे। लेकिन उनके चेहरे पर स्यापा छा गया। अगर यह कथन नामवर सिंह की जगह किसी पत्रकार की जुबान से निकला होता तो विश्वविद्यालय के धुरंधर लोग उस पत्रकार का मजाक ही उड़ाते, चाहे वह पत्रकार कितना ही मूर्धन्य क्यों न रहा हो। लेकिन उनका दुर्भाग्य यह कि उनका पाला किसी पत्रकार से नहीं, हिंदी के ठेठ अध्यापक से पड़ा था। नामवर सिंह कितने सही है, इसका अंदाज इन पंक्तियों के लेखक को गाहे-बगाहे होता रहा है। हाल ही में दिल्ली के एक महाविद्यालय में न्यू मीडिया को लेकर एक गोष्ठी हुई। उदारीकरण के दौर में स्ववित्तपोषित पाठ्यक्रम शुरू करने की इजाजत विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को दे रखी है। इसका फायदा उठाते हुए तमाम कॉलेजों ने अपने यहां पत्रकारिता का पाठ्यक्रम शुरू कर रखा है। हिंदी या अंग्रेजी विभागों के अधीन यह कोर्स चल रहा है। ये अध्यापक अब अपने को पत्रकारिता का अध्येता भी समझ बैठे हैं। उन्हें लगता है कि बाल मुकुंद गुप्त से लेकर अज्ञेय तक ही हिंदी में पत्रकारिता हुई है। प्रभाष जोशी तक तो उन्हें पता है। लेकिन उसके बाद राहुल देव, प्रणय राय, अच्युतानंद मिश्र. जैसे नाम तो इन विभाग प्रमुखों तक को पता नहीं है। हिंदी में सक्रिय नव पत्रकारों की बात तो इनके लिए बेमानी है। उनके लिए भाषा अब भी महादेवी वर्मा और अज्ञेय तक ही लटकी हुई है। उसके आगे भी हिंदी ने कुछ विकास किया है, उन्हें इसे जानने की जरूरत ही नहीं है। हिंदी की समकालीन पत्रकारिता की बात कौन कहे, समकालीन लेखन तक की तमीज नहीं है। ऐसे में उनसे भाषा के विकास की उम्मीद करना ही बेमानी है। न्यू मीडिया की गोष्ठी में भी अध्यापक गणों की चर्चा में महावीर प्रसाद द्विवेदी और बाल मुकुंद गुप्त या अध्यापक पूर्ण सिंह ही मौजूद थे। न्यू मीडिया यानी इंटरनेट क्या है , उसकी दुनिया कैसे बदल रही है, तकनीक भाषा के साथ कैसा खिलवाड़ कर रही है और उसके दबाव में भाषा कैसे बदल रही है, इसकी जानकारी शायद ही किसी अध्यापक को थी। जाहिर है कि वे अध्यापक सिर्फ जुगाली कर रहे थे और अपने परिचितों को बुलाकर इस जुगाली का आर्थिक और कथित ज्ञानाश्रयी फायदा उठा-लुटा रहे थे। ऐसे में पाठकगण अंदाज लगा सकते हैं कि विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ा रहे अध्यापक गण हिंदी का कितना विकास कर रहे हैं।
अब आते हैं नामवर सिंह की बात पर...हिंदी गद्य को गद्यपर्व निश्चित तौर पर महावीर प्रसाद द्विवेदी जैसे धुरंधर पत्रकारों ने ही बनाया। लेकिन हम मुंशी सदासुख लाल और लल्लू लाल जैसे अध्यापकों को कैसे भूल सकते हैं। अंग्रेज अधिकारियों को भारतीय भाषाओं की ट्रेनिंग देने के लिए स्थापित कोलकाता के फोर्ट बिलियम कॉलेज में हिंदी पढ़ाने वाले इन अध्यापकों ने हिंदी के विकास के लिए ही सुख सागर और प्रेम सागर जैसे ग्रंथ लिखे। जिनका प्रचार इतना हुआ कि उन्हें घर-घर में धार्मिक ग्रंथों की तरह रखा जाने लगा। यानी जरूरत पड़ी तो अध्यापकों ने भी हिंदी के विकास यज्ञ में हिस्सा बंटाया है। यह बात और है कि आज के ज्यादातर हिंदी अध्यापकों को सिर्फ विश्वविद्यालयी राजनीति से मतलब है। हिंदी पढ़ाने की बजाय उन्हें उसकी जुगाली ही पसंद है। लेकिन इसका यह भी मतलब नहीं है कि आज के हिंदी पत्रकार सिर्फ हिंदी को गढ़ ही रहे हैं। हिंदी के साथ जितना अनाचार नव हिंदी पत्रकार कर रहे हैं, वह भी क्षमा के काबिल नहीं है।
रविवार, 27 फ़रवरी 2011
साहित्यिक चर्चाओं में गालियां
उमेश चतुर्वेदी
भाषा के अब तक दो ही रूप पढ़ाए जाते रहे हैं- लौकिक और साहित्यिक। संस्कृत चूंकि एक दौर में वेदों की पर्याय मानी जाती रही, लिहाजा यह भाषाई वर्गीकरण वहां लौकिक और वैदिक के तौर पर है। साहित्यिक समारोहों ही नहीं, औपचारिक माहौल में हमारे यहां गालियों के इस्तेमाल से परहेज रहा है। लेकिन पिछले दिनों जयपुर में हुए जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में भारतीय मूल के एक लेखक जीत तायल ने अपनी नई अंग्रेजी पुस्तक के कुछ अंश पढ़े तो उनकी किताब में इस्तेमाल हिंदी की ठेठ देसज गालियों के इस्तेमाल ने प्रबुद्ध लेखकों को भले ही नहीं चौंकाया, लेकिन स्थानीय पाठकों को हैरत जरूर हुई। गालियों का सार्वजनिक इस्तेमाल वह भी औपचारिक आयोजनों में होने का जयपुर वासियों के लिए शायद यह पहला अनुभव था। उनकी चिंताओं की वजह यही रही। वैसे अपने यहां मांगलिक कार्यक्रमों में गाली देने का रिवाज रहा है। शादी-विवाह के मौकों पर समधी और रिश्तेदारों की खातिरदारी तब तक पूरी नहीं मानी जाती रही है, जब तक उन्हें गालियों के माहौल में खिलाया-पिलाया न जाए। रामचरित मानस में राम विवाह के वक्त गालियों के इस्तेमाल का चित्रण तुलसीदास ने भी किया है। लेकिन उन गालियों में एक हद तक शिष्टता होती थी। अगर इन गालियों का सामाजिक अध्ययन किया जाय तो पता चलेगा कि गालियों में शिष्टाचार दरअसल जातिगत आधार पर था। नीची जातियों में मंगल मौकों पर गाई जाने वाली गालियां उच्चतर जातियों की गालियों से कहीं ज्यादा फूहड़ होती थीं। तब माना जाता था कि शिक्षा के प्रसार के चलते उच्चतर जातियों में गालियों का शिष्टाचार कुछ दूसरे अंदाज में दिखता है। उत्तर भारत में होली के मौके पर गालियों की बौछार की परंपरा रही है। दुनिया के सबसे पुराने शहर के खिताब से नवाजे जाते रहे वाराणसी में होली का कवि सम्मेलन मशहूर है। इस सम्मेलन में ठेठ गालियों से ही समाज के कुल-शील लोगों का स्वागत होता रहा है। गालियों के स्वागत की साख ऐसी है कि अगर शहर के सम्मानजन्य लोगों का इस सम्मेलन में नाम नहीं लिया जाता तो उसका मतलब यही माना जाता है कि अब उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं रही। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के भोजपुरी इलाके में गोंड़ऊ नाम लोकनृत्य का प्रचलन रहा है। डमरू जैसे बड़े वाद्य हुड़का और मंजीरे की थाप पर इस लोकनृत्य के प्रमुख कलाकार सामाजिक समस्याओं को उभारते रहे हैं। इन लोकनृत्य़ों में भक्ति की धारा भी बहती रही है। लेकिन उनका विदूषक ठेठ और गंदी गालियों से ही लोगों का स्वागत करता रहा है। इन विदूषकों के बारे में भी माना जाता रहा है कि अगर उन्होंने अपनी गालियों में गांव के प्रमुख लोगों का नाम नहीं लिया तो उसका मतलब यह है कि उनकी नजर में उस रसूखदार की कोई खास वकत नहीं है। जाहिर है कि भारतीय समाज में गालियों की परंपरा और गाहे-बगाहे की सामाजिक मान्यता रही है। लेकिन इन गालियों पर आज अगर चर्चा हो रही है तो इसकी बड़ी वजह यह है कि अब इन गालियों ने नागर समाज की सामाजिक परिधि को तोड़ डाला है। वह लौकिक से साहित्यिक गढ़ों में सेंध लगाती जा रही है। इसकी शुरूआत आपको यथार्थवादी रचनाओं में दिखती है। नई कहानियों में जब गांवों और समाज के निचले तबके को रचना का आधार बनाना शुरू किया तो वहां गालियों की बौछार शुरू हो गई। निश्चित तौर पर हंस और कथादेश में छपी कहानियों से इसकी शुरूआत होती है। हिंदी फिल्मों में गालियों की शुरूआत फूलन देवी की जिंदगी पर आधारित फिल्म बैंडिट क्विन में होती है। मां-बहन की गालियां इस फिल्म में धड़ल्ले से इस्तेमाल हुई। विवाद तो तब भी हुआ। कहानियों में गालियों की बौछारों को प्रकाशित करने वाले हंस ने भी इस फिल्म में आई गालियों पर बहस कराई। हाल के दिनों में आई फिल्म इश्किया में भी गालियों की जमकर इस्तेमाल हुआ। हाल के दिनों में आई फिल्म नो वन किल्ड जेसिका और ओंकारा तक में गालियों का जमकर इस्तेमाल हुआ है।
यथार्थवादी साहित्य और सिनेमा ने गालियों के देसज रूपों को भले ही स्वीकार कर लिया है, लेकिन अखबारों और मुख्यधारा की दूसरी पत्रकारिता में अभी इतना साहस नहीं है। हालांकि कौन नहीं जानता कि अखबारों और टेलीविजन के न्यूज रूमों में तनाव के वक्त गालियों का कितनी तेजी से इस्तेमाल होता है। लेकिन यह सिर्फ लौकिक ही रह जाता है, अखबार या पत्रिका के पन्ने और टीवी के पर्दे पर आकर साहित्यिक रूप धारण करने से बच जाता है। और ऐसा होता भी है तो इसलिए, क्योंकि माध्यमों के ये रूप अपने को कम से कम अब भी संस्कारित होने या दिखने का दबाव महसूस करते हैं। यह दबाव ही है कि फिल्मों या साहित्य में ठेठ गालियों की बाढ़ नैतिकता समेत तमाम दूसरे सवालों को उछालने के लिए मजबूर कर रही है। लेकिन यह भी सच है कि लोक संस्कृति का अंग रहने के बावजूद सभ्य समाज गालियों को अपना दैनंदिन साथी नहीं मानता रहा है। वह मांगलिक कार्यों या होली तक ही सीमित रही है। गोंड़ऊ लोकनृत्य में काम करने वाले विदूषक भी सामान्य जिंदगी में गालियों के इस्तेमाल से परहेज करते रहे हैं। कहना न होगा कि यह दबाव समाज पर काम करता रहेगा। इसीलिए साहित्य और फिल्मों में गालियों की बाढ़ पर सवाल उठते रहेंगे।
भाषा के अब तक दो ही रूप पढ़ाए जाते रहे हैं- लौकिक और साहित्यिक। संस्कृत चूंकि एक दौर में वेदों की पर्याय मानी जाती रही, लिहाजा यह भाषाई वर्गीकरण वहां लौकिक और वैदिक के तौर पर है। साहित्यिक समारोहों ही नहीं, औपचारिक माहौल में हमारे यहां गालियों के इस्तेमाल से परहेज रहा है। लेकिन पिछले दिनों जयपुर में हुए जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में भारतीय मूल के एक लेखक जीत तायल ने अपनी नई अंग्रेजी पुस्तक के कुछ अंश पढ़े तो उनकी किताब में इस्तेमाल हिंदी की ठेठ देसज गालियों के इस्तेमाल ने प्रबुद्ध लेखकों को भले ही नहीं चौंकाया, लेकिन स्थानीय पाठकों को हैरत जरूर हुई। गालियों का सार्वजनिक इस्तेमाल वह भी औपचारिक आयोजनों में होने का जयपुर वासियों के लिए शायद यह पहला अनुभव था। उनकी चिंताओं की वजह यही रही। वैसे अपने यहां मांगलिक कार्यक्रमों में गाली देने का रिवाज रहा है। शादी-विवाह के मौकों पर समधी और रिश्तेदारों की खातिरदारी तब तक पूरी नहीं मानी जाती रही है, जब तक उन्हें गालियों के माहौल में खिलाया-पिलाया न जाए। रामचरित मानस में राम विवाह के वक्त गालियों के इस्तेमाल का चित्रण तुलसीदास ने भी किया है। लेकिन उन गालियों में एक हद तक शिष्टता होती थी। अगर इन गालियों का सामाजिक अध्ययन किया जाय तो पता चलेगा कि गालियों में शिष्टाचार दरअसल जातिगत आधार पर था। नीची जातियों में मंगल मौकों पर गाई जाने वाली गालियां उच्चतर जातियों की गालियों से कहीं ज्यादा फूहड़ होती थीं। तब माना जाता था कि शिक्षा के प्रसार के चलते उच्चतर जातियों में गालियों का शिष्टाचार कुछ दूसरे अंदाज में दिखता है। उत्तर भारत में होली के मौके पर गालियों की बौछार की परंपरा रही है। दुनिया के सबसे पुराने शहर के खिताब से नवाजे जाते रहे वाराणसी में होली का कवि सम्मेलन मशहूर है। इस सम्मेलन में ठेठ गालियों से ही समाज के कुल-शील लोगों का स्वागत होता रहा है। गालियों के स्वागत की साख ऐसी है कि अगर शहर के सम्मानजन्य लोगों का इस सम्मेलन में नाम नहीं लिया जाता तो उसका मतलब यही माना जाता है कि अब उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं रही। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के भोजपुरी इलाके में गोंड़ऊ नाम लोकनृत्य का प्रचलन रहा है। डमरू जैसे बड़े वाद्य हुड़का और मंजीरे की थाप पर इस लोकनृत्य के प्रमुख कलाकार सामाजिक समस्याओं को उभारते रहे हैं। इन लोकनृत्य़ों में भक्ति की धारा भी बहती रही है। लेकिन उनका विदूषक ठेठ और गंदी गालियों से ही लोगों का स्वागत करता रहा है। इन विदूषकों के बारे में भी माना जाता रहा है कि अगर उन्होंने अपनी गालियों में गांव के प्रमुख लोगों का नाम नहीं लिया तो उसका मतलब यह है कि उनकी नजर में उस रसूखदार की कोई खास वकत नहीं है। जाहिर है कि भारतीय समाज में गालियों की परंपरा और गाहे-बगाहे की सामाजिक मान्यता रही है। लेकिन इन गालियों पर आज अगर चर्चा हो रही है तो इसकी बड़ी वजह यह है कि अब इन गालियों ने नागर समाज की सामाजिक परिधि को तोड़ डाला है। वह लौकिक से साहित्यिक गढ़ों में सेंध लगाती जा रही है। इसकी शुरूआत आपको यथार्थवादी रचनाओं में दिखती है। नई कहानियों में जब गांवों और समाज के निचले तबके को रचना का आधार बनाना शुरू किया तो वहां गालियों की बौछार शुरू हो गई। निश्चित तौर पर हंस और कथादेश में छपी कहानियों से इसकी शुरूआत होती है। हिंदी फिल्मों में गालियों की शुरूआत फूलन देवी की जिंदगी पर आधारित फिल्म बैंडिट क्विन में होती है। मां-बहन की गालियां इस फिल्म में धड़ल्ले से इस्तेमाल हुई। विवाद तो तब भी हुआ। कहानियों में गालियों की बौछारों को प्रकाशित करने वाले हंस ने भी इस फिल्म में आई गालियों पर बहस कराई। हाल के दिनों में आई फिल्म इश्किया में भी गालियों की जमकर इस्तेमाल हुआ। हाल के दिनों में आई फिल्म नो वन किल्ड जेसिका और ओंकारा तक में गालियों का जमकर इस्तेमाल हुआ है।
यथार्थवादी साहित्य और सिनेमा ने गालियों के देसज रूपों को भले ही स्वीकार कर लिया है, लेकिन अखबारों और मुख्यधारा की दूसरी पत्रकारिता में अभी इतना साहस नहीं है। हालांकि कौन नहीं जानता कि अखबारों और टेलीविजन के न्यूज रूमों में तनाव के वक्त गालियों का कितनी तेजी से इस्तेमाल होता है। लेकिन यह सिर्फ लौकिक ही रह जाता है, अखबार या पत्रिका के पन्ने और टीवी के पर्दे पर आकर साहित्यिक रूप धारण करने से बच जाता है। और ऐसा होता भी है तो इसलिए, क्योंकि माध्यमों के ये रूप अपने को कम से कम अब भी संस्कारित होने या दिखने का दबाव महसूस करते हैं। यह दबाव ही है कि फिल्मों या साहित्य में ठेठ गालियों की बाढ़ नैतिकता समेत तमाम दूसरे सवालों को उछालने के लिए मजबूर कर रही है। लेकिन यह भी सच है कि लोक संस्कृति का अंग रहने के बावजूद सभ्य समाज गालियों को अपना दैनंदिन साथी नहीं मानता रहा है। वह मांगलिक कार्यों या होली तक ही सीमित रही है। गोंड़ऊ लोकनृत्य में काम करने वाले विदूषक भी सामान्य जिंदगी में गालियों के इस्तेमाल से परहेज करते रहे हैं। कहना न होगा कि यह दबाव समाज पर काम करता रहेगा। इसीलिए साहित्य और फिल्मों में गालियों की बाढ़ पर सवाल उठते रहेंगे।
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