शनिवार, 18 दिसंबर 2010

बदलती दुनिया को समझने का औजार


उमेश चतुर्वेदी
अब दुनिया गोल नहीं
प्रकाशक - पेंगुइन बुक्स इंडिया प्रा. लि.
11 कम्युनिटी सेंटर, पंचशील पार्क, नई दिल्ली -110017
मूल्य – 350 रूपए

पंद्रहवीं सदी के आखिरी दिनों में ईस्ट इंडिया की खोज करने स्पेन से निकले क्रिस्टोफर कोलंबस भले ही भारत को नहीं खोज पाया, लेकिन उसने दुनिया को एक विचार जरूर दिया। दरअसल यह यूरोपीय वैज्ञानिक गैलीलियो के विचार को ही आगे बढ़ा रहा था। इसके मुताबिक दुनिया गोल है। यह वैज्ञानिक सत्य भी है कि हमारी धरती गोल है। लेकिन जब हम धरती के एक कोने से दूसरे कोने तक जाते हैं तो हमें धरती की इस गोलाई का अहसास नहीं होता है, अलबत्ता ये जरूर लगता है कि पूरी धरती समतल है। तकनीक ने धरती के इस समतलीकरण को और बढ़ा दिया है। न्यूयार्क टाइम्स के स्तंभकार टॉमस एल फ्रीडमैन को यह विचार पहली बार तब आया, जब वे न्यूयार्क से हजारों किलोमीटर दूर तकनीक का नया केंद्र बन चुके बंगलुरू में इन्फोसिस के मुख्यालय नंदन नीलकेणी से मिलने पहुंचे। बंगलुरू शहर से चालीस मिनट के सफर पर स्थित इन्फोसिस के मुख्यालय में उन्हें अहसास हुआ कि कोलंबस पंद्रह सदीं में भारत की जगह अमेरिका जा पहुंचा और वहां के लोगों को रेड इंडियन कहा जाने लगा। वक्त का सफर बीसवीं सदी के आखिरी छोर तक पहुंच जाता है। इस बार भी कोई कोलंबस भारत की खोज पर निकलता है। इस बार उसकी यात्रा उस अमेरिका से शुरू होती है, जिसे भारत के नाम पर कोलंबस ने खोजा था। अनजाने में अमेरिका पहुंचे कोलंबस को रेड इंडियन मिले, लेकिन भारत पहुंचे टॉमस फ्रीडमैन को अमेरिकन ही मिले। आउटसोर्सिंग के केंद्र के तौर पर उभरे बंगलुरू में जो अंतरराष्ट्रीय कॉल सेंटर काम कर रहे हैं, उनके बाजार अमेरिका में हैं, उनके ग्राहक अमेरिका में हैं और उनके लिए बंगलुरू में काम करने वाले लोग अपने ग्राहकों से सहज रिश्ता बनाए रखने के लिए ना सिर्फ अमेरिकी लहजे की अमेरिकी बोलना सीख गए हैं, बल्कि उन्होंने अमेरिकन नाम भी अख्तियार कर लिया है। इन अर्थों में देखें तो भारत में भी एक अमेरिका बस गया है, जो अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए काम कर रहा है। इतना ही नहीं इन अमेरिकियों की धरती तो भारतीय है, जन्म भी भारत में ही हुआ है, लेकिन तकनीकी क्रांति के दम पर उन्होंने जो ताकत हासिल की है, उसकी वजह से वे भारत में रहते हुए ही अमेरिकी बनते नजर आ रहे हैं। भारतीय धरती पर अमेरिकी, अमेरिकी धरती पर भारतीय, एशिया में यूरोप और यूरोप में एशिया के चलन और ज्ञान-विज्ञान का जो संस्पर्श बढ़ा है, उसे टॉमस एल फ्रीडमैन ने अपनी किताब द वर्ल्ड इज फ्लैट में संजोया है। तकनीक और ज्ञान आधारित दुनिया में बढ़ते एशियाई वर्चस्व को दिखाने-समझाने वाली इस पुस्तक की दुनिया भर में अब तक पचास लाख प्रतियां बिक चुकी हैं। इसे हाल ही में पेंगुइन बुक्स इंडिया ने अब दुनिया गोल नहीं नाम से प्रकाशित किया है।
उन्नीसवीं सदी की औद्योगिक क्रांति की रोशनी अमेरिका तक पहुंची। विकास की धारा यूरोप से होते हुए अमेरिका तक पहुंची। तकनीक और ज्ञान-विज्ञान के जरिए यूरोप और अमेरिका ने पूरी दुनिया पर वर्चस्व स्थापित कर लिया है। तकनीक और ज्ञान-विज्ञान की ताकत ही रही कि बीसवीं सदी यूरोप और अमेरिका की रही। लेकिन इन्फोसिस, विप्रो, सैमसंग, ओनिडा, ह्यूंडई जैसी हजारों एशियाई कंपनियों की वजह से इक्कीसवीं सदी को एशिया की सदी कहा जा रहा है। टॉमस एल फ्रीडमैन को लगता है कि तकनीक और ज्ञान की यह यात्रा जिस तरह हो रही है, उसके मूल में भी कहीं न कहीं दुनिया का समतल होना ही है। फ्रीडमैन ने तकनीकी क्रांति को अपनी आंखों से भारत, चीन और मध्य पूर्व के देशों में देखा है। फ्रीडमैन की नजर में ब्लॉगिंग्स, ऑनलाइन एनसाइक्लोपीडिया और पॉडकास्टिंग के जरिए एशिया के दो महत्वपूर्ण देशों चीन और भारत पूरी दुनिया को जबर्दस्त तरीके से प्रभावित कर रहे हैं। फ्रीडमैन का मानना है कि दुनिया आज जितनी एक-दूसरे कोनों और विचारों के नजदीक है, उतनी पहले कभी नहीं थी। इसकी बड़ी वजह यही है कि तकनीक और ज्ञान-विज्ञान ने इस नजदीकी को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।
भले ही एशिया का दुनिया में वर्चस्व बढ़ रहा हो, लेकिन एशिया का एक हिस्सा अब भी ऐसा है, जिसके यहां पैसा तो बहुत है, लेकिन ज्ञान की दुनिया में उनका वर्चस्व नहीं बढ़ रहा है। निश्चित तौर पर अरब देशों का यह समूह है। जिनके यहां तेल के चलते पेट्रो डॉलर की बाढ़ है। लेकिन वैसी तकनीकी और ज्ञान क्रांति नहीं है, जैसी भारत और चीन में दिख रही है। इसे समझाने के लिए फ्रीडमैन 2003 में प्रकाशित एक रिपोर्ट का हवाला देते हैं। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के लिए अरबी समाज वैज्ञानिकों ने यह रिपोर्ट तैयार की थी। इस रिपोर्ट के मुताबिक 1980 से 1999 के बीच अरब देशों ने सिर्फ 171 पेटेंट ही कराए, जबकि इसी दौर में दक्षिण कोरिया ने अकेले 16,328 पेटेंट कराए। जबकि कंप्यूटर और प्रिंटिंग टेक्नॉलजी से जुड़ी कंपनी हैवलेट पैकर्ड हर दिन औसतन 11 पेटेंट कराती है। इसी रिपोर्ट के मुताबिक अध्ययन अवधि में अरब देशों में प्रति दस लाख की आबादी पर 371 वैज्ञानिक और इंजीनियर काम कर रहे थे। लेकिन अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका समेत दुनिया का यह औसत 979 था। फ्रीडमैन अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की सन 2004 की एक रिपोर्ट का हवाला भी देते हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में 15 से 24 साल की उम्र वाले बेरोजगार पुरूषों की संख्या 8 करोड़ 80 लाख थी। जिनमें से अकेले 26 फीसदी लोग अरब देशों से ही थे। फ्रीडमैन इस रिपोर्ट के हवाले से इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि अरब देशों में आगे बढ़ने की ललक इसलिए नहीं है, क्योंकि वहां के लोगों की रूझान धार्मिक ज्यादा है और अरब-मुस्लिम जगत में नई चीजों के लिए जगह नहीं है। फ्रीडमैन का मानना है कि ज्ञान जगत में पिछड़ने की वजह से ही इस्लामिक और अरबी जमात में कट्टरता बढ़ रही है।
दुनिया को समतल बताने की इस दौड़ में फ्रीडमैन को कई बार ऐसे सवालों का भी सामना करना पड़ा है, जिससे आज का आम अमेरिकी बचना चाहता है। मसलन भारत और चीन की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और उसके चलते उपभोग का बढ़ता दायरा, गाड़ियों की बढ़ती संख्या उन्हें बहुत परेशान करती है। चीन में एक लेक्चर के दौरान फ्रीडमैन ने जैसे ही यह कहा कि चीन को गाड़ियों की संख्या कम करनी चाहिए और उसे ऊर्जा की खपत कम करनी चाहिए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो दुनिया को ऊर्जा संकट का जल्द ही सामना करना पड़ेगा। उनके व्याख्यान के बाद एक लड़की ने उनसे ही यह सवाल पूछ लिया कि आखिर भारत और चीन को क्यों नहीं ऊर्जा खपत बढ़ानी चाहिए। लगे हाथों उस लड़की ने फ्रीडमैन के सामने एक सवाल उछाल दिया कि अमेरिका और यूरोप ने अपने विकास के दौर में तेल और ऊर्जा की खपत कर ली है और अब बारी भारत और चीन की ही है। फ्रीडमैन तब सोचने के लिए मजबूर हो जाते हैं। क्योंकि बराबरीवाद के आधार पर देखें तो यह तर्क सही है। चिंतन के क्रम में फ्रीडमैन अमेरिका को सुझाते हैं कि उसे खुद के उपभोग पर काबू पाने के बाद ही चीन और भारत से जलवायु परिवर्तन की दिशा में बेहतर काम और नतीजों की उम्मीद रखनी चाहिए। फ्रीडमैन ऐसा कहते वक्त भले ही गांधी का संदर्भ नहीं देते, लेकिन यह सच है कि गांधी का भी यही रास्ता था। गांधी भी ऐसा ही सोचते थे।
तकनीक और ज्ञान का गुणगान करते-करते फ्रीडमैन आखिर में उदास हो जाते हैं। वे कहते हैं – “ दुनिया का समतल होते जाना हमारे लिए नई संभावनाएं, नई चुनौतियां, नए सहयोगी लेकर आया है। लेकिन अफसोस है कि वह साथ में नए खतरे भी लेकर आया है, खासकर अमेरिकी होने के नाते यह जरूरी है कि हम इन सबमें सही संतुलन कायम करें। यह जरूरी है कि हम सबसे अच्छे विश्व नागरिक बनें, जो हम नहीं बन पाते हैं, क्योंकि समतल दुनिया में अगर आप अपने बुरे पड़ोस में नहीं जाते हैं तो वह आपके पास आ सकता है। ”
फ्रीडमैन की यह किताब बदलती दुनिया के बदलाव के औजारों को समझने का जितना अच्छा जरिया बन पड़ी है, दुनिया के भावी खतरों से उतनी मुस्तैदी से आगाह भी करती है।

रविवार, 12 दिसंबर 2010

अफसरशाही और प्रोफेसरशाही को समर्पित

उमेश चतुर्वेदी

पूरे देश में मौसमी दहलीज पर जब सर्दी दस्तक देती है तो जिंदगी को जल्दी समेटने की तैयारियां तेज हो जाती हैं। एक तरफ सूरज देवता अपनी किरणों को समेटते हैं और दूसरी तरफ देश गुदड़ी से लेकर अलाव तक के सहारे रात का अंधेरा काटने की दिशा में आगे बढ़ जाता है। ऐसा नहीं कि गुलाबी सर्दियां सिर्फ शहरों को ही भली लगती हैं, गांवों को भी गुलाबी सर्दियां उतना ही आनंद और सुकून देती हैं, जितना सुविधाजीवी शहरातियों को। लेकिन हाड़ कंपाने वाली ठंड पूरे देश में जिंदगी की गाड़ी को भी ठंडी कर देती है। लेकिन इन्हीं दिनों दिल्ली के साहित्यिक गलियारे गुलजार हो जाते हैं। सर्दियों की परवाह करने की जरूरत भी नहीं रहती। रसरंजन का सर्दियां बेहतरीन बहाना बन जाती हैं। इसी बहाने किताबों के विमोचन का दौर तेज हो जाता है। साहित्यिक गलियारे की यह गर्मी साहित्य अकादमी पुरस्कारों के लिए जोड़तोड़ के चलते बढ़ जाती है। वैसे भी इन दिनों विशुद्ध लेखक किस्म के साहित्यकारों की पूछ कम हुई है। लेखक अगर प्राध्यापक हुआ या फिर सरकारी आला अधिकारी तो समझो सोने पर सुहागा। प्रकाशकों की फौज उनकी किताबों के प्रकाशन और प्रकाशन के बाद लोकार्पण के बहाने वैचारिक विमर्श में जुट जाती है। अगर लेखक ऊंचा सरकारी अफसर हुआ तो क्रांतिकारी होने का दावा करने वाले लेखक और आलोचक तक उसकी किताब को न भूतो न भविष्यति का विशेषण देने लगता है। दिल्ली के अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेला के बाद सर्दियां ही ऐसा बड़ा अवसर होती हैं, जब दिल्ली का साहित्यिक समाज सक्रिय हो जाता है। मशहूर लेखक हिमांशु जोशी कहते रहे हैं कि हिंदी को जरूरत है ऐसे लेखक की जो चौबीस घंटे की जिंदगी में पच्चीस घंटे लेखन में व्यतीत करे। ऐसे लेखक हैं भी लेकिन प्रकाशक मित्रों का उन पर ध्यान कम ही जाता है। उनके लिए अधिकारी लेखक कहीं ज्यादा मुफीद है। पच्चीस घंटे लिखने वाला लेखक प्रकाशक की किताबें भला कैसे बिकवा सकता है। लेकिन अफसर या रसूखदार प्रोफेसर हुआ तो किताबें बिकवाना उसके लिए बाएं हाथ का खेल है। जाहिर है ऐसे लेखक प्रकाशक को मुफीद लगते हैं। इसीलिए उनकी कविता हो या कामचलाऊ गद्य की पुस्तक, सब कुछ छाप देता है और उसे पत्रकारिता के हवाले कर देता है। इन दिनों एक और प्रवृत्ति जोर पकड़ रही है। टेलीविजन के लोकप्रिय चेहरों से किताबें लिखवाने का, उन्हें बाकायदा लोकार्पित भी किया जाता है। पिछले दिनों ऐसी ही एक शख्सियत की किताब का पुनर्संस्करण प्रकाशित हुआ। उस किताब को भी न भूतो न भविष्यति बताने के लिए बड़ा कार्यक्रम हुआ। हिंदी के एक नामी प्रकाशक ने इन पंक्तियों के लेखक को एक ऐसे मशहूर टीवी पत्रकार के लिए घोस्टराइटिंग करने का प्रस्ताव दिया था, जिनका बड़ा नाम है। हिंदी के बड़े अखबारों को भी अब अपनी रियल प्रतिभाएं कम ही प्रभावित करती हैं। उन्हें अधकचरी हिंदी लिखने या धाराप्रवाह अंग्रेजी लिखने वाले सोशलाइट किस्म के पत्रकार, नेता या अधिकारी ही विचार पक्ष को मजबूत करने के लिए बेहतर लगते हैं। हिंदी की अपनी मौलिक प्रतिभाओं पर उनका भरोसा नहीं है। जिनका मूल काम ही लिखना-पढ़ना है, हिंदी के ही अखबारों का उन पर इकबाल कम हुआ है। हिंदी के प्रकाशक भी उसी प्रवृत्ति को अपने ढंग से आगे बढ़ा रहे हैं। प्रकाशकों का तर्क है कि मशहूर टीवी पत्रकारों की किताबें खूब बिकती हैं। ऐसा नहीं कि सभी टीवी एंकरों को लिखना ही नहीं आता। लेकिन सबसे ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि जिनकी किताबें छप रही हैं, उनमें से कम के ही पास लिखने का शऊर है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या बिकाऊ चेहरों, कोर्स में किताबें रखवाने की हैसियत रखने वाले प्रोफेसरों और अफसर लेखकों के ही सहारे हिंदी का कारवां आगे बढ़ेगा। इसका जवाब हिंदीभाषी समाज को खोजना पड़ेगा।

चलते-चलते- आठ दिसंबर को दिल्ली का तापमान आठ डिग्री सेल्सियस के आसपास था, उसी दिन वाणी प्रकाशन ने एक साथ आठ उपन्यासों का लोकार्पण करके इतिहास रच दिया। मशहूर लेखक असगर वजाहत का उपन्यास पहर दोपहर, रमेश चंद्र शाह का असबाब-ए-वीरानी , पुन्नी सिंह का जो घाटी ने कहा, ध्रुव शुक्ल का उसी शहर में उसका घर, मोहनदास नैमिषराय का जख्म हमारे, पत्रकार और कवि विमल कुमार का चांद एट द रेट डॉट कॉम, पत्रकार प्रदीप सौरभ का तीसरी ताली और सुरेश कुमार वर्मा का उपन्यास मुमताज महल का एक साथ लोकार्पण निश्चित तौर पर हिंदी साहित्यिक जगत के लिए महत्वपूर्ण घटना रही।

शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

कैसे सधे सुर

उमेश चतुर्वेदी

जिंदगी में लगातार बढ़ती टेलीविजन की दखल से सामाजिक और पारिवारिक मूल्यों में आ रहे नकारात्मक बदलावों को लेकर आवाजें उठनी अब नई बात नहीं रही। इस सिलसिले में अगर कुछ नया है तो वह है क्लासिकल संगीत की दुनिया से उठती मुखर आवाज। प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह से ऑल इंडिया म्यूजिशिन ग्रुप की मुलाकात की अहमियत भी इसीलिए बढ़ जाती है। शास्त्रीय संगीत में अपनी असाधारण साधना के चलते इस ग्रुप के सदस्यों का देश और दुनिया में नाम है। कत्थक नृत्य का दूसरा नाम बन चुके बिरजू महाराज, संतूर के सतरंगे सुरों की दुनिया के शहंशाह पंडित शिवकुमार शर्मा, बांसुरी की मधुर तान के लिए मशहूर पंडित हरिप्रसाद चौरसिया और राजन मिश्र, तबले की थाप के जरिए पूरी दुनिया में अपना सिक्का जमाने वाले उस्ताद जाकिर हुसैन, सुधा रघुनाथन, लीला सैंमसन, टीएन कृष्णन का ग्रुप बनाकर संगीत के बिगड़ते सुरों को ठीक करने के लिए आवाज उठाना निश्चित तौर पर साहस का काम है।

पहले उस्तादों की शागिर्दी में साधना के बाद प्रतिभाओं की खोज होती थी। इस तरह बनी-निखरी प्रतिभाओं को तब शास्त्रीय समाज में आदर के साथ देखा जाता था। लेकिन टेलीविजन ने प्रतिभा खोज के मायने ही बदल दिए हैं। अब रियलिटी शो के जरिए क्लासिकल संगीत और नृत्य जैसी विधाओं में भी प्रतिभाओं की खोज की जाती है, जिनके लिए पहले निष्काम साधना जरूरी मानी जाती थी। निश्चित तौर पर तब की शास्त्रीय प्रतिभाओं के पास लय और ताल की असल थाती होती थी, लेकिन उनके प्रभामंडल में ग्लैमर की छाया नहीं होती थी। भारत में वैसे भी संगीत को आत्मा से परमात्मा से मिलन की राह माना गया है। वैसे भी शास्त्र और बाजार अपने स्वभावों के मुताबिक एक-दूसरे के विरोधी माने जाते हैं। लेकिन टेलीविजन ने इस पारंपरिक समीकरण को बदल कर रख दिया है। टेलीविजन के जरिए सुरों की दुनिया में बाजार की पैठ बढ़ी है। जीटीवी का मशहूर कार्यक्रम सारेगामापा सिंगिंग सुपरस्टार हो या फिर स्टार प्लस का अमूल वॉयस ऑफ इंडिया, शास्त्रीयता की दुनिया में बढ़ती बाजार की पैठ के ही उदाहरण हैं। बाजार की बढ़ती पैठ ने शास्त्रीयता में भी पैसे की पहुंच बढ़ा दी है। कमाई बढ़ना गलत भी नहीं माना जा सकता। लेकिन कमाई के साथ जब शास्त्रीय परंपराओं और सुरों को ताक पर रखा जाता है तो साधकों को तकलीफ होती ही है। वैसे भी बाजार जब दखल देता है तो वह अपनी शर्तों पर चीजों में बदलाव लाता है। बाजार का एक बड़ा तर्क यही होता है कि जनता को जो पसंद है, उसे ही पेश किया जाय। चूंकि मौजूदा टेलीविजन चैनल बाजारवाद के दौर में ही विकसित हुए हैं, लिहाजा उन पर बाजार के लिए शास्त्रीयता से खिलवाड़ का आरोप लगता रहा है। उन्हें सुरों और शास्त्रीय परंपराओं से खिलवाड़ करने का दोषी माना जाता रहा है। संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष और मशहूर कवि अशोक वाजपेयी की अगुआई में ऑल इंडिया म्यूजिशियन ग्रुप ने प्रधानमंत्री से मिलकर अपनी यही चिंता जताई है। ऐसा नहीं कि संगीत की दुनिया की नामचीन हस्तियों ने पहली बार रियलिटी शो पर ऐसे सवाल उठाए हैं। सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर भी ऐसे कार्यक्रमों पर सवाल उठा चुकी हैं। इन कार्यक्रमों पर सिर्फ सुरों या संगीत के साथ खिलवाड़ करने का आरोप नहीं हैं। बल्कि उन पर यह भी आरोप है कि वे संगीत की उदात्त परंपरा को फूहड़ बना रहे हैं। इससे भारतीय शास्त्रीय संगीत का नुकसान हो रहा है। इससे हजारों साल से संभालकर रखी थाती का ही नुकसान होगा और उसे सही तरीके से बाद वाली पीढ़ी के लिए संजो कर रखना मुश्किल हो जाएगा।

बाजार का तर्क आजकल लोकतांत्रिक परंपराएं लागू करने के बहाने भी सामने आ रहा है। बिग बॉस और राखी का इंसाफ जैसे रियलिटी शो का प्रसारण समय बदलने का फरमान नवंबर के आखिरी हफ्ते में जब सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने जारी किया तो उस समय भी लोकतांत्रिक परिपाटी का ही तर्क दिया गया। कहा गया कि जनता पर ही यह छोड़ दिया जाना चाहिए कि वह किसी कार्यक्रम को पसंद करती है या नहीं...लेकिन बाजार के पैरोकार यह तर्क देते वक्त भूल जाते हैं कि लोकतंत्र की कामयाबी की पहली शर्त यह होती है कि जनता का मानसिक स्तर लोकतांत्रिक मूल्यों को समझने लायक हो। सुरों और नृत्य की शास्त्रीयता की परख शास्त्रीय जानकार ही कर सकता है। सामान्य जनता की पसंदगी और नापसंदगी के दम पर किसी शो या तथ्य को अच्छा या बुरा ठहराना दरअसल गलत कसौटी ही अख्तियार करना होगा। वैसे आधुनिक लोकतांत्रिक समाज का दावा करने वाले देश चाहे ब्रिटेन या फ्रांस या फिर जर्मनी, उनके यहां अपनी परंपरा की थाती को बचा कर रखने का जज्बा बरकार है। पूर्वी यूरोप के कई देशों को अपने संगीत और शास्त्रीय कलाओं की धरोहर पर गर्व है। इसलिए उनसे थोड़ी-भी छेड़छाड़ मंजूर नहीं है। बाजार तो उनके यहां भी है। फिर परंपराओं और मूल्यों की दुहाई देने वाले भारतीय समाज से ऐसी उम्मीद क्यों न की जाए। प्रधानमंत्री से इसी उम्मीद की दिशा में कदम उठाने की संगीतकारों के ग्रुप की मांग को इसी आधार पर जायज ठहराया जाना चाहिए।

शनिवार, 27 नवंबर 2010

सपाट बयानी के खतरे

उमेश चतुर्वेदी
तीन दिसंबर को बांग्लादेश को बने 39 साल हो जाएंगे। यूं तो बरसी और सालगिरह पर किसी महत्वपूर्ण घटना का याद आना असहज नहीं है। लेकिन बांग्लादेश की याद सिर्फ रस्मी तौर पर नहीं आ रही है। हर साल जब तीन दिसंबर आता है, बचपन में पढ़े एक रिपोर्ताज की स्मृतियां जाग उठती हैं। ब्रह्मपुत्र के मोर्चे पर शीर्षक इस रिपोर्ताज को तो किसी संकलन में पढ़ा था। जब साहित्य और पत्रकारिता से गहरा रिश्ता बना तो पता चला कि यह रिपोर्ताज पहले धर्मयुग में छपा था। बांग्लादेश के गठन की तैयारियों के बीच भारतीय सेना की पाकिस्तानी सेना से भिड़ंत भी हुई थी। उसी लड़ाई के एक मोर्चे से हिंदी के यशस्वी कवि और पत्रकार डॉक्टर धर्मवीर भारती ने यह रिपोर्ताज लिखा था। ब्रह्मपुत्र नदी के दोनों तरफ से जारी गोलाबारी के बीच धर्मवीर भारती खुद भी मौजूद थे। यह लेखन इसलिए ज्यादा याद आता है, क्योंकि युद्ध के मोर्चे से लिखे इस रिपोर्ताज में भाषा के जबर्दस्त प्रयोग दिखते हैं। पढ़ते वक्त लगता है जैसे हम सीधे-सीधे लड़ाई के दृश्यों से दो-चार हो रहे हैं। आज का जमाना होता तो धर्मवीर भारती का वह रिपोर्ताज भी खारिज कर दिया जाता यह कहते हुए कि पेस और मूवमेंट लड़ाई के मोर्चे की रिपोर्ट कैसी ? लेकिन ब्रह्मपुत्र के मोर्चे से लिखा यह रिपोर्ताज उन लोगों को जरूर सुकून पहुंचाता है और हिंदी की भाषाई ताकत को महसूस भी कराता है, जिन्हें भाषा में खिलंदड़ापन पसंद हैं।
धर्मवीर भारती ही क्यों, मैला आंचल और परती-परिकथा जैसी कृतियों के मशहूर लेखक फणीश्वर नाथ रेणु के उन रिपोर्ताजों को भी पढ़ना अपने आप में सुखद अनुभव है, जो ऋणजल-धनजल शीर्षक से संग्रहीत हैं। मूलत: दिनमान के लिए इन्हें लिखा गया था। 1973 की बिहार की भयंकर बाढ़, उसके पहले का सूखा, बाढ़ और सूखे के बीच पिसती बिहार की जनता, 1967 में पहली बार बिहार में संयुक्त सरकार बनना, उस सरकार की पहली कैबिनेट बैठक का विवरण...ऐसी कई घटनाओं पर रेणु ने रिपोर्ताज लिखे। दिनमान संपादक रघुवीर सहाय ने रेणु से आग्रह करके खासतौर पर ये रिपोर्ताज लिखवाए थे। उन्हें पढ़कर लोगों का दिल न पसीज जाए, गुस्से से मुट्ठियां न तन जाएं या फिर गर्व ना हो...ऐसा हो ही नहीं सकता। भाषाई चमत्कार और खास घटनाओं के लिए खास शब्दों का इस्तेमाल....इसकी बेहतरीन बानगी है रेणु के ये रिपोर्ताज. अस्सी के दशक तक भाषाई खिलंदड़ी के साथ रिपोर्ताज लेखन की यह परंपरा चलती रही। 1980 के दशक के आखिरी दिनों में भाषाई खिलंदड़ापन का यह प्रयोग टूटने लगा। क्योंकि बाद में आए हिंदी के कर्णधार संपादकों को इस खिलंदड़ापन में पंडिताऊपन नजर आने लगा था। उन्हें हिंदी पत्रकारिता के सबसे बड़े दुश्मन हिंदी से साहित्यकार पत्रकार नजर आने लगे थे। उनके खिलाफ जमकर अभियान चलाया गया। जिन धर्मवीर भारती, रघुवीर सहाय, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, अज्ञेय ने हिंदी को मांजने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, वे सब के सब नए संपादकों की नजर में हिंदी पत्रकारिता के खलनायक थे। खलनायकत्व का यह प्रचार अंतत: हिंदी की नवोन्मेषी विधाओं पर पड़ा। अब तो हालत यह है कि उनके दर्शन भी नहीं होते। 1970 के दशक में वाराणसी से निकलने वाले आज अखबार की तूती पूरे उत्तर प्रदेश और बिहार में बोलती थी। उसमें विवेकी राय का साप्ताहिक स्तंभ मनबोध मास्टर की डायरी छपती थी। भले ही इस स्तंभ के नाम में डायरी शब्द जुड़ा था, लेकिन हकीकत में यह डायरी की बजाय रिपोर्ताज ही था। मजे की बात यह है कि इसे पढ़ने वालों का अपना बड़ा पाठक वर्ग था। इन प्रकीर्ण विधाओं (बाद में पाठ्यक्रमों में रिपोर्ताज और डायरी के लिए प्रकीर्ण शब्द का ही इस्तेमाल किया जाता था।) ने पाठकों के ज्ञान के भंडार में वृद्धि तो की ही, उनका स्तरीय मनोरंजन भी किया। लेकिन इन विधाओं का सबसे बड़ा योगदान यह है कि उन्होंने भाषा को नए-नए शब्द दिए। ऐसा नहीं कि आज ऐसी विधाओं में लोग सक्रिय नहीं हैं। उदयन वाजपेयी, विवेकी राय, नर्मदाप्रसाद उपाध्याय जैसे नाम सक्रिय तो हैं, लेकिन मौजूदा पत्रकारिता में ऐसी रचनात्मकता को मंच उपलब्ध कराने की जगह ही नहीं रही। इसका असर यह हो रहा है कि हमारी नई पीढ़ी के शब्द भंडार में कमी होती जा रही है। हिंदी का हर चौथा शब्द उनकी भौंहों पर बल डालने के लिए काफी होता है। मजे की बात यह है कि मौजूदा पत्रकारिता नएपन और प्रगतिशीलता के नाम पर इसे ही बढ़ावा दे रही है। आज की शहराती पीढ़ी अपने भारत से ही परिचित नहीं है, रही-सही कसर उसे भाषा से भी काट कर पूरा किया जा रहा है।


सोमवार, 22 नवंबर 2010

नकारात्मक प्रतिभाओं की मशहूरियत का दौर


उमेश चतुर्वेदी
झांसी जिले के प्रेम नगर निवासी लक्ष्मण की मौत ने टेलीविजन की चंचल और मुंहफट बाला के रियलिटी शो राखी का इंसाफ को सवालों के घेरे में ला दिया है। लक्ष्मण के घरवालों के मुताबिक खुलेआम टीवी कैमरे के सामने राखी द्वारा उसे नामर्द कहे जाने के सदमे को वह झेल नहीं पाया। लक्ष्मण की मौत ने एनडीटीवी इमैजिन के इस शो को विवादों में ला दिया है और इसे बंद किए जाने की मांग उठने लगी है। पंजाब सरकार के एक मंत्री हीरा सिंह गाबड़िया तक इसे बंद करने की सलाह दे चुके हैं। मुंबई हाईकोर्ट में इसके खिलाफ याचिका भी दायर की जा चुकी है। ये पहला मौका नहीं है, जब राखी का यह शो विवादों में आया है। अभी कुछ ही हफ्तों पहले राखी के इसी शो में भोजपुरी फिल्मों की एक स्ट्रगलर और एक कास्टिंग डाइरेक्टर के बीच खुलेआम गालीगलौज हुआ और दोनों ने कैमरे के सामने एक-दूसरे पर हाथ उठा दिया।
दरअसल यह नकारात्मक प्रचार का दौर है। उदारीकरण ने जिंदगी के तमाम मूल्यों को किनारे रखने में मदद दी है। नकारात्मकता को प्रचार मिलता है और इस प्रचार के चलते दर्शकों की भीड़ ऐसे कार्यक्रमों की ओर टूट पड़ती है। इस दौर में नकारात्मक शख्सियतों को ही पसंद किया जा रहा है। लिहाजा टेलीविजन चैनलों को भी दर्शक जुटाने का यह नकारात्मक तरीका ही पसंद आ रहा है। चूंकि राखी के शो पर आरोप है कि एक शख्स की मौत हो गई है, लिहाजा उस पर इन दिनों उंगलियां खूब उठ रही हैं। लेकिन भारतीय टेलीविजन की दुनिया में दिखने वाला यह एक मात्र रियलिटी शो नहीं है, जिसका कंटेंट जिंदगी के तमाम मूल्यों को ध्वस्त करते हुए आगे बढ़ रहा है। बिग बॉस सीजन – 4 भी इन दिनों कलर्स पर छाया हुआ है। टैम की रेटिंग रिपोर्टें बताती हैं कि जिस दिन सलमान खान इस कार्यक्रम की एंकरिंग कर रहे होते हैं, उस दिन हिंदी मनोरंजन चैनलों को देखने वाले दर्शकों का सबसे ज्यादा हिस्सा इसी चैनल के पास होता है। बिग बॉस में हो रही घटनाएं पहले से तय हैं या नहीं, यह तो बाद के बहस का विषय है। लेकिन इतना तय है कि यहां भी जमकर ऐसे मूल्यों की धज्जियां उड़ाई जाती हैं, जिनकी शिक्षा लोग इस बदलाव के दौर में भी शायद ही अपने बच्चों को देना चाहें। डॉली बिंद्रा की खुलेआम जारी बदतमीजी और चीख-चिल्लाहट, पाकिस्तान की असफल अभिनेत्री वीना मलिक की अश्लीलता भरी अदाएं और उनके प्यार में अश्लीलता की हद तक डूबे महान समाजवादी नेता रजनी पटेल के पोते अस्मित पटेल को देखना आज उस समाज को पसंद आ रहा है, जिसके ड्राइंग या बेडरूम में टेलीविजन की अबाध पहुंच है। नकारात्मकता आज प्रचार पाने का माध्यम बन गई है। इसलिए रियलिटी शो को नकारात्मक विषय और नकारात्मक चरित्र पसंद आ रहे हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो कलर्स को महान चोर बंटी को क्यों चुनना पड़ता। उसे डॉली बिंद्रा की चीख-पुकार क्यों पसंद आती। बीना मलिक पर आरोप है कि उनके क्रिकेट के खेल के सटोरियों से संबंध हैं। इस आरोप वाले व्यक्ति को जेल के सीखचों के पीछे होना चाहिए। उसकी साख सवालों के घेरे में होनी चाहिए। लेकिन वह एक प्रतिष्ठित चैनल के जरिए घर-घर पहुंच तो रही ही है, बदले में उसे मोटा माल भी मिल रहा है। सीमा परिहार बीहड़ों की धूल फांकते हुए अपनी जो पहचान नहीं बना पाईं, वे अब कलर्स के जरिए देश के सभ्य परिवारों के ड्राइंग रूम की शोभा बन चुकी हैं। रियलिटी शो का एक मकसद तो यही है कि मशहूर या कुख्यात शख्सियतों की जिंदगी में झांका जाय। राखी सावंत, डॉली बिंद्रा या ऐसी ही हस्तियों से किसी अच्छेपन की उम्मीद तो नहीं की जा सकती। ब्रेड के टुकड़े या एक सेव और चाय की एक प्याली के लिए भी ये शख्सियतें किस हद तक गिर सकती हैं, इसकी असल तस्वीर ये शो पेश तो कर ही रहे हैं। गालियों को तो जैसे टेलीसमाज में स्वीकृति हासिल हो गई है। तभी तो बिग बॉस की एंकरिंग करते हुए सलमान खान कुछ भी बोल देते हैं और दर्शक फिर भी तालियां बजा रहे होते हैं। एमटीवी रोडीज और यूटीवी के बिंदास भी बिंदासपन की ही असल तस्वीर पेश करते हैं। जहां गालियां नवाचार के तौर आराम से दी जाती हैं और सुनी भी जाती हैं। इन रियलिटी शो ने हमारे हास्य बोध को भी बदलकर रख दिया है। जहां द्विअर्थी संवादों की भरमार है। सोनी टीवी पर भी एक हास्य शो आता है। रियलिटी शो की तरह के इस शो में जितने द्विअर्थी संवादों का इस्तेमाल होता है, उससे दादा कोंडके की फिल्मों की याद आ जाती है। लेकिन दिलचस्प यह है कि उत्सव जैसी फिल्म में अभिनय से विख्यात हुए शेखर कपूर को ऐसे संवादों को हंसने का बहाना ही होते हैं। समाज तालियां पीट रहा है और कंपनियां इन तालियों के चलते विज्ञापनों की माया से भरी हुई हैं।
पश्चिमी दुनिया में भी ढेरों रियलिटी शो चल रहे हैं। वहां भी वे लोकप्रिय हैं। लेकिन शोध रिपोर्टें बताती हैं कि ये शो बच्चों में नकारात्मक प्रवृत्ति को बढ़ावा देते हैं। जर्मनी की मीडिया शिक्षक माया गेयोत्स ने इस विषय पर शोध किया है। उनका कहना है कि 9 से 22 साल के लोग अनजाने में ही इन शोज़ से बहुत कुछ सीख जाते हैं। उनके मुताबिक बच्चे और युवा इन शोज़ से बहुत कुछ सीखते हैं। मिसाल के तौर पर जर्मनीज़ नेक्सट टॉप मॉडल में प्रतियोगियों से कई तरह के टास्क कराए जाते हैं, मसलन बिना कपड़ों के अपना फोटोशूट कराना। जब बच्चे यह सब देखते हैं तो वे सोचते हैं कि वे भी ऐसा कुछ कर सकते हैं। माया कहती हैं कि इन रियलिटी शो को देखते-देखते बच्चों को लगने लगता है कि जीवन में सफल होने और आगे बढ़ने के लिए खूबसूरत दिखना और अच्छे कपड़े पहनना बेहद ज़रूरी है। बच्चों को लगने लगता है कि ऐसा स्टार या फिर मॉडल बनना ही तरक्की कहलाता है।
माया के इन निष्कर्षों की तसदीक अपने देश में भी हो चुकी है। एक रियलिटी शो में हिस्सा लेते वक्त दो साल पहले इंदौर में एक नौजवान अपनी जान गंवाते-गंवाते बचा। वह पानी के टब में ज्यादा से ज्यादा देर तक डूबे रहे कर स्टार बनने की दौ़ड़ में शामिल था। स्टार बनने के चक्कर में रियलिटी शो में शामिल हुई कोलकाता की एक स्कूली लड़की को उस शो के निर्णायकों ने इतना डांटा कि वह अस्पताल पहुंच गई और उसे लकवा मार गया। वह अपनी आवाज भी खो चुकी थी। काफी इलाज के बाद ही वह स्वस्थ हो सकी। जब रामायण-महाभारत का दौर चल रहा था, तब राम और रावण की तरह तीर से लड़ाई करने का चलन बढ़ गया था। हालांकि वे रियलिटी शो नहीं थे। पूरी तरह से महाकाव्यात्म कथाओं पर आधारित वे धारावाहिक थे। आस्था और सांस्कृतिक इतिहास से जुड़ा होने के बावजूद उन धारावाहिकों पर सवाल उठे। बच्चों को समझाने और उन्हें चेताने की कोशिशें शुरू हो गई थीं। हालांकि उनमें जीवन मूल्यों की स्थापना पर जोर था। लेकिन तब से लेकर करीब दो दशक का वक्त बीत चुका है। इसके बावजूद अब के रियलिटी शो को लेकर चेताने की कोई कार्यवाही होती नहीं दिख रही। वैसे राखी का इंसाफ जैसे शो भारतीय कानून व्यवस्था का भी मजाक उड़ा रहे हैं। अगर राखी जैसे लोग ही इंसाफ कर सकते हैं तो कानून व्यवस्था संभालने और न्याय करने वाली संस्थाओं की क्या जरूरत रह जाती है। राखी अपने हावभाव के जरिए इंसाफ चाहें जितना भी करती हों, उनकी ये हरकत दर्शकों को पसंद आती है। बिग बॉस की डॉली बिंद्रा को भी इसी श्रेणी में रखा जा सकता है। नकारात्मक प्रचार की ताकत बढ़ रही है और बाजार चूंकि इसी के सहारे बढ़ रहा है, लिहाजा इसे बढ़ावा देने में उसकी भूमिका बढ़ती जा रही है। यही वजह है कि तमाम टेलीविजन चैनलों पर ऐसे शो की बाढ़ आई हुई है। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बाजार को भले ही ये चीजें पसंद आती हैं। लेकिन समाज के लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा, इसे निर्धारित करने का काम व्यवस्था संभालने वाली संस्थाओं का है, जिनसे ऐसे मसलों पर निर्मम और गंभीर कदमों की उम्मीद की जाती है। बीबीसी के चैनल फोर पर प्रसारित बिग ब्रदर कार्यक्रम में जेड गुडी ने शिल्पा शेट्टी पर नस्ली टिप्पणियां की थीं, तो उसका ब्रिटेन की मीडिया की सबसे बड़ी निगरानी संस्था ब्रा़डकास्टिंग रेग्युलेटरी अथॉरिटी ने संज्ञान लिया था और चैनल फोर को नोटिस जारी किया था। जिसका वहां के नागरिकों तक ने स्वागत किया था। लेकिन खेद का विषय यह है कि अपने यहां ऐसी पहल होती नहीं दिख रही।

बुधवार, 6 अक्तूबर 2010

क्यों पिछड़ा है राजस्थानी सिने उद्योग

राजस्थानी सिनेमा का यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि हिंदी की मुख्यधारा की फिल्मों में राजस्थानी परिवारों की कहानियां हिट रहती हैं, लेकिन राजस्थानी भाषा का अपना सिनेमा न तो क्लासिक और न ही कमर्शियल फिल्म के तौर पर अब तक खास पहचान बना पाया है। हालांकि हिंदी का शुरूआती सिनेमा राजस्थानी रजवाड़ों की कहानियों से भरा पड़ा था। मीराबाई से लेकर पन्ना धाय तक की कहानियां भी हिंदी सिनेमा का विषय बन चुकी हैं। मुगल-ए-आजम से लेकर जोधा-अकबर जैसी फिल्मों ने राजस्थानी पृष्ठभूमि का हिंदी सिनेमा ने कलात्मक और व्यवसायिक दोहन किया है। राजस्थानी तर्ज के नीबूड़ा-नीबूड़ा जैसे कई गीतों ने हिंदी सिनेमा के हिट होने में अहम योगदान दिया है। हम दिल दे चुके सनम तो पूरी तरह राजस्थानी पृष्ठभूमि की ही फिल्म थी। फिर क्या वजह है कि राजस्थानी सिनेमा अपनी अलहदा पहचान नहीं बना पाया। इसका जवाब देते हैं हिंदी में कई हिट फिल्में बना चुके के सी बोकाड़िया। आज का अर्जुन, तेरी मेहरबानियां जैसी हिट फिल्में बनाने और निर्देशित करने वाले बोकाड़िया राजस्थान के ही मेड़ता सिटी के रहने वाले हैं। उनका कहना है कि राजस्थान में हर 20-25 किलोमीटर के बाद भाषा बदल जाती है। यही वजह है कि राजस्थानी सिनेमा की दुर्दशा हो रही है। क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों के पिछड़ने की वजह की जब भी चर्चा होती है, तब यही सवाल उठता है। हरियाणा अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टीवल में हरियाणवी फिल्मों के विकास पर हो रही गोष्ठी में भी यही मजबूरी निर्माता-निर्देशक अश्विनी चौधरी ने जताई थी।
सवाल यह है कि क्या सचमुच बोलियों में विविधता ही हरियाणवी या राजस्थानी सिनेमा के विकास की बड़ी बाधा हैं। यह तर्क देने वाले भूल जाते हैं कि इस देश में बरसों से कहावत चली आ रही है- कोस-कोस पर पानी बदले, तीन कोस पर बानी। यह स्थिति भारत की हर भाषा की है। तेलुगू, तमिल, कन्नड़, मलयालम, मराठी, बांग्ला, भोजपुरी कोई भी ऐसी बोली नहीं है, जिसे उसके प्रभाव क्षेत्र में एक ही तरह से बोला जाता हो। खुद हिंदी के साथ भी ऐसी स्थिति नहीं है। बिहार वाले की हिंदी, मध्य प्रदेश वाले की हिंदी से अलग है। लखनऊ समेत मध्य उत्तर प्रदेश का व्यक्ति जिस हिंदी का इस्तेमाल करता है, झारखंड या छत्तीसगढ़ की हिंदी से वह अलग होती है। लेकिन क्षेत्रीय भाषाओं और हिंदी का सिनेमा चल रहा है। उसकी व्यवासियक और क्लासिकल, दोनों पहचान है। ऐसे में बोलियों की विविधता को क्षेत्रीय सिनेमा के विकास में बाधक मानने वाले तर्क पर गौर किया जाना जरूरी है।

सोमवार, 4 अक्तूबर 2010

क्षेत्रीय सिनेमा के विकास के लिए राज्य का संरक्षण जरूरी


समानांतर और सरोकार वाले सिनेमा को लेकर अपने यहां जब भी चर्चा होती है, बांग्ला और मलयालम जैसी क्षेत्रीय भाषाओं का नाम सबसे उपर होता है। सार्थक सिनेमा की कड़ी में मराठी, उड़िया और असमी जैसी भाषाओं ने भी अपनी पहचान दर्ज करा दी है। कमर्शियल फिल्मों की दुनिया में तमिल, तेलुगू, कन्नड़ का कोई जोड़ नहीं है। भोजपुरी तो इन दिनों अपने कमर्शियल सिनेमा को लेकर क्षेत्रीय भाषाओं में नई पहचान बना रही है। इन अर्थों में देखा जाय तो हरियाणवी फिल्मों का अब तक का विकास निराश करता है। हरियाणा के यमुनानगर में आयोजित तीसरे अंतरराष्ट्रीय हरियाणा फिल्म फेस्टिवल में हरियाणवी सिनेमा का विकास विषय पर आयोजित गोष्ठी में इसी निराशा को समझने की कोशिश की गई। इस मौके पर अपनी पहली ही हरियाणवी फिल्म लाडो से चर्चित हो चुके अश्विनी चौधरी ने मार्के की बात कही। उन्होंने कहा कि अच्छे सिनेमा का बेहतर स्रोत साहित्य होता है। सच कहें तो सिनेमा के लिए साहित्य परखा हुआ दस्तावेज होता है। लेकिन हरियाणवी सिनेमा का संकट यह है कि यहां कोई अपना साहित्य ही नहीं है। यही वजह है कि जब कोई हरियाणवी सिनेमा में हाथ आजमाना चाहता है तो कहानी के लिए उसे लोक साहित्य की ओर देखना पड़ता है। लेकिन लोक के साथ संकट यह है कि वह सिनेमा के लिए हर वक्त उर्वर और कामयाब कहानी नहीं दे सकता। कमर्शियल सिनेमा को जहां आम लोगों का साथ मिलता है, वहीं सरोकारी सिनेमा को समाज के प्रबुद्ध वर्ग का साथ मिलता है। अश्विनी चौधरी के मुताबिक हरियाणवी समाज में इसकी भी कमी है और सबसे बड़ी बात यह है कि हरियाणा की बोलियों में एक रूपता नहीं हैं। यही वजह है कि अगर कोई हरियाणवी फिल्म बनाना चाहता है तो उसके सिनेकार को ये चिंता सताती रहती है कि वह किस बोली में फिल्म बनाए।
बोलियों की समस्या को लेकर अश्विनी चौधरी की इस राय से हरियाणवी सिनेमा की पहली सुपर हिट फिल्म चंद्रावल की हीरोईन ऊषा शर्मा सहमत नहीं हैं। उनका कहना था कि अगर बोलियां बाधा रहतीं तो उनकी फिल्म हरियाणा के बाहर उत्तरी राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दिल्ली और पंजाब के कुछ हिस्सों तक में हिट रही थी।
गोष्ठी में शामिल सभी वक्ता कम से एक मुद्दे पर सहमत थे। उनका मानना था कि क्षेत्रीय सिनेमा के पनपने में राज्य का सहयोग कम से कम शुरूआती दौर में होना चाहिए। क्योंकि जहां-जहां क्षेत्रीय सिनेमा विकसित हुआ है, वहां – वहां क्षेत्रीय सिनेमा का शुरूआती दौर में राज्य ने संरक्षण दिया है।
चंद्रावल का सीक्वल बनाने जा रही ऊषा शर्मा को अफसोस है कि हरियाणा में अब तक राज्य की अपनी कोई फिल्म पॉलिसी नहीं है। 1985 में उन्होंने राज्य के मुख्यमंत्री से फिल्म नीति बनाने की मांग रखी थी। इसमें हरियाणवी भाषा में कम से कम दो फिल्में बना चुके निर्माता को तीस लाख रूपए का राजकीय अनुदान देने की मांग रखी थी। इसके साथ ही उन्होंने कम से कम अस्सी फीसदी शूटिंग हरियाणा में होने वाली फिल्मों को भी यही सहायता देने की मांग रखी थी। इसके साथ ही हर सिनेमा हॉल को हरियाणवी फिल्में कम से कम हर हफ्ते दो शो दिखाने की मांग भी रखी। यह सच है कि अगर यह मांग मान ली जाती तो शायद हरियाणा में सिनेमा के विकास को गति मिल सकती थी। लेकिन अधिकारियों के चलते अब तक न तो राज्य की अपनी फिल्म पॉलिसी बन पाई है और न ही सिनेमा हॉलों को कोई आदेश दिया जा सका है।
ऊषा शर्मा की इस राय से सहमत होने के बावजूद भोजपुरी जैसी क्षेत्रीय भाषाओं के सिनेमा का विस्तार सवाल खड़े करता है। यह सच है कि भोजपुरी का बाजार हरियाणवी की तुलना में बड़ा है। लेकिन यह भी सच है कि उसे न तो बिहार, न ही उत्तर प्रदेश और न ही झारखंड की सरकारों से कोई प्रोत्साहन मिल पाया है। इसके बावजूद कम से कम कमर्शियल स्तर पर भोजपुरी सिनेमा का विस्तार होता जा रहा है। इसका जवाब अश्विनी चौधरी की तकरीर में मिलता है। अश्विनी चौधरी ने कहा कि सिनेमा को बढ़ावा देने में मध्य वर्ग का भी योगदान होता है, लेकिन हरियाणा में कम से कम अपने सिनेमा से प्यार करने वाला मध्यम वर्ग विकसित नहीं हो पाया है। अगर इन तर्कों को ही आखिरी मान लिया जाएगा तो हरियाणवी ही नहीं, किसी भी भाषा और उसके सिनेमा के विकास की गुंजाइश कम होती जाएगी। इस मसले पर सबसे बढ़िया सुझाव रहा शीतल शर्मा का, जिनका कहना था कि अगर रचनात्मक लोग आगे आंएगें तो मध्यवर्ग को आकर्षित किया जा सकेगा और बोलियों की एक रूपता के संकट से भी पार पाया जा सकेगा।
गोष्ठी का संचालन कर रहे हरियाणा के मशहूर संस्कृतिकर्मी अनूप लाठर ने महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने कहा कि बाजार तो चंद्रावल ने ही बना दिया था। यह बात और है कि उस बाजार की दिशा में हरियाणवी सिनेमा आगे नहीं बढ़ पाया। उनके मुताबिक शुरूआती हरियाणवी सिनेमा में प्रशिक्षित कलाकारों की कमी तो थी ही, आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल भी कम ही हुआ। अपनी फिल्म लाडो के संदर्भ में अश्विनी चौधरी भी इस तथ्य से सहमत नजर आ रहे थे।
ऐसी गोष्ठियों का मकसद किसी मुकम्मल नतीजे पर पहुंचना होता है। हालांकि यह गोष्ठी किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाईं। लेकिन अजित राय के शब्दों में कहें तो ऐसी गोष्ठियां किसी मसले का रातोंरात हल नहीं सुझातीं, बल्कि बदलाव की जमीन तैयार करती हैं। ऐसे में यह उम्मीद करना बेमानी नहीं होगा कि हरियाणवी फिल्म के विकास की दिशा में यह गोष्ठी भी एक कदम जरूर साबित होगी।

रविवार, 3 अक्तूबर 2010

अलग –अलग विधा हैं साहित्य और सिनेमा



साहित्य और सिनेमा के रिश्ते की जब भी चर्चा होती है, हिंदी में एक तरह की वैचारिक गर्मी आ जाती है। किसी साहित्यिक कृति पर बनी फिल्म को लेकर अक्सर साहित्यकारों को शिकायत रहती है कि फिल्मकार या निर्देशक ने उसकी रचना की आत्मा को मार डाला। हिमांशु जोशी ने अपनी कहानी सुराज पर बनी फिल्म में मनमाने बदलाव के बाद भविष्‍य में अपनी कहानी पर फिल्म बनाने की अनुमति देने से कान ही पकड़ लिये। हालांकि राजेंद्र यादव, जिनके मशहूर उपन्यास सारा आकाश पर इसी नाम से फिल्म बन चुकी है, मानते रहे हैं कि कहानी और उपन्यास जहां लेखक की रचना होती है, वहीं फिल्म पूरी तरह निर्देशक की कृति होती है। कुछ ऐसा ही विचार हरियाणा अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टीवल के तीसरे दिन सिनेमा और साहित्य के रिश्ते पर आयोजित गोष्ठी में शामिल वक्ताओं के भी रहे।
मशहूर फिल्मकार के. बिक्रम सिंह का कहना है कि साहित्य और सिनेमा के रिश्ते पर चर्चा के वक्त हिंदी में विवाद की असल वजह है कि दरअसल हिंदी में विजुअल आधारित सोच का विकास नहीं हुआ है, बल्कि सोच में शाब्दिकता का जोर ज्यादा है। उनका कहना है कि सिनेमा में कला, संगीत, सिनेमॉटोग्राफी, कला निर्देशन जैसी कई विधाओं का संगम होता है। ऐसे में साहित्य को पूरी तरह से सेल्युलायड पर उतारना संभव नहीं होता। उन्होंने सत्यजीत रे की फिल्म पाथेर पांचाली का उदाहरण देते हुए कहा कि इस उपन्यास में जहां करीब पांच सौ चरित्र हैं, वहीं फिल्म में महज दस-बारह। उन्होंने श्रीलंका के मशहूर उपन्यासकार लेक्सटर जेंस पेरी का उदाहरण देते हुए कहा कि उनके उपन्यास टेकावा पर जब फिल्म बनी और उनसे प्रतिक्रिया पूछी गई तो पैरी ने कहा था कि उपन्यास उनका है, जबकि फिल्म निर्देशक की है। उन्होंने रवींद्र नाथ टैगोर के हवाले से कहा कि सिनेमा कला के तौर पर तभी स्थापित हो सकेगा, जब वह साहित्य से छुटकारा पा लेगा। हालांकि मशहूर फिल्म समीक्षक और कवि विनोद भारद्वाज ने रवींद्र नाथ टैगोर की कहानी चारूलता का उदाहरण देते हुए कहा कि अच्छे साहित्य पर अच्छी फिल्में बनाई जा सकती हैं। जिस पर सत्यजीत रे ने बेहतरीन फिल्म बनाई है। भारद्वाज ने शरत चंद्र के उपन्यास देवदास पर बनी विमल राय की फिल्म देवदास और अनुराग कश्यप की देव डी का उदाहरण देते हुए कहा कि एक ही कृति पर अलग-अलग ढंग से सोचते हुए अच्छी फिल्में जरूर बनाई जा सकती हैं। उनका सुझाव है कि साहित्यकारों को यह सोचना चाहिए कि महान साहित्यिक कृतियों के फिल्मांकन के वक्त छेड़छाड़ उस कृति की महानता से छेड़छाड़ नहीं है। साहित्यिक कृतियों पर बनने वाली फिल्मों की रिलीज के बाद साहित्य और सिनेमा के रिश्तों में आने वाली तल्खी का ध्यान फ्रेंच फिल्मकार गोदार को भी था। यही वजह है कि वे अच्छी और महान कृति पर फिल्म बनाने का विरोध करते थे। वैसे सिनेमा और साहित्य के रिश्ते को समझने के लिए फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान, पुणे के पूर्व निदेशक त्रिपुरारिशरण नया नजरिया देते हैं। उनका कहना है कि चूंकि साहित्य का जोर कहने और सिनेमा का जोर देखने पर होता है, लिहाजा भारत में दोनों विधाओं के रिश्तों में खींचतान दिखती रही है। उनका मानना है कि चूंकि यूरोप में कहने और देखने का अनुशासन विकसित हो चुका है, लिहाजा वहां साहित्य और सिनेमा के रिश्ते को लेकर वैसे सवाल नहीं उठते, जैसे भारत में उठते हैं। शरण के मुताबिक यही वजह है कि भारत में प्रबुद्ध सिनेकार महत्वपूर्ण रचनाओं को छूना तक नहीं चाहते। उनका सुझाव है कि सिनेमा और साहित्य असल में दो तरह की दो अलग विधाएं हैं, लिहाजा उनके बीच तुलना होनी ही नहीं चाहिए।

पुस्तक समीक्षा


संपादकीय लेखन के विकास का गवाह

उमेश चतुर्वेदी
हिंदी पत्रकारिता को शुरूआती दौर में वे सारी चुनौतियां झेलनी पड़ीं, जिनका सामना उदारीकरण के दौर में आए मीडिया बूम के पहले तक सामना करना पड़ रहा था पाठकों की संख्या, ग्राहकों की उदासीनता और पैसे की कमी ने हिंदी पत्रकारिता को शुरूआती दौर से ही परेशान किए रखा है। पिछली सदी के शुरूआती बरसों में ये चुनौतियां और भी पहाड़ सरीखी अंग्रेजी राज के दमन तंत्र के चलते हो जाती थीं। इसके बावजूद प्रताप नारायण मिश्र का चाहे ब्राह्मण नामक पत्र हो या फिर गणेश शंकर विद्यार्थी का प्रताप या फिर माधव राव सप्रे का छत्तीसगढ़ मित्र, हर पत्र का संपादक अपने दौर की समस्याओं को लेकर अपने संपादकीयों में चिंता जाहिर करता रहा है। तरूशिखा सुरजन के संपादन में आई किताब हिंदी पत्रकारिता का प्रतिनिधि संकलन के पृष्ठों से गुजरते हुए इसके बार-बार दर्शन होते हैं।
हिंदी पत्रकारिता में एक प्रवृत्ति आज भी देखने को मिलती है। अखबारों की तुलना में पत्रिकाओं को चलाना और उनमें लिखना-पढ़ना कहीं कम महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। हैरत की बात यह है कि हिंदी पत्रकारिता के शुरूआती दौर में अपनी पत्रिकाओं को जमाने के लिए तब के संपादक लोगों को पत्रिकाओं को दैनिक अखबारों की तुलना में कहीं ज्यादा संग्रहणीय बताने की जरूरत महसूस होती थी। इस संकलन के शुरूआती संपादकीयों में ऐसी चिंताएं बार-बार दिखती हैं। सरस्वती के दिसंबर 1900 के अंक में उसके प्रकाशक ने अपनी परेशानियां गिनाते वक्त इसकी चर्चा की है। 438 पृष्ठ की इस भारी-भरकम किताब में शामिल हिंदी की पहली महिला पत्रिका बालबोधिनी के संपादक भारतेंदु हरिश्चंद्र से लेकर रतलाम की सुगृहिणी की संपादक हेमंत कुमार चौधरी तक के संपादकीय जहां हमें उस दौर में स्त्रीशिक्षा को लेकर जताई जा रही चिंताओं से हिंदी पाठकों को रूबरू कराते हैं तो वहीं प्रताप, अभ्युदय, चांद, सरस्वती के संपादकीय राष्ट्रीय आंदोलन की चिंताओं और भाषा की समस्या से भरे पड़े हैं। विशाल भारत के अपने संपादकीय में सन 1940 में भी बनारसी दास चतुर्वेदी किसानों और मजदूरों की समस्याओं को लेकर अपनी चिंताएं जता चुके हैं। इस संकलन में जहां आजादी के पहले राष्ट्र को बनाने और उसके आजाद होने के बाद की नीतियों पर केंद्रित संपादकीय शामिल हैं, तो बाद के दौर के संपादकीय नेहरू के बाद कौन, पाकिस्तान से लड़ाई और आपातकाल की चिंताओं से पाठकों को रूबरू कराते हैं।
हिंदी पत्रकारिता में संपादकीय लेखन का किस तरह विकास हुआ है, इसे समझने में भी यह संकलन मददगार साबित होता है। हालांकि इसमें संपादन की सीमाएं भी दिखती हैं। खासतौर पर स्नेहलता चौधरी और हिंदी पत्रकारिता के आदि संपादक युगुल किशोर शुक्ल के संपादकीयों को सीधे-सीधे पेश करने की बजाय उन पर लिखे लेख पेश किए गए हैं। जिसका जिक्र अखबारी स्तंभों की तरह नीचे किया गया है। इससे इनकी पाठकीयता के आस्वादन में बाधा आती है।

किताब - हिंदी पत्रकारिता का प्रतिनिधि संकलन
संपादक – तरूशिखा सुरजन
प्रकाशक – राधाकृष्ण प्रकाशन
7 / 31, अंसारी मार्ग, दरियागंज
नई दिल्ली- 110002
मूल्य - रूपए 550 /

बुधवार, 15 सितंबर 2010

शब्द संकोचन का शिकार बनती हिंदी

उमेश चतुर्वेदी
हाल ही में राजधानी दिल्ली से सटे एक कॉलेज में एक मित्र को जाने का मौका मिला। जिस बिल्डिंग के उपरी माले पर स्थित दफ्तर में उन्हें जाना था, उसकी सीढ़ियों पर भारी संख्या में छात्र बैठे हुए थे। छात्रों ने सीढ़ी को ऐसा घेर रखा था कि वहां से चाह कर भी निकलना आसान नहीं था। लिहाजा एक जगह उन्होंने छात्रों से अनुरोध किया – अपना पैर बटोर कर बैठो दोस्त...लेकिन कोई प्रतिक्रिया छात्रों की ओर से नहीं मिली। बल्कि उल्टे उनकी प्रश्नवाचक निगाहें मित्र को घूरती रहीं। दस सेकंड में ही माजरा समझ में आ गया। तब उन्हें छात्रों से अनुरोध करना पड़ा कि अपने पैर समेट लो। राजधानी के नजदीक स्थित कॉलेज के उन छात्रों को बटोरना भले ही समझ में नहीं आया, लेकिन शुक्र है उन्हें समेटना पता था।
शहरी इलाकों में आए दिन हमें ऐसे वाकयों से दो-चार होना पड़ता है। हाल ही में मशहूर गीतकार प्रसून जोशी ने अपने साथ घटी एक घटना का भी जिक्र किया है। एक फिल्म के गीत की रिकॉर्डिंग के वक्त उन्हें भी कुछ ऐसा ही अनुभव हुआ। उस गीत में उन्होंने एक जगह सट-सटकर बैठने का जिक्र किया है। जोशी को हैरानी तब हुई, जब हिंदी फिल्मी दुनिया के संगीतकार, गायक और वहां मौजूद ज्यादातर साजिंदों को सट-सटकर बैठने का अर्थ ही नहीं समझ आ रहा था। हारकर उन्हें सटना की जगह पास-पास बैठने का प्रयोग करना पड़ा। लेकिन प्रसून जोशी को अफसोस है कि सट-सटकर बैठने जैसे शब्दों के प्रयोग से जो तपिश और ध्वनि निकलती है, वह पास-पास में कहां निकलती है। अब तक यह आरोप लगता रहा है कि शाब्दिक ज्ञान की दुनिया नई पीढ़ी में सिमट रही है। लेकिन यह प्रक्रिया तो सत्तर के दशक में ही शुरू हो गई थी, जब कथित तौर पर मांटेसरी और कान्वेंट स्कूलों की खेप गांवों तक पहुंचनी शुरू हुई थी। यह प्रक्रिया तो इन दिनों अपने चरम पर है। लेकिन सत्तर-अस्सी के दशक में शुरू हुए अधकचरे कान्वेंट की परंपरा ने जड़ जमा ली है और वहां से पढ़कर निकली पीढ़ी अब जवान हो गई है। वही पीढ़ी है, जिसे सट-सटकर बैठने का अर्थ अब समझ नहीं आता है। इस पीढ़ी के सामने आपने खालिस हिंदी का प्रयोग किया तो आपको यह भी सुनने के लिए तैयार रहना होगा- क्या डिफिकल्ट हिंदी बोलते हैं आप। इस पूरी प्रक्रिया में भागीदार अपना मीडिया भी है। मीडिया के छात्रों और नवागंतुकों को एक ही चीज बताई-समझाई जाती है कि सरल – सहज भाषा में अपनी बात रखो। सहजता और सरलता की यह परंपरा इतनी गहरी हो गई है कि सामान्य हिंदी के शब्दों की बजाय अंग्रेजी के शब्दों का धड़ल्ले से प्रयोग जारी है। दिल्ली में इन दिनों कॉमनवेल्थ गेम की बड़ी चर्चा है। दो-चार साल पहले तक हिंदी अखबार इसे राष्ट्रमंडल या राष्ट्रकुल खेल कहते नहीं अघाते थे। लेकिन अब वे भी इन शब्दों को भूल गए हैं। हमसे पहले की पीढ़ी ने भाषा का संस्कार और उसका पाठ अखबारों के जरिए ही सीखा है। लेकिन तब मीडिया संस्कारित करने की भूमिका भी निभाता था। लेकिन आज ऐसी हालत नहीं रही है। उसका तर्क है कि उसके पाठक जो पढ़ना चाहते हैं, वह उसे पढ़ाना चाहता है। मीडिया को अब हिंगलिश भाषा अच्छी नजर आने लगी है और यह सब हो रहा है नई पीढ़ी के नाम पर। तर्क तो यह भी दिया जाता है कि नई पीढ़ी को यही सब पसंद है। लेकिन यह तर्क देते वक्त हम यह भूल जाते हैं कि नई पीढ़ी तो सड़क पर ही जीवन की वर्जनाओं को तोड़ना चाहती है। क्या इसकी छूट दी जा सकती है। नई पीढ़ी को छेड़खानी और बदतमीजी में ही मजा आता है। क्या इसके लिए छूट दी जा सकती है। दरअसल मनुष्य स्वभाव से ही आदिम और जानवर होता है। उसे सलीका और शिष्टाचार का पाठ संस्कारों और शिक्षा के जरिए पढ़ाया जाता है। भाषा का संस्कार भी उसी प्रक्रिया की एक कड़ी है। लेकिन दुर्भाग्य से हमने उस परंपरा को तोड़ दिया है। 1853 में जब मैकाले की मिंट योजना के बाद देसी और प्राच्य शिक्षा को खत्म करके सिर्फ अंग्रेजी शिक्षा देने की ईस्ट इंडिया कंपनी की सरकार ने तैयारी की तो उसका जोरदार विरोध हुआ था। तब सवाल उठा था कि अपनी भाषाएं खत्म हो जाएंगी और भाषा खत्म होगी तो संस्कृति पर भी खतरा आएगा। मैकाले की योजना तब सफल तो नहीं हुई, लेकिन आजादी के बाद यह योजना सफल होती नजर आ रही है। जो काम विदेशी नहीं कर पाए, आजादी के बाद आई अपने लोगों की सरकार की नीतियों ने वह कर दिखाया है।
दैनिक जीवन में शब्दों संकोचन को हर वक्त महसूस किया जा सकता है। दैनंदिन व्यवहार में आने वाले शब्द भी अब हम भूलते जा रहे हैं। अगर दिमाग पर जोर डालकर उन शब्दों की तलाश करें तो आपको पता चलेगा कि शब्दों के ज्ञान की दुनिया में कितनी कमी आ चुकी है। हिंदी पखवाड़ा जारी है। हिंदी को कथित तौर पर विकसित करने का पाखंड जारी है। बेहतर तो होता कि हिंदी को अपने लपेटे में ले रही इस प्रवृत्ति पर भी विचार किया जाता।

रविवार, 22 अगस्त 2010

साहित्यिक पत्रकारिता- सवाल सिर्फ पाठकों का नहीं


उमेश चतुर्वेदी
पचास करोड़ हिंदी भाषियों के देश में अगर हिंदी की सबसे लोकप्रिय पत्रिका हंस बारह हजार के आसपास ही बिकती हो तो, हिंदीभाषियों के साहित्यिक संसार पर सवाल उठेंगे ही। किसी भी भाषा की रचनाशीलता की सबसे बेहतर प्रतिनिधि उसकी साहित्यिक पत्रिकाएं ही होती हैं। निश्चित तौर पर इस मोर्चे पर हिंदी का पूरा परिदृश्य निराशाजनक है। हिंदी की लोकप्रिय पत्रकारिता में जिस तरह दैनिक अखबारों की भूमिका बढ़ती जा रही है, वह निश्चित तौर पर हिंदी के लिए बेहतर संकेत तो है। लेकिन इस लोकप्रियता के बरक्स हिंदी में कम से कम साहित्यिक पत्रकारिता को लेकर पाठकों में संस्कार विकसित नहीं हो पाए हैं। हिंदी में जब भी इसकी तरफ ध्यान दिया जाता है, सबसे पहला ध्यान राजभाषा को लेकर सरकारी उदासीनता की ओर ही जाता है। राजभाषा बनने के बावजूद नीति नियंताओं और सत्ता विमर्श में हिंदी की भूमिका वैसी नहीं हो पाई है, जैसी अंग्रेजी की है। रचनाशीलता और रचनात्मकता से जुड़े विमर्श को लेकर हिंदीभाषी राज्यों को छोड़ दें तो केंद्रीय स्तर पर हिंदी सापेक्ष माहौल अभी बनना बाकी है। लेकिन सिर्फ इसी वजह से यह मान लिया जाय कि हिंदी के लिए साहित्यिक पत्रकारिता का माहौल नहीं रहा तो यह निष्कर्ष अधूरा ही माना जाएगा।
हिंदी में आज भी लोकप्रिय किताबों का संस्करण हजार से दो हजार तक ही होता है। साहित्यिक पत्रकारिता पर चर्चा के वक्त हिंदी प्रकाशन जगत की उदासीनता पर भी ध्यान जाना सहज ही है। यह सच है कि हिंदी की कमाई खाने वाले प्रकाशकों ने भी हिंदी के साहित्यिक संस्कार को विकसित करने में कोई खास योगदान नहीं दिया। आजादी के तत्काल बाद चूंकि माहौल राष्ट्रीयता से ओतप्रोत था, लिहाजा उस वक्त हिंदी के लिए सोचने-मरने वाले लोग थे। उस माहौल का ही असर था कि उस वक्त हिंदी में साहसिक पहल करने की जिद्द का बोलबाला था। लेकिन जैसे-जैसे उदारीकरण की तरफ हमारे कदम बढ़ते गए, हिंदी की रचनाशीलता को लेकर जिद्दीपन में कमी आती गई। साहसिक पहल तो अब सिर्फ अंग्रेजी की ही बात है। यह कहना कि सिर्फ इसके चलते ही हिंदी में लोकप्रिय साहित्यिक पत्रकारिता के क्षितिज का फैलाव नहीं हुआ तो यह भी अतिशयोक्ति ही होगी। हालांकि यह भी एक कारण जरूर हो सकता है।
आज हिंदी के कुछ उत्साही कार्यकर्ता तर्क देते नहीं थक रहे हैं कि जब भास्कर, जागरण, अमर उजाला, राजस्थान पत्रिका, हिंदुस्तान, सरस सलिल, प्रतियोगिता दर्पण, गृहशोभा लाखों की संख्या में बिक सकते हैं तो हिंदी की कोई साहित्यिक पत्रिका क्यों सात से दस हजार की संख्या तक भी नहीं पहुंच पाती। लेकिन यह तर्क भी एकांगी ही है। क्योंकि जो सामग्री सरस सलिल में छप सकती है, वह किसी साहित्यिक पत्रिका की सामग्री नहीं हो सकती। दरअसल हर प्रकाशन और विषय विशेष का अपना अनुशासन होता है। बच्चों की पत्रिका में समोसे बनाने की विधियां या फिर लिपस्टिक लगाने के तरीके की जानकारी नहीं दी जा सकती। वैसे ही महिला पत्रिकाओं में राजनीतिक भंडाफोड़ की सामग्री देना भी अटपटा ही लगेगा। कुछ यही हालत साहित्यिक पत्रकारिता की भी है। वहां हर तरह की सामग्री देना संभव ही नहीं होगा। ऐसे में किसी साहित्यिक पत्रिका की किसी लोकप्रिय पत्रिका से तुलना ही बेमानी होगा। लेकिन दिल्ली में हाल ही में हुई ऐसी एक गोष्ठी में ऐसी तुलना की गई तो हंगामा मच गया।
हिंदी में साहित्यिक पत्रकारिता के सामने आज प्रसार का जो संकट दिख रहा है, उसके दो कारण हैं। पहला तो विचारशीलता को भौतिक यानी आर्थिक प्रश्रय देने वाले उदार हाथों की कमी हो गई है। उदारीकरण के दौर में इस तथ्य पर गौर फरमाने की कहीं ज्यादा जरूरत है। वैचारिकता से ओतप्रोत साहसिक पहल करने वाले लोगों की कमी भी हमारे इस पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार है। वैसे तो हर तरह की पत्रकारिता पाठक केंद्रित ही होती है। लेकिन साहित्यिक पत्रकारिता पर पाठक को संस्कारित करने और वैचारिकता से लैस करने की जिम्मेदारी भी होती है। वैसे यह काम क्षेत्र विशेष के नियंताओं और भाषा की कमाई खाने वाले वर्ग का भी है, ताकि वे अपनी भाषा को जिम्मेदार और वैचारिक रचनाशीलता का वाहक बना सकें। दुर्भाग्य से इस मोर्चे पर कोई काम नहीं हुआ है। जाहिर है कि पाठकीय संस्कारहीनता भी आज साहित्यिक पत्रकारिता की राह में रोड़ा बनकर खड़ी है। जिस अंग्रेजी में किताबों की बिक्री के आंकड़े गिनाते हम अपनी हिंदी में ऐसे भविष्य की चिंता करते रहते हैं, पैसा, पाठकीयता और उदारीकरण के बावजूद वहां भी साहित्यिक पत्रकारिता की कोई बहुत ज्यादा बेहतर स्थिति नहीं है। वहां भी अगर कला अकादमियां या ट्रस्ट और विश्वविद्यालय मदद नहीं करते तो ग्रांटा या न्यूयार्कर जैसी पत्रिकाओं के सहज प्रकाशन का अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता। जबकि भारत में ही अंग्रेजी की किसी किताब का पांच हजार से ज्यादा का संस्करण निकलता है।
तो क्या यह मान लिया जाय कि हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता में सर्वत्र घटाटोप अंधेरा ही अंधेरा है। फिलहाल भले ही ऐसा लग रहा हो, लेकिन सच तो यह है कि एक बार फिर हिंदी की कमाई खा रहे लोगों पर ही इस अंधेरे से बाहर निकलने की जिम्मेदारी है। बड़े अखबार समूह, संस्थानिक घराने और विश्वविद्यालय अगर पूंजी का आधार मुहैया कराएं तो हिंदी साहित्यिक पत्ररकारिता में रचनाशीलता को नया आयाम मिलेगा। तब शायद हमें पाठकों का रोना न रोने का कोई कारण भी नहीं रह पाएगा।

रविवार, 8 अगस्त 2010

भला हो हम हिंदी वालों का

उमेश चतुर्वेदी
राजधानी दिल्ली में इन दिनों तकरीबन रोज ही कहीं हलकी और तेज बारिश हो जाती है। बरसाती फुहारों के बीच मौसम में ठंडक का अहसास होना स्वाभाविक है। लेकिन यहां राजभाषा के साहित्यिक गलियारे में इन दिनो गरमी की तासीर कुछ ज्यादा ही महसूस की जा रही है। गरमी की वजह बना है देश के सबसे प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्थान भारतीय ज्ञानपीठ की पत्रिका नया ज्ञानोदय में प्रकाशित शहर में कर्फ्यू के उपन्यासकार विभूति नारायण राय का एक इंटरव्यू। जिसमें उन्होंने हिंदी की कुछ लेखिकाओं की आत्मकथाओं के बहाने असंसदीय किस्म की टिप्पणी कर दी है। चूंकि विभूति नारायण राय गांधी जी के नाम पर बने अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति और उत्तर प्रदेश कैडर के पूर्व पुलिस अधिकारी हैं, इसलिए उनकी लानतें-मलामतें का दौर तेज हो गया है। हिंदी के अतिजनवादी एक्टिविस्ट पत्रकारों, लेखकों और संस्कृतिकर्मियों का ग्रुप राय को हिंदी विश्वविद्यालय से बर्खास्त कराने को लेकर अभियान जारी रखे हुए है।
इस लड़ाई को लेकर बहसबाजियों का दौर तेज है। क्या गलत है और क्या सही, इस पर विचार किया जाना यहां उद्देश्य भी नहीं हैं। इस पूरे बहस में एक तथ्य पर ध्यान नहीं दिया गया कि यह मसला उछला कैसे। दरअसल राय के इंटरव्यू को लेकर सबसे पहले अपनी आक्रामकता के लिए मशहूर अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने खबर बनाई। अगस्त महीने के पहले दिन इस खबर के छपने से करीब हफ्ताभर पहले से नया ज्ञानोदय का अंक बाजार में मौजूद था। लेकिन उसे किसी ने नोटिस नहीं लिया, नोटिस लिया भी गया तो तब, तब एक्सप्रेस में यह खबर साया हुई। तब से देश के अति जनवादी साहित्यिक-सांस्कृतिक खेमे का हरावल दस्ता विभूति नारायण राय के खिलाफ पिल पड़ा है। ऐसा कैसे हो सकता है कि हिंदी में एक्टिविस्ट की भूमिका निभा रहे इस हरावल दस्ते के किसी सदस्य की नजर मूल हिंदी में हिंदी की प्रमुख साहित्यिक पत्रिकाओं में शुमार नया ज्ञानोदय पर नहीं पड़ी होगी। उनकी नजर में विभूति का इंटरव्यू विवादास्पद तभी बना, जब एक्सप्रेस में इसकी खबर हुई। यहां इस तथ्य पर भी ध्यान दिए जाने की जरूरत है कि क्या एक्सप्रेस का रिपोर्टर हिंदी की पत्रिकाओं से उतने ही सहज तरीके से बाबस्ता होते हैं, जितना वे अंग्रेजी प्रकाशनों के साथ होते हैं। अगर ऐसा है तो हिंदी के लिए यह सुखद बात है। लेकिन इसकी उम्मीद कम ही नजर आती है। जाहिर है ऐसे में शक की सूई ज्ञानपीठ के आकाओं पर भी उठती है कि कहीं पत्रिका को चर्चा में लाने के लिए उन्होंने ही इस इंटरव्यू की कॉपी एक्सप्रेस रिपोर्टर को मुहैया कराई हो।
इस मसले पर पूरी बहसबाजी और उठाने-गिराने की साहित्यिक-सांस्कृतिक पहलवानी में हिंदी-अंग्रेजी का मुद्दा शामिल करना प्रगतिवादियों को बुरा लग सकता है। लेकिन हकीकत यही है। इस मुद्दे ने अंग्रेजी मानसिकता को हिंदी वालों का मजाक उड़ाने का बैठे-बिठाए मौका ही दे दिया है। जैसा की टेबलायड पत्रकारिता का चरित्र है, अंग्रेजी के एक नवेले टेबलायड अखबार ने इस पूरे मसले को चटखारे लेकर तफसील से प्रकाशित किया। अगर इतना ही होता तो गनीमत थी। लेकिन लगे हाथों उसने टिप्पणी भी कर दी कि हिंदी वालों के इसी चरित्र के ही चलते हिंदी की यह हालत बनी हुई है। यानी हिंदी आज भी अगर चेरी की भूमिका में है तो उस अंग्रेजी अखबार के मुताबिक विभूति जैसे लोगों की सतही टिप्पणियां और उस पर बवाल मचाने वाले प्रगतिवादियों की आपसी जोरआजमाइश का भी हाथ है। लगे हाथों उस अखबार ने हिंदी वालों को सुझाव भी दे डाला कि हिंदी को आगे ले जाना है तो ऐसी ओछी हरकतों से बचो। हिंदी वाले चाहे जितना क्रांतिकारी बनने का दावा करें, अपने भाषाई स्वाभिमान की चर्चा करें, लेकिन हकीकत यही है कि आपसी सिरफुटौव्वल में उस्तादी की तुलना में भाषाई स्वाभिमान कम ही है। चूंकि अंग्रेजी ठहरी देश के असल राजकाज की भाषा - नीति नियंताओं के सोचने-विचारने की भाषा, लिहाजा उन्हें अंग्रेजी के उस टेबलॉयड अखबार के सुझावों से कोई परेशानी नहीं है। उलटे उन्हें ये सुझाव अच्छे लग रहे हैं। भला हो हम हिंदी वालों का ....
साहित्यिक और सांस्कृतिक हलकों में जब भी किसी समस्या की चर्चा होती है, राजनीति को दोषी ठहराने का खेल चालू हो जाता है। राजनीति दोषी है भी, लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के चलते राजनीति पर सवाल खड़े करना आसान है। इक्का-दुक्का घटनाओं को छोड़ दें, तो राजनीति हमारी जिंदगी में इतना स्पेस मुहैया जरूर कराती है कि आप उसकी आलोचना कर सकें। लेकिन क्या इतना स्पेस हमारे सांस्कृतिक और साहित्यिक हलकों में है...निश्चित तौर पर इसका जवाब ना में है। संस्कृति और साहित्य के मसले पर अगर किसी की ओर उंगली उठती है तो उसके पीछे अधिकांश वक्त नितांत निजी स्वार्थ और अपना बदला चुकाने की भावना होती है। साहित्यिक कृतियों की आलोचना के पीछे भी यही धारणा काम कर रही होती है। साहित्यिक और सांस्कृतिक आलोचनाओं को स्वस्थ अंदाज में लिया भी नहीं जाता। स्वस्थ आलोचक से दुश्मन की तरह व्यवहार किया जाने लगता है। ऐसे में फिर कैसे होगा अपनी हिंदी का विकास....सोचना तो हमें ही पड़ेगा। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हम ऐसी वैचारिक मुठभेड़ों के लिए तैयार हैं। हिंदी में इन दिनों जारी पहलवानी के खेल से ऐसा तो नहीं ही लग रहा।

शनिवार, 3 जुलाई 2010

प्रथम चंद्रयान पुरस्कार कथाकार शेखर जोशी को


हिंदी के लब्ध प्रतिष्ठित कथाकार शेखर जोशी को मानिक दफ्तरी ज्ञानविभा ट्रस्ट के प्रथम चंद्रयान पुरस्कार- 2010 से नवाजा जायेगा। एक प्रेस विज्ञप्ति में प्रबंध न्यासी धनराज दफ्तरी ने बताया है कि नयी कहानी में सामाजिक सरोकारों का प्रतिबद्ध स्वर जोड़ने वाले शेखर जोशी को पुरस्कार स्वरुप 31000 रुपये की राशि भेंट की जाएगी। पुरस्कार समोराह कोलकाता के भारतीय भाषा परिषद् में रविवार 18 जुलाई को आयोजित होगा। इस समारोह की अध्यक्षता भारतीय भाषा परिषद् के निदेशक डाक्टर विजय बहादुर सिंह करेंगे जबकि जाने-माने आलोचक डॉक्टर शिवकुमार मिश्र मुख्य वक्ता के तौर पर कार्यक्रम में शिरकत करेंगे। इस अवसर पर शेखर जोशी की प्रचलित कहानी दाज्यू का पाठ पत्रकार प्रकाश चंडालिया करेंगे। सितम्बर १९३२ में अल्मोड़ा जनपद के ओजिया गाँव में जन्मे शेखर जोशी की प्रारंभिक शिक्षा अजमेर और देहरादून में हुई। कथा लेखन को दायित्वपूर्ण कर्म मानने वाले जोशी हिंदी के सुपरिचित कथाकार हैं। उन्हें उ.प्र. हिंदी संस्थान द्वारा महावीर प्रसाद द्विवेदी पुरस्कार-1987, साहित्य भूषण-1995, पहल सम्मान-1997 से सम्मानित किया जा चुका है। शेखर जोशी की कहानियों का तमाम भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेजी, चेक, रूसी, पोलिश और जापानी भाषाओं में अनुवाद किया जा चुका है। कुछ कहानियों का मंचन और दाज्यू नामक कहानी पर बाल फिल्म सोसायटी ने फिल्म भी बनाई है। शेखर जोशी की प्रमुख प्रकाशित कृतियाँ हैं- कोशी का घटवार, साथ के लोग, हलवाहा, नौरंगी बीमार है, मेरा पहाड़, प्रतिनिधि कहानियां और एक पेड़ की याद। दाज्यू, कोशी का घटवार, बदबू, मेंटल जैसी कहानियों ने न सिर्फ शेखर जोशी के प्रशंसकों की लम्बी जमात खडी की बल्कि नयी कहानी की पहचान को भी अपने तरीके से प्रभावित किया है। पहाड़ी इलाकों की गरीबी, कठिन जीवन संघर्ष, उत्पीड़न, यातना, प्रतिरोध, उम्मीद और नाउम्मीद्दी से भरे औद्योगिक मजदूरों के हालात, शहरी-कस्बाई और निम्नवर्ग के सामाजिक-नैतिक संकट, धर्म और जाति की रूढ़ियाँ उनकी कहानियों का विषय रहे हैं।

बुधवार, 9 जून 2010

भारतीय भाषाओं के जरिए बनता नया इतिहास

उमेश चतुर्वेदी
1994-95 की बात है। दिल्ली के तब के मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना विदेश दौरे पर थे। उनकी गैरमौजूदगी में तब के शिक्षा और विकास मंत्री साहब सिंह वर्मा कार्यकारी मुख्यमंत्री की भूमिका निभा रहे थे। इस दौरान उन्होंने तय किया कि पब्लिक स्कूलों में पहली कक्षा से ही अंग्रेजी की पढ़ाई पर रोक लगा दी जाय और उन्होंने उसे रोक दिया। इसे लेकर राजधानी के अंग्रेजीभाषी समाज में भूचाल आ गया। अंग्रेजी मीडिया और पब्लिक स्कूलों ने सुर में सुर मिलाकर तर्क देना शुरू कर दिया था कि अंग्रेजी की पढ़ाई के बिना तकनीकी पढ़ाई का क्या होगा। यहां यह बताना बेकार है कि मदनलाल खुराना के विदेश से लौटने तक अंग्रेजी के खेवनहार जीत गए थे और साहब सिंह वर्मा का गंवई मन मसोस कर अपने ही फैसले को वापस होता देखता रह गया। लेकिन इस साल आईआईटी की परीक्षा के जो नतीजे आए हैं, उसने इस धारणा को गलत साबित कर दिया है कि हिंदी माध्यम वाले बच्चे देश की इस सबसे बेहतर तकनीकी संस्थान में दाखिला नहीं ले सकते और बेहतरीन विद्यार्थी नहीं हो सकते।
इस साल आईआईटी की संयुक्त प्रवेश परीक्षा में कुल 13,104 उम्मीदवार सफल हुए हैं। जिसमें हिंदी माध्यम से पास होने वाले छात्रों की संख्या 554 है। तेरह हजार से ज्यादा कामयाब छात्रों के बीच हिंदी वाले छात्रों की इतनी संख्या छोटी हो सकती है। लेकिन पिछले रिकॉर्ड पर जब नजर जाती है तो यह कामयाबी कहीं ज्यादा बड़ी नजर आती है। खुद आईआईटी के ही मुताबिक पिछले साल हिंदी माध्यम से सिर्फ 184 प्रतियोगी सफल रहे थे। इसकी तुलना में तो इस साल की कामयाबी करीब तीन गुना ज्यादा बैठती है। जाहिर है कि इससे हिंदी माध्यम से पढ़ाई करने वाले नए प्रतियोगी और उत्साहित होंगे और अगली बार कामयाबी में उनकी भागीदारी और भी ज्यादा होगी।
1835 में जब मैकाले ने मिंट योजना लागू की थी तो उसका एक मात्र उद्देश्य अंग्रेजी सरकार के लिए बाबुओं को तैयार करना था। मैकाले की आत्मा जहां भी होगी, वह अपनी कामयाबी का अब तक जश्न मनाती रही है। क्योंकि भारत में अंग्रेजी का व्यवहार अंग्रेजी की अपनी ब्रिटिश धरती की तुलना में कहीं ज्यादा रहा है। लेकिन आईआईटी में हिंदी माध्यम वालों की कामयाबी ने कम से कम मैकाले की आत्मा को भी अब जरूर परेशान करना शुरू कर दिया होगा। अपने देश में जब भी अंग्रेजी के खिलाफ कोई तर्क दिया जाता है, तुरंत हिंदी के विरोध में भी कहा जाने लगता है कि हिंदी में ज्ञान-विज्ञान की पढ़ाई के लिए न तो किताबें हैं और न ही उसमें इतनी क्षमता है कि वह अंग्रेजी की तरह तकनीकी और ज्ञान-विज्ञान की चीजों को अभिव्यक्त कर सके। इसके खिलाफ चीन और जापान की तकनीकी क्रांति और दुनिया में आर्थिक महाशक्ति बनते जाने का उदाहरण भी दिया जाता रहा है। लेकिन भारतीय मानसिकता यह है कि वह अपनी सनातनी पद्धति के गौरव का जिक्र तो करती है, लेकिन भारतीयता के प्रतीक माने जाते रहे दो शब्दों गंगा और सिंदूर को देने वाली धरती की ओर नहीं झांकती। भारतीयता के प्रतीक ये दोनों ही शब्द पड़ोसी देश चीन से आए हैं। चीन की प्रगति की हम अब बात तो करने लगे हैं, लेकिन वहां जारी अपनी भाषाओं और अंग्रेजी के खिलाफ बढ़ते माहौल को लेकर हम उदासीन ही रहते हैं। आर्थिक उदारीकरण के दौर में चीन और जापान की तकनीकी क्रांति अब हमें भी लुभा रही है, हम उन्हीं की तरह आर्थिक महाशक्ति बनने की राह पर आगे बढ़ने की बात तो करने लगे हैं, लेकिन हमें उनकी तरह अपनी भाषाओं से प्यार का ककहरा सीखने में झल्लाहट और हिचक जारी है।
देश में बढ़ते अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों के पीछे एक बड़ा तर्क यह भी है कि हिंदी माध्यम से पढ़ाई करने वाले लोग क्लर्क और चपरासी तो बन सकते हैं, लेकिन इंजीनियर, डॉक्टर और आईएएस नहीं बन सकते। यही वजह है कि देश के दूरदराज तक के इलाकों में अंग्रेजी माध्यम वाले स्कूलों की बाढ़ आ गई है। लोगों में यह भावना घर कर गई है कि चाहे भूखे रहेंगे, आधी रोटी खाएंगे, लेकिन अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में ही पढ़ाएंगे। हालांकि इस प्रवृत्ति की मुखालफत साठ के दशक में डीएस कोठारी की अध्यक्षता वाला कोठारी कमीशन से लेकर आज के दौर के मशहूर शिक्षाशास्त्री और वैज्ञानिक प्रोफेसर यशपाल तक कर चुके हैं। सबसे बड़ी बात यह कि दोनों ही विद्वान अंग्रेजी के भी वैसे ही जानकार हैं, जैसे भारतीय अंग्रेजी दां हैं। देश की तकरीबन हर सरकार भी इन विद्वानों की राय का आदर करती रही हैं, लेकिन अंग्रेजी समर्थक लॉबी के दबाव में बच्चों से अंग्रेजी का दबाव हटाने की दिशा में कभी इच्छाशक्ति नहीं दिखा पाईं।
भारत के अपने लोग और अपने अगुआ भले ही जिस काम को नहीं कर पाए, आर्थिक उदारीकरण के बाद बढ़ते भारत के विशाल मध्यवर्ग ने वह कर दिखाया है। आज भारत में माना जा रहा है कि करीब चालीस करोड़ लोगों का विशाल मध्यवर्ग है, जिसकी खरीद क्षमता बढ़ती जा रही है। यही वजह है कि दुनिया के बड़ी कंपनियां तक कमाई के लिए भारत का रूख कर रही हैं। उन्हें पता है कि इस बाजार का दोहन हिंदी और भारतीय भाषाओं के जरिए ही किया जा सकता है, यही वजह है कि वे हिंदी में काम को बढ़ावा दे रही हैं। इस तरह हिंदी नए सिरे से प्रतिष्ठापित हो रही है। हिंदी और भारतीय भाषाओं के इस जयगान में भारतीय लोकतंत्र का भी बड़ा हाथ है। लोकतंत्र में पिछड़ी और अनुसूचित जातियों के लोगों की ऐतिहासिक कारणों से अंग्रेजी तक वह पहुंच नहीं बन पाई है, जो हिंदी और भारतीय भाषाओं की है। कोई सरकार भले ही राजभाषा के मंच पर प्रतिष्ठित राजभाषा की उपेक्षा कर दे, लेकिन सत्ता विमर्श में उभर कर सामने आ रही इन जातियों और इन वर्गों की अनदेखी नहीं कर सकती। इसलिए उन्हें हिंदी और भारतीय भाषाओं को आईआईटी और संघ लोकसेवा आयोग तक प्रवेश देना पड़ रहा है, जहां हिंदी अब तक चेरी या दोयम भूमिका में रही है। इसका नतीजा दिख रहा है कि अब हिंदी माध्यम के परीक्षार्थी आईआईटी और सिविल सर्विस तक में कामयाब होने लगे हैं। कार्मिक मंत्रालय ने सिविल सर्विस परीक्षा की जो रिपोर्ट जारी की है, उसके मुताबिक पिछले साल आईएएस के लिए जिन 111 लोगों का चयन हुआ, उनमें से हिंदी माध्यम के सफल प्रतियोगी 19 थे। संघ लोकसेवा आयोग के ही मुताबिक इस साल कामयाब टॉप 25 में चार प्रतियोगियों ने हिंदी माध्यम में परीक्षा दी थी। इन छात्रों की कामयाबी का जश्न इसलिए भी ज्यादा हो जाता है, क्योंकि खुद आईआईटी की आर्गेनाइजिंग कमेटी की रिपोर्ट ही मानती है कि हिंदी माध्यम से परीक्षा देने वाले छात्रों के लिए आईआईटी परीक्षा में पास होना आसान नहीं है।
जाहिर है इसका असर सामाजिक तौर पर भी पड़ रहा है। संघ लोकसेवा आयोग के सदस्य और हिंदी के जाने-माने विद्वान पुरुषोत्तम अग्रवाल भी मानते हैं कि हिंदी माध्यम ने सिविल सर्विस की परीक्षाओं में ग्रामीण इलाकों के छात्रों के लिए भी दरवाजे खोले हैं। जाहिर है इसका असर इंजीनियरों और सिविल सेवा अधिकारियों की मानसिकता पर भी पड़ेगा। अब तक इन सेवाओं को सिर्फ शहरी नजरिए से ही देखा जाता रहा है। भारत के गांवों के पिछड़ेपन को लेकर अब तक जितने भी आरोप लगते रहे हैं, उसमें एक बड़ा कारण यह भी माना जाता रहा है कि जो भी योजनाएं बनती हैं, उन्हें बनाने वाले ज्यादातर लोगों को गांवों से परिचय सिर्फ निबंध लेखन तक ही होता है। लेकिन हिंदी और भारतीय भाषाओं के माध्यम से जो छात्र इंजीनियरिंग या सिविल सर्विस में आ रहे हैं, उनका नजरिया जाहिर है कुछ अलग ही होगा। उनकी सोच अपने धूल भरी गांवों की गलियों के उत्थान के लिए भी होगा। तो क्या हम ये मानने लगें कि भारत की 65 प्रतिशत ग्रामीण आबादी में बदलाव की नई बयार बहने वाली है। आईआईटी और सिविल सर्विस में हिंदी और भारतीय भाषाओं की यह कामयाबी कम से कम ऐसी उम्मीद तो जरूर जताती है।

शुक्रवार, 4 जून 2010

वितंडा का ब्लॉग



उमेश चतुर्वेदी
ब्लॉग यानी वेब लॉग के बारे में माना जाता है कि इससे आम अभिव्यक्ति को नया आयाम मिला है। वर्चुअल दुनिया के इस अपूर्व माध्यम ने उन लोगों को भी अभिव्यक्ति के लिए ऐसा स्पेस मुहैया कराया है, जिनके विचारों और समस्याओं को आधुनिक मीडिया के पारंपरिक माध्यमों में जगह नहीं मिल पाती। इससे मुक्त अभिव्यक्ति को नया आयाम मिला है। ऐसा माना जा रहा है कि हिंदी में इन दिनों कम से पंद्रह हजार ब्लॉग सक्रिय हैं। जिन पर लोग अपने विचारों, अपनी रचनाधर्मिता को मुक्त भाव से अभिव्यक्त कर रहे हैं। ये ब्लॉग तमाम तरह के विषयों पर केंद्रित हैं- धर्म, समाज, साहित्य, राजनीति, संस्कृति, अर्थ व्यवस्था, विज्ञान और सेक्स समेत तमाम तरह की चर्चाएं आज ब्लॉगिंग के केंद्र में हैं। इस लिहाज से देखें तो इंटरनेट की दुनिया में हिंदी नए तरह से करवट ले रही है।
लेकिन दुख की बात यह है कि अभिव्यक्ति का सबसे नया यह जनमाध्यम भी पारंपरिक मीडिया के रोगों से ग्रस्त हो चुका है। खबरिया चैनलों को इन दिनों हर दूसरा व्यक्ति उनकी कंटेंट और भाषा को लेकर गाली देता मिल जाएगा। खबरिया चैनलों पर आरोप है कि वे टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट यानी टीआरपी के लिए कंटेंट और भाषा से खिलवाड़ कर रहे हैं। अफसोस की बात यह है कि ब्लॉगिंग की दुनिया के कुछ अहम खिलाड़ी भी इन दिनों सनसनीखेज पत्रकारिता की ही राह पर चल पड़े हैं। जिनके लिए अपनी हिट बढ़ाने का एक ही तरीका नजर आ रहा है, कंटेंट और भाषा के साथ परोसे जाने वाले विषयों के साथ खिलवाड़ करो। ताकि उनकी चर्चा हो और वर्चुअल दुनिया के यायावर उनके पास चले आएं और उनकी हिट को बढ़ाएं ताकि वे वर्चुअल दुनिया में अपनी बादशाहत को साबित कर सकें। यह कुछ वैसे ही हो रहा है, जैसे हाल के दौर तक हिंदी के खबरिया चैनल नाग-नागिन को नचाने से लेकर एलियन के हाथों गायों को धरती से अंतरिक्ष की दुनिया में भिजवाते रहे हैं। ब्लॉगिंग की दुनिया में इतना अतिवाद नहीं है। लेकिन यह जरूर है कि सतही विषयों को सनसनी की चाशनी में जमकर परोसा जा रहा है। और हमारी जो मानसिक बुनावट है, हमारा जो सामाजिक ढांचा है, उसमें तात्कालिक तौर पर सनसनी की चाशनी बेहद मीठी और लुभावनी लगती है। लिहाजा इस चाशनी को परोसने वाले ब्लॉग इन दिनों हिट हैं।
इंटरनेट के खोजकर्ता देश अमेरिका में ब्लॉगिंग की दुनिया इससे कहीं आगे निकल गई है। वहां तो सही मायने में वर्चुअल दुनिया का यह माध्यम आज मुख्यधारा के मीडिया से कम से कम मुक्त और जिम्मेदार अभिव्यक्ति के माध्यम के तौर पर जबर्दस्त टक्कर दे रहा है। पिछले साल अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा की ताजपोशी में जिन कारकों की प्रमुख भूमिका रही, उसमें एक बड़ा कारक वहां के जिम्मेदार ब्लॉगर और ब्लॉगिंग ही रही। वहां का मुख्यधारा का मीडिया जार्ज बुश जूनियर के बारे में तकरीबन वही लिख या दिखा रहा था, जो वे चाहते थे। अफगानिस्तान और इराक युद्ध की हकीकत से आम अमेरिकी का एक बड़ा वर्ग अनजान था। लेकिन जिम्मेदार और सक्रिय ब्लॉगरों ने उसे अनजान नहीं रहने दिया। अमेरिकी सेनाओं की अफगानिस्तान और इराक में करतूत और इससे हो रहे नुकसान को ब्लॉगरों ने बखूबी बयान किया। इसके चलते रिपब्लिकन उम्मीदवार जॉन मैकेनन को अपनी तमाम अच्छाइयों के बावजूद हार का मुंह देखना पड़ा। क्योंकि वे उस जार्ज बुश के उत्तराधिकारी बनने चले थे, जिनकी नीतियों की वजह से अमेरिकी सेनाएं इराक और अफगानिस्तान में फंसी पड़ी हैं।
हिंदी की ब्लॉगिंग की दुनिया अभी इतना परिपक्व नहीं हो पाई है। यह कहना भी एक तरह का अतिवाद ही होगा। यहां कानून, भाषा, सिनेमा, रेडियो और विभिन्न दार्शनिक और राजनीतिक विचारों को लेकर ब्लॉगिंग की दुनिया में महत्वपूर्ण काम हो रहा है। लेकिन वितंडावादी ब्लॉगिंग के चलते उनकी पहुंच बेहद सीमित है। उनके बारे में कम ही लोग जान पाते हैं। लेकिन ये तय है कि जिस तरह भारत के दूसरे और तीसरे दर्जे तक के शहरों से लेकर गांवों की चौपाल तक इंटरनेट की पहुंच बढ़ती जा रही है, मुक्त अभिव्यक्ति का यह जनमाध्यम और सशक्त बनकर उभरेगा। तब सनसनी की चाशनी की मिठास कड़वे स्वाद में बदलती नजर आएगी।
( यह लेख भोपाल से प्रकाशित अखबार पीपुल्स समाचार में छप चुका है। )

बुधवार, 19 मई 2010

बदलाव की आहट


उमेश चतुर्वेदी
अपने यहां जब भी किसी को प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्थाओं से इंसाफ नहीं मिलता, तो उसके पास अदालत का दरवाजा खटखटाने के अलावा कोई चारा नहीं होता। अदालतों से उन्हें इंसाफ भी मिलता है। संवैधानिक ताकत और रसूख रखने वाले हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट पर आज देश के नागरिकों का भरोसा कहीं ज्यादा बढ़ गया है। जाहिर है कि इस भरोसे की वजह वहां न्याय की अमोल कुर्सी पर बैठे न्यायाधीशों का आचरण और उनके इंसाफपसंद फैसले ही रहे हैं। लेकिन आम लोगों को कम ही पता होगा कि उपरी अदालतों के न्यायमूर्तियों की नियुक्ति में भी राजनीति होती है और अक्सर वही राजनीतिक सत्ता आखिरकार हावी हो जाती है, जिनके खिलाफ कई बार उन जजों को ही सुनवाई करनी पड़ती है। भारत के किसी हाईकोर्ट की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश लीला सेठ की आत्मकथा से गुजरते हुए इस राजनीति के दर्शन बार-बार होते हैं। अंग्रेजी के मशहूर उपन्यासकार विक्रम सेठ की मां लीला सेठ की घर और अदालत नाम से आई यह आत्मकथा छह साल पहले अंग्रेजी में ऑन बैलेंस के नाम से प्रकाशित हो चुकी है। तब इसे अंग्रेजी में हाथोंहाथ लिया गया था। लेकिन अदालती नियुक्तियों की राजनीति से हिंदी पाठकों का दस्तावेजी साबका अब जाकर पड़ा है, जब पेंगुइन इंडिया ने यह किताब हिंदी में अनूदित करके प्रकाशित की है। इस राजनीति को जानने और समझने के लिए पाठकों को किताब के शब्दों से गुजरना होगा। जिसमें लीला सेठ ने बेबाकी से लिखा है कि राजनीति के चलते वे सुप्रीम कोर्ट की जज नहीं बन पाईं और सुप्रीम कोर्ट की पहली महिला जस्टिस होने का गौरव केरल की जस्टिस फातिमा बीवी हासिल करने में सफल रहीं। इस पूरी कहानी को जानना और समझना इस किताब के ही जरिए हो सकता है। इतना ही नहीं, ये आत्मकथा एक ऐसी महिला के आत्मसंघर्ष की कहानी भी है, जिसके पिता की उसके बचपन में ही मौत हो जाती है। मां उसे संघर्षों में पालपोस कर बड़ा करती है और वह लड़की अपनी जिंदगी की शुरूआत रेलवे के एक अधिकारी की स्टेनो और टाइपिस्ट के तौर पर करती है। लेकिन अध्यवसाय नहीं छोड़ती और वकालत पास करके वकील बनती है और इतनी सफल वकील बनती है कि उसे यही व्यवस्था हाईकोर्ट का जस्टिस और फिर चीफ जस्टिस बनाने के लिए मजबूर हो जाती है। इस किताब में अ सूटेबल ब्वॉय के लेखक विक्रम सेठ की शब्दों की दुनिया में उतरने और कामयाब बनने की पूर्वपीठिका का भी दर्शन कराने में यह कहानी सफल रहती है।
इस स्तंभ में इस किताब की चर्चा का मकसद पारंपरिक समीक्षा नहीं है। बल्कि हिंदी प्रकाशन की दुनिया में आ रहे बदलावों को भी रेखांकित करना है। पुस्तकालयों के लिए खरीद पर केंद्रित रही हिंदी प्रकाशन की दुनिया में पेंगुइन वाइकिंग धीरे-धीरे क्रांति लाने की तैयारियों में जुट गया है। अन्यथा पारंपरिक प्रकाशन की दुनिया आज भी जुगाड़ और उसी पारंपरिक कहानी-कविता की ही दुनिया में खोयी-सिमटी है। लेकिन पेंगुइन हिंदी प्रकाशन की दुनिया के नए दरवाजों पर दस्तक दे रहा है। वैचारिकता और विमर्श से लेकर पारंपरिक खांचे से बाहर की हिंदी की दुनिया में झांकने की कोशिशें और बाजार की जरूरतों के मुताबिक मार्केटिंग के साथ उतरे पेंगुइन हिंदी प्रकाशन का चेहरा बदल रहा है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के जरिए जब से पता चला है कि हिंदी का विशाल मध्यवर्ग बाजार की बड़ी ताकत बन कर उभरा है। उस बाजार पर कब्जा जमाने की कोशिशों में उदारीकरण वाली अर्थव्यवस्था वाली ताकतें जोरशोर से कूद पड़ी हैं। माल कल्चर के जरिए कब्जा जमाने की इस होड़ को समझा जा सकता है, जिसकी प्रक्रिया महानगरों से लेकर दूसरी श्रेणी के शहरों तक में दिखने लगी है। हिंदी के इस बाजार की चर्चा कीजिए तो पारंपरिक प्रकाशक आज भी मायूस और रोते हुए से दिखेंगे। इस रूदन के बावजूद उनकी समृद्धि बढ़ती जा रही है। लेकिन पाठकीय समृद्धि के साथ ही लेखकीय गौरव और समृद्धि की ओर उनका ध्यान नहीं है। लेकिन इस ओर ध्यान पेंगुइन ने दिया है। भारत में उदारीकरण के बाद आ रही विदेशी कंपनियों की मंशा पर अब तक न जाने कितने सवाल उठाए जा चुके हैं। लेकिन पेंगुइन पर सवाल नहीं उठ रहे हैं। जबकि वह भी हिंदी के बाजार से ही कमाई करने के लिए उतरी है। इसकी वजह यह है कि वह हिंदी के इस विशाल बाजार को प्रोफेशनल और सांस्कृतिक नजरिए से समृद्ध करने की कोशिश में ही जुटी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि भारतीय और खासकर हिंदी के प्रकाशक भी ऐसे ही नजरिए से बाजार में उतरने की कोशिश करेंगे और अब तक दीनहीन समझी जाती रही हिंदी प्रकाशन की दुनिया का चेहरा बदल सकेंगे।
(यह आलेख पीपुल समाचार भोपाल में प्रकाशित हो चुका है)

सोमवार, 3 मई 2010

एफ एम चैनल के कर्मचारी संघर्ष को तैयार


एफ एम सहित आकाशवाणी दिल्ली के विभिन्न चैनलों में काम करने वाले सैकड़ों उदघोषकों और कर्मियों में अधिकतर कलाकारों को पिछले ग्यारह महीनों से भुगतान नहीं किया गया है। कुछ तो ऐसे भी हैं जिन्हें इससे भी अधिक समय से पैसे नहीं मिले हैं। इसके लिए श्रोताओं, कलाकारों व समाजिक कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर इन कर्मचारियों ने अपना रेडियो बचाओं अभियान शुरू किया है। अभियान का मानना है कि रेडियो के निजी चैनलों को फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से आकाशवाणी की स्थिति बदत्तर बनाई जा रही है।

राजधानी में अपना रेडियो बचाओं अभियान में लगे श्रोताओं, कलाकारों व समाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि रेडियो की भी वैसी ही स्थिति बनाई जा रही है जैसा कि टेलीविजन के निजी चैनलों के लिए जगह बनाने के लिए वर्षों पूर्व दूरदर्शन की बनाई गई थी। निजी चैनलों के शुरू होने से पहले मैट्रों चैनल को सबसे ज्यादा लोकप्रिय बनाने की कोशिश की गई। उसके जरिये दर्शकों की रूचि को मसलन भाषा और विषय वस्तु आदि हर स्तर पर बदलने की पूरी कोशिश शुरू की गई। दूरदर्शन के कर्मचारियों की भी शिकायतें उन दिनों काफी बढ़ रही थी और उन पर ध्यान देने की जरूरत सरकार महसूस नहीं कर रही थी। इन दिनों रेडियों के पर्याय के रूप में एफएम चैनलों को जाना जाता है। खासतौर से मनोरंजन के लिए श्रोताओं की बड़ी तादाद एफ एम चैनलों के कार्यक्रमों को सुनती है। लेकिन आकाशवाणी के एम एम चैनलों की जो स्थिति है उसे देखकर आश्चर्य ही नहीं होता है बल्कि ये एक भरोसे के साथ कहा जा सकता है कि रेडियों के निजी चैनलों के विस्तार के लिए आकाशवाणी के आला अधिकारी काम कर रहे हैं। याद दिलाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि टेलीविजन के निजी चैनलों की शुरूआत में दूरदर्शन को छोड़कर उसके कई बड़े अधिकारी निजी चैनलों की सेवा में उंची तनख्वाह पर चले गए थे।

एक तरफ तो रेडियो का तेजी से विस्तार हो रहा है और दूसरी तरफ आकाशवाणी पर वर्षों से नई नियुक्तियां नहीं हुईं हैं और यहाँ प्रोग्राम प्रजेंटेशन का काम आकस्मिक प्रस्तोता ही करते हैं। काम के घंटे अधिक और पारिश्रमिक कम, इस पर भी भुगतान में वर्ष भर की देरी । जबकि संसद की एक समिति ने आकाशवाणी में अस्थायी कलाकारों की बदतर स्थिति पर चिंता जाहिर करते हुए उनकी स्थायी नियुक्तियां करने की सिफारिश की थी।

रेडियो के सबसे लोकप्रिय एम एफ चैनलों के लिए काम करने वाले कलाकारों ने दो महीने के दौरान सम्बंधित उच्चाधिकारियों से मिलकर इन स्थितियों से अवगत कराया है लेकिन स्थितियां जस की तस हैं । "अपना रेडियो बचाओ " मंच के तत्वावधान में लगभग बीस सक्रिय प्रज़ेन्टरों का एक प्रतिनिधिमंडल आकाशवाणी महानिदेशक को पहले १७ फरवरी और फिर २६ अप्रेल २०१० को ज्ञापन दे चुका है । इस ज्ञापन में कार्यक्रमों के गिरते स्तर, भुगतान में अभूतपूर्व विलम्ब के और ध्यान दिलाया गया है और एफ़ एम गोल्ड चैनेल में चल रही गडबडियों के लिए एफ़ एम गोल्ड चैनल की कार्यक्रम अधिशासी MrsMmmmmmmmm Mrs. Ritu Rajput को जिम्मेवार बताया गया है। लम्बे समय तक यह चैनल देश के सर्वाधिक लोकप्रिय चैनेल्स में रहा है और इसके सूझबूझ से भरे मनोरंजक और ज्ञानवर्धक कार्यक्रम व्यापक जनहित का काम करते रहे हैं और श्रोताओं का जीवन प्रकाशित करते रहे हैं.

अपना रेडियो बचाओ मंच इस सन्दर्भ में सूचना और प्रसारण मंत्रालय से तत्काल हस्तक्षेप की मांग करता है और तुरंत भुगतान कर के कैजुअल प्रज़ेन्टरों के नियमितीकरण की प्रक्रिया आरम्भ करने की भी मांग करता है। साथ ही संसदीय समिति की सिफारिशों के आलोक में तत्काल कदम उठाने का आग्रह करता है। इस मंच के सदस्यों ने इस बात पर भी जोर दिया है कि आकाशवाणी को बर्बाद करने की जो साजिश चल रही है उसका पर्दापाश करने के लिए मंच राजधानी और देश के दूसरे शहरों में अभियान चलाएगा।

गुरुवार, 29 अप्रैल 2010

कहां है लोक......


उमेश चतुर्वेदी
लोक के बिना जिंदगी के रसधार की कल्पना नहीं की जा सकती। रोजाना की जिंदगी की टीस और उससे उपजी पीड़ा को स्वर देने का काम लोक की अपनी भाषा और उसका अपना साहित्य ही दे सकता है। लोक के दर्द की टीस को लोकसाहित्य इतनी खूबसूरती से अभिव्यक्ति देता है कि सुनने या पढ़ने वाले के लिए वह दर्द अपना सा हो जाता है।
बहुत कम लोगों को पता होगा कि दर्दभरी यह लोकअभिव्यक्ति ही थी कि हिंदी में लोकसाहित्य के विधिवत अध्ययन की नींव पड़ी। हिंदी के प्रसिद्ध कवि पंडित रामनरेश त्रिपाठी एक बार कवि सम्मेलन में जाने के सिलसिले में अपने जिले जौनपुर के तिवारीपुर रेलवे स्टेशन पर रेल के इंतजार में बैठे थे। इसी दौरान एक परिवार अपने परदेसी सदस्य को छोड़ने स्टेशन आया। पिछड़े वर्ग के इस परिवार में महिलाएं भी थीं। कलकत्ता जाने वाली रात की रेल छुक-छुक करती आई और उस परदेसी को ट्रेन में बैठाकर वह परिवार लौट गया। लौटते-लौटते वह परिवार त्रिपाठी जी को एक टीस दे गया। लोक में रची वह लाइनें थीं – रेलिया ना बैरी, जहजिया ना बैरी.....पइसवा बैरी भइले ना...यानी रेल दुश्मन नहीं है, जहाज भी दुश्मन नहीं....दुश्मन तो वह खोटा पैसा है, जिसके लिए अपनों को छोड़ परदेसी होना पड़ता है।
दर्द की इस अभिव्यक्ति ने ही त्रिपाठी जी को हिंदी में लोकसाहित्य के विधिवत अध्ययन की नींव डालने की प्रेरणा दी। जिसे वासुदेश शरण अग्रवाल, कृष्णदेव उपाध्याय, हंसकुमार तिवारी आदि ने आगे बढ़ाया। लेकिन दुख की बात है कि अब यह अध्ययन सिर्फ किताबी रटंत की तरह कुछ विश्वविद्यालयों के हिंदी के पाठ्यक्रम में सिमट कर रह गया है। वहां भी नए काम या तो हो नहीं रहे हैं या फिर इक्का-दुक्का छिटफुट ही हो रहे हैं। लोक से लगातार गायब होते लोकसाहित्य और उससे आम जन की बढ़ती दूरी को लेकर पहले चिंताएं भी जताई जाती रही हैं। लेकिन अब ये चिंताएं भी विद्वत्त जनों को परेशान नहीं कर रहीं हैं और जब विद्वत्तजन परेशान नहीं हैं तो लोक को क्यों चिंता होने लगी। उसे उदारीकरण ने मनोरंजन के ढेरों सरंजाम मुहैया करा दिए हैं। घर में टेलीविजन है, मोबाइल फोन में एफएम है...वीसीडी और डीवीडी प्लेयर भी हैं तो फिर किसे और क्यों चिंता होने लगी लोक के टीस की...
लेकिन इसका ये भी मतलब नहीं है कि लोक से उसकी अपनी पारंपरिक और देसज अभिव्यक्ति खत्म हो गई है। बाजार ने लोक को भले ही उसके अपने माध्यमों से दूर कर दिया है, लेकिन वह बदले हुए रूप में जरूर सामने आ रहा है। इसे उत्तर प्रदेश के पूर्वी इलाकों और बिहार में होली और शादी-विवाह के दिनों में जाकर देखना और सुनना बेहतर होगा। सहज और दैनंदिन जीवन के दर्द लोक के स्वरों से गायब हैं। अगर कुछ बाकी बचा दिखता है तो वह है लोक का तर्ज..बाकी लय और धुन में परोसी जाती हैं फूहड़ भाषा ...इसे गालियां भी कह सकते हैं, जिन्हें सभ्यताशील कान शायद ही सुन सकें।
लोक बाजार में राजस्थानी गीत नीबूड़ा-नीबूड़ा के तौर पर फिल्मी दुनिया में भी दिख-सुन जाता है। तब लोक के मिठास भरे सुर हमें अच्छे लगने लगते हैं....लोक साहित्य की एक पहचान रही है उसका लोगों के होठों पर चढ़ जाना। इस चढ़ने के पीछे पहले कहीं कोई बाजार नहीं होता था। लेकिन अब बाजार इसकी बड़ी वजह होता है। इस बाजार का माध्यम बनती है - हम दिल दे चुके सनम जैसी फिल्म। 2009 में आई फिल्म दिल्ली-6 का गीत – ससुराल गेंदा फूल- भी छत्तीसगढ़ी लोकगीत से प्रभावित था। वह आज भी लोगों की जबान पर चढ़ा हुआ है तो इसकी एक बड़ी वजह है कि उसके जरिए लोक की देसज और सहज अभिव्यक्ति जिंदा है।
यानी आज अगर लोक की अभिव्यक्ति कहीं जिंदा है तो इसकी बड़ी वजह बाजार की जरूरत है। बाजार चाहता कि कोई खास लोक की अभिव्यक्ति जिंदा रहे तो उसे वह जिंदा करता है..इसके लिए वह पैसा बहाता है, क्योंकि पैसा कमाना उसका मकसद होता है। लेकिन जहां वह नहीं चाहता कि लोकअभिव्यक्ति बचे, उसे बचाने की ताकीद भी नहीं करता। क्योंकि उसे वहां पैसा नजर नहीं आता। निश्चित तौर पर लोक की सहज – दर्दीली अभिव्यक्ति का नुकसान हो रहा है। लेकिन उम्मीद की किरण उस बाजार में ही है। जो पैसे के लिए ही सही, इसे कभी-कभी जिंदा रखने की कोशिश करता है या करता है। इस उम्मीद को बढ़ाना आज की जरूरत है। तभी हम अपने पुरखों की थाती से आने वाली पीढ़ियों को परिचित कराते रहने की परंपरा को आगे बढ़ा सकेंगे।

मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

साहित्य और सत्ता के रिश्ते


उमेश चतुर्वेदी
संतन को सीकरी सों क्या काम...
सत्ता और साहित्य के रिश्तों की जब भी चर्चा होती है, करीब साढ़े चार सौ साल पहले लिखी कुंभनदास की ये पंक्तियां बरबस याद आ जाती हैं। अकबर के दौर में जब कुंभनदास ने इन पंक्तियों की रचना की थी, तब के अधिकांश साहित्यकार ही संत थे। वे भक्त कवि थे और उनकी भक्ति अपने आराध्य देव के प्रति थी। लेकिन आज जमाना बदल गया है। सीकरी यानी राजधानी ही साहित्यकारों की रिहायश बन गई है। राजनीति के केंद्र राजधानी में रहते वक्त तुलसी की तर्ज पर कोई साहित्यकार लाख ये कहता रहे कि उसका राजनीति में क्या काम...लेकिन हकीकत तो यही है कि उसका रोज ब रोज का सीधा साबका भले ही राजनेताओं से नहीं पड़ता हो.. राजनीति से जरूर पड़ता है। रोटी-कपड़ा से लेकर दैनंदिन जीवन की तमाम घटनाओं पर राजनीति का ही ज्यादा असर है। राजनीति के बिना आज की जिंदगी की कल्पना भी बेमानी है। जाहिर है इस माहौल से साहित्यकार लाख कोशिशों के बावजूद बच नहीं सकता।
सत्ता का तरीका लाख बदल जाए, उसके स्वरूप में भले ही आमूलचूल परिवर्तन हो जाए, लेकिन उसका मूल चरित्र एक जैसा ही रहता है। राजतंत्र में भी शासकों का एक ही काम था आम लोगों पर शासन करना। लोकतंत्र में जनता का दबाव भले ही ज्यादा हो, लोकतांत्रिक शासक का भी मूल चरित्र राजतंत्रिक शासकों से अलग नहीं है। यही वजह है कि आज के शासक भी लोकतांत्रिक मूल्यों की दुहाई देने के बावजूद साहित्यकारों से वैसी ही उम्मीद रखते हैं, जैसी उम्मीद अकबर जैसा महान शासक भी रखता था। यानी सत्ताएं हमेशा चाहती हैं कि साहित्य को उसका अनुगामी होना चाहिए। भक्ति या रीतिकाल में जो कवि सत्ता के साथ रहता था, उसके लिए भव्य राजमहल, जागीर का प्रबंध होता था, लोकतांत्रिक समाज में भी सत्ताओं के साथ रहने वाले साहित्यकारों की भी हालत कुछ ऐसी ही है। मध्यकाल में कोई कबीर या कुंभन दरबार में जाने और वहां मत्था टेकने से इनकार करता था तो उसे फाकामस्ती की जिंदगी गुजारने के लिए मजबूर होना पड़ता था। आज भी हालात बदले नहीं हैं। उनका तरीका जरूर बदल गया है। यही वजह है कि आज भी साहित्यकार की बात की बजाय आज का शासक अपने दलीय साथियों का ज्यादा ध्यान रखता है। अगर ऐसा नहीं होता तो हिंदी की दुनिया में अपने खास तरह के लेखन के लिए मशहूर कृष्ण बलदेव वैद का नाम दिल्ली की हिंदी अकादमी 2008 के शलाका सम्मान के लिए पहले चुनती नहीं और फिर किसी छुटभैये नेता के कहने पर उसे खारिज भी नहीं कर देती। उनके उपन्यास नसरीन और विमल उर्फ जाएं तो जाएं कहां पर कांग्रेस के एक छुटभैये नेता ने अश्लीलता का आरोप लगाया। इसे लेकर उन्होंने दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को चिट्ठी लिखी...सुशिक्षित ...संभ्रांत और पढ़ने-लिखने में दिलचस्पी रखने वाली शीला दीक्षित ने ये परवाह भी नहीं की कि उनके फैसले के बाद क्या ज्वार उठ सकता है। कृष्ण बलदेव वैद का नाम पुरस्कृत होने वाली सूची से गायब हो गया। हिंदी अकादमी ने इस पर चुप्पी ही साध ली।
जैसी की उम्मीद थी, ज्वार तो उठना ही था और ज्वार उठा भी। उदारीकरण के दौर में हिंदी के लेखक की आज भी वैसी स्थिति नहीं बन पाई है, जैसी कुल जमा दो-तीन किताबें लिखने वाले अंग्रेजी लेखक चेतन भगत की बन गई है। हिंदी वालों के लिए आज भी लाख रूपए बड़ा सपना है। जबकि हिंदी अकादमी का शलाका सम्मान ही दो लाख 11 हजार रूपए का है। कम ही लोगों को उम्मीद रही होगी कि हिंदी के लेखक एक साथ अपने एक साथी के सम्मान पर चोट पहुंचाए जाने के खिलाफ लामबंद हो जाएंगे। लामबंद ही नहीं हुए, बल्कि 2009 के शलाका सम्मान विजेता मशहूर कवि केदारनाथ सिंह के साथ पुरस्कार लौटाने का ऐलान कर दिया। हिंदी में यह पहला मौका है, जब विचारधारा और ग्रुपों से उपर उठकर लेखकीय स्वाभिमान के लिए एक साथ उठ खड़ी हुई है। इन विरोधी सुरों का ही दबाव है कि हिंदी अकादमी को अपने पुरस्कार समारोह को टालना पड़ा। कुछ लोगों को उम्मीद थी कि हिंदी अकादमी और उसकी पदेन अध्यक्ष दिल्ली की कुलशील मुख्यमंत्री शीला दीक्षित अपनी गलती को सुधारेंगी और वैद का सम्मान बहाल किया जाएगा। मैकियावेली ने अपनी पुस्तक द प्रिंस में लिखा है कि शासक का चरित्र कम ही बदल पाता है। शीला दीक्षित के फैसले ने मैकियावेली के इस कथन को ही साबित किया है। कृष्ण बलदेव वैद को पुरस्कार भले ही न मिले, लेकिन इतना तय है कि लेखकों की इस एकता के बाद कम से कम भविष्य में कोई राजनीतिक सत्ता ऐसी हरकत दोबारा करने से पहले सौ बार सोचेगी।

रविवार, 4 अप्रैल 2010

नागरी लिपि या रोमन हिंदी


उमेश चतुर्वेदी
1957 में लखनऊ से प्रकाशित युगचेतना पत्रिका में रघुवीर सहाय की हिंदी पर एक कविता छपी थी, जिसमें उन्होंने हिंदी को दुहाजू की नई बीवी बताया था। राजनीतिक सत्तातंत्र के हाथों हिंदी की जो कथित सेवा हो रही थी, इस कविता के जरिए रघुवीर सहाय ने उसकी पोल खोली है। इसे लेकर तब बवाल मच गया था। खालिस हिंदी वाले ने हिंदी की असल हकीकत बयां की थी तो हिंदी वाले ही नाराज हो गए थे। कुछ ऐसा ही इन दिनों भी देखने में आ रहा है। हिंदी की अकादमिक और साहित्यिक दुनिया में रसूखदार असगर वजाहत ने हिंदी को रोमन लिपि में लिखने का सुझाव दिया है। उनका तर्क है कि अगर ऐसा हुआ तो हिंदी का प्रसार काफी तेजी से बढ़ेगा। 53 साल बाद इस एक बयान के बाद ही असगर वजाहत हिंदी वालों की ही आलोचना के केंद्र में आ गए हैं। असगर वजाहत ने तर्क दिया है कि हिंदी का सबसे ज्यादा प्रचार-प्रसार करने वाले टेलीविजन और फिल्मों की दुनिया में अभिनेताओं के डायलॉग रोमन में लिखा जा रहा है। अधिकांश प्रोड्यूसर और डायरेक्टर पटकथाएं और संवाद पारंपरिक देवनागरी लिपि में लिखने की बजाय रोमन लिपि में लिखने के लिए अपने पटकथा और संवाद लेखकों पर जोर डाल रहे हैं। इसी का हवाला देकर असगर वजाहत हिंदी के रहनुमाओं को देवनागरी लिपि की बजाय रोमन में लिखने का सुझाव दे रहे हैं। हिंदी का व्यापक तौर पर प्रचार और प्रसार हो, उसे सही मायने में राजभाषा का दर्जा मिले, राष्ट्र का प्रशासनिक और राजनीतिक काम हिंदी में हो, इससे भला किसी को क्यों ऐतराज होगा। लेकिन हमारी हिंदी की पहचान रही देवनागरी लिपि की जगह रोमन को अपनाने की बात शायद ही किसी को पचेगी। यह सच है कि गेट और डंकल प्रस्तावों के बाद दुनियाभर में आए उदारीकरण के झोंके ने अंग्रेजी के प्रसार में मदद की है। जाहिर है कि रोमन लिपि जापान से लेकर लैटिन अमेरिका के देश ब्राजील और रूस से लेकर फ्रांस तक में पढ़ी जाती है, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सिर्फ रोमन लिपि अख्तियार कर लेने से ही किसी भाषा को समझने का सूत्र हाथ नहीं लग जाता है। अगर ऐसा ही होता तो रोमन में लिखी फ्रेंच और जर्मन को भी आज हर वह व्यक्ति समझना शुरू कर चुका होता, जो अंग्रेजी जानता है। इसी तरह से उसे लैटिन अमेरिकी और अफ्रीकी भाषाएं भी समझ में आ रही होती। क्योंकि दुनियाभर में जहां-जहां ब्रिटेन की सत्ता रही है, कुछ एशियाई देशों को छोड़ दें तो वहां की सरकारों ने अपनी आजादी के बाद अपनी भाषाओं के लिए रोमन लिपि को ही प्राथमिकता दी। ऐसे में होना तो यह चाहिए था कि रोमन लिपि पढ़ने-समझने वाले लोग जिम्बाब्वे की भी भाषा को समझ रहे होते। दक्षिण अफ्रीका में अंग्रेजी के साथ ही स्थानीय जुलू भाषा के लिए भी रोमन लिपि का ही इस्तेमाल होता है, लेकिन जिन्हें अंग्रेजी आती है, वे रोमन में लिखी वहां की अंग्रेजी ही समझते हैं, जुलू भाषा को नहीं। वर्ष 1948 में तुर्की की आजादी के बाद वहां के शासक कमालपाशा ने भी रोमन लिपि का इस्तेमाल किया था, लेकिन तुर्की भाषा दुनियाभर में लोकप्रिय नहीं हो पाई। दुनियाभर में जब यह फार्मूला चल नहीं पाया तो हिंदी में इसके कामयाब होने की गारंटी कैसे दी जा सकती है। देवनागरी से दूर हिंदी को ले जाने का सुझाव देने के लिए मीडिया में रोमन की लोकप्रियता को बड़ा आधार बताते हुए असगर वजाहत साहब कुछ-कुछ पुलकित नजर आ रहे हैं, लेकिन यह सुझाव देते वक्त वह यह भूल गए कि हिंदी के बाजार में जो लोग रोमन के जरिए कारोबार कर रहे हैं, उनका मूल उद्देश्य अपना कारोबार करना मात्र है, हिंदी की सांस्कृतिक परंपरा को और ज्यादा संजीदा और मूल्यवान बनाना नहीं है। वे सिर्फ कारोबार करने आए हैं, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कारोबारियों को जिस दिन लगेगा कि अब वे रोमन की बजाय चीनी लिपि के जरिए कमाई कर सकते हैं, वे रोमन को भी भूल जाएंगे। उनके लिए बाजार में चलने वाली भाषा उनकी बड़ी और कारोबारी दोस्त हो जाएगी। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि भाषाएं संस्कृति का अहम उपादान होती हैं। जिन लिपियों के सहारे वे खुद को अभिव्यक्त करती हैं, उनके जरिए वे अपनी संस्कृति को भी स्वर देती हैं। बाजार की भाषा का इससे कोई लेना नहीं होता। फिल्म और बॉलीवुड की दुनिया में रोमन में लिखे संवाद और पटकथाएं स्वीकार्य हो रही हैं, लेकिन इसके जरिए हिंदी को जो नुकसान हो रहा है, उसे भी देखना-परखना होगा। नागरी लिपि को दुनियाभर के भाषाविज्ञानी सबसे बेहतर और वैज्ञानिक लिपि घोषित कर चुके हैं। दुनिया में जितनी भी भाषाएं और उनकी लिपि है, दरअसल वे स्थानीय भाषाई जरूरतों के मुताबिक विकसित हुई हैं। रोमन के साथ यह स्थिति नहीं है। रोमन में च और क के लिए आपको सीएच का इस्तेमाल मिल जाएगा, यहां बीयूटी बट हो सकता है तो पीयूटी पुट हो जाता है। देवनागरी में ऐसी अराजकता आपको शायद ही देखने को मिले। र वर्ग की ध्वनियों को छोड़ दें तो बाकी हर तरह की जो ध्वनियां हैं और उनका जो उच्चारण है, उसे सही तरीके से नागरी लिपि ही अभिव्यक्त कर पाती है। रोमन लिपि के साथ यह सुविधा नहीं है। वहां द और ड दोनों के लिए एक ही डी अक्षर का इस्तेमाल होता है। इसीलिए रोमन में लिखी स्कि्रप्ट को याद करने के बाद कई अभिनेता डाल को दाल और दाल को डाल बोलते नजर आते हैं। अगर रोमन को हिंदी की लिपि के तौर पर स्वीकार कर लिया गया तो क्या गारंटी है कि दाल और डाल को अलग तरह से बोला जाएगा। इसी तरह से ध्वनि दोषों को सुधारने के लिए कैसे उपाय किए जाएंगे। अगर किसी को मेरा बच्चा पसंद नहीं आता तो इसका यह मतलब तो नहीं हो सकता न कि मैं अपने बच्चे को ही छोड़ दूं और दूसरे के बच्चे को अपनाने की सोचने लगूं। अगर मेरे बच्चे में खराबी या बुराई है तो होना तो यह चाहिए कि मैं उसके स्वाभाव को बदलने की कोशिश करूं, लेकिन दुर्भाग्य से अपनी हिंदी के साथ ऐसा ही हो रहा है। हवाला तो यह भी दिया जा रहा है कि मोबाइल क्रांति के दौर में एसएमएस में हिंदी का इस्तेमाल तो हो रहा है, लेकिन उसकी अभिव्यक्ति का माध्यम रोमन लिपि ही बन रही है। इसकी वजह यह नहीं है कि रोमन ज्यादा सहज है, इसलिए उसे यह जिम्मेदारी निभानी पड़ रही है। चूंकि यह तकनीकी क्रांति पहले अंग्रेजी में ही हुई और उसकी ऑपरेटिंग भाषा अंग्रेजी ही है। यही वजह है कि वहां रोमन का चलन बढ़ा, लेकिन दुनिया में जैसे-जैसे मोबाइल कंपनियां अंग्रेज दुनिया से बाहर के बाजार में अपने पांव फैला रही हैं, वहां की स्थानीय भाषाओं और लिपियों को भी अपने ऑपरेटिंग सिस्टम में शामिल कर रही हैं। अरब देशों में अरबी लिपि, चीन में चीनी लिपि और जापान में जापानी लिपि में न सिर्फ एसएमएस करने की सुविधा मोबाइल कंपनियां मुहैया करा रही हैं, बल्कि ऑपरेटिंग सिस्टम को उन्हीं भाषाओं के आधार पर दुरुस्त और सहज बना रही हैं। बाजार जब आता है तो ऐसे ही स्थानीय संस्कृतियों पर हमला करता है। उसके लिए सांस्कृतिक मूल्यों का कोई महत्व नहीं रहता। उदारीकरण के दौर में जब से अमेरिकी अर्थव्यवस्था ने अपनी आगोश में पूरी दुनिया को लेना शुरू किया, उसने देसी भाषाओ पर भी जोरदार हमला बोला। दुनिया में तीसरे नंबर पर बोली जाने वाली भाषा हिंदी की रेडियो सर्विस को बंद करने की प्रमुख वजह तो यह भी समझी जा रही है कि उसने यह मान लिया है कि हिंदी की धरती पर भी उसका काम अंगरेजी में चल सकता है। असगर वजाहत हिंदी के समझदार और प्रतिष्ठित बौद्धिक है, ऐसे में यह मान लेना कि उन्हें ये सब चीजें पता नहीं होंगी, ऐसा मानना भोलापन ही माना जाएगा। उन्हें भी पता होगा कि हिंदी के लिए रोमन लिपि का यह शिगूफा तात्कालिक तौर पर भले ही फायदेमंद हो, इसके दूरगामी नतीजे हिंदी की सेहत और अस्तित्व के लिए घातक होंगे। रोमन को स्वीकार करना दरअसल अंग्रेजी मानसिकता के सामने झुकना होगा। अंग्रेजी वर्चस्व वाली दुनिया दरअसल यही चाहती हैं। ऐसे में उनका ही काम आसान होगा। हम हिंदीवालों को तय करना है कि हम बाजार के सामने समर्पण करना चाहते हैं या फिर बाजार को खुद के मुताबिक बदलने की कोशिश करेंगे।

गुरुवार, 18 मार्च 2010

लंदन में 'फैसले ' की धूम


लंदन के नेहरू केंद्र के सभागार में 18 मार्च को भारी हुजूम उमड़ा। मौका था मशहूर लेखिका और फिल्म निर्माता-निर्देशक रमा पांडे की किताब फैसले के लोकार्पण का। भारतीय मुस्लिम महिलाओं की जिंदगी पर बने टीवी सीरियल पर आधारित रमा पांडे की इस किताब में उन महिलाओं की जिंदगी पूरी शिद्दत से झांकती है। इस किताब का लोकार्पण लेबर पार्टी की कौंसिलर जाकिया जुबैरी ने किया। इस मौके पर फैसले की कुछ कहानियों की सीडी और डीवीडी भी लांच की गई। इस मौके पर जाकिया जुबैरी ने कहा कि इस किताब का हर पन्ना मैंने चाट लिया है। इसका हर एपिसोड मुझे भारतीय मुस्लिम महिलाओं की जिंदगी का आईना जैसा लगता है। जुबैरी ये कहने से भी नहीं चूकीं कि सियासत एपिसोड में वे खुद को भी कही ना कहीं पाती हैं।
टेलीविजन और रेडियो की चर्चित शख्सियत रमा पांडे ने अपने आसपास बिखरे किरदारों पर 26 एपिसोड का सीरियल बनाया है। फैसले में उन्हीं कहानियों को संकलित किया गया है। इस समारोह में आकर्षण का केंद्र रहीं अफगानी लेखिका सोफिया। अफगानिस्तान से आईं सोफिया ने कहा कि इस किताब के हर हर्फ का अनुवाद किया जाना जरूरी है। ताकि यह बात उन महिलाओं तक भी पहुंचे, जिनके लिए ये सीरियल बनाया गया है।
बीबीसी हिंदी सेवा से जुड़ी मशहूर लेखिका अचला शर्मा ने इस लोकार्पण समारोह का संचालन किया। इस मौके पर नेहरू सेंटर के हॉल को जयपुरी दुपट्टे से खासतौर पर सजाया गया था। दरअसल जयपुरी दुपट्टे बनाने वाले रंगरेजों की कहानी इस सीरियल के सुलताना एपिसोड में दिखाया गया है। इस कार्यक्रम में जाने - माने अंग्रेजी उपन्यासकार लारेंस नारफोक और बीबीसी हिंदी सेवा के पूर्व प्रमुख कैलाश बुधवार समेत कई हस्तियां शामिल हुईं।

गुरुवार, 11 मार्च 2010

नहीं बदल रहा मीडिया का मिजाज


उमेश चतुर्वेदी
टैम की रेटिंग प्वाइंट यानी टीआरपी के मौजूदा पैमाने पर इन दिनों सवालिया निशान लगाने वालों में वे लोग भी शामिल हो गए हैं, जो हाल के दिनों तक इसके पैरोकार रहे हैं। इसके जरिए एक बार फिर से खबरों की बुनियादी संरचना और उसके विषय को लेकर गंभीर बहस शुरू हो गई है। जिसे मुख्यधारा की पत्रकारिता में स्वागत भी किया जा रहा है। ऐसा माना जा रहा है कि इस बहस के जरिए भूत-प्रेत और जादू-टोने से लेकर अतीन्द्रीय किस्म की मनोरंजक खबरों की बजाय सरोकार वाले समाचारों को लेकर मीडिया जगत का रवैया बदल रहा है। जाहिर है, इस बहस के जरिए सरोकारी पत्रकारिता के पैरोकारों की उम्मीदें बढ़ गई हैं। लेकिन क्या सचमुच दुनिया बदल गई है या फिर हाल के दिनों में टीआरपी बटोरने का जो तरीका रहा है, उसी लीक पर आज का मीडिया चल रहा है। इसे समझने के लिए हाल के दिनों की कुछ घटनाओं को लेकर मीडिया कवरेज को देखा जाना चाहिए।
27 फरवरी को जनसंघ के वरिष्ठ नेता रहे नानाजी देशमुख का निधन हुआ। नानाजी भले ही दक्षिणपंथी धारा के महत्वपूर्ण स्तंभ रहे हैं। लेकिन उनका संबंध समाजवादी राजनीति के अलंबरदारों से भी गहरा रहा है। लेकिन उनके निधन को टेलीविजन की तो बात ही छोड़िए, अखबारों तक ने वह कवरेज नहीं दी, जिसके वे हकदार थे। नानाजी देशमुख से लोगों का विरोध हो सकता है, लेकिन भारतीय राजनीति में उनके योगदान को नकारा नहीं जा सकता। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के हीरो रहे डॉक्टर राममनोहर लोहिया ने जिस गैरकांग्रेसवाद की नींव रखी थी, उसको जमीनी स्तर पर पहली बार अमलीजामा 1967 में ही पहनाया जा सका। भारतीय राजनीति के अध्येताओं को पता है कि अगर नानाजी देशमुख नहीं होते तो डॉक्टर लोहिया और जनसंघ प्रमुख दीनदयाल उपाध्याय एक साथ नहीं बैठते और 1967 के चुनावों के बाद नौ राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें नहीं बनतीं। भारतीय राजनीति को तब तक आजादी के आंदोलन से साख हासिल कर चुकी कांग्रेस को अभेद्य माना जाता था। लेकिन नानाजी देशमुख के चलते उस दौर की कांग्रेस विरोधी दो धाराएं- समाजवादी आंदोलन और दक्षिण पंथी विचारधारा साथ आई थी। इस साथ ने कांग्रेस को पहली बार पटखनी देने में कामयाबी हासिल की थी। 1967 का ये प्रयोग अगर नहीं हुआ होता तो शायद 1977 में भी गैरकांग्रेस का नारा सफल नहीं हुआ होता और तब तक भारतीय राजनीति में सर्वशक्तिमान मानी जाती रहीं इंदिरा गांधी की बुरी हार नहीं हुई होती। आजादी के तत्काल बाद गठित जनसंघ और समाजवादी पार्टियां कम से कम एक मसले पर एक जैसा विचार रखती थीं। कांग्रेस विरोध के वैचारिक धरातल पर साथ काम करते रहे दोनों दलों ने 1967 से पहले चुनावी मैदान में साथ उतरने को सोचा होगा। लेकिन दोनों विचारधाराओं को चुनावी बिसात पर साथ लाने में जिन लोगों ने अहम योगदान दिया, उनमें नानाजी देशमुख भी थे। उन्हीं दिनों चंद्रशेखर से भी उनका गहरा संपर्क हुआ और इस प्रखर और खरे समाजवादी के साथ उनका साथ ताजिंदगी बना रहा।
1967 में कांग्रेस विरोध के बहाने ही दोनों विचारधाराओं में साथ आने की जो हिचक दूर हुई, उसका ही असर है कि 1977, 1989 और 1998 में नया इतिहास रचा गया। सबको पता है कि इन्हीं सालों में कांग्रेस को हराकर केंद्र में गैरकांग्रेसी सरकारें बनीं। नानाजी की विचारधारा से असहमत होने का लोकतांत्रिक समाज में सबको अधिकार होना चाहिए। लेकिन भारतीय राजनीति में उनके योगदान को कम करके नहीं आंका जा सकता। अगर इन अर्थों में देखें तो उनकी मौत मीडिया के लिए सिर्फ सूचना बन कर आई। उसके लिए बड़ी खबर नहीं बन पाई। सरोकारी पत्रकारिता का दावा करने वाले अखबारों तक में उन्हें लेकर छोटी खबरें ही जगह बना पाईं।
यह हालत सिर्फ नानाजी के साथ ही नहीं है। देश की राजनीति में भूचाल लाकर इतिहास रचने वाले दूसरे महापुरूषों के साथ भी कुछ ऐसा ही होता रहा है। 11 अक्टूबर 1942 और 1977 के हीरो जयप्रकाश नारायण का जन्मदिन है। यह सुखद संयोग ही है कि इसी दिन अमिताभ बच्चन भी पैदा हुए थे। लेकिन हर साल 11 अक्टूबर को मीडिया जितना स्पेस अमिताभ बच्चन को देता है, उसका दसवां हिस्सा भी जयप्रकाश नारायण को नहीं देता। अमिताभ ने मनोरंजन की दुनिया में भले ही नए कीर्तिमान बनाए हों, लेकिन उनके सामने जयप्रकाश नारायण का महत्व कम नहीं हो जाता। बल्कि सच तो ये है कि अगर जयप्रकाश नहीं होते तो शायद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार ही बहाल नहीं हो पाता, जिसे इमरजेंसी के दौरान छीन लिया गया था।
सरोकारी पत्रकारिता करने वाले मीडिया के लोगों का इस विरोधाभास पर जवाब बेहद सधा हुआ है। उनका कहना है कि नानाजी और जयप्रकाश नारायण को नई पीढ़ी नहीं जानती। इसीलिए उनसे जुड़ी खबरों को ज्यादा स्पेस नहीं दिया जा सकता। पूरी दुनिया में मीडिया के तीन काम पढ़ाए-बताए जाते रहे हैं- सूचना देना, शिक्षा देना और मनोरंजन करना। सवाल है कि जब तक नई पीढ़ी को बताया नहीं जाएगा, तब तक वह नानाजी या जयप्रकाश नारायण के बारे में कैसे जानेगी। ऐसे सवालों का जवाब देने की बजाय मीडिया यह कहकर उससे किनारा करने में देर नहीं लगाता कि मीडिया का काम पढ़ाई कराना नहीं है।
यह सच है कि आजादी के बाद से मीडिया में भी भारी बदलाव आए हैं। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अगर आजादी के आंदोलन के दौरान भी मीडिया ऐसा ही रवैया अख्तियार किए रहता तो क्या आजादी की अलख उतनी तेजी से जलाई रखी जा सकती थी, जितनी तेजी से वह रोशनी और तपिश फैलाती रही। निश्चित तौर पर इसका जवाब ना में होगा। ऐसे सवालों से किनाराकसी करके मीडिया एक तरह से यही साबित करता है कि वह अपने पहले दो फर्जों की बजाय तीसरे यानी सिर्फ मनोरंजन पर ही ज्यादा ध्यान दे रहा है। और अगर ऐसा है तो निश्चित तौर पर सरोकारी पत्रकारिता को लेकर जारी बहस को ही झुठलाने का प्रयास किया जा रहा है। हकीकत तो यही है कि गंभीर और सरोकारी पत्रकारिता को लेकर अभी भी माहौल सकारात्मक नजर नहीं आ रहा है। अब भी खबरों के चयन और उसके प्रकाशन - प्रसारण को लेकर लोकप्रियता और टीआरपी बटोरू मौजूदा रवैया ही महत्वपूर्ण आधार बना हुआ है। ऐसे में टैम की रेटिंग प्वाइंट पर सवाल उठाने और उसके औचित्य को कटघरे में खड़ा करने का भी कोई फायदा मिलना आसान नहीं होगा।

शनिवार, 9 जनवरी 2010

अखबारों पर भरोसा बरकरार

उमेश चतुर्वेदी
अमेरिका और यूरोप में जैसे-जैसे इंटरनेट का प्रसार बढ़ता जा रहा है, अखबारों के प्रसार में गिरावट देखी जा रही है। इसके चलते वहां अखबारों के अस्तित्व पर ही सवाल उठने लगा है। चार साल पहले ब्रिटेन की पत्रिका द इकोनॉमिस्ट में प्रकाशित कवर स्टोरी- हू किल्ड द न्यूजपेपर – के बाद ये सवाल जबर्दस्त तरीके से उछला। ऐसी हालत में प्राइसवाटर हाउसकूपर की ताजा रिपोर्ट अखबारी दुनिया को राहत दे सकती है। वर्ल्ड एसोसिएशन ऑफ न्यूज पेपर्स की पहल पर प्राइसवाटर हाउसकूपर ने हाल ही में अमेरिका और ब्रिटेन के 4900 पाठकों, तीस बड़े मीडिया घराने और दस बड़ी विज्ञापनदाता कंपनियों से सर्वे के बाद एक रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट से साफ हुआ है कि भले ही पश्चिमी दुनिया में अखबारों की बजाय इंटरनेट को ज्यादा तरजीह दी जाने लगी है। लेकिन अब भी ज्यादातर लोगों को प्रिंट पर ही भरोसा है। जबकि सिर्फ बासठ फीसदी लोग ही पैसे देकर इंटरनेट पर उपलब्ध या अखबारों के डिजिटल संस्करणों को पढ़ने के लिए तैयार हैं। पश्चिमी अखबारी जगत के लिए ये रिपोर्ट जहां चौंकाने वाली है, वहीं इंटरनेट के प्रति अखबारी संस्थानों के बढ़ते भरोसे को संतुलित करने के लिए भी काफी है। अखबारी प्रसार में गिरावट के बाद मीडिया मुगल रूपर्ट मर्डोक के प्रकाशनों समेत द टाइम्स न्यूयार्क जैसे प्रकाशन भी अपने इंटरनेट संस्करणों की पाठकों के बीच मुफ्त पहुंच को सीमित करने के लिए जरूरी सॉफ्टवेयर के विकास में जुट गए हैं। ताकि इन प्रकाशनों के इंटरनेट संस्करणों तक उन्हीं पाठकों की पहुंच हो, जो इसके लिए कीमत चुकाने को तैयार हों। लेकिन प्राइसवाटर हाउसकूपर की इस रिसर्च रिपोर्ट से साफ है कि विकसित दुनिया के पाठकों में इंटरनेट के प्रति वैसा भरोसा नहीं है, जैसा कि प्रिंट के प्रति है। क्योंकि प्रिंट के लिए अब भी शत-प्रतिशत लोग कीमत चुकाने के लिए तैयार हैं।
परंपरा की पूंजी के चलते चाहे पूरब का समाज हो या पश्चिम का, प्रिंट बड़ी ताकत बना हुआ है। यही वजह है कि पाठकों का उसमें भरोसा बना हुआ है। यही वजह है कि विज्ञापनदाताओं का भी उन पर भरोसा बरकरार है। इसकी तस्दीक प्राइसवाटर हाउस कूपर की रिसर्च रिपोर्ट भी करती है। रिपोर्ट के मुताबिक डिजिटल माध्यमों की ओर विज्ञापन का प्रवाह बढ़ रहा है। लेकिन विज्ञापनदाता गंभीर और भरोसेमंद पाठकों को लुभाने के लिए अखबारों पर ही ज्यादा भरोसा जता रहे हैं। इसमें उन अखबारों की संभावना ज्यादा बेहतर नजर आ रही है, जिन्होंने अपने डिजिटल या इंटरनेट या फिर दोनों तरह के संस्करण शुरू कर रखे हैं। यानी उन अखबारों पर विज्ञापनदाताओं का भरोसा बना हुआ है, जो बदलते दौर में नई तकनीक को आत्मसात करने में पीछे नहीं हैं। हालांकि इस रिपोर्ट में ये अफसोस भी जताया गया है कि यह चलन अभी ज्यादातर अखबार समूहों में शुरू नहीं हो पाया है। बहरहाल रिपोर्ट ने उम्मीद जताई है कि बाजार में अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए देर-सबेर सभी प्रकाशनों को अपने डिजिटल या इंटरनेट संस्करणों को बेहतर बनाना ही पड़ेगा।
वैसे वैश्विक मंदी और आर्थिक संकट के चलते ये भी सच है कि अखबारों की राह कठिन हुई है। प्राइसवाटर हाउस कूपर की इस रिपोर्ट में भी अनुमान लगाया गया है कि समाचार पत्रों के ग्लोबल बाजार में इस साल 10.2 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की जाएगी। और 2013 तक इसमें हर साल करीब दो प्रतिशत की गिरावट देखी जाएगी। प्राइसवाटर हाउसकूपर की रिपोर्ट ने विज्ञापनों में गिरावट की भी उम्मीद जताई है। यही वजह है कि अखबारों के लिए विज्ञापनों में कमी आई है। कूपर की रिपोर्ट के ही मुताबिक खुद मीडिया संस्थान ही मानते हैं कि वैश्विक मंदी और विज्ञापनों में गिरावट के चलते वे अपना घाटा 2011 में ही पूरा कर पाएंगे। यानी उम्मीद की किरणें बनी हुई हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि अखबार कैसे बचे रह सकते हैं। प्राइसवाटर हाउसकूपर की रिपोर्ट से साफ है कि पाठकों के भरोसे के चलते विज्ञापन उद्योग का प्रिंट पर भरोसा बना रहेगा। लेकिन यह भी सच है कि पाठकों के भरोसे को बनाए रखने के लिए प्रिंट को नए-नए प्रयोग भी करने होंगे। इसकी तस्दीक द इकोनॉमिस्ट को दिए अपने एक इंटरव्यू में मीडिया मुगल रूपर्ट मर्डोक ने भी की थी। उन्होंने कहा था कि मीडिया हाउसों ने अपने प्रिंट संस्करणों के जरिए अकूत कमाई तो की, लेकिन अपने इन दुलारे प्रकाशनों के टिकाऊ विकास के लिए अनुसंधान और नये प्रयोगों पर पैसे खर्च करने के बारे में कभी नहीं सोचा। कहना ना होगा कि भारत के भी बड़े मीडिया संस्थान मर्डोक की इस बात से सहमत नजर आ रहे हैं। हाल ही में एक कार्यक्रम आईएनएस के अध्यक्ष और बॉम्बे समाचार समूह के प्रमुख होर्म्सजी कामा को भी कहना पड़ा कि बदलते दौर के मुताबिक खुद को नए रूप में ढालने के लिए समाचार-पत्रों को तैयार होना पड़ेगा। इसके लिए शोधपरक अध्ययन भी करना होगा। और तो और उन्होंने माना कि वही अखबार बाजार में मजबूती के साथ खड़े रहेंगे, जो अपनी डिजाइन, ले-आउट और स्वरूप में नयापन लाने की सफल कोशिश करेंगे।
जब-जब कोई नया माध्यम आता है, पुराने की मौत की आशंका जताई जाने लगती है। रेडियो- टीवी के आने के दौरान भी ऐसा ही हुआ था। लेकिन नई चुनौतियों से जूझते हुए प्रिंट माध्यम ने खुद को मजबूती से खड़ा होने का रास्ता तलाश लिया था और आगे बढ़ते रहे। ये सच है कि एक बार फिर उनके सामने ऐसी चुनौती आ खड़ी हुई है, लेकिन यह भी सच है कि इससे निबटने और खड़ा होने का रास्ता तलाश ही लेंगे।