शनिवार, 3 जुलाई 2010

प्रथम चंद्रयान पुरस्कार कथाकार शेखर जोशी को


हिंदी के लब्ध प्रतिष्ठित कथाकार शेखर जोशी को मानिक दफ्तरी ज्ञानविभा ट्रस्ट के प्रथम चंद्रयान पुरस्कार- 2010 से नवाजा जायेगा। एक प्रेस विज्ञप्ति में प्रबंध न्यासी धनराज दफ्तरी ने बताया है कि नयी कहानी में सामाजिक सरोकारों का प्रतिबद्ध स्वर जोड़ने वाले शेखर जोशी को पुरस्कार स्वरुप 31000 रुपये की राशि भेंट की जाएगी। पुरस्कार समोराह कोलकाता के भारतीय भाषा परिषद् में रविवार 18 जुलाई को आयोजित होगा। इस समारोह की अध्यक्षता भारतीय भाषा परिषद् के निदेशक डाक्टर विजय बहादुर सिंह करेंगे जबकि जाने-माने आलोचक डॉक्टर शिवकुमार मिश्र मुख्य वक्ता के तौर पर कार्यक्रम में शिरकत करेंगे। इस अवसर पर शेखर जोशी की प्रचलित कहानी दाज्यू का पाठ पत्रकार प्रकाश चंडालिया करेंगे। सितम्बर १९३२ में अल्मोड़ा जनपद के ओजिया गाँव में जन्मे शेखर जोशी की प्रारंभिक शिक्षा अजमेर और देहरादून में हुई। कथा लेखन को दायित्वपूर्ण कर्म मानने वाले जोशी हिंदी के सुपरिचित कथाकार हैं। उन्हें उ.प्र. हिंदी संस्थान द्वारा महावीर प्रसाद द्विवेदी पुरस्कार-1987, साहित्य भूषण-1995, पहल सम्मान-1997 से सम्मानित किया जा चुका है। शेखर जोशी की कहानियों का तमाम भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेजी, चेक, रूसी, पोलिश और जापानी भाषाओं में अनुवाद किया जा चुका है। कुछ कहानियों का मंचन और दाज्यू नामक कहानी पर बाल फिल्म सोसायटी ने फिल्म भी बनाई है। शेखर जोशी की प्रमुख प्रकाशित कृतियाँ हैं- कोशी का घटवार, साथ के लोग, हलवाहा, नौरंगी बीमार है, मेरा पहाड़, प्रतिनिधि कहानियां और एक पेड़ की याद। दाज्यू, कोशी का घटवार, बदबू, मेंटल जैसी कहानियों ने न सिर्फ शेखर जोशी के प्रशंसकों की लम्बी जमात खडी की बल्कि नयी कहानी की पहचान को भी अपने तरीके से प्रभावित किया है। पहाड़ी इलाकों की गरीबी, कठिन जीवन संघर्ष, उत्पीड़न, यातना, प्रतिरोध, उम्मीद और नाउम्मीद्दी से भरे औद्योगिक मजदूरों के हालात, शहरी-कस्बाई और निम्नवर्ग के सामाजिक-नैतिक संकट, धर्म और जाति की रूढ़ियाँ उनकी कहानियों का विषय रहे हैं।

बुधवार, 9 जून 2010

भारतीय भाषाओं के जरिए बनता नया इतिहास

उमेश चतुर्वेदी
1994-95 की बात है। दिल्ली के तब के मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना विदेश दौरे पर थे। उनकी गैरमौजूदगी में तब के शिक्षा और विकास मंत्री साहब सिंह वर्मा कार्यकारी मुख्यमंत्री की भूमिका निभा रहे थे। इस दौरान उन्होंने तय किया कि पब्लिक स्कूलों में पहली कक्षा से ही अंग्रेजी की पढ़ाई पर रोक लगा दी जाय और उन्होंने उसे रोक दिया। इसे लेकर राजधानी के अंग्रेजीभाषी समाज में भूचाल आ गया। अंग्रेजी मीडिया और पब्लिक स्कूलों ने सुर में सुर मिलाकर तर्क देना शुरू कर दिया था कि अंग्रेजी की पढ़ाई के बिना तकनीकी पढ़ाई का क्या होगा। यहां यह बताना बेकार है कि मदनलाल खुराना के विदेश से लौटने तक अंग्रेजी के खेवनहार जीत गए थे और साहब सिंह वर्मा का गंवई मन मसोस कर अपने ही फैसले को वापस होता देखता रह गया। लेकिन इस साल आईआईटी की परीक्षा के जो नतीजे आए हैं, उसने इस धारणा को गलत साबित कर दिया है कि हिंदी माध्यम वाले बच्चे देश की इस सबसे बेहतर तकनीकी संस्थान में दाखिला नहीं ले सकते और बेहतरीन विद्यार्थी नहीं हो सकते।
इस साल आईआईटी की संयुक्त प्रवेश परीक्षा में कुल 13,104 उम्मीदवार सफल हुए हैं। जिसमें हिंदी माध्यम से पास होने वाले छात्रों की संख्या 554 है। तेरह हजार से ज्यादा कामयाब छात्रों के बीच हिंदी वाले छात्रों की इतनी संख्या छोटी हो सकती है। लेकिन पिछले रिकॉर्ड पर जब नजर जाती है तो यह कामयाबी कहीं ज्यादा बड़ी नजर आती है। खुद आईआईटी के ही मुताबिक पिछले साल हिंदी माध्यम से सिर्फ 184 प्रतियोगी सफल रहे थे। इसकी तुलना में तो इस साल की कामयाबी करीब तीन गुना ज्यादा बैठती है। जाहिर है कि इससे हिंदी माध्यम से पढ़ाई करने वाले नए प्रतियोगी और उत्साहित होंगे और अगली बार कामयाबी में उनकी भागीदारी और भी ज्यादा होगी।
1835 में जब मैकाले ने मिंट योजना लागू की थी तो उसका एक मात्र उद्देश्य अंग्रेजी सरकार के लिए बाबुओं को तैयार करना था। मैकाले की आत्मा जहां भी होगी, वह अपनी कामयाबी का अब तक जश्न मनाती रही है। क्योंकि भारत में अंग्रेजी का व्यवहार अंग्रेजी की अपनी ब्रिटिश धरती की तुलना में कहीं ज्यादा रहा है। लेकिन आईआईटी में हिंदी माध्यम वालों की कामयाबी ने कम से कम मैकाले की आत्मा को भी अब जरूर परेशान करना शुरू कर दिया होगा। अपने देश में जब भी अंग्रेजी के खिलाफ कोई तर्क दिया जाता है, तुरंत हिंदी के विरोध में भी कहा जाने लगता है कि हिंदी में ज्ञान-विज्ञान की पढ़ाई के लिए न तो किताबें हैं और न ही उसमें इतनी क्षमता है कि वह अंग्रेजी की तरह तकनीकी और ज्ञान-विज्ञान की चीजों को अभिव्यक्त कर सके। इसके खिलाफ चीन और जापान की तकनीकी क्रांति और दुनिया में आर्थिक महाशक्ति बनते जाने का उदाहरण भी दिया जाता रहा है। लेकिन भारतीय मानसिकता यह है कि वह अपनी सनातनी पद्धति के गौरव का जिक्र तो करती है, लेकिन भारतीयता के प्रतीक माने जाते रहे दो शब्दों गंगा और सिंदूर को देने वाली धरती की ओर नहीं झांकती। भारतीयता के प्रतीक ये दोनों ही शब्द पड़ोसी देश चीन से आए हैं। चीन की प्रगति की हम अब बात तो करने लगे हैं, लेकिन वहां जारी अपनी भाषाओं और अंग्रेजी के खिलाफ बढ़ते माहौल को लेकर हम उदासीन ही रहते हैं। आर्थिक उदारीकरण के दौर में चीन और जापान की तकनीकी क्रांति अब हमें भी लुभा रही है, हम उन्हीं की तरह आर्थिक महाशक्ति बनने की राह पर आगे बढ़ने की बात तो करने लगे हैं, लेकिन हमें उनकी तरह अपनी भाषाओं से प्यार का ककहरा सीखने में झल्लाहट और हिचक जारी है।
देश में बढ़ते अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों के पीछे एक बड़ा तर्क यह भी है कि हिंदी माध्यम से पढ़ाई करने वाले लोग क्लर्क और चपरासी तो बन सकते हैं, लेकिन इंजीनियर, डॉक्टर और आईएएस नहीं बन सकते। यही वजह है कि देश के दूरदराज तक के इलाकों में अंग्रेजी माध्यम वाले स्कूलों की बाढ़ आ गई है। लोगों में यह भावना घर कर गई है कि चाहे भूखे रहेंगे, आधी रोटी खाएंगे, लेकिन अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में ही पढ़ाएंगे। हालांकि इस प्रवृत्ति की मुखालफत साठ के दशक में डीएस कोठारी की अध्यक्षता वाला कोठारी कमीशन से लेकर आज के दौर के मशहूर शिक्षाशास्त्री और वैज्ञानिक प्रोफेसर यशपाल तक कर चुके हैं। सबसे बड़ी बात यह कि दोनों ही विद्वान अंग्रेजी के भी वैसे ही जानकार हैं, जैसे भारतीय अंग्रेजी दां हैं। देश की तकरीबन हर सरकार भी इन विद्वानों की राय का आदर करती रही हैं, लेकिन अंग्रेजी समर्थक लॉबी के दबाव में बच्चों से अंग्रेजी का दबाव हटाने की दिशा में कभी इच्छाशक्ति नहीं दिखा पाईं।
भारत के अपने लोग और अपने अगुआ भले ही जिस काम को नहीं कर पाए, आर्थिक उदारीकरण के बाद बढ़ते भारत के विशाल मध्यवर्ग ने वह कर दिखाया है। आज भारत में माना जा रहा है कि करीब चालीस करोड़ लोगों का विशाल मध्यवर्ग है, जिसकी खरीद क्षमता बढ़ती जा रही है। यही वजह है कि दुनिया के बड़ी कंपनियां तक कमाई के लिए भारत का रूख कर रही हैं। उन्हें पता है कि इस बाजार का दोहन हिंदी और भारतीय भाषाओं के जरिए ही किया जा सकता है, यही वजह है कि वे हिंदी में काम को बढ़ावा दे रही हैं। इस तरह हिंदी नए सिरे से प्रतिष्ठापित हो रही है। हिंदी और भारतीय भाषाओं के इस जयगान में भारतीय लोकतंत्र का भी बड़ा हाथ है। लोकतंत्र में पिछड़ी और अनुसूचित जातियों के लोगों की ऐतिहासिक कारणों से अंग्रेजी तक वह पहुंच नहीं बन पाई है, जो हिंदी और भारतीय भाषाओं की है। कोई सरकार भले ही राजभाषा के मंच पर प्रतिष्ठित राजभाषा की उपेक्षा कर दे, लेकिन सत्ता विमर्श में उभर कर सामने आ रही इन जातियों और इन वर्गों की अनदेखी नहीं कर सकती। इसलिए उन्हें हिंदी और भारतीय भाषाओं को आईआईटी और संघ लोकसेवा आयोग तक प्रवेश देना पड़ रहा है, जहां हिंदी अब तक चेरी या दोयम भूमिका में रही है। इसका नतीजा दिख रहा है कि अब हिंदी माध्यम के परीक्षार्थी आईआईटी और सिविल सर्विस तक में कामयाब होने लगे हैं। कार्मिक मंत्रालय ने सिविल सर्विस परीक्षा की जो रिपोर्ट जारी की है, उसके मुताबिक पिछले साल आईएएस के लिए जिन 111 लोगों का चयन हुआ, उनमें से हिंदी माध्यम के सफल प्रतियोगी 19 थे। संघ लोकसेवा आयोग के ही मुताबिक इस साल कामयाब टॉप 25 में चार प्रतियोगियों ने हिंदी माध्यम में परीक्षा दी थी। इन छात्रों की कामयाबी का जश्न इसलिए भी ज्यादा हो जाता है, क्योंकि खुद आईआईटी की आर्गेनाइजिंग कमेटी की रिपोर्ट ही मानती है कि हिंदी माध्यम से परीक्षा देने वाले छात्रों के लिए आईआईटी परीक्षा में पास होना आसान नहीं है।
जाहिर है इसका असर सामाजिक तौर पर भी पड़ रहा है। संघ लोकसेवा आयोग के सदस्य और हिंदी के जाने-माने विद्वान पुरुषोत्तम अग्रवाल भी मानते हैं कि हिंदी माध्यम ने सिविल सर्विस की परीक्षाओं में ग्रामीण इलाकों के छात्रों के लिए भी दरवाजे खोले हैं। जाहिर है इसका असर इंजीनियरों और सिविल सेवा अधिकारियों की मानसिकता पर भी पड़ेगा। अब तक इन सेवाओं को सिर्फ शहरी नजरिए से ही देखा जाता रहा है। भारत के गांवों के पिछड़ेपन को लेकर अब तक जितने भी आरोप लगते रहे हैं, उसमें एक बड़ा कारण यह भी माना जाता रहा है कि जो भी योजनाएं बनती हैं, उन्हें बनाने वाले ज्यादातर लोगों को गांवों से परिचय सिर्फ निबंध लेखन तक ही होता है। लेकिन हिंदी और भारतीय भाषाओं के माध्यम से जो छात्र इंजीनियरिंग या सिविल सर्विस में आ रहे हैं, उनका नजरिया जाहिर है कुछ अलग ही होगा। उनकी सोच अपने धूल भरी गांवों की गलियों के उत्थान के लिए भी होगा। तो क्या हम ये मानने लगें कि भारत की 65 प्रतिशत ग्रामीण आबादी में बदलाव की नई बयार बहने वाली है। आईआईटी और सिविल सर्विस में हिंदी और भारतीय भाषाओं की यह कामयाबी कम से कम ऐसी उम्मीद तो जरूर जताती है।

शुक्रवार, 4 जून 2010

वितंडा का ब्लॉग



उमेश चतुर्वेदी
ब्लॉग यानी वेब लॉग के बारे में माना जाता है कि इससे आम अभिव्यक्ति को नया आयाम मिला है। वर्चुअल दुनिया के इस अपूर्व माध्यम ने उन लोगों को भी अभिव्यक्ति के लिए ऐसा स्पेस मुहैया कराया है, जिनके विचारों और समस्याओं को आधुनिक मीडिया के पारंपरिक माध्यमों में जगह नहीं मिल पाती। इससे मुक्त अभिव्यक्ति को नया आयाम मिला है। ऐसा माना जा रहा है कि हिंदी में इन दिनों कम से पंद्रह हजार ब्लॉग सक्रिय हैं। जिन पर लोग अपने विचारों, अपनी रचनाधर्मिता को मुक्त भाव से अभिव्यक्त कर रहे हैं। ये ब्लॉग तमाम तरह के विषयों पर केंद्रित हैं- धर्म, समाज, साहित्य, राजनीति, संस्कृति, अर्थ व्यवस्था, विज्ञान और सेक्स समेत तमाम तरह की चर्चाएं आज ब्लॉगिंग के केंद्र में हैं। इस लिहाज से देखें तो इंटरनेट की दुनिया में हिंदी नए तरह से करवट ले रही है।
लेकिन दुख की बात यह है कि अभिव्यक्ति का सबसे नया यह जनमाध्यम भी पारंपरिक मीडिया के रोगों से ग्रस्त हो चुका है। खबरिया चैनलों को इन दिनों हर दूसरा व्यक्ति उनकी कंटेंट और भाषा को लेकर गाली देता मिल जाएगा। खबरिया चैनलों पर आरोप है कि वे टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट यानी टीआरपी के लिए कंटेंट और भाषा से खिलवाड़ कर रहे हैं। अफसोस की बात यह है कि ब्लॉगिंग की दुनिया के कुछ अहम खिलाड़ी भी इन दिनों सनसनीखेज पत्रकारिता की ही राह पर चल पड़े हैं। जिनके लिए अपनी हिट बढ़ाने का एक ही तरीका नजर आ रहा है, कंटेंट और भाषा के साथ परोसे जाने वाले विषयों के साथ खिलवाड़ करो। ताकि उनकी चर्चा हो और वर्चुअल दुनिया के यायावर उनके पास चले आएं और उनकी हिट को बढ़ाएं ताकि वे वर्चुअल दुनिया में अपनी बादशाहत को साबित कर सकें। यह कुछ वैसे ही हो रहा है, जैसे हाल के दौर तक हिंदी के खबरिया चैनल नाग-नागिन को नचाने से लेकर एलियन के हाथों गायों को धरती से अंतरिक्ष की दुनिया में भिजवाते रहे हैं। ब्लॉगिंग की दुनिया में इतना अतिवाद नहीं है। लेकिन यह जरूर है कि सतही विषयों को सनसनी की चाशनी में जमकर परोसा जा रहा है। और हमारी जो मानसिक बुनावट है, हमारा जो सामाजिक ढांचा है, उसमें तात्कालिक तौर पर सनसनी की चाशनी बेहद मीठी और लुभावनी लगती है। लिहाजा इस चाशनी को परोसने वाले ब्लॉग इन दिनों हिट हैं।
इंटरनेट के खोजकर्ता देश अमेरिका में ब्लॉगिंग की दुनिया इससे कहीं आगे निकल गई है। वहां तो सही मायने में वर्चुअल दुनिया का यह माध्यम आज मुख्यधारा के मीडिया से कम से कम मुक्त और जिम्मेदार अभिव्यक्ति के माध्यम के तौर पर जबर्दस्त टक्कर दे रहा है। पिछले साल अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा की ताजपोशी में जिन कारकों की प्रमुख भूमिका रही, उसमें एक बड़ा कारक वहां के जिम्मेदार ब्लॉगर और ब्लॉगिंग ही रही। वहां का मुख्यधारा का मीडिया जार्ज बुश जूनियर के बारे में तकरीबन वही लिख या दिखा रहा था, जो वे चाहते थे। अफगानिस्तान और इराक युद्ध की हकीकत से आम अमेरिकी का एक बड़ा वर्ग अनजान था। लेकिन जिम्मेदार और सक्रिय ब्लॉगरों ने उसे अनजान नहीं रहने दिया। अमेरिकी सेनाओं की अफगानिस्तान और इराक में करतूत और इससे हो रहे नुकसान को ब्लॉगरों ने बखूबी बयान किया। इसके चलते रिपब्लिकन उम्मीदवार जॉन मैकेनन को अपनी तमाम अच्छाइयों के बावजूद हार का मुंह देखना पड़ा। क्योंकि वे उस जार्ज बुश के उत्तराधिकारी बनने चले थे, जिनकी नीतियों की वजह से अमेरिकी सेनाएं इराक और अफगानिस्तान में फंसी पड़ी हैं।
हिंदी की ब्लॉगिंग की दुनिया अभी इतना परिपक्व नहीं हो पाई है। यह कहना भी एक तरह का अतिवाद ही होगा। यहां कानून, भाषा, सिनेमा, रेडियो और विभिन्न दार्शनिक और राजनीतिक विचारों को लेकर ब्लॉगिंग की दुनिया में महत्वपूर्ण काम हो रहा है। लेकिन वितंडावादी ब्लॉगिंग के चलते उनकी पहुंच बेहद सीमित है। उनके बारे में कम ही लोग जान पाते हैं। लेकिन ये तय है कि जिस तरह भारत के दूसरे और तीसरे दर्जे तक के शहरों से लेकर गांवों की चौपाल तक इंटरनेट की पहुंच बढ़ती जा रही है, मुक्त अभिव्यक्ति का यह जनमाध्यम और सशक्त बनकर उभरेगा। तब सनसनी की चाशनी की मिठास कड़वे स्वाद में बदलती नजर आएगी।
( यह लेख भोपाल से प्रकाशित अखबार पीपुल्स समाचार में छप चुका है। )

बुधवार, 19 मई 2010

बदलाव की आहट


उमेश चतुर्वेदी
अपने यहां जब भी किसी को प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्थाओं से इंसाफ नहीं मिलता, तो उसके पास अदालत का दरवाजा खटखटाने के अलावा कोई चारा नहीं होता। अदालतों से उन्हें इंसाफ भी मिलता है। संवैधानिक ताकत और रसूख रखने वाले हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट पर आज देश के नागरिकों का भरोसा कहीं ज्यादा बढ़ गया है। जाहिर है कि इस भरोसे की वजह वहां न्याय की अमोल कुर्सी पर बैठे न्यायाधीशों का आचरण और उनके इंसाफपसंद फैसले ही रहे हैं। लेकिन आम लोगों को कम ही पता होगा कि उपरी अदालतों के न्यायमूर्तियों की नियुक्ति में भी राजनीति होती है और अक्सर वही राजनीतिक सत्ता आखिरकार हावी हो जाती है, जिनके खिलाफ कई बार उन जजों को ही सुनवाई करनी पड़ती है। भारत के किसी हाईकोर्ट की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश लीला सेठ की आत्मकथा से गुजरते हुए इस राजनीति के दर्शन बार-बार होते हैं। अंग्रेजी के मशहूर उपन्यासकार विक्रम सेठ की मां लीला सेठ की घर और अदालत नाम से आई यह आत्मकथा छह साल पहले अंग्रेजी में ऑन बैलेंस के नाम से प्रकाशित हो चुकी है। तब इसे अंग्रेजी में हाथोंहाथ लिया गया था। लेकिन अदालती नियुक्तियों की राजनीति से हिंदी पाठकों का दस्तावेजी साबका अब जाकर पड़ा है, जब पेंगुइन इंडिया ने यह किताब हिंदी में अनूदित करके प्रकाशित की है। इस राजनीति को जानने और समझने के लिए पाठकों को किताब के शब्दों से गुजरना होगा। जिसमें लीला सेठ ने बेबाकी से लिखा है कि राजनीति के चलते वे सुप्रीम कोर्ट की जज नहीं बन पाईं और सुप्रीम कोर्ट की पहली महिला जस्टिस होने का गौरव केरल की जस्टिस फातिमा बीवी हासिल करने में सफल रहीं। इस पूरी कहानी को जानना और समझना इस किताब के ही जरिए हो सकता है। इतना ही नहीं, ये आत्मकथा एक ऐसी महिला के आत्मसंघर्ष की कहानी भी है, जिसके पिता की उसके बचपन में ही मौत हो जाती है। मां उसे संघर्षों में पालपोस कर बड़ा करती है और वह लड़की अपनी जिंदगी की शुरूआत रेलवे के एक अधिकारी की स्टेनो और टाइपिस्ट के तौर पर करती है। लेकिन अध्यवसाय नहीं छोड़ती और वकालत पास करके वकील बनती है और इतनी सफल वकील बनती है कि उसे यही व्यवस्था हाईकोर्ट का जस्टिस और फिर चीफ जस्टिस बनाने के लिए मजबूर हो जाती है। इस किताब में अ सूटेबल ब्वॉय के लेखक विक्रम सेठ की शब्दों की दुनिया में उतरने और कामयाब बनने की पूर्वपीठिका का भी दर्शन कराने में यह कहानी सफल रहती है।
इस स्तंभ में इस किताब की चर्चा का मकसद पारंपरिक समीक्षा नहीं है। बल्कि हिंदी प्रकाशन की दुनिया में आ रहे बदलावों को भी रेखांकित करना है। पुस्तकालयों के लिए खरीद पर केंद्रित रही हिंदी प्रकाशन की दुनिया में पेंगुइन वाइकिंग धीरे-धीरे क्रांति लाने की तैयारियों में जुट गया है। अन्यथा पारंपरिक प्रकाशन की दुनिया आज भी जुगाड़ और उसी पारंपरिक कहानी-कविता की ही दुनिया में खोयी-सिमटी है। लेकिन पेंगुइन हिंदी प्रकाशन की दुनिया के नए दरवाजों पर दस्तक दे रहा है। वैचारिकता और विमर्श से लेकर पारंपरिक खांचे से बाहर की हिंदी की दुनिया में झांकने की कोशिशें और बाजार की जरूरतों के मुताबिक मार्केटिंग के साथ उतरे पेंगुइन हिंदी प्रकाशन का चेहरा बदल रहा है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के जरिए जब से पता चला है कि हिंदी का विशाल मध्यवर्ग बाजार की बड़ी ताकत बन कर उभरा है। उस बाजार पर कब्जा जमाने की कोशिशों में उदारीकरण वाली अर्थव्यवस्था वाली ताकतें जोरशोर से कूद पड़ी हैं। माल कल्चर के जरिए कब्जा जमाने की इस होड़ को समझा जा सकता है, जिसकी प्रक्रिया महानगरों से लेकर दूसरी श्रेणी के शहरों तक में दिखने लगी है। हिंदी के इस बाजार की चर्चा कीजिए तो पारंपरिक प्रकाशक आज भी मायूस और रोते हुए से दिखेंगे। इस रूदन के बावजूद उनकी समृद्धि बढ़ती जा रही है। लेकिन पाठकीय समृद्धि के साथ ही लेखकीय गौरव और समृद्धि की ओर उनका ध्यान नहीं है। लेकिन इस ओर ध्यान पेंगुइन ने दिया है। भारत में उदारीकरण के बाद आ रही विदेशी कंपनियों की मंशा पर अब तक न जाने कितने सवाल उठाए जा चुके हैं। लेकिन पेंगुइन पर सवाल नहीं उठ रहे हैं। जबकि वह भी हिंदी के बाजार से ही कमाई करने के लिए उतरी है। इसकी वजह यह है कि वह हिंदी के इस विशाल बाजार को प्रोफेशनल और सांस्कृतिक नजरिए से समृद्ध करने की कोशिश में ही जुटी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि भारतीय और खासकर हिंदी के प्रकाशक भी ऐसे ही नजरिए से बाजार में उतरने की कोशिश करेंगे और अब तक दीनहीन समझी जाती रही हिंदी प्रकाशन की दुनिया का चेहरा बदल सकेंगे।
(यह आलेख पीपुल समाचार भोपाल में प्रकाशित हो चुका है)

सोमवार, 3 मई 2010

एफ एम चैनल के कर्मचारी संघर्ष को तैयार


एफ एम सहित आकाशवाणी दिल्ली के विभिन्न चैनलों में काम करने वाले सैकड़ों उदघोषकों और कर्मियों में अधिकतर कलाकारों को पिछले ग्यारह महीनों से भुगतान नहीं किया गया है। कुछ तो ऐसे भी हैं जिन्हें इससे भी अधिक समय से पैसे नहीं मिले हैं। इसके लिए श्रोताओं, कलाकारों व समाजिक कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर इन कर्मचारियों ने अपना रेडियो बचाओं अभियान शुरू किया है। अभियान का मानना है कि रेडियो के निजी चैनलों को फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से आकाशवाणी की स्थिति बदत्तर बनाई जा रही है।

राजधानी में अपना रेडियो बचाओं अभियान में लगे श्रोताओं, कलाकारों व समाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि रेडियो की भी वैसी ही स्थिति बनाई जा रही है जैसा कि टेलीविजन के निजी चैनलों के लिए जगह बनाने के लिए वर्षों पूर्व दूरदर्शन की बनाई गई थी। निजी चैनलों के शुरू होने से पहले मैट्रों चैनल को सबसे ज्यादा लोकप्रिय बनाने की कोशिश की गई। उसके जरिये दर्शकों की रूचि को मसलन भाषा और विषय वस्तु आदि हर स्तर पर बदलने की पूरी कोशिश शुरू की गई। दूरदर्शन के कर्मचारियों की भी शिकायतें उन दिनों काफी बढ़ रही थी और उन पर ध्यान देने की जरूरत सरकार महसूस नहीं कर रही थी। इन दिनों रेडियों के पर्याय के रूप में एफएम चैनलों को जाना जाता है। खासतौर से मनोरंजन के लिए श्रोताओं की बड़ी तादाद एफ एम चैनलों के कार्यक्रमों को सुनती है। लेकिन आकाशवाणी के एम एम चैनलों की जो स्थिति है उसे देखकर आश्चर्य ही नहीं होता है बल्कि ये एक भरोसे के साथ कहा जा सकता है कि रेडियों के निजी चैनलों के विस्तार के लिए आकाशवाणी के आला अधिकारी काम कर रहे हैं। याद दिलाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि टेलीविजन के निजी चैनलों की शुरूआत में दूरदर्शन को छोड़कर उसके कई बड़े अधिकारी निजी चैनलों की सेवा में उंची तनख्वाह पर चले गए थे।

एक तरफ तो रेडियो का तेजी से विस्तार हो रहा है और दूसरी तरफ आकाशवाणी पर वर्षों से नई नियुक्तियां नहीं हुईं हैं और यहाँ प्रोग्राम प्रजेंटेशन का काम आकस्मिक प्रस्तोता ही करते हैं। काम के घंटे अधिक और पारिश्रमिक कम, इस पर भी भुगतान में वर्ष भर की देरी । जबकि संसद की एक समिति ने आकाशवाणी में अस्थायी कलाकारों की बदतर स्थिति पर चिंता जाहिर करते हुए उनकी स्थायी नियुक्तियां करने की सिफारिश की थी।

रेडियो के सबसे लोकप्रिय एम एफ चैनलों के लिए काम करने वाले कलाकारों ने दो महीने के दौरान सम्बंधित उच्चाधिकारियों से मिलकर इन स्थितियों से अवगत कराया है लेकिन स्थितियां जस की तस हैं । "अपना रेडियो बचाओ " मंच के तत्वावधान में लगभग बीस सक्रिय प्रज़ेन्टरों का एक प्रतिनिधिमंडल आकाशवाणी महानिदेशक को पहले १७ फरवरी और फिर २६ अप्रेल २०१० को ज्ञापन दे चुका है । इस ज्ञापन में कार्यक्रमों के गिरते स्तर, भुगतान में अभूतपूर्व विलम्ब के और ध्यान दिलाया गया है और एफ़ एम गोल्ड चैनेल में चल रही गडबडियों के लिए एफ़ एम गोल्ड चैनल की कार्यक्रम अधिशासी MrsMmmmmmmmm Mrs. Ritu Rajput को जिम्मेवार बताया गया है। लम्बे समय तक यह चैनल देश के सर्वाधिक लोकप्रिय चैनेल्स में रहा है और इसके सूझबूझ से भरे मनोरंजक और ज्ञानवर्धक कार्यक्रम व्यापक जनहित का काम करते रहे हैं और श्रोताओं का जीवन प्रकाशित करते रहे हैं.

अपना रेडियो बचाओ मंच इस सन्दर्भ में सूचना और प्रसारण मंत्रालय से तत्काल हस्तक्षेप की मांग करता है और तुरंत भुगतान कर के कैजुअल प्रज़ेन्टरों के नियमितीकरण की प्रक्रिया आरम्भ करने की भी मांग करता है। साथ ही संसदीय समिति की सिफारिशों के आलोक में तत्काल कदम उठाने का आग्रह करता है। इस मंच के सदस्यों ने इस बात पर भी जोर दिया है कि आकाशवाणी को बर्बाद करने की जो साजिश चल रही है उसका पर्दापाश करने के लिए मंच राजधानी और देश के दूसरे शहरों में अभियान चलाएगा।

गुरुवार, 29 अप्रैल 2010

कहां है लोक......


उमेश चतुर्वेदी
लोक के बिना जिंदगी के रसधार की कल्पना नहीं की जा सकती। रोजाना की जिंदगी की टीस और उससे उपजी पीड़ा को स्वर देने का काम लोक की अपनी भाषा और उसका अपना साहित्य ही दे सकता है। लोक के दर्द की टीस को लोकसाहित्य इतनी खूबसूरती से अभिव्यक्ति देता है कि सुनने या पढ़ने वाले के लिए वह दर्द अपना सा हो जाता है।
बहुत कम लोगों को पता होगा कि दर्दभरी यह लोकअभिव्यक्ति ही थी कि हिंदी में लोकसाहित्य के विधिवत अध्ययन की नींव पड़ी। हिंदी के प्रसिद्ध कवि पंडित रामनरेश त्रिपाठी एक बार कवि सम्मेलन में जाने के सिलसिले में अपने जिले जौनपुर के तिवारीपुर रेलवे स्टेशन पर रेल के इंतजार में बैठे थे। इसी दौरान एक परिवार अपने परदेसी सदस्य को छोड़ने स्टेशन आया। पिछड़े वर्ग के इस परिवार में महिलाएं भी थीं। कलकत्ता जाने वाली रात की रेल छुक-छुक करती आई और उस परदेसी को ट्रेन में बैठाकर वह परिवार लौट गया। लौटते-लौटते वह परिवार त्रिपाठी जी को एक टीस दे गया। लोक में रची वह लाइनें थीं – रेलिया ना बैरी, जहजिया ना बैरी.....पइसवा बैरी भइले ना...यानी रेल दुश्मन नहीं है, जहाज भी दुश्मन नहीं....दुश्मन तो वह खोटा पैसा है, जिसके लिए अपनों को छोड़ परदेसी होना पड़ता है।
दर्द की इस अभिव्यक्ति ने ही त्रिपाठी जी को हिंदी में लोकसाहित्य के विधिवत अध्ययन की नींव डालने की प्रेरणा दी। जिसे वासुदेश शरण अग्रवाल, कृष्णदेव उपाध्याय, हंसकुमार तिवारी आदि ने आगे बढ़ाया। लेकिन दुख की बात है कि अब यह अध्ययन सिर्फ किताबी रटंत की तरह कुछ विश्वविद्यालयों के हिंदी के पाठ्यक्रम में सिमट कर रह गया है। वहां भी नए काम या तो हो नहीं रहे हैं या फिर इक्का-दुक्का छिटफुट ही हो रहे हैं। लोक से लगातार गायब होते लोकसाहित्य और उससे आम जन की बढ़ती दूरी को लेकर पहले चिंताएं भी जताई जाती रही हैं। लेकिन अब ये चिंताएं भी विद्वत्त जनों को परेशान नहीं कर रहीं हैं और जब विद्वत्तजन परेशान नहीं हैं तो लोक को क्यों चिंता होने लगी। उसे उदारीकरण ने मनोरंजन के ढेरों सरंजाम मुहैया करा दिए हैं। घर में टेलीविजन है, मोबाइल फोन में एफएम है...वीसीडी और डीवीडी प्लेयर भी हैं तो फिर किसे और क्यों चिंता होने लगी लोक के टीस की...
लेकिन इसका ये भी मतलब नहीं है कि लोक से उसकी अपनी पारंपरिक और देसज अभिव्यक्ति खत्म हो गई है। बाजार ने लोक को भले ही उसके अपने माध्यमों से दूर कर दिया है, लेकिन वह बदले हुए रूप में जरूर सामने आ रहा है। इसे उत्तर प्रदेश के पूर्वी इलाकों और बिहार में होली और शादी-विवाह के दिनों में जाकर देखना और सुनना बेहतर होगा। सहज और दैनंदिन जीवन के दर्द लोक के स्वरों से गायब हैं। अगर कुछ बाकी बचा दिखता है तो वह है लोक का तर्ज..बाकी लय और धुन में परोसी जाती हैं फूहड़ भाषा ...इसे गालियां भी कह सकते हैं, जिन्हें सभ्यताशील कान शायद ही सुन सकें।
लोक बाजार में राजस्थानी गीत नीबूड़ा-नीबूड़ा के तौर पर फिल्मी दुनिया में भी दिख-सुन जाता है। तब लोक के मिठास भरे सुर हमें अच्छे लगने लगते हैं....लोक साहित्य की एक पहचान रही है उसका लोगों के होठों पर चढ़ जाना। इस चढ़ने के पीछे पहले कहीं कोई बाजार नहीं होता था। लेकिन अब बाजार इसकी बड़ी वजह होता है। इस बाजार का माध्यम बनती है - हम दिल दे चुके सनम जैसी फिल्म। 2009 में आई फिल्म दिल्ली-6 का गीत – ससुराल गेंदा फूल- भी छत्तीसगढ़ी लोकगीत से प्रभावित था। वह आज भी लोगों की जबान पर चढ़ा हुआ है तो इसकी एक बड़ी वजह है कि उसके जरिए लोक की देसज और सहज अभिव्यक्ति जिंदा है।
यानी आज अगर लोक की अभिव्यक्ति कहीं जिंदा है तो इसकी बड़ी वजह बाजार की जरूरत है। बाजार चाहता कि कोई खास लोक की अभिव्यक्ति जिंदा रहे तो उसे वह जिंदा करता है..इसके लिए वह पैसा बहाता है, क्योंकि पैसा कमाना उसका मकसद होता है। लेकिन जहां वह नहीं चाहता कि लोकअभिव्यक्ति बचे, उसे बचाने की ताकीद भी नहीं करता। क्योंकि उसे वहां पैसा नजर नहीं आता। निश्चित तौर पर लोक की सहज – दर्दीली अभिव्यक्ति का नुकसान हो रहा है। लेकिन उम्मीद की किरण उस बाजार में ही है। जो पैसे के लिए ही सही, इसे कभी-कभी जिंदा रखने की कोशिश करता है या करता है। इस उम्मीद को बढ़ाना आज की जरूरत है। तभी हम अपने पुरखों की थाती से आने वाली पीढ़ियों को परिचित कराते रहने की परंपरा को आगे बढ़ा सकेंगे।