शनिवार, 29 दिसंबर 2007

पत्रकारिता पर विचार -2

साक्षात्कार-2
दिनमान के सहायक संपादक रहे जितेंद्र गुप्त से उमेश चतुर्वेदी की बातचीत।

नई पीढ़ी के पत्रकारों को जितेंद्र गुप्त का नाम भले ही अनजाना हो, लेकिन एक पूरी की पूरी पीढ़ी जितेंद्र गुप्त को पढ़ते हुए आगे बढ़ी है। जितेंद्र हमेशा सहकारी ही रहे- कुछ वैसे ही जैसे सरस्वती पत्रिका में हरिभाऊ उपाध्याय महावीर प्रसाद द्विवेदी के सहकारी हुआ करते थे। जितेंद्र जी 1967 में दिनमान के शुरू होने के बाद से बतौर मुख्य उपसंपादक जुड़े और उनके बाद रघुवीर सहाय के भी सहायक संपादक रहे। बाद में कन्हैयालाल नंदन और घनश्याम पंकज के भी सहायक संपादक रहे। आखिरी दो-चार अंकों में दिनमान की प्रिंट लाइन में नाम भी छपा, लेकिन बतौर सहायक संपादक ही और 1992 में सहायक संपादक रहते ही रिटायर भी हो गए। इन पच्चीस वर्षों में उन्होंने पत्रकारिता, राजनीति और समाज को करीब से देखा है। आजादी के बाद से अब तक पत्रकारिता पर उनके अपने विचार हैं, अपनी चिंताएं भी हैं और जानकारी भी। पेश है उनसे उमेश चतुर्वेदी की बातचीत के प्रमुख अंश---
हिंदी पत्रकारिता की साठ साल की इस यात्रा को आप किस तरह से देखते
हैं ?

देखिए, मैं साठ साल की पत्रकारिता को मुख्यत: तीन हिस्सों में बांटता हूं। 1947 से पहले की पत्रकारिता मिशनरी भाव की पत्रकारिता थी। लेकिन मैं यहां साफ कर देना चाहता हूं कि आजादी के पहले भी आर्थिक हितों का ध्यान जरूर रखा जाता है। ऐसे भी पत्र और पत्रकार थे, जिन्होंने जुर्माना देकर अखबार निकाला, लेकिन अपने आर्थिक हितों का ध्यान रखने वाले भी लोग थे। शायद यही वजह है कि 1947 से 1962 तक की पत्रकारिता आशाओं और संभावनाओं की पत्रकारिता रही है। इसे आशाओं का दौर भी कह सकते हैं। आजादी के आंदोलन के दौरान जो सपने देखे गए थे, उन्हें पूरा करने का दौर था। पूरा देश नेहरू पर निगाह लगाए हुए था। इसी दौर में रिहंद, भाखड़ा, हीराकुंड जैसे बांध बने, भिलाई इस्पात संयंत्र की स्थापना हुई, एलआईसी का राष्ट्रीयकरण हुआ, जमींदारी उन्मूलन हुआ। तो देश में हर तरफ एक नया उत्साह था। लेकिन 1962 में चीन ने आक्रमण किया तो पता चला कि हम लोग तो कुछ कर ही नहीं सकते, और फिर पूरा परिदृश्य ही बदल गया।
तो क्या 1962 के बाद से पत्रकारिता भी बदल जाती है ?
जी हां, 1962 के बाद पूरी भारतीय पत्रकारिता बदलने लगती है। मैं 1962 से 1980 तक को एक दौर की पत्रकारिता मानता हूं। मोहभंग का दौर शुरू होने लगता है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि चीन के हमले के बाद जो देश पस्त पड़ा था- उसमें नया संचार आ जाता है। लाल बहादुर शास्त्री की अगुआई में देश पाकिस्तान पर 1965 में ऐतिहासिक जीत हासिल करता है। इसी दौर में गैर कांग्रेसवाद का बोलबाला बढ़ा। इसका असर दिखा भी। 1967 में हिंदी भाषी राज्यों में गैरकांग्रेसी सरकारें बनती हैं और देश में एक नई चेतना का संचार होता है। 1971 आता है और बांग्लादेश का निर्माण होता है। इसी दौर में दिनमान का प्रकाशन शुरू होता है और एक दौर ऐसा आता है कि पूरे हिंदीभाषी बौद्धिकों और राजनीतिक वर्ग का प्यारा साप्ताहिक बन गया। इमर्जेंसी इसी दौर में लगी। लोगों को जयप्रकाश नारायण और जनता पार्टी से नई उम्मीद जागती है। लेकिन उनसे भी मोहभंग होता है। क्योंकि जनता का ये प्रयोग भी नहीं चला।
1980 के बाद की पत्रकारिता को आप किस नजरिए से देखते हैं ?
इस दौर को मैं व्यवसायिकता को हावी होने का दौर मानता हूं। इसी दौर में इंदिरा गांधी की आर्थिक नीतियां बदलनी शुरू हुईं। राजीव के आते-आते तक तो देश में उदारीकरण का बीज रोपा जा सकता था। जिस पेप्सी और कोका कोला को 1977 में जार्ज फर्नांडिस की अगुआई में भगाया गया था, उसी पेप्सी को 1988-89 में राजीव गांधी ने भारत में काम करने की अनुमति दे दी। इस उदारीकरण ने पूरा परिदृश्य ही बदल दिया। राजनीति की दुनिया में भी बदलाव दिखने लगे। इसका असर पत्रकारिता पर भी दिखने लगा। इसी दौर में अखबारी संस्थानों में मालिकों की नई पीढ़ी आने लगी। जिसे ये देखकर कोफ्त होती थी कि उनके वेतनभोगी संपादकों को तो प्रधानमंत्री से मुलाकात का वक्त मिल जाता है। लेकिन उन्हें नहीं मिलता। तो उन्होंने संपादक नाम की संस्था पर ही हमला शुरू कर दिया। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। टाइम्स ऑफ इंडिया में उन दिनों गिरिलाल जैन जी संपादक थे और उनकी तूती बोलती थी। लेकिन नए मालिकों को गिरिलाल जी पसंद नहीं थे। टाइम्स ग्रुप में अमेरिका से पढ़कर समीर जैन आकर काम संभालना शुरू कर चुके थे। टाइम्स ग्रुप में एक परंपरा थी। साल के पहले रविवार को मुख्य उप संपादक रैंक से लेकर उपर तक के लोगों को टाइम्स प्रबंधन एक लंच पार्टी देता था। 1987-88 की बात है। एक ऐसी ही लंच पार्टी में तब के टाइम्स ऑफ इंडिया के सहायक संपादक दिलीप पडगांवकर से गिरिलाल जैन की नकल उतारने को कहा गया और उन्होंने किया भी। बाद में वे टाइम्स ऑफ इंडिया के संपादक बनाए गए। तो जाहिर है कि किस तरह संपादक संस्था पर मैनेजमेंट का शिकंजा कस रहा था। जाहिर है इस दौर में मालिकों की नई पीढ़ी ऐसे संपादक ढूंढ़ रही थी, जो उनके इशारे पर काम करे। इसका असर पत्रकारिता पर पड़ना ही था। यानी व्यवसायिकता हावी होनी शुरू हुई और इसका असर अब साफ नजर आ रहा है।
तो क्या इसी दौर में मालिक- संपादकों की परंपरा शुरू हुई ?
जहां तक टाइम्स ऑफ इंडिया की बात है तो 1980 के दौर में हिंदी प्रेमी रमारानी जैन और शांति प्रसाद जैन की मौत हो चुकी थी। इसका असर टाइम्स ग्रुप की हिंदी पत्रकारिता पर पड़ना शुरू हुआ। हिंदी पत्र तो पहले भी दूसरी प्राथमिकता पर थे। लेकिन दोनों की मौत के बाद ये प्रवृत्ति और बढ़ती गई। लेकिन हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि हिंदी में इसी दौर में दो अखबार ऐसे भी निकल रहे थे – जिनकी साख और गुणवत्ता राष्ट्रीय स्तर पर भी थी और ये दोनों अखबार मालिक संपादक ही निकाल रहे थे। जयपुर से कर्पूरचंद कुलिश और इंदौर से लाभचंद छजलानी नई दुनिया निकाल रहे थे। लेकिन मालिक संपादकों की परंपरा इसी दौर में शुरू होती है। इसी दौर में व्यवसायिकता हावी होने लगी। अखबारों के सरोकार बदलने लगे।
क्या आपको लगता है कि मौजूदा दौर में अखबार खबरिया टेलीविजन चैनलों के दबाव में हैं ? कहा तो ये भी जा रहा है कि आजकल आम आदमी के सरोकारों से अखबार दूर होते जा रहे हैं।
हां, दबाव में हैं। लेकिन ये कहना गलत होगा कि अखबारों से आम आदमी के सरोकार दूर हो रहे हैं। कम जरूर हो रहे हैं। लेकिन हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तरह अखबार बिल्कुल ही आम आदमी से दूर हो जाएंगे। इसकी एक वजह ये भी है कि अखबारों को आखिरकार आम आदमी के बीच ही बिकना है। इसलिए अखबारों की दुनिया से आम आदमी के सरोकार कम नहीं होने वाले। हां, टीवी के दबाव में चिकने पेज पर अर्द्धनग्न फोटो आजकल जरूर छपने लगे हैं। हां, ये जरूर है कि अखबारों में भी आम आदमी की बातें कम हो रही हैं। 27 हजार भूमिहीनों का एक जत्था गांधी जयंती पर ग्वालियर से अपनी पदयात्रा शुरू किया और राजघाट पर खत्म हुआ। लेकिन जैसी कवरेज इसकी होनी चाहिए थी, वैसी नहीं हुई। टीवी का दबाव अखबारों पर भी दिख रहा है। आज अखबारों में तस्वीरें दे रहे हैं।
आज के दौर में मध्यवर्ग सबसे बड़ा नियामक हो गया है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया उसका ज्यादा ध्यान रखता है, क्या अखबार भी मध्य वर्ग का ध्यान रखते हैं ?
हां, अखबार भी ध्यान रखते हैं। प्रियदर्शिनी मट्टू केस हो या फिर जेसिका लाल केस, ये विषय मध्य वर्ग को हिट करते हैं। इसलिए अखबारों ने इसे उछाला और इसका असर भी दिखा। मध्य वर्ग ही आज के दौर का प्रमुख खरीददार है। जाहिर है आज विज्ञापन भी उसके लिए बन रहे हैं और अखबारों को मिल रहे हैं। ऐसे में उनकी पसंद की चीजें और उनकी जिंदगी पर असर डालने वाली चींजें भी प्रकाशित होंगी ही और अखबार इससे मुंह नहीं मोड़ सकते।
आज मीडिया का एजेंडा कौन तय कर रहा है, राजनीति, बाजार की ताकतें या फिर मीडिया संस्थान ?

मीडिया का एजेंडा तो सोलह आने कोई नहीं तय कर रहा है। राजनीति कई बार अपने ढंग से कुछ एजेंडा तय करती है। व्यवसायिक प्रतिष्ठान भी अपने ढंग से तय करते हैं। बाजार की ताकतें भी अपनी तरह से एजेंडा तय करती हैं। लेकिन ये सब एक सीमित मात्रा में ही होता है और हो सकता है। इसकी वजह ये है कि अखबार आखिरकार आम आदमी के लिए ही उत्पाद है। और जिस दिन उसे लगेगा कि उस पर एजेंडा थोपा जा रहा है तो वह उस अखबार – पत्रिका को नापसंद कर सकता है। इसलिए कई बार तो पाठक के हिसाब से भी एजेंडा तय होता है।
आप लंबे समय तक दिनमान से जुड़े रहे हैं। दिनमान के बंद होने की क्या वजहें रहीं?
देखिए, अस्सी के दशक में जब समीर जी(समीर जैन) ने टाइम्स ग्रुप की कमान संभाली तो उन्होंने एक बैठक बुलाई। उसमें मैं भी शामिल था। तब प्रिंट माध्यम का कुल विज्ञापन बजट 800 करोड़ का था। इनमें सबसे ज्यादा हिस्सा अखबारों को मिलता था, जबकि पत्रिकाओं का हिस्सा बेहद कम था। समीर जी ने कहा कि अगर हम पत्रिकाओं पर जोर देंगे तो अधिक से अधिक एक-आध प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हो सकती है। लेकिन इतना ही श्रम और पूंजी अखबारों पर लगाएंगे तो हमारी कमाई बढ़ जाएगी। जो दूसरी बात उन्होंने कही- वह ये कि हमारी बिजनेस फैमिली में जो बेटा एक करोड़ नहीं कमाता, उसे बाप भी बेटा नहीं मानता। यानी उस दौर में टाइम्स ऑफ इंडिया और नवभारत टाइम्स करोड़ों की कमाई तो कर रहे थे, लेकिन पत्रिकाओं की कुल कमाई एक करोड़ भी नहीं थी और समीर जैन को इन पर खर्च फिजूल लग रहा था। यानी जिस दिन समीर जी ने टाइम्स को संभाला, उसी दिन दिनमान समेत टाइम्स ग्रुप की सभी पत्रिकाओं के बंद होने की नींव पड़ गई। इसमें तब के संपादक रघुवीर सहाय बाधक थे। लिहाजा कन्हैंया लाल नंदन को संपादक बनाया गया। उन्हें कहा गया कि दिनमान को शहरोन्मुखी पत्रिका बनाओ। उन्होंने स्वीकार कर लिया। यह जानते हुए भी कि दिनमान का प्रमुख पाठक गांवों,छोटे शहरों और कस्बों में रहता है। जिसके यहां रोजाना के अखबार की पहुंच कम थी। जबकि शहरों में स्थिति उलट थी। तो हमें ना शहरी पाठकों ने पसंद किया और गांवों – समकालीन राजनीति पर हमने विचार करना ही छोड़ दिया तो ऐसे में हमें कोई क्यों पसंद करता। यानी ना खुदा मिला और ना बिसाले सनम।
क्या आपको लगता है कि भविष्य में दिनमान जैसी पत्रिका का कोई स्कोप है?
बिल्कुल नहीं, इसकी वजह भी है। आज सिर्फ जानपहचान से विज्ञापन मिलते हैं। कई बार तो पचास प्रतिशत तक कमीशन देना पड़ता है। मुझे पक्की जानकारी है कि इंडिया टुडे और आउटलुक तक का सर्कुलेशन घट रहा है। यही वजह है कि दोनों पत्रिकाएं साल में एक बार सेक्स सर्वे छापती हैं। फिर आज बिल्डर, चिट फंड मालिक और मॉल से पैसे कमाए एक वर्ग का बोलबाला बढ़ा है और वे लगातार पत्रिकाएं, चैनल या अखबार लांच कर रहे हैं। इसके पीछे उनका निहित स्वार्थ भी है। ऐसे में दिनमान जैसी पत्रकारिता को फंडिंग कौन करेगा। ये सबसे बड़ा सवाल है।

1 टिप्पणी:

संजय तिवारी ने कहा…

आपका स्वागत है. तो आपने भी ब्लाग बना ही लिया. नियमित लिखिए और कुछ एग्रीगेटरों पर इसे रजिस्टर करवा लीजिए. पर्याप्त संख्या में पाठक मिलने लगेंगे.
मुझे फोन भी कर सकते हैं 09868362658