शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

प्यार भरे स्वाभिमान को तरसती भारतीय भाषाएं

उमेश चतुर्वेदी
चिली की राष्ट्रपति डॉक्टर मिशेल बास्लेट गणतंत्र दिवस के ठीक पहले भारत के दौरे पर थीं। चूंकि पांच साल बाद चिली का कोई इतना बड़ा नेता भारत के दौरे पर था, लिहाजा उनके सम्मान में भारत सरकार की ओर से कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी गई। उनके सम्मान में उपराष्ट्रपति डॉक्टर हामिद अंसारी ने एक भोज दिया। जैसी की रवायत है, भोज के पहले मेजबान और मेहमान दोनों ने औपचारिक बयान दिया। लेकिन उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के बयान देते ही एक ऐसी घटना हो गई, जिसे लेकर वहां कुछ देर तक सन्नाटा छा गया। हमारे नेता विदेशी नेताओं और मेहमानों के समक्ष अंग्रेजी में ही बोलने के आदी रहे हैं। उपराष्ट्रपति ने उसी परंपरा का निर्वाह किया और औपचारिक बयान अंग्रेजी में ही देने लगे। उनके ऐसा करते ही डॉ.बास्लेट के लिए चिली सरकार की तरफ से दुभाषिया तैनात था। वह दुभाषिया कामचलाऊ अंग्रेजी ही जानता था। उसे हिंदी और स्पेनिश ही आती थी। उपराष्ट्रपति ने बयान पढ़ना शुरू क्या किया, दुभाषिया ने टूटी-फूटी अंग्रेजी में उसे टोक दिया। उसने कहा कि उसकी राष्ट्रभाषा स्पेनिश है। चिली दुभाषिये न उपराष्ट्रपति से अनुरोध किया कि उसकी राष्ट्रपति चूंकि अंग्रेजी नहीं जानती, लिहाजा बेहतर हो कि वे स्पेनिश या हिंदी में बोलें। क्योंकि हिंदी से वह अनुवाद कर सकता था। इसके आगे क्या हुआ, इसका जिक्र किया जाना यहां ज्यादा जरूरी नहीं है।
सोचने की बात यह है कि क्या ऐसी घटनाओं से हम भारतीयों को कोई सीख मिलती है। राजनेताओं को गलियाना और उनकी लानत-मलामत करना तो हमारी दिनचर्या में शामिल है ही। लेकिन हम खुद भी ऐसी घटनाओं के लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं। हमें अपनी श्रेष्ठताबोध के प्रदर्शन का एक ही जरिया नजर आता है अंग्रेजी। नव उदार आर्थिक-सामाजिक परिवेश में अंग्रेजी का बोलबाला कुछ ज्यादा बढ़ गया है। बाजार की अब तक की मजबूरी हिंदी समेत भारतीय भाषाएं हैं। लिहाजा बाजार इन्हें अपने उत्पाद को बेचने के लिए इन भाषाओं का इस्तेमाल भर कर रहा है। चूंकि नई बाजार व्यवस्था में चूंकि उत्पाद को विज्ञापन के जरिए ही अपने लक्ष्य समूह तक पहुंचाया जा सकता है, इसलिए भारतीय भाषाओं में विज्ञापन बनाया जा रहा है और उन्हें देसी मीडिया के जरिए ही फैलाया जा रहा है। भारतीय भाषाओं के मीडिया के विस्तार की एक वजह यह भी है। लेकिन हमारा ध्यान इस ओर नहीं है। वैसे भी बाजार का एक नियम होता है, अपने उत्पाद को बेहतर बनाना। चूंकि भाषाएं भी इस नव बाजारवादी व्यवस्था में एक उत्पाद बन रही हैं, लिहाजा इन्हें बेहतर बनाने की उम्मीद पालना बेमानी नहीं है। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि भाषाओं के मामले में बेहतर बनाने की कोशिश नहीं की जा रही है। इस पूरे उहापोह में अंग्रेजी की बन आई है। सुदूर गाजीपुर में रहकर रचनाकर रहे विवेकी राय अंग्रेजी के इस विकास को नव उपनिवेशवाद मानते हैं। हिंदी का भला चाहने वालों की भी राय कुछ अलग नहीं है। लेकिन अंग्रेजी का यह जनविस्तार बढ़ता जा रहा है। इसलिए इन दिनों एक राय कमोबेश पूरे देश में बन गई है कि अंग्रेजी पढ़-बोलकर ही मलाई खाई जा सकती है।
अंग्रेजी बोध के विस्तार का यह बीज अंग्रेजीदां राजनेताओं ने ही बोया था, जो अब फैल गया है। संविधान में यह कहीं नहीं लिखा कि अंग्रेजी नहीं जानने वाला प्रधानमंत्री नहीं बन पाएगा। लेकिन 1989 में जब देवीलाल जनता दल के नेता चुने गए तो उन्होंने यह कहते हुए ताज वीपी सिंह के सिर रख दिया था कि उन्हें अंग्रेजी नहीं आती और प्रधानमंत्री बनने वाले को अंग्रेजी आनी चाहिए। अंग्रेजी के प्रति राजनीति की असल चाहत को बयां करने के लिए यह एक घटना काफी है। यही वजह है कि विदेशी राजनेताओं के सामने वे अपनी भाषा के अपमान की कीमत पर भी अंग्रेजी में बोलना पसंद करते हैं। ऐसे लोगों के लिए चिली की राष्ट्रपति मिशेल बास्लेट नजीर बन सकती हैं। दस-बारह साल पहले कजाकिस्तान के राष्ट्रपति साहित्य अकादमी के संवत्सर व्याख्यान देने आए थे। लोगों को लगता था कि विदेशी होने के नाते उनका भाषण अंग्रेजी में होगा, लेकिन उन्हें अंग्रेजी नहीं आती थी और उन्होंने अपना भाषण कजाक भाषा में ही दिया। अपनी भाषा के प्रति प्रेम को फ्रांस में भी देखा जा सकता है। दो साल पहले विश्वबैंक की एक बैठक से फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी इसलिए बाहर निकल गए थे, क्योंकि वहां फ्रांसीसी मूल का विश्वबैंक का एक अधिकारी फ्रेंच की बजाय अंग्रेजी में बोल रहा था। इन उदाहरणों का मकसद भाषाओं के प्रति कट्टरता की हद तक प्यार फैलाना नहीं है, बल्कि ये समझाने की कोशिश भर है कि अपनी भाषाओं के प्रति दुनिया के गैरअंग्रेजी भाषी देशों में कितना सम्मान और प्यार है। बेहतर तो यह होता कि हम भी अपने भाषाओं में ऐसा ही प्यारभरा स्वाभिमान भर पाते।

3 टिप्‍पणियां:

Chandrakant ने कहा…

badhai. Shri Umesh Chaturvedi ne bahut hi marmik aur sateek tippani ki hai.

राजेश चड्ढ़ा ने कहा…

हिंदी दिवस पर .....अंग्रेज़ी को कोसने में भी इसी वर्ग के लोग...सबसे आगे होते हैं...दुर्भाग्य... हिंदी सेवियों और हिंदी प्रेमियों का ।

sushant jha ने कहा…

बहुत दिनों के बाद ऐसा लेख देखने को मिला है, जो सोचने पर मजबूर करे। सर, आपने जो सवाल उठाया है उससे हम रोज दो चार होते हैं, फिर भी अंग्रेजी ही सीख रहे हैं। क्या करें, फिलहाल उसी से रोटी मिल रही है। लेकिन ये सवाल शाश्वत है। पता नहीं इसका क्या उपाय है।