उमेश चतुर्वेदी
1996 की बात है, तब मैं शावक पत्रकार था, अमर उजाला ग्रुप के आर्थिक अखबार अमर उजाला कारोबार में मेरी नई-नई नौकरी लगी थी। तब के संपादक ने नौकरी देते वक्त मुझसे ट्रेड यूनियन और साहित्यिक-सांस्कृतिक रिपोर्टिंग कराने का वादा किया था। लेकिन बाद में उन्होंने मंडी रिपोर्टिंग के काम पर लगा दिया। मेरे तत्कालीन बॉस ने एक दिन मुझसे कहा कि आप जाकर एशिया के सबसे बड़े हार्डवेयर मार्केट पर स्टोरी करके लाइए। मैंने पता लगाया कि वह मार्केट नई दिल्ली स्टेशन के पास स्वामी श्रद्धानंद मार्ग पर है। अजमेरी गेट की तरफ से मैंने आगे बढ़कर स्वामी श्रद्धानंद मार्ग का रास्ता वहां तैनात एक सिपाही से पूछा। सिपाही ने मुझे ऐसे घूरा- जैसे मुझे खा जाएगा। माजरा नहीं समझ पाया, लिहाजा ये बताने में मैंने देर नहीं लगाई कि पत्रकार हूं। सिपाही का रवैया बदल गया। उसने मुझे आंख के इशारे से रास्ता बता दिया। उसके बताए रास्ते पर आगे बढ़ने के पहले तक मुझे उस रास्ते के हकीकत की जानकारी नहीं थी। लेकिन उस रास्ते पर आगे बढ़ते ही मेरी हैरत का ठिकाना नहीं रहा। श्रद्धानंद जैसे क्रांतिकारी संन्यासी के नाम पर बनी ये सड़क पहले जीबी रोड के नाम पर जानी जाती थी। इसी जीबी रोड के ग्राउंड फ्लोर पर सचमुच एशिया का सबसे बड़ा हार्डवेयर मार्केट फैला पड़ा है। इसी रास्ते के आखिरी छोर पर लाहौरी गेट समेत पुरानी दिल्ली के कई रिहायशी इलाके हैं। इसी रास्ते से घर-परिवार वाले लोग भी रोजाना हाट-बाजार जाते हैं। कभी रिक्शे से तो कभी पैदल, वे निर्विकार भाव से वैसे ही गुजरते हैं – जैसे दूसरे इलाके में वे जाते हैं। बाजार की चमक के बीच अंधेरी सीढ़ियां भी दिख रही थीं और उनसे होकर उपर जो रास्ता जाता है, वहां कोई और ही दुनिया थी। छतों पर खड़ी लड़कियां और महिलाएं बार-बार कुछ वैसे ही बुला रही थीं – जैसे सब्जी बाजार में सब्जी वाले तरकारी और जिंस का भाव लगाते हुए ग्राहकों को बुलाते हैं। तब जाकर मुझे पता चला कि एशिया के सबसे बड़े हार्डवेयर बाजार के छत पर देह का बाजार लगता है। मेरे लिए ये नया अनुभव था। मेरा मन घृणा और विक्षोभ से भर गया। रोटी के लिए अपनी अस्मत की बोली लगाते हुए देखना मेरे लिए ये पहला अनुभव था। उस रात मैं सो नहीं पाया। सारी रात मनुष्य जीवन की मजबूरियां मुझे बेधती रहीं।
बहरहाल मैं रिपोर्टर की हैसियत से गया था और मुझे हार्डवेयर बाजार पर स्टोरी करनी ही थी। लिहाजा मैं मार्केट एसोसिएशन के तत्कालीन अध्यक्ष के पास पहुंचा, लेकिन उनके किसी रिश्तेदार की मौत हो गई थी। लिहाजा उनसे मुलाकात नहीं हुई। तब मैं पूर्व अध्यक्ष के पास पहुंचा। वहां पहुंचा तो श्रद्धानंद मार्ग पुलिस चौकी का हेडकांस्टेबल उनकी चंपूगिरी में मसरूफ था। मैंने पूर्व अध्यक्ष जी को अपना परिचय बताया और मार्केट के बारे में जानकारी मांगी। जानकारी देने की बजाय अपनी दुकान से मुझे बाहर लेकर वे निकल पड़े। वे मुझे लेकर नई दिल्ली से सदर जाने वाली रेलवे लाइन और हार्डवेयर मार्केट के बीच वाले इलाके की ओर चले। ये वाकया नवंबर महीने का है। लेकिन उस खाली जगह में पतझड़ जैसा माहौल था। वहां प्रयोग किए जा चुके कंडोम ऐसे बिखरे पड़े थे, जैसे पतझड़ के दिनों में पेड़ों के नीचे पत्तियां बिखरी होती हैं। एक साथ इतने यूज्ड कंडोम देखकर मुझे उबकाई आने लगी। मैं उल्टे पांव लौट पड़ा। पीछे-पीछे मार्केट एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष की आवाज थी, पहले हमारी इस समस्या पर लिखो तब जाकर कोई दूसरी खबर दूंगा।
एशिया के सबसे बड़े हार्डवेयर मार्केट की चमक-दमक के पीछे कितना कचरा है और उसका छत कितने स्याह अंधेरे से घिरा है, ये मैं तभी जान पाया। उसी दिन मुझे हेड कांस्टेबल ने बताया कि वहां आनेवाले ज्यादातर ग्राहक रिक्शे-ठेले वाले या फिर स्कूलों के जवान होते छात्र होते हैं। ये भी पता चला कि सेना के जवान भी अच्छी-खासी संख्या में यहां अपना दिल बहलाने आते हैं। आप उन्हें रोकते नहीं – मेरे इस सवाल को लेकर हेड कांस्टेबल का जवाब था , उसकी यानी पुलिस वालों की कोशिश होती है कि छात्र कोठों पर जा नहीं पाएं। इसके लिए वे लाठियां भांजने से भी नहीं हिचकते। लेकिन लगे हाथों वह ये भी जोड़ने से नहीं चूका कि यहां आने वाले को कोई रोक पाया है भला।
मैं गांव का हूं...वह भी एक संभ्रांत ब्राह्मण परिवार से ..पारिवारिक संस्कारों ने कोठों के अंधेरे कोने की तहकीकात से रोक दिया। लिहाजा वहां नहीं जा पाया, लेकिन स्याह अंधेरे के पीछे की दुनिया का दर्द समझने में कोई चूक नहीं हुई। दर्द समझने में संस्कार भी कभी बाधक बनते हैं भला .......
इस ब्लॉग पर कोशिश है कि मीडिया जगत की विचारोत्तेजक और नीतिगत चीजों को प्रेषित और पोस्ट किया जाए। मीडिया के अंतर्विरोधों पर आपके भी विचार आमंत्रित हैं।
सोमवार, 20 अप्रैल 2009
गुरुवार, 2 अप्रैल 2009
पुस्तक समीक्षा
इतिहास और निजता का संसार
उमेश चतुर्वेदी
इंटरनेट ने चिट्ठियों के संसार पर विराम लगा दिया..रही-सही कसर फोन और मोबाइल फोन ने पूरी कर दी। किसी का हालचाल जानना है तो पंडोरा बॉक्स काफी है। बीएसएनएल की मोबाइल फोन सेवा का उद्घाटन करते वक्त तब के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने मोबाइल फोन को पंडोरा बॉक्स ही कहा था। पंडोरा बॉक्स के इस चलन के दौर ने निजी अनुभवों...सामयिक पीड़ाओं, राजनीतिक - सामाजिक चिंताओं और अपने उछाह-प्यार को दर्ज कराने का सबसे बड़ा माध्यम रही चिट्ठियों के अस्तित्व पर ही जैसे सवाल उठा दिया है। मोबाइल और इंटरनेट के दौर में हम क्या और कितना कुछ खो रहे हैं – इसका आभास तब हुआ, जब मशहूर कथाकार और ललित निबंधकार विवेकी राय की पुस्तक पत्रों की छांव में से साबका पड़ा। इस किताब में विवेकी राय को लिखे 111 चिट्ठियां तो शामिल हैं। जिन्हें अमृतलाल नागर, रामधारी सिंह दिनकर, भगवत शरण उपाध्याय, धर्मवीर भारती, कुबेरनाथ राय सरीखे नामी और महत्वपूर्ण साहित्यकारों के साथ ही नामी गिरामी हस्तियों ने लिखा है। इसी तरह विवेकी राय के लिखे 29 पत्र भी इस किताब में शामिल हैं।
कम्युनिज्म में भले ही ये मान्यता रही हो कि डीक्लास होने की प्रक्रिया सिर्फ उसके यहां ही है। लेकिन 1978 में विवेकी राय को लिखे एक पत्र में अमृतलाल नागर सरीखा व्यक्ति बताता है कि डीक्लास होने की प्रक्रिया केवल साम्यवादी ही नहीं है – अध्यात्मवादी भीहै तो हैरत होती है। इसी चिट्ठी में अपने उपन्यास मानस का हंस में बुंदेली और अवधी शब्दों को शामिल करने और उन्हें नेचुरल पुट देने की प्रक्रिया भी समझाई है। अपने इस प्रयोग को सही साबित करने के लिए वे कहते हैं कि लेखकों को अपने प्रयोग करते समय किसी हद तक अपने पाठकों का ध्यान रखना चाहिए।
विवेकी राय को लिखी एक और चिट्ठी की ओर भी किताब के सुधी पाठक का ध्यान जाना स्वाभाविक है। इसमें दिनकर की भी एक चिट्ठी है – जिसमें उन्होंने अपनी मशहूर कविता दिल्ली की रचनाप्रक्रिया पर रोशनी डाली है। दिनकर लिखते हैं - “ आपने दिल्ली कविता में जोश का जो उतार देखा है। वह उतार नहीं...चढ़ाव का दृष्टांत है। सुबह के समय फूल पर शबनम होती है, मगर दोपहरी के फूल पर तो शबनम होती ही नहीं।”
विवेकी राय की चिट्ठियों को पढ़ते हुए आपको अनामदास का पोथा में उपसंहार को जल्दीबाजी में लिखने की प्रक्रिया पर हजारी प्रसाद द्विवेदी का स्वीकृतिबोध भी मिल सकता है। ऐसे न जाने कितने दृष्टांत हैं – जो इस पूरी पुस्तक में बिखरे पड़े हैं। यही इस पुस्तक की उपलब्धि है।
हालांकि इस किताब में ढेरों निजी चिट्ठियां भी शामिल हैं। जिनमें उनकी माता जबिति देवी की गंगोत्री यात्रा का जिक्र है। तो कई मित्रों के उलाहने और मजाक भी हैं। कई अति निजी चिट्ठियां भी इस किताब में शामिल हैं। ऐसी ही एक चिट्ठी की कुछ पंक्तियों को यहां शामिल करने का लोभ संवरण करना आसान नहीं है। ये चिट्ठी है उतराखंड शोध संस्थान के पूर्व निदेशक गिरिराज शाह की – जो उन्होंने नैनीताल से 2003 में लिखी थी। गिरिराज शाह लिखते हैं – कभी सोचता हूं, यदि साहित्य साधना के स्थान पर क्रिकेट साधना या अभिनय साधना अथवा नेतागिरी की होती तो शायद सम्मान, संपदा और सुख (राजतिलक) मिलता जैसे अमिताभ बच्चन, लालू, मायावती, मुलायम और जयललिता तथा मदनलाल खुराना ‘खुरोट’ को मिल रहा है। टीवी और मीडिया में नित्य तस्वीर छपती और हिंदुस्तान के सौ करोड़ में से 99 करोड़ 99 लाख मूर्ख तालियां बजाते और चर्चा करते।
कुल मिलाकर ये पुस्तक सन 1940 के दशक से लेकर मौजूदा दौर के साहित्यिक और राजनीतिक इतिहास और कई मशहूर पुस्तकों की रचनाप्रक्रियाओं को जानने – समझने का अच्छा माध्यम बन पड़ी है।
पुस्तक – पत्रों की छांव में
लेखक – विवेकी राय
प्रकाशक – स्वामी सहजानंद सरस्वती स्मृतिकेंद्र
बड़ी बाग, गाज़ीपुर
मूल्य – 150 रूपए
उमेश चतुर्वेदी
इंटरनेट ने चिट्ठियों के संसार पर विराम लगा दिया..रही-सही कसर फोन और मोबाइल फोन ने पूरी कर दी। किसी का हालचाल जानना है तो पंडोरा बॉक्स काफी है। बीएसएनएल की मोबाइल फोन सेवा का उद्घाटन करते वक्त तब के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने मोबाइल फोन को पंडोरा बॉक्स ही कहा था। पंडोरा बॉक्स के इस चलन के दौर ने निजी अनुभवों...सामयिक पीड़ाओं, राजनीतिक - सामाजिक चिंताओं और अपने उछाह-प्यार को दर्ज कराने का सबसे बड़ा माध्यम रही चिट्ठियों के अस्तित्व पर ही जैसे सवाल उठा दिया है। मोबाइल और इंटरनेट के दौर में हम क्या और कितना कुछ खो रहे हैं – इसका आभास तब हुआ, जब मशहूर कथाकार और ललित निबंधकार विवेकी राय की पुस्तक पत्रों की छांव में से साबका पड़ा। इस किताब में विवेकी राय को लिखे 111 चिट्ठियां तो शामिल हैं। जिन्हें अमृतलाल नागर, रामधारी सिंह दिनकर, भगवत शरण उपाध्याय, धर्मवीर भारती, कुबेरनाथ राय सरीखे नामी और महत्वपूर्ण साहित्यकारों के साथ ही नामी गिरामी हस्तियों ने लिखा है। इसी तरह विवेकी राय के लिखे 29 पत्र भी इस किताब में शामिल हैं।
कम्युनिज्म में भले ही ये मान्यता रही हो कि डीक्लास होने की प्रक्रिया सिर्फ उसके यहां ही है। लेकिन 1978 में विवेकी राय को लिखे एक पत्र में अमृतलाल नागर सरीखा व्यक्ति बताता है कि डीक्लास होने की प्रक्रिया केवल साम्यवादी ही नहीं है – अध्यात्मवादी भीहै तो हैरत होती है। इसी चिट्ठी में अपने उपन्यास मानस का हंस में बुंदेली और अवधी शब्दों को शामिल करने और उन्हें नेचुरल पुट देने की प्रक्रिया भी समझाई है। अपने इस प्रयोग को सही साबित करने के लिए वे कहते हैं कि लेखकों को अपने प्रयोग करते समय किसी हद तक अपने पाठकों का ध्यान रखना चाहिए।
विवेकी राय को लिखी एक और चिट्ठी की ओर भी किताब के सुधी पाठक का ध्यान जाना स्वाभाविक है। इसमें दिनकर की भी एक चिट्ठी है – जिसमें उन्होंने अपनी मशहूर कविता दिल्ली की रचनाप्रक्रिया पर रोशनी डाली है। दिनकर लिखते हैं - “ आपने दिल्ली कविता में जोश का जो उतार देखा है। वह उतार नहीं...चढ़ाव का दृष्टांत है। सुबह के समय फूल पर शबनम होती है, मगर दोपहरी के फूल पर तो शबनम होती ही नहीं।”
विवेकी राय की चिट्ठियों को पढ़ते हुए आपको अनामदास का पोथा में उपसंहार को जल्दीबाजी में लिखने की प्रक्रिया पर हजारी प्रसाद द्विवेदी का स्वीकृतिबोध भी मिल सकता है। ऐसे न जाने कितने दृष्टांत हैं – जो इस पूरी पुस्तक में बिखरे पड़े हैं। यही इस पुस्तक की उपलब्धि है।
हालांकि इस किताब में ढेरों निजी चिट्ठियां भी शामिल हैं। जिनमें उनकी माता जबिति देवी की गंगोत्री यात्रा का जिक्र है। तो कई मित्रों के उलाहने और मजाक भी हैं। कई अति निजी चिट्ठियां भी इस किताब में शामिल हैं। ऐसी ही एक चिट्ठी की कुछ पंक्तियों को यहां शामिल करने का लोभ संवरण करना आसान नहीं है। ये चिट्ठी है उतराखंड शोध संस्थान के पूर्व निदेशक गिरिराज शाह की – जो उन्होंने नैनीताल से 2003 में लिखी थी। गिरिराज शाह लिखते हैं – कभी सोचता हूं, यदि साहित्य साधना के स्थान पर क्रिकेट साधना या अभिनय साधना अथवा नेतागिरी की होती तो शायद सम्मान, संपदा और सुख (राजतिलक) मिलता जैसे अमिताभ बच्चन, लालू, मायावती, मुलायम और जयललिता तथा मदनलाल खुराना ‘खुरोट’ को मिल रहा है। टीवी और मीडिया में नित्य तस्वीर छपती और हिंदुस्तान के सौ करोड़ में से 99 करोड़ 99 लाख मूर्ख तालियां बजाते और चर्चा करते।
कुल मिलाकर ये पुस्तक सन 1940 के दशक से लेकर मौजूदा दौर के साहित्यिक और राजनीतिक इतिहास और कई मशहूर पुस्तकों की रचनाप्रक्रियाओं को जानने – समझने का अच्छा माध्यम बन पड़ी है।
पुस्तक – पत्रों की छांव में
लेखक – विवेकी राय
प्रकाशक – स्वामी सहजानंद सरस्वती स्मृतिकेंद्र
बड़ी बाग, गाज़ीपुर
मूल्य – 150 रूपए
मंगलवार, 24 मार्च 2009
किस करवट बैठेगी ब्लॉगिंग की दुनिया !
उमेश चतुर्वेदी
ब्लॉगिंग पर सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले ने ब्लॉगरों के मीडिया के सबसे शिशु माध्यम और उसके कर्ताधर्ताओं के सामने धर्मसंकट खड़ा कर दिया है। अपनी भड़ास निकालने का अब तक अहम जरिया माने जाते रहे ब्लॉगिंग की दुनिया सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से कितना मर्यादित होगी या उस पर बंदिशों का दौर शुरू हो सकता है - सबसे बड़ा सवाल ये उठ खड़ा हुआ है। चूंकि ये फैसला सुप्रीम कोर्ट की ओर से आया है, लिहाजा इस पर सवाल नहीं उठ रहे हैं।
इस लेख का मकसद इस फैसले की मीमांसा करना नहीं है - लेकिन इसके बहाने उठ रहे कुछ सवालों से दो-चार होना जरूर है। इन सवालों से रूबरू होने से पहले हमें आज के दौर के मीडिया की कार्यशैली और उन पर निगाह डाल लेनी चाहिए। उदारीकरण की भले ही हवा निकलती नजर आ रही है – लेकिन ये भी सच है कि आज मीडिया के सभी प्रमुख माध्यम – अखबार, टीवी और रेडियो बाजार की संस्कृति में पूरी तरह ढल चुके हैं। बाजार के दबाव में रणनीति के तहत सिर्फ आर्थिक मुनाफे के लिए पत्रकारिता को आज सुसभ्य और सुसंस्कृत भाषा में कारपोरेटीकरण कहा जा रहा है। यानी कारपोरेट शब्द ने बाजारीकरण के दबावों के बीच किए जा रहे कामों को एक वैधानिक दर्जा दे दिया है। जाहिर है – इस संस्कृति में उतना ही सच, आम लोगों के उतने ही दर्द और परेशानियां सामने आ पाती हैं, जितना बाजार चाहता है। भारत में दो घटनाओं को इससे बखूबी समझा जा सकता है। राजधानी दिल्ली से सटे नोएडा के निठारी से लगातार बच्चे गायब होते रहे – लेकिन कारपोरेट मीडिया के लिए ये बड़ी खबर नहीं बने। लेकिन उसी नोएडा के एक पॉश इलाके से नवंबर 2006 में एक बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी एडॉबी इंडिया के सीईओ नरेश गुप्ता के बच्चे अंकित का अपहरण कर लिया गया तो ये मीडिया के लिए सबसे बड़ी खबर बन गई। इसके ठीक दो साल बाद मुंबई में ताज होटल पर जब आतंकियों ने हमला कर दिया तो उस घटना के साथ भी मीडिया ने कुछ वैसा ही सलूक किया – जैसा अंकित गुप्ता अपहरण के साथ हुआ। जबकि ऐसी आतंकी घटनाएं उत्तर पूर्व और कश्मीर घाटी में रोज घट रही हैं। नक्सलियों के हाथों बीसियों लोग रोजाना मारे जा रहे हैं। लेकिन इन घटनाओं के साथ मीडिया उतना उतावलापन नहीं दिखाता – जितना अंकित अपहरण या ताज हमला जैसी घटनाओं को लेकर दिखाता रहा है।
मीडिया के ऐसे कारपोरेटाइजेशन के दौर में कुछ अरसा पहले ब्लॉगिंग नई हवा के झोंके के साथ आया और वर्चुअल दुनिया में छा गया। ब्लॉगिंग पर दरअसल वह दबाव नहीं रहा – जो कारपोरेट मीडिया पर बना रहता है। इसलिए ब्लॉगरों के लिए सच्चाई को सामने लाना आसान रहा। इसके चलते ब्लॉगिंग कितनी ताकतवर हो सकती है – इसका अंदाजा तकनीक और आधुनिकता की दुनिया के बादशाह अमेरिका में हाल के राष्ट्रपति चुनावों में देखा गया। ये सच है कि अमेरिकी लोगों को बराक हुसैन ओबामा का बदलावभरा नेतृत्व पसंद तो आया। लेकिन ये भी उतना ही सच है कि उन्हें लेकर लोगों का मानस सुदृढ़ बनाने में ब्लॉगरों की भूमिका बेहद अहम रही। अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों के बाद एक सर्वे एजेंसी ने अपनी एक रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट के मुताबिक तकरीबन साठ फीसदी अमेरिकी वोटरों को ओबामा के प्रति राय बनाने में ब्लॉगिंग ने अहम भूमिका निभाई। इस सर्वे एजेंसी के मुताबिक वोटरों का कहना था कि मीडिया के प्रमुख माध्यमों पर उनका भरोसा नहीं था, क्योंकि उन दिनों ये सारे प्रमुख माध्यम वही बोल रहे थे, जो ह्वाइट हाउस कह रहा था।
ब्लॉगरों की ताकत इराक और अफगानिस्तान में बुश के हमले की हकीकत दुनिया के सामने लाने में दिखी। आप याद कीजिए उस दौर को – तब इंबेडेड पत्रकारिता की बात जोरशोर से उछाली जा रही थी। क्या अमेरिकी – क्या भारतीय – दोनों मीडिया के दिग्गज इसकी वकालत कर रहे थे। जिन भारतीय अखबारों और चैनलों को अमेरिकी सेनाओं के साथ इंबेडेड होने का मौका मिल गया था – वे अपने को धन्य और इस व्यवस्था को बेहतर बताते नहीं थक रहे थे। सारा लब्बोलुआब ये कि इन हमलों को जायज ठहराने के लिए बुश प्रशासन और अमेरिकी सेना जो भी तर्क दे रही थी – दुनियाभर का कारपोरेट मीडिया इसे हाथोंहाथ ले रहा था। लेकिन अमेरिकी ब्लॉगरों ने हकीकत को बयान करके भूचाल ला दिया। ये ब्लॉगरों की ही देन थी कि बुश कटघरे में खड़े नजर आने लगे। उनकी लोकप्रियता का ग्राफ लगातार गिरता गया। और हालत ये हो गई कि 2008 आते –आते जार्ज बुश जूनियर अपने प्रत्याशी को जिताने के भी काबिल नहीं रहे।
भारत में ब्लॉगिंग की शुरूआत भले ही बेहतर लक्ष्यों को हासिल करने को लेकर ही हुई – लेकिन उतना ही सच ये भी है कि बाद में ये भड़ास निकालने का माध्यम बन गया। पिछले साल यानी 2008 की शुरुआत और 2007 के आखिरी दिनों में तो आपसी गालीगलौज का भी माध्यम बन गया। हिंदी के दो मशहूर ब्लॉगरों के बीच गालीगलौज आज तक लोगों को याद है। दो हजार छह के शुरूआती दिनों में तो दो-तीन ब्लॉग ऐसे थे – जिन पर पत्रकारिता जगत के बेडरूम की घटनाओं और रिश्तों को आंखोंदेखा हाल की तरह बताया जा रहा था। किस पत्रकार का किस महिला रिपोर्टर से संबंध है – ब्लॉगिंग का ये भी विषय था। जब इसका विरोध शुरू हुआ तो ये ब्लॉग ही खत्म कर दिए गए।
दरअसल कोई भी माध्यम जब शुरू होता है तो इसे लेकर पहले कौतूहल होता है। फिर उसके बेसिर-पैर वाले इस्तेमाल भी शुरू होते हैं। इस बीच गंभीर प्रयास भी जारी रहते हैं। नदी की धार की तरह माध्यम के विकास की धारा भी चलती रहती है और इसी धारा से तिनके वक्त के साथ दूर होते जाते हैं। हिंदी ब्लॉगिंग के साथ भी यही हो रहा है। आज भाषाओं को बचाने, देशज रूपों के बनाए रखने, स्थानीय संस्कृति की धार को बनाए रखने को लेकर ना जाने कितने ब्लॉग काम कर रहे हैं। तमाम ब्लॉग एग्रीगेटरों के मुताबिक हिंदी में ब्लॉगों की संख्या 10 हजार के आंकड़े को पार कर गई है। इनमें ऐसे भी ढेरों ब्लॉग हैं – जो राजनीतिक से लेकर सामाजिक रूढ़ियों पर चुभती हुई टिप्पणियां करते हैं।
जिस ब्लॉग पर टिप्पणियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला आया है – वह केरल के एक साइंस ग्रेजुएट अजीत का ब्लॉग है। उसने अपनी सोशल साइट पर शिवसेना के खिलाफ एक कम्युनिटी शुरू की थी। इसमें कई लोगों की पोस्ट, चर्चाएं और टिप्पणियां शामिल थीं। इसमें शिवसेना को धर्म के आधार पर देश बांटने वाला बताया गया था। जिसकी शिवसेना ने महाराष्ट्र हाईकोर्ट में शिकायत की थी। जिसके बाद हाईकोर्ट ने अजीत के खिलाफ नोटिस जारी किया था। अजीत ने सुप्रीम कोर्ट से शिकायत की कि ब्लॉग और सोशल साइट पर की गई टिप्पणी के लिए उसे जिम्मेदार ठहराया नहीं जा सकता। लेकिन चीफ जस्टिस के.जी.बालाकृष्णन और जस्टिस पी सतशिवम की पीठ ने कहा कि ब्लाग पर कमेंट भेजने वाला जिम्मेदार है,यह कहकर ब्लागर बच नहीं सकता है। यानी किसी मुद्दे पर ब्लाग शुरू करके दूसरों को उस पर मनचाहे और अनाप-शनाप कमेंट पोस्ट करने के लिए बुलाना अब खतरनाक है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से अनापशनाप लेखन पर रोक तो लगेगी। लेकिन असल सवाल दूसरा है। राजनीति विज्ञान और कानून की किताबों में कानून के तीन स्रोत बताए गए हैं। पहला – संसद या विधानमंडल, दूसरा सुप्रीम कोर्ट के फैसले और तीसरा परंपरा। ये सच है कि जिस तरह ब्लॉगिंग की दुनिया में सरकारी और सियासी उलटबांसियों के परखच्चे उड़ाए जा रहे हैं। उससे सरकार खुश नहीं है। वह ब्लॉगिंग को मर्यादित करने के नाम पर इस पर रोक लगाने का मन काफी पहले से बना चुकी है। सूचना और प्रसारण मंत्रालय के गलियारों से रह-रहकर छन-छन कर आ रही जानकारियों से साफ है कि सरकार की मंशा क्या है। कहना ना होगा कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से सरकार को अपनी मुखालफत कर रही वर्चुअल दुनिया की इन आवाजों को बंद करने का अच्छा बहाना मिल जाएगा। जिसका इस्तेमाल वह देर-सवेर करेगी ही।
मुंबई हमले के दौरान टेलीविजन पर आतंकवादी के फोनो ने पहले से खार खाए बैठी सरकार को अच्छा मौका दे दिया। टेलीविजन चैनलों पर लगाम लगाने के लिए उसने केबल और टेलीविजन नेटवर्क कानून 1995 में नौ संशोधन करने का मन बना चुकी थी। लेकिन टेलीविजन की दुनिया इसके खिलाफ उठ खड़ी हुई तो सरकार को बदलना पड़ा। लेकिन हैरत ये है कि ब्लॉगरों के लिए अभी तक कोई ऐसा प्रयास होता नहीं दिख रहा।
ब्लॉगिंग पर सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले ने ब्लॉगरों के मीडिया के सबसे शिशु माध्यम और उसके कर्ताधर्ताओं के सामने धर्मसंकट खड़ा कर दिया है। अपनी भड़ास निकालने का अब तक अहम जरिया माने जाते रहे ब्लॉगिंग की दुनिया सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से कितना मर्यादित होगी या उस पर बंदिशों का दौर शुरू हो सकता है - सबसे बड़ा सवाल ये उठ खड़ा हुआ है। चूंकि ये फैसला सुप्रीम कोर्ट की ओर से आया है, लिहाजा इस पर सवाल नहीं उठ रहे हैं।
इस लेख का मकसद इस फैसले की मीमांसा करना नहीं है - लेकिन इसके बहाने उठ रहे कुछ सवालों से दो-चार होना जरूर है। इन सवालों से रूबरू होने से पहले हमें आज के दौर के मीडिया की कार्यशैली और उन पर निगाह डाल लेनी चाहिए। उदारीकरण की भले ही हवा निकलती नजर आ रही है – लेकिन ये भी सच है कि आज मीडिया के सभी प्रमुख माध्यम – अखबार, टीवी और रेडियो बाजार की संस्कृति में पूरी तरह ढल चुके हैं। बाजार के दबाव में रणनीति के तहत सिर्फ आर्थिक मुनाफे के लिए पत्रकारिता को आज सुसभ्य और सुसंस्कृत भाषा में कारपोरेटीकरण कहा जा रहा है। यानी कारपोरेट शब्द ने बाजारीकरण के दबावों के बीच किए जा रहे कामों को एक वैधानिक दर्जा दे दिया है। जाहिर है – इस संस्कृति में उतना ही सच, आम लोगों के उतने ही दर्द और परेशानियां सामने आ पाती हैं, जितना बाजार चाहता है। भारत में दो घटनाओं को इससे बखूबी समझा जा सकता है। राजधानी दिल्ली से सटे नोएडा के निठारी से लगातार बच्चे गायब होते रहे – लेकिन कारपोरेट मीडिया के लिए ये बड़ी खबर नहीं बने। लेकिन उसी नोएडा के एक पॉश इलाके से नवंबर 2006 में एक बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी एडॉबी इंडिया के सीईओ नरेश गुप्ता के बच्चे अंकित का अपहरण कर लिया गया तो ये मीडिया के लिए सबसे बड़ी खबर बन गई। इसके ठीक दो साल बाद मुंबई में ताज होटल पर जब आतंकियों ने हमला कर दिया तो उस घटना के साथ भी मीडिया ने कुछ वैसा ही सलूक किया – जैसा अंकित गुप्ता अपहरण के साथ हुआ। जबकि ऐसी आतंकी घटनाएं उत्तर पूर्व और कश्मीर घाटी में रोज घट रही हैं। नक्सलियों के हाथों बीसियों लोग रोजाना मारे जा रहे हैं। लेकिन इन घटनाओं के साथ मीडिया उतना उतावलापन नहीं दिखाता – जितना अंकित अपहरण या ताज हमला जैसी घटनाओं को लेकर दिखाता रहा है।
मीडिया के ऐसे कारपोरेटाइजेशन के दौर में कुछ अरसा पहले ब्लॉगिंग नई हवा के झोंके के साथ आया और वर्चुअल दुनिया में छा गया। ब्लॉगिंग पर दरअसल वह दबाव नहीं रहा – जो कारपोरेट मीडिया पर बना रहता है। इसलिए ब्लॉगरों के लिए सच्चाई को सामने लाना आसान रहा। इसके चलते ब्लॉगिंग कितनी ताकतवर हो सकती है – इसका अंदाजा तकनीक और आधुनिकता की दुनिया के बादशाह अमेरिका में हाल के राष्ट्रपति चुनावों में देखा गया। ये सच है कि अमेरिकी लोगों को बराक हुसैन ओबामा का बदलावभरा नेतृत्व पसंद तो आया। लेकिन ये भी उतना ही सच है कि उन्हें लेकर लोगों का मानस सुदृढ़ बनाने में ब्लॉगरों की भूमिका बेहद अहम रही। अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों के बाद एक सर्वे एजेंसी ने अपनी एक रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट के मुताबिक तकरीबन साठ फीसदी अमेरिकी वोटरों को ओबामा के प्रति राय बनाने में ब्लॉगिंग ने अहम भूमिका निभाई। इस सर्वे एजेंसी के मुताबिक वोटरों का कहना था कि मीडिया के प्रमुख माध्यमों पर उनका भरोसा नहीं था, क्योंकि उन दिनों ये सारे प्रमुख माध्यम वही बोल रहे थे, जो ह्वाइट हाउस कह रहा था।
ब्लॉगरों की ताकत इराक और अफगानिस्तान में बुश के हमले की हकीकत दुनिया के सामने लाने में दिखी। आप याद कीजिए उस दौर को – तब इंबेडेड पत्रकारिता की बात जोरशोर से उछाली जा रही थी। क्या अमेरिकी – क्या भारतीय – दोनों मीडिया के दिग्गज इसकी वकालत कर रहे थे। जिन भारतीय अखबारों और चैनलों को अमेरिकी सेनाओं के साथ इंबेडेड होने का मौका मिल गया था – वे अपने को धन्य और इस व्यवस्था को बेहतर बताते नहीं थक रहे थे। सारा लब्बोलुआब ये कि इन हमलों को जायज ठहराने के लिए बुश प्रशासन और अमेरिकी सेना जो भी तर्क दे रही थी – दुनियाभर का कारपोरेट मीडिया इसे हाथोंहाथ ले रहा था। लेकिन अमेरिकी ब्लॉगरों ने हकीकत को बयान करके भूचाल ला दिया। ये ब्लॉगरों की ही देन थी कि बुश कटघरे में खड़े नजर आने लगे। उनकी लोकप्रियता का ग्राफ लगातार गिरता गया। और हालत ये हो गई कि 2008 आते –आते जार्ज बुश जूनियर अपने प्रत्याशी को जिताने के भी काबिल नहीं रहे।
भारत में ब्लॉगिंग की शुरूआत भले ही बेहतर लक्ष्यों को हासिल करने को लेकर ही हुई – लेकिन उतना ही सच ये भी है कि बाद में ये भड़ास निकालने का माध्यम बन गया। पिछले साल यानी 2008 की शुरुआत और 2007 के आखिरी दिनों में तो आपसी गालीगलौज का भी माध्यम बन गया। हिंदी के दो मशहूर ब्लॉगरों के बीच गालीगलौज आज तक लोगों को याद है। दो हजार छह के शुरूआती दिनों में तो दो-तीन ब्लॉग ऐसे थे – जिन पर पत्रकारिता जगत के बेडरूम की घटनाओं और रिश्तों को आंखोंदेखा हाल की तरह बताया जा रहा था। किस पत्रकार का किस महिला रिपोर्टर से संबंध है – ब्लॉगिंग का ये भी विषय था। जब इसका विरोध शुरू हुआ तो ये ब्लॉग ही खत्म कर दिए गए।
दरअसल कोई भी माध्यम जब शुरू होता है तो इसे लेकर पहले कौतूहल होता है। फिर उसके बेसिर-पैर वाले इस्तेमाल भी शुरू होते हैं। इस बीच गंभीर प्रयास भी जारी रहते हैं। नदी की धार की तरह माध्यम के विकास की धारा भी चलती रहती है और इसी धारा से तिनके वक्त के साथ दूर होते जाते हैं। हिंदी ब्लॉगिंग के साथ भी यही हो रहा है। आज भाषाओं को बचाने, देशज रूपों के बनाए रखने, स्थानीय संस्कृति की धार को बनाए रखने को लेकर ना जाने कितने ब्लॉग काम कर रहे हैं। तमाम ब्लॉग एग्रीगेटरों के मुताबिक हिंदी में ब्लॉगों की संख्या 10 हजार के आंकड़े को पार कर गई है। इनमें ऐसे भी ढेरों ब्लॉग हैं – जो राजनीतिक से लेकर सामाजिक रूढ़ियों पर चुभती हुई टिप्पणियां करते हैं।
जिस ब्लॉग पर टिप्पणियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला आया है – वह केरल के एक साइंस ग्रेजुएट अजीत का ब्लॉग है। उसने अपनी सोशल साइट पर शिवसेना के खिलाफ एक कम्युनिटी शुरू की थी। इसमें कई लोगों की पोस्ट, चर्चाएं और टिप्पणियां शामिल थीं। इसमें शिवसेना को धर्म के आधार पर देश बांटने वाला बताया गया था। जिसकी शिवसेना ने महाराष्ट्र हाईकोर्ट में शिकायत की थी। जिसके बाद हाईकोर्ट ने अजीत के खिलाफ नोटिस जारी किया था। अजीत ने सुप्रीम कोर्ट से शिकायत की कि ब्लॉग और सोशल साइट पर की गई टिप्पणी के लिए उसे जिम्मेदार ठहराया नहीं जा सकता। लेकिन चीफ जस्टिस के.जी.बालाकृष्णन और जस्टिस पी सतशिवम की पीठ ने कहा कि ब्लाग पर कमेंट भेजने वाला जिम्मेदार है,यह कहकर ब्लागर बच नहीं सकता है। यानी किसी मुद्दे पर ब्लाग शुरू करके दूसरों को उस पर मनचाहे और अनाप-शनाप कमेंट पोस्ट करने के लिए बुलाना अब खतरनाक है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से अनापशनाप लेखन पर रोक तो लगेगी। लेकिन असल सवाल दूसरा है। राजनीति विज्ञान और कानून की किताबों में कानून के तीन स्रोत बताए गए हैं। पहला – संसद या विधानमंडल, दूसरा सुप्रीम कोर्ट के फैसले और तीसरा परंपरा। ये सच है कि जिस तरह ब्लॉगिंग की दुनिया में सरकारी और सियासी उलटबांसियों के परखच्चे उड़ाए जा रहे हैं। उससे सरकार खुश नहीं है। वह ब्लॉगिंग को मर्यादित करने के नाम पर इस पर रोक लगाने का मन काफी पहले से बना चुकी है। सूचना और प्रसारण मंत्रालय के गलियारों से रह-रहकर छन-छन कर आ रही जानकारियों से साफ है कि सरकार की मंशा क्या है। कहना ना होगा कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से सरकार को अपनी मुखालफत कर रही वर्चुअल दुनिया की इन आवाजों को बंद करने का अच्छा बहाना मिल जाएगा। जिसका इस्तेमाल वह देर-सवेर करेगी ही।
मुंबई हमले के दौरान टेलीविजन पर आतंकवादी के फोनो ने पहले से खार खाए बैठी सरकार को अच्छा मौका दे दिया। टेलीविजन चैनलों पर लगाम लगाने के लिए उसने केबल और टेलीविजन नेटवर्क कानून 1995 में नौ संशोधन करने का मन बना चुकी थी। लेकिन टेलीविजन की दुनिया इसके खिलाफ उठ खड़ी हुई तो सरकार को बदलना पड़ा। लेकिन हैरत ये है कि ब्लॉगरों के लिए अभी तक कोई ऐसा प्रयास होता नहीं दिख रहा।
शुक्रवार, 6 मार्च 2009
चुनावी माहौल का बदला-बदला नजारा

उमेश चतुर्वेदी
चुनाव कार्यक्रमों का ऐलान करके चुनाव आयोग रेफरी की तरह मैदान में उतर गया है। उसे इंतजार है नियत तारीख पर चुनावी अखाड़े में उतरने वाले राजनीतिक दलों का..जो अखाड़े के नियम कायदे का पालन करते हुए अपने प्रतिद्वंद्वियों को पटखनी दे सकें। चुनाव आयोग का ये इंतजार तो खत्म हो जाएगा, लेकिन राजनीतिक दलों को मतगणना से ठीक पहले सब्जबाग दिखाने वाले एक्जिट पोल करने वाली कंपनियों की हालत खराब है। चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के मुताबिक एक्जिट पोल पर रोक लगा दी है। इससे मीडिया के जरिए अपना बाजार चमकाने वाली उन कंपनियों की हालत खराब है- जिनका दावा रहता आया है कि वे सटीक एक्जिट पोल करती रही हैं। सही मायने में देखा जाय तो डिजिटल टेक्नॉलजी के विस्तार के दौर में ये पहला मौका होगा, जिसमें इंटरनेट, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और रेडियो...सभी अपनी-अपनी भूमिकाएं निभाएंगे, लेकिन नहीं होगा तो एक्जिट पोल का धमाल।
चुनाव आयोग के मुताबिक पांच दौर में चुनाव होने जा रहे हैं। तकरीबन एक महीने तक चलने वाले इस चुनावी महायज्ञ में पहली बार होगा कि हर मतदान के बाद एक्जिट पोल वाले चौंकाने वाले नतीजे राजनेताओं और वोटरों को परेशान नहीं करेंगे। एक्जिट पोल पर रोक की सबसे बड़ी वजह तो यही बताई गई है कि इससे बाद के दौर के वोटरों को रूझान पर असर पड़ता है। अगर राजनीतिक दल और मीडिया संस्थान ये मानते रहे हैं कि एक्जिट पोल बाद के दौर में असर डालता है तो जाहिर है कि सियासत के खिलाड़ी इसका अपने पक्ष में इस्तेमाल करने की कोशिश भी जरूर करते रहे होंगे। वैसे ऐसी खबरें आती भी रही हैं। इसका फायदा उठाने की कोशिश में चुनाव का मौसम आते ही कुकुरमुत्तों की तरह एक्जिट पोल और चुनाव सर्वे करने वाली कंपनियों की बाढ़ आती रही है। जब से चुनाव आयोग ने मतदान की तारीखों का ऐलान किया है – ऐसी कंपनियों की बाढ़ तो इस बार भी आ गई है। इसे देखना है तो आप सांसदों की कॉलोनियों नॉर्थ एवेन्यू और साउथ एवेन्यू में घूम आइए। वहां लकदक कपड़ों में अपने कथित सटीक चुनाव पूर्व सर्वे का दावा वाली चमकती फाइलें लिए एक्जीक्यूटिव और मार्केटिंग एजेंट घूमते नजर आ जाएंगे। टिकटों की चाहत में अपने राज्यों के दिल्ली स्थित भवनों में ठहरे नेताओं के यहां भी ऐसे लोगों की दस्तक बढ़ गई है। राजनेताओं से मिलते वक्त उनका एक ही दावा है कि उनका सर्वे का तरीका बेहद वैज्ञानिक है और वह तकरीबन सही और सटीक बैठता है।
चूंकि इस बार एक्जिट पोल नहीं होना है, अब चुनाव सर्वे की जरूरत भी नहीं रह गई है। लिहाजा वक्ती तौर के इन खिलाड़ियों ने नया तरीका अख्तियार कर लिया है। वे प्रत्याशियों और भावी उम्मीदवारों को समझाते फिर रहे हैं कि कौन सा मुद्दा उनके लिए क्लिक करेगा, वे उसकी पड़ताल करके आपको बताएंगे। यानी एक्जिट पोल करने वाले अब सलाहकार की भूमिका में नजर आ रहे हैं। बाजार में उनके खेल के लिए जगह नहीं बची तो उन्होंने अपनी भूमिका ही बदल डाली है या फिर बदलने की सोच रहे हैं। मजे की बात ये है कि ये खिलाड़ी एक सीट के सभी महत्वपूर्ण प्रत्याशियों या भावी उम्मीदवारों से मिल रहे हैं। यानी सबके लिए उनके पास ताबीज और टोटका है। यानी एक ही कंपनी का एक्जीक्यूटिव अगर कांग्रेस के प्रत्याशी से मिल रहा है तो उसके चुनावी क्षेत्र के लिए जरूरी और क्लिक करने वाले विषय और मुद्दे की तलाश का दावा कर रहा है और दिलचस्प बात ये है कि वही जब विपक्षी बीजेपी या किसी और दल के प्रत्याशी से मिल रहा है तो उसके योग्य मुद्दे खोजने की बात कर रहा है। इन कंपनियों का दावा है कि वे उम्मीदवार को फायदा पहुंचाने वाले मुद्दों को खोज कर उसके लायक मीडिया प्लानिंग बना और तैयार कर सकते हैं – जिसका फायदा उन्हें चुनावी मैदान में मिल सकता है।
तकनीक किस हद तक इस चुनाव में हंगामा बरपाने जा रहा है – इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अब तकरीबन हर प्रत्याशी को सीडी और डीवीडी बनवाने का सुझाव दिया जा रहा है। एक्जिट पोल करने का दावा करने वाली कुछ कंपनियां भी इस दौड़ में शामिल हो गई हैं। मजे की बात ये है कि इस दौड़ में उस बीजेपी के उम्मीदवार भी शामिल हैं – जिन्हें पिछला यानी 2004 का आम चुनाव हारने के पीछे तकनीक आधारित हाईटेक प्रचार को ही सबसे ज्यादा जिम्मेदार ठहराया गया था। बीजेपी के हाईटेक प्रचार की खिल्ली उड़ाने वाली कांग्रेस भी इस दौड़ में शामिल है। लेकिन इस बार बीजेपी भी उसका मजाक नहीं उड़ा रही है।
इस सबका असर मीडिया में भी नजर आ रहा है। अब चुनाव में कौन बाजी मारेगा – इसे लेकर अभी चर्चा नहीं हो रही। चुनाव प्रचार अपने चरम पर पहुंचेगा तो शायद ये चर्चा भी जोर पकड़े। लेकिन फिलहाल मीडिया भी खामोश है और कहना ना होगा कि इसमें चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों के प्रकाशन और प्रसारण पर लगी रोक की अहम भूमिका है। वोटर तो बेचारा पहले की ही तरह खामोश है। उसे बस इंतजार है उस दिन का- जब वह अपनी बदहाली दूर करने का दावा करने और बेहतर भविष्य का सपना दिखाने वाले नेताजी के पक्ष में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का बटन दबाएगा। ये बात और है कि हर बार की तरह उसका सपना हकीकत की जमीं पर कम ही उतर पाएगा।
गुरुवार, 26 फ़रवरी 2009
सियासी मैदान में इंटरनेट की दस्तक
उमेश चतुर्वेदी
अमेरिका में हाल ही में हुए राष्ट्रपति चुनाव और भारत में होने जा रहे आम चुनाव में मंदी की छाया के अलावा और कोई समानता है तो वह है इंटरनेट का इस्तेमाल। 1969 में इंटरनेट के जन्म के बाद ये पहला मौका है – जब भारतीय चुनावों में इंटरनेट का जोरदार इस्तेमाल होने की उम्मीद जताई जा रही है। अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के दोनों उम्मीदवारों ने मतदाताओं को लुभाने के लिए इंटरनेट का जमकर इस्तेमाल किया। लेकिन इसका ये भी मतलब नहीं कि अखबारों और टेलीविजन या फिर खबरिया वेबसाइटों ने अमेरिका में ओबामा के पक्ष में माहौल बनाने में कोई मदद नहीं की। अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के बाद वहां हुए एक सर्वेक्षण में साठ फीसदी लोगों का कहना था कि ओबामा के पक्ष या कहें कि बुश के खिलाफ उनका नजरिया विकसित करने में ब्लॉगिंग और ब्लॉगरों ने बड़ी भूमिका निभाई।
आप याद करिए सन 2000 और उसके बाद का माहौल...उस समय आईटी को लेकर दो राज्यों के नजरिए में कितना अंतर था। एक तरफ आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू थे, जिन्होंने हैदराबाद में सॉफ्टवेयर उद्योग को इतना आगे बढ़ाया कि उसे लोग साइबराबाद के तौर पर जानने लगे। जिलों को वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए जोड़ने वाले पहले मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ही थे। उन्हीं दिनों बिहार में राज चला रहे आरजेडी अध्यक्ष लालू यादव इंटरनेट और सॉफ्टवेयर उद्योग का मजाक उड़ाते फिर रहे थे – ये आईटी- फाईटी क्या होता है। उन्हीं दिनों आंध्र में किसान आत्महत्याएं कर रहे थे। तब लालू के इस जुमले के जरिए एन चंद्रबाबू नायडू की जमकर आलोचना हो रही थी। 2004 के आम चुनावों में नायडू पर सॉफ्टवेयर उद्योग का विकास एक आरोप की तरह चस्पा करने में उनके विरोधी पीछे नहीं रहे। जिसका खामियाजा नायडू को सत्ता से बाहर होकर चुकाना पड़ा। लेकिन पांच साल में ही पूरा नजारा बदल गया है। आईटी-फाईटी कह कर इंटरनेट और कंप्यूटर की वर्चुअल दुनिया का मजाक उड़ाने वाले लालू यादव खुद ब्लॉगर हो गए हैं। ब्लॉग पर व्यक्त उनके विचार वैसे ही खबर बन रहे हैं – जैसे उनके बयान बनते रहे हैं। जो शख्स कभी इंटरनेट की वर्चुअल दुनिया का मजाक उड़ाते नहीं थकता था – उसमें तकनीक और वर्चुअल दुनिया को लेकर ये बदलाव कम बड़ी बात नहीं है। गांव-गिरांव और गरीब-गुरबे की बात करने वाले राजनेताओं में आखिर ये बदलाव क्यों आया है। इसका सबसे बेहतरीन जवाब खुद राजनेता ही दे रहे हैं। हाल ही में फिक्की के एक कार्यक्रम में एनडीए की ओर से प्रधानमंत्री पद के घोषित उम्मीदवार लालकृष्ण आडवाणी ने कहा कि पहिया की खोज के बाद अब तक की सबसे बडी खोज इंटरनेट ही है। जिसने पूरी दुनिया को ही बदल दिया है।
इंटरनेट को आमतौर पर नौजवानों का माध्यम माना जाता है। लेकिन हकीकत ये है कि नौजवानों का ये माध्यम बूढ़े राजनेताओं तक को भी भा रहा है। लालकृष्ण आडवाणी अब खुद अपनी वेबसाइट के जरिए नौजवानों से मुखातिब हैं। उनके लेफ्टिनेंट शाहनवाज हुसैन भी अपनी अलग वेबसाइट लेकर वर्चुअल दुनिया में नौजवानों को रिझाने निकल पड़े हैं। कांग्रेस के राहुल बाबा भी नौजवानों को रिझा रहे हैं। हालांकि उन्होंने मीडिया के सभी माध्यमों के जरिए नौजवानों को लुभाने का अभियान छेड़ रखा है। जाहिर है, इसमें इंटरनेट भी है। लेकिन सबसे बड़ी बात ये कि उनकी अभी तक स्वतंत्र वेबसाइट नहीं है। बल्कि कांग्रेस पार्टी की वेबसाइट के ही जरिए वे लोगों से मुखातिब हैं। वैसे आज इक्का-दुक्का पार्टियां ही हैं, जिनकी अपनी कोई वेबसाइट नहीं है। समाजवादी विचारधारा वाली समाजवादी पार्टी भी इंटरनेट की वर्चुअल दुनिया में मौजूद है। दलितों का उद्धार करने का दावा करने वाली बहुजन समाज पार्टी की भी अपनी वेबसाइट है। हां, बिहार में राज चला रहे जनता दल की साइट अभी नहीं दिखी है। लेकिन एक बात जरूर है कि अब राजनेता अपने बयानों और विचारों को इंटरनेट की वर्चुअल दुनिया में पेश करने और दिखाने के लिए सचेत हो रहे हैं।
आखिर क्या वजह है कि अब तक गली – कूचों से लेकर गांव-कस्बे के मैदानों में तकरीर करने वाले राजनेताओं को इंटरनेट की दुनिया लुभाने लगी है। इसका जवाब है हाल ही में सुधारी गई मतदाता सूचियां। 2004 के मुकाबले इस बार के आम चुनाव के लिए करीब 14 करोड़ नए मतदाता जुटे हैं। जाहिर है, इनमें से ज्यादातर ने हाल ही में 18 साल की उम्र सीमा पार की है। एक अनुमान के मुताबिक इनमें से करीब आठ करोड़ ऐसे हैं – जो यदा-कदा इंटरनेट की दुनिया में भ्रमण के लिए जाते रहते हैं। असल बात ये है कि इन्हीं वोटरों पर हमारे राजनेताओं की निगाह है। कहा जाता है कि 1989 के आम चुनाव में राजीव गांधी की अगुआई वाली कांग्रेस को हराने में नौजवानो मतदाताओं ने ही अहम भूमिका निभाई थी। लिहाजा इस बार कोई खतरा उठाने को तैयार नहीं है।
इसकी तस्दीक इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया की 28 जनवरी 2009 को जारी रिपोर्ट भी करती है। इस रिपोर्ट के मुताबिक देश में तकरीबन चार करोड़ तिरपन लाख लोग तकरीबन रोजाना इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं। वैसे एसोसिएशन की इस रिपोर्ट के मुताबिक देश में करीब सवा छह करोड़ नियमित इंटरनेट यूजर हैं। एसोसिएशन का मानना है कि देश के सभी 614 जिलों में तकरीबन पचास साइबर कैफे तो हैं हीं। ये सच भी है। हो सकता है किसी जिले में तीस साइबर कैफे हैं तो किसी में सत्तर। जहां बिजली की सुविधा कमजोर है, वहां सर्फिंग दिल्ली-मुंबई जैसी जगहों से महंगी जरूर है। लेकिन ये भी सच है कि इन इंटरनेट यूजरों में सबसे ज्यादा संख्या युवाओं की ही है। एसोसिएशन के आंकड़ों पर गौर करें तो इसमें हर साल करीब 13 फीसदी की बढ़ोत्तरी ही देखी जा रही है। अगर इंटरनेट के लिए जरूरी बुनियादी चीज बिजली की आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके तो ये वृद्धि दर और तेज हो सकती है।
इन आंकड़ों की हकीकत सामने आने के बाद कौन ऐसा राजनेता होगा – जो अपने नौजवान वोटरों को रिझाना नहीं चाहेगा। यही वजह है कि इस बार के आम चुनाव में इंटरनेट का पहली बार जमकर इस्तेमाल होने जा रहा है। वैसे ये भी सच है कि नौजवान वोटर उस तरह किसी चुनाव क्षेत्र में संगठित या समूह में नहीं हैं। क्योंकि शहरी इलाकों में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले वोटर ज्यादा हैं तो ग्रामीण इलाके में ऐसे वोटर कम हैं। क्योंकि तमाम सियासी दबावों के बावजूद अभी देश के करीब तीस फीसदी गांवों में या तो बिजली पहुंची ही नहीं या फिर आंशिक तौर पर पहुंची है। लेकिन जिस तरह मोबाइल कंपनियों ने मोबाइल फोन पर ही इंटरनेट की सुविधा देनी शुरू की है – उससे साफ है कि अगले आम चुनावों तक शायद ही कोई नौजवान होगा – जो इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं कर रहा होगा। तकनीक की दुनिया में लगातार आ रहे बदलावों के चलते ऐसा होना ही है। तब ये भी सच है कि अगले आम चुनाव में वोटरों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल कुछ वैसे ही होगा – जैसा आज अमेरिका या ब्रिटेन सरीखे विकसित देशों में हो रहा है। लेकिन इसका ये भी मतलब नहीं कि गली-कूचों और कस्बे – हाट के मैदानों में अपनी बात पहुंचाने की पारंपरिक अवधारणा भी बीते दिनों की बात हो जाएगी। विविधरंगी भारत के गांव को परंपरा में बंधे रहने का अपना देसज रूप कम नहीं लुभाता और इस उम्मीद के दम तोड़ने का कोई कारण नजर भी नहीं आता।
अमेरिका में हाल ही में हुए राष्ट्रपति चुनाव और भारत में होने जा रहे आम चुनाव में मंदी की छाया के अलावा और कोई समानता है तो वह है इंटरनेट का इस्तेमाल। 1969 में इंटरनेट के जन्म के बाद ये पहला मौका है – जब भारतीय चुनावों में इंटरनेट का जोरदार इस्तेमाल होने की उम्मीद जताई जा रही है। अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के दोनों उम्मीदवारों ने मतदाताओं को लुभाने के लिए इंटरनेट का जमकर इस्तेमाल किया। लेकिन इसका ये भी मतलब नहीं कि अखबारों और टेलीविजन या फिर खबरिया वेबसाइटों ने अमेरिका में ओबामा के पक्ष में माहौल बनाने में कोई मदद नहीं की। अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के बाद वहां हुए एक सर्वेक्षण में साठ फीसदी लोगों का कहना था कि ओबामा के पक्ष या कहें कि बुश के खिलाफ उनका नजरिया विकसित करने में ब्लॉगिंग और ब्लॉगरों ने बड़ी भूमिका निभाई।
आप याद करिए सन 2000 और उसके बाद का माहौल...उस समय आईटी को लेकर दो राज्यों के नजरिए में कितना अंतर था। एक तरफ आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू थे, जिन्होंने हैदराबाद में सॉफ्टवेयर उद्योग को इतना आगे बढ़ाया कि उसे लोग साइबराबाद के तौर पर जानने लगे। जिलों को वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए जोड़ने वाले पहले मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू ही थे। उन्हीं दिनों बिहार में राज चला रहे आरजेडी अध्यक्ष लालू यादव इंटरनेट और सॉफ्टवेयर उद्योग का मजाक उड़ाते फिर रहे थे – ये आईटी- फाईटी क्या होता है। उन्हीं दिनों आंध्र में किसान आत्महत्याएं कर रहे थे। तब लालू के इस जुमले के जरिए एन चंद्रबाबू नायडू की जमकर आलोचना हो रही थी। 2004 के आम चुनावों में नायडू पर सॉफ्टवेयर उद्योग का विकास एक आरोप की तरह चस्पा करने में उनके विरोधी पीछे नहीं रहे। जिसका खामियाजा नायडू को सत्ता से बाहर होकर चुकाना पड़ा। लेकिन पांच साल में ही पूरा नजारा बदल गया है। आईटी-फाईटी कह कर इंटरनेट और कंप्यूटर की वर्चुअल दुनिया का मजाक उड़ाने वाले लालू यादव खुद ब्लॉगर हो गए हैं। ब्लॉग पर व्यक्त उनके विचार वैसे ही खबर बन रहे हैं – जैसे उनके बयान बनते रहे हैं। जो शख्स कभी इंटरनेट की वर्चुअल दुनिया का मजाक उड़ाते नहीं थकता था – उसमें तकनीक और वर्चुअल दुनिया को लेकर ये बदलाव कम बड़ी बात नहीं है। गांव-गिरांव और गरीब-गुरबे की बात करने वाले राजनेताओं में आखिर ये बदलाव क्यों आया है। इसका सबसे बेहतरीन जवाब खुद राजनेता ही दे रहे हैं। हाल ही में फिक्की के एक कार्यक्रम में एनडीए की ओर से प्रधानमंत्री पद के घोषित उम्मीदवार लालकृष्ण आडवाणी ने कहा कि पहिया की खोज के बाद अब तक की सबसे बडी खोज इंटरनेट ही है। जिसने पूरी दुनिया को ही बदल दिया है।
इंटरनेट को आमतौर पर नौजवानों का माध्यम माना जाता है। लेकिन हकीकत ये है कि नौजवानों का ये माध्यम बूढ़े राजनेताओं तक को भी भा रहा है। लालकृष्ण आडवाणी अब खुद अपनी वेबसाइट के जरिए नौजवानों से मुखातिब हैं। उनके लेफ्टिनेंट शाहनवाज हुसैन भी अपनी अलग वेबसाइट लेकर वर्चुअल दुनिया में नौजवानों को रिझाने निकल पड़े हैं। कांग्रेस के राहुल बाबा भी नौजवानों को रिझा रहे हैं। हालांकि उन्होंने मीडिया के सभी माध्यमों के जरिए नौजवानों को लुभाने का अभियान छेड़ रखा है। जाहिर है, इसमें इंटरनेट भी है। लेकिन सबसे बड़ी बात ये कि उनकी अभी तक स्वतंत्र वेबसाइट नहीं है। बल्कि कांग्रेस पार्टी की वेबसाइट के ही जरिए वे लोगों से मुखातिब हैं। वैसे आज इक्का-दुक्का पार्टियां ही हैं, जिनकी अपनी कोई वेबसाइट नहीं है। समाजवादी विचारधारा वाली समाजवादी पार्टी भी इंटरनेट की वर्चुअल दुनिया में मौजूद है। दलितों का उद्धार करने का दावा करने वाली बहुजन समाज पार्टी की भी अपनी वेबसाइट है। हां, बिहार में राज चला रहे जनता दल की साइट अभी नहीं दिखी है। लेकिन एक बात जरूर है कि अब राजनेता अपने बयानों और विचारों को इंटरनेट की वर्चुअल दुनिया में पेश करने और दिखाने के लिए सचेत हो रहे हैं।
आखिर क्या वजह है कि अब तक गली – कूचों से लेकर गांव-कस्बे के मैदानों में तकरीर करने वाले राजनेताओं को इंटरनेट की दुनिया लुभाने लगी है। इसका जवाब है हाल ही में सुधारी गई मतदाता सूचियां। 2004 के मुकाबले इस बार के आम चुनाव के लिए करीब 14 करोड़ नए मतदाता जुटे हैं। जाहिर है, इनमें से ज्यादातर ने हाल ही में 18 साल की उम्र सीमा पार की है। एक अनुमान के मुताबिक इनमें से करीब आठ करोड़ ऐसे हैं – जो यदा-कदा इंटरनेट की दुनिया में भ्रमण के लिए जाते रहते हैं। असल बात ये है कि इन्हीं वोटरों पर हमारे राजनेताओं की निगाह है। कहा जाता है कि 1989 के आम चुनाव में राजीव गांधी की अगुआई वाली कांग्रेस को हराने में नौजवानो मतदाताओं ने ही अहम भूमिका निभाई थी। लिहाजा इस बार कोई खतरा उठाने को तैयार नहीं है।
इसकी तस्दीक इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया की 28 जनवरी 2009 को जारी रिपोर्ट भी करती है। इस रिपोर्ट के मुताबिक देश में तकरीबन चार करोड़ तिरपन लाख लोग तकरीबन रोजाना इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं। वैसे एसोसिएशन की इस रिपोर्ट के मुताबिक देश में करीब सवा छह करोड़ नियमित इंटरनेट यूजर हैं। एसोसिएशन का मानना है कि देश के सभी 614 जिलों में तकरीबन पचास साइबर कैफे तो हैं हीं। ये सच भी है। हो सकता है किसी जिले में तीस साइबर कैफे हैं तो किसी में सत्तर। जहां बिजली की सुविधा कमजोर है, वहां सर्फिंग दिल्ली-मुंबई जैसी जगहों से महंगी जरूर है। लेकिन ये भी सच है कि इन इंटरनेट यूजरों में सबसे ज्यादा संख्या युवाओं की ही है। एसोसिएशन के आंकड़ों पर गौर करें तो इसमें हर साल करीब 13 फीसदी की बढ़ोत्तरी ही देखी जा रही है। अगर इंटरनेट के लिए जरूरी बुनियादी चीज बिजली की आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके तो ये वृद्धि दर और तेज हो सकती है।
इन आंकड़ों की हकीकत सामने आने के बाद कौन ऐसा राजनेता होगा – जो अपने नौजवान वोटरों को रिझाना नहीं चाहेगा। यही वजह है कि इस बार के आम चुनाव में इंटरनेट का पहली बार जमकर इस्तेमाल होने जा रहा है। वैसे ये भी सच है कि नौजवान वोटर उस तरह किसी चुनाव क्षेत्र में संगठित या समूह में नहीं हैं। क्योंकि शहरी इलाकों में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले वोटर ज्यादा हैं तो ग्रामीण इलाके में ऐसे वोटर कम हैं। क्योंकि तमाम सियासी दबावों के बावजूद अभी देश के करीब तीस फीसदी गांवों में या तो बिजली पहुंची ही नहीं या फिर आंशिक तौर पर पहुंची है। लेकिन जिस तरह मोबाइल कंपनियों ने मोबाइल फोन पर ही इंटरनेट की सुविधा देनी शुरू की है – उससे साफ है कि अगले आम चुनावों तक शायद ही कोई नौजवान होगा – जो इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं कर रहा होगा। तकनीक की दुनिया में लगातार आ रहे बदलावों के चलते ऐसा होना ही है। तब ये भी सच है कि अगले आम चुनाव में वोटरों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल कुछ वैसे ही होगा – जैसा आज अमेरिका या ब्रिटेन सरीखे विकसित देशों में हो रहा है। लेकिन इसका ये भी मतलब नहीं कि गली-कूचों और कस्बे – हाट के मैदानों में अपनी बात पहुंचाने की पारंपरिक अवधारणा भी बीते दिनों की बात हो जाएगी। विविधरंगी भारत के गांव को परंपरा में बंधे रहने का अपना देसज रूप कम नहीं लुभाता और इस उम्मीद के दम तोड़ने का कोई कारण नजर भी नहीं आता।
मंगलवार, 10 फ़रवरी 2009
क्या है इस राहत पैकेज का मकसद !

उमेश चतुर्वेदी
लोहिया जी कहते थे कि दिल्ली में माला पहनाने वाली एक कौम है। सरकारें बदल जाती हैं, लेकिन माला पहनाने वाली इस कौम में कोई बदलाव नहीं आता। आज अगर लोहिया जी होते तो वे देखते कि माला पहनाने वाली इस कौम की तरह सरकारी व्यवस्था और रवायत में कोई बदलाव नहीं आता। भले ही सरकारें बदल जाती हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो ऐन चुनावों से पहले भारत निर्माण का अभियान केंद्र की यूपीए सरकार नहीं शुरू करती।
शाइनिंग इंडिया की याद है आपको....2004 के आम चुनावों से ठीक पहले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार ने शाइनिंग इंडिया यानी चमकते भारत को अपनी उपलब्धि के तौर पर प्रचारित करने का अभियान छेड़ दिया था। तब आज की सरकार चला रही कांग्रेस ने इस अभियान की जमकर खिंचाई की थी। आपको इंडिया शाइनिंग की याद है तो आपको 2004 में आम चुनावों से ठीक पहले कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का रोड शो भी याद होगा। इस शो का मकसद ही था कि इंडिया शाइनिंग की हकीकत दुनिया को दिखाई जाए और इसका सियासी फायदा उठाया जाय। कहना ना होगा, सोनिया गांधी अपने मकसद में कामयाब रहीं और बीजेपी की अगुआई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की हवा निकल गई थी।
मंदी के इस दौर में भारत निर्माण अभियान मीडिया के लिए अच्छी संजीवनी बन कर आया है। अखबारों से लेकर टेलीविजन तक हर जगह यूपीए की अगुआई में भारत निर्माण का दर्शन हो रहा है। कभी अपने शाइनिंग इंडिया अभियान की आलोचना झेल और बर्दाश्त कर चुकी बीजेपी भारत निर्माण के विरोध में नहीं दिख रही। इसका ये मतलब नहीं है कि वह भारत निर्माण के कांग्रेस की अगुआई वाली केंद्र सरकार के दावे से सहमत है। हकीकत तो ये है कि मंदी के दौर में मीडिया भी पिस रहा है। ना सिर्फ प्रिंट, बल्कि टेलीविजन संस्थान भी आर्थिक दिक्कतों से दो-चार हो रहे हैं। शायद ही कोई मीडिया समूह बचा है, जहां कर्मचारियों की छंटनी नहीं हो रही है या फिर उनके सिर छंटनी की तलवार नहीं लटक रही है। फिर चुनावी साल है...इतनी आर्थिक दिक्कतों के बावजूद अब भी मीडिया संस्थान इतने ताकतवर हैं कि उन्हें कोई भी राजनीतिक दल नजरंदाज करने की हालत में नहीं है। लिहाजा बीजेपी भी इस अभियान का विरोध करके खुद को मीडिया के निशाने पर लाने से बच रही है।
भारत निर्माण अभियान के जरिए भारत सरकार दरअसल अपने दो लक्ष्य साधने की कोशिश कर रही है। उसे पता है कि इसके जरिए मीडिया घरानों के पास पैसा पहुंचेगा। लिहाजा उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत रहेगी और वे कम से कम मंदी के नाम पर उसे घेरने से बचेंगे। मंदी के चलते देशभर में नौकरियों का संकट बढ़ता जा रहा है। रोजाना रोजगार के तमाम क्षेत्रों से छंटनी की खबरें आ रही हैं। लेकिन मीडिया में इसे लेकर कहीं गुस्सा नहीं दिखता..भारत निर्माण अभियान अगर गुस्से की थोड़ी – बहुत झलक कहीं है भी तो उसे कम करने में अपनी बेहतर भूमिका निभा सकता है।
मंदी की मार से उबरने के लिए उद्योगों के लिए सरकार वैसे ही कई योजनाएं लागू कर चुकी है। रिजर्व बैंक कई बार रैपो रेट घटा चुका है। ऐसे में मीडिया को राहत मिलनी ही चाहिए। इससे कोई इनकार भी नहीं कर सकता। मीडिया के लिए भी राहत पैकेज की मांग को लेकर पिछले दिनों प्रिंट मीडिया के दिग्गजों ने सूचना और प्रसारण राज्य मंत्री आनंद शर्मा से मुलाकात की। इस मुलाकात में हिंदुस्तान टाइम्स की संपादकीय निदेशक शोभना भरतिया, इंडियन एक्सप्रेस के प्रधान संपादक शेखर गुप्ता और बिजनेस स्टैंडर्ड के टी एन नैनन भी शामिल थे। इस बैठक में आनंद शर्मा से मीडिया घरानों ने अपने लिए राहत पैकेज की मांग के साथ ही अखबारी कागज के आयात शुल्क में छूट देने की भी मांग रखी। ये सच है कि अखबारी कागज की बढ़ती कीमतों ने भी प्रिंट मीडिया संस्थानों की कमर तोड़ रखी है। पिछले साल इसकी कीमत छह सौ डालर प्रति टन से बढ़कर 960 डालर तक पहुंच गई। फिर मंदी के चलते विज्ञापनों में गिरावट आई। एडवर्टाइजिंग एसोसिएशन ऑफ इंडिया के मुताबिक इस देश में तकरीबन साढ़े चार हजार बड़े विज्ञापनदाता हैं। विज्ञापनों के लिहाज से नवंबर और दिसंबर मीडिया के लिए सबसे ज्यादा मसरूफियत वाला महीना रहा है। लेकिन मंदी के चलते इस बार वैसी व्यस्तता नहीं दिखी। बड़े विज्ञापनदाताओं के बजट में भी कटौती दिखी। ऐसा नहीं कि इस पर सरकार का ध्यान नहीं रहा है और मीडिया घरानों से मुलाकात के बाद ही उसका इस समस्या की ओर ध्यान गया है। सूचना और प्रसारण मंत्रालय के एक बड़े अफसर के मुताबिक भारत निर्माण अभियान की शुरूआत में इसका भी ध्यान रखा गया था।
मीडिया उद्योग को राहत पैकेज की पहली बार मांग पत्रकार से राजनेता बने राजीव शुक्ला ने संसद के पिछले सत्र में ही रखी थी। उसके बाद से ही मीडिया घरानों में इसे लेकर सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति बनने लगी थी। आनंद शर्मा से मुलाकात इसी रणनीति का नतीजा है, जिसका फायदा कुछ दिनों में मिलने वाला है। जिसमें अखबारी कागज के आयात टैक्स पर छूट भी हो सकती है। हालांकि सरकार ने खबरिया चैनलों के लिए किसी राहत का ऐलान नहीं किया है। लेकिन भारत निर्माण के जरिए उनकी भी मदद तो की ही जा रही है।
एडवर्टाइजिंग एसोसिएशन ऑफ इंडिया हर तिमाही में मीडिया को मिलने वाले विज्ञापनों के आंकड़े जारी करता है। इस बार जो आंकड़ा आएगा, ये तय है कि उसमें केंद्र सरकार सबसे बड़े विज्ञापनदाता के तौर पर उभरेगी। ऐसा 2004 की पहली तिमाही में भी हुआ था। तब भी अपने इंडिया शाइनिंग अभियान के चलते सरकार सबसे बड़ी विज्ञापनदाता थी। ये बात और है कि तब सरकारी खजाने के दुरूपयोग को लेकर उस वक्त की केंद्र सरकार की जमकर लानत-मलामत की गई थी। जिसका खामियाजा वाजपेयी सरकार को हार के तौर पर भुगतना पड़ा था। मंदी की मार झेल रहे मीडिया को सरकारी राहत से फायदा तो जरूर मिलेगा। लेकिन वोटों की खेती में इसका कितना फायदा केंद्र की यूपीए सरकार उठा पाती है, इस पर सबकी निगाह लगी रहेगी।
बुधवार, 28 जनवरी 2009
गैरजिम्मेदार टीवी रिपोर्टिंग के लिए जिम्मेदार कौन ?
उमेश चतुर्वेदी
तोप से मुकाबिल रहने वाले प्रिंट मीडिया की सारी तोपें इन दिनों इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की ओर जोरशोर से निशाना साधे हुए हैं। वजह बनी है मुंबई में आतंकी हमलों की नाटकीय रिपोर्टिंग.. डेढ़ दशक से ज्यादा वक्त से प्रिंट माध्यमों को भस्मासुरी अंदाज में पटखनी देते आ रहे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की इस नाटकीयता ने प्रिंट को अच्छा-खासा मौका दे दिया है। आलोचनाओं और कटघरे में खड़ा करने का दौर जारी है और इलेक्ट्रॉनिक माध्यम अपना मुंह छुपाने को मजबूर हो गया है। उदारीकरण और बाजारवाद के दौर में जिस तरह अंधाधुंध टीवी का विस्तार हुआ है – उसमें बौद्धिकता के लिए खास गुंजाइश और जगह नहीं रही..लिहाजा टीवी माध्यम सहज ही बुद्धिजीवी वर्ग के निशाने पर आ गया है। इसके साथ ही इस माध्यम को गैर जिम्मेदार ठहराए जाने का दौर तेज हो गया है। चूंकि प्रभावशाली प्रिंट मीडिया और बौद्धिक तबका इस आक्रमण अभियान में शामिल है – इसलिए सरकार को भी मौका मिल गया है और उसने कुछ चैनलों को कारण बताओ नोटिस जारी करने में देर नहीं लगाई।
टीवी को गैर जिम्मेदार ठहराए जाने के बीच इसकी असल वजहों पर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। टीवी वाले नाटकीय और सनसनीखेज रिपोर्टिंग के लिए जिम्मेदार तो हैं – इसे अब टेलीविजन के न्यूजरुम में काम करने वाले लोगों का एक बड़ा वर्ग भी मानने लगा है। इसके बावजूद ना सिर्फ मुंबई हमले – बल्कि दूसरी ऐसी घटनाओं की भी ऐसी रिपोर्टिंग जारी है। इस मसले पर पूरी पड़ताल करने से पहले एक बार हमें समानांतर सिनेमा के दौर में जारी साहित्य और सिनेमा के आपसी रिश्ते और उसे लेकर जारी विवाद को भी याद कर लेना जरूरी होगा। पिछली सदी तीस के दशक में हिंदी कहानी के सबसे महत्वपूर्ण शिल्पकार प्रेमचंद ने मायानगरी में नया कैरियर बनाने को लेकर पांव रखे थे – लेकिन उन्हें मायावी दुनिया रास नहीं आई और वे बनारस लौट आए थे। पचास के दशक में मुंबई गए अमृतलाल नागर का भी वैसा ही अनुभव रहा। ये बात है कि उन्हीं दिनों साहित्य की दुनिया से फिल्मी दुनिया में गए पंडित नरेंद्र शर्मा ने साहित्य से इतर फिल्मी दुनिया में नया मुकाम रचा। सातवें दशक में यही काम कमलेश्वर ने किया। लेकिन प्रेमचंद और अमृतलाल नागर के दौर में सिनेमा को लेकर साहित्यिक हलकों में जो पूर्वाग्रह पनपा – वह कमोबेश आज भी जारी है। शायद यही वजह है कि कमलेश्वर रहे हों या फिर नरेंद्र शर्मा ...उन्हें साहित्यिक जगत में वह सम्मान और आदर नहीं मिला – जिसके वे हकदार रहे। कुछ ऐसा ही संबंध आज आज प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों के बीच भी है। इसीलिए जब भी टेलीविजन की दुनिया में मुंबई जैसी घटनाओं की गैरजिम्मेदार रिपोर्टिंग होती है – पूरा का पूरा प्रिंट माध्यम उस पर पिल पड़ता है।
ऐसा नहीं कि 27 नवंबर 2008 को हुए मुंबई हमले की ही टीवी ने अतिरेकी रिपोर्टिंग की। 13 दिसंबर 2001 को संसद पर हमले की भी ऐसी ही रिपोर्टिंग हुई। जयपुर और अहमदाबाद धमाके को लेकर भी इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों ने ऐसा ही कदम उठाया। आलोचना तब भी हुई – लेकिन इस बार ज्यादा बावेला इसलिए मचा है – क्योंकि एक चैनल ने ना सिर्फ एक कथित आतंकवादी का फोनो चलाया। बल्कि अपने इस काम को सही साबित करने की कवायद में भी जोरशोर से जुट गया है। ऐसे में ये सवाल उठना लाजिमी है कि कोई आतंकवादी किसी चैनल पर आकर ये प्रस्ताव रखे कि वह देश को उड़ाने या प्रधानमंत्री पर ही हमला बोलने का ऐलान करने वाला है तो क्या उसे टीवी अपना स्टूडियो और अपना पैनल कंट्रोल रूम इसके लिए मुहैय्या कराएगा। सवाल ये भी है कि क्या किसी पत्रकार के पास किसी मासूम लड़की या महिला से बलात्कार का फुटेज है तो उसे भी बिना सेंसर्ड और बिना संपादन दिखा दिया जाएगा। करीब छह साल पहले आगरा में एक अध्यापिका का उसके ही कुछ छात्रों ने बलात्कार किया। इसकी फुटेज किसी के पास क्या होती। लेकिन अपने दर्शकों को ये घटना दिखाने के लिए एक प्रमुख चैनल ने बाकायदा इस रेप कांड का नाट्यरूपांतरण कराया और उसे खबर में वांछित जगह पर संपादित करके चलाया भी। उसका भी तब विरोध हुआ था।
टेलीविजन चैनलों में एक वर्ग ऐसा भी है – जिसका मानना है कि खबर की सच्चाई दिखाने के लिए उसका ये कदम जायज है। इसी आधार पर 2004 में गुजरात के एक खास संप्रदाय के साधुओं की यौनलीला को एक चैनल ने बाकायदा बिना किसी संपादन के दिखाया था। लेकिन हकीकत ये थी कि न्यूज रूम में काम करने वाले अधिकांश पत्रकार इससे सहमत नहीं थे। महिला पत्रकारों की न्यूज रूम में हालत क्या थी – उसे ही पता है, जो उस समय न्यूज रूम में था।
बहरहाल जो ये चैनल मान रहे हैं कि सच्चाई के लिए ये सारी चीजें उन्हें दिखाने का हक है । पत्रकारिता में बुराई को उजागर करने के लिए बुराई को ज्यों का त्यों दिखाने का एक वर्ग तेजी से इन दिनों बढ़ा है। बुराई दिखाई जाए..उसे लेकर दर्शकों और पाठकों का आगाह किया जाए- इससे शायद ही किसी को एतराज होगा। लेकिन इसकी सीमा क्या होगी – यह तो कहीं न कहीं उन्हें तय करना ही होगा। अन्यथा उन्हें अमेरिका के नैकेड न्यूज नामक चैनल को भी दिखाने से गुरेज नहीं होगा। इंटरनेट पर भी वह चैनल मौजूद है। नेकेड न्यूज नाम के इस चैनल के सारे एंकर बिल्कुल नंगे इंटरव्यू लेते या लेती हैं। खबरें भी नंगे बदन ही पढ़ी जाती हैं। दरअसल बहस और आलोचना की वजह भी यही है कि अगर ऐसा किया गया तो औरों से अलग और बौद्धिक दिखने वाले पत्रकार वर्ग और बाकी लोगों के विवेक में फर्क कहां रह जाएगा।
मार्च 2002 में गुजरात दंगों में खुलेआम लोगों को जलाने की घटनाओं की रिपोर्टिंग को लेकर भी विवाद हुआ था। लेकिन तब इसकी मुखालफत नहीं हुई थी। प्रिंट मीडिया और बुद्धिजीवियों के एक बड़े वर्ग ने इसका समर्थन किया था। इसकी रिपोर्टिंग करने वाले लोगों ने तब के विरोधियों के तर्कों को सिरे से खारिज कर दिया था। विरोधियों का तर्क था कि इससे हिंसा को और बढ़ावा मिला। लेकिन मुंबई पर आतंकी हमले के बाद चीजें बदल गईं हैं। पूरे देश में इस घटना को लेकर विरोध के सुर उठ रहे हैं। लिहाजा टीवी में काम करने वाले लोगों का बड़ा तबका इस घटना को लेकर रक्षात्मक बना हुआ है।
मुंबई हमले पर टीवी ने क्या – क्या किया...इसे तकरीबन पूरे देश ने देखा है। कुछ लोगों का सवाल है कि ताज होटल से छुड़ाए गए बंधकों से टीवी वालों ने पूछा कि आपको कैसा लग रहा है। प्रिंट के कई दिग्गजों ने इसकी भी आलोचना की है कि टीवी पत्रकारों ने सामान्य शिष्टाचार का ध्यान नहीं रखा और बदहवास लोगों का इंटरव्यू करने या उनकी बाइट लेने के लिए दौड़ पड़ा। ये सच है कि टीवी वाले इस सवाल का प्रतिकार नहीं कर रहे हैं – लेकिन क्या यह कार्य इतना गिरा हुआ है कि इसकी आलोचना की जाए। क्या किसी सार्वजनिक माध्यम का यह दायित्व नहीं बनता कि वह दुनिया को यह बताए कि आतंकी हमले के दौरान ताज होटल के अंदर क्या हो रहा था और इसका आंखों देखा हाल बताने के लिए बंधकों के अलावा और दूसरा कौन हो सकता है। ऐसे सवाल तो प्रिंट के पत्रकार भी पूछ रहे थे और केस हिस्ट्री तो अगले दिन के अखबारों में भी इंटरव्यू और बंधकों की आपबीती के रूप में भरी पड़ी थी। लेकिन उस पर सवाल तो नहीं उठा।
यह सच है कि टीवी की अतिरेकी रिपोर्टिंग से शुरू में आतंकियों को मदद मिली। यह गलती इतनी बड़ी है – जिससे इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों को सबक लेना चाहिए। लेकिन कभी किसी ने ये जानने की कोशिश नहीं की कि टीवी के न्यूज रूम में आखिर ऐसा क्यों होता है। ये सच है कि टीवी रिपोर्टर इस दौरान हर गतिविधि पर नजर गड़ाए हुए थे। पल-पल की खबरें अपने पैनल कंट्रोल रूम को भेज रहे थे। लेकिन ये भी उतना ही सच है कि इसे जनता को दिखाने- अपने चैनल पर चलाने और न चलाने का फैसला उनके आका ले रहे थे। टेलीविजन न्यूज रूम का आज के दौर में जैसा विकास हुआ है और टीआरपी की गलाकाट प्रतियोगिता पर जिस तरह बाजार और विज्ञापनों की दुनिया टिकी हुई है – उसके चलते न्यूज रूम का कोई आका अगर दूसरे चैनल पर ऐसी रिपोर्टिंग दिख गई तो अपने चैनल पर साया करने से रोकने का दुस्साहस नहीं कर सकता। टीवी न्यूजरूम के प्रमुख लोगों की निगाह अपने प्रतिद्वंद्वी चैनलों पर लगी रहती है। अगर सामने वाले चैनल के रिपोर्टर ने अतिरेकवादी भूमिका निभाई तो न्यूज रूम में दहाड़ सुनाई देने लगती है। रिपोर्टर और कैमरामैन को मोबाइल पर निर्देश दिए जाने लगते हैं कि वैसा ही कुछ करके दिखाओ – जैसा सड़क पार या पड़ोस का चैनल करके दिखा रहा है। यही वजह है कि एक दौर में ताज की रिपोर्टिंग कर रही सभी टीमों के रिपोर्टर सोकर रिपोर्टिंग करते दिखे। जबकि उनके कैमरा मैन पहले की ही तरह खड़े थे। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या गोली लगने का खतरा सिर्फ रिपोर्टरों को था और कैमरामैन बुलेटप्रूफ पहनकर महफूज थे। निश्चित रूप से इसका जवाब ना में है। अगले दिन के अखबारों में ये पूरी की पूरी तस्वीर छपी भी और आम लोगों तक ये नाटकीयता पहुंची भी। इन तस्वीरों ने भी टीवी रिपोर्टिंग को लेकर सवाल उठाने का मौका दिया।
लेकिन इस पूरी आलोचना और बहसबाजी के दौर में टेलीविजन न्यूज रूम के असल संकट पर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। एक-दो दशक पहले तक जो लोग पत्रकारिता में आ रहे थे – उनके सामने दुनिया को बदलने और कुछ कर दिखाने का जज्बा हुआ करता था। लेकिन बाजारवाद के दौर में ये हकीकत बदल गई है। टीवी के लोग खुद को पत्रकार भले ही कहें – लेकिन एक पूरी की पूरी पीढ़ी अब नौकरी करने आई है। गली-मोहल्ले के पत्रकारिता संस्थानों से लाखों रूपए की फीस देकर कथित पढ़ाई के बाद निकले नए लड़के-लड़कियों का नजरिया साफ है। उनका मानना है कि वे नौकरी करने आए हैं – पत्रकारिता करने नहीं। शायद यही वजह है कि उन्हें जब भी पत्रकारिता के नाम पर पत्रकारीय मानदंडों की अवहेलना करने को कहा जाता है, वे वैसा करने में देर नहीं लगाते। लाखों रूपए के कर्ज की रकम पर मिली शिक्षा से निकले पत्रकार ने दम दिखाया तो उसकी नौकरी जा सकती है।
रही बात न्यूज रूम के आकाओं की तो उनकी भी हालत कुछ बेहतर नहीं है-सिवा मोटी पगार के। नौकरी पर लगातार लटकी तलवार के चलते वे भी पत्रकारीय दंभ और मानदंड पर कायम रह नहीं पाते। टीआरपी गिरी नहीं कि नौकरी पर लटकी तलवार और नजदीक हुई। बाजारवाद ने लोगों के सामने आदर्शों के लिए जगह नहीं छोड़ी। ऐसे में चाहे लाख सवाल उठे – होना तो वही है जो बाजार चाहता है। टीवी पर सवाल उठाना कुछ वैसा ही है – जैसे बाजार में रहकर बाजार का विरोध...
दरअसल हर पेशे की एक नैतिकता भी होती है। आजादी के आंदोलन की कोख से निकली भारतीय पत्रकारिता के लिए पहले इसकी जरूरत नहीं रही। आजादी के आंदोलन का पत्रकारिता भी एक उपादान रही है। चूंकि तब पत्रकारिता का मकसद आजादी पाना था, इसलिए उसमें राष्ट्रीय आंदोलन की वे सारी चीजें समाहित हो गई थीं – जिसके बल पर राष्ट्रीय आंदोलन ने गति पकड़ी और उफान पर रहा। आजादी के बाद के करीब एक दशक तक पत्रकारिता उसी रोमांसवाद से प्रभावित रही। लेकिन नब्बे के दशक में शुरू हुए बाजारवाद के दौर में पत्रकारिता ने अपनी इस नैतिक जिम्मेदारी से पल्ला छुड़ाना शुरू किया। चूंकि टेलीविजन इस बाजारवाद के दौर में ही पनपा, उभरा और विराट बना, इसलिए उसने बाजारवाद की तमाम खासियतें बेरोकटोक खुद में समाहित कर लीं। अखबार में संपादकीय टीम की मीटिंगों में जहां महंगाई, कानून-व्यवस्था और सुरक्षा की बदहाली सबसे बड़ा मुद्दा रही हैं – टेलीविजन न्यूज रूम की मीटिंगों में नए ब्रांड के कपड़े, फैशन शो और कार की गिरती-बढ़ती कीमतों का मसला छाया रहता है। वैसे टीवी पर सवाल उठाने वाले प्रिंट माध्यमों की बैठकों में धीरे-धीरे ही सही – टीवी का ये रोग आता जा रहा है। रही – सही कसर टैम रेटिंग प्वाइंट यानी टीआरपी की माया ने पूरी कर दी है। टैम का जो पैमाना है – उस पर भी बाजारवाद की चीजें ही हावी हैं। ऐसे में ये सोचना कि इस व्यवस्था पर टिका टेलीविजन उद्योग और उसके पत्रकार पेशेवर नैतिकता के तहत ही काम करेंगे – बिल्कुल बेमानी है।
वकालत, इंजीनियरिंग और डॉक्टरी जैसे पेशों की नैतिकता निर्धारित करने , उनकी आचार संहिता बनाने के लिए बार कौंसिल और मेडिकल कौंसिल जैसे संगठन हैं। लेकिन मीडिया के लिए ऐसा कोई पेशेवर संगठन नहीं है – जिसके जरिए पत्रकारों को नैतिक दायरे में बांधे रखने का काम किया जा सके। मुंबई हमलों के बाद एक बार फिर से मीडिया के लिए ऐसे ही एक पेशेवर संगठन की जरूरत बढ़ती जा रही है। ताकि वह मीडिया और उसमें काम करने वाले लोगों के लिए एक मानदंड तय करे। उनकी आचार संहिता तय करे और उसे लागू करने की नैतिक जिम्मेदारी भी उठाए। सूचना और प्रसारण मंत्री रहते सुषमा स्वराज ने 2002 में मीडिया कौंसिल के गठन का सवाल जब उछाला था – तब इसका ना सिर्फ इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों और घरानों ने भी विरोध किया था। पत्रकारों का एक तबका तो खैर आगे था ही। लेकिन अब इसे लेकर भी सहमति बनती दिख रही है। टीवी पत्रकारों का एक बड़ा तबका भी मानने लगा है कि कम से कम उन्हें भी पेशेवर नैतिकता और आचारसंहिता के दायरे में बंधना ही होगा। पेशेवराना अंदाज को जब तक संरक्षण नहीं दिया जाएगा, टीआरपी के बाजारवादी पैमाने बदले नहीं जाएंगे..टीवी माध्यमों को नैतिकता और देशहित के नाम पर जिम्मेदार ठहराना आसान नहीं होगा। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि आचार संहिता बनाने की वकालत करने वाले दिग्गज पत्रकार और राजनेता इस मोर्चे पर सचमुच तैयार हैं।
तोप से मुकाबिल रहने वाले प्रिंट मीडिया की सारी तोपें इन दिनों इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की ओर जोरशोर से निशाना साधे हुए हैं। वजह बनी है मुंबई में आतंकी हमलों की नाटकीय रिपोर्टिंग.. डेढ़ दशक से ज्यादा वक्त से प्रिंट माध्यमों को भस्मासुरी अंदाज में पटखनी देते आ रहे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की इस नाटकीयता ने प्रिंट को अच्छा-खासा मौका दे दिया है। आलोचनाओं और कटघरे में खड़ा करने का दौर जारी है और इलेक्ट्रॉनिक माध्यम अपना मुंह छुपाने को मजबूर हो गया है। उदारीकरण और बाजारवाद के दौर में जिस तरह अंधाधुंध टीवी का विस्तार हुआ है – उसमें बौद्धिकता के लिए खास गुंजाइश और जगह नहीं रही..लिहाजा टीवी माध्यम सहज ही बुद्धिजीवी वर्ग के निशाने पर आ गया है। इसके साथ ही इस माध्यम को गैर जिम्मेदार ठहराए जाने का दौर तेज हो गया है। चूंकि प्रभावशाली प्रिंट मीडिया और बौद्धिक तबका इस आक्रमण अभियान में शामिल है – इसलिए सरकार को भी मौका मिल गया है और उसने कुछ चैनलों को कारण बताओ नोटिस जारी करने में देर नहीं लगाई।
टीवी को गैर जिम्मेदार ठहराए जाने के बीच इसकी असल वजहों पर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। टीवी वाले नाटकीय और सनसनीखेज रिपोर्टिंग के लिए जिम्मेदार तो हैं – इसे अब टेलीविजन के न्यूजरुम में काम करने वाले लोगों का एक बड़ा वर्ग भी मानने लगा है। इसके बावजूद ना सिर्फ मुंबई हमले – बल्कि दूसरी ऐसी घटनाओं की भी ऐसी रिपोर्टिंग जारी है। इस मसले पर पूरी पड़ताल करने से पहले एक बार हमें समानांतर सिनेमा के दौर में जारी साहित्य और सिनेमा के आपसी रिश्ते और उसे लेकर जारी विवाद को भी याद कर लेना जरूरी होगा। पिछली सदी तीस के दशक में हिंदी कहानी के सबसे महत्वपूर्ण शिल्पकार प्रेमचंद ने मायानगरी में नया कैरियर बनाने को लेकर पांव रखे थे – लेकिन उन्हें मायावी दुनिया रास नहीं आई और वे बनारस लौट आए थे। पचास के दशक में मुंबई गए अमृतलाल नागर का भी वैसा ही अनुभव रहा। ये बात है कि उन्हीं दिनों साहित्य की दुनिया से फिल्मी दुनिया में गए पंडित नरेंद्र शर्मा ने साहित्य से इतर फिल्मी दुनिया में नया मुकाम रचा। सातवें दशक में यही काम कमलेश्वर ने किया। लेकिन प्रेमचंद और अमृतलाल नागर के दौर में सिनेमा को लेकर साहित्यिक हलकों में जो पूर्वाग्रह पनपा – वह कमोबेश आज भी जारी है। शायद यही वजह है कि कमलेश्वर रहे हों या फिर नरेंद्र शर्मा ...उन्हें साहित्यिक जगत में वह सम्मान और आदर नहीं मिला – जिसके वे हकदार रहे। कुछ ऐसा ही संबंध आज आज प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों के बीच भी है। इसीलिए जब भी टेलीविजन की दुनिया में मुंबई जैसी घटनाओं की गैरजिम्मेदार रिपोर्टिंग होती है – पूरा का पूरा प्रिंट माध्यम उस पर पिल पड़ता है।
ऐसा नहीं कि 27 नवंबर 2008 को हुए मुंबई हमले की ही टीवी ने अतिरेकी रिपोर्टिंग की। 13 दिसंबर 2001 को संसद पर हमले की भी ऐसी ही रिपोर्टिंग हुई। जयपुर और अहमदाबाद धमाके को लेकर भी इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों ने ऐसा ही कदम उठाया। आलोचना तब भी हुई – लेकिन इस बार ज्यादा बावेला इसलिए मचा है – क्योंकि एक चैनल ने ना सिर्फ एक कथित आतंकवादी का फोनो चलाया। बल्कि अपने इस काम को सही साबित करने की कवायद में भी जोरशोर से जुट गया है। ऐसे में ये सवाल उठना लाजिमी है कि कोई आतंकवादी किसी चैनल पर आकर ये प्रस्ताव रखे कि वह देश को उड़ाने या प्रधानमंत्री पर ही हमला बोलने का ऐलान करने वाला है तो क्या उसे टीवी अपना स्टूडियो और अपना पैनल कंट्रोल रूम इसके लिए मुहैय्या कराएगा। सवाल ये भी है कि क्या किसी पत्रकार के पास किसी मासूम लड़की या महिला से बलात्कार का फुटेज है तो उसे भी बिना सेंसर्ड और बिना संपादन दिखा दिया जाएगा। करीब छह साल पहले आगरा में एक अध्यापिका का उसके ही कुछ छात्रों ने बलात्कार किया। इसकी फुटेज किसी के पास क्या होती। लेकिन अपने दर्शकों को ये घटना दिखाने के लिए एक प्रमुख चैनल ने बाकायदा इस रेप कांड का नाट्यरूपांतरण कराया और उसे खबर में वांछित जगह पर संपादित करके चलाया भी। उसका भी तब विरोध हुआ था।
टेलीविजन चैनलों में एक वर्ग ऐसा भी है – जिसका मानना है कि खबर की सच्चाई दिखाने के लिए उसका ये कदम जायज है। इसी आधार पर 2004 में गुजरात के एक खास संप्रदाय के साधुओं की यौनलीला को एक चैनल ने बाकायदा बिना किसी संपादन के दिखाया था। लेकिन हकीकत ये थी कि न्यूज रूम में काम करने वाले अधिकांश पत्रकार इससे सहमत नहीं थे। महिला पत्रकारों की न्यूज रूम में हालत क्या थी – उसे ही पता है, जो उस समय न्यूज रूम में था।
बहरहाल जो ये चैनल मान रहे हैं कि सच्चाई के लिए ये सारी चीजें उन्हें दिखाने का हक है । पत्रकारिता में बुराई को उजागर करने के लिए बुराई को ज्यों का त्यों दिखाने का एक वर्ग तेजी से इन दिनों बढ़ा है। बुराई दिखाई जाए..उसे लेकर दर्शकों और पाठकों का आगाह किया जाए- इससे शायद ही किसी को एतराज होगा। लेकिन इसकी सीमा क्या होगी – यह तो कहीं न कहीं उन्हें तय करना ही होगा। अन्यथा उन्हें अमेरिका के नैकेड न्यूज नामक चैनल को भी दिखाने से गुरेज नहीं होगा। इंटरनेट पर भी वह चैनल मौजूद है। नेकेड न्यूज नाम के इस चैनल के सारे एंकर बिल्कुल नंगे इंटरव्यू लेते या लेती हैं। खबरें भी नंगे बदन ही पढ़ी जाती हैं। दरअसल बहस और आलोचना की वजह भी यही है कि अगर ऐसा किया गया तो औरों से अलग और बौद्धिक दिखने वाले पत्रकार वर्ग और बाकी लोगों के विवेक में फर्क कहां रह जाएगा।
मार्च 2002 में गुजरात दंगों में खुलेआम लोगों को जलाने की घटनाओं की रिपोर्टिंग को लेकर भी विवाद हुआ था। लेकिन तब इसकी मुखालफत नहीं हुई थी। प्रिंट मीडिया और बुद्धिजीवियों के एक बड़े वर्ग ने इसका समर्थन किया था। इसकी रिपोर्टिंग करने वाले लोगों ने तब के विरोधियों के तर्कों को सिरे से खारिज कर दिया था। विरोधियों का तर्क था कि इससे हिंसा को और बढ़ावा मिला। लेकिन मुंबई पर आतंकी हमले के बाद चीजें बदल गईं हैं। पूरे देश में इस घटना को लेकर विरोध के सुर उठ रहे हैं। लिहाजा टीवी में काम करने वाले लोगों का बड़ा तबका इस घटना को लेकर रक्षात्मक बना हुआ है।
मुंबई हमले पर टीवी ने क्या – क्या किया...इसे तकरीबन पूरे देश ने देखा है। कुछ लोगों का सवाल है कि ताज होटल से छुड़ाए गए बंधकों से टीवी वालों ने पूछा कि आपको कैसा लग रहा है। प्रिंट के कई दिग्गजों ने इसकी भी आलोचना की है कि टीवी पत्रकारों ने सामान्य शिष्टाचार का ध्यान नहीं रखा और बदहवास लोगों का इंटरव्यू करने या उनकी बाइट लेने के लिए दौड़ पड़ा। ये सच है कि टीवी वाले इस सवाल का प्रतिकार नहीं कर रहे हैं – लेकिन क्या यह कार्य इतना गिरा हुआ है कि इसकी आलोचना की जाए। क्या किसी सार्वजनिक माध्यम का यह दायित्व नहीं बनता कि वह दुनिया को यह बताए कि आतंकी हमले के दौरान ताज होटल के अंदर क्या हो रहा था और इसका आंखों देखा हाल बताने के लिए बंधकों के अलावा और दूसरा कौन हो सकता है। ऐसे सवाल तो प्रिंट के पत्रकार भी पूछ रहे थे और केस हिस्ट्री तो अगले दिन के अखबारों में भी इंटरव्यू और बंधकों की आपबीती के रूप में भरी पड़ी थी। लेकिन उस पर सवाल तो नहीं उठा।
यह सच है कि टीवी की अतिरेकी रिपोर्टिंग से शुरू में आतंकियों को मदद मिली। यह गलती इतनी बड़ी है – जिससे इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों को सबक लेना चाहिए। लेकिन कभी किसी ने ये जानने की कोशिश नहीं की कि टीवी के न्यूज रूम में आखिर ऐसा क्यों होता है। ये सच है कि टीवी रिपोर्टर इस दौरान हर गतिविधि पर नजर गड़ाए हुए थे। पल-पल की खबरें अपने पैनल कंट्रोल रूम को भेज रहे थे। लेकिन ये भी उतना ही सच है कि इसे जनता को दिखाने- अपने चैनल पर चलाने और न चलाने का फैसला उनके आका ले रहे थे। टेलीविजन न्यूज रूम का आज के दौर में जैसा विकास हुआ है और टीआरपी की गलाकाट प्रतियोगिता पर जिस तरह बाजार और विज्ञापनों की दुनिया टिकी हुई है – उसके चलते न्यूज रूम का कोई आका अगर दूसरे चैनल पर ऐसी रिपोर्टिंग दिख गई तो अपने चैनल पर साया करने से रोकने का दुस्साहस नहीं कर सकता। टीवी न्यूजरूम के प्रमुख लोगों की निगाह अपने प्रतिद्वंद्वी चैनलों पर लगी रहती है। अगर सामने वाले चैनल के रिपोर्टर ने अतिरेकवादी भूमिका निभाई तो न्यूज रूम में दहाड़ सुनाई देने लगती है। रिपोर्टर और कैमरामैन को मोबाइल पर निर्देश दिए जाने लगते हैं कि वैसा ही कुछ करके दिखाओ – जैसा सड़क पार या पड़ोस का चैनल करके दिखा रहा है। यही वजह है कि एक दौर में ताज की रिपोर्टिंग कर रही सभी टीमों के रिपोर्टर सोकर रिपोर्टिंग करते दिखे। जबकि उनके कैमरा मैन पहले की ही तरह खड़े थे। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या गोली लगने का खतरा सिर्फ रिपोर्टरों को था और कैमरामैन बुलेटप्रूफ पहनकर महफूज थे। निश्चित रूप से इसका जवाब ना में है। अगले दिन के अखबारों में ये पूरी की पूरी तस्वीर छपी भी और आम लोगों तक ये नाटकीयता पहुंची भी। इन तस्वीरों ने भी टीवी रिपोर्टिंग को लेकर सवाल उठाने का मौका दिया।
लेकिन इस पूरी आलोचना और बहसबाजी के दौर में टेलीविजन न्यूज रूम के असल संकट पर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। एक-दो दशक पहले तक जो लोग पत्रकारिता में आ रहे थे – उनके सामने दुनिया को बदलने और कुछ कर दिखाने का जज्बा हुआ करता था। लेकिन बाजारवाद के दौर में ये हकीकत बदल गई है। टीवी के लोग खुद को पत्रकार भले ही कहें – लेकिन एक पूरी की पूरी पीढ़ी अब नौकरी करने आई है। गली-मोहल्ले के पत्रकारिता संस्थानों से लाखों रूपए की फीस देकर कथित पढ़ाई के बाद निकले नए लड़के-लड़कियों का नजरिया साफ है। उनका मानना है कि वे नौकरी करने आए हैं – पत्रकारिता करने नहीं। शायद यही वजह है कि उन्हें जब भी पत्रकारिता के नाम पर पत्रकारीय मानदंडों की अवहेलना करने को कहा जाता है, वे वैसा करने में देर नहीं लगाते। लाखों रूपए के कर्ज की रकम पर मिली शिक्षा से निकले पत्रकार ने दम दिखाया तो उसकी नौकरी जा सकती है।
रही बात न्यूज रूम के आकाओं की तो उनकी भी हालत कुछ बेहतर नहीं है-सिवा मोटी पगार के। नौकरी पर लगातार लटकी तलवार के चलते वे भी पत्रकारीय दंभ और मानदंड पर कायम रह नहीं पाते। टीआरपी गिरी नहीं कि नौकरी पर लटकी तलवार और नजदीक हुई। बाजारवाद ने लोगों के सामने आदर्शों के लिए जगह नहीं छोड़ी। ऐसे में चाहे लाख सवाल उठे – होना तो वही है जो बाजार चाहता है। टीवी पर सवाल उठाना कुछ वैसा ही है – जैसे बाजार में रहकर बाजार का विरोध...
दरअसल हर पेशे की एक नैतिकता भी होती है। आजादी के आंदोलन की कोख से निकली भारतीय पत्रकारिता के लिए पहले इसकी जरूरत नहीं रही। आजादी के आंदोलन का पत्रकारिता भी एक उपादान रही है। चूंकि तब पत्रकारिता का मकसद आजादी पाना था, इसलिए उसमें राष्ट्रीय आंदोलन की वे सारी चीजें समाहित हो गई थीं – जिसके बल पर राष्ट्रीय आंदोलन ने गति पकड़ी और उफान पर रहा। आजादी के बाद के करीब एक दशक तक पत्रकारिता उसी रोमांसवाद से प्रभावित रही। लेकिन नब्बे के दशक में शुरू हुए बाजारवाद के दौर में पत्रकारिता ने अपनी इस नैतिक जिम्मेदारी से पल्ला छुड़ाना शुरू किया। चूंकि टेलीविजन इस बाजारवाद के दौर में ही पनपा, उभरा और विराट बना, इसलिए उसने बाजारवाद की तमाम खासियतें बेरोकटोक खुद में समाहित कर लीं। अखबार में संपादकीय टीम की मीटिंगों में जहां महंगाई, कानून-व्यवस्था और सुरक्षा की बदहाली सबसे बड़ा मुद्दा रही हैं – टेलीविजन न्यूज रूम की मीटिंगों में नए ब्रांड के कपड़े, फैशन शो और कार की गिरती-बढ़ती कीमतों का मसला छाया रहता है। वैसे टीवी पर सवाल उठाने वाले प्रिंट माध्यमों की बैठकों में धीरे-धीरे ही सही – टीवी का ये रोग आता जा रहा है। रही – सही कसर टैम रेटिंग प्वाइंट यानी टीआरपी की माया ने पूरी कर दी है। टैम का जो पैमाना है – उस पर भी बाजारवाद की चीजें ही हावी हैं। ऐसे में ये सोचना कि इस व्यवस्था पर टिका टेलीविजन उद्योग और उसके पत्रकार पेशेवर नैतिकता के तहत ही काम करेंगे – बिल्कुल बेमानी है।
वकालत, इंजीनियरिंग और डॉक्टरी जैसे पेशों की नैतिकता निर्धारित करने , उनकी आचार संहिता बनाने के लिए बार कौंसिल और मेडिकल कौंसिल जैसे संगठन हैं। लेकिन मीडिया के लिए ऐसा कोई पेशेवर संगठन नहीं है – जिसके जरिए पत्रकारों को नैतिक दायरे में बांधे रखने का काम किया जा सके। मुंबई हमलों के बाद एक बार फिर से मीडिया के लिए ऐसे ही एक पेशेवर संगठन की जरूरत बढ़ती जा रही है। ताकि वह मीडिया और उसमें काम करने वाले लोगों के लिए एक मानदंड तय करे। उनकी आचार संहिता तय करे और उसे लागू करने की नैतिक जिम्मेदारी भी उठाए। सूचना और प्रसारण मंत्री रहते सुषमा स्वराज ने 2002 में मीडिया कौंसिल के गठन का सवाल जब उछाला था – तब इसका ना सिर्फ इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों और घरानों ने भी विरोध किया था। पत्रकारों का एक तबका तो खैर आगे था ही। लेकिन अब इसे लेकर भी सहमति बनती दिख रही है। टीवी पत्रकारों का एक बड़ा तबका भी मानने लगा है कि कम से कम उन्हें भी पेशेवर नैतिकता और आचारसंहिता के दायरे में बंधना ही होगा। पेशेवराना अंदाज को जब तक संरक्षण नहीं दिया जाएगा, टीआरपी के बाजारवादी पैमाने बदले नहीं जाएंगे..टीवी माध्यमों को नैतिकता और देशहित के नाम पर जिम्मेदार ठहराना आसान नहीं होगा। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि आचार संहिता बनाने की वकालत करने वाले दिग्गज पत्रकार और राजनेता इस मोर्चे पर सचमुच तैयार हैं।
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