गुरुवार, 15 जनवरी 2009

क्यों चुप है चीन

उमेश चतु्र्वेदी
जून 2003 में चीन की धरती पर तब के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जब कदम पड़े थे – तब ना सिर्फ भारतीय, बल्कि चीन के मीडिया ने भी दोनों देशों के बीच रिश्तों की नई इबारत लिखे जाने की भरपूर उम्मीद जताई थी। इस उम्मीद की वजह भी थी। 1962 में भारत की शर्मनाक पराजय के बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की ये पहली चीन यात्रा थी, जिससे किसी सार्थक नतीजे की उम्मीद जताई जा रही थी। ये उम्मीद परवान चढ़ती नजर भी आई...जब 44 साल से बंद सिक्किम की सीमा पर स्थित नाथूला दर्रे को 6 जुलाई 2006 को खोल दिया गया। तब से लेकर गंगा और यांग टिसी क्यांग में न जाने कितना पानी बह चुका है। आर्थिक बदलाव के दौर में इन दोनों पड़ोसी देशों के बीच अर्थव्यवस्था से लेकर सियासी हालात ...हर मोर्चे पर बेहतर संबंधों की उम्मीद जताई जाती रही है। लेकिन क्या ये उम्मीद सचमुच सफल हो पाई है...इस पर नजर डालने के लिए हाल में हुए मुंबई हमले को लेकर चीन की सरकार और वहां के मीडिया के रूख पर निगाह डालना ज्यादा समीचीन होगा।
26 नवंबर को मुंबई हमले के बाद पूरी दुनिया की सवालिया निगाहें पाकिस्तान और पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद पर टिकी हुई हैं। अमेरिका की एफबीआई तक मुंबई में पकड़े गए पाकिस्तानी आतंकवादी कसाब से पूछताछ कर चुकी है। इसे लेकर अमेरिकी मीडिया में खबरों की भरमार है। पाकिस्तान को चेतावनियों वाले लेख लगातार साया हो रहे हैं। कुछ यही हाल ब्रिटेन का भी है। ब्रिटिश विदेश मंत्री डेविड मिलिबैंड इन दिनों भारत यात्रा पर हैं। उन्होंने भी पाकिस्तान को आतंकवाद का निर्यात रोकने और उस पर काबू पाने के लिए चेतावनी दी है। जाहिर है..ये खबर भी इन दिनों यूरोपीय और अमेरिकी अखबारों की सुर्खियां बनी है। सात समंदर पार या सात हजार मील दूर की सरकार और वहां की मीडिया के लिए पाकिस्तान इन दिनों बड़ा सवाल है। लेकिन अपने ठीक पड़ोस में ...हिमालय के पार स्थित चीन के लिए जैसे ये घटना कोई खबर ही नहीं है। यह उस चीन का नजरिया है, जिसके साथ हमारे अर्थशास्त्री बदलते आर्थिक दौर में मिलकर नई इबारत लिखने की उम्मीद पाले हुए हैं।
जो चीन को जानते हैं और उसे देखते – परखते रहे हैं, उन्हें पता है कि चीन का मीडिया क्यों चुप है। चीन में वैसा मीडिया नहीं है, जैसा भारत, पाकिस्तान या फिर यूरोप-अमेरिका में है। इन जगहों के मुताबिक यहां का मीडिया ना तो स्वतंत्र है, ना ही निष्पक्ष। चीन का मीडिया उन्हीं खबरों को तवज्जो देता है या यहां वही खबरें सुर्खियां बनतीं हैं ...जिसके लिए चीन सरकार से हरी झंडी मिलती है। साफ है - यहां के मीडिया पर सरकारी नियंत्रण है। शायद यही वजह है कि चीन के मीडिया को वहां की सरकार का मुखपत्र ही कहा जाता है।
जब चीन की सरकार ही इस मसले को लेकर पूरी तरह चुप्पी साधे हुए है तो वहां का सबसे बड़ा अखबार पीपुल्स डेली या सरकारी समाचार एजेंसी झिंन्हुआ कैसे पाकिस्तान पर उंगली उठा सकती है। 26 नवंबर के आतंकी हमले के बाद चीन के सरकारी रेडियो चाइना इंटरनेशनल ने भी कायदे की डिस्पैच दिल्ली से नहीं भेजी या भेजी भी तो उसे प्रसारित नहीं किया गया। सिर्फ तीस नवंबर को इसने एक खबर जारी की। वह खबर थी कि भारतीय गृहमंत्री ने भारतीय प्रधानमंत्री को मुंबई हमले के सिलसिले में अपना इस्तीफा सौंपा। जाहिर है ये खबर तब के गृहमंत्री शिवराज पाटिल के इस्तीफे को लेकर थी। ऐसा नहीं कि चीन की सरकार इस मसले पर चुप ही है। उसने चार दिसंबर को एक अपील जरूर जारी की। इसमें चीन की सरकार ने भारत और पाकिस्तान सरकार से मुंबई हमले को लेकर बातचीत करने की अपील की थी। इस खबर को पीपुल्स डेली ने चार दिसंबर को प्रमुखता से साया किया। इसके बाद से मुंबई हमले को लेकर चीन का मीडिया हैरतनाक तरीके से चुप है। हां 14 दिसंबर को उसकी चुप्पी एक बार टूटी जरूर ...लेकिन उसमें ये जानकारी दी गई कि मुंबई हमले को लेकर चीन सरकार और प्रशासन भी चिंतित है और यही वजह है कि बीजिंग में सुरक्षा इंतजामों को लेकर रिहर्सल की गई।
चीन के मीडिया की चुप्पी भी समझ में आती है। हिमालय के दोनों तरफ दोस्ती के लाख दावे किए जाएं- लेकिन ये उतना ही बड़ा सच है कि आज भी दोनों देशों के रिश्तों में वह गरमाहट नहीं आई है, जितनी चीन और पाकिस्तान के बीच है। शायद यही वजह है कि जहां दुनिया भर का मीडिया मुंबई हमलों के लिए पाकिस्तान समर्थित लश्कर-ए-तैय्यबा को जिम्मेदार ठहरा रहा है। वहीं चीन के सरकारी अखबार पीपुल्स डेली ने 28 नवंबर को ये रिपोर्ट प्रकाशित करने में देर नहीं लगाई कि इन हमलों के लिए डेक्कन मुजाहिद्दीन नामक भारतीय संगठन जिम्मेदार है। पीपुल्स डेली ने पाकिस्तानी उर्दू अखबारों की उन रिपोर्टों को प्रमुखता से प्रकाशित करने में भी देर नहीं लगाई – जिनमें इस हमले के लिए हिंदू आतंकवादी संगठनों को जिम्मेदार ठहराया गया।
पीपुल्स डेली में तो एक अनाम विश्लेषक के हवाले एक रिपोर्ट भी प्रकाशित की गई। जिसमें मुंबई हमले के पीछे पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठनों का हाथ होने से पाकिस्तानी अधिकारियों और नेताओं ने इनकार किया था। चीनी मीडिया की ये चुप्पी और भी दिलचस्प बन जाती है – जब आपको पता चलता है कि चीन की सरकारी संवाद एजेंसी झिन्हुआ ने मुंबई हमलों को 2008 के टॉप टेन वर्ल्ड न्यूज में शुमार किया था। चीन के मीडिया ने किस तरह भारतीय पक्ष को कमजोर दिखाने की कोशिश की – इसका उदाहरण है एक रिपोर्ट। तीस दिसंबर को प्रकाशित इस रिपोर्ट में कहा गया है कि मुंबई हमले की संयुक्त जांच के संबंध में भारतीय विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी के बयान से पाकिस्तान के सबूतों को ही बल मिलता है। ये रिपोर्ट कितनी शातिराना है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि भारतीय विदेश मंत्रालय ने मुंबई हमले की संयुक्त जांच के पाकिस्तान के प्रस्ताव को सिरे से नकार दिया था। लेकिन इस रिपोर्ट में भारत के इस इनकार का कोई जिक्र नहीं है।
तीस दिसंबर को ही झिन्हुआ ने एक रिपोर्ट जारी की। पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसफ अली जरदारी और चीन के उप राष्ट्रपति ही याफेई के बीच बैठक के बाद एक तरह से चीन सरकार के वक्तव्य के तौर पर जारी किया गया था। इसके मुताबिक – दक्षिण पूर्वी एशिया के इलाके में शांति और स्थिरता को लेकर चीन, भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव कम करने के लिए रचनात्मक भूमिका निभाता रहेगा।
चीन के मीडिया की इस भूमिका के विश्लेषण के बाद भी क्या दोनों देशों के बीच पारदर्शिता पर आधारित दोस्ती की कोई गुंजाइश बाकी रह जाती है। इस पर उन लोगों को खासतौर पर विचार करना चाहिए, जिन्हें लगता है कि दोनों देशों के रिश्तों के बीच पड़ी हिमालय की ठंडी बरफ को पिघलाना कठिन नहीं है।

गुरुवार, 8 जनवरी 2009

मीडिया के पन्ने या युद्ध का मैदान

उमेश चतुर्वेदी
पिछले साल 26 नवंबर को मुंबई में आतंकी हमले के बाद अरब सागर में न जाने कितने ज्वार-भाटा आ चुके हैं। लेकिन एक सवाल का जवाब दोनों तरफ बड़ी बेसब्री से तलाशा जा रहा है कि युद्ध होगा या नहीं ....दोनों तरफ एक वर्ग ऐसा है, जिसे लड़ाई के ही सहारे सारी समस्याओं का हल सूझ रहा है तो दूसरा तबका ऐसा भी है – जिसे लोहिया जी के भारत-पाक महासंघ को पुनर्जीवित करने में आज भी दिलचस्पी है।
पिछली सदी के साठ के दशक में डॉक्टर लोहिया ने भारत-पाक महासंघ की कल्पना की थी। उन्होंने ये विचार देते वक्त कहा था कि हिंदुस्तान के भले ही तीन टुकड़े हो गए हैं – लेकिन ये बदलाव बनावटी है। क्योंकि संस्कृति और भौगोलिक आधार पर दोनों या बल्कि अब कहें तो तीनों यानी भारत, पाकिस्तान और बांगलादेश में कोई अंतर नहीं है। भाषाई सवालों को छोड़ दें तो तीनों की नाल एक ही है ...तीनों का उद्गम एक है। ये तो समय और राजनीति की मार है कि इतिहास के एक बड़े पत्थर ने तीनों को अलग-अलग धाराओं में बांट दिया। डॉक्टर लोहिया ने कहा था कि अगर सोवियत संघ एक हो सकता है – जर्मनी के दोनों हिस्से एक होने की कवायद में जुट सकते हैं तो एक बनावटी विभाजन के चलते पैदा हुए भारत और पाकिस्तान एक होने की कोशिश में क्यों नहीं जुट सकते। लोहिया ने कहा था कि विदेश नीति, रक्षा और मुद्रा जैसे मामले एक रखकर दोनों या कहें तीनों देश आपसी कई समस्याओं से निजात पा सकते हैं।
लोहिया की इस कल्पना का तफसील से विश्लेषण बाद में ...अब जरा 26 नवंबर के बाद की घटनाओं पर भारत और पाकिस्तानी मीडिया के रूख पर ध्यान दें। दोनों तरफ की मीडिया की चिंताओं से रूबरू होने से पहले दोनों तरफ की मीडिया की एक सामान्य प्रवृत्ति पर ध्यान देने की जरूरत है। पाकिस्तान से युद्ध हो या क्रिकेट ....मीडिया भी इसमें वैसे ही भाग लेता है ...जैसे वह खुद सिपाही या क्रिकेटर हो। अगर दूसरे शब्दों में कहें तो मीडिया का स्पेस भी क्रिकेट या युद्ध के मैदान में तबदील हो जाता है। दोनों तरफ युद्धोन्माद पैदा करने में दोनों तरफ का मीडिया भी कूद पड़ता है। भारत के खबरिया टेलीविजन चैनलों का तो पाकिस्तान से मैच खबर बेचने का जबर्दस्त यूएसपी है। कहना ना होगा इस बार भी ये युद्ध का ये हाइप भी कुछ ज्यादा ही दिख रहा है। भारत और पाकिस्तान के बयान बहादुर राजनेता पूरी शिद्दत से एक – दूसरे को झूठा और खुद को ईमानदार दिखाने – जताने की कोशिश में जुटे हुए हैं। ऐसे में बार – बार दोनों तरफ ये सवाल उठ रहा है कि क्या लड़ाई होगी। भारत का अंग्रेजी – हिंदी समेत तकरीबन सभी भारतीय भाषाओं का मीडिया युद्ध नहीं चाहता। मुंबई पर आतंकी हमले के खिलाफ बने माहौल के चलते अंग्रेजी मीडिया इन दिनों अपनी सेक्युलर छवि से कहीं ज्यादा अपराधियों को दंड दिलाने की मंशा के साथ रिपोर्टिंग कर रहा है। हालांकि अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में ये मीडिया संसद पर आतंकी हमले के लिए वाजपेयी और उनके जिम्मेदार गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी को ही जिम्मेदार ठहराने में जोरशोर से जुटा था। लेकिन इस बार हालात बदले हुए हैं। कुछ यही हालत पाकिस्तान के भी अंग्रेजी मीडिया का भी है। सबसे अच्छी बात ये है कि वहां के मशहूर दैनिक द डॉन और द न्यूज ने एफबीआई के हवाले से ये खबरें देने में हिचक नहीं दिखाई कि मुंबई में पकड़ा गया आतंकी कसाब पाकिस्तानी नागरिक ही है। द न्यूज और द डॉन के संवाददाता पाकिस्तान के फरीदकोट जिले के उस गांव तक पहुंच गए- जहां का कसाब निवासी है। लेकिन वहां के उर्दू अखबारों का रवैया ऐसा नहीं है। खुद द डॉन के ही ग्रुप के उर्दू अखबार जंग का रवैया वैसा नहीं रहा। उसने भारत को ही दोषी साबित करने में देर नहीं लगाई और कसाब को भारत का नागरिक बताने से भी नहीं हिचका।
पाकिस्तान के दूसरे प्रतिष्ठित अखबार द नेशन और फ्राइडे टाइम्स का रवैया कभी संतुलित नजर आया तो कभी वह पाकिस्तान को लेकर मोहग्रस्त भी रहा। लेकिन उर्दू अखबार पहले की ही तरह अखबारी पन्नों पर भारत के खिलाफ जंग लड़ते रहे। सबसे ज्यादा हमला नवा ए वक्त ने बोला। पाकिस्तान के एक अखबार से जुड़े हमारे एक जानकार ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया कि पाकिस्तान में उर्दू अखबारों ने जिम्मेदराना रूख अख्तियार नहीं किया।
अभी ज्यादा दिन नहीं हुए ..जब भारतीय उर्दू अखबारों में भी पाकिस्तान को दोषी ठहराने से हिचक दिखती थी। हालांकि इस बार ऐसा नहीं हुआ है। अंग्रेजी के मशहूर पत्रकार खुशवंत सिंह ने अपने पिछले कॉलम में ही लिखा है कि मुंबई हमले में जो करीब 185 लोग मारे गए –उनमें चालीस से ज्यादा मुसलमान थे। खुशवंत का कहना है कि यही वजह है कि मुंबई में मारे गए आतंकियों से भारतीय मुसलमानों को कोई हमदर्दी नहीं है। शायद यही वजह है कि इस बार पाकिस्तानी आतंकवादियों को लेकर उर्दू प्रेस भी तल्ख है।
उर्दू और अंग्रेजी मीडिया की रपटों और संपादकीयों में इस अंतर से साफ है कि दोनों दरअसल दो तरह की मानसिकता का प्रतिनिधित्व करते हैं और दोनों का लक्ष्य समूह अलग है। भारत में भी कुछ एक अपवादों को छोड़ दें तो उर्दू प्रेस के साथ पूर्वाग्रह के आरोप लगते रहे हैं और पाकिस्तान का अधिसंख्य उर्दू प्रेस कट्टरपंथी मानसिकता का ही प्रतिनिधित्व करता है। यही वजह है कि अंग्रेजी मीडिया जहां हकीकत आधारित रिपोर्टिंग कर रहा है—उसे लड़ाई और आतंकवाद में भलाई नहीं दिख रही है। वहीं उर्दू प्रेस अभी-भी अपने पुराने रवैये पर कायम है।
पता नहीं ..लोहिया जी के विचारों से अंग्रेजी प्रेस कितना मुतमईन रहा है। लेकिन अगर आज वे जिंदा रहते तो मुख्यधारा की पत्रकारिता- जिसमें पाकिस्तान का अंग्रेजी प्रेस के साथ ही भारत की प्रमुख भाषाओं का प्रेस शामिल है – में आए इस बदलाव को अपने विचारों की जीत के एक सोपान के तौर पर देखते।

मंगलवार, 30 दिसंबर 2008

नई सुबह की उम्मीद

यह लेख अमर उजाला में प्रकाशित हो चुका है।
उमेश चतुर्वेदी
हर बीते हुए लमहे की अपनी कुछ उपलब्धियां होती हैं तो कुछ असफलताएं भी होती हैं। जाहिर है दो हजार आठ ने भी कुछ कामयाबियां हासिल कीं तो कुछ नाकामयाबियों से भी उसे रूबरू होना पड़ा है। बीता हुआ जब इतिहास में तब्दील होता है तो उसकी महत्वपूर्ण कामयाबियां और नाकामियां ही आने वाले वक्त को याद रह पाती हैं। इतिहास में दर्ज होते वक्त हर लमहे की कोशिश होती है कि उसकी कामयाबियों की ही चर्चा हो। भारत में अभी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भले ही परिपक्वता की उम्र सीमा में नहीं पहुंच पाया है – लेकिन उसकी भी यही कोशिश रही है कि उसकी कामयाबियां ही इतिहास में दर्ज हों। लेकिन साल के आखिरी महीने के ठीक पहले मुंबई में जो कुछ हुआ और उसे लेकर मीडिया का जो रवैया रहा ...वह कम से कम इतिहास में दर्ज होने की सदइच्छाओँ पर भारी पड़ गया। मुंबई में आतंकी हमले के दौरान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ---खासकर खबरिया चैनलों की भूमिका इतनी खराब रही कि ना सिर्फ मीडिया के अंदर – बल्कि समाज के दूसरे तबकों से इसके खिलाफ सवाल जमकर उठे। आतंकवादी हमले के खिलाफ सुरक्षा बलों की कार्रवाई की पल-पल की रिपोर्टिंग भले ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की मजबूरी रही हो – लेकिन उसे जिम्मेदारी पूर्ण तरीके से नहीं निभाया गया। पहले से ही सांप-बिच्छू नचाकर टीआरपी बटोरने के खेल के लिए आलोचना का पात्र रहे मीडिया ने कथित आतंकवादी का फोनो चलाकर जैसे खुद ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली।
दो हजार आठ का मीडिया परिदृश्य मुंबई में आतंकी घटनाओं की रिपोर्टिंग के दौरान अपनी गैर जिम्मेदारी के लिए जमकर याद किया जाएगा। मानव का स्वभाव है ...वह बाद की घटनाओं को पहले की घटनाओं की बनिस्बत कहीं ज्यादा गहराई से याद करता है। मुंबई के ताज होटल और ट्राइडेंट में आतंकी हमले के ठीक पहले दिल्ली में 13 सितंबर को सीरियल धमाके हुए थे। उस वक्त मीडिया के एक बड़े तबके ने जिम्मेदार रिपोर्टिंग का परिचय दिया था। हालांकि एक – दो प्रमुख चैनलों के कुछ रिपोर्टरों ने एक लड़के को थैला लेकर भागते देखकर टाइम बम की अफवाह फैलाने में भी देर नहीं लगाई थी। हालांकि अफरातफरी के आलम में ऐसी एक – दो घटनाएं हो जाती हैं। लेकिन उस दिन रिपोर्टरों ने घायलों को अस्पताल पहुंचाने में जितना जिम्मेदराना रूख दिखाया था – उसकी आम लोगों ने तारीफ ही की थी। घायलों को परिजनों को जरूरी सहायता को रिपोर्टरों ने रिपोर्टिंग से ज्यादा तवज्जो देकर अपनी जिम्मेदारी का बखूबी परिचय दिया था। ये टेलीविजन रिपोर्टर ही थे – जिन्होंने नीरो की तरह चैन से बांसुरी बजा रहे शिवराज पाटिल के ड्रेस सेंस पर स्टोरियां की। अखबारी रिपोर्टरों से कहीं ज्यादा टीवी रिपोर्टरों के निशाने पर ही पाटिल के सफेद झक्कास – कलफदार सूट रहे। यही वजह है कि मुंबई धमाकों के बाद शिवराज पाटिल को विदा होना पड़ा।
टीवी की जिम्मेदार रिपोर्टिंग के नाम 13 मई के जयपुर और 26 जुलाई के अहमदाबाद धमाके भी रहे। हालांकि आरडीएक्स और साइकिलों के जरिए धमाके को दिखाने के लिए जिस तरह कुछ खबरिया चैनलों के न्यूज रूम में जिस तरह साइकिलें लाई गईं और उनकी घंटियां बजाईं गईं ...उसे लोगों ने पसंद नहीं किया। लेकिन जयपुर की गंगजमुनी संस्कृति को आगे लाने और एक – दूसरे संप्रदायों के लोगों की ओर से शुरू किए गए राहत उपायों को लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया दमदार खबरें दिखाने में आगे रहे। इसका असर भी दिखा। आतंकवादी अपने नापाक मंसूबों में कामयाब नहीं रहे। बम धमाकों के जरिए आतंकी दरअसल देश के प्रमुख संप्रदायों के बीच दरार कायम करने की कोशिश में रहते हैं ताकि लोग आपस में लड़ें और उनकी कोशिशें कामयाब हों।
मुंबई धमाकों की तरह एक और घटना की रिपोर्टिंग में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपनी जिम्मेदारी का परिचय नहीं दे सका। वह घटना रही 15 मई को नोएडा के एक पॉश इलाके में एक डॉक्टर राजेश तलवार की लड़की आरूषि और उनके नौकर हेमराज की हत्या कर दी गई। इस हत्याकांड को लेकर मीडिया ने बिना जांचे-समझे जमकर रिपोर्टिंग की। कई चैनलों ने आरूषि के घर अपनी रिपोर्टिंग टीम को स्थायी तौर पर तैनात कर दी। नोएडा पुलिस ने बिना जांचे-परखे जैसी सूचनाएं उन्हें मुहैय्या कराई – उन्होंने अपने टीवी पर्दे पर साया करने में देर नहीं लगाई। मासूम आरूषि के नौकर हेमराज से शारीरिक संबंध, राजेश तलवार के उसकी सहयोगी एक और डॉक्टर से संबंध जैसी खबरों को पुलिस ने मीडिया को दी और बिना जांचे-परखे छापने में देर नहीं लगाई।
इसका फायदा भी टीवी चैनलों को मिला। जिन दिनों आरूषि की हत्या हुई – उस समय आईपीएल के मैच चल रहे थे। टैम के मुताबिक आईपीएल के मैचों को महज 7.5 प्वाईंट टीआरपी हासिल हुई तो समाचार चैनलों को 9 प्वाईंट टीआरपी मिली। टैम के मुताबिक इस हत्याकाण्ड के कारण सबसे ज्यादा 2 प्वाईंट की टीआरपी बढ़ोत्तरी हिन्दी चैनलों को मिली। टैम के समानांतर चलने वाली रेटिंग एजेंसी एमैप का भी कहना है कि आईपीएल मैचों के बीच भी आरूषि हत्याकाण्ड के कारण टीवी चैनल टीआरपी लपकने में कामयाब रहे। 23 मई को जिस दिन आरुषि के बार राजेश तलवार को हत्या के अंदेशा में गिरफ्तार किया गया उस दिन मोहाली और हैदराबाद के बीच मैच था। लेकिन इस मैच को टीवी पर जितने दर्शक उससे ज्यादा दर्शकों को आरूषि हत्याकाण्ड की बदौलत अपने साथ जोड़कर रखा। उस दौरान आईपीएल को 0.96 टीआरपी मिली तो पांच प्रमुख हिन्दी अंग्रेजी चैनलों को 1.0 प्वाइंट टीआरपी हासिल हुई।
ये सच है कि टीआरपी के लिए काम करना चैनलों की मजबूरी है। लेकिन मुंबई हमले के बाद जिस तरह मीडिया कटघरे में खड़ा हुआ और मीडिया को अपनी आचार संहिता बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा। उसके लिए भी बीते साल को याद किया जाएगा। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि आने वाले साल में देसी खबरिया चैनल पिछली गलतियां नहीं दुहराएंगे।

बुधवार, 24 दिसंबर 2008

मंदी का बहाना है ....


उमेश चतुर्वेदी
कहते हैं दीपक तले अंधेरा होता है। इस कहावत का सबसे बेहतरीन नमूना इन दिनों मीडिया की अपनी खुद की दुनिया है। पीलीवर्दीधारियों (जेट एयरवेज की एयरहोस्टस की वर्दी) की खबर को मनमोहनी अर्थव्यवस्था के मुंह पर बड़ा तमाचा बताने वाले मीडिया वाला खुद पीली वर्दीधारियों की हालत में पहुंच गया है। शायद ही कोई मीडिया हाउस है – जहां मंदी के नाम पर छंटनी की तलवार नहीं चल रही है। लेकिन मीडिया के अंदरूनी दुनिया की कोई खबर नहीं बन रही है।

कहा जा रहा है कि 1929 की भयानक मंदी के बाद ये अब तक की सबसे बड़ी मंदी है। मंदी के उस दौर में खाने तक के लाले पड़ गए थे। लेकिन अभी तक हालात खास नहीं बदले हैं। हां विलासिता की चीजों के बाजार – मसलन ऑटोमोबाइल और रिटेल सेक्टर में कुछ गिरावट जरूर दिख रही है। लेकिन उपभोक्ता बाजार अभी तक कायम है। इसका ही असर है कि टेलीविजन के पर्दे से विज्ञापन गायब नहीं हुए हैं। कुछ यही हालत अखबारों की भी है। वहां भी विज्ञापनों भरे पृष्ठों में कमी नहीं आई है। ये सच है कि मंदी के चलते अखबारी कागजों की कीमतें जरूर बढ़ी हैं। इसकी कीमत में बीस से चालीस फीसद तक की बढ़त देखी जा रही है। ये सच है कि इन बढ़ी कीमतों का अखबारों की अर्थव्यवस्था पर असर जरूर पड़ा है। लेकिन इतना कि लोगों की रोजी-रोटी पर बन आए...उन लोगों की रोजी-रोटी पर ...जिन्होंने खुद इन अखबारों को सजाने – बचाने में खून-पसीना एक किया है ...तकलीफदेह जरूर है। लेकिन छंटनी का बाजार तेज है।

आइए देखते हैं कि अखबारी दुनिया की इस छंटनी की हकीकत क्या है ? बिजनेस स्टैंडर्ड के गुजराती संस्करण, दैनिक जागरण और टीवी 18 के प्रस्तावित गुजराती बिजनेस अखबार और गुजराती बिजनेस भास्कर को छोड़ दें तो हर अखबार में संपादकीय विभाग से गिने-चुने लोगों की ही छंटनी की गई है या की जा रही है। सबसे ज्यादा इस छंटाई प्रक्रिया के शिकार पेजीनेटर बन रहे हैं या बनाए जा रहे हैं। पेजीनेटर यानी कंप्यूटर पर पेज बनाने वाले लोग। तकनीकी तौर पर ये लोग न्यूजरूम में संपादकीय विभाग के कर्मचारी होते हैं। डेस्क टॉप पब्लिशिंग के दौर की शुरूआत के साथ ही पेजीनेटरों के जिम्मे ही अखबारों के पेज बनाने का जिम्मा रहा है। लेकिन अब मंदी के नाम पर ये जिम्मेदारी उपसंपादकों पर डाली जा रही है। उनसे कहा जा रहा है कि अब वे ही पेज बनाएं। अब तक अपने पेज के लिए सामग्री का चयन की उनकी जिम्मेदारी रही है। उसका शीर्षक लगाना और पेज को सजाना उपसंपादकों का प्राथमिक काम रहा है। लेकिन मंदी ने उन पर अब पेज बनाने का बोझ भी डालना शुरू कर दिया है। एक अखबार में तकरीबन सभी पेजीनेटरों को मंदी के नाम पर हटा दिया गया। इससे संपादकीय विभाग में भी हड़कंप मच गया और अखबार निकालने में मुश्किलें आने लगीं। इसका आभास जब मैनेजमेंट को हुआ तो उसने बाकायदा संपादकीय विभाग की बैठक ली और उन्हें ये भरोसा दिलाया कि उनकी नौकरियां सलामत हैं। लेकिन उनसे ये आग्रह जरूर किया गया कि वे पेज बनाने की जिम्मेदारी भी ले लें।
ये पहला मौका नहीं है – जब आर्थिक बदहाली या मंदी के नाम पर अखबारी संस्थानों में छंटनी की गई है। नब्बे के दशक में मनमोहनी अर्थव्यवस्था की ओर भले ही देश बढ़ रहा था – लेकिन तब मीडिया का वैसा विस्तार नहीं हो रहा था। तकनीक बदल रही थी। डीटीपी का जोर बढ़ रहा था। उस दौर में तकनीक में बदलाव के नाम पर अखबारों की दुनिया से तीन पद धीरे-धीरे खत्म किए गए। तब अखबारों में कंपोजिटर का पद भी होता था। हाथ से लिखने के दौर में कंपोजिटर और टाइपिस्ट की दुनिया हुआ करती थी। उनके बिना अखबारी न्यूज रूम की कल्पना नहीं की जा सकती थी। लेकिन आर्थिक बदहाली के दौर में कंपोजिटर और प्रूफरीडर का पद पूरी तरह समाप्त कर दिया गया। और ये जिम्मेदारी भी आज की तरह उपसंपादकों पर डाल दी गई। ये सच है कि आज ज्यादातर रिपोर्टर अपनी कॉपी कंप्यूटर पर टाइप करके ही भेजते हैं – लेकिन ये भी सच है कि भारत जैसे विविधताओं वाले देश में अब भी हाथ से लिखने वाले लोगों की संख्या कम नहीं है। हाथ से लिखी खबरें-टिप्पणियां और लेख...सबकुछ आता है और इन सबको प्रकाशित करने की जिम्मेदारी निभाने वाले उप संपादकों इन्हें टाइप और कंपोज भी करना पड़ता है। इसके साथ ही उन्हें प्रूफ भी पढ़ना पड़ता है।

मैनेजमेंट की दुनिया में इन दिनों एक शब्द जमकर चल रहा है – मल्टीस्किल्ड। यानी एक शख्स को तमाम तरह के काम आने चाहिए। इटली के मशहूर चित्रकार और कवि लियोनार्दो द विंची के बारे में कहा जाता था कि एक ही बार में वे यदि दाहिने हाथ से चित्र बना रहे होते तो वे दूसरे हाथ से कविता भी उतनी ही प्रौढ़ता और गहराई से लिख लेते थे। आज के उपसंपादकों से विंची जैसा ही बनने की उम्मीद की जा रही है। और इसका बहाना बनी है मंदी ...लेकिन मैनेजमेंट ये भूल जाता है कि विंची या विंची जैसा कोई एक या दो ही शख्स होता है। इसका असर कम से कम आम पाठकों को रोजाना अखबारों के पृष्ठों पर दिखता है। जब प्रूफ की गलतियां किसी अच्छी खबर या अच्छे लेख का मजा किरकिरा कर देती हैं।
सवाल ये है कि ये कब तक जारी रहेगा...क्या इसका कोई अंत है ....पीली वर्दीधारियों की चिंताओं को राष्ट्र की चिंता बनाने वालों की ये जायज परेशानियां किसी की चिंता और परेशानी की सबब बनेगी.. जब तक इन सवालों का जवाब ढूंढ़ने के लिए किसी और की ओर पत्रकार समाज देखता रहेगा ...उप संपादक की पीड़ाएं और बोझ बढ़ता रहेगा। मंदी के बहाने चक्की की चाल तेज होती रहेगी।

मंगलवार, 28 अक्टूबर 2008

क्यों महान हैं गांधी ...


गांधी जी की महानता को लेकर आए दिन सवाल-जवाब और तर्क-वितर्क होते रहे हैं। ऐसे ही सवालों से लबरेज एक जर्मन जिज्ञासु युवती का सहारा समय उत्तर प्रदेश के सीनियर प्रोड्यूसर राजकुमार पांडेय का सामना हुआ तो उन्हें इसका जवाब खोजने के लिए काफी कवायद करनी पड़ी। उसी कवायद को उन्होंने शब्दों में पिरोकर मीडिया मीमांसा को भेजा है। पेश है राजकुमार पांडेय जी के विचार-
महात्मा गांधी को महान किस चीज ने बनाया। ये सवाल भले ही अटपटा लगे लेकिन इसका जबाव इतना आसान नहीं है। वो भी उस हालत में जब कोई विदेशी बातचीत के दौरान ये सवाल पूछ बैठे। एक बातचीत में जर्मनी की एक युवती ने ये प्रश्न खड़ा कर दिया। बैठकी पत्रकारों की थी, लिहाजा हमें जवाब देना ही था। तरह तरह के उत्तरों के बीच मैंने कहा कि गांधी की ईमानदारी, उनकी सादगी और मानव मात्र के प्रति उनके आदर भाव ने गांधी को महान बनाया। एक मित्र ने बीच में ही टोक दिया- गांधी ने कमजोरों को सशक्त किया था। इस लिए वे महान बने। लेकिन पश्चिमी समाज में आदमी की ताकत को पैसे से तौला जाता है। लिहाजा जर्मन युवती के लिए ये जवाब हैरत की बात थी। ऐसे में उसे फिर से सवाल दागना ही था - गांधी के पास वो ताकत कहां से आई कि वो किसी और को ताकत दे सकें।
प्रश्न मासूम और तर्किक लग रहा था। जिसे भारतीय दर्शन की पारंपरिकता से परिपूर्ण समझ न हो तो उसे ऐसे सवाल परेशान करते ही रहेंगे। दरअसल ताकत का अर्थ पश्चिमी दर्शन भौतिक ताकत से ही लगाता है। आत्मिक ताकत का अंदाजा उसे तब तक नहीं हो सकता, जब तक भारतीय जीवन पद्धति और दर्शन से वाकफियत न हो।
मैने उस युवती से बातचीत कर शायद उसे काफी हद तक संतुष्ट कर दिया, लेकिन चूंकि चर्चा में मदिरा भी शामिल थी लिहाजा कोई खास नतीजा नहीं निकलना था।
लेकिन मुझे लगता है कि हम भारतीय लोग अपने लिए प्रतिमूर्तियां गढ़ते हैं। कई बार किसी और की बनाई हुई छवि भी हमें इतनी रोचक लगती है कि हम उसके दीवाने हो जाते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाय तो हम छविवादी है। इसी से मिलता जुलता एक तर्क सादृश्यमूलक युक्ति भी है। हालांकि सादृश्यमूलक युक्ति में हम बनी बनाई छवियों में अपने जैसा कुछ देख कर उसे अपना मानने लगते हैं। फिर उस छवि को हम तरह तरह की कसौटियों पर कसते हैं। ये कसौटिंयां इतनी खरी होती हैं कि बहुत सी छवियां या प्रतिमूर्तियां समय के साथ भंग भी होती जाती है। इसी छविवाद के तहत श्री राम, श्री कृष्ण भगवान हैं और अमिताभ, शाहरुख हमारे हीरो हैं। हम सचिन और गावसकर के दीवाने हैं।
गांधी जी की छवि भारत में उनके जुझारुपन, और आंदोलनों के प्रति उनके अपने नज़रिए के कारण बनी। साथ में उनकी सादगी, ईमानदारी और मानव मात्र को सम्मान देने के उनके भाव ने उन्हें संत का स्थान दिलाया। उन्हें छवियों के पीछे चलने की हमारी प्रवृति का लाभ मिला और चल पड़े जिधर दो डग मग में चल पड़े कोटि पग उसी ओर.... की स्थिति हो गयी। गांधी जी के कहने पर करोड़ों लोग उनके पीछे चलने लगे।
दरअसल इनमें से कोई भी एक गुण अकेला किसी को बड़ा तो बना सकता है। लेकिन महान नहीं। गांधी जी जिस तरह से व्यक्तिगत स्वतंत्रता के हामी थे, या फिर जो सादगी उनके पास थी, जिस तरह से वे ईमानदार थे, सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन में उन सब चीजों ने मिल कर उन्हें महान बनाया। भारतीय परंपरा में अब से तकरीबन तीन दशक पहले जो संत कम से कम कपड़े पहन कर सादगी के साथ तपस्या में लगा रहता था वही महात्मा कहलाता था। तमाम आशाराम या फिर किसी और की तरह भौतिक साधनों का भयंकर इस्तेमाल करने वाला संत नहीं माना जाता था। गांधी का युग वही था। उन्होंने भी बहुत कुछ छोड़ा। वे एक सफल आंदोलन के महानायक के रूप में भारत आए थे। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में अपने नेतृत्व की शक्ति दिखा दी थी। उन्होंने यहां पर देखा कि मानव मानव में गहरा भेद है। थोड़े से अभिजात्य या ब्राह्मण जाति के लोग तो शूद्र की परछाई से भी दूर भागते हैं। वही शूद्र उनका मैला सिर पर उठा कर चल रहा है। हरिजनों कों मंदिर में प्रवेश करने का अधिकार नहीं है। गांधी जी ने बराबरी का नारा ही नहीं दिया, मंदिरों के दरवाजे हरिजनों के लिए खुलवाए। सबको बताया कि सभी मानव बराबर है। तब जा कर सुदूर बिहार के हरिजन टोले में भी “गान्ही बाबा” की टोली तैयार हो गई। हिंदू धर्म की सहिष्णुता को अपने जीवन में दिखा कर उन्होंने मुसलमानों का भी भरोसा हांसिल किया। अब ज्यादातर भारतीयों को वह छवि दिखने लगी, जो उन्हें आजादी दिला सकने वाले नेता में दिखनी चाहिए थी। तब जा कर लोगों ने ही उन्हें वह ताकत दे दी- जिससे वे महान हो सके। जिस ताकत से अंग्रेज फौज और अंग्रेजी हाक़िम डरें। ये गांधी जी ही थे, जिनके सम्मान में उन्हीं के विरुद्ध सुनवाई करने वाले जज ने खड़े हो कर कुछ पक्तियां कहीं। इसकी दूसरी मिसाल शायद ही इतिहास में कहीं और मिले। उनके प्रति लोगों के प्रेम का ही सबूत था कि उन्होंने एक आंदोलन शुरू करने को कहा और आंदोलन चल पड़ा। बाद में जब चौरा चौरी कांड हुआ तो तमाम खतरों के बावजूद उन्होंने आंदोलन वापस लेने में भी हिचक नहीं दिखाई। आंदोलन रुक भी गया। अगर हम गांधी को सिर्फ नेता मानते तो उनके कहने पर आंदोलन चला तो देते, उनकी एक आवाज पर आंदोलन रोकते नहीं। इसकी भी मिसाल कम ही मिलेगी।
गांधी जी के बारे में हम भारतीय तो बचपन से ही जानते हैं, फिर भी ये सब कुछ लिखने की वजह ये हुई कि कहीं कोई और अगर गांधी के बारे में सवाल करे तो हमारे पास उनके राष्ट्रपिता बनने के कारणों की दार्शनिक वजह भी रहे।

सोमवार, 20 अक्टूबर 2008

निशाने पर रिपोर्टर ...


खबरिया चैनलों की बढ़ती दुनिया में पत्रकारिता में कैरियर बनाने की इच्छा रखने वाले नौजवानों को सिर्फ और सिर्फ चमक-दमक ही नजर आती है। लेकिन इसके पीछे भी एक स्याह और मटमैली दुनिया है। रिपोर्टरों की मजबूरी है कि वे घटना का सीधा कवरेज करें। ना करें तो बॉस की गालियों की बौछार उसका दफ्तर में स्वागत करती है। घटनास्थल पर अमर सिंह जैसे दोमुहें नेताओं को कवर करें तो ओखला जैसी घटनाएं सामने आती है। टेलीविजन की दुनिया की इसी स्याह -सफेद तस्वीरों पर नजर डाल रहे हैं जी न्यूज के वरिष्ठ संवाददाता विनोद अग्रहरि
अठारह अक्टूबर की सुबह टीवी पर ब्रेकिंग न्यूज़ चल रही थी। ख़बर किसी और के बारे में नहीं, ख़ुद ख़बर देने वालों के बारे में थी। जामिया नगर में कई पत्रकारों पर भीड़ ने हमला बोल दिया। कुछ टीवी रिपोर्टर घायल हुए, कैमरामैनों को चोटें आईं। एक अगवा चैनल ने ख़बर को ज़ोर-शोर से उछाला जिसका अपना रिपोर्टर भी ज़ख्मी हुआ था। चैनल ने ख़बर दिखाने और पत्रकारों पर हमला करने वालों की जमकर मज़म्मत भी की। पत्रकार जामिया नगर में अमर सिंह की सभा को कवर करने गए थे। सभा ख़त्म होने के बाद जब वो अमर सिंह से जवाब-तलब कर रहे थे, तो वहां मौजूद स्थानीय नेता के समर्थकों को पत्रकारों के सवाल आपत्तिजनक लगे और उन्होंने पत्रकारों की धुनाई कर दी। तो ये है आज की पत्रकारिता का सूरते हाल।
वैसे ये पहली मर्तबा नहीं है, जब पत्रकारों पर हमले हुए हैं। अगर सिर्फ हालिया घटनाओं का ज़िक्र करें तो भी पिटने वालने पत्रकारों की एक लिस्ट तैयार की जा सकती है। ख़ासकर टीवी पत्रकार (रिपोर्टर और कैमरामैन) आए दिन लोगों के गुस्से का शिकार हो रहे हैं। लोगों का गुस्सा पूरे मीडिया जगत के ख़िलाफ होता है, लेकिन ज्यादातर हाथ लगते हैं टेलीविजन रिपोर्टर और कैमरामैन। ज़ाहिर है मीडिया का यही दोनों वर्ग लोगों से सबसे ज़्यादा सीधे तौर पर जुड़ा हैं, इसलिए मीडिया के ख़िलाफ बन रही आबोहवा का शिकार इन्हीं दोनों को होना पड़ रहा है। आज मीडिया के बारे में लोगों की सोच कितनी तेज़ी से बदल रही है, इसका सही जवाब या तो ख़ुद लोग दे सकते हैं, या फिर वो रिपोर्टर जो ख़बरों की कवरेज के लिए उनके पास जाता है। कई जगहों पर उसे लोगों की गालियां सुननी पड़ती है, बेइज्जत होना पड़ता है। कई बार मार खाने की नौबत आ जाती है। अगर रिपोर्टर विवेक से काम न लें तो हड्डियों का नुकसान हो सकता है।
इस नुकसान का ख़तरा सबसे ज़्यादा होता है टीवी में काम करने वाले सिटी और ‘जूनियर’ क्राइम रिपोर्टरों को। इन्हें प्रेस कॉन्फ्रेंस या पीआर टाइप स्टोरी करने का तोहफा नहीं मिलता। लोकेशन पर पहुंचने पर इनका कोई स्वागत नहीं करता, बिज़नेस कार्ड नहीं मांगता, बल्कि इन्हें बड़ी हिकारत की नज़र से देखा जाता है। ‘आ गए मीडिया वाले……..इन्हें तो बस मसाला चाहिए......टीवी पर तो ऐसे दिखाते हैं’ ......ऐसे ही कई चुभाने वाले तीर आते ही उन पर छोड़े जाते हैं। अब तो फिल्मों में भी रिपोर्टरों पर मज़ाक उड़ाने वाली लाइनें लिखी जाने लगी हैं। लेकिन रिपोर्टर अपना काम तो छोड़ नहीं सकता। जल्द ही उसे इन सबकी आदत पड़ जाती है और वो भीड़ में से ही किसी काम के शख्स की पहचान कर ख़बर की डीटेल लेनी शुरु कर देता है। घटना बड़ी हुई तो उसकी दिक़्क़त बढ़ जाती है। चुनौती अब ख़बर को ज़ोरदार बनाने की होती है। इसके लिए पीड़ित की बाइट जैसी अनिवार्य चीज़ें चाहिए होंगी। उसका जुगाड़ कैसे होगा, ...’वो तो किसी से बात भी नहीं कर रहे। क्या किया जाए, इसी उधेड़बुन में वो लगा रहता है। काम तो किसी तरह हो जाता है, लेकिन मन में एक अजीब सी अकुलाहट होती है, जिसे ख़ुद वही रिपोर्टर समझ सकता है। शायद उससे कहीं ज़्यादा एक्सपीरिएंस रखने वाला उसका बॉस भी नहीं। उनके दौर में हाल क्या रहा होगा, ये तो वही बेहतर जानते होंगे, लेकिन कहना ग़लत न होगा कि तब और अब की पत्रकारिता में जो महत्वपूर्ण बदलाव हुए हैं, उनमें से ये एक है।
कम से कम दिल्ली में तो मीडिया के प्रति लोगों का नज़रिया काफी बदला है। कभी टीवी रिपोर्टर जैसी उपाधि पर गर्व करने वालों के लिए आज कई जगहों पर अपनी पहचान छिपानी ज़रूरी हो जाती है। दिल्ली के महरौली बम धमाके की कवरेज करने गए एक शीर्ष न्यूज़ चैनल के रिपोर्टर को सिर्फ इसलिए अपना आई कार्ड अंदर रखना पड़ा क्योंकि उसी वक़्त उसके चैनल में चल रही एक ख़बर से स्थानीय लोग भड़क गए थे। अगर उसने फौरन वहां से भाग निकलने की समझदारी न की होती, तो भीड़ उस पर कोई भी क़हर बरपा सकती थी। दु:ख की बात ये है कि लोगों का ये रिएक्शन शायद चैनलों की दशा और दिशा तय करने वालों तक उतनी अच्छी तरह से नहीं पहुंच पा रहा, और अगर पहुंच भी रहा है तो वो इसके प्रति संजीदा नहीं है। आज अगर किसी मुद्दे पर आम लोगों की प्रतिक्रिया ‘वॉक्सपॉप’ लेना हो, तो रिपोर्टर ही जानता है कि उसे कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं। मीडिया से बात करने के लिए बड़ी मुश्किल से लोग तैयार होते हैं। वो दिन अगर बीते नहीं तो बहुत कम बचे हैं जब मीडियावाले लोगों की आंखों के तारे हुआ करते थे। आज तो लोगों को मीडिया तब अच्छी लगती है, जब उन्हें उसका इस्तेमाल करना हो। पड़ोसी से झगड़ा हुआ तो मीडिया बुला ली। एमसीडी ने अतिक्रमण हटाया तो चैनल के असाइनमेंट पर फोन कर दिया कि बदमाशों ने घर तोड़ दिया। शायद अब लोगों के लिए मीडिया की अहमियत इतनी ही रह गई है।
लेकिन इसके लिए ज़िम्मेदार कौन है? मेरे ख़्याल से उनका नंबर तो कहीं बाद में आता है जो लोगों की नज़र में इसके लिए ज़िम्मेदार माने जाते हैं। आम धारणा यही है कि रिपोर्टर ही चैनल में ख़बर देता है और जो कुछ दिखाई देता है, अच्छा या बुरा, उसी की वजह से होता है। मगर टीवी में काम करने वाला जानता है कि हक़ीक़त क्या है। चैनल की पॉलिसी से लेकर दिन भर की ख़बरों का खाका तैयार करने में उसका अंशदान कितना है, ये टेलीविज़न में काम करने वाला समझ सकता है। तो फिर लोगों के गुस्से का शिकार अकेले निरीह रिपोर्टर और कैमरामैन ही क्यों हों?

रविवार, 5 अक्टूबर 2008

अब नौसिखुओं का कौन खयाल रखेगा...

वाराणसी के पत्रकार सुशील त्रिपाठी की असामयिक मौत सहारा समय उत्तर प्रदेश चैनल के सीनियर प्रोड्यूसर राजकुमार पांडेय के लिए व्यक्तिगत क्षति है। सुशील जी उनके गुरू भी रहे हैं और हम-प्याला, हम-निवाला मित्र भी। राजकुमार पांडेय ने अपने इस मित्र, गुरू और हमदम को भावभीनी श्रद्धांजलि पेश की है।
बगल में कुछ कागज़ात, बालों पर लगा चश्मा और कुछ सोचते हुए चलते जाना। ऐसे ही मैंने देखा सुशील जी को। तकरीबन 92-93 में मुझे आज इलाहाबाद में नौकरी मिली और सुशील जी वहां बड़े पत्रकार थे। साल भर तक सिर्फ नमस्कार बंदगी का ही संबध रहा। वे रिपोर्टिंग में बैठते थे और हम डेस्क के लोग लीडर प्रेस बिल्डिंग के हॉल में। डाक डेस्क पर काम था लिहाजा जब रिपोर्टिंग का काम शुरु हो रहा होता था उससे पहले डेस्क और खास तौर से डाक डेस्क का काम सिमट रहा होता था, क्योंकि सिर्फ दो या शायद चार पन्ने ही इलाहाबाद से छपते थे। बाकी का अखबार बनारस से आता था। वही बनारस जहां का आज अखबार था और सुशील त्रिपाठी भी। इस लिहाज से भी हम जैसे नए लोगों के लिए सुशील जी बहुत बड़े थे। बस नमस्कार करना और निकल लेना, इससे ज्यादा का ताल्लुक नहीं था।
एक दिन दोपहर में किसी कारण से मेरे डेस्क इंचार्ज ने कोई रिपोर्ट करने भेज दिया। शायद दफ्तर में कोई नहीं था। रिपोर्ट करके लाया। अगले दिन रिपोर्ट मेरे नाम से यानी बाई लाइन अखबार में छप गई। इससे पहले शायद आज अखबार में एक दो ही रिपोर्ट बाई लाइन छपी थी। अगले ही दिन मुझे अपने डेस्क इंचार्ज के जरिए फरमान मिला कि अब रिपोर्टिंग करनी है। बाद में पता चला कि डेस्क से रिपोर्टिंग में मुझे लाने का आदेश सुशील जी की पहल पर ही मिला था। बहरहाल मैं अपने मनचाहे काम पर लग गया था। धीरे धीरे वह बीट भी मिल गईं, जो इलाहाबाद में रहते हुए अहम होती हैं। फिर भी सुशील जी के कारण मेरे पास सिटी पेज बनवाने की जिम्मेदारी होती थी। आज में उन दिनों पेस्टिंग के जरिए ही पेज बनता था। इससे भी लगातार मुझे सीखने को मिलता रहा।
इस दौरान सुशील जी से निकटता बढ़ती रही और उनके बहुआयामी सृजनात्मक व्यक्तित्व को देखने के मौके मिलते रहे। मैने देखा कि किस तरह से वे छोटी छोटी सी चीजों पर भी अपना असर डालते थे। जब भी मेरी या किसी और युवा रिपोर्टर की कोई खबर उन्हें अच्छी लगती, वे उसी समय पेज पर खुद ही केरिकेचर बना देते थे और हम लोगों के लिए ये किसी इनाम से कम नहीं होता। मेरे एक और साथी राजेश सरकार को कभी -कभार ये पुरस्कार मिलता था। जब भी उनसे किसी नए मुद्दे पर कोई बात होती, कहते – अरे चिरकुट यही लिख क्यों नहीं देते।
और लगातार सुशील जी लिखते रहे। इलाहाबाद के बौद्धिक हलके में उनके तकरीबन हर रिपोर्ट की चर्चा जरुर होती थी। जब संघ परिवार के विशेष अनुरोध पर शिव परिवार दूध पी रहा था, उस दिन मेरा साप्ताहिक अवकाश होता था। मैं किसी काम से सिविल लाइंस में बैठा था। वहीं से दफ्तर फोन कर सुशील जी को नमस्कार किया। उन्होंने हाल चाल पूछते हुआ अपना तकिया कलाम पढ़ा- और... मैने कहा बहुगुणा जी भी दूध पी रहे हैं। उन्होंने फिर पूछा – अबे तुमने पिलाया या नहीं। मैंने सहजता से बता दिया- मां मंदिर में गई थी, लेकिन कह रही थी कि भीड़ में धक्के से दूध चम्मच से छलक गया, गणेश जी ने नहीं पिया। फिर सुशील जी ने लगभग हड़काया- अरे चिरकुट सब जगह हंगामा है आकर यही सब लिख डालो। मै दफ्तर पहुंचा। रिपोर्ट बनायी, जैसा देखा था, बहुगुणा के आदमकद प्रतिमा का दूध पीना और मां के चम्मच से दूध छलकना, वगैरह सब कुछ लिख डाला। अगले दिन मेरी रिपोर्ट तो बाटम के रूप में छपी, लेकिन बाई लाइन नहीं थी। अलबत्ता सुशील त्रिपाठी की रिपोर्ट पूरे पेज भर की थी और हमेशा की तरह 16 प्वाइंट की बाई लाइन थी। कोफ्त हुई और नाराज़गी भी। बाद में पता चला कि नगवा कोठी (आज के मालिकों के निवास स्थान) ने भी पर्याप्त मात्रा में गणेश जी को दूध पिलाया था। साथ ही किसी ने सुशील जी से इसका जिक्र भी कर दिया था। सुशील जी ने अपनी रिपोर्ट में ये भी तंज किया -जो जितना बड़ा है उसने उतना ही दूध पिलाया। पता चला कि सुशील जी का तो कुछ नहीं हुआ लेकिन अगर मेरी रिपोर्ट बाइ लाइन होती मेरी खैर नहीं थी। मैं तो निपटा ही दिया जाता।
फिर मैं दिल्ली आ गया और सुशील जी बरेली के रास्ते वापस बनारस पहुंच गए। उनसे लंबी मुलाकात इलाहाबाद के पिछले अर्धकुंभ मेले में ही हो पाई। उस दौरान भी उनका एक्टीविस्ट जगा हुआ था। उनका कहना था कि ये मेला बौद्धों का मेला था और इसे ब्राह्मणों ने कब्जा किया। इस पर उन्होंने काफी लिखा भी था। उनकी आखिरी रिपोर्ट भी बौद्ध चिह्नों के खोज पर ही थी। सुन कर लगा कि सुशील जी सच्चे पत्रकार थे और हमेशा खोज में लगे रहते थे। उनकी शख्सियत के दूसरे पहलू चित्रकारी में भी उनका यही रूप दिखता रहा है। उन्हें बनारसी परंपराए लुभाती तो थीं, लेकिन वे पोंगापंथी के विरोध में ही रहते थे। जब से उनके जाने की खबर सुनी तो हर मिलने वाले से उनकी ही बातें करने का मन होता रहा। वैसे भी जिसने उन्हें देखा है उसके लिए उन्हें भुला पाना मुमकिन ही नहीं है, क्योंकि कभी भी आवाज आ सकती है.. का बे या फिर का गुरु.......