गुरुवार, 14 जून 2012



हिंदी प्रदेश में हिंदी का हाल
उमेश चतुर्वेदी

(यह लेख अमर उजाला में प्रकाशित हो चुका है।)
पिछली सदी के नब्बे के दशक में नई आर्थिकी की आगोश में देश जाने की तैयारी कर रहा था, तब कई सवाल उठे थे। इनमें निश्चित तौर पर आर्थिक मसलों से जुड़े सवाल ज्यादा थे। लेकिन लगे हाथों संस्कृति और भारतीय भाषाओं की भावी हालत को लेकर खासी चिंताएं जाहिर की गई थीं। इन चिंताओं का केंद्रीय बिंदु यह आशंका ही थी कि बाजार आधारित नई आर्थिकी ना सिर्फ संस्कृति के क्षेत्र में ही नकारात्मक दखल देगी, बल्कि देसी भाषाओं पर भी असर डालेगी। नई आर्थिकी के पैरोकारों ने इन चिंताओं को निर्मूल करार देने में देर नहीं लगाई। उनके तर्कों का आधार बनी बाजार की भाषा के तौर पर चिन्हित होती हिंदी और उसका बाजार आधारित विस्तार। लेकिन हिंदी भाषी राज्यों के हृदय प्रदेश उत्तर प्रदेश के दसवीं के नतीजों ने उस खतरे  को पहली बार सतह पर ला खड़ा किया है, जिसकी आशंका नब्बे के दशक मे भाषाशास्त्री उठा रहे थे।

हिंदीभाषी उत्तर प्रदेश में दसवीं की परीक्षा में 35 लाख परीक्षार्थियों ने अपनी किस्मत आजमाई और उनमें से तीन लाख दस हजार परीक्षार्थी हिंदी में ही खेत रहे। मूल्यांकन की नवीनतम ग्रेडिंग पद्धति अपनाने के बाद भी महज डेढ़ हजार विद्यार्थियों को ही 91 फीसदी अंक हासिल हो पाए। हिंदी में हिंदी प्रदेशों की अगली पीढ़ी की दखल और हिंदी को लेकर उसका रवैया कैसा है, इसे भी उत्तर प्रदेश के दसवीं के नतीजों से परखा जा सकता है, जिसमें महज 40 फीसदी बच्चे ही पचास फीसदी अंक जुटा पाए। यह हालत तब है, जब विज्ञान, गणित और सामाजिक विज्ञान में ए ग्रेड हासिल करने का आंकड़ा कहीं ज्यादा है। अगर किसी दूसरे और गैर हिंदीभाषी राज्य से ये आंकड़े आए होते तो एक हद तक उन्हें टाला भी जा सकता था। लेकिन हिंदी का हृदय सम्राट माने जाने वाले उत्तर प्रदेश से आए इन आंकड़ों और उससे उठने वाले सवालों को आसानी से दरकिनार नहीं किया जा सकता।
यह सच है कि मीडिया विस्फोट और हिंदी प्रदेशों में बढ़ती बाजार की दखल ने हिंदी को लेकर नई अवधारणा विकसित हुई है। उसे सिर्फ बोलचाल और सहज अभिव्यक्ति का ऐसा साधन माना जाने लगा है, जिसमें बाजार का काम चल सके। उसे विमर्श और गंभीर चेतना की वाहक भाषा मानने से भी लगातार परहेज रहा है। फिर बाजारवाद के दौर में जिस तरह हिंदी बेहतर रोजगार के माध्यम से लगातार दूर हुई है, उसका भी मनोवैज्ञानिक असर हिंदीभाषी प्रदेशों के छात्रों में भी नजर आने लगा है। अब तक यह अवधारणा सिर्फ गैरहिंदीभाषी प्रदेशों और कुलीन समझे जाने वाले विद्यालयों के छात्रों में ही व्याप्त थी। बाजारवाद और मीडिया विस्फोट के दौर में दो शब्द समाज के वर्गीकरण में अपनी खास भूमिका निभा रहे हैं। अपमार्केट और डाउन मार्केट की यह अवधारणा बेशक नई आर्थिकी के तहत समाज को दो हिस्सों में देखने का माध्यम बन गई है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि आम हिंदीभाषी डाउनमार्केट समझा जाता है और गलत अंग्रेजी बोलने वाला अपमार्केट के खांचे में फिट माना जाता है। उपरी तौर पर देखने से हिंदी के किनारे होने के पीछे ये वजहें गंभीर न लगें। लेकिन हकीकत तो यही है कि तीन दशकों के लंबे अंतराल में पीढ़ियां बदल गई हैं और निश्चित तौर पर उनका नजरिया भी। यही वजह है कि अब हिंदी को लेकर चलताऊ रवैया अख्तियार करने की आम मानसिकता हिंदी प्रदेशों में भी नजर आने लगी है। लेकिन सवाल यह उठ सकता है कि आखिर गैर हिंदीभाषी प्रदेशों में वहां की स्थानीय भाषाओं के साथ भी ऐसा ही हो रहा है। निश्चित तौर पर वहां भी ऐसा ही हो रहा है। लेकिन हिंदी से इतर दूसरी देसी भाषाएं उपराष्ट्रीयता और स्थानीय स्वाभिमान का एक हद तक अब भी प्रतीक बनी हुई हैं। लिहाजा उन्हें लेकर एक खास तरह का लगाव उन समाजों में बना हुआ है। लेकिन हिंदी, बांग्ला, मराठी, कन्नड़ और तमिल जैसी नहीं है और न ही उसका अपना कोई स्थानीय क्षेत्र है। लिहाजा वह एक हद तक भले ही अभी तक राष्ट्रीयता की वाहक बनी हुई है, लेकिन उसकी तासीर बांग्ला, तमिल या दूसरी भारतीय भाषाओं जैसी नहीं है। लेकिन यह मानना कि बाजार ने वहां पैठ बनाकर उन्हें बदलने की कोशिश शुरू नहीं की है, बेमानी होगा। हां, उपराष्ट्रीयतावादी उभार के दौर में उनके साथ आसानी से छेड़छाड़ नहीं हो सकती। लेकिन हिंदी के साथ ऐसा नहीं है। बहुत पहले मशहूर कवि रघुवीर सहाय हिंदी को लेकर यह कह गए हैं कि हिंदी दुहाजू की बीबी है। उन्होंने जब ये कहा था, तब देश में नई आर्थिकी नहीं आई थी। लेकिन अब जमाना बदल गया है, लिहाजा हिंदी को लेकर हिंदी भाषी समाज के चलताऊ अंदाज को आसानी से समझा जा सकता है।
लेकिन जिस तरह नई आर्थिकी को लेकर नए सिरे से सवाल उठने लगे हैं, उसमें कहीं न कहीं हिंदी समेत भारतीय भाषाओं का सवाल भी छुपा हुआ है। ऐसा नहीं कि हिंदी के इस हाल को लेकर लोगों में कसक नहीं है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हिंदी के जरिए खाने-कमाने वाला बुद्धिजीवी और हिंदी के जरिए अपनी गांव-ढाणियों में अपनी राजनीतिक जमीन तलाशने वाला हिंदी भाषी क्षेत्रों का राजनेता को ये सवाल परेशान करते हैं। अगर ये सवाल हिंदी क्षेत्र के बुद्धिजीवियों और राजनेताओं को परेशान करेंगे तो निश्चित मानिए हिंदी को लेकर बढ़ते इस उदासीनता बोध को रोक जा सकता है। 

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