शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2008

जरूरत नए मीडिया की ..

उमेश चतुर्वेदी
भारतीय परंपरा में भावी वक्त और परिदृश्य के लिए हमेशा अच्छे की ही आशा प्रकट की जाती है। पत्रकारिता इससे आगे आगत की चिंताओं से आगाह कराने का दायित्व निभाती है। लेकिन मौजूदा परिदृश्य के आधार पर पत्रकारिता के भावी स्वरूप और जन सरोकारों की बात की जाती है तो कम से कम निकट भविष्य में मुझे आश्वस्तकारी नजारा नहीं दिखता।
ये सच है कि हमारी पीढ़ी तक के पत्रकार अखबारनवीसी की दुनिया में महज कैरियर बनाने की चाहत लेकर नहीं आए थे। पत्रकारिता के जरिए सिर्फ जीविका कमाना उनका मकसद नहीं था। उनमें से ज्यादातर की अपेक्षा जिंदगी में व्याप्त असमानताओं को दूर करने, वंचितों की आवाज उठाने और शोषण के समाजशास्त्र का भी विरोध करने की रही। लेकिन मीडिया की दुनिया में उन्होंने जो देखा, वह उनकी सपनीली राहों कहीं अलग था। तब पत्रकारों को लगता था कि समाचार पत्र लोकतंत्र के वाहक ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया के सच्चे प्रतिदर्श भी हैं। लेकिन पिछली सदी के आखिरी दशक के मध्य में - जब मौजूदा आर्थिक उदारवाद शैशवावस्था को पार कर रहा था – तब इन पत्रकारों के सपने एक-एक कर चकनाचूर होते नजर आए। पत्रकारिता की दहलीज पर दो-चार कदम बढ़ा चुके पत्रकारों को पत्रकारिता- खासकर हिंदी- की दुनिया में जब पता चला कि नौकरी पाने के मापदंड महज योग्यता नहीं हैं – बल्कि संपादक की चापलूसी, उसके घर की साग-भाजी ढोना मात्र है तो उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं। आज भी कई पत्रकार ऊंची कुर्सियों पर विराजमान हैं – जिनके लिए दूसरे पत्रकारों का छवि भंजन पत्रकारीय सरोकारों से कहीं ज्यादा जरूरी और अच्छा कर्म लगता है। मजे की बात ये है कि पत्रकारिता के मंचों और सार्वजनिक स्थलों से उन्हें पत्रकारिता में नैतिकता की चिंताएं औरों की बनिस्बत कुछ ज्यादा ही सताती हैं। हमारे साथ वाली पीढ़ी का सामना ऐसे संपादकों से भी पड़ा है – जिन्हें अपने विरोधी संपादकों को रिश्वतखोर और रंगीन मिजाज बताना बेहद प्रिय कर्म रहा है। लेकिन असलियत में उनकी खुद की दुनिया पत्रकारिता के नाम पर दलाली कर रहे लोगों- रंगीन मिजाज महिला और पुरूष पत्रकारों से भरपूर रही है। कुछ एक वरिष्ठ पत्रकार ऐसे भी हैं – जिन्हें नए पत्रकारों को ये प्रस्ताव देने में हिचक नहीं होती की फलां नामी-गिरामी आदमी का इंटरव्यू तुम करो, तुम्हें पैसा मिल जाएगा- लेकिन इंटरव्यू के साथ मेरा नाम छपेगा। कई पत्रकारनुमा राजनेता और राजनेतानुमा पत्रकार ऐसे भी हैं – जिनके नाम से प्रकाशित होने वाले लेख-स्तंभ कोई गुमनाम पत्रकार लिखता है। जिसके एवज में उसे महज चंद रूपए मिल जाते हैं। आज की हिंदी पत्रकारिता पर ऐसी नैतिकता वाले लोगों का बोलबाला है। उन्हीं के हाथ में हिंदी की पत्रकारीय दुनिया की निर्णयात्मक शक्तियां निहित हैं और अगले कुछ वर्षों में यह परिदृश्य बदलता हुआ नजर नहीं आ रहा है।
हिंदी की दुनिया में रविवार और बालमेला जैसी पत्रिकाओं के जरिए कोलकाता के आनंदबाजार समूह ने पिछली सदी के आठवें दशक में सार्थक हस्तक्षेप किया था। रविवार और बालमेला इसलिए बंद नहीं हुए कि उनके पाठक नहीं थे, बल्कि हिंदी पत्रकारिता के पुरोधाओं ने जो आपसी राजनीति की नीचता की हद तक एक-दूसरे के कपड़े फाड़े और नकाब उतारे- उससे क्षुब्ध होकर समूह ने न सिर्फ दोनों पत्रिकाओं को बंद कर दिया , बल्कि भविष्य में दोबारा हिंदी में हाथ न डालने का कठोर फैसला भी ले लिया।
नवभारत टाइम्स के पटना,जयपुर और लखनऊ संस्करणों की बंदी के टाइम्स ऑफ इंडिया समूह के प्रबंधन की बदलती प्राथमिकताओं को ज्यादा जिम्मेदार बताया गया। लेकिन यह सिर्फ तस्वीर का एक पहलू है। दूसरी बात ये है कि यहां कार्यरत कुछ वरिष्ठ पत्रकार एक –दूसरे को नीचा दिखाने के लिए चारित्रिक लांछन लगाने से नहीं हिचकते थे। ऐसी परिस्थितियों में भला प्रबंधन क्यों किसी की परवाह करता। अगर प्रबंधन ने हिंदी पत्रकारों के बारे में गलत धारणा बनाई तो इसके लिए एक हद तक जिम्मेदार स्वयं पत्रकार भी रहे। पत्रकारीय फूट और खींचतान के चलते प्रबंधन को अपने संस्करणों को देर की बजाय जल्द ही बंद करने की सहूलियत मिल गई। .....क्रमश:….

रविवार, 10 फ़रवरी 2008

बारहवीं सदी में प्रशासन की भाषा थी हिंदी

उमेश चतुर्वेदी
आजादी के तत्काल बाद ही संविधान सभा ने हिंदी को संवैधानिक दर्जा दिया था। संविधान के अनुच्छेद 343 में हिंदी को संघ की भाषा और देवनागरी को उसकी लिपि का दर्जा दिया था। लेकिन असलियत में हिंदी इस देश की कभी-भी राजभाषा नहीं बन पाई। तब से उसका काम महज प्रशासनिक तौर पर उपयोग में लाए जाने वाली अंग्रेजी के अनुवाद का कर्मकांड ही रह गया। हर साल हिंदी दिवस पर इसी कर्मकांड के पाखंड का दुहराव होता है। मजे की बात है कि हर बार इस दुरूह शैलीगत विशेषताओं को ही दुहराया जाता है। इस दुरूहता को विभागीय और अनुभाग स्तर पर सम्मानित और पुरस्कृत करने का फायदेमंद कार्यक्रम भी होता है। इससे कुछ लोगों की कुछ वक्त के लिए माली हालत सुधर भी जाती है। लेकिन ये भी सच है कि राजभाषा को याद करने की इस माखौली रस्म से असलियत में हिंदी का कोई विकास नहीं होता। लेकिन जो लोग इस खेल के माहिर और आदी हैं- उन्हें शायद ये पता न हो कि हिंदी को इसके पहले भले ही बतौर राजभाषा संवैधानिक दर्जा हासिल नहीं था- लेकिन वास्तविकता के धरातल पर वह अपने उस कालरूप में ही प्रशासन की भाषा थी।
हिंदी का प्रशासन की भाषा के तौर पर पहली बार बारहवीं सदी में दिखता है। इस दौर में दिल्ली की गद्दी पर पृथ्वीराज चौहान का शासन था। इस दौर के कतिपय दूसरे नरेशों के प्रशासन की भाषा भी हिंदी ही थी। चूंकि अरब देशों से व्यापार और हमलावरों के रूप में भारतीयों का संपर्क ज्यादा था- इसलिए उस दौर में अरबी शब्दों का कम से कम प्रशासनिक हिंदी पर ज्यादा असर दिखता है। तब तत्सम शब्दों का बहुतायत से प्रयोग होता था। लेकिन एक कमी उस दौर में प्रमुखता से दिखती है- तब आज की तरह वर्तनी की एकरूपता उस दौर में नहीं दिखती है। इसके लिए पृथ्वीराज चौहान और तत्कालीन चित्तौड़ नरेश राम समर सिंह के बीच पत्रव्यवहार को देखा जा सकता है। एक चिट्ठी राम समर सिंह ने चौहान को लिखी थी। उसका मजमून कुछ इस तरह का है-
ओर थारा चाकर घोड़ा का नामो कोठार सूं चला जाएगा और यूं जमाखातरी रीजो मोई में राजस्थान बाद अणी पवानरी कोई अलंगणा करेगा, जी ने श्री एंवली गंजी की आण है, दूबे जानकी दास संबत 1139 काती बदी तीन।
इस राजकीय चिट्ठी को समझने में आज के हिंदीभाषी को भले ही परेशानी होती हो- लेकिन तत्कालीन दौर में प्रारंभिक हिंदी राजकाज में किस तरह स्थान बना रही थी- इसका बेहतरीन नमूना है ये पत्र।
कौटिल्य ने अपने मशहूर ग्रंथ अर्थशास्त्र में राजभाषा के बारे में लिखा है कि शासन की भाषा में अर्थ, क्रम,संबंध,माधुर्य और औदार्य के साथ-साथ स्पष्टता होनी चाहिए। आजादी के पहले तक की राजभाषा हिंदी में लगभग ये सारी विशेषताएं देखी जा सकती हैं। लेकिन बाद की हिंदी इससे सर्वथा भिन्न और दुरूह है। यही कारण है कि आज की प्रशासनिक हिंदी का मतलब इतर लोक की भाषा के रूप में रूढ़ हो गया है। पता नहीं अरब देशों से आए लोगों ने जिस सल्तनत शासन परंपरा की नींव डाली,उन्होंने आचार्य कौटिल्य की इन स्थापनाओं को पढ़ा था या नहीं, लेकिन राजकाज की भाषा के रूप में तत्कालीन हिंदी को तात्कालिक विशेषताओं सहित स्वीकार किया था। सुल्तानों ने पृथ्वीराज की हार के बाद देश में सल्तनत कायम करने के बाद जनविश्वास अर्जित करने व जनसंपर्क के लिए राजकाज में हिंदी व लिपि के रूप में देवनागरी को ही अपनाया। शहाबुद्दीन ने अपने शासन काल में सिक्कों पर हिंदू देवी-देवताओं के चिन्ह अंकित कराए, इनके चारों ओर श्री हम्मीर और श्री महमूद साम और दूसरी ओर नंदी की मूर्ति भी अंकित कराई थी। इल्तुतमिश ने कन्नौज के विजय स्मारक पर देवनागरी में ही सूचना व संदेश अंकित कराए थे। हालांकि आज ये संदेश अस्पष्ट हो चले हैं। अल्लाउद्दीन खिलजी संभवत:पहला शासक था, जिसने हिंदी को सुदूर दक्षिण में फैलाने की कोशिश की। उसने राजकीय नियमों-उपनियमों को हिंदी में लिखाकर उसकी हजारों प्रतियां दक्षिणी राज्यों में बंटवाई। बाद में उसके सेनापति मलिक काफूर ने आंध्र, महाराष्ट्र और कर्नाटक को दिल्ली सल्तनत में मिला लिया। इसके बाद इन क्षेत्रों में राजकाज के लिए उसने दक्खिनी हिंदी को अपनाया। मोहम्मद तुगलक के साथ-साथ बहमनी वंश के शासकों ने उत्तर में तो हिंदी के तात्कालिक रूप को राजकाज की भाषा के रूप में अपनाया ही था- दक्षिणी राज्यों में हिंदी के दÎक्खनी रूप के माध्यम से ही प्रशासन चलाया। इसमें इन्हें कोई परेशानी नहीं हुई। बाद में बीजापुर,गोलकुंडा,अहमदनगर तक के शासकों ने हिंदी में ही प्रशासन चलाया। इसके लिए राष्ट्रीय अभिलेखागार में मौजूद दस्तावेज़ों को देखा जा सकता है। लेकिन आजाद भारत में अब इन क्षेत्रों में भी राजभाषा हिंदी में काम करने में परेशानियां हो रही हैं।
भक्ति काल को हिंदी का स्वर्ण काल माना जाता है। मध्यकाल यानी भक्तिकाल में हिंदी का जितना विकास हुआ है- उतनी ही प्रतिष्ठा उसकी राजभाषा के भी रूप में हुई। यह ऐतिहासिक रूप में से मुगल सल्तनत काल था। इस दौर में देसी रियासतों और दिल्ली सल्तनत के बीच संपर्क के लिए आज के राजदूतों की भांति व्यवस्था थी। मुगल साम्राज्य ने हर मित्र रियासत में अपना प्रतिनिधि रखा था। ठीक इसी तरह देसी रियासतों ने भी मुगल दरबार में अपने प्रतिनिधि रख छोड़ा था। इन प्रतिनिधियों को वकील कहा जाता था। इन वकीलों और राज्यों के बीच आपसी पत्रव्यवहार हिंदी में ही होता था। इन पत्रों को तहरीर,खाते,मिसिल,नक्शा,खतूत रोजनामा,अमलदस्तूर आदि नामों से पुकारा जाता था। इन पत्रों में फारसी के वर्चस्व के दर्शन तो होते हैं- लेकिन अवधी, ब्रज और राजस्थानी के शब्दों का भी भरपूर उपयोग दिखता है। इन पत्रों को देवनागरी लिपि में ही लिखा जाता था। लेकिन इन पत्रों में भी सल्तनतकालीन पत्रों की तरह वर्तनी में एकरूपता नहीं है। ऐसे ढेरों पत्र बीकानेर के अभिलेखागार में रखे गए हैं। मुगलकाल की राजभाषा को समझने के लिए दो आदेशों को बतौर उदाहरण देखा जा सकता है-
जमीं षेती लाइक होई सा एक बिस्वो भी पड़े रही नहीं। अर्थात खेती योग्य एक बिस्वा जमीन भी खाली नहीं रहनी चाहिए।
नाज रैत्य पास लेके व्यापारी बहूत परीदि करि भंडसाल न करने पावे अर्थात अधिकारियों को स्पष्ट आदेश है कि व्यापारी अनाज खरीदकर भंडारों जमा न करने पाएं।
मुगल साम्राज्य के बीच बारह सालों तक शेरशाह सूरी का भी शासन काल रहा। सासाराम में जन्मे शेरशाह ने भी अपने सिक्कों पर देवनागरी में श्री सीताराम, श्रीनाथ संवत और ऊं लिखवाए थे।
औरंगजेब के दौरान संस्कृत शब्दों का राजकाज की हिंदी में प्रयोग बढ़ा। बाद में मुगल सम्राटों के राजकाज की भाषा में ब्रज और खड़ी का इस्तेमाल ज्यादा होने लगा। मुगल सल्तनत के बाद और अंग्रेज़ों की सत्ता आने से पहले तक इस देश के अधिकांश भूभाग पर मराठों का शासन रहा। मराठों ने भी दिल्ली की गद्दी पर कब्जा जमाने के बाद दैनिक राजकाज में हिंदी को ही बढ़ावा दिया था। राजकाज की भाषा के लिए प्रशासनिक शब्दावली और अधिकारियों के पदनामों का एक तरह से मानकीकरण इसी दौर में हुआ। मराठों ने राजनीति, वित्त,कृषि,कर,सेना,कंपनी आदि के बारे में सैकड़ों पत्र लिखे हैं। ऐसे सैकड़ों पत्र राष्ट्रीय अभिलेखागार दिल्ली के अलावा राज्य अभिलेखागार बीकानेर और पुणे के पेशवा दफ्तर में संकलित हैं। इन पत्रों की भाषा पर हालांकि मराठी प्रभाव ज्यादा है, लेकिन राजस्थानी, प्राकृत,अरबी,फारसी व बुंदेलखंडी शब्दों की बहुलता है। मराठी से कई पत्रों के हिंदी अनुवाद भी उन दिनों कराए गए थे। ये पत्र भी इन अभिलेखागारों के पास बतौर अमोल धरोहर सुरक्षित हैं।
अठारहवीं सदी के उत्तरार्ध में अंग्रेज़ों ने इस देश की शासन व्यवस्था हथिया ली। उन्हीं के एक अधिकारी मैकाले को आज तक देश में अंग्रेजी थोपने का दोषी माना जाता है। लेकिन यह भी सच है कि भारत में तैनाती चाहने वाले अंग्रेज अधिकारियों के लिए हिंदी जानना जरूरी था। कलकत्ता-अब कोलकाता के मशहूर फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना सन 1800 में ब्रिटिश सरकार ने अंग्रेज सिविल अधिकारियों को हिंदी सिखाने के लिए की थी। सदल मिश्र और लल्लू लाल जैसे विद्वान अध्यापक इस कॉलेज में सिविल सेवा के अधिकारियों को हिंदी सिखाने के लिए ही तैनात किए गए थे। इन्हीं सदल मिश्र ने बाद में सुखसागर और लल्लू लाल ने प्रेमसागर की रचना की। यहां ये बताना जरूरी है कि आज हिंदुओं के घरों में बतौर धार्मिक ग्रंथ पढ़े जाते हैं।
अंग्रेजी सरकार ने देसी रियासतों की राजधानियों और दरबारों में पोलिटिकल एजेंट, पोलिटिकल सुपरिंटेंडेंट और रेजिडेंट नियुक्त किए थे। पोलिटिकल एजेंट और पोलिटिकल सुपरिंटेंडेंट गवर्नर जनरल द्वारा देसी रियासतों और रियासतों की ओर से अंग्रेज सरकार को अंग्रेजी में लिखे पत्रों का हिंदी में अनुवाद करते थे। सही मायने में तभी से हिंदी की राजभाषा के साथ ही अनुवाद की भाषा बनने की शुरूआत हुई और आजाद भारत में तो ये महज अनुवादी राजभाषा ही रह गई। गृह विभाग के तहत अंग्रेज शासकों ने इसी काम के लिए बाद में तरजुमा महकमा की स्थापना की - जिसे आज केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो कहा जाता है। कहना न होगा कि ये ब्यूरो आज भी केंद्रीय गृह मंत्रालय के ही अधीन काम करता है।
उन्नीसवीं सदी के कचहरियों के दस्तावेज़ों से साफ है कि अंग्रेज सरकार ने शुरूआती दौर में हिंदी के माध्यम से ही न्याय व्यवस्था चलाई थी। बाद में फारसी पर जोर दिया जाने लगा। 1857 की आजादी के बाद ये इसलिए शुरू हुआ ताकि हिंदुओं और मुसलमानों के बीच दरार बढ़ाई जा सके। ताकि ब्रिटिश सरकार की अहमियत और जरूरत इस देश में बनी रहे। आज के शासकों का नेपाल जैसे देवनागरी लिपि का इस्तेमाल करने वाले देश से भी अंग्रेजी में ही पत्र व्यवहार होता है। आज के शासकों को ये जानकर शायद आश्चर्य हो कि अंग्रेज सरकार भी नेपाल से हिंदी में ही राजकीय पत्र व्यवहार करती थी। इसे बिडंबना भले ही मानें- असलियत तो यही है।

शनिवार, 9 फ़रवरी 2008

खबर का अपमार्केट बनना

उमेश चतुर्वेदी
केंद्र सरकार ने खबरिया चैनलों पर जब से कंटेंट कोड लागू करने की तैयारियां शुरू की है- तब से इन चैनलों पर लगने वाला एक आरोप फिर जोर-शोर से उठने लगा है। आरोप ये है कि इन चैनलों पर खबरें नहीं हैं- खबरों की बजाय ये चैनल भूत-प्रेत और ऐय्यारी की कथाओं के बहाने टीआरपी बटोर रहे हैं। आरोप तो ये भी है कि खबरिया चैनलों से आम आदमी दूर होता जा रहा है। कम से कम हिंदी चैनलों पर आम आदमी का दुखदर्द कहीं नहीं दिखता। देश में भूख, कर्ज और गरीबी से लोगों की मौतें हो रही हैं, किसान आत्महत्या करने के लिए मजबूर हैं, लेकिन खबरिया चैनलों पर इनकी अनुगूंज नहीं सुनाई दे रही है।
भारत में आधुनिक मीडिया ने सवा दो सौ साल से ज्यादा की यात्रा कर ली है। (जेम्स ऑगस्टस हिक्की का बंगाल गजट एंड जेनरल एडवर्टाइजर यानी हिक्की गजट 1780 में निकला था। यानी पिछले दस-बारह सालों का इतिहास छोड़ दें तो कमोबेश ये विकास यात्रा असल में प्रिंट मीडिया की विकास यात्रा है। सवा दो सौ साल से ज्यादा की प्रिंट मीडिया की उम्र के सामने टेलीविजन अभी बच्चा ही है। दस-बारह साल की उम्र सवा दो सौ साल के सामने कहीं नहीं ठहरती। इस वजह से खबरिया चैनलों की इस भूल को उदारवादी मीडिया समीक्षक माफ करने की सलाह देते हैं। आशावादी नजरिये से वे मानते हैं कि भारत में टेलीविजन एक दिन जिम्मेदार मीडिया जरूर बनेगा। लेकिन पारंपरिक सोच रखने वाले लोगों को मीडिया का वाच डॉग वाला स्वरूप ही ज्यादा मुफीद नजर आता है और वे चाहते हैं कि खबरिया चैनल इसी ढर्रे पर ही काम करें। लेकिन ऐसी सोच रखने वाले ये भूल जाते हैं कि टेलीविजन का धंधे में पूंजी की अहम भूमिका है। इसमें विशालकाय पूंजी लगती है और जाहिर है इतनी बड़ी पूंजी को कोई लंबे समय तक नहीं लगा सकता। परोपकारी रवैये से लोकसभा चैनल तो चल सकता है- लेकिन ये भी सच है कि जब वह लोकसभा के बजट पर भारी पड़ने लगेगा - तब उसे भी दूरदर्शन की तरह चलाने की मांग उठने लगेगी। तब शायद लोकसभा चैनल को भी बदलने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। हालांकि विशुद्ध खबर वाली सोच वाला कोई भी प्रतिबद्ध और प्रगतिशील व्यक्ति नहीं चाहेगा कि बाजार की अंधी दौड़ में लोकसभा चैनल भी दौड़ने और खुद को बनाए रखने के लिए मजबूर हो जाए।
हकीकत तो ये है कि पूंजी के इस खेल में विज्ञापन नहीं मिलेंगे तो खबरिया चैनल के अस्तित्व पर ही सवाल उठ खड़ा हो जाएगा। और जब चैनल नहीं रहेंगे तो उन पर पत्रकारिता और खबरों की नैतिकता कैसे लागू होगी। दरअसल आज खबरें ना तो इलेक्ट्रॉनिक चैनलों के संपादक तय करते हैं और ना ही उनके मालिक। खबरें दरअसल बाजार तय कर रहा है और बाजार के इस रिवाज का मानक है टीआरपी-टैम रेटिंग प्वाइंट।
एक दौर था, जब अखबार की सबसे बड़ी खासियत उसका प्रसार मानी जाती थी। जिसका जितना प्रसार -विज्ञापन उतना ही ज्यादा। लेकिन आज प्रिंट मीडिया के लिए भी वह मानक पुराना पड़ता जा रहा है। विज्ञापन बटोरने- हथियाने का ये खेल ही है कि आज अखबार अपने सर्कुलेशन की बजाय ये बताने में अपनी ज्यादा ऊर्जा लगाते हैं कि उन्हें पढ़ने वाले इतने लाख या करोड़ पाठकों के पास कार है, स्कूटर है और घर में आधुनिक सुख-सुविधा के सारे साधन मौजूद हैं। कहने का मतलब ये है कि आज क्वांटिटी की बजाय क्वालिटी वाले विज्ञापन बटोरने की होड़ प्रिंट मीडिया में भी तेज हो गई है। ये उसी प्रिंट मीडिया की बात है- जो अपने को पत्रकारिता की नैतिकता के सबसे ज्यादा करीब बताते नहीं थकता। उसे भी अब ये बताने से गुरेज नहीं है कि उसे आम नहीं- खास आदमी पढ़ता है। उसे पढ़ने वाला समाज के उस वर्ग से आता है-जिसकी खरीद क्षमता खासी है। वह आपके विज्ञापनों से प्रभावित होकर आपकी चीजें खरीद सकता है। अखबार ये बताने से अब हिचकने लगा है कि उसे समाज के हाशिए और निचले तबके के कितने लोग पढ़ते हैं।
कुछ इसी तरह खबरिया चैनलों की दुनिया में टैम का बोलबाला है। टैम की रेटिंग-जिसे टीआरपी कहा जाता है-उसी पर विज्ञापन देने वाली कंपनियां भरोसा करती हैं और उसी के आधार पर चैनलों को विज्ञापन मिलता है। भारी पूंजी के सहारे चल रहे टेलीविजन चैनलों को अगर विज्ञापन न मिलें तो उनका चलना मुश्किल है। ऐसे में चैनलों को इन दिनों उन्होंने भेंड़चाल में शामिल होना पड़ रहा है- जिसमें बाकी चैनल दौड़ रहे हैं। इंडिया टीवी ने अपने शुरूआती दिनों में नारा ही दिया था- इंडिया टीवी बदले भारत की तस्वीर। जो लोग शुरू में इंडिया टीवी से जुड़े-उन्हें पता है कि इंडिया टीवी पर फिल्मों की खबरें तक चलाने की मनाही थी। लेकिन मौजूदा बाजार और टैम की माया में कुछ अलग दिखने का नारा नहीं चला। भारत की तस्वीर बदलने का माद्दा बाजार के दबाव में झुक गया और उसी इंडिया टीवी पर झंकार बीट दिखाई पड़ने लगा। तकरीबन पूरे इलेक्ट्रॉनिक चैनलों की यही हालत है।
वैसे टैम की रेटिंग पर भी कम सवाल नहीं हैं। चुनावों में एक्जिट पोल के नतीजे अक्सर मुंह की खाते रहे हैं। इसकी वजह बताई जाती रही है कि करोड़ों की जनसंख्या वाले देश में कुछ सौ या कुछ हजार के सैंपलों के आधार पर भविष्यवाणी करना कितना उचित होगा। तर्क ये भी दिया जाता है कि विविधताओं और करोड़ों की जनसंख्या वाले देश में कुछ सौ या कुछ हजार के सैंपल भला पूरे देश या इलाके को कैसे रूपायित कर सकते हैं। लेकिन ये सवाल उठाने वाले लोग इस बात पर मौन हैं कि टीआरपी बताने वाले सैंपल भी सिर्फ 9870 ही हैं। वह भी कुछ शहरों में ही हैं। हाल तक ये संख्या महज 4555 ही थी। एक अनुमान के मुताबिक करीब डेढ़ करोड़ घरों में सेटेलाइट टेलीविजन यानी केबल टीवी या फिर डीटीएच की पहुंच है। जबकि आठ करोड़ घरों में दूरदर्शन की पहुंच है। और आठ करोड़ टेलीविजन उपभोक्ता परिवारों की रूचि-अरूचि, दिलचस्पी का पैमाना सिर्फ 6000 मीटरों के जरिए किया जा रहा है। सबसे मजे की बात ये है कि इन पीपुल्स मीटरों में से एक भी हिंदी पत्र-पत्रिकाओं के गढ़ समझे जाने वाले बिहार में नहीं है। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के शहर टैम की रेटिंग के दायरे में नहीं आते। लेकिन पीपुल्स मीटर की माया पर सब मेहरबान हैं और उसके सामने नाचने को मजबूर हैं। वैसे भी आज के दौर में सवाल पूछने की प्रवृत्ति कम से कम पत्रकारिता के अंदरूनी हलकों कम होती जा रही है। सवाल पूछने वाले या तो हाशिए पर हैं या हैं ही नहीं-ऐसे में टैम की माया जारी है और उस पर कुर्बानियां भी दी जा रही हैं। वैसे भी ये पीपुल्स मीटर कहां लगे हैं-ये भी किसी को ठीक-ठीक पता नहीं हैं। वैसे एक बात तय है कि ये मीटर जिसे निम्न मध्य वर्ग कहा जाता है,उनके घरों में नहीं हैं। यही वजह है कि आज आम आदमी की चिंताएं टैम की रेटिंग में कहीं नहीं दिखती। ऐसे में भला कौन संपादक या चैनल प्रमुख होगा, जो निम्न मध्यवर्गीय घरों की कहानियां और उनकी परेशानियां दिखाकर टैम की रेटिंग प्वाइंट में गिरने का खतरा उठाना पसंद करेगा। टेलीविजन चैनलों की आज मजबूरी बन गई है कि डाउन मार्केट दुनिया की खबरों से खुद को दूर रखें। निम्न मध्यवर्गीय दुनिया और उससे जुड़ी़ घटनाएं टेलीविजन की भाषा में डाउन मार्केट कही जाती हैं। ज़ी न्यूज़ ने 2006 में पंजाब और महाराष्ट्र के कर्ज में डूबे दो गांवों की मजबूरी पर एक घंटे का लाइव प्रोग्राम बनाया। दोनों गांवों ने खुद के बिकाऊ होने का ऐलान कर दिया था। दिलचस्प है कि प्रोग्राम अच्छा बना, देविंदर शर्मा और किसान संगठनों के नेताओं की अच्छी-खासी चर्चा हुई, लेकिन टैम की रेटिंग प्वाइंट में ये प्रोग्राम कोई जगह ही नहीं बना पाया था। ऐसे तमाम उदाहरण हर चैनल में मिल जाएंगे। बहरहाल ऐसे में डाउन मार्केट खबरों और उनसे जुड़ी चिंताओं पर चर्चा करने की हिम्मत अच्छे-भले लोग भी नहीं दिखा सकते।
टैम की रेटिंग का दबाव है कि आज हर चैनल या तो अप मार्केट खबर दिखाता है या फिर भूत नचाने में ही मशगूल रहता है। लेकिन कई बार डाउन मार्केट खबरें भी अपमार्केट बन जाती हैं तो चैनलों और मार्केटिंग वालों को कुछ नहीं सूझता। इसका बेहतरीन उदाहरण है - नोएडा के निठारी की घटना। 36 बच्चे गायब होते रहे, झुग्गियों या निम्न मध्यवर्गीय कॉलोनियों की गंदी गलियों में रहने वाले उनके माता-पिता पुलिस से लेकर नेताओं तक के चक्कर लगाते रहे। लेकिन उनके दर्द और जज्बात पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने ध्यान नहीं दिया। उन्हीं दिनों एक मशहूर कंपनी के सीईओ के बेटे का उसी नोएडा से अपहरण हुआ तो मीडिया की ये पहली सुर्खी बन गया। इस बीच उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव आ गए और विपक्षी निशाने पर मुलायम सिंह यादव का शासन काल और कानून-व्यवस्था आ गई। लगने लगा कि मुलायम की सरकार बर्खास्त भी हो सकती है। तो निठारी की गंदी गलियों में बचपन गुजारने वाले बच्चों की मौत अचानक अप मार्केट खबर बन गई। यानी जब गंदी गलियों की घटनाएं समाज के खरीददार वर्ग की दुनिया पर असर डालने लगती है, ये खबर अप मार्केट बन जाती है। कहना ना होगा कि इसके पीछे भी टैम की रेटिंग का ही हाथ होता है।
लोग सोचते होंगे कि चैनलों के कर्ता-धर्ता सांप नचाकर या भूतों का मेला दिखाकर खुश होते हैं। इस बारे में आजतक चैनल के संपादकीय प्रमुख कमर वहीद नकवी के सार्वजनिक बयान को उदाहरण के तौर पर रखा जा सकता है। भारतीय जनसंचार संस्थान के मौजूदा और पुराने छात्रों के एक मिलन कार्यक्रम में 16 मई 2007 को उन्होंने कहा था कि आज जो वे लोग चैनलों में कर रहे हैं या दिखा रहे हैं-उस पर उन्हें अफसोस है क्योंकि पत्रकारिता में जो करने आए थे, नहीं कर पा रहे हैं। जाहिर है कि चैनलों के कर्ताधर्ता भी मौजूदा हालात से खुश नहीं हैं। लेकिन रोजाना की रेटिंग का दबाव उन पर हावी है और उनके सामने इस दबाव में भूत नचाने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है। लेकिन हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि हर दौर में ऐसे दबाव रहे हैं। आजादी के आंदोलन के दौरान भी हर उस अखबार के बंद किए जाने का खतरा था, जो अंग्रेजी सरकार के खिलाफ और आजादी के रणबांकुरों के पक्ष में लिखा करता था। लेकिन अभिव्यक्ति के ये खतरे उठाने वालों ने उठाए ही। शायद यही वजह है कि खतरे उठाने वाले रामानंद दोषी, बनारसी दास चतुर्वेदी, गणेश शंकर विद्यार्थी और बाबूराव विष्णुराव पराड़कर ही याद किए जाते हैं। उस दौर में भी तमाम तरह के अखबार, पत्रिकाएं और दूसरे रिसाले निकल रहे थे, लेकिन उनके संपादकों को कौन याद करता है।
आम आदमी को भूलने वाले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में ये हालत ज्यादा दिनों तक नहीं रहने वाली है। इसकी भी वजह है। गांवों तक बाजार की पहुंच तेजी से हो रही है। डाबर का लाल दंतमंजन दिल्ली-लखनऊ में एक रूपए के पाउच में नहीं मिलता, लेकिन सहरसा या बलिया के किसी गांव के परचूनिए के यहां एक रूपए के पाउच में ये मंजन मौजूद है। सनसिल्क या क्लिनिक प्लस शैंपू शहरों में दो रूपए के पाउच में मिलता है, लेकिन देश के किसी सुदूर गांव में पचास पैसे की कीमत में भी उसका पाउच मौजूद है। यानी उदारीकरण के दौर में गांवों तक अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए ये कंपनिया मार्केटिंग और सेल्स का ये नया तरीका अपना रही है। ऐसे में वह दिन दूर नहीं- जब आम आदमी और गांव-गिरांव की बात भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को करना होगा। लेकिन सोचने वाली बात ये है कि मीडिया ये कदम सामाजिक दायित्व को निभाने के लिए उठाएगा, बल्कि बाजार के दबाव में उठाएगा।

गुरुवार, 31 जनवरी 2008

अंग्रेजी की एक हकीकत

उमेश चतुर्वेदी
मेरे एक जानकार इन दिनों जर्मनी में जाकर भी परेशान हैं। आप सवाल पूछेंगे कि आखिर क्या वजह रही कि जर्मनी जाकर भी वे हलकान हुए जा रहे हैं। ये सवाल इसलिए भी मौजूं हैं कि क्यों बदलती दुनिया में आज हर किसी का मकसद यूरोप और अमेरिका जाना और वहां छोटा-मोटा ही सही, नौकरी करना हो गया है। यूरो और डालर की चमक के इस दौर में इन्हें कमाना आज दुनिया की सबसे बड़ी इच्छा हो गई है। ऐसे में हमारे जानकार को जर्मनी जाकर ही खुश हो जाना चाहिए था- लेकिन वे खासे परेशान हैं तो सवाल उठेगा ही।
इस सवाल का जवाब जानने-समझने से पहले उनके जर्मनी जाने की पृष्ठभूमि भी समझ लेनी चाहिए। मेरे मित्र को इंटरनेट पर चैटिंग करते हुए एक जर्मन लड़की से प्रेम हो गया। मैक्समूलर की धरती की बेटी को भी भारत और इसकी अध्यात्मिक दुनिया को जानने-समझने में जबर्दस्त दिलचस्पी थी-लिहाजा उसे भी भारत का देसी छोरा पसंद आ गया और बात इतनी आगे बढ़ी कि अंजाम शादी तक पहुंच गया। हालांकि लड़की की दिलचस्पी भारत में रहने और यहां की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दुनिया में खुद को डूबा लेने की थी। लेकिन शादी के बाद उसे पता चला कि पति महोदय की दिलचस्पी तो जर्मनी जाकर यूरो कमाने में है। तो लड़की ने भी ठेठ भारतीय लड़की की तरह पति की ही इच्छा को अपनी इच्छा मानकर पति के साथ जर्मनी लौट गई। जर्मनी जाने के बाद हमारे जानकार की जिंदगी कुछ दिनों तक तो बेहतर रही-लेकिन ऐसा कब तक चलता?तो जब मधुयामिनी का वक्त बीता, हमारे जानकार महोदय को जीविका,नौकरी और यूरो की चिंता समाने लगी और शुरु हुआ जर्मनी में नौकरी ढूंढ़ने की जमीनी कोशिश। जानकार महोदय अच्छी-खासी अंग्रेजी जानते हैं। भारत में अच्छे कहे जाने वाले स्कूलों में उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई है,इसलिए उन्हें भरोसा था कि उन्हें नौकरी मिल ही जाएगी। लेकिन उनकी कोशिश कुछ वैसी ही होती गई-जैसे भारत में बेरोजगारों को नौकरी खोजते वक्त होती है।
दरअसल जर्मनी में नौकरी पाने के लिए अंग्रेजी से ज्यादा जर्मन जानना ज्यादा जरूरी है। जानकार महोदय जर्मन नहीं जानते-लिहाजा उन्हें नौकरी मिलने में दिक्कतें हो रही हैं। यही वह वजह है कि जानकार महोदय विदेश की चमकीली और सुनहली जमीन पर भी हलकान हुए जा रहे हैं।
अमेरिकी मॉडल की अर्थव्यवस्था लागू होने के बाद से अपने देश में अंग्रेजी का बोलबाला और तेजी से बढ़ा है। इसके साथ ही ये भी मान लिया गया कि पूरी दुनिया में सफलता सिर्फ और सिर्फ अंग्रेजी के जरिए ही हासिल की जा सकती है। हमारे जानकार महोदय भी ऐसी ही मानसिकता को लेकर जर्मनी की जमीन पर पहुंचे थे। लेकिन उनकी इस मानसिकता को चोट पहुंची वहीं पहुंचकर। सिर्फ जर्मनी ही नही, दुनिया के तमाम देश ऐसे हैं-जहां अंग्रेजी के बल पर सामान्य कामकाज भी नहीं निबटाया जा सकता। अभी हाल ही में क्वात्रोक्की का मामला एक बार फिर उछला था। क्वात्रोक्की अर्जेंटीना में है। जिसके प्रत्यर्पण के लिए सीबीआई टीम पहुंची तो वहां की स्थानीय भाषा न जानने के कारण उसे कई तरह की परेशानियां झेलनी पड़ीं। क्वात्रोक्की के सीबीआई के हाथ से फिसल जाने के कारणों की पड़ताल के साथ ही इस तथ्य की भी जमकर चर्चा हुई थी। फ्रांस के लोगों को तो अंग्रेजी बोलने से भी परहेज रहता है। ये तो बात जगजाहिर है। लेकिन फ्रांस और जर्मनी भी आर्थिक मोर्चे पर अमेरिका को टक्कर दे रहे हैं।
दुर्भाग्य की बात ये है कि नए आर्थिक उदारीकरण के इस दौर में मीÊडया भी ऐसी खबरों को कोई प्रमुखता नहीं दे रहा। चाहे भाषाई मीÊडया हो या फिर कथित मुख्यधारा का अंग्रेजी मीडिया-उसके लिए इन खबरों का कोई मतलब नहीं रह गया है। इसका एक असर ये हो रहा है कि फ्रांस और जर्मनी के भी सपने लोग अंग्रेजी के जरिए देखने लगे हैं और वहां जाकर हमारे जानकार की तरह परेशान घूमने या फिर छोटी-मोटी नौकरियां करने को मजबूर हो गए हैं।

सोमवार, 28 जनवरी 2008

पत्रकारिता के किंतु - परंतु

ये लेख भारतीय जनसंचार संस्थान की त्रैमासिक पत्रिका संचार माध्यम के जुलाई-सितंबर 2005 के अंक में प्रकाशित हो चुका है। अंक देर से प्रकाशित हुआ है।
उमेश चतुर्वेदी
बीसवीं सदी के आखिरी वर्षों में समाचार माध्यमों में जो इलेक्ट्रॉनिक क्रांति हुई, उससे अखबारों की दुनिया के सिकुड़ने की आशंका जताई जाने लगी थी। लेकिन अखबारों का विस्तार हुआ, ना सिर्फ बढ़े, बल्कि उनकी बढ़त क्रांतिकारी रही। हिंदी के दो अखबारों – दैनिक जागरण और दैनिक भास्कर की क्रांतिकारी प्रसार संख्या इसकी गवाह है। दोनों ही अखबारों का दावा डेढ़ करोड़ पाठक होने का है। दोनों के बिक्री के आंकड़े दस लाख की संख्या को पार कर गए हैं। गाय और गोबर पट्टी के तौर पर देशभर में उपहास का पात्र रहे हिंदी इलाके में अकेले इन्हीं दो अखबारों का दस लाख की प्रसार संख्या का पार कर जाना, इस बात का गवाह है कि छपे हुए शब्दों के प्रति गाय और गोबर पट्टी का रवैया तेजी से बदला है। इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों के वर्चस्व के दौर में भी छपे शब्दों की ताकत और उनके प्रति लोगों में कितनी आस्था है- इसका अंदाजा आए दिन अखबारों के दफ्तरों में आने वाले दुखी-पीड़ित लोगों को देखकर लगाया जा सकता है। उन्हें लगता है कि उनके दुख, उनकी पीड़ाएं और उनके साथ हुए अन्याय को अखबार का स्वर मिला तो उनकी समस्या छू-मंतर हो जाएगी। लेकिन सवाल उठता है कि क्या अखबार अब भी अपने इस दायित्व का उतनी ही शिद्दत से निर्वाह कर रहे हैं ?
इस सवाल का जवाब ढूंढ़ने से पहले याद आते हैं हिंदी के संपादकाचार्य बाबू राव विष्णुराव पराड़कर के करीब छह दशक पहले कहे गए कुछ शब्द ... पत्र निकालकर सफलतापूर्वक चलाना बड़े-बड़े धनियों अथवा सुसंघटित कंपनियों के लिए ही संभव होगा। पत्र सर्वांग सुंदर होंगे। छपाई अच्छी होगी, मनोहर,मनोरंजक और ज्ञानवर्द्धक चित्रों से सुसज्जित होंगे। लेखों में विविधता होगी,कल्पकता होगी, गंभीर गवेषणा की झलक होगी,ग्राहकों की संख्या लाखों में गिनी जाएगी। यह सब कुछ होगा पर पत्र प्राणहीन होंगे।.....उनकी ये बात आज अक्षरश: साबित हो रही है। अखबारों के अब तक तीन काम गिनाए जाते रहे हैं। मीडिया संस्थानों के विद्यार्थी इसका रट्टा मारते रहे हैं। ये काम है – सूचना देना, शिक्षा देना और मनोरंजन करना। लेकिन मनमोहनी अर्थव्यवस्था ने जैसे-जैसे इस भारतभूमि में अपने पांव पसारे – अखबारों ने अपने इन तीनों भूमिकाओं में कटौती शुरू कर दी। कुछ लोग एतराज के तौर पर कह सकते हैं कि अखबार सूचना देने का काम तो करते ही रहते हैं। इस पर चर्चा बाद में ...सबसे पहले बात करते हैं मनोरंजन की। हिंदी अखबारों के चकमक रंगीन पृष्ठों पर आजकल खबरें लगातार कम होती जा रही हैं। बल्कि इन पृष्ठों पर अब प्यार करने की विधियों से लेकर कॉलेज में लड़का या लड़की पटाने तक सजीव तरीका बताया जा रहा है। ये काम वे संपादक भी बदस्तूर जारी रखे हुए हैं – जिनसे हिंदी समाज को कहीं ज्यादा अपेक्षाएं थीं। संपादक महोदय खुद हिंदी के गरिष्ठ- क्लिष्ट लेखों से अपने पाठकों को बोर कर रहे हैं या अपने अखबारी जीवन को समृद्ध कर रहे हैं- ये तो शोध का विषय है। लेकिन सरसरी तौर पर जो परिलक्षित हो रहा है – उसकें युवा पाठकों की पसंद के नाम पर वो सब कुछ परोसा जा रहा है। जिसे बाजारी व्यवस्था वाले खुले समाज की इकाई परिवारों तक ने अभी तक नहीं आजमाया है।
विकसित देशों की पेज थ्री पत्रकारिता को अंग्रेजी अखबारों ने करीब छह- सात साल पहले जब अपनाया था, तब हिंदी अखबारों ने इस चलन को लेकर खूब नाक-भौं सिकोड़ा था। इन पृष्ठों पर दलाली और दूसरे दोयम तरीके से समाज में बेहतर आर्थिक हैसियत हासिल कर चुके राजनेताओं के एक लिजलिजे वर्ग ने कब्जा जमाना शुरू किया तो अंग्रेजी अखबारों ने इसे हाथोंहाथ लिया। इस पेज थ्री पत्रकारिता की सहायता से कई लोगों ने अपनी राजनीतिक हैसियत में और इजाफा कर लिया है। ऐसे में इसका असर पेज थ्री पत्रकारिता पर नहीं पड़ता, ऐसा कैसे हो सकता था। इन पृष्ठों पर प्रकाशित होने वाले छपास रोगी राजनेताओं,पत्रकारिता से इतर कर्म करने के बावजूद पत्रकारिता करने के बावजूद पत्रकार कहलाने वाले कथित पत्रकार, सोशलाइट और नवधनाढ्यों ने इन पृष्ठों का रसूख बढ़ाने में भरपूर कोशिश की। हर बार छपने पर उनका समाज सेवा और क्रांति करने का दावा रहा। लेकिन हकीकत में इन पृष्ठों पर प्रकाशित होने वाली हस्तियों की प्रतिबद्धता किसके प्रति है – ये हाल के दिनों में पूरी शिद्दत से जाहिर हुआ है। बीना रमानी के उदाहरण से इसे समझा जा सकता है। पेज थ्री पर छाई रहने वाली इस सोशलाइट के टर्मरिंड कोर्ट में तीस अप्रैल 1999 को उसके ही सामने उसकी ही कर्मचारी जेसिका लाल की हत्या हुई। हत्या भी पेज थ्री पर ही छाए रहने वाले मनु शर्मा नामक एक रसूखदार रईसजादे ने की। लेकिन कहां तक बीना अपने सार्वजनिक चेहरे के मुताबिक हत्यारे के खिलाफ उठ खड़ी होती – तो उल्टे वह हत्यारे को बचाने में ही जुट गई।
पेज थ्री पर साया होने वाली हस्तियों को मीडिया जमकर स्पेस देता रहा है। लेकिन इनमें से ज्यादातर के लिए सार्वजनिक भूमिका का कोई मतलब नहीं है। हालांकि अंग्रेजी अखबारों ने इन हस्तियों को साया करने और अहमियत देने की प्रवृत्ति के बावजूद पेज थ्री से असल पत्रकारिता की दूरी बचाए रखी। लेकिन यहीं पर हिंदी अखबारों की भूमिका गड्ड-मड्ड नजर आई। पेज थ्री को देर से ही सही हिंदी अखबारों ने भी आत्मसात कर लिया, लेकिन अंग्रेजी अखबारों की तरह वे पेज थ्री और थोड़ी-बहुत बची असल पत्रकारिता के बीच दूरी बनाकर नहीं रख सके। हिंदी अखबारों में पेज थ्री वाले राजनेता मुख्य पृष्ठ पर भी भरपूर जगह हासिल करते रहे। उन्हें रातोंरात महान नेता बनाने में भी आज की पत्रकारिता कोई कसर नहीं छोड़ती। लेकिन जब यही राजनेता किसी स्टिंग ऑपरेशन या घोटाले में फंस जाता है तो अखबारों की बेचारगी साफतौर पर नजर आने लगती है। यहां ऐसी घटनाओं और उनसे जुड़े राजनेताओं का नाम लेना उचित नहीं होगा। लेकिन एक बात गौर करने की है कि ऐसे में मुद्दा आधारित पत्रकारिता करने वाले लोगों को किनारे लगाने की प्रवृत्ति भी बढ़ती जा रही है और इसमें पेज थ्री वाले राजनेता भी सफल कोशिश करने से नहीं चूक रहे। दिलचस्प बात ये है कि अखबार प्रबंधन भी ऐसे लोगों की बीट बदलने और उनका ट्रांसफर करने से नहीं चूकता। अपने करीब चौदह साल के पत्रकारीय जीवन में इन पंक्तियों के लेखक ने भी कई बार ऐसे वाकये देखे-भुगते हैं। इसका सबसे बदतर असर पत्रकारिता के स्तर और जनपक्षधरता पर पड़ रहा है। इसका सबसे बेहतर उदाहरण है 2004 का लोकसभा चुनाव। तब के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और उनकी सरकार को पूरा देश चमकता हुआ ही नजर आ रहा था। एनडीए सरकार जैसे-जैसे देश को चमकता हुआ दिखा रही थी, अखबार-खासतौर पर हिंदी अखबार एनडीए से भी कहीं ज्यादा देश को चमकता हुआ दिखा रहे थे। किसी ने ये पड़ताल करने की कोशिश नहीं की कि खुशहाल रहे पंजाब और विदर्भ में किसान लगातार आत्महत्याएं कर रहे हैं-इसके बावजूद देश कैसे चमक रहा है ? उत्तर प्रदेश में सड़कों पर गड्ढे भरे पड़े हैं और अंधेरे में डूबा है, आंध्र में भी आत्महत्याओं और भुखमरी का दौर जारी है। इसके बावजूद देश कैसे चमक रहा है। यहां ये सवाल उठता है कि क्या अखबार अपने पहले दायित्व – तथ्यात्मक सूचना देने का सही मायने में निर्वाह कर रहे थे। इसका जवाब 2004 के लोकसभा चुनाव के नतीजों ने ही दिया। एनडीए को जीतते दिखा रहे अखबारों की भविष्यवाणी और आकलन गलत साबित हुआ, एनडीए की हार हुई। लेकिन निर्लज्ज अखबार उतनी ही तेजी से यूपीए के गुणगान में जुट गए। उन्हें एनडीए बुराइयों का पुलिंदा नजर आने लगा। इससे हिंदी अखबारों के बौद्धिक दिवालिएपन का आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है।
जहां तक सूचना देने की बात है तो आज कितने अखबार हैं , जो सही मायने में सूचनाएं दे रहे हैं। अपने निहित राजनीतिक स्वार्थों और तात्कालिक फायदे के लिए अखबार अपना चोला बदलने से नहीं चूक रहे। एनडीए की तर्ज पर एक और बड़े अखबार को हरियाणा की चौटाला सरकार में 2005 में कोई गलती नजर नहीं आ रही थी। लेकिन इसी साल हुए विधानसभा चुनावों में चौटाला की पार्टी पूरी तरह साफ हो गई। दरअसल अखबारों में वस्तुनिष्ठता के आधार पर सरकारों के कामकाज के विवेचन की समृद्ध परंपरा लगातार खत्म होती जा रही है। इसलिए छपे शब्दों की महिमा भी लगातार कम हुई है। इसका दर्शन-श्रवण पान-चाय की दुकानों, लोकल ट्रेनों और बस यात्रा में सामान्य लोगों की आपसी चर्चा में किया जा सकता है। अखबारों को ये भ्रम है कि वे जो कहते-छापते हैं, जनता आंखमूंदकर उस पर भरोसा कर लेती है। राजनेता भी कुछ ऐसा ही समझते हैं। इसीलिए वे अखबारों का अपने पक्ष में मनचाहा छपवाने की हरदम कोशिश करते रहते हैं। लेकिन आज की जनता बदल चुकी है। उसे पता है कि कौन अखबार कांग्रेस का समर्थक है और किसकी सहानुभूति वामपंथी विचारधारा से है। काश ! अखबारी दुनिया के आका इसे जानने-समझने की कोशिश करते।
लेकिन सच ये भी है कि मिशनरी पत्रकारिता करने वालों की एक टुकड़ी अब भी शब्दों की दुनिया का संस्कार करने और प्रतिष्ठा बचाने की कोशिशों में चुपचाप जुटी हुई है। लेकिन उनकी हालत बत्तीस दांतों के बीच जीभ की तरह है। चूंकि पत्रकारिता में तेवर का जमाना नहीं रहा – लिहाजा ऐसे लोग हाशिए पर हैं। नीति-निर्धारण करने वाली स्थितियों में इनकी संख्या कम ही है। इसका खामियाजा आज हाशिए पर पड़े लोग भुगत रहे हैं। जब पत्रकारिता में तेवर को मान्यता थी – तब मिशनरी लोगों ने ही पत्रकारिता के मानदंड स्थापित किए थे। आज अगर ये अखबारी संस्थानों में बचे –बने हुए हैं तो इसलिए नहीं कि आज की नियंता पीढ़ी ने उन पर कोई कृपा की है। बल्कि अखबार निकालने और बचाने की कला दुर्भाग्यवश मीडियाकर लोगों की बजाय इन मिशनरी लोगों को ही आती है।
भारत में पत्रकारिता की नींव तेवर और विरोध के स्वरों के साथ ही पड़ी थी। जेम्स हिक्की का ‘बंगाल गडट एंड जनरल एडवर्टाइजर ’ भले ही एक अंग्रेज का अखबार था। लेकिन हिक्की का उद्देश्य अंग्रेजी सरकार का गुणगान करना नहीं था – बल्कि सरकार और प्रशासन में मौजूद घूसखोरी और विलासिता को उजागर करना और उसके लिए विरोधी मानस तैयार करना था। इसकी हिक्की को कीमत भी चुकानी पड़ी। इस पत्रकारिता की रक्त-अस्थि-मांस-मज्जा आजादी के आंदोलन की कोख में बनी थी। सही मायने में इसी दौर में भारतीय पत्रकारिता ने आकार ग्रहण किया। कहना ना होगा- उस आंदोलन के आदर्श और उसकी आंच वर्षों तक भारतीय पत्रकारिता की प्रेरणास्रोत बनी रही। खासकर भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता ने आजादी के आंदोलन के मूल्यों में ही अपना अस्तित्व खोजा और पाया है। यह भी सच है कि बाजारवाद के दौर में पत्रकारिता ने बाजारवादी लटके-झटके भी अख्तियार कर लिए हैं। लेकिन वह अभी भी आजादी के आंदोलन की स्वर्णिम स्मृतियों से मुक्त नहीं हो पाई है और शायद ही कभी मुक्त हो। यही वजह है कि बाजारवाद के मूल्यों को आंशिक या पूरी भारतीय पत्रकारिता का अब भी आजादी के मूल्यों पर चलने का दिखावा भी उसकी मजबूरी है। समीर जैन के अलावा डंके की चोट पर अपने अखबार या पत्रिका को महज एक उत्पाद कहने वाले मालिक-प्रकाशक कम ही हैं। ऐसे दिखावे में मिशनरी लोग ही मददगार हो सकते हैं। लिहाजा उन्हें अखबार प्रबंधन आज भी ढो रहा है। (ये शब्द भी प्रबंधन के शब्दकोश से लिए गए हैं। )
आमजन की आवाज और उनके अभावों को सुर्खियां बनाने की मांग मिशनरी लोग तकरीबन रोज ही करते हैं। लेकिन महान दार्शनिक इमैनुअल कांट के कार्य-कारण सिद्धांत के तहत ऐसी खबरें सुर्खियां तभी हासिल कर पाती हैं – जब ऐसी खबरों से कोई राजनीतिक दल या समूह फायदा पाने की कोशिश करता है। जाहिर है – ऐसे हालात में आम आदमी की स्थिति प्रयोगशाला के ‘गिनीपिग’ से ज्यादा नहीं रह जाती। यानी आम व्यक्ति और उसके अभाव, उसकी दुश्चिंताएं सभी अवसरवादी राजनीति के उपादान बन जाते हैं। कहना न होगा इसके मंच बनते हैं अखबार। अखबारों की इन सुर्खियों के पीछे की हकीकत और राजनीति को जब तक आम पाठक समझ पाते हैं – तब तक देर हो चुकी होती है।
तो क्या हमें ये मान लेना चाहिए कि अखबारी दुनिया में भरोसे के लिए कुछ भी नहीं बचा है। गणित के सवाल की तरह इसका जवाब पूरी तरह ना तो ‘ना’ में हो सकता है और ना ही पूरी तरह से ‘हां’ में।

शनिवार, 26 जनवरी 2008

ये कैसा मीडिया !

उमेश चतुर्वेदी
गुजरात के हालिया विधानसभा चुनाव में एक बड़ी पार्टी के बड़े नेता को भी जिम्मेदारी दी गई थी। अपनी पार्टी के प्रचार में उन्होंने गुजरात के जिले-जिले का दौरा किया था। इस दौरान उन्हें जो अनुभव हुआ- वह चौंकाने वाला था। उन्होंने हैरतभरे लहजे में बताया कि हर जिले में उनकी प्रेस कांफ्रेंस को कवर करने के लिए भारी संख्या में पत्रकार आते थे। उन्हें गौर से सुना भी जाता था, सवाल-जवाब भी खूब होते। लेकिन प्रेस कांफ्रेंस खत्म होने के बाद उनसे घुमा - फिराकर सवाल पूछा जाता, उनके अखबार या फिर पत्रिका को वे कितनी रकम देंगे। दिल्ली में अपना अधिकांश वक्त बड़े पत्रकारों और समाचार पत्रों के मालिकों के साथ गुजारने वाले एक बड़ी पार्टी के प्रवक्ता के लिए पत्रकारों द्वारा पैसा मांगे जाने का ये अनुभव पहला था। मजे की बात ये है कि पूरे गुजरात में उनसे ऐसे सवाल किए गए- ऐसी अपेक्षाएं पाली गईं। ये बात और है कि उन्होंने किसी को पैसा नहीं दिया। दिल्ली लौटकर ये अनुभव साझा करते वक्त भी उनका आश्चर्य कम नहीं हुआ था। उन्हें लगा कि ऐसा पहली बार हुआ। ये बताते वक्त वे ये भी बताना नहीं भूले कि जब उन्होंने इसके लिए तहकीकात किया तो पता चला कि हर पत्रकार का अखबारों ने लक्ष्य तय कर दिया था। कई बार ये भी हुआ था कि अखबार ने अपनी जिला यूनिट को भी टारगेट दिया था।
उस पार्टी प्रवक्ता के लिए ये भले ही पहला अनुभव हो – लेकिन ये खेल बहुत पहले से चल रहा है। पत्रकारिता की दुनिया में आने वाले शावक पत्रकारों को पहले ही समझा दिया जाता था कि चुनाव अखबारों के लिए उत्सव के समान होते हैं। लेकिन ये बातें सिर्फ कंटेंट के स्तर पर होती थीं। तब अखबारों में होड़ रहती थी कि कौन कितनी ज्यादा कवरेज करता है। पत्रकारों की कोशिश रहती थी कि वे ये साबित कर सकें कि जनता की नब्ज उन्होंने सबसे गहराई से पकड़ा। लेकिन उदारीकरण की हवा में अब ये सब अब बीते दिनों की बातें होती जा रही हैं। ऐसा नहीं कि चुनाव में पहली बार पैसा खाने की बात सामने आ रही है। पहले भी ऐसा होता रहा है। लेकिन कम से कम सीधे-सीधे पैसे मांगने की हिम्मत विरले पत्रकार ही करते रहे हैं। वैसे दिल्ली की 1998 के विधानसभा चुनाव में एक बड़े नेता से एक पत्रकार ने सीधे-सीधे पैसे मांगने की जुर्रत की थी। जिसकी शिकायत उस बड़े नेता ने उस पत्रकार के दफ्तर को कर दी थी। पत्रकारिता जगत में ये चर्चा तब छाई रही थी। लेकिन तब भी ये चलन नहीं बन पाया था। लेकिन अब ये संस्थानिक दर्जा हासिल कर चुका है।
हिंदी में पहली बार मध्य भारत के एक अखबार ने 1999 के आम चुनाव से शुरू किया था। उसने अपनी सभी यूनिटों के लिए उसकी क्षमता के मुताबिक लक्ष्य तय कर दिया था। उम्मीदवारों के बारे में खबरें छापने के लिए उनकी यूनिटों ने पैसे तय कर दिए थे। तब उस अखबार के इलाके में इसकी आलोचना हुई थी। तब अखबार की दलील थी कि जब चुनाव लड़ने वाले नेता से पत्रकार पैसे खाने की कोशिश करते हैं तो अखबार ही सीधे-सीधे क्यों न पैसे लें। तब इस चलन पर नाक-भौं सिकोड़ने वाले अखबार भी देर-सवेर नैतिकता के इस उहापोह से निकल गए। 2004 के आम चुनावों और 2003 के विधानसभा चुनावों में इस प्रवृत्ति को कुछ – एक बड़े अखबारों को छोड़कर – संस्थानिक दर्जा मिलने लगा था। पिछले साल उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भी अखबारों ने ऐसा किया।
ऐसा नहीं कि पहले पैसे लेकर खबरें नहीं प्रकाशित की जाती थीं। लेकिन तब अखबार या पत्रिका पत्रकारिता के नैतिक दबावों के चलते कहीं कोने में ये जरूर छाप देते थे – ये एडवर्टोरियल है। लेकिन उदारीकरण की आंधी में एडवर्टोरियल लिखने- बताने का नैतिक दबाव भी नहीं रहा। इसके लिए अब तो बाकायदा विज्ञापन के तौर पर पैसे कमाने वाली यूनिटों को बाकायदा कमीशन भी देते हैं। ये जानकारी लेनी है तो इन अखबारों के दफ्तरों में काम करने वाले पत्रकारों से संपर्क किया जा सकता है।
मीडिया का काम सही खबरें लोगों तक पहुंचाना है। सही मायने में न्यूज बिजनेस की जो अवधारणा है – उसमें मौजूदा चलन की कोई जगह नहीं है। सवाल ये उठता है कि जब अपने लक्ष्य के मुताबिक पैसा जुटाने के लिए पत्रकार पर दबाव होगा तो वह कैसे निष्पक्ष खबरें दे पाएगा। इसका जवाब देर-सवेर प्रिंट मीडिया को ही ढूंढ़ना होगा। आजकल एक चलन ने जोर पकड़ लिया है – टेलीविजन पत्रकारिता को कटघरे में खड़ा करना। लेकिन प्रिंट माध्यम में ये जो बदलाव आता जा रहा है – उस पर विचार करने की जहमत नहीं उठाई जा रही। माना टेलीविजन चैनल पत्रकारिता नहीं कर रहे हैं – लेकिन प्रिंट माध्यमों की इस पत्रकारिता को सही कैसे ठहराया जाएगा। इस सवाल का जवाब फिलहाल उस राष्ट्रीय पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता भी ढूंढ़ रहे हैं। लेकिन अभी तक उन्हें कोई जवाब नहीं सूझ पाया है।

स्टिंग का खेल और टीवी पत्रकारिता

गीता
1991 में जब उदारीकरण की बयार इस देश में बहाए जाने की तैयारी थी- तब उसके विरोधियों का एक तर्क ये भी था कि उदारीकरण की बयार देश की संस्कृति और परंपरा पर भी असर डालेगी। कहना ना होगा कि पत्रकारिता पर भी इसका खासा असर देखने को मिल रहा है। झटपट चर्चित ओने और पैसा कमाने का मोह आज पत्रकारिता पर भी हावी हो गया है। चूंकि भारत में टेलीविजन पत्रकारिता चूंकि इसी दौर में पनपी है- इसलिए भौतिकवादी जीवनधारा (मैटरलिस्टिक लाइफ स्टाइल) पर इसका कुछ ज्यादा ही असर दिख रहा है। स्टिंग पत्रकारिता भी इसी की एक कड़ी है।
पिछले दिनों दो स्टिंग मीडिया में बेहद चर्चित रहे। पहला स्टिंग रहा - जनमत के परिवर्तित नाम वाले चैनल इंडिया लाइव का- जिसके असर से एक अच्छी-भली अध्यापिका की जिंदगी सूली पर चढ़ गई। उमा खुराना स्कूली छात्राओं से वेश्यावृत्ति नहीं कराती थी- पुलिस जांच से ये साबित भी हो गया है। लेकिन एक चैनल ने सनसनी बटोरने के लिए ये पड़ताल करना जरूरी नहीं समझा कि स्टिंग की हकीकत क्या है। यहीं पर अनुभव की बात आती है। इस चैनल के युवा कर्ताधर्ताओं को सनसनी चाहिए थी और उनकी इस चाहत का ही फायदा उठाया नए पत्रकार प्रकाश ने। मजे की बात ये है कि इसमें स्कूली छात्रा की भूमिका निभाने वाली भी लड़की पत्रकार रही है। सनसनी और पैसे कमाने की चाहत ने साध्य की पवित्रता का कोई खयाल नहीं रखा और उमा खुराना को सूली पर चढ़ाने में कोई कसर नहीं रखी गई। जब तक टेलीविजन नहीं थे- सिर्फ अखबारी दुनिया थी- तब पत्रकारों के बीच एक कहावत प्रचलित थी- नो न्यूज इज बेटर न्यूज यानी खबर का ना होना बेहतर खबर है। लेकिन आज के पत्रकार के पत्रकारीय मुंह को खबरों का खून लग गया है। ऐसे में नो न्यूज की चिंता ही उसे खाए डालती है। उदारीकरण की कोख से निकले टेलीविजन पत्रकारों को ये खून कुछ ज्यादा ही लग गया है। इसी का असर है कि किसी शिक्षिका को भी बदनाम करने के पहले सोचा नहीं जाता और दंगे हो जाते हैं। वैसे भी इंडिया लाइव के जो कर्ताधर्ता हैं- उनका वैसे भी कोई साफ पत्रकारीय रिकॉर्ड नहीं रहा है। ऐसे में ये कहना कि प्रकाश ने उसे झांसे में रखा- सहज भरोसेमंद नहीं है। सच तो ये है कि आज के दौर में पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखने वाले हर नौजवान की एक ही पसंद है- टेलीविजन के पर्दे पर छा जाना। एक-दो नौजवान ही मिलते हैं- जिनकी दिलचस्पी सोच-विचार वाले माध्यम अखबार और पत्रिका में काम करने में होती है। असलियत तो ये है कि उमा खुराना का स्टिंग करने वाला प्रकाश पहले आईबीएन सेवेन नाम के नवेले हिंदी चैनल में इंटर्नशिप कर रहा था और उसे इस स्टिंग के सहारे बुद्धू बक्से वाले पत्रकारिता पर छा जाने की उम्मीद थी। लेकिन जब उसका मकसद आईबीएन में साबित होता नहीं दिखा तो वह इंडिया लाइव में आ गया। उसका ऑपरेशन सफल भी रहा- रातोंरात इंडिया लाइव छा भी गया- उसके कर्ताधर्ताओं के फोटो और इंटरव्यू अखबारों में चस्पा होने लगे। लेकिन पुलिस की जांच ने उनके सारे गुब्बारे की हवा निकाल दी।
दूसरा स्टिंग भी इसी तरह का रहा। झारखंड के सांसद रामेश्वर उरांव को फर्जी पत्रकारों की एक टीम ने फंसाने की कोशिश की। लेकिन आज का हर राजनेता बंगारू लक्ष्मण नहीं रहा। अब राजनेता भी सतर्क हो गए हैं। उरांव भी सावधान थे तो उन्होंने पुलिस ही बुला ली और तीन फर्जी पत्रकार -दूसरे शब्दों में कहें तो स्टिंगबाज धरे गए। जब पुलिस ने उनसे पूछताछ की तो उन्होंने एक-दो चैनलों को छोड़कर तकरीबन सभी बड़े दबंग स्टिंग और खोजी संपादकों का नाम ले डाला। उनका कहना था कि उन्होंने सबसे तेज से लेकर सबसे आक्रामक चैनल के खोजी संपादकों के लिए स्टिंग किए हैं। जब उन्होंने पुलिस को ये बयान दिए तो संबंधित संपादकों के हाथों से तोते उड़ते नजर आए। फिर शुरू हुआ आननफानन में हर एक चैनलों को फोन करके ये खबर न चलाने की गुजारिश का खेल। इसमें उनकी बदनामी जो होनी थी। ऐसा हुआ भी। अपनी बिरादरी का पत्रकारों ने खयाल रखा भी। लेकिन इससे एक सवाल तो उठ खड़ा हुआ ही कि आखिर टेलीविजन के पर्दे पर क्या किया जा रहा है। वैसे भी जिस जनता के नाम पर खबरों का खेल दिखाया जाता है- वह जनता भी अब चैनलों के इस खेल का रस लेकर आनंद उठाने लगी है। इसका असर है कि आज टेलीविजन को खबरों के लिए नहीं- बकवासबाजी का आनंद उठाने के लिए देखा जा रहा है। इससे टेलीविजन पत्रकार शायद ही सहमत होंगे- लेकिन हकीकत ये है कि जनता से उनका भी कोई सीधा साबका नहीं रहा। लिहाजा उन्हें पता ही नहीं है कि जिस जनता के नाम पर वे स्टिंग कर रहे हैं, उसका खयाल भी कुछ और ही है। इसे जानने के लिए पान वाले से लेकर अखबारों और चायवालों की दुकानों की खाक छाननी पड़ेगी। लाख टके का सवाल ये है कि चैनलों के कर्ताधर्ता इसे समझने की कोशिश करेंगे या नहीं। लेकिन ये भी सच है कि अगर इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो टेलीविजन की साख को बचा पाना आसान नहीं होगा- साख के संकट से जूझ रही टेलीविजन पत्रकारिता के लिए ये बहुत ही महंगा सौदा होगा।