रविवार, 23 अगस्त 2009

अंदरखाने में भी हुई डील


उमेश चतुर्वेदी
यह लेख प्रथम प्रवक्ता के 01 सितंबर 2009 के अंक में प्रकाशित हुआ है।
भारतीय लोकतंत्र में इस बात पर शक नहीं है कि इस देश का सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री का पद है। जाहिर है उन्हें नियंत्रित करने वाली पार्टियों के अध्यक्ष की ताकत भी कम नहीं होगी। इस देश में शायद ही कोई मानेगा कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उनके निर्देशन में काम करने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी मीडिया के सामने कमजोर होंगे। लेकिन ये सोलह आने सही है कि पिछले आम चुनावों में देश की सत्ता संभाल रहे ये दोनों दिग्गज भी कमजोर साबित हुए। चुनावी समर के दौरान सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह को भी मीडिया को अंदरखाने में पैकेज देना पड़ा। नाम ना छापने की शर्त पर कांग्रेस पार्टी के ही एक रसूखदार नेता को इस तथ्य को स्वीकार करने से गुरेज नहीं है।
चुनाव के दौरान प्रत्याशियों के पक्ष में खबर छापने और पैसे या पैकेज डील ना करने वाले प्रत्याशियों की खबरों को सिरे से नकार देने का आरोप तो मीडिया पर लग ही रहा है। पैसे कमाने की इस बहती गंगा में हाथ धोने में देश के कई बड़े मीडिया घरानों के बारे में खुलेआम सवाल-जवाब हो ही रहे हैं। इसे लेकर आरोपी मीडिया को भी बचाव में उतरना पड़ा है। लेकिन ये भी सच है कि एक-एक वोट के जुगाड़ में लगी कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी जैसी पार्टियों ने मीडिया के एक बड़े धड़े की इस जायज-नाजायज मांग के आगे घुटने टेकने में ही अपनी भलाई समझी। भारतीय जनता पार्टी के सांसद और वरिष्ठ पत्रकार चंदन मित्रा देश के बड़े खबरिया चैनलों पर आरोप लगा ही चुके हैं कि उन्होंने एक संगठन बनाकर पार्टियों से विज्ञापन बटोरे। लेकिन कांग्रेस नेता का खुलासा इससे आगे की बात बता रहा है। उन्होंने कहा कि कई बड़े चैनलों ने अंदरखाने में उनसे बिना किसी रसीद और पक्की खाता-बही के भी पैसे लिए। इसमें कई बड़े और नामी पत्रकार भी शामिल हैं। उत्तर प्रदेश के एक नेता ने भी नाम ना छापने की शर्त पर बताया कि एक चैनल ने तो बाकायदा बीएसपी के नेताओं से भी अंदरखाने में डीलिंग की। जिसमें उसके संपादक का ही बड़ा हाथ रहा।
वैसे स्थानीय और जिला स्तर पर ऐसे आरोप पहले भी लगते रहे हैं। कुछ तथ्यों में सच्चाई भी रही है। कुछ एक लोग राष्ट्रीय स्तर पर भी ऐसा करते रहे होंगे। लेकिन आमतौर पर पत्रकारिता के मूल मानदंडों का खयाल रखा जाता था। लेकिन इस बार इसे खुलकर स्वीकार किया गया, यही वजह है कि इस बार सवाल भी ज्यादा उठ रहे हैं। वैसे सच तो ये है कि मध्य प्रदेश के एक अखबार ने 1996 के स्थानीय चुनावों में अपनी जिला यूनिटों को प्रत्याशियों से कमाई का लक्ष्य दिया था। जिसने नहीं दिया, उनका अखबार ने बॉयकाट किया और इसकी कीमत उन प्रत्याशियों को चुकानी पड़ी थी। लेकिन कमाई का ये रास्ता चल निकला तो इसे मीडिया घरानों ने अपनाने में देर नहीं लगाई।
धीरे-धीरे ये रोग पूरे देश में फैलने लगा। पंजाब के पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के एक प्रचार प्रभारी को इस नई परिपाटी से पहली बार साबका पड़ा। अब तक वे जानते थे कि प्रचार के लिए राज्य या राष्ट्रीय मुख्यालय से अपने लक्ष्य समूह वाले अखबारों और टीवी चैनलों को विज्ञापन जारी किया जाता है। लेकिन उस विधानसभा चुनाव में पहली बार उन्हें पता चला कि मीडिया घरानों ने अपनी जिला यूनिटों को लक्ष्य दे रखे थे। अब मरता पत्रकार क्या ना करता, लिहाजा दो-दो तीन-तीन संस्थानों के स्थानीय पत्रकारों ने आपस में गुट बनाकर खुद की मार्केटिंग की और दबाव बनाकर उनसे विज्ञापन की मांग की। इसके कुछ महीनों बाद गुजरात में विधानसभा चुनाव हुए। जब वे गुजरात के चुनाव प्रचार के समंदर में उतरे तो वहां भी पत्रकारीय भ्रष्टाचार की इस गंगा से साबका पड़ा। रही-सही कसर लोकसभा चुनावों में पूरी हो गई। लिहाजा अब तो वे मान के चलते हैं कि हर राज्य में उन्हें ऐसा ही अनुभव होने वाला है।
जिस तरह से मीडिया के एक वर्ग की जायज-नाजायज मांगों के सामने बड़े – बड़े दलों के बड़े नेताओं तक को झुकना पड़ा, उससे साफ है कि आज मीडिया कितना ताकतवर हो गया है और एक-एक वोट की जुगत में जुटे नेताओं के लिए ऐसे मीडिया को नकारना भी उनके लिए आसान नहीं रहा। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल ये है कि भ्रष्टाचार पर सवाल उठाने की ताकत रखने वाले मीडिया संस्थान इस परिपाटी के बाद क्या सरकार और नेताओं पर उसी आक्रामकता से सवाल उठा सकेंगे। इसका जवाब पाना फिलहाल आसान नहीं लगता। लेकिन इसके साथ ये भी सच है कि जो पार्टी या उसके ताकतवर नेता मीडिया की इस नाजायज मांग के सामने झुक सकते हैं, क्या गारंटी है कि वे देश के उन अहम मसलों को शिद्दत से हल कर पाएंगे, जिनके लिए मजबूती और दृढ़ता की जरूरत होती है।
साफ है कि ये मान्यताओं और उसूलों पर संकट का दौर है। लेकिन ये भी सच है कि संकट के दौर ही नए उसूलों, मजबूत परंपराओं और मानवीय मूल्यों की स्थापना की नई राह भी सुझाते हैं। जब हिंदी पत्रकारिता के शलाका पुरूष और नौजवान पत्रकारों की टोली इसके खिलाफ आवाज उठाने में नहीं हिचक रही है तो नई उम्मीद का दीया जलाना गलत नहीं होगा।

बुधवार, 29 जुलाई 2009

निजीपन में सेंध यानी सच का सामना


उमेश चतुर्वेदी
कड़वी सचाई का सामना बहादुर ही कर पाते हैं। बचपन से ही हमें ये बताया जाता रहा है। ये शिक्षा हमें देते वक्त इस बात की भी ताकीद की जाती रही है कि जब तक उस सचाई के उजागर होने से व्यापक समुदाय का हित न जुड़ा हो, चाहे कितना भी कड़वी हकीकत क्यों ना हो, उसका खुलासा नहीं किया जाना चाहिए। पारंपरिक मीडिया इसे सूत्र वाक्य की तरह लेता रहा है। यही वजह है कि किसी व्यक्ति विशेष की निजी जिंदगी में ताक-झांक करने से देसी मीडिया बचता रहा है। इसी सूत्र वाक्य के सहारे सत्तर के दशक में भारतीय मीडिया ने भी राजनेताओं की जिंदगी के काले सच को उजागर करना शुरू किया तो राजनीति की दुनिया में भूचाल आ गया था। तब से जब भी मौका लगता है, राजनीति मीडिया के ऐसे कामों पर सवाल उठाने से पीछे नहीं रहती। लेकिन दिलचस्प बात ये है कि इस बार राजनीति की दुनिया से जुड़े लोगों की निजी जिंदगी के अंधेरे पक्ष का खुलासा नहीं हो रहा है, बल्कि इस बार सवालों से मुठभेड़ करने आम और खास हर तरह के लोग खुद आ रहे हैं और राजनीति की दुनिया में भूचाल आ गया है। 22 जुलाई को राज्य सभा में जिस तरह स्टार प्लस के कार्यक्रम सच का सामना पर दलगत राजनीति से उपर उठकर राजनेताओं ने सवाल उठाया है, उससे तो कम से कम यही ध्वनि निकलती है।
14 जुलाई को कलर्स के लोकप्रिय सीरियल बालिका वधू पर लोकसभा में जिस तरह बड़े नेताओं ने सवाल उठाया, उससे सूचना और प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने बालिका वधू की मानिटरिंग का आदेश ही दे डाला। ये क्या संजोग है कि जिस सच का सामना जैसे रियलिटी शो पर संसद में सवाल उठा है, वह इसके ठीक अगले दिन यानी 15 जुलाई को शुरू हुआ। बहरहाल सरकार ने सच का सामना की मानिटरिंग का कोई खुला आदेश तो नहीं दिया है। लेकिन जिस तरह सीरियलों की भूमिका पर संसद में चर्चा कराने के लिए सरकार तैयार हो गई है, उससे साफ है कि आने वाले दिन ऐसे सीरियल निर्माताओं के लिए परेशानियां लेकर आ सकते हैं।
22 जुलाई को राज्य सभा में समाजवादी पार्टी के सांसद कमाल अख्तर को आपत्ति थी कि सच का सामना में अश्लील सवाल पूछे जा रहे हैं और इससे भारतीय संस्कृति का खुला उल्लंघन हो रहा है। इसके साथ ही व्यक्ति की निजता में भी सेंध लगाई जा रही है। मंडल- कमंडल से लेकर आर्थिक मुद्दों पर अलग-अलग राय रखने वाले अपने राजनीतिक दलों की एक बात के लिए जरूर दाद दी जानी चाहिए। जब भी भारतीय संस्कृति पर हमले की बात होती है, सारे दल एक साथ खड़े नजर आते हैं। सच का सामना चूंकि राजनीतिक दलों की नजर में भारतीय संस्कृति का उल्लंघन कर रहा है, लिहाजा इसके खिलाफ पूरी राज्यसभा एकमत नजर आई।
संसद में सच का सामना को लेकर चर्चा होगी तो इससे जुड़े तमाम मुद्दे सामने तो आएंगे ही। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या सचमुच इसके लिए सिर्फ स्टार प्लस चैनल ही जिम्मेदार है। जिस अमेरिकी कार्यक्रम की तर्ज पर भारतीय लोग सच का सामना कर रहे हैं, उसके मूल देश में व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता का संवैधानिक तौर पर खास खयाल रखा गया है। वहां भी यह कार्यक्रम विवादास्पद रहा है। लेकिन इससे इस कार्यक्रम में शामिल होने आए लोग अपनी जवावदेही से बच नहीं सकते। इस कार्यक्रम में शामिल हो रहे लोग मासूम और अनपढ़ नहीं हैं। विनोद कांबली को आप क्या मासूम मानेंगे। जिस स्मिता नाम की महिला से उसकी सेक्स फैंटेसी के बारे में पूछे गए सवाल को लेकर संसद में सवाल उछला है, वह भी मासूम नहीं रही हैं। जिस तरह की परिपाटी आज के टेलीविजन की दुनिया में पसरी हुई है, उससे ऐसे सवालों का अंदाजा लगाना किसी समझदार व्यक्ति के लिए कोई कठिन काम नहीं है। साफ है ये लोग पढ़े-लिखे और समझदार हैं और उन्हें एक करोड़ रूपए जीतने का सपना अपनी निजी जिंदगी की सार्वजनिक चीड़फाड़ के लिए तैयार कर रहा है।
ये सच है कि साल भर पहले तक मनोरंजन चैनल की दुनिया का बेताज बादशाह रहा स्टार प्लस अपनी लोकप्रियता बनाए रखने के लिए इन दिनों जूझ रहा है। इसके चलते उसे अपनी प्रोग्रामिंग में ताजगी लाने के लिए मजबूर होना पड़ा है। जैसा कि अपने यहां परिपाटी है, आइडिया की ताजगी हमें अमेरिका में ही मिलती- दिखती है। लिहाजा वह अमेरिकी कार्यक्रम की तर्ज पर इस कार्यक्रम को लाने के लिए मजबूर हुआ है। चैनल को भी ये अंदाजा रहा होगा कि सचाई का सामना करने वाले लोगों को चाहे ज्यादा परेशानी ना हो, देश में इसे लेकर बवाल जरूर होगा और फिर कार्यक्रम चर्चा में आएगा। और चर्चा में आएगा तो उसकी टीआरपी बढ़ेगी ही। यह टीआरपी की ही माया है कि उसे लोगों की निजी जिंदगी में आक्रामक तरीके से घुसने के लिए मजबूर कर रहा है और उसकी यही मजबूरी खटकने लगी है।
खबरिया चैनलों की बढ़ती भीड़ के भी दौर में स्टिंग और निजी जिंदगी में दखलंदाजी का जोर बढ़ गया था। यह परिपाटी इतनी तेजी से बढ़ी कि लोगों ने इस पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। तब खबरिया चैनलों को गैरजिम्मेदार ठहराने में हर दूसरा व्यक्ति आगे आ रहा था। मुंबई पर हमले के बाद खबरिया चैनलों में ऐसे चलन कम हुए हैं। उन्हें खबरों की विमर्श वाली दुनिया में गोते लगाने के लिए लौटना पड़ा है। लेकिन हकीकत देखिए कि ऐसे कार्यक्रमों से अब तक बचे रहे मनोरंजन चैनलों को भी इसी दौ़ड़ में शामिल होना पड़ा है, और उनकी भी वजह वही है, प्रतिद्वंद्विता और टीआरपी की चाह। राज्यसभा में उन पर उठा सवाल दरअसल खबरिया चैनलों के साथ शुरू हुए टीवी प्रोग्रामिंग के विरोध का ही विस्तार है।
संसद में चर्चा के बाद इस कार्यक्रम को जायज ठहराया जाएगा या फिर गलत, लेकिन एक चीज साफ है कि इस बहस में वे मुद्दे भी उठेंगे, जिसकी वजह से आज आम आदमी अपने गोपनीय चीजों को भी उजागर करने के लिए मजबूर हुआ है। उदारीकरण की हवा में, जब हर किसी चीज का पैमाना पैसा बन गया है, ऐसे में एक करोड़ का लालच चाहे कोई टीवी चैनल दे या फिर कोई और, ऐसे कार्यक्रमों पर रोक लगा पाना आसान नहीं होगा। लेकिन ये भी सच है कि अगर हर तरह के कार्यक्रमों के लिए सरकारी दखलंदाजी बढ़ती रही तो चाहे खबरिया चैनल हों या फिर मनोरंजन के चैनल, उनके लिए सही तरीके से काम कर पाना आसान नहीं होगा। लेकिन इसके बचाव की राह क्या होगी, इस पर बेहतर हो कि सरकार या संसद की बजाय मीडिया और उसके कर्ता-धर्ता खुद विचार करें।

सोमवार, 20 जुलाई 2009

बालिका वधू पर सवाल


उमेश चतुर्वेदी
14 जुलाई को लोकसभा में सवाल भर्तृहरि महताब का था...जवाब अंबिका सोनी ने दिया ...लेकिन उनका जवाब पूरा होने का जैसे जनता दल यू के अध्यक्ष शरद यादव कर रहे थे। उन्होंने छूटते ही बालिका वधू पर शारदा एक्ट के उल्लंघन और इसके जरिए बाल विवाह को बढ़ावा देने का आरोप जड़ दिया। शरद यादव कोई मामूली नेता नहीं हैं, लिहाजा अंबिका सोनी को कहना पड़ा कि वे इस पर विचार करेंगी। यानी बालिका वधू पर सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने निगरानी या तो शुरू कर दी है या फिर वह जल्द ही करने वाला है। जाहिर है, यदि मंत्रालय को ऐसा लगा तो टेलीविजन की सबसे मासूम और नन्हीं बहू को देखने के आदी रहा एक बड़ा दर्शक वर्ग इससे वंचित हो सकता है।
इसका नतीजा चाहे जो हो, लेकिन ये सच है कि बालिका वधू पर संसद में उठी निगाहों की प्रासंगिकता और जरूरत पर भी सवाल उठने लगे हैं। टेलीविजन की अतिरेकी भूमिका को लेकर शरद यादव की चिंताएं और उनके रूख से हर वह शख्स परिचित है, जो उनके थोड़ा-बहुत भी करीब रहा है। पूर्व गृह राज्य मंत्री गावित के खिलाफ चले स्टिंग ऑपरेशन को लेकर वे एक चैनल के खिलाफ वे कितने नाराज थे, इसे उन लोगों ने देखा है, जो राज्य सभा की कार्यवाही को कवर करते रहे हैं। लेकिन बालिका वधू पर उनका सवाल उठाना और उस पर ये आरोप लगाना कि यह बाल विवाह को बढ़ावा दे रहा है, समझ से परे लग रहा है। ये सच है कि टीआरपी के दबाव में खबरिया चैनलों ने जिस तरह खबरों से खिलवाड़ किया, उससे राजनेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं का एक बड़ा वर्ग टेलीविजन से खार खाए बैठा है। मीडिया जगत में भी इस परिपाटी पर सवाल उठे...इस गलती को दबी जबान से ही सही, मीडिया के अंदरूनी हलके में भी स्वीकार किया जाने लगा है। लेकिन बालिका वधू पर सवाल और उसे लेकर सूचना और प्रसारण मंत्री के जवाब को लोग पचा नहीं पा रहे हैं।
ये सच है कि एक दौर में टेलीविजन का प्राइम टाइम सास-बहू के अंतहीन झगड़ों और उच्च वर्ग के परिवारों के बीच जारी षडयंत्र के किस्सों से गुंजायमान था। ऐसे माहौल में एक वर्ग को मनोरंजन चैनलों से भी ऊब होने लगी थी। ऐसे माहौल में जब पिछले साल बालिका वधू ने दस्तक दी तो दर्शकों ने इसे हाथोंहाथ लिया। एकरस कार्यक्रमों की भीड़ में बालिका वधू हवा के नए झोंके की तरह सामने आया। और देखते ही देखते इस सीरियल की नन्हीं बहू आनंदी यानी अविका गौर घर-घर की महिलाओं की चहेती बन गई। एक दौर तो ऐसा भी आया कि मनोरंजन चैनलों के प्राइम टाइम पर इसी धारावाहिक की तूती बोलने लगी और इसके साथ ही नए नवेले चैनल कलर्स ने अपना झंडा गाड़ दिया। फिर तो ना आना इस देश लाडो, अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजौ जैसे धारावाहिक आए और प्राइम टाइम में छा गए। सास-बहू की एकरस कहानियों से भरी प्राइम टाइम की दुनिया में इन धारावाहिकों की सफलता की वजह रहे इनके नए – नए और तकरीबन टेलीविजन की दुनिया से अछूते रहे विषय। प्राइम टाइम की दुनिया में भले ही इन धारावाहिकों की तूती बोल रही है, लेकिन राजनेताओं की निगाहें इन पर टेढ़ी होती जा रही हैं।
ये भी सच है कि बालिका वधू की कहानी में वह कसावट नहीं रही , जो शुरूआती कई हफ्तों में दिखती रही थी। टीआरपी के दबाव और कमाई के चलते इस धारावाहिक की कहानी में भी कई असहज और अप्रासंगिक मोड़ आने लगे हैं, जिनका कोई तर्क नहीं नजर आता। कुछ यही हालत अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजौ और ना आना इस देश लाडो की कहानी के साथ भी हो रहा है। लेकिन इसका ये भी मायने नहीं है कि ये धारावाहिक बाल विवाह, कन्या भ्रूण हत्या और बिहार में लड़की बेचने की कुप्रथाओं को बढ़ावा दे रहे हैं। सही बात तो ये धारावाहिक जिन चैनलों पर दिखाए जा रहे हैं, उन्हें सामान्य एंटीना के जरिए नहीं देखा जा सकता। इन्हें देखने के लिए केबल या डीटीएच की जरूरत होगी। और इस देश में विकास के तमाम दावों के बावजूद बड़े शहरों को छोड़ दें तो केबल या डीटीएच का खर्च वहन करने की क्षमता निम्न मध्यवर्ग और कम पढ़े-लिखे परिवारों के पास नहीं है। जाहिर है, उन घरों तक इन धारावाहिकों की पहुंच ही नहीं है। ऐसे में शरद यादव या भर्तृहरि महताब के इस आरोप को कैसे सही माना जा सकता है कि ये धारावाहिक शारदा एक्ट या फिर बाल विवाह कानून का उल्लंघन कर रहे हैं।
अगर कुरीतियों को दिखाना भी उसे बढ़ावा देना है तो भ्रष्टाचार को उजागर करना भी उसे महिमा मंडित करना हो जाएगा। और अगर एक बार हमने इसे मान लिया तो ये भी सच है कि भ्रष्टाचार का खुलासे पर भी संसद से लेकर सड़क पर सवाल उठने लगेंगे। जाहिर है ये मौका खुद मीडिया की अतिरेकी भूमिकाओं ने मुहैया कराया है। ऐसे में सबसे बड़ी जरूरत ये है कि राजनीति की ओर से हो रहे ऐसे सवालों का तार्किक जवाब दिया जाय। मीडिया और कला की मॉनिटरिंग होनी चाहिए। इसे खुले मन से मीडिया को भी स्वीकार करना चाहिए। लेकिन इसका ये भी मतलब नहीं है कि हर गैरजरूरी सवालों का भी सामना किया जाय। कम से कम मनोरंजन चैनलों के बदलाव भरे सीरियलों पर उठे सवाल तो ऐसी ही श्रेणी में आते हैं।

सोमवार, 8 जून 2009

ये सीरियल कुछ खास है!


उमेश चतुर्वेदी
हिंदी टेलीविजन की दुनिया में इन दिनों दो समानांतर धाराएं आगे बढ़ती नजर आ रही हैं। एक तरफ खबरिया चैनलों की दुनिया है, जहां पारंपरिक खबरों की सिमटती दुनिया का फिलहाल कोई तार्किक अंत होता नजर नहीं आ रहा है, जबकि दूसरी तरफ है मनोरंजन चैनलों की बदलती दुनिया। सास-बहू के अंतहीन झगड़े और महानगरों के बड़े और रईसजादे परिवारों के भीतर जारी साजिशों की दुनिया अब बदलती नजर आ रही है। कभी महिलाओं जीवन की करूणागाथा के प्रतीक रहे गीत अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजौ की पैरोडी अब सकारात्मक तौर पर बदल चुकी है। अब अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजौ से लेकर ना आना लाडो इस देश के बहाने अब महानगरीय जिंदगी की वे शामें बदलने लगीं हैं, जो टेलीविजन के पर्दे के सहारे आगे बढ़ती रही हैं।
हिंदी फिल्मी दुनिया के बारे में माना जाता है कि वहां जो मसाला एक बार हिट हो जाता है, उसकी तेजी से नकल शुरू हो जाती है। एक फिल्मी फार्मूले के दोहन की होड़ लग जाती है। सेटेलाइट चैनलों की बढ़ती भीड़ के शुरूआती दौर यानी करीब आठ साल पहले बॉलीवुड के इसी रोग ने हिंदी टेलीविजन चैनलों को भी घेर लिया था। सास-बहू के अंतहीन झगड़ों, प्यार-मोहब्बत की नाटकीय किस्सागोई और परिवार के भीतर रची जा रही साजिशों का इतना जोर बढ़ा कि बुद्धू बक्से की वह दुनिया ही पूरी तरह बदल गई, जिसकी बुनियाद हमलोग, बुनियाद, मैला आंचल, गणदेवता और शांति जैसे सीरियलों के जरिए रखी गई थी। निश्चित तौर पर ये दूरदर्शन का दौर था। दूरदर्शन के विस्तार के शुरूआती सालों में वही किस्सा दोहराया गया, जो कभी आजादी के ठीक बाद रेडियो के लिए तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री केसकर और आकाशवाणी के महानिदेशक जगदीश चंद्र माथुर ने मिलकर लिखा था। लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि जिस दौर में यानी नब्बे के दशक में जब हिंदी टेलीविजन की सेटेलाइट दुनिया बदलने लगी थी, उसी दौर में उदारीकरण की शुरूआत हुई। और सास-बहू के साजिशों के किस्से रंगीन सेटेलाइट चैनलों के सहारे भारतीय मध्यवर्ग के ड्राइंग रूमों की शोभा बढ़ाने लगे। यह भी सच है कि जी टीवी ना सिर्फ हिंदी, बल्कि देश का पहला निजी सेटेलाइट चैनल रहा। अपने शुरूआती दिनों में उस पर वैसा बाजारवाद हावी नहीं रहा, जो आज से छह महीने पहले तक हर सेटेलाइट चैनल की पहचान बना हुआ था। हम पांच जैसे कुछ अर्थवान धारावाहिक उसकी जान रहे। उसे पहली बार टक्कर 1998 के आसपास मिलना शुरू हुआ, जब सोनी का टीवी चैलन लांच हुआ। इसके साथ ही शुरू हुए प्रतिस्पर्धा के दौर को तेजी मिली करीब आठ साल पहले, जब पीटर मुखर्जी की अगुआई में स्टार ग्रुप ने भारत में अपने पांव रखे। इसके साथ ही महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक के ड्राइंग रूम की तस्वीर बदलने लगी। निश्चित रूप से इसमें एकता कपूर के बनाए सीरियल क्योंकि सास भी कभी बहू थी या कहानी घर-घर की जैसे सीरियलों ने नई परिपाटी शुरू की। चूंकि तब तक बाजारवाद अपने चरम पर पहुंच चुका था, तब मुनाफा कमाना हर प्रोफेशन की पहली शर्त बन गया था। ऐसे में दूरदर्शनी जमाने शुरू हुई परंपरा को आघात लगना ही था। यही वह दौर है, जब शहरी मध्यवर्ग तेजी से उभर रहा था। इसका असर ये हुआ कि सास-बहू मार्का ये धारावाहिक और उनके साजिश रचने वाले पात्र ना सिर्फ लोकप्रिय हुए, बल्कि उनकी पहचान भी बनी। फिर तो ऐसे धारावाहिकों की जैसे बाढ़ ही आ गई। कसौटी जिंदगी की, कस्तूरी, कुमकुम एक प्यारा सा बंधन..जैसे तमाम सीरियल टेलीविजन के नए और तेजी से बढ़ रहे उपभोक्ताओं को तेजी से लुभाने लगे। टेलीविजन पर मनोरंजन का पूरा का पूरा संसार इसी फार्मूले पर चल पड़ा। जिसमें लोकप्रिय पात्र मरने के बाद जिंदा होते रहे। याद कीजिए क्योंकि सास भी कभी बहू थी के प्रमुख पात्र मिहिर को, इसे निभा रहे अमर उपाध्याय की मौत हुई, लेकिन कहानी की मांग के नाम पर उन्हें जिंदा किया गया। कसौटी जिंदगी की में भी ऐसा ही हुआ। स्टार प्लस अपने इन सीरियलों के जरिए आठ साल तक टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट में नंबर वन की कुर्सी पर बैठा रहा। जाहिर है इसमें सगुन, कहीं किसी रोज, विदाई, संजीवनी जैसे कई धारावाहिकों का योगदान रहा। पीटर मुखर्जी के स्टार ग्रुप से अलग होने के बाद ऐसी आशंका जताई जा रही थी कि उनके प्रोमोशन में शुरू हुए चैनल नाइन एक्स भी वैसा ही धमाका करेगा। लेकिन नहीं हुआ। अलबत्ता स्टार के दबाव में जी टीवी को भी सात फेरे, बेटियां जैसे सीरियल लाने पड़े। वहां भी वैसी ही साजिशें और अंदरूनी उठापटक जारी रही।
यही वह दौर रहा, जब हिंदी के खबरिया चैनलों पर पारंपरिक खबरों की बजाय सांप-बिच्छू नचाने, काल-कपाल और महाकाल दिखाने का दौर शुरू हुआ। ये कथानक और खबरें एक दौर तक तो अपने नयापन के चलते दर्शकों को लुभाती रहीं। लेकिन बाद में आलोचकों, समाजवैज्ञानिकों और प्रबुद्ध वर्ग द्वारा इसकी आलोचना होने लगी। लेकिन इस आलोचना से टेलीविजन चैनल अप्रभावित रहे। टीआरपी का दबाव और बहाना ऐसे सीरियलों को एलास्टिक की तरह बढ़ाते रहने का बहाना बना रहा। लेकिन पिछले साल आए टीवी 18 ग्रुप के नए चैनल कलर्स ने इन धारावाहिकों की दुनिया ही बदल दी। बाल विवाह के दंश पर आधारित सीरियल बालिका बधू आज टेलीविजन की रेटिंग प्वाइंट में नंबर वन बना हुआ है। इसकी वजह ये नहीं है कि इसमें पारंपरिक मसाले और लटके-झटके हैं। बल्कि इसमें बचपन में शादी के चलते परिवार, समाज और उस बच्चे की जिंदगी पर कैसा और क्या असर पड़ता है, इसे कथा में पिरोया गया है। कहना ना होगा, ऐसे अर्थवान धारावाहिक के जरिए हिंदी के मनोरंजन चैनलों की दुनिया फिर एक बार उसी ढर्रे पर लौटरने लगी है, जिसकी शुरूआत रमेश सिप्पी जैसे निर्माता और मनोहर श्याम जोशी जैसे लेखक के साथ दूरदर्शन ने नब्बे के दशक के शुरूआती दिनों में बुनियाद और हमलोग जैसे धारावाहिकों के जरिए की थी। कलर्स पर इन दिनों जितने भी सीरियल आ रहे हैं, उनमें कथ्य को लेकर ताजगी तो है ही, व्यापक सामाजिक सरोकारों से भी जुड़े हैं। कलर्स का ही एक और सीरियल है, ना आना इस देश मेरी लाडो। इसमें बालिका भ्रूण हत्या के मामले को कथा के फ्रेम में बेहतर तरीके से पिरोकर पेश किया गया है। जो देखने वाले का दिल छू लेता है। इसी तरह जीवन साथी में भी एक ऐसे परिवार की कहानी पेश की गई है, जहां परिवार का मुखिया अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए अपने परिवार और अपनी बेटी तक को दांव पर लगाने से नहीं चूकता। इसी तरह एक और अर्थवान सीरियल उतरन भी दिखाया जा रहा है, जिसमें एक बड़ा रईस परिवार अपनी एक गलती के चलते उसकी शिकार गरीब महिला और उसकी बेटी को ठाटबाट से पाल रहा है।
कलर्स के इन अर्थवान धारावाहिकों ने इस बाजार के अगुआ रहे स्टार प्लस, सोनी और जीटीवी को भी अर्थवान धारावाहिकों की दौड़ में शामिल होने के लिए मजबूर कर दिया। अब जीटीवी भी अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजौ जैसा धारावाहिक दिखाना पड़ रहा है। इसी तरह एक और धारावाहिक आपकि अंतरा जैसा धारावाहिक भी शुरू करना पड़ा है। वैसे जब क अक्षर वाले धारावाहिकों का दौर जारी था, उसी दौर में जस्सी जैसी कोई नहीं जैसा सीरियल सोनी पर दिखाया जाता रहा। उसका सीआईडी अभी तक चल ही रहा है। लेकिन नए दौर के चलन में उसे भी लेडीज स्पेशल लेकर आना पड़ा है। जिसमें चार महिलाओं की जिंदगी और आम जिंदगी में उनकी जद्दोजहद को पेश किया जा रहा है।
कलर्स के जरिए शुरू हुई धारावाहिकों की विविधरंगी दुनिया में दो चीजें खासतौर से नोट की जा सकती हैं। एक ये कि अधिकांश धारावाहिक महिला समस्याओं से दोचार होने के कथ्य से भरे पड़े हैं। दूसरा, अब तक बिहार और बिहारी लोग टेलीविजन धारावाहिकों में सिर्फ बदहाली और नौकर वाली भूमिकाओं के पर्याय रहे हैं। लेकिन अब वहां की भी वह जिंदगी लोगों के सामने आ रही है, जिसमें जिंदगी की परेशानियां भी हैं तो खूबसूरत रंग भी। उम्मीद की जानी चाहिए कि मनोरंजन चैनलों की दुनिया में आ रहे इस सकारात्मक बदलाव से खबरिया चैनल भी जल्द ही सबक लेंगे और खबरों की दुनिया भी उसी तरह बदलाव से भरी नजर आ सकेगी।

मंगलवार, 26 मई 2009

अखबारों के खिलाफ उठी आवाज


उमेश चतुर्वेदी
लोकसभा चुनावों के दौरान उम्मीदवारों से पैसे लेकर खबरें छापने और अखबारी पैकेज न लेने वाले उम्मीदवारों की चुनाव प्रचार तक की खबरों को जगह ना देने का विरोध वरिष्ठ पत्रकार तो कर रहे हैं, लेकिन चिंता की बात ये है कि खुद पत्रकारिता में इसे लेकर कोई अपराधबोध नजर नहीं आ रहा है। हिंदी के शीर्ष पत्रकार प्रभाष जोशी तो इस परिपाटी के खिलाफ मशाल लेकर निकल पड़े हैं। उन्होंने इसके खिलाफ अभियान छेड़ दिया है। प्रभाष जी मशाल लेकर निकलें और उसे भले ही अखबारों का साथ नहीं मिले, लेकिन जिस तरह से पत्रकारों का साथ मिलना शुरू हुआ है, उससे साफ है कि ये बात दूर तलक जाएगी।
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल के नोएडा परिसर की गोष्ठी लोकसभा चुनावों में मीडिया की भूमिका में प्रभाष जोशी ने कहा कि अखबारों और पाठकों के बीच विश्वास का रिश्ता होता है। अखबार में छपी चीजों पर पाठक भरोसा करता है। लेकिन उम्मीदवारों से पैसे लेकर खबरें छाप कर अखबार पाठकों के इसी भरोसे को तोड़ रहे हैं। प्रभाष जी जैसे वरिष्ठ पत्रकार ही ऐसा कह सकते हैं। क्योंकि ये भी सच है कि पत्रकारिता की दुनिया में इसे लेकर खास उहापोह नजर नहीं आ रहा है। इसका उदाहरण खुद उन्हें अपने ही शहर इंदौर में नजर आया। मई के दूसरे हफ्ते में वे इंदौर के अखबारों में शुरू हुई इस परिपाटी को लेकर तैयार रिपोर्ट को जारी किया तो उसकी एक कॉलम तक की खबर नहीं छपी। प्रभाष जी को इस बात का अफसोस है कि ये रिपोर्ट बी जी वर्गीज जैसे पत्रकारिता के शलाका पुरूष के हाथों हुआ, और इंदौर के अखबारों ने उनकी वरिष्ठता और पत्रकारिता में उनके योगदान तक का भी ध्यान नहीं रखा।
यह सिर्फ प्रभाष जी की ही पीड़ा नहीं है। पत्रकार और बीजेपी के राज्यसभा सांसद चंदन मित्रा ने तो इससे भी आगे की बात बताई। उनके मुताबिक चैनलों ने भी लोकसभा चुनावों के दौरान जमकर चांदी काटी है। उन्होंने खबरिया चैनलों का नाम तो नहीं लिया, लेकिन ये जरूर बताया कि खबरों के लिए आपस में मारकाट मचाने वाले कई चैनलों में राजनीतिक दलों से प्रचार का पैकेज हासिल करने के लिए जबर्दस्त एकता नजर आई। उन्होंने शर्त रखी थी कि ना सिर्फ उन्हें, बल्कि उनके बुके के दूसरे चैनलों को भी पैकेज देना होगा। दिलचस्प बात ये है कि पहले तो राजनीतिक दलों ने इसे नकार दिया, लेकिन बाद में उन्हें इसे मानना पड़ा। उनके अनुमान के मुताबिक अकेले चैनलों ने इस दौरान करीब 100 करोड़ का बिजनेस किया।
गोष्ठी में शामिल अधिकांश वरिष्ठ पत्रकारों का मानना था कि पैसे लेकर खबरें छापने का चलन अब शुरू हुआ है। लेकिन इसका प्रतिकार वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय और श्याम खोसला ने किया। रामबहादुर जी के मुताबिक 14 साल पहले महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों में भी राजनीतिक दलों ने जमकर पैसे लिए थे। जबकि श्याम खोसला के मुताबिक पंजाब के विधानसभा चुनावों में भी ऐसा काफी पहले शुरू हो गया था। बहरहाल सबका यही मानना था कि इस परिपाटी से ना तो पाठकों को सही सूचनाएं पाने का अधिकार सुरक्षित रहेगा, ना ही यह लोकतंत्र के लिए बेहतर होगा। लेकिन आर्थिक पत्रकार आलोक पुराणिक का मानना कि जब मीडिया कंपनियां पूंजी बाजार और शेयर मार्केट से पूंजी जुटाएंगी तो उनका सबसे बड़ा उद्देश्य लाभ कमाना रह जाएगा। सही मायने में यही हो भी रहा है। लिहाजा उन पर भी अपने शेयरधारकों को फायदा पहुंचाने का दबाव बढ़ गया है और इस दबाव में उनके लिए ईमानदार पत्रकारिता से ज्यादा जरूरी पैसे कमाना रह गया है। इस गोष्ठी में राजनीति की ओर से सोमपाल शास्त्री ने अपनी पीड़ाएं जाहिर कीं। बागपत से पिछला लोकसभा चुनाव लड़ चुके सोमपाल शास्त्री ने कहा कि जिस तरह अखबारों ने उनसे खबरों के बदले पैकेज की मांग की, उससे उनका मन इतना खट्टा हुआ कि एक बारगी उन्होंने अखबारों के खिलाफ ही आवाज बुलंद करने की तैयारी कर ली थी।
बहरहाल इस परिपाटी का विरोध कैसे हो। इसका जवाब वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र प्रभु ने सुझाया कि अखबारी संस्थानों में ट्रेड यूनियनों को जब तक बढावा नहीं दिया जाएगा, पत्रकारों की नौकरियों की गारंटी नहीं होगी, तब तक वे इसके खिलाफ नहीं उठ खड़े होंगे। प्रभाष जी ने भी इसे स्वीकार तो किया, लेकिन उनका मानना था कि सिर्फ इतने से ही बात नहीं बनेगी। प्रभाष जी इस परिपाटी के खिलाफ जनजागरण पर तो निकल ही पड़े हैं। उनकी योजना चुनाव आयोग से ये मांग करने की है कि वह चुनाव प्रक्रिया के दौरान अखबारों में छपे विज्ञापनों का खर्च भी उनके चुनाव खर्च में जोड़े। इसके साथ ही वे वरिष्ठ पत्रकारों के साथ सुप्रीम कोर्ट में भी इसके खिलाफ याचिका दायर करने की तैयारी में हैं। इसके साथ ही उनका कहना है कि वकालत और डॉक्टरी जैसे प्रोफेशन की तरह पत्रकारों को शपथ पत्र पर हस्ताक्षर करना जरूरी किया जाना चाहिए। और गड़बड़ी करने पर उन्हें पत्रकार यूनियन निष्कासित भी करे। प्रभाष जी को इस बात का भी मलाल है कि इस गलत परिपाटी के खिलाफ एक भी पाठक खुलकर सामने नहीं आया। उन्होंने कहा कि अब पाठकों को जगाना होगा ताकि वे आदर्श पत्रकारिता के पक्ष में उठ कर खड़े हो सकें। उन्होंने कहा कि मीडिया की साख बचाने के लिए यह जरूरी है कि पैसे लेकर छापी जाने वाली खबरों को विज्ञापन का रूप दिया जाए। इसकी सूचना पाठकों को स्पष्ट रूप से देनी आवश्यक होनी चाहिए।
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति अच्युतानंद मिश्र पाठकों को जागरूक करने और उनके क्लब बनाने की वकालत करते रहे हैं। इस गोष्ठी में भी उन्होंने इस बात को आगे बढ़ाने पर जोर दिया। विश्वविद्यालय के नोएडा परिसर के निदेशक अशोक टंडन ने कहा कि इस अभियान का सिलसिला यहीं नहीं थमेगा।

रविवार, 10 मई 2009

पत्रिका चर्चा

नए अनुभवों से गुजरने की यात्रा
उमेश चतुर्वेदी
टेलीविजन चैनलों के विस्तार के इस दौर में साहित्यिक और सांस्कृतिक मंचों पर एक रोना सामान्य हो गया है। हर वक्ता को गंभीर पाठकों का अभाव हर समारोह में सालता रहता है। ऐसे स्यापे भरे माहौल में अगर 2009 ने नई उम्मीदें जगाईं हैं। साल के पहले ही महीने में दस साल के लंबे अंतराल के बाद पूर्वाग्रह जैसी गंभीर पत्रिका ने पाठकों की दुनिया के बीच दोबारा प्रवेश किया। मध्य प्रदेश की राजधानी भारत भवन की ये पत्रिका पहले अशोक वाजपेयी के संपादन में निकलती थी। भोपाल जैसी जगह से प्रकाशित होती रही इस पत्रिका ने सांस्कृतिक और साहित्यिक जगत में गंभीर और वैचारिक रचनाओं के जरिए इस पत्रिका ने समय और संस्कृति में खूब हस्तक्षेप किया। लेकिन जब भारत भवन महज सांस्कृतिक केंद्र ना रहकर सियासी अखाड़े में तब्दील होता गया – इस पत्रिका पर संकट के बादल मंडराने लगे और दस साल पहले इसका प्रकाशन स्थगित कर दिया गया। लेकिन पिछले साल जब भारत भवन के न्यासी मंडल का पुनर्गठन हुआ और उसमें प्रभाकर श्रोत्रिय शामिल किए गए – तब से एक बार फिर उम्मीद जताई जाने लगी थी कि भारत भवन की खोई प्रतिष्ठा वापस लौटेगी और वह एक बार फिर कम से कम साहित्यिक केंद्र के तौर पर सकारात्मक कदम उठाने में संभव होगा। पूर्वग्रह का प्रकाशन कम से कम इस उम्मीद पर खरा तो उतरता ही है। प्रभाकर श्रोत्रिय के संपादन में निकले इसके 124 वें अंक में ढेरों ऐसी रचनाएं हैं – जिनसे गुजरना पाठकों को नई सूचनाएं, नए विचार और नई उम्मीद दे सकता है। इस अंक में ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता कवि कुंवर नारायण पर खास सामग्री दी गई है। इनमें उनकी चुनिंदा रचनाओं का विश्लेषण, कुछ बेहतरीन रचनाएं और उनका साक्षात्कार शामिल है। इस अंक में स्वर्गीय प्रभा खेतान का एक लेख स्त्री और मीडिया भी प्रकाशित किया गया है। स्त्री की नई छवियां रचते मीडिया का इतना बेहतरीन विश्लेषण प्रभा ही कर सकती थीं।
2009 जहां नई उम्मीदें लेकर आया है – वहीं पिछले साल ने भी कुछ सकारात्मक नींव भी रखी। पिछले साल कुछ पत्रिकाओं के लिए नियमित होने के लिए भी याद किया जाएगा। कथन इसी साल से लगातार नियमित अंतराल पर प्रकाशित हो रही है। निश्चित तौर पर इसके लिए नई संपादक संज्ञा उपाध्याय की रचना दृष्टि, सोच और मेहनत का खासा योगदान है। इसी दौरान जनगाथा का भी नियमित तौर पर प्रकाशन शुरू हुआ है। बिहार के आरा में रह रहे कथाकार और बैंककर्मी अनंत कुमार सिंह और उनके दोस्तों की रचनात्मक जिद्द के चलते ये पत्रिका भी पाठकों के लिए नियमित अंतराल पर उपलब्ध रहने लगी है। पत्रिका के जनवरी अंक में यूं तो ढेरों रचनाएं हैं। लेकिन पत्रकार कुमार नरेंद्र सिंह का लेख आतंकवाद की सांप्रदायिक समझ. सुभाष शर्मा का नारीवादी लेखिका डोरिस लेसिंग पर लेख – कोई भी चीज स्थायी नहीं इस अंक में पठनीय बन पड़े हैं।
कोलकाता की भारतीय भाषा परिषद की पत्रिका वागर्थ की संपादकीय अगुआई कवि और आलोचक विजय बहादुर सिंह ने संभाल ली है। उनके संपादन में आया वागर्थ नई रचनात्मक उम्मीद जगा रहा है। वागर्थ के जनवरी अंक का संपादकीय खासतौर पर निराला को समर्पित है। इस संपादकीय में निराला को नए ढंग से समझने की कोशिश की गई है। पारंपरिक वाम सोच से आगे भी निराला की रचनात्मकता सक्रिय थी, इस संपादकीय के जरिए समझा जा सकता है। इस अंक में आलोक श्रीवास्तव की कविताएं पहला वसंत, तुम मेरा ही स्वप्न अपनी भावप्रवणता के लिए ध्यान आकर्षित करती हैं। केशव तिवारी की कविता रातों में अक्सर रोती थी मर चिरैया पीछे छूटे गांव को पूरी मार्मिकता से याद कराकर सराबोर कर देती है।
संपादक बदलने की चर्चा हो रही है तो इसी कड़ी में अगला नाम आता है कृति ओर का। कृति ओर अब कवि विजेंद्र की जगह रमाकांत शर्मा के संपादन में निकलने लगी है। हालांकि उनका नाम अब भी प्रधान संपादक की जगह साया हो रहा है। वागर्थ की तरह इसका संपादकीय भी विचारोत्तेजक बन पड़ा है। इस संपादकीय में लोक से निकलती कविता और उसके लोकभाष्य पर गंभीर विवेचन किया गया है। इस संपादकीय में कवि को प्रकृति के साथ चलने की जमकर वकालत की गई है। संपादकीय के मुताबिक कविता के लिए जीवन द्रव्य जितना जरूरी है – उतना ही जरूरी प्रकृतिबोध भी है। संपादकीय में कहा गया है कि यही वजह है कि सजग और संवेदनशील कवि प्रकृति का साथ कभी नहीं छोड़ता। खराब और आधी-अधूरी कविता के पैरोकार ही यह मानकर चलते हैं कि आज प्रकृति को स्मृति के रूप में याद करके ही लिखा जा सकता है।
यूं तो हिंदी में ढेरों पत्रिकाएं लगातार अपनी उपस्थिति बनाए हुए हैं। लेकिन इन पत्रिकाओं से गुजरना मौजूदा समय की नब्ज से दो-चार होने में मदद तो देता ही है, सांस्कृतिक और वैचारिक दुनिया के नए अनुभवों से लबरेज होने और अपनी नई दृष्टि बनाने में भी मददगार है।

सोमवार, 20 अप्रैल 2009

शुरूआती पत्रकारिता के दिनों की एक याद

उमेश चतुर्वेदी
1996 की बात है, तब मैं शावक पत्रकार था, अमर उजाला ग्रुप के आर्थिक अखबार अमर उजाला कारोबार में मेरी नई-नई नौकरी लगी थी। तब के संपादक ने नौकरी देते वक्त मुझसे ट्रेड यूनियन और साहित्यिक-सांस्कृतिक रिपोर्टिंग कराने का वादा किया था। लेकिन बाद में उन्होंने मंडी रिपोर्टिंग के काम पर लगा दिया। मेरे तत्कालीन बॉस ने एक दिन मुझसे कहा कि आप जाकर एशिया के सबसे बड़े हार्डवेयर मार्केट पर स्टोरी करके लाइए। मैंने पता लगाया कि वह मार्केट नई दिल्ली स्टेशन के पास स्वामी श्रद्धानंद मार्ग पर है। अजमेरी गेट की तरफ से मैंने आगे बढ़कर स्वामी श्रद्धानंद मार्ग का रास्ता वहां तैनात एक सिपाही से पूछा। सिपाही ने मुझे ऐसे घूरा- जैसे मुझे खा जाएगा। माजरा नहीं समझ पाया, लिहाजा ये बताने में मैंने देर नहीं लगाई कि पत्रकार हूं। सिपाही का रवैया बदल गया। उसने मुझे आंख के इशारे से रास्ता बता दिया। उसके बताए रास्ते पर आगे बढ़ने के पहले तक मुझे उस रास्ते के हकीकत की जानकारी नहीं थी। लेकिन उस रास्ते पर आगे बढ़ते ही मेरी हैरत का ठिकाना नहीं रहा। श्रद्धानंद जैसे क्रांतिकारी संन्यासी के नाम पर बनी ये सड़क पहले जीबी रोड के नाम पर जानी जाती थी। इसी जीबी रोड के ग्राउंड फ्लोर पर सचमुच एशिया का सबसे बड़ा हार्डवेयर मार्केट फैला पड़ा है। इसी रास्ते के आखिरी छोर पर लाहौरी गेट समेत पुरानी दिल्ली के कई रिहायशी इलाके हैं। इसी रास्ते से घर-परिवार वाले लोग भी रोजाना हाट-बाजार जाते हैं। कभी रिक्शे से तो कभी पैदल, वे निर्विकार भाव से वैसे ही गुजरते हैं – जैसे दूसरे इलाके में वे जाते हैं। बाजार की चमक के बीच अंधेरी सीढ़ियां भी दिख रही थीं और उनसे होकर उपर जो रास्ता जाता है, वहां कोई और ही दुनिया थी। छतों पर खड़ी लड़कियां और महिलाएं बार-बार कुछ वैसे ही बुला रही थीं – जैसे सब्जी बाजार में सब्जी वाले तरकारी और जिंस का भाव लगाते हुए ग्राहकों को बुलाते हैं। तब जाकर मुझे पता चला कि एशिया के सबसे बड़े हार्डवेयर बाजार के छत पर देह का बाजार लगता है। मेरे लिए ये नया अनुभव था। मेरा मन घृणा और विक्षोभ से भर गया। रोटी के लिए अपनी अस्मत की बोली लगाते हुए देखना मेरे लिए ये पहला अनुभव था। उस रात मैं सो नहीं पाया। सारी रात मनुष्य जीवन की मजबूरियां मुझे बेधती रहीं।
बहरहाल मैं रिपोर्टर की हैसियत से गया था और मुझे हार्डवेयर बाजार पर स्टोरी करनी ही थी। लिहाजा मैं मार्केट एसोसिएशन के तत्कालीन अध्यक्ष के पास पहुंचा, लेकिन उनके किसी रिश्तेदार की मौत हो गई थी। लिहाजा उनसे मुलाकात नहीं हुई। तब मैं पूर्व अध्यक्ष के पास पहुंचा। वहां पहुंचा तो श्रद्धानंद मार्ग पुलिस चौकी का हेडकांस्टेबल उनकी चंपूगिरी में मसरूफ था। मैंने पूर्व अध्यक्ष जी को अपना परिचय बताया और मार्केट के बारे में जानकारी मांगी। जानकारी देने की बजाय अपनी दुकान से मुझे बाहर लेकर वे निकल पड़े। वे मुझे लेकर नई दिल्ली से सदर जाने वाली रेलवे लाइन और हार्डवेयर मार्केट के बीच वाले इलाके की ओर चले। ये वाकया नवंबर महीने का है। लेकिन उस खाली जगह में पतझड़ जैसा माहौल था। वहां प्रयोग किए जा चुके कंडोम ऐसे बिखरे पड़े थे, जैसे पतझड़ के दिनों में पेड़ों के नीचे पत्तियां बिखरी होती हैं। एक साथ इतने यूज्ड कंडोम देखकर मुझे उबकाई आने लगी। मैं उल्टे पांव लौट पड़ा। पीछे-पीछे मार्केट एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष की आवाज थी, पहले हमारी इस समस्या पर लिखो तब जाकर कोई दूसरी खबर दूंगा।
एशिया के सबसे बड़े हार्डवेयर मार्केट की चमक-दमक के पीछे कितना कचरा है और उसका छत कितने स्याह अंधेरे से घिरा है, ये मैं तभी जान पाया। उसी दिन मुझे हेड कांस्टेबल ने बताया कि वहां आनेवाले ज्यादातर ग्राहक रिक्शे-ठेले वाले या फिर स्कूलों के जवान होते छात्र होते हैं। ये भी पता चला कि सेना के जवान भी अच्छी-खासी संख्या में यहां अपना दिल बहलाने आते हैं। आप उन्हें रोकते नहीं – मेरे इस सवाल को लेकर हेड कांस्टेबल का जवाब था , उसकी यानी पुलिस वालों की कोशिश होती है कि छात्र कोठों पर जा नहीं पाएं। इसके लिए वे लाठियां भांजने से भी नहीं हिचकते। लेकिन लगे हाथों वह ये भी जोड़ने से नहीं चूका कि यहां आने वाले को कोई रोक पाया है भला।
मैं गांव का हूं...वह भी एक संभ्रांत ब्राह्मण परिवार से ..पारिवारिक संस्कारों ने कोठों के अंधेरे कोने की तहकीकात से रोक दिया। लिहाजा वहां नहीं जा पाया, लेकिन स्याह अंधेरे के पीछे की दुनिया का दर्द समझने में कोई चूक नहीं हुई। दर्द समझने में संस्कार भी कभी बाधक बनते हैं भला .......